Pretika › Real Experiences › भानपुरा की बावड़ी - चालीस सीढ़ियाँ
भाग 3 — तीसरी सीढ़ी
Piyashi Atma · Real Experiences · 24 मिनट
- Writer
- Piyashi Atma
- Story
- भानपुरा की बावड़ी - चालीस सीढ़ियाँ
- Chapter
- 3 of 31
- Category
- Real Experiences
- Reading time
- 24 min
- Words
- 4671
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
लोग कहते हैं कि तस्वीरें झूठ नहीं बोलतीं।
ये आधा सच है।
तस्वीरें झूठ नहीं बोलतीं, क्योंकि वो बोलती ही नहीं। वो बस दिखाती हैं। चुपचाप। बिना किसी सफ़ाई के। वो आपको वो चीज़ दिखाती हैं जो उस पल वहाँ थी — और फिर आप पर छोड़ देती हैं कि आप उसके साथ क्या करते हैं।
बारह साल से मैं तस्वीरें खींच रहा हूँ। शादियों में दूल्हे का घबराया चेहरा, किसी पुरानी हवेली की टूटी खिड़की, किसी बच्चे का पहला क़दम। मैंने हज़ारों पल क़ैद किए हैं।
पर उस सुबह तक मुझे कभी नहीं लगा था कि कोई पल मुझे भी क़ैद कर सकता है।
सूरज को हम उसके घर तक सहारा देकर ले गए।
वो चल तो रहा था, पर ऐसे जैसे उसके पैर उसके अपने न हों। हर क़दम पर वो रुकता, ज़मीन को देखता, और फिर अपना पैर बहुत सावधानी से रखता — जैसे उसे यक़ीन न हो कि नीचे पत्थर होगा या पानी। उसके होंठ लगातार हिल रहे थे, पर अब कोई आवाज़ नहीं आ रही थी।
भोला हलवाई का घर मिठाई की दुकान के पीछे था। सूरज की माँ ने दरवाज़ा खोला, बेटे को देखा — उसके भीगे पायजामे को, उसके पैरों की काई को — और बिना एक शब्द बोले ज़मीन पर बैठ गईं। उन्होंने चीख़ नहीं मारी। रोईं भी नहीं। बस बैठ गईं, जैसे किसी ने उनकी रीढ़ की हड्डी निकाल ली हो।
"फिर से," उन्होंने फुसफुसाकर कहा। "सत्रह साल बाद फिर से।"
अंदर से एक छोटी-सी बच्ची दौड़ती हुई आई। पाँच-छह साल की। दो चोटियाँ, लाल रिबन, फ्रॉक पर मिट्टी के दाग़।
"पापा!"
वो सूरज के पैरों से लिपट गई। और फिर, एक झटके से, पीछे हट गई।
"पापा, आप ठंडे क्यों हो?"
सूरज ने नीचे देखा। अपनी बेटी की तरफ़। और उस पल उसकी आँखों में जो था, वो मैं कभी नहीं भूलूँगा। एक बाप का डर। किसी भी भूत से बड़ा, किसी भी अँधेरे से गहरा।
"गुड्डी," उसने काँपती आवाज़ में कहा, "अंदर जा, बेटा। दादी के पास।"
बच्ची नहीं हिली। वो अब भी अपने पापा के पैरों को देख रही थी। उनके टख़ने के नीले निशानों को।
"पापा," उसने बहुत मासूमियत से कहा, "ये तो बिल्कुल वैसे ही हैं जैसे उस लड़के के हाथ हैं।"
हम तीनों — मैं, सूरज, और उसकी माँ — जम गए।
"कौन-सा लड़का, गुड्डी?" मैंने धीरे से पूछा, उसके सामने घुटनों के बल बैठते हुए।
उसने मुझे देखा। बड़ी-बड़ी काली आँखें। उसने कंधे उचकाए, जैसे बच्चे करते हैं जब उन्हें लगता है कि सवाल बहुत बेवक़ूफ़ी भरा है।
"नीली कमीज़ वाला। जो रात को खिड़की के बाहर खड़ा रहता है। वो भी गीला रहता है। वो कहता है वो पापा का दोस्त है।"
मैं दोपहर तक सूरज के घर रुका। वो बुख़ार में तपने लगा था, और उसकी माँ ने गाँव के वैद्य को बुलाया था — एक दुबले-पतले आदमी को, जिसने सूरज की नब्ज़ देखी, उसके टख़ने देखे, और फिर बिना कोई दवा दिए, बिना पैसे लिए, चुपचाप चला गया।
दरवाज़े पर उसने सिर्फ़ इतना कहा: "ये बुख़ार दवा का नहीं है, भाभी। इसके लिए रामप्यारी के पास जाओ।"
मैं घर लौटा। दादाजी के कमरे में गया। और अलमारी खोली।
