Pretika › Real Experiences › भानपुरा की बावड़ी - चालीस सीढ़ियाँ
भाग 5 — पाँचवीं सीढ़ी
Piyashi Atma · Real Experiences · 21 मिनट
- Writer
- Piyashi Atma
- Story
- भानपुरा की बावड़ी - चालीस सीढ़ियाँ
- Chapter
- 5 of 31
- Category
- Real Experiences
- Reading time
- 21 min
- Words
- 4026
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
उल्टी गिनती हमेशा किसी चीज़ के आने की होती है।
रॉकेट उड़ने से पहले। नया साल आने से पहले। किसी बम के फटने से पहले। दस... नौ... आठ... हर संख्या के साथ वो चीज़ पास आती है, और आप जानते हैं कि शून्य पर पहुँचते ही कुछ बदल जाएगा। हमेशा के लिए।
सीधी गिनती में आप कहीं जाते हैं।
उल्टी गिनती में कोई आपके पास आता है।
उस पाँचवें दिन तक मैं सिर्फ़ सीधी गिनती से डरता था। एक, दो, तीन — हर रात एक सीढ़ी नीचे।
फिर रघु चाचा ने मुझे बताया कि पिछली रात चाची क्या कर रही थीं।
और मुझे समझ आया कि बावड़ी में सिर्फ़ उतरने वाले नहीं होते।
चढ़ने वाले भी होते हैं।
चाचा ने मुझे घर में कुछ नहीं बताया।
मैं रामप्यारी अम्मा के घर से लौटा तो वो दरवाज़े पर ही खड़े थे, जैसे मेरा इंतज़ार कर रहे हों। उनकी आँखें लाल थीं। उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा और बिना कुछ बोले मुझे घर से दूर ले गए — गली के आख़िर तक, फिर खेतों की तरफ़, फिर उस सूखे आम के बाग़ तक, जहाँ मैं और छोटू बचपन में खेलते थे।
वहाँ, एक सूखे पेड़ के नीचे, उन्होंने चारों तरफ़ देखा। दूर-दूर तक कोई नहीं था।
"अम्मा ने कहा था," उन्होंने फुसफुसाकर कहा, "तेरी चाची के पास कुछ मत बोलना। वो सुनती है।"
"अम्मा ने आपको भी बताया?"
"कल शाम। जब तू सूरज के साथ उनके घर गया था, वो मेरे पास आई थीं।" उन्होंने अपने चेहरे पर हाथ फेरा। "विक्की, कल रात..."
वो रुक गए। उनकी आँखें सूखे पेड़ की दरारों पर टिकी थीं।
"कल रात क्या, चाचा?"
"मेरी नींद खुली। साढ़े तीन के आसपास। तेरी चाची बगल में नहीं थीं। मैंने सोचा पानी पीने गई होंगी। पर रसोई की तरफ़ से कोई आवाज़ नहीं आ रही थी। मैं उठा। आँगन में गया।"
उन्होंने निगला।
"वो तुलसी के चौरे के पास बैठी थीं। ज़मीन पर। पालथी मारकर। आँखें बंद। सामने एक लोटा रखा था — वही पीतल का लोटा, विक्की, जो बाबूजी के बक्से में था। मैंने उसे तेरे कमरे में देखा था। वो नीचे कैसे आया, मुझे नहीं पता।"
मेरे पेट में कुछ मरोड़ा। वो लोटा। जिसमें वो हरा, बर्फ़ीला पानी था। मैंने उसे पहली रात के बाद से छुआ नहीं था। वो दादाजी के बक्से में ही पड़ा था।
"वो उस लोटे में उँगली डुबोतीं," चाचा ने आगे कहा, "और ज़मीन पर एक लकीर खींचतीं। और एक संख्या बोलतीं। फिर उँगली डुबोतीं, फिर लकीर, फिर संख्या। बहुत धीरे-धीरे। जैसे कोई पूजा कर रहा हो।"
"क्या गिन रही थीं?"
चाचा ने मेरी तरफ़ देखा। उनके चेहरे पर एक ऐसा डर था जो मैंने कभी किसी बड़े आदमी के चेहरे पर नहीं देखा था।
"उल्टा," उन्होंने कहा। "चालीस से। 'चालीस।' लकीर। 'उनतालीस।' लकीर। 'अड़तीस।' लकीर। मैं वहीं खड़ा रहा, विक्की। मैं हिल नहीं पाया। 'सैंतीस।' 'छत्तीस।' और जब उन्होंने 'पैंतीस' बोला, तब जाकर मैं आगे बढ़ा और उनका कंधा छुआ।"
"फिर?"
