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भाग 4 — चौथी सीढ़ी

Piyashi Atma · Real Experiences · 21 मिनट

Writer
Piyashi Atma
Story
भानपुरा की बावड़ी - चालीस सीढ़ियाँ
Chapter
4 of 31
Category
Real Experiences
Reading time
21 min
Words
4033
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

हर गाँव में एक बूढ़ी औरत होती है जिसके पास सब जाते हैं, पर कोई बैठना नहीं चाहता।

बच्चे उससे डरते हैं। जवान उसका मज़ाक़ उड़ाते हैं। और बूढ़े, जब अँधेरे में कुछ ऐसा सुनते हैं जिसका कोई नाम नहीं होता, तो चुपचाप उसके दरवाज़े पर पहुँच जाते हैं।

भानपुरा में वो औरत रामप्यारी अम्मा थीं।

और मुझे उस चौथे दिन पता चला कि लोग उनके पास बैठना क्यों नहीं चाहते थे।

इसलिए नहीं कि वो डरावनी थीं।

बल्कि इसलिए कि वो सच बोलती थीं। और कुछ सच ऐसे होते हैं जिन्हें सुनने के बाद आप कभी वापस वो इंसान नहीं बन पाते जो आप पहले थे।

लेकिन उससे पहले, उस सुबह, चाची का कान था।

मैं सूरज के घर से लौटा तो चाची आँगन में तुलसी के पास बैठी थीं, सिर एक तरफ़ झुकाए, जैसे कोई नहाने के बाद कान से पानी निकालने की कोशिश करता है। वो अपनी हथेली से कनपटी को थपथपा रही थीं। एक बार। दो बार। तीन बार।

"अब भी भरा हुआ लग रहा है, चाची?"

"हाँ बेटा।" उन्होंने सिर सीधा किया और मुस्कुराने की कोशिश की। "बड़ा अजीब है। कुछ सुनाई भी कम दे रहा है इस कान से। और..."

"और?"

वो हिचकिचाईं। "और कभी-कभी लगता है जैसे इसके अंदर कोई... गुनगुना रहा हो। बहुत धीरे। कोई पुराना गीत। जो मेरी सास गाती थीं, पानी भरते वक़्त।"

मैंने उनके पास बैठकर उनका कान देखा। बाहर से सब ठीक था। मैंने टॉर्च जलाई और अंदर रोशनी डाली।

अंदर कुछ चमका।

काला। पतला। गीला।

"चाची, हिलना मत।"

मैंने दादाजी के कमरे से एक चिमटी लाई — वो जिससे वो दाढ़ी के बाल निकालते थे। बहुत सावधानी से मैंने उसे कान के अंदर डाला और उस काली चमक को पकड़ा।

एक बाल था।

लंबा। काला। पानी से भीगा हुआ। मैंने धीरे से खींचा। वो बाहर आने लगा। एक इंच। दो इंच। छह इंच।

मैंने खींचना जारी रखा। एक फ़ुट। दो फ़ुट।

चाची के चेहरे पर अब डर आने लगा था। "विक्की... बहुत लंबा है न?"

"बस निकल रहा है, चाची।"

तीन फ़ुट। चार। बाल मेरी चिमटी से होते हुए ज़मीन पर गिर रहा था, गोल-गोल घेरे बनाता हुआ, एक गीला काला ढेर। उससे वही गंध आ रही थी। सड़ी हुई काई। पुराना, ठहरा हुआ पानी।

पाँच फ़ुट। छह।

वो ख़त्म नहीं हो रहा था।

चाची ने मेरी कलाई पकड़ ली। उनकी उँगलियाँ बर्फ़ जैसी थीं। "विक्की, बस कर।"

मैंने अपना हाथ रोका। बाल अब भी उनके कान से मेरी चिमटी तक तना हुआ था। पतला, चमकता हुआ, हवा में एक काली लकीर। और मुझे महसूस हुआ — उस पल, बिल्कुल साफ़ — कि दूसरी तरफ़ से कोई उसे पकड़े हुए था। बाल में एक हल्का-सा खिंचाव था। कान के अंदर की तरफ़।

जैसे किसी मछली पकड़ने वाली डोरी में, जब दूसरे सिरे पर कुछ फँसा हो।

और तब चाची बोलीं।

पर वो आवाज़ चाची की नहीं थी। उनके होंठ हिले, पर जो निकला वो किसी और का था — एक औरत की आवाज़, बहुत धीमी, बहुत पुरानी, जैसे पानी के बहुत नीचे से आ रही हो और चाची का गला बस उसका रास्ता हो।