कैमरे का बैग वहीं था जहाँ मैंने कल रखा था। ज़िप बंद।
पर बैग गीला था।
नीचे से नहीं — ऊपर से। जैसे किसी ने उसे गीले हाथों से उठाया हो। पकड़ा हो। देखा हो। और फिर वापस रख दिया हो। ज़िप के ठीक पास, चमड़े पर, छोटी उँगलियों के पाँच निशान थे, जो अब सूखकर हल्के हरे हो गए थे।
मैंने बैग खोला। कैमरा निकाला। चालू किया।
बैटरी फ़ुल थी। मुझे अच्छी तरह याद था कि दिल्ली से निकलते वक़्त वो आधी थी, और मैंने उसे चार्ज नहीं किया था। इस गाँव में तो ढंग से बिजली भी नहीं थी।
मैंने प्लेबैक का बटन दबाया।
पहली तस्वीर वही थी जो मैंने ली थी। पीपल वाली सड़क से, उस पहली शाम। बावड़ी, टीन की चादरें, ज़ंजीर, उल्टे दीये। शाम की नीली-नारंगी रोशनी।
और मुंडेर पर कोई बैठा था।
मैंने स्क्रीन को आँखों के पास लाया। ज़ूम किया।
एक बच्चा। मुंडेर के किनारे, टीन पर बैठा, पैर नीचे लटकाए। हाफ़ पैंट। नीली कमीज़। उसके बाल गीले थे और माथे पर चिपके थे। उसका चेहरा धुँधला था — मोशन ब्लर की तरह, जैसे शटर खुलने के उस एक पल में उसने बहुत तेज़ी से सिर हिलाया हो।
पर मैंने वो तस्वीर 1/250 सेकंड पर ली थी। उस स्पीड पर उड़ती चिड़िया भी साफ़ आती है।
चेहरा धुँधला था। पूरा चेहरा — नाक, होंठ, गाल, सब एक सफ़ेद-भूरी लकीर में घुले हुए।
सिवाय आँखों के।
आँखें बिल्कुल साफ़ थीं। तीखी। जैसे वो चेहरे का हिस्सा न हों, बल्कि उसके ऊपर चिपकाई गई हों। और वो सीधे कैमरे में देख रही थीं। सीधे लेंस में। सीधे मुझमें।
मैंने ज़ूम और बढ़ाया। पिक्सेल टूटने लगे। पर वो आँखें नहीं टूटीं। वो उतनी ही साफ़ रहीं, जितना ज़ूम बढ़ता गया। जैसे वो तस्वीर में नहीं, उसके पीछे हों।
मैंने कैमरा मेज़ पर रख दिया। मेरे हाथ ठंडे पड़ गए थे।
फिर मैंने उसे फिर से उठाया। क्योंकि मैं फ़ोटोग्राफ़र हूँ, और मैंने अभी तक पूरी तस्वीर नहीं देखी थी।
ज़ूम कम किया। पूरा फ़्रेम देखा। और तब मुझे दिखा।
बाईं तरफ़, फ़्रेम के बिल्कुल किनारे पर, पीपल के तने के पास, एक और आकृति थी। लंबी। दुबली। सफ़ेद धोती। कंधे पर गमछा।
एक बूढ़ा आदमी।
वो बावड़ी की तरफ़ नहीं देख रहा था। वो कैमरे की तरफ़ भी नहीं देख रहा था। उसका चेहरा मेरी तरफ़ था — उस जगह की तरफ़, जहाँ मैं सड़क पर खड़ा था। और उसका दाहिना हाथ ऊपर उठा था। हथेली बाहर की ओर। जैसे कोई ट्रैफ़िक पुलिस वाला गाड़ी रोकता है।
रुको।
उसका चेहरा साफ़ था। बिल्कुल साफ़।
दादाजी।
जिनकी चिता उस शाम से एक दिन पहले जल चुकी थी।
मैं बहुत देर तक उस तस्वीर को देखता रहा। दादाजी का चेहरा। उनकी आँखों में वो बेचैनी। उनका उठा हुआ हाथ। वो मुझे रोक रहे थे। वो मुझे वापस भेजना चाहते थे। उसी शाम, जब मैं पहली बार आया था।
और मैंने उन्हें देखा तक नहीं।
मैंने अगली तस्वीर के लिए बटन दबाया।
और मेरा दिल रुक गया।
क्योंकि अगली तस्वीर मैंने नहीं ली थी।
तस्वीर अँधेरी थी। लगभग काली। कैमरे ने फ़्लैश का इस्तेमाल किया था — मैं फ़्लैश कभी ऑन नहीं रखता — और उस फ़्लैश की सफ़ेद, कठोर रोशनी में कुछ चीज़ें दिख रही थीं।
पत्थर की दीवारें। गीली। काई से ढकी। ऊपर उठती हुई।
और ऊपर, बहुत ऊपर, फ़्रेम के बीच में, एक आयताकार टुकड़ा धूसर आसमान का।
और उस आसमान के नीचे, सीढ़ियों पर खड़ा, एक आदमी। नंगे पैर। पानी टख़नों तक। उसका चेहरा ऊपर की तरफ़ उठा हुआ। आँखें आसमान पर गड़ी हुईं। मुँह थोड़ा खुला, जैसे वो प्रार्थना कर रहा हो या चीख़ने वाला हो।