"उन्होंने आँखें खोलीं। बिल्कुल आराम से। जैसे कुछ हुआ ही न हो। मुझे देखकर मुस्कुराईं और बोलीं, 'आप क्यों उठ गए? मैं तो बाबूजी के लिए माला फेर रही थी। सो जाइए।'" चाचा की आवाज़ काँपी। "उनके हाथ में कोई माला नहीं थी, विक्की। सिर्फ़ गीली उँगलियाँ थीं। और ज़मीन पर पाँच हरी लकीरें।"
हम दोनों चुप हो गए। बाग़ में हवा नहीं चल रही थी। एक सूखा पत्ता भी नहीं हिल रहा था।
"चाचा," मैंने धीरे से कहा, "आप मुझसे कुछ और भी कहना चाहते हैं।"
उन्होंने मेरी तरफ़ नहीं देखा। उनका जबड़ा कसा हुआ था।
"बाबूजी ने मरने से कुछ दिन पहले मुझसे एक बात कही थी," उन्होंने आख़िर में कहा। "उन्होंने कहा था, 'रघु, अगर बहू गिनने लगे — उल्टा — तो समझ लेना कि कोई ऊपर आ रहा है। और अगर वो ऊपर आ गया, तो...'"
वो रुक गए।
"तो क्या?"
"बाक़ी उन्होंने नहीं बताया।" चाचा उठ खड़े हुए। "या शायद बताया था, और मैं... मैं भूल जाना चाहता था। बहुत सी बातें हैं जो मैं भूल जाना चाहता हूँ, विक्की।"
और उस पल, जब वो उठे, उनकी धोती थोड़ी ऊपर सरकी — और मैंने उनके बाएँ टख़ने पर कुछ देखा।
पुराने, फीके पड़ चुके निशान। नीले नहीं, भूरे। लगभग मिट चुके। पर वहाँ थे।
पाँच छोटी उँगलियाँ।
मैंने कुछ नहीं कहा। मैंने नज़र हटा ली। पर चाचा ने मुझे देखते हुए देख लिया था। उन्होंने चुपचाप अपनी धोती नीचे की, और घर की तरफ़ चलने लगे।
उस दिन के बाद से मैंने उन्हें कभी धोती ऊपर करते नहीं देखा।
"उल्टी गिनती का मतलब है कोई सीढ़ियाँ चढ़ रहा है," रामप्यारी अम्मा ने कहा।
दोपहर थी। हम फिर से उनके आँगन में थे — मैं, सूरज और अम्मा। अब ये एक तरह का नियम बन गया था: दिन में योजना, अम्मा के घर में, जहाँ दीवारों पर हाथ के छापे थे और चौखट पर कीलें।
मैंने कोशिश की कि दीवार पर अपने छापे की तरफ़ न देखूँ।
"कौन चढ़ रहा है, अम्मा?"
"जो आज़ाद हुआ है।" अम्मा ने बिना हिचकिचाए कहा। "देवदत्त ने तुझसे कहा था न — वो थक गया है। उसे बदलने वाला चाहिए। वो जानता है कि इस बार तू चालीसवीं बनेगा। उसे बस इंतज़ार करना है।" उन्होंने एक गहरी साँस ली। "पर पत्थर को ऊपर आने के लिए एक रास्ता चाहिए। वो ख़ुद नहीं चल सकता। उसे एक घर चाहिए।"
"चाची," मैंने कहा।
"तेरी चाची उसकी खिड़की है। खिड़की से झाँका जाता है, बच्चा। और कल रात उसने झाँककर पाँच सीढ़ियाँ चढ़ लीं। चालीस से पैंतीस तक।"
सूरज ने अपनी आँख से काला कपड़ा हटाया। "तो वो हर रात पाँच चढ़ेगा?"
"नहीं।" अम्मा ने सिर हिलाया। "खिड़की से बस थोड़ा ही चढ़ा जा सकता है। उसे दरवाज़ा चाहिए। कोई ऐसा जो उसकी पूरी गिनती बोल दे — पैंतीस से एक तक, एक साँस में। अगर किसी ने बोल दी..." उन्होंने अपनी सफ़ेद आँख पर उँगली रखी। "...तो वो एक रात में ऊपर आ जाएगा।"
"और ऊपर आकर क्या करेगा?"