"मत खींचो, बेटा। दूसरे सिरे पर मैं हूँ।"

मैंने चिमटी छोड़ दी।

बाल एक पल हवा में लटका रहा। फिर — मैं क़सम खाकर कहता हूँ — वो ज़मीन पर पड़ा पूरा ढेर हिला। धीरे से। किसी जीवित चीज़ की तरह। और पीछे की तरफ़ सरकने लगा। चाची के कान की तरफ़। वापस अंदर। एक काले, गीले साँप की तरह, बिना किसी आवाज़ के, कान के छोटे-से छेद में गायब होता हुआ।

जब तक मैं होश में आया और कैंची लेकर लौटा, वो पूरा अंदर जा चुका था।

चाची ने आँखें झपकाईं। अपना कान छुआ।

"क्या हुआ, विक्की? तू ऐसे क्यों देख रहा है?" उनकी आवाज़ वापस उनकी थी। "निकला कुछ?"

उन्हें याद नहीं था।

"वो सुन रही है," रामप्यारी अम्मा ने कहा।

दोपहर हो चुकी थी। मैं और सूरज अम्मा के आँगन में बैठे थे। वही चटाई, वही पीतल की थाली, वही गोबर से बने हाथ के छापों वाली दीवारें। सूरज ने अपनी बाईं आँख पर एक काला कपड़ा बाँध रखा था — "ये आँख बंद करता हूँ तो भी दिखता है," उसने रास्ते में बताया था, "कपड़े से थोड़ा कम दिखता है।"

"कौन सुन रही है, अम्मा?"

"वो। सीढ़ीवाली।" अम्मा ने पहली बार उसे कोई नाम दिया था। "तेरी चाची का कान अब उसका कान है। जो भी तेरी चाची के पास बोला जाएगा, वो सब सुनेगी। तुम लोग जो भी सोचो, जो भी तय करो — उस घर में मत बोलना। रघु से भी मत कहना।"

"चाची को कोई नुक़सान तो नहीं—"

"अभी नहीं।" अम्मा ने सीधे मेरी आँखों में देखा। "वो अभी सिर्फ़ सुन रही है। तेरी चाची उसके लिए एक खिड़की है। खिड़की को कोई नहीं तोड़ता, बच्चा। जब तक उसे बाहर देखना हो।"

"और जब नहीं देखना होगा?"

अम्मा ने जवाब नहीं दिया।

सूरज ने बेचैनी से अपना पहलू बदला। "अम्मा... ये आँख। ये मेरे साथ क्या हो रहा है?"

अम्मा बहुत देर तक चुप रहीं। फिर उन्होंने अपनी थाली एक तरफ़ रखी, और अपना पल्लू सिर से थोड़ा पीछे खिसकाया — ताकि उनकी सफ़ेद आँख पूरी दिखे।

"तुम दोनों को एक कहानी सुनानी है," उन्होंने कहा। "जो मैंने अड़सठ साल से किसी को नहीं सुनाई। रमेसर को भी नहीं। वो जानता था, पर मैंने कभी बताई नहीं।"

धूप तेज़ थी। एक चील ऊपर आसमान में चक्कर काट रही थी। और रामप्यारी अम्मा ने बोलना शुरू किया।

"उन्नीस सौ अट्ठावन।

मैं बारह बरस की थी। तेरी ही उमर की, विक्की, जब तेरे साथ वो हुआ।

उस साल भी सूखा पड़ा था। ऐसा सूखा कि लोग कहते थे, धरती प्यासी नहीं, भूखी है। और उस साल, जेठ के महीने में, बावड़ी में पानी आ गया।

तब बावड़ी खुली थी। कोई टीन नहीं, कोई ज़ंजीर नहीं। बस पुराने बुज़ुर्ग कहते थे कि उधर बच्चे न जाएँ। पर कोई वजह नहीं बताता था।

गाँव के मुखिया थे ठाकुर गजराज सिंह। उनका एक ही बेटा था — देवदत्त। चौदह बरस का। गोरा, लंबा, हँसमुख। पूरे गाँव की लड़कियाँ उसे देखकर शरमाती थीं।" अम्मा की आवाज़ एक पल को नरम हुई। "मैं भी।

हमारी सगाई तय हो चुकी थी। बचपन में ही। दोनों परिवारों ने तय की थी। मुझे पता था कि एक दिन मैं उसके घर जाऊँगी। और मैं ख़ुश थी।

उस गर्मी में लड़कों ने एक शर्त लगाई। कि कौन बावड़ी की सारी सीढ़ियाँ गिनकर नीचे तक जाएगा। देवदत्त ने कहा, मैं जाऊँगा। वो ठाकुर का बेटा था — उसे डर किस बात का?