मैं।
पहली सीढ़ी पर। पहली सुबह।
और ये तस्वीर नीचे से ली गई थी। बावड़ी के अंदर से। अँधेरे से। किसी ऐसी जगह से जहाँ से मुझे देखा जा सकता था, पर जिसे मैं नहीं देख सकता था — क्योंकि मैं नीचे नहीं देख रहा था।
कैमरे की स्क्रीन के कोने में टाइमस्टैम्प था।
03:47 AM।
मैंने अगली तस्वीर देखी।
वही जगह। वही अँधेरा। वही फ़्लैश। पर अब मैं दूसरी सीढ़ी पर था, पानी पिंडलियों तक, पीठ दीवार से सटी हुई, और मेरे हाथ मेरे टख़ने की रस्सी पर थे। और मेरा चेहरा — ऊपर उठा हुआ, आँसुओं से भीगा, इतने डर से भरा कि मैं अपने आप को पहचान नहीं पा रहा था।
और ये तस्वीर पहली वाली से पास से ली गई थी। बहुत पास से। जैसे फ़ोटो लेने वाला अब तीसरी सीढ़ी पर था। मेरे ठीक सामने। मेरे घुटनों की ऊँचाई पर।
एक बच्चे की ऊँचाई पर।
03:51 AM।
मैंने अगला बटन दबाया।
तीसरी तस्वीर में बावड़ी नहीं थी।
तीसरी तस्वीर एक कमरे की थी। अँधेरा। फ़्लैश। एक खाट, जिस पर कोई सो रहा था — एक औरत, करवट लिए, दीवार की तरफ़ मुँह किए, सफ़ेद धोती का पल्लू सिर से सरका हुआ।
चाची।
उनके अपने कमरे में। नीचे।
और उनकी खाट के सिरहाने, उनके सिर के ठीक पास, कोई खड़ा था।
छोटा। नीली कमीज़। गीले बाल। उसकी पीठ कैमरे की तरफ़ थी। वो झुका हुआ था — चाची के कान की तरफ़। बहुत पास। जैसे वो उनके कान में कुछ फुसफुसा रहा हो।
और उसके पैरों के नीचे, फ़र्श पर, पानी का एक छोटा-सा तालाब बन गया था।
टाइमस्टैम्प देखकर मेरे हाथ से कैमरा लगभग गिर गया।
आज की तारीख़। 02:47 AM।
आज। आज रात।
जो अभी आई ही नहीं थी।
मैंने घड़ी देखी। दोपहर के बारह बजकर बीस मिनट।
मैंने फिर से तस्वीर देखी। टाइमस्टैम्प वही था। आज रात, 2:47। मैंने कैमरे की सेटिंग्स में जाकर तारीख़ चेक की। सही थी। मैंने फिर से तस्वीर खोली।
इस बार बच्चे का सिर थोड़ा मुड़ा हुआ था।
पहले उसकी पीठ कैमरे की तरफ़ थी। अब उसका चेहरा आधा घूमा हुआ था, कंधे के ऊपर से। कैमरे की तरफ़। मेरी तरफ़।
मैंने कैमरा बंद किया। बैटरी निकाल दी। मेमोरी कार्ड निकाला। और दोनों को अलग-अलग दराज़ों में डालकर बंद कर दिया।
फिर मैं बाथरूम में गया और उल्टी कर दी।
दोपहर एक बजे, जब धूप सबसे तेज़ थी, मैं सूरज के पास लौटा।
उसका बुख़ार थोड़ा कम हुआ था। वो आँगन में खाट पर बैठा था, पीठ नीम के पेड़ से टिकाए, और उसकी माँ उसके सिर पर गीली पट्टी रख रही थीं। उसने मुझे देखा और अपनी माँ से कहा, "अम्मा, अंदर जाओ। गुड्डी को भी ले जाओ।"
उसकी माँ ने कुछ बोलना चाहा, फिर नहीं बोलीं। चुपचाप चली गईं।
मैं उसके सामने ज़मीन पर बैठ गया। धूप इतनी कड़ी थी कि मेरी आँखें चुंधिया रही थीं। पर कल सूरज ने यही कहा था — दोपहर को, जब धूप सबसे तेज़ हो।
"बता," मैंने कहा।
उसने बहुत देर तक कुछ नहीं कहा। उसकी नज़रें आँगन की दीवार पर टिकी थीं, जहाँ एक छिपकली धूप में बैठी थी। फिर उसने गहरी साँस ली।
"छोटू ने खेल बनाया था," उसने कहा। "'सीढ़ी-सीढ़ी'। उसने बताया था कि उसने किसी से सुना है — कि अगर बावड़ी की सारी सीढ़ियाँ गिनकर नीचे उतरो, तो आख़िरी सीढ़ी पर पानी में एक सिक्का मिलता है। चाँदी का। पुराने राजा के ज़माने का।"
"किससे सुना था?"
सूरज ने मुझे देखा। "उसने कहा था, बावड़ी वाली दीदी ने बताया।"
"बावड़ी वाली दीदी?"