अम्मा ने बहुत देर तक जवाब नहीं दिया।
"मुझे नहीं पता," उन्होंने आख़िर में कहा। "अट्ठावन में वो नीचे गया था। पहली बार कोई ऊपर आने वाला है, जिसे मैं जानती थी।" उनकी आवाज़ बहुत धीमी हो गई। "मुझे नहीं पता अड़सठ बरस पत्थर बने रहने के बाद इंसान के अंदर क्या बचता है, विक्की। मुझे नहीं पता वो अब भी देवदत्त है या कुछ और।"
"एक काम कर सकते हैं," अम्मा ने कहा। "खिड़की बंद कर सकते हैं।"
उन्होंने एक छोटी-सी शीशी निकाली। गहरे रंग का सरसों का तेल, जिसमें कुछ सूखी पत्तियाँ और लहसुन की एक कली तैर रही थी।
"रात को सोने से पहले तेरी चाची के कान में ये गुनगुना करके डालना। तीन बूँद। फिर रुई लगा देना। कसकर। सुबह तक निकालना मत।"
"इससे वो सुन नहीं पाएगी?"
"इससे खिड़की बंद हो जाएगी।" अम्मा ने शीशी मेरे हाथ में रखी, पर उसे छोड़ा नहीं। उनकी उँगलियाँ मेरी उँगलियों पर कसी रहीं। "पर सुन, बच्चा। ध्यान से सुन। जब खिड़की बंद होती है, तो वो दरवाज़ा ढूँढती है। वो रुकती नहीं। वो बस दूसरा रास्ता ढूँढती है।"
"कौन-सा दरवाज़ा?"
"जो भी पास हो। जो भी कमज़ोर हो। जिसके अंदर पहले से उसका कोई धागा बँधा हो।"
मुझे चाचा के टख़ने के वो फीके, भूरे निशान याद आए।
"अम्मा," मैंने धीरे से पूछा, "रघु चाचा... क्या वो कभी बावड़ी पर गए थे? कभी पहले?"
अम्मा ने मेरे हाथ से अपना हाथ हटा लिया। और उनकी आँखों में — दोनों आँखों में, काली और सफ़ेद — एक पल के लिए कुछ बंद हो गया। जैसे कोई दरवाज़ा।
"ये उससे पूछ," उन्होंने कहा। "मुझसे नहीं।"
शाम ढलने से पहले, मैंने कुछ ऐसा किया जो शायद मुझे नहीं करना चाहिए था।
मैं बावड़ी पर गया।
दिन में। सूरज के साथ। चार बजे, जब धूप अभी भी तेज़ थी पर तिरछी होने लगी थी। मेरे पास रघु चाचा के तकिये के नीचे से निकाली गई चाबी थी — उन्हें पता नहीं था।
"तू पागल है," सूरज ने रास्ते भर कहा। "तू सच में पागल है, विक्की।"
"मुझे देखना है।"
"क्या देखना है? वो सीढ़ियाँ तू हर रात देखता है!"
"नहीं देखता। मैं हर रात आसमान देखता हूँ। मैंने कभी नीचे नहीं देखा। दिन में, धूप में, जब वो सो रही हो — मुझे देखना है कि देवदत्त ने सच कहा या नहीं।"
"गिनेगा?" सूरज रुक गया। उसकी आवाज़ में दहशत थी। "तू गिनेगा सीढ़ियाँ? विक्की, पहला नियम ही यही है—"
"नहीं गिनूँगा।" मैंने अपना कैमरा उठाया। "तस्वीर लूँगा।"
पीपल की घंटियाँ बज रही थीं। हवा नहीं थी।
मैंने ताले में चाबी डाली। वो आसानी से घूमी — बहुत आसानी से, जैसे किसी ने अभी-अभी उसमें तेल डाला हो। ज़ंजीर ढीली हुई। मैंने और सूरज ने मिलकर टीन की एक चादर को थोड़ा-सा सरकाया। बस इतना कि एक आदमी झाँक सके।
अंदर से ठंडी हवा का एक झोंका आया। उसमें वही गंध थी। पर दिन की रोशनी में वो गंध और भी घिनौनी लग रही थी — जैसे किसी ने बहुत दिनों से बंद किसी कमरे का दरवाज़ा खोल दिया हो जिसमें कुछ मरा पड़ा हो।