मैं वहाँ थी। मैंने उसे रोका। उसने हँसकर मेरी चोटी खींची और कहा, 'प्यारी, ऊपर से गिनती करती रहना। मैं नीचे से तेरे लिए चाँदी का सिक्का लाऊँगा।'"

मैं और सूरज एक-दूसरे को देखने लगे। चाँदी का सिक्का। छोटू ने भी यही कहा था।

"उसने गिनना शुरू किया। ख़ुद ही। एक। दो। तीन। नीचे उतरता गया। बाक़ी लड़के ऊपर खड़े हँस रहे थे। दस तक। पंद्रह तक। फिर पानी आ गया, और उसकी आवाज़ बदलने लगी। और फिर, उन्नीस पर, वो रुक गया।

वो ऊपर आया। हँसता हुआ। उसने कहा, 'पानी बहुत ठंडा है। कल आगे जाऊँगा।'

और उसी रात से शुरू हुआ।"

"हर रात वो गायब होता था। हर सुबह बावड़ी की सीढ़ियों पर मिलता था — एक सीढ़ी और नीचे। ठाकुर साहब ने पहरे बिठाए। उसे कमरे में बंद किया। ज़ंजीरों से बाँधा। कुछ काम नहीं आया।

फिर ओरछा से एक तांत्रिक बुलाया गया। काले कपड़े, लाल आँखें, गले में हड्डियों की माला। उसने बावड़ी पर तीन रात पूजा की। और फिर उसने ठाकुर साहब से कहा — मैंने छुपकर सुना था —

'ठाकुर, इस बावड़ी में जो है, वो देवी नहीं है, प्रेत भी नहीं है। वो कुछ और है। वो सीढ़ियाँ गिनने वालों को खाती है। उसे रोका नहीं जा सकता। उसे सिर्फ़ चुकाया जा सकता है।'

ठाकुर साहब ने पूछा, 'कैसे?'

तांत्रिक ने कहा, 'चालीसवीं रात, जब लड़का आख़िरी सीढ़ी पर होगा, कोई ऊपर खड़ा होकर पानी में देखे। सीधे उसकी आँखों में। उसे पहचाने। अगर कोई उसे पहचान ले — पूरी तरह, बिना डरे — तो वो उस बार लड़के को छोड़ देगी। पर बदले में वो देखने वाले की आँख ले लेगी। एक आँख। दक्षिणा।'

'और अगर देखने वाला डर गया तो?'

'तो वो दोनों को ले जाएगी।'"

अम्मा रुकीं। उनका हाथ अपनी सफ़ेद आँख की तरफ़ उठा, जैसे अनजाने में।

"गाँव में कोई तैयार नहीं हुआ। कोई नहीं। ठाकुर साहब ने सोने की पेशकश की, ज़मीन की पेशकश की। लोग घरों में छुप गए। ठाकुर साहब ख़ुद तैयार हुए — पर तांत्रिक ने कहा, बाप नहीं कर सकता, उसका ख़ून एक है, वो उसे पहचानने से पहले ही खा जाएगी।

चालीसवीं रात को मैं घर से निकली।

किसी को बताए बिना। बारह बरस की लड़की, लालटेन लेकर, आधी रात को पीपल वाली सड़क पर।

मैं बावड़ी पर पहुँची। मुंडेर पर खड़ी हुई। और नीचे देखा।"

अम्मा की आवाज़ अब बहुत धीमी हो गई थी। इतनी धीमी कि मुझे और सूरज को आगे झुकना पड़ा।

"चालीस सीढ़ियाँ। नीचे। और सबसे नीचे, पानी के बीच में, देवदत्त खड़ा था। पानी उसकी छाती तक था। वो ऊपर देख रहा था। मेरी तरफ़।

और वो रो नहीं रहा था।

वो ख़ुश था। वो मुस्कुरा रहा था। बिल्कुल वैसे, जैसे वो हमेशा मुस्कुराता था जब मेरी चोटी खींचता था।