"हमने भी यही पूछा था। वो बस हँस दिया था। कहा, 'तुम लोग नहीं देख सकते उसे। वो सिर्फ़ मुझसे बात करती है। वो रात को मेरी खिड़की के बाहर आती है।'"
मुझे ठंड लगी। उस तपती धूप में भी।
वो रात को खिड़की के बाहर खड़ा रहता है। गुड्डी ने यही कहा था।
"उस दिन," सूरज ने आगे कहा, "हम तीनों दोपहर को बावड़ी पर गए। तब टीन नहीं थी, ज़ंजीर नहीं थी। बस लकड़ी का एक टूटा-फूटा दरवाज़ा था, जिस पर एक पुराना ताला था — और वो ताला टूटा हुआ था। छोटू ने कहा था कि दीदी ने तोड़ा है, हमारे लिए।"
"खेल ऐसे था: एक ऊपर खड़ा होकर गिनेगा, बाक़ी दो उतरेंगे। जो ऊपर खड़ा है वो जितना गिनेगा, नीचे वाले उतनी सीढ़ी उतरेंगे। रुकना तभी है जब ऊपर वाला रुके।"
"और ऊपर मैं था।"
सूरज ने सिर हिलाया। "तू ही सबसे बड़ा था। कुछ महीने बड़ा। और तुझे गिनती अच्छी आती थी — तू हमेशा हर चीज़ गिनता रहता था। सीढ़ियाँ, पेड़, तारे।"
मेरी पुरानी आदत।
"तूने गिनना शुरू किया। 'एक।' हम दोनों पहली सीढ़ी पर। 'दो।' दूसरी पर। बावड़ी में तब पानी बहुत नीचे था — बीस-पच्चीस सीढ़ियों के बाद। ऊपर की सीढ़ियाँ सूखी थीं। मज़ा आ रहा था। हम हँस रहे थे। छोटू सबसे आगे था, मैं उसके पीछे।"
"दस तक सब ठीक था। फिर ग्यारह पर ठंड लगने लगी। अजीब ठंड। दोपहर की गर्मी में। बारह पर... बारह पर मुझे पहली बार लगा कि कोई और भी उतर रहा है। हमारे साथ। पीछे से नहीं — नीचे से। ऊपर की तरफ़।"
उसने अपना चेहरा अपने हाथों में ले लिया।
"मैं रुकना चाहता था। मैंने तुझे आवाज़ दी, 'विक्की, रुक जा!' पर तू नहीं रुका। तू गिनता रहा। और तेरी आवाज़... तेरी आवाज़ बदल गई थी, विक्की। वो तेरी नहीं लग रही थी। वो बहुत धीमी और बहुत गहरी हो गई थी, जैसे तू किसी कुएँ के अंदर से बोल रहा हो।"
"तेरह। चौदह। पंद्रह। अब हम पानी के पास पहुँच गए थे। पानी काला था। बिल्कुल स्थिर। शीशे जैसा। सोलह। मेरे पैर पानी में गए। बर्फ़ जैसा ठंडा। सत्रह।"
वो रुका। उसकी साँस तेज़ हो गई थी।
"सत्रहवीं सीढ़ी पर मैंने नीचे पानी में देखा।"
"क्या दिखा?"
"एक औरत," सूरज ने फुसफुसाकर कहा। "पानी के अंदर। उल्टी। सिर नीचे, पैर ऊपर, जैसे वो पानी की सतह के नीचे उल्टी लटकी हो। उसके बाल नीचे की तरफ़ लहरा रहे थे — बहुत लंबे, इतने लंबे कि उनका अंत दिखता ही नहीं था, बस अँधेरे में फैलते जा रहे थे। और उसका चेहरा ऊपर की तरफ़ था। पानी की सतह से बस एक इंच नीचे। मेरे पैरों के ठीक नीचे।"
"और वो मुस्कुरा रही थी। और उसके मुँह में दाँत नहीं थे, विक्की। उसके मुँह में सीढ़ियाँ थीं। छोटी-छोटी पत्थर की सीढ़ियाँ, नीचे उतरती हुई, उसके गले के अंदर।"
मैंने अपने मुँह पर हाथ रख लिया।
"मैं भागा," सूरज ने कहा। उसकी आवाज़ टूट रही थी। "मैं मुड़ा और भागा। ऊपर। सत्रह सीढ़ियाँ। मैं गिरा, मेरे घुटने छिले, मैं फिर भागा। मैंने छोटू को आवाज़ नहीं दी। मैंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। मैं बस भागा।"
"और मैं?"
"तू अब भी गिन रहा था। जब मैं ऊपर पहुँचा और तेरे बगल से भागा, तो तू अठारह बोल रहा था। तेरी आँखें बंद थीं। तू मुस्कुरा रहा था।"
"और फिर?"
"फिर मैंने तेरी आवाज़ सुनी — तेरी असली आवाज़ — जब मैं पीपल तक पहुँच गया था। तू चीख़ रहा था। 'छोटू! छोटू, मेरा हाथ पकड़! हाथ पकड़!'"