मैंने झुककर देखा।
धूप तिरछी होकर अंदर जा रही थी — ऊपर की दस-बारह सीढ़ियों पर। उसके नीचे सब कुछ धीरे-धीरे अँधेरे में घुलता जा रहा था। पत्थर की सीढ़ियाँ, दोनों तरफ़ से नीचे उतरती हुई, एक उल्टे पिरामिड की तरह, और बीच में, बहुत नीचे, पानी की एक काली, चमकती सतह।
सीढ़ियाँ पुरानी थीं। घिसी हुई। बीच में गड्ढे थे।
और फिर मैंने ध्यान से देखा।
और मेरी साँस रुक गई।
हर सीढ़ी पर एक आकृति थी।
पत्थर में। पत्थर का हिस्सा बनकर। जैसे किसी ने सीढ़ी पर लेटकर अपने शरीर का निशान छोड़ दिया हो, और वो निशान समय के साथ पत्थर में धँस गया हो। एक सिर। कंधे। बाँहें, शरीर के बगल में। पैर। हर सीढ़ी पर एक इंसान की धुँधली रूपरेखा, पीठ के बल लेटी हुई। पत्थर की सतह पर उभरी हुई — या शायद अंदर धँसी हुई, मैं ठीक से नहीं कह सकता।
चेहरे ऊपर की तरफ़।
आसमान की तरफ़।
और हर चेहरे पर, जहाँ आँखें होनी चाहिए थीं, दो छोटे-छोटे गड्ढे थे, जिनमें पानी भरा था। और धूप में वो पानी चमक रहा था।
जैसे वो सब ऊपर देख रहे हों। मेरी तरफ़।
"सूरज," मैंने फुसफुसाया, "तू देख रहा है?"
सूरज मेरे बगल में झुका। उसने अपनी दाईं आँख बंद की। सिर्फ़ बाईं से — सफ़ेद वाली से — देखा।
और वो पीछे गिर पड़ा।
"वो ज़िंदा हैं," उसने हाँफते हुए कहा। "विक्की, वो पत्थर नहीं हैं। वो ज़िंदा हैं। मेरी इस आँख से वो दिखते हैं — असली। लोग। औरतें, आदमी, बच्चे। सब लेटे हुए। सब ऊपर देख रहे हैं। और उनकी पलकें... उनकी पलकें झपकती हैं, विक्की। बहुत धीरे। सालों में एक बार।"
मैंने कैमरा उठाया। मेरे हाथ काँप रहे थे।
क्लिक।
और तभी मैंने पहली सीढ़ी पर देखा।
पहली सीढ़ी पर कोई आकृति नहीं थी। सिर्फ़ पैरों के निशान थे। मेरे। गीले, जो पहली सुबह के बाद भी सूखे नहीं थे।
दूसरी सीढ़ी पर भी कोई आकृति नहीं। मेरे निशान। और उनके बगल में सूरज के।
तीसरी पर भी। चौथी पर भी।
मेरी सीढ़ियाँ ख़ाली थीं।
क्योंकि वो सीढ़ियाँ अभी किसी की नहीं हुई थीं। वो इंतज़ार कर रही थीं।
पाँचवीं सीढ़ी पर — आज रात की सीढ़ी पर — गीले निशान थे।
पर मेरे नहीं।
छोटे। पतले। किसी औरत के पैर। और उनके बीच, पत्थर पर, पाँच हरी लकीरें खिंची हुई थीं। उँगली से खींची हुई। बिल्कुल वैसी, जैसी चाचा ने आँगन में देखी थीं।
चाची यहाँ आई थीं।
किसी रात। या शायद हर रात। मुझसे पहले।
"विक्की, टीन बंद कर," सूरज ने कहा। उसकी आवाज़ बदल गई थी। "अभी। अभी बंद कर।"
"क्यों?"
"क्योंकि वो सब..." उसकी सफ़ेद आँख फैली हुई थी, "...वो सब अब ऊपर नहीं देख रहे। वो सब सिर घुमा रहे हैं। बहुत धीरे-धीरे। सब एक साथ। तेरी तरफ़ नहीं। नीचे की तरफ़। पानी की तरफ़।"
"क्यों?"