'प्यारी,' उसने कहा, 'आ गई तू? नीचे आ। यहाँ बहुत अच्छा है। यहाँ कोई प्यासा नहीं है।'

और उसके पीछे, पानी के अंदर..." अम्मा ने अपनी आँखें बंद कर लीं। "...उसके पीछे वो थी।

मैं तुम्हें नहीं बता सकती वो कैसी दिखती थी। मैंने कोशिश की है, अड़सठ साल से। जब भी शब्द ढूँढती हूँ, मेरे मुँह में पानी भर जाता है। बस इतना कह सकती हूँ — वो उल्टी थी। पानी के नीचे। और उसके बाल... उसके बाल पूरी बावड़ी में फैले थे। हर सीढ़ी के नीचे। हर पत्थर के बीच में। बावड़ी की दीवारों में जो दरारें हैं, वो दरारें नहीं हैं। वो उसके बाल हैं।"

मेरी रीढ़ में ठंड दौड़ गई। चाची के कान से निकलता वो बाल।

"मैंने उसे देखा," अम्मा ने कहा। "मैं डरी। बहुत डरी। मेरे घुटने काँप रहे थे, मेरी लालटेन हाथ से छूटने वाली थी। पर मैंने नज़र नहीं हटाई। मैंने उसकी आँखों में देखा। और मैंने... मैंने उसे पहचाना।"

"कौन थी वो, अम्मा?" सूरज ने फुसफुसाया।

अम्मा ने आँखें खोलीं। वो सफ़ेद आँख धूप में चमक रही थी।

"ये मैं नहीं बताऊँगी। अभी नहीं। नाम लेने से वो पास आती है।" उन्होंने सिर हिलाया। "बस इतना जान लो — उस पल मेरी बाईं आँख में जैसे किसी ने बर्फ़ की सलाई घुसा दी। मैं गिर गई। मुंडेर पर। और जब मैं उठी, तो मेरी ये आँख ऐसी हो चुकी थी।"

"और देवदत्त?"

अम्मा बहुत देर तक चुप रहीं।

"वो ऊपर नहीं आया।"

"पर तांत्रिक ने कहा था—"

"तांत्रिक ने आधा सच कहा था।" अम्मा की आवाज़ में अब कड़वाहट थी। अड़सठ साल की कड़वाहट। "मेरी आँख लेकर उसने उस बार गाँव छोड़ दिया। सत्रह बरस तक किसी और को नहीं बुलाया। पर देवदत्त को उसने नहीं छोड़ा। वो उसका हो चुका था। उसने चालीस पूरी कर ली थीं।"

"तो आपकी आँख... बेकार गई?"

"बेकार नहीं।" अम्मा ने अपनी सफ़ेद आँख पर उँगली रखी। "इस आँख से मैं उसकी दुनिया देखती हूँ, बच्चा। अड़सठ साल से। हर रात। मैं देखती हूँ कि कौन-कौन उसके धागे से बँधा है। मैं देखती हूँ कि कौन से घर में वो रात को झाँकती है। और मैं देखती हूँ..." उनकी आवाज़ टूटी, "...मैं देवदत्त को देखती हूँ। अब भी। हर रात। मेरे दरवाज़े के बाहर खड़ा। चौदह बरस का। गीला। दरवाज़ा खटखटाता हुआ।"

सूरज ने अपनी आँख से काला कपड़ा हटाया। उसकी सफ़ेद आँख पलक झपकाती रही।

"तो मैं भी..."

"तूने कल रात अठारहवीं सीढ़ी पर नीचे देखा," अम्मा ने कहा। "तूने उसे देखा। अधूरा। डरते हुए। उसने तेरी आँख पूरी नहीं ली — बस उस पर अपना निशान छोड़ दिया। अब तू भी देखेगा। थोड़ा-थोड़ा।"

"मैं देख रहा हूँ," सूरज ने कहा। उसकी आवाज़ काँप रही थी। "सुबह से। गाँव में आते वक़्त मैंने देखा — लोगों के पैरों से धागे बँधे हैं। पतले, काले, गीले धागे। सब पीपल वाली सड़क की तरफ़ जाते हैं। बावड़ी की तरफ़।"

"कितने लोगों के?"