मैं जम गया।
तुमने मेरा हाथ छोड़ा था, भैया। मैंने नहीं। तुमने।
पर सूरज कह रहा था कि मैं चीख़ रहा था — "हाथ पकड़।"
दोनों में से कोई एक झूठ बोल रहा था। या दोनों सच बोल रहे थे, और मुझे वो याद नहीं जो बीच में हुआ।
"मैं रुका नहीं," सूरज ने कहा। "मैं घर भागा। रात को रमेसर दादा हमारे घर आए। उन्होंने मेरे बापू से अकेले में बात की। फिर मुझसे कहा: 'सूरज, तू उस दिन वहाँ नहीं था। तुझे बुख़ार था। तू घर पे था। समझा? किसी को भी मत बताना। कभी नहीं। अगर तूने बताया, तो वो तुझे भी याद कर लेगी।'"
उसने मेरी तरफ़ देखा।
"सत्रह साल मैंने किसी को नहीं बताया, विक्की। अपनी बीवी को भी नहीं। और कल रात, नींद में, जब छोटू ने खिड़की के बाहर से पूछा, 'सूरज, एक के बाद क्या आता है?' — तो मैं भूल गया था। मैं सच में भूल गया था कि वो कौन है। मुझे लगा मैं सपने में हूँ, और कोई बच्चा पूछ रहा है। मैंने बस बता दिया।"
"सूरज," मैंने धीरे से कहा, "डायरी में लिखा था कि तू 'बीच में से शुरू' करेगा। कि तुझे याद है तू कहाँ तक गया था।"
उसका चेहरा सफ़ेद पड़ गया।
"सत्रह," उसने कहा।
और मुझे समझ आ गया। और उसे भी।
उसकी गिनती एक से नहीं, सत्रह से शुरू होती थी। कल रात वो दूसरी सीढ़ी पर था, मेरे बगल में — क्योंकि बावड़ी उसे पहले लाई थी, दिखाने के लिए। पर आज रात...
"आज रात अठारह," सूरज ने कहा।
मेरे पास अभी अड़तीस रातें बाक़ी थीं।
सूरज के पास सिर्फ़ तेईस।
मैं उस रात सूरज के घर रुका।
रघु चाचा ने मना किया। चाची रोईं। पर मैंने उन्हें कैमरे की तीसरी तस्वीर के बारे में नहीं बताया — चाची के सिरहाने खड़े उस बच्चे के बारे में। मैंने बस इतना कहा: "आज रात चाची के कमरे में दीया जलाकर रखना। पूरी रात। और अगर कोई उनके कान में कुछ कहे, तो उन्हें जगा देना।"
चाचा ने मुझे अजीब नज़रों से देखा। पर उन्होंने हाँ कहा।
सूरज के घर में एक ही बड़ा कमरा था जिसमें सब सोते थे। सूरज, उसकी माँ, और गुड्डी। उसकी बीवी मायके गई हुई थी — "अच्छा ही हुआ," सूरज ने कहा था। कमरे के कोने में पानी का एक बड़ा मटका रखा था, मिट्टी का, ऊपर से एक पीतल की थाली से ढका हुआ।
मैंने अपना कैमरा लाया था।
मुझे नहीं पता था ये ठीक है या नहीं। पर मैं फ़ोटोग्राफ़र हूँ। और अगर आज रात वक़्त फिर से रुकने वाला था, तो मैं जानना चाहता था कि उस रुके हुए वक़्त में क्या होता है। मैंने नया मेमोरी कार्ड डाला, कैमरे को एक छोटे ट्राइपॉड पर लगाया, और उसे कमरे के कोने में रखा — इस तरह कि पूरा कमरा फ़्रेम में आए। सूरज की खाट। गुड्डी और उसकी दादी की खाट। खिड़की। मटका।
और वीडियो रिकॉर्डिंग चालू कर दी।
"ये क्या करेगा?" सूरज ने पूछा।
"पता नहीं," मैंने ईमानदारी से कहा। "शायद कुछ नहीं। शायद हमें दिखाएगा कि हम क्या नहीं देख पाते।"
रात वैसी ही आई जैसी पिछली दो रातें आई थीं। धीरे-धीरे। हर आवाज़ को निगलती हुई।
सूरज की माँ जल्दी सो गईं। गुड्डी को सुलाने में वक़्त लगा — वो बार-बार खिड़की की तरफ़ देखती थी और पूछती थी, "आज वो आएगा क्या, पापा?" सूरज उसके बालों में हाथ फेरता रहा और कहता रहा, "नहीं बेटा, कोई नहीं आएगा।" और हर बार वो ये कहता, उसकी आवाज़ थोड़ी और टूटती।
आख़िरकार गुड्डी सो गई।
सूरज और मैं जागते रहे। उसकी खाट पर वो, ज़मीन पर दरी पर मैं। बीच में लालटेन। कैमरे की लाल बत्ती कोने में टिमटिमा रही थी — रिकॉर्डिंग।
एक बजे।
दो बजे।
"विक्की," सूरज ने अँधेरे में फुसफुसाया। "अगर मैं... अगर मैं आज नीचे रह गया..."
"ऐसा कुछ नहीं होगा।"
"अगर रह गया, तो गुड्डी को यहाँ से ले जाना। झाँसी। दिल्ली। कहीं भी। बस यहाँ नहीं। वो उसे पहचानता है, विक्की। वो उसकी खिड़की पर आता है।"
मैंने कुछ नहीं कहा। मैं कुछ कह ही नहीं पाया।
दो बजकर चालीस।
दो बजकर पैंतालीस।
मैंने अपनी कलाई घड़ी देखी। सेकंड की सुई घूम रही थी। पचास... पचपन... साठ...