"क्योंकि पानी में कुछ उठ रहा है।"
हमने टीन खींची। ज़ंजीर लपेटी। ताला लगाया। और भागे। पीछे मुड़कर नहीं देखा।
पीपल की घंटियाँ ज़ोर-ज़ोर से बजने लगी थीं।
घर लौटकर, छत पर, जहाँ चाची की आवाज़ नहीं पहुँचती थी, मैंने कैमरे की स्क्रीन पर वो तस्वीर खोली।
सूरज मेरे बगल में बैठा था। उसने अपनी सफ़ेद आँख पर फिर से काला कपड़ा बाँध लिया था। "मुझे मत दिखाना," उसने कहा। "मैंने जितना देखना था, देख लिया।"
तस्वीर में वो आकृतियाँ और साफ़ थीं। आँख से जो धुँधला दिख रहा था, कैमरे ने उसे पकड़ लिया था। हर सीढ़ी पर एक शरीर। पत्थर में जड़ा हुआ। मैंने ज़ूम किया।
छठी सीढ़ी पर एक बूढ़ी औरत थी। उसके कानों में भारी बालियाँ थीं — पत्थर की, पर बालियों की शक्ल साफ़ थी।
सातवीं पर एक आदमी। उसकी कलाई पर कुछ बँधा था — एक पुरानी घड़ी का पट्टा, जो पत्थर बनकर भी घड़ी जैसा दिख रहा था।
आठवीं पर एक बच्ची। गुड्डी जितनी। उसकी चोटियाँ पत्थर पर फैली हुई थीं।
मैंने आगे ज़ूम किया। नीचे। जहाँ धूप ख़त्म होती थी और अँधेरा शुरू होता था। वहाँ आकृतियाँ मुश्किल से दिखती थीं। पर कैमरे का सेंसर अँधेरे में भी कुछ न कुछ पकड़ लेता है।
और मैंने कुछ देखा जिससे मेरे हाथ ठंडे पड़ गए।
पानी के ठीक ऊपर वाली सीढ़ी पर — जो भी वो संख्या थी, मैं गिनना नहीं चाहता था — बाक़ी सब आकृतियाँ पीठ के बल लेटी थीं।
पर वो एक आकृति बैठी हुई थी।
उठकर बैठी हुई। घुटने मोड़े। बाँहें उनके चारों ओर। जैसे कोई बहुत देर तक लेटे रहने के बाद अभी-अभी उठा हो, और अब भी तय नहीं कर पा रहा हो कि खड़ा हो या नहीं।
और उसका सिर ऊपर उठा हुआ था। सीधे कैमरे की तरफ़।
उसके चेहरे पर पत्थर की परत थी, पर उस परत में दरारें पड़ गई थीं। जैसे अंडे का छिलका टूटता है। और उन दरारों में से, अंदर से, कुछ झाँक रहा था। कुछ मुलायम। कुछ ज़िंदा।
"सूरज," मैंने कहा, "तस्वीरें झूठ नहीं बोलतीं, है न?"
सूरज ने कपड़े वाली आँख पर हाथ रखा। "तू किसके बारे में बात कर रहा है?"
मैंने स्क्रीन उसकी तरफ़ नहीं घुमाई।
"कोई नहीं," मैंने कहा। "कोई भी नहीं।"
पर उस रात, जब मैं चाची के कान में तेल डाल रहा था, मेरे दिमाग़ में सिर्फ़ वो एक तस्वीर घूम रही थी। पत्थरों के बीच बैठा हुआ वो एक लड़का। अंडे के छिलके जैसी दरारों वाला चेहरा।
और उसकी आँखें, जो कैमरे में नहीं देख रही थीं।
वो मुझमें देख रही थीं। अपनी जगह का हिसाब लगाती हुईं।
उस रात मैंने चाची के कान में तेल डाला।
"अम्मा ने दिया है," मैंने कहा। "कान के पानी के लिए।"
चाची ने ख़ुशी-ख़ुशी सिर झुका दिया। "रामप्यारी अम्मा के हाथ में जादू है, बेटा।"
मैंने तेल को एक कटोरी में रखकर लालटेन की गर्मी पर गुनगुना किया। तीन बूँदें। जैसे ही पहली बूँद उनके कान में गई, चाची चौंकीं।
"आह! कितना ठंडा है!"
पर तेल गरम था। मैंने ख़ुद छूकर देखा था।
दूसरी बूँद।
चाची की आँखें एक पल के लिए ऊपर की तरफ़ पलट गईं — सिर्फ़ सफ़ेदी दिखी — फिर वापस आ गईं। "विक्की... कोई गाना बंद हो गया। जो कान में चल रहा था। अचानक बंद हो गया।"
तीसरी बूँद।
उनके कान से एक आवाज़ आई। बहुत धीमी। बुलबुले फूटने जैसी। और फिर — इतनी धीमी कि मुझे लगा शायद मेरा वहम है — एक फुसफुसाहट। तेल के नीचे से। बहुत गहरे से।
"...ऐसा मत कर, बेटा..."