सूरज ने मुझे देखा। फिर अम्मा को।

"आधे गाँव के," उसने कहा। "और अम्मा... आपके पैर से भी।"

अम्मा ने कुछ नहीं कहा। उन्होंने अपनी धोती के किनारे को थोड़ा ऊपर उठाया। उनके बाएँ टख़ने पर पुराने, फीके पड़ चुके नीले निशान थे। पाँच छोटी उँगलियाँ। अड़सठ साल पुरानी।

"वो किसी को पूरा नहीं छोड़ती, बच्चा," उन्होंने कहा।

फिर सूरज मेरी तरफ़ मुड़ा। और मैंने उसकी आँखों में वही चीज़ देखी जो सुबह बावड़ी पर देखी थी।

"और तेरे कंधे पर अब भी उसका हाथ है, विक्की। पर अब..." उसने निगला, "...अब वो हाथ छोटू का नहीं लगता। अब वो बड़ा हो गया है। तेरे हाथ जितना।"

उस रात हम तीनों रामप्यारी अम्मा के घर रुके।

"मेरे घर की दीवारें उसे अंदर आने नहीं देतीं," अम्मा ने कहा। "पर वक़्त रुकने से नहीं रोक सकतीं। आज रात जब वो तुम्हें बुलाएगी, तो तुम जाओगे। पर मैं और सूरज देखेंगे। अपनी इन आँखों से। कि जब तुम जाते हो, तो पीछे क्या रहता है।"

"आप भी हिल पाएँगी? जब वक़्त रुकेगा?"

"जिसकी आँख उसकी है, उसके लिए उसका वक़्त नहीं रुकता।" अम्मा ने कहा। "अड़सठ साल से हर सत्रहवें बरस मैं उस रुके हुए वक़्त में जागी हूँ। अकेली। पूरे गाँव को जमा हुआ देखते हुए। और उस आवाज़ को सुनते हुए।"

अम्मा का घर छोटा था। एक कमरा, एक रसोई। कमरे की चारों दीवारों पर गोबर से बने हाथ के छापे थे — ज़मीन से छत तक। मैंने उन्हें गिनने की कोशिश की, फिर रुक गया। गिनना अब मुझे डराता था।

"ये छापे किसके हैं, अम्मा?"

अम्मा ने लालटेन जलाई। उसकी पीली रोशनी में छापे उभर आए। सैकड़ों हाथ। बड़े, छोटे, कुछ इतने छोटे कि किसी शिशु के।

"हर उस बच्चे के, जिसे वो ले गई," उन्होंने कहा। "जितने मुझे पता चले। पुराने लोगों से पूछकर। पुरानी पोथियों से। बावड़ी बनी तब से। मैंने बनाए। अपने हाथ से। उनके नाम लेकर। ताकि कोई तो उन्हें याद रखे।"

उन्होंने एक छापे की तरफ़ इशारा किया। दरवाज़े के ठीक बगल में। एक लड़के का हाथ, चौदह-पंद्रह बरस का।

"देवदत्त।"

फिर एक और। छोटा। बारह बरस का। उसकी उँगलियाँ थोड़ी फैली हुई।

"कन्हैया। तेरा छोटू।"

मैं उस छापे को देखता रहा। सूखा हुआ गोबर। भूरा। मैंने अपना हाथ उठाया, उसके पास ले गया — पर छुआ नहीं।

तुमने मेरा हाथ छोड़ा था, भैया।

दो बजकर सैंतालीस।

मुझे अब घड़ी देखने की ज़रूरत नहीं थी। मेरा शरीर जानता था। मेरे टख़ने के निशान एक पल के लिए जलने लगे — ठंडी जलन — और लालटेन की लौ नीली हो गई।

और इस बार, कमरा पूरी तरह नहीं जमा।

सूरज अपनी जगह पर बैठा था, उसकी सफ़ेद आँख खुली, दाईं बंद। वो हिल रहा था। सांस ले रहा था। अम्मा दरवाज़े के पास बैठी थीं, अपनी माला हाथ में, उनके होंठ चल रहे थे।

पर बाहर — बाहर का सब कुछ रुक गया था। गाँव की वो दूर की आवाज़ें जो रात में भी रहती हैं — किसी भैंस का रंभाना, किसी पंखे की खड़खड़ — सब ग़ायब। जैसे पूरी दुनिया एक तस्वीर बन गई हो। और हम तीनों उस तस्वीर के अंदर इकलौते ज़िंदा लोग हों।

फिर दरवाज़े पर दस्तक हुई।

ठक।

धीरे से।

ठक। ठक।

अम्मा की माला रुक गई।

"प्यारी..."