दो बजकर सैंतालीस।
सुई रुक गई।
लालटेन की लौ नीली हो गई।
और सूरज, जो मुझसे बात कर रहा था, अपने वाक्य के बीच में जम गया। उसका मुँह खुला था, जैसे वो कोई शब्द बोलने वाला हो। उसकी आँखें मेरी तरफ़ थीं। पलक नहीं झपक रही थीं।
मैंने कोने की तरफ़ देखा। कैमरे की लाल बत्ती।
वो अब भी टिमटिमा रही थी।
टिम। टिम। टिम।
कैमरा रुका नहीं था।
पहले कुछ नहीं हुआ।
फिर मटके पर रखी पीतल की थाली हिली।
हल्के से। जैसे नीचे से किसी ने धक्का दिया हो। खन्न। वो थोड़ी-सी सरकी, और उसके किनारे से, मटके के अंदर से, पानी की एक पतली धार बाहर निकली और मटके की बाहरी दीवार पर बहने लगी। नीचे। फ़र्श की तरफ़।
पर वो पानी नीचे गिरा नहीं। वो फ़र्श पर पहुँचा और फैलने लगा — एक सीधी लकीर में। जैसे कोई उसे खींच रहा हो। मटके से सूरज की खाट की तरफ़।
फिर गुड्डी उठकर बैठ गई।
अपने आप। झटके से। जैसे किसी ने उसके कंधे पकड़कर उठाया हो। उसकी आँखें बंद थीं। उसकी दो चोटियाँ उसके कंधों पर लटक रही थीं। उसकी दादी उसके बगल में जमी पड़ी थीं।
गुड्डी रुके हुए वक़्त में हिल रही थी।
उसने अपना सिर मेरी तरफ़ घुमाया। आँखें अब भी बंद।
"चाचा," उसने कहा। उसकी आवाज़ बिल्कुल उसकी अपनी थी — पतली, मीठी, नींद में डूबी। "छोटू भैया पूछ रहे हैं। सत्रह के बाद क्या आता है?"
मेरा गला सूख गया।
"गुड्डी," मैंने बहुत धीरे से कहा, "सो जाओ, बेटा।"
"पर वो पूछ रहे हैं। पापा को नहीं पता। पापा जवाब नहीं दे रहे।" उसकी भौंहें सिकुड़ीं — बच्चों वाली नाराज़गी। "आप बता दो न, चाचा। आपको तो गिनती आती है। आप तो सब कुछ गिनते हो।"
मैं अपनी जगह से उठा। घुटनों के बल उसकी खाट तक गया। फ़र्श का पानी मेरे घुटनों को छू रहा था। बर्फ़ जैसा।
"गुड्डी, मेरी बात सुनो—"
"सत्रह के बाद," गुड्डी ने ख़ुद से कहा, जैसे याद करने की कोशिश कर रही हो। उसकी छोटी-छोटी उँगलियाँ हवा में गिनने लगीं। "पंद्रह, सोलह, सत्रह..."
उसका मुँह खुला। अगला शब्द बनने लगा—
मैंने उसके मुँह पर हाथ रख दिया। नरमी से। पर मज़बूती से।
उसकी आँखें खुलीं।
और वो गुड्डी की आँखें नहीं थीं।
वो वही आँखें थीं जो मैंने तस्वीर में देखी थीं। मुंडेर पर बैठे बच्चे की। साफ़, तीखी, और बहुत, बहुत पुरानी। एक पाँच साल की बच्ची के चेहरे में, जैसे किसी ने दो पुराने सिक्के धँसा दिए हों।
वो आँखें मुझे देखती रहीं। और मेरी हथेली के नीचे, गुड्डी के होंठ मुस्कुराए।
और फिर मटके से आवाज़ आई।
बुलबुलों वाली। गीली। पानी के अंदर से।
"अठारह।"
मैंने सूरज की तरफ़ देखा।
सूरज की खाट ख़ाली थी।
जहाँ वो बैठा था, वहाँ सिर्फ़ एक भीगा हुआ गड्ढा था चादर में। और चादर से पानी टपक रहा था। और फ़र्श पर, खाट से दरवाज़े तक, पैरों के निशान थे — बड़े, एक मर्द के — और उनके बगल में, साथ-साथ चलते हुए, छोटे निशान।
जैसे कोई बच्चा किसी बड़े का हाथ पकड़कर उसे ले गया हो।
गुड्डी मेरी हथेली के नीचे ढीली पड़ गई। उसकी आँखें बंद हो गईं। वो वापस तकिये पर गिर गई, और गहरी साँसें लेने लगी। एक सोती हुई बच्ची। बस एक सोती हुई बच्ची।
और मेरे पैरों के नीचे से फ़र्श गायब हो गया।
तीसरी सीढ़ी।
पानी घुटनों तक।
मुझे अब ये पहचानने के लिए सोचना नहीं पड़ता था। पत्थर का वो ख़ास स्पर्श। पानी का वो ख़ास खिंचाव। ऊपर वो धूसर आसमान का टुकड़ा, जो हर रात थोड़ा छोटा लगता था।
मैंने आँखें ऊपर रखीं।
"सूरज?" मैंने पुकारा। "सूरज!"