मैंने रुई ठूँस दी। कसकर।
उस रात घर में सिर्फ़ हम तीन थे। मैं, चाचा, चाची। सूरज अपने घर पर था — गुड्डी के पास। अम्मा अपने घर पर।
चाची जल्दी सो गईं। रुई कान में, सिर तकिये पर। उनकी साँसें गहरी और शांत थीं। पिछली कई रातों से वो ऐसे नहीं सोई थीं।
मैं और चाचा उनके कमरे के बाहर बरामदे में बैठे थे। लालटेन बीच में।
"चाचा," मैंने कहा, "आप कभी बावड़ी पर गए थे? बचपन में?"
उन्होंने लालटेन की लौ की तरफ़ देखा। बहुत देर तक।
"सो जा, विक्की।"
"चाचा—"
"कल बताऊँगा।" उनकी आवाज़ में कुछ टूटा हुआ था। "कल दिन में। धूप में। बस आज रात... आज रात कुछ मत पूछ।"
दो बजकर सैंतालीस।
लौ नीली हुई।
चाची अपने बिस्तर पर जम गईं। उनकी साँस बीच में रुक गई।
मैं इंतज़ार करता रहा। अब मुझे पता था कि क्या होगा। किसी की आवाज़। कोई गिनती। दरवाज़े के नीचे से पानी।
पर कुछ नहीं हुआ।
पूरा घर जमा हुआ था। पूरा गाँव। और कोई आवाज़ नहीं आई। कोई दस्तक नहीं। कोई फुसफुसाहट नहीं।
मैंने चाची की तरफ़ देखा। उनके कान की रुई धीरे-धीरे बाहर सरक रही थी।
अपने आप। बहुत धीरे। जैसे अंदर से कोई उसे धकेल रहा हो।
रुई बाहर गिरी। और उसके पीछे-पीछे तेल बहा। पर वो तेल अब सुनहरा नहीं था। वो काला था। गाढ़ा। चाची के गाल पर से होता हुआ, तकिये पर टपकता हुआ।
पर उसके बाद कुछ नहीं निकला। कोई बाल नहीं। कोई आवाज़ नहीं।
खिड़की बंद हो चुकी थी।
मैंने राहत की साँस ली।
और तब, मेरे बगल में, रघु चाचा ने बोलना शुरू किया।
"पैंतीस।"
मैं मुड़ा।
चाचा अपनी जगह पर बैठे थे। वो जमे नहीं थे। वो रुके हुए वक़्त में हिल रहे थे — मेरी तरह। उनकी आँखें बंद थीं। उनके हाथ घुटनों पर रखे थे। हथेलियाँ ऊपर। और उनके होंठ हिल रहे थे।
"चौंतीस।"
"चाचा!" मैंने उनका कंधा हिलाया। "चाचा, जागो!"
"तैंतीस।" उनकी आवाज़ शांत थी। नींद में डूबी हुई। "बत्तीस।"
मुझे अम्मा की बात याद आई। जब खिड़की बंद होती है, तो वो दरवाज़ा ढूँढती है। जिसके अंदर पहले से उसका कोई धागा बँधा हो।
चाचा के टख़ने के वो भूरे, फीके निशान।
"इकतीस। तीस।"
मैंने उनके मुँह पर हाथ रखा। ज़ोर से।
और उनकी आवाज़ मेरी हथेली के नीचे से भी आती रही। दबी हुई, पर साफ़। जैसे वो उनके मुँह से नहीं, उनके सीने से, उनके पेट से, उनके पूरे शरीर से आ रही हो।
"उनतीस। अट्ठाईस।"
और उनकी त्वचा ठंडी होने लगी। मेरी हथेली के नीचे। धीरे-धीरे। एक ज़िंदा इंसान की गरमाहट से पत्थर की ठंडक तक।
"सत्ताईस। छब्बीस।"
मैंने उन्हें ज़मीन पर गिरा दिया। उनके ऊपर बैठ गया। उनके चेहरे को दोनों हाथों से पकड़ा।
"चाचा! रघुनाथ मिश्र! मेरी आवाज़ सुनो!"