बाहर से एक आवाज़ आई। एक लड़के की। चौदह-पंद्रह बरस का। टूटती हुई, जैसे बड़ों की आवाज़ बनने के बीच में हो। और गीली। बहुत गीली।

"प्यारी... दरवाज़ा खोल। बहुत ठंड है। अड़सठ बरस हो गए, प्यारी। अड़सठ बरस से मैं ठंड में खड़ा हूँ।"

मैंने अम्मा की तरफ़ देखा। उनका चेहरा पत्थर जैसा था। पर उनकी सफ़ेद आँख से एक आँसू बह रहा था। सिर्फ़ उस आँख से।

"तूने कहा था तू मेरे घर आएगी। याद है? तूने वादा किया था। अब मैं आया हूँ तेरे घर। बस दरवाज़ा खोल दे।"

"अम्मा," मैंने फुसफुसाया।

"चुप रह," उन्होंने कहा। उनकी आवाज़ बिल्कुल स्थिर थी। "ये हर रात होता है। सत्रहवें बरस में हर रात। मैं आदी हूँ।"

पर उनके हाथ काँप रहे थे।

"प्यारी... मैंने तुझे चाँदी का सिक्का लाकर दिया था। याद है? तू दरवाज़ा खोलेगी तो मैं दिखाऊँगा। वो अभी भी मेरी मुट्ठी में है। अड़सठ बरस से मैंने उसे पकड़ रखा है। तेरे लिए।"

दरवाज़े के नीचे से पानी की एक पतली धार अंदर आई। और उस पानी में, चमकता हुआ, कुछ लुढ़कता हुआ आया — और अम्मा के पैरों के पास आकर रुक गया।

एक सिक्का। पुराना। काला पड़ा हुआ। उस पर किसी राजा का धुँधला चेहरा।

अम्मा ने उसे देखा।

और वो — जो अड़सठ बरस से हर सत्रहवें साल ये सब झेल रही थीं, जिनका चेहरा पत्थर था — वो टूट गईं। उन्होंने अपने चेहरे को अपने हाथों में छुपा लिया और उनकी पीठ हिलने लगी, बिना किसी आवाज़ के।

"छू ले उसे, प्यारी। बस एक बार छू ले।"

"मत छूना, अम्मा," सूरज ने कहा।

अम्मा ने नहीं छुआ।

और तब सूरज चीख़ा।

मैं उसकी तरफ़ मुड़ा। वो मेरी तरफ़ देख रहा था — नहीं, मेरे ऊपर देख रहा था, अपनी सफ़ेद आँख से। उसका चेहरा डर से सफ़ेद पड़ गया था। वो पीछे खिसक रहा था, दीवार की तरफ़, जैसे मुझसे दूर भागना चाहता हो।

"क्या? सूरज, क्या दिख रहा है?"

"तू..." उसके होंठ काँप रहे थे। "विक्की, तू... दो हो गया है।"

"क्या?"

"एक तू वहाँ बैठा है। और एक तू... उसमें से... उठ रहा है। खड़ा हो रहा है। जैसे कोई कपड़ा उतारता है। और वो जो खड़ा हो रहा है, वो पारदर्शी है, और वो दरवाज़े की तरफ़ जा रहा है... वो जा रहा है, विक्की, दरवाज़े के आर-पार—"

मुझे महसूस हुआ।

एक खिंचाव। मेरे सीने के बीच से। जैसे कोई मेरे अंदर से कुछ निकाल रहा हो। धीरे-धीरे। मेरी आँखों के आगे अँधेरा छाने लगा। कमरा दूर जाने लगा। दरवाज़ा पास आने लगा — नहीं, मैं दरवाज़े की तरफ़ जा रहा था, पर मेरे पैर नहीं हिल रहे थे—

"और जो पीछे रह गया," सूरज की आवाज़ बहुत दूर से आ रही थी, "जो बैठा है... विक्की... वो सिर घुमा रहा है... वो मेरी तरफ़ देख रहा है... वो मुस्कुरा रहा है... अम्मा! अम्मा, देखो उसे!"