मेरी आवाज़ पत्थर की दीवारों से टकराई और नीचे गूँजती हुई चली गई। नीचे। और नीचे। और नीचे। इतनी देर तक, कि मुझे लगा बावड़ी चालीस सीढ़ियों से कहीं ज़्यादा गहरी है।
फिर जवाब आया।
बहुत दूर से। बहुत नीचे से। इतना नीचे, कि आवाज़ पानी से होकर आई थी और उसके शब्द घुले-मिले से थे।
"...विक्की..."
"सूरज! तू कहाँ है?"
"...अठारहवीं पर... विक्की, यहाँ से आसमान नहीं दिखता... यहाँ से कुछ नहीं दिखता... पानी मेरे गले तक है... और यहाँ कोई है... मेरे बगल में... वो मेरी तरफ़ नहीं देखता... वो बस ऊपर देखता है... तुम्हारी तरफ़..."
"ऊपर आ, सूरज! ऊपर चढ़! मत देख किसी को, बस ऊपर चढ़!"
"...मैं नहीं देख सकता, विक्की... मैं ऊपर कैसे आऊँ... मुझे सीढ़ियाँ नहीं दिखतीं... गिनना पड़ेगा... ऊपर आने के लिए भी गिनना पड़ेगा..."
और फिर मैंने उसे गिनते हुए सुना। उल्टा। रुक-रुककर। रोते हुए।
"...सत्रह..."
छप।
"...सोलह..."
छप।
हर गिनती के साथ उसकी आवाज़ थोड़ी पास आती। और हर गिनती के साथ मैं उसके पीछे एक और आवाज़ सुनता। धीमी। बुलबुलों वाली। जो उसके साथ-साथ गिन रही थी। उसी सुर में। उसी लय में। एक सीढ़ी पीछे।
"...सोलह..."
मैं वहीं खड़ा रहा, आँखें ऊपर, और सूरज को ऊपर आते सुनता रहा। पंद्रह। चौदह। दस। सात। उसकी साँसें अब मुझे सुनाई दे रही थीं। उसके पैरों की आवाज़। पाँच। चार।
फिर वो मेरे बगल में था।
मैंने उसे आँखों के कोने से देखा। उसका कंधा मेरे कंधे से टकराया। वो काँप रहा था। पूरा भीगा हुआ। सिर से पाँव तक।
"चल," मैंने कहा। "ऊपर। मत देख पीछे।"
हम दोनों ने साथ में दूसरी सीढ़ी पर पैर रखा। फिर पहली पर। फिर मुंडेर। फिर धूल। फिर पीपल की घंटियों की आवाज़, और पूरब में उगती सूरज की पहली, पतली, सुनहरी रोशनी।
हम दोनों ज़मीन पर गिरे और हाँफते रहे।
मैंने सूरज की तरफ़ देखा।
और मेरी साँस गले में अटक गई।
उसके बाल — घने, काले, जिन्हें वो हमेशा तेल लगाकर पीछे की तरफ़ सँवारता था — उनमें अब एक सफ़ेद लट थी। माथे के बीच से, पीछे तक। चौड़ी। बिल्कुल सफ़ेद। जैसे किसी ने चाक से लकीर खींच दी हो।
और उसकी बाईं आँख।
उसकी बाईं आँख पर एक पतली, सफ़ेद, दूधिया परत चढ़ गई थी। मोतियाबिंद जैसी।
बिल्कुल वैसी, जैसी रामप्यारी अम्मा की आँख पर थी।
"विक्की," सूरज ने कहा, और अपनी बाईं आँख को मलने लगा। "मुझे कुछ... मुझे कुछ अजीब दिख रहा है। इस आँख से।"
"क्या?"
उसने अपनी दाईं आँख बंद की। सिर्फ़ बाईं से देखा। उस सफ़ेद, दूधिया आँख से। मेरी तरफ़।
और उसका चेहरा डर से ऐंठ गया।
"तेरे पीछे," उसने फुसफुसाया। "तेरे ठीक पीछे, विक्की। तेरे कंधे पर उसका हाथ है।"
मैंने पलटकर देखा।
कुछ नहीं था। सिर्फ़ पीपल। और सुबह।
पर मेरे बाएँ कंधे पर — अब मुझे महसूस हुआ — एक ठंडक थी। एक छोटी-सी, हथेली के आकार की ठंडक। जो मेरी कमीज़ के आर-पार, मेरी चमड़ी में उतर रही थी।
घर पहुँचकर सबसे पहले मैंने चाची को देखा।
वो ठीक थीं। रसोई में थीं, चाय बना रही थीं, उनकी आँखें नींद की कमी से सूजी हुई थीं। "रात भर दीया जलाए रखा," उन्होंने कहा। "कुछ नहीं हुआ। बस..."
"बस क्या, चाची?"