उनकी आँखें खुलीं।
वो उनकी आँखें नहीं थीं।
वो एक लड़के की आँखें थीं। चौदह-पंद्रह बरस का। बहुत थकी हुई। बहुत दुखी। और बहुत, बहुत पुरानी। उन आँखों में आँसू थे।
"माफ़ करना," चाचा के मुँह से निकला। पर वो आवाज़ चाचा की नहीं थी। वो देवदत्त की थी। वही, जो मैंने चौथी सीढ़ी पर सुनी थी। "मैंने कहा था न, मैं ये नहीं चाहता। पर मैं बहुत थक गया हूँ, विक्रम। अड़सठ बरस। बस एक बार सूरज देखना चाहता हूँ। बस एक बार।"
"चाचा को छोड़ दो। प्लीज़। मैं... मैं चालीसवीं बन जाऊँगा, पर चाचा को छोड़ दो—"
उन आँखों में कुछ बदला। दया। या शायद शर्म।
"तू बनेगा," उसने धीरे से कहा। "वो तय है। पर मुझे ऊपर आने के लिए एक घर चाहिए था। और इसका घर तो सत्रह बरस से ख़ाली पड़ा था।"
और फिर, एक ही साँस में, बिना रुके, चाचा के मुँह से गिनती निकली। तेज़। बहुत तेज़। जैसे कोई बाँध टूट गया हो।
"पच्चीस-चौबीस-तेईस-बाईस-इक्कीस-बीस-उन्नीस-अठारह-सत्रह-सोलह-पंद्रह-चौदह-तेरह-बारह-ग्यारह-दस-नौ-आठ-सात-छह-पाँच-चार-तीन-दो—"
मेरे नीचे से फ़र्श गायब हो गया।
पाँचवीं सीढ़ी। पानी कमर तक।
मैं इतनी ज़ोर से गिरा था कि पानी की छींटें मेरे चेहरे पर पड़ीं। मुँह में गया। वो कड़वा था। सड़ा हुआ। और उसमें लोहे का स्वाद था — ख़ून जैसा।
मैंने आँखें ऊपर कीं। आसमान। धूसर। छोटा।
और फिर मैंने आवाज़ सुनी।
नीचे से। बहुत नीचे से। पत्थर के पत्थर पर घिसटने की आवाज़।
घर्रर्र।
जैसे कोई भारी चक्की घूम रही हो।
घर्रर्र।
पास आती हुई। हर बार थोड़ी पास।
कोई सीढ़ियाँ चढ़ रहा था।
पर वो चलने की आवाज़ नहीं थी। वो पैरों की छप-छप नहीं थी। वो किसी ऐसी चीज़ की आवाज़ थी जो बहुत भारी थी। जिसके पैर पत्थर के थे। जो हर सीढ़ी पर अपना पूरा वज़न रखती थी, और सीढ़ी उसके नीचे कराहती थी।
घर्रर्र। पानी हिला।
घर्रर्र। पानी में लहरें उठीं, मेरी छाती तक।
घर्रर्र।
छठी सीढ़ी। मेरे ठीक नीचे।
मैंने दीवार से पीठ सटा ली। अपने आप को जितना छोटा कर सकता था, कर लिया। आँखें आसमान पर। होंठ दाँतों के बीच।
घर्रर्र।
वो मेरे बगल में आया।
पाँचवीं सीढ़ी पर। मेरे साथ। इतना पास कि उसका कंधा मेरे कंधे से छुआ।
वो कंधा पत्थर था। खुरदुरा। ठंडा। काई से ढका। और गीला। उससे पानी बह रहा था, मेरी बाँह पर। और उस पत्थर के अंदर — मुझे महसूस हुआ — कुछ धड़क रहा था। बहुत धीरे। बहुत कमज़ोर। एक दिल, जो अड़सठ बरस में पहली बार फिर से धड़कना सीख रहा था।
मैंने उसे नहीं देखा। मैं क़सम खाता हूँ, मैंने उसे नहीं देखा।
पर मेरी आँखों के सबसे बाएँ कोने में, धुँधला-सा, कुछ आया। एक सिर। एक लड़के का सिर, जिसके बाल पत्थर में जमे थे। जिसका कान पत्थर का था, जिसमें दरारें थीं, और उन दरारों में से पतले, काले बाल बाहर निकल रहे थे।
वो रुका। मेरे बगल में। एक पल।
"धन्यवाद," उसने फुसफुसाया। "तेरी वजह से मैं ऊपर जा पा रहा हूँ। तेरी गिनती की वजह से। अगर तूने सत्रह बरस पहले ये खेल शुरू न किया होता..."