और आख़िरी चीज़ जो मैंने देखी, इससे पहले कि अँधेरा पूरी तरह आ जाए —

वो मैं था।

नीचे। ज़मीन पर। दरी पर बैठा। मेरा शरीर। और वो धीरे से उठा। दीवार की तरफ़ गया। उन सैकड़ों हाथ के छापों की तरफ़। और उसने अपनी हथेली — मेरी हथेली — मटके के पास रखे पानी में डुबोई, और उसे दीवार पर दबा दिया।

कन्हैया के छापे के ठीक बगल में।

एक नया छापा। गीला। बड़ा। एक आदमी का हाथ।

और फिर मेरे शरीर ने, मेरे चेहरे से, छोटू की मुस्कान से, पलटकर अम्मा की तरफ़ देखा और कहा — मेरी आवाज़ में, पर बहुत धीमे, बहुत गहरे:

"अम्मा, आपने सबके छापे बनाए। मेरे भैया का रह गया था। मैंने बना दिया।"

चौथी सीढ़ी।

पानी जाँघों तक।

मैं पत्थर की दीवार से पीठ सटाए खड़ा था और हाँफ रहा था। मेरे सीने में वो खिंचाव अब भी था — जैसे मेरे अंदर कुछ अधूरा रह गया हो। जैसे मैं पूरा यहाँ नहीं आया था। या पूरा वहाँ नहीं छूटा था।

मैंने आँखें ऊपर रखीं।

आसमान का टुकड़ा अब और छोटा लग रहा था। पहली रात वो एक खिड़की जितना था। आज वो एक किताब जितना।

और तब मुझे अपने नीचे किसी की साँस सुनाई दी।

बहुत पास। पाँचवीं सीढ़ी पर। मेरे ठीक सामने, पानी के अंदर।

मैं जम गया। मैंने अपनी आँखें आसमान पर गड़ा दीं, इतनी ज़ोर से कि उनमें पानी आ गया।

"डर मत।"

एक आवाज़। एक लड़के की। चौदह-पंद्रह बरस का। वही आवाज़ जो अम्मा के दरवाज़े पर थी।

पर इस बार उसमें वो मीठा, मनाने वाला सुर नहीं था। इस बार वो थकी हुई थी। बहुत थकी हुई। और सच्ची।

"मैं देवदत्त हूँ। मैं तुझे कुछ नहीं करूँगा। मेरे पास ज़्यादा वक़्त नहीं है। वो ऊपर है अभी। प्यारी के दरवाज़े पर। मेरी आवाज़ में। मेरा चेहरा पहनकर।"

मैंने कुछ नहीं कहा। मैं कुछ कह ही नहीं पाया।

"प्यारी से कहना — जो हर रात उसका दरवाज़ा खटखटाता है, वो मैं नहीं हूँ। मैं कभी उसके दरवाज़े पर नहीं गया। मैं यहाँ से निकल ही नहीं सकता। वो मेरी आवाज़ चुराकर जाती है। कहना — मैंने उसे कभी ठंड में खड़े रहने का ताना नहीं दिया। कहना — मैं नाराज़ नहीं हूँ कि वो नीचे नहीं आई। मैं ख़ुश हूँ।"

पानी हिला। उसकी साँस पास आई।

"और तू सुन। ध्यान से। ये बात उसने किसी को नहीं बताने दी। प्यारी को भी नहीं। रमेसर को भी नहीं।"

मैंने साँस रोक ली।

"इस बावड़ी में चालीस सीढ़ियाँ नहीं हैं।"

मेरा दिल रुक गया।

"उनतालीस हैं। मैंने गिनी हैं। अड़सठ बरस से गिन रहा हूँ। हर रात। उनतालीस पत्थर। उसके नीचे सिर्फ़ पानी है। कोई सीढ़ी नहीं।"

"चालीसवीं सीढ़ी..." उसकी आवाज़ अब काँप रही थी, "...चालीसवीं सीढ़ी वो ख़ुद होता है, जो गिनती पूरी करता है। वो उनतालीसवीं से आगे पैर रखता है, और उसके पैर के नीचे कुछ नहीं होता। और फिर वो पत्थर बन जाता है। अगले गिनने वाले के लिए। अगली सीढ़ी।"

"मैं चालीसवीं सीढ़ी हूँ, विक्रम। अट्ठावन से। और तेरे दादा ने जिस पर पैर नहीं टिका पाया था — वो मैं था। मैंने उसे वापस ऊपर धकेला था। क्योंकि वो तेरी गिनती पूरी कर रहा था, अपनी नहीं। और मैं..."