उन्होंने अपना बायाँ कान छुआ। "बस सुबह से कान में पानी-सा भरा लग रहा है। जैसे नहाते वक़्त चला गया हो। निकलता ही नहीं।"
मैंने कुछ नहीं कहा।
मैं सूरज के घर वापस गया। कैमरा उठाने। ट्राइपॉड अब भी कोने में खड़ा था। लाल बत्ती बुझ चुकी थी — मेमोरी कार्ड भर गया था।
मैं वहीं बैठ गया, सूरज की खाट के पास, और रिकॉर्डिंग चलाई। तेज़ी से आगे बढ़ाया — एक बजे, दो बजे, दो बजकर चालीस।
दो बजकर सैंतालीस पर मैंने सामान्य स्पीड पर चलाया।
स्क्रीन पर कमरा था। लालटेन की लौ नीली हो गई। सूरज अपनी खाट पर जम गया। मैं दरी पर बैठा था—
और मैं उठा।
स्क्रीन पर मैं उठा। पर मुझे वो याद नहीं था। मुझे याद था कि मैं घुटनों के बल गुड्डी की खाट तक गया था। पर स्क्रीन पर मैं घुटनों के बल नहीं गया। मैं खड़ा हुआ। सीधा। और चलकर गया। बहुत धीरे-धीरे, बहुत सधे हुए क़दमों से। जैसे कोई मुझे चला रहा हो।
मैं गुड्डी की खाट के पास रुका।
गुड्डी स्क्रीन पर नहीं उठी थी। वो सो रही थी। पूरे वक़्त। उसकी आँखें बंद थीं, वो करवट लिए लेटी थी, उसकी चोटियाँ तकिये पर बिखरी थीं।
वो कभी उठी ही नहीं थी।
स्क्रीन पर मैं झुका। उसके कान की तरफ़। बहुत पास। ठीक वैसे, जैसे तस्वीर में वो बच्चा चाची के कान के पास झुका था।
और मैंने कुछ फुसफुसाया।
मैंने वॉल्यूम पूरा बढ़ाया। कैमरे का माइक बहुत अच्छा नहीं है, पर कमरा शांत था। मैंने फ़ोन कान से सटाया — मेरे कान पर वो गीली, सरसराती आवाज़ आई, जो बावड़ी के अंदर हमेशा होती है — और उसके नीचे, मेरी अपनी आवाज़।
पर वो आवाज़ मेरी नहीं थी। वो बहुत धीमी थी। बहुत गहरी। जैसे मैं किसी कुएँ के अंदर से बोल रहा हूँ।
"गुड्डी... एक के बाद दो आता है... दो के बाद तीन... और एक दिन, जब तू बड़ी हो जाएगी, सत्रह साल बाद... तू मेरे साथ खेलेगी... ठीक है?"
फिर स्क्रीन पर मैं सीधा हुआ।
और मैं मुड़ा। कैमरे की तरफ़। कोने की तरफ़। जहाँ लाल बत्ती टिमटिमा रही थी।
और मैं कैमरे की तरफ़ देखकर मुस्कुराया।
मैंने वो मुस्कान पहचानी। मैं उसे बारह साल की उम्र से जानता था। वो तस्वीर, जिसमें हम दोनों बावड़ी की सीढ़ियों पर खड़े थे। वो मुस्कान उस तस्वीर में थी — पर मेरे चेहरे पर नहीं।
मैं कभी ऐसे नहीं मुस्कुराता। होंठों का एक कोना ऊपर, दूसरा नीचे। आँखें आधी बंद।
ऐसे छोटू मुस्कुराता था।
और स्क्रीन पर, मेरे चेहरे पर, छोटू की मुस्कान थी। और मेरी आँखों में — मेरी अपनी आँखों में — वो साफ़, तीखी, बहुत पुरानी चमक थी, जो मैंने मुंडेर पर बैठे बच्चे की तस्वीर में देखी थी।
स्क्रीन पर मैंने अपना हाथ उठाया। तीन उँगलियाँ खड़ी कीं।
और फिर होंठ हिलाए। बिना आवाज़ के। पर मुझे पढ़ने के लिए आवाज़ की ज़रूरत नहीं थी।
"तीन।"
वीडियो वहीं ख़त्म हो गया।
मैं उस कमरे में बैठा रहा, फ़ोन हाथ में, और बहुत देर तक अपनी बाईं कंधे की उस ठंडक को महसूस करता रहा। जो अब भी वहीं थी।
जैसे किसी ने अपना हाथ वहाँ रखा हो।
और छोड़ा ही न हो।
और तब मुझे पहली बार एक ऐसा ख़याल आया, जिससे मुझे बावड़ी से भी ज़्यादा डर लगा।
अगर वो हर रात मुझे नीचे बुला रहा है...
तो हर रात, मेरी जगह, ऊपर कौन आ रहा है?
भाग 3 समाप्त।
अगले भाग में — "चौथी सीढ़ी": रामप्यारी अम्मा आख़िरकार अपनी सफ़ेद आँख का सच बताती हैं — और 1958 में मुखिया के बेटे के साथ क्या हुआ था। सूरज अब वो देख सकता है जो कोई और नहीं देख सकता। और चाची के कान से जो पानी निकलता है, उसमें कुछ और भी है...
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