एक बुलबुला फूटा। उसकी आवाज़ रुकी।

"...और मैं थक गया हूँ। अड़सठ बरस हो गए। मुझे कोई बदलने वाला चाहिए।"

और मेरे घुटने पर, पानी के नीचे, कुछ ठंडा और कठोर छुआ। उँगलियाँ नहीं। पत्थर। एक पत्थर जैसा हाथ। खुरदुरा। काई से ढका। जिस पर एक आदमी की उँगलियों की शक्ल थी।

"माफ़ करना," देवदत्त ने फुसफुसाया। "मैं ये नहीं चाहता। पर मैं बहुत थक गया हूँ।"

मैं मुड़ा और भागा।

सूरज मुंडेर पर था। उसने मेरा हाथ पकड़कर मुझे खींचा। अम्मा उसके पीछे खड़ी थीं, हाथ में सीधा जलता दीया।

मैं ज़मीन पर गिरा। और गिरते-गिरते चीख़ा:

"उनतालीस! अम्मा, उनतालीस हैं! चालीसवीं नहीं है!"

अम्मा के हाथ से दीया गिर गया।

वो वहीं खड़ी रहीं, सुबह की धुँधली रोशनी में, बावड़ी की तरफ़ देखती हुईं। और मैंने पहली बार उनके चेहरे पर डर देखा। असली डर। अड़सठ साल पुराना नहीं — अभी का। ताज़ा।

"देवदत्त ने बताया?" उन्होंने फुसफुसाकर पूछा।

मैंने सिर हिलाया। और मैंने उन्हें सब बताया। उसकी हर बात। दरवाज़े वाली आवाज़ के बारे में। उसके थकने के बारे में। पत्थर के हाथ के बारे में।

अम्मा ने अपनी आँखें बंद कर लीं।

"अट्ठावन में," उन्होंने बहुत धीमे कहा, "जब मैंने नीचे देखा था... चालीसवीं सीढ़ी पर वो खड़ा था। मैंने सोचा था वो सीढ़ी पर खड़ा है। पर वो... वो पत्थर बन रहा था। नीचे से। पैरों से ऊपर की तरफ़। और वो मुस्कुरा रहा था क्योंकि..."

"क्योंकि उसके नीचे वाला पत्थर आज़ाद हो रहा था," सूरज ने कहा। उसकी सफ़ेद आँख बावड़ी पर टिकी थी। "उससे पहले वाला। जो इकतालीस में... या चौबीस में..."

अम्मा ने सिर हिलाया। धीरे से।

"हर सत्रह बरस," उन्होंने कहा। "एक आता है। एक जाता है। और सीढ़ियाँ वही रहती हैं। उनतालीस। हमेशा उनतालीस।"

घर लौटने से पहले, मैं अम्मा के कमरे में गया। अपना सामान उठाने।

दीवार पर वो छापा था।

कन्हैया के छापे के ठीक बगल में। एक बड़ा हाथ। एक आदमी का। जो रात में गीला था, अब सूखकर हरा-भूरा हो गया था। उस पर काई के बारीक रेशे चिपके थे।

मैंने अपना हाथ उसके ऊपर रखा।

बिल्कुल ठीक बैठा। हर उँगली। हर रेखा। मेरा हाथ।

और मेरी हथेली अब भी हल्की हरी थी। रगड़ने से नहीं जा रही थी।

अम्मा दरवाज़े पर खड़ी थीं। उन्होंने उस छापे को देखा। फिर मुझे।

"जानता है, बच्चा," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ में कुछ ऐसा था जो मैंने पहले कभी नहीं सुना था — दया नहीं, डर नहीं, बल्कि एक तरह का शोक, जैसे वो किसी के जाने से पहले ही उसका शोक मना रही हों, "मैंने इस दीवार पर अड़सठ बरस में दो सौ तिरेपन छापे बनाए। और एक भी उस इंसान का नहीं था जो ज़िंदा था।"

उन्होंने छापे को छुआ। मेरे छापे को।

"इस दीवार पर सिर्फ़ उनके हाथ हैं, विक्की, जो कभी ऊपर नहीं लौटे।"

भाग 4 समाप्त।

अगले भाग में — "पाँचवीं सीढ़ी": रघु चाचा रात को उठते हैं और देखते हैं कि चाची आँगन में बैठी हैं, आँखें बंद, और धीरे-धीरे गिनती कर रही हैं — पर उल्टी। चालीस से। और विक्रम को पता चलता है कि अगर चालीसवीं सीढ़ी एक इंसान है — तो इस बार कौन-सा पत्थर आज़ाद होने वाला है...

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