और फिर वो आगे बढ़ गया।
घर्रर्र। चौथी सीढ़ी।
घर्रर्र। तीसरी।
दूसरी। पहली।
और फिर एक आवाज़ — पत्थर के धूल पर पैर रखने की। मुंडेर के ऊपर। बाहर।
वो बाहर निकल गया था।
और बाहर से, पीपल की तरफ़ से, एक गहरी, लंबी, भूखी साँस अंदर लेने की आवाज़ आई। जैसे किसी ने अड़सठ बरस बाद पहली बार हवा चखी हो।
मैं वहीं खड़ा रहा, कमर तक पानी में, और रोता रहा।
मैं ख़ुद निकला। किसी ने मुझे नहीं खींचा। घर पहुँचा तो सूरज उग चुका था।
चाचा आँगन में बैठे थे। तुलसी के चौरे के पास। पालथी मारकर। सामने एक लोटा रखा था — वो पीतल वाला। और वो उसमें से पानी पी रहे थे।
गट-गट-गट।
पूरा लोटा ख़ाली करके उन्होंने उसे नीचे रखा। फिर घड़े से भरा। फिर पिया। गट-गट-गट।
"चाचा?"
उन्होंने ऊपर देखा। और मुस्कुराए।
"अरे विक्की! सुबह-सुबह कहाँ से आ रहा है?" उनकी आवाज़ बिल्कुल उनकी थी। उनका लहजा। उनकी खाँसी। "रात बहुत अच्छी नींद आई, बेटा। पता नहीं कितने बरस बाद ऐसी नींद आई। बस प्यास बहुत लग रही है। बहुत प्यास।"
उन्होंने फिर लोटा उठाया।
और मैंने उनकी हथेली देखी। लोटा पकड़े हुए।
हथेली की रेखाएँ बदल गई थीं। वो अब रेखाएँ नहीं थीं। वो दरारें थीं। पत्थर की दरारें। बारीक, भूरी-हरी, जैसी पुरानी सीढ़ियों पर होती हैं।
चाची रसोई से बाहर आईं। उनका कान ठीक था। "रुई अपने आप गिर गई रात को," उन्होंने हँसकर कहा। "पर अब पानी वाली बात भी चली गई, विक्की। एकदम साफ़ सुनाई दे रहा है। अम्मा के तेल ने कमाल कर दिया।"
मैं कुछ नहीं बोल पाया।
मैं ऊपर गया। दादाजी के कमरे में। डायरी खोली।
नई पंक्ति थी।
पर इस बार लिखावट किसी बच्चे की नहीं थी। न दादाजी की। ये लिखावट पुरानी थी। बहुत पुरानी। सुंदर, गोल, सधी हुई। वैसी, जैसी पुराने ज़माने में पाठशाला में सिखाई जाती थी। शिरोरेखा बिल्कुल सीधी। और कुछ शब्द ऐसे थे जो अब कोई इस्तेमाल नहीं करता।
"प्रिय विक्रम,
ऊपर का पवन अड़सठ बरस उपरांत इतना मधुर होगा, मैंने कल्पना नहीं की थी। तुम्हारा उपकार मैं कभी नहीं भूलूँगा।
तुम्हारे चाचा का घर अच्छा है। थोड़ा पुराना, पर मज़बूत। मैं इसका ध्यान रखूँगा।
अब चालीसवीं सीढ़ी ख़ाली है। वो तुम्हारी प्रतीक्षा करेगी। उसे जल्दी नहीं है। पत्थरों को कभी जल्दी नहीं होती।
— दे. द."
मैं खिड़की के पास गया। नीचे आँगन में देखा।
चाचा अब भी वहीं बैठे थे। लोटा ख़ाली। उनका चेहरा ऊपर की तरफ़। आसमान की तरफ़। आँखें आधी बंद। चेहरे पर एक ऐसी मुस्कान, जैसे कोई बहुत लंबे समय के बाद धूप में बैठा हो।
फिर चाची उनके पास आईं, हाथ में चाय का गिलास।
चाचा ने गिलास लिया। चाची की तरफ़ देखा। और बहुत प्यार से, बहुत नरमी से, एक ऐसी आवाज़ में जो मैंने अपने चाचा के मुँह से पूरी ज़िंदगी कभी नहीं सुनी थी, पूछा:
"सुनो... ये प्यारी का घर अब किधर पड़ता है? बहुत बरस हो गए। रास्ता भूल गया हूँ।"
चाची हँस पड़ीं। "कौन प्यारी? आप भी न, सुबह-सुबह..."
पर मैं नहीं हँसा।
क्योंकि पूरे भानपुरा में, अड़सठ बरस से, रामप्यारी अम्मा को "प्यारी" कहकर बुलाने वाला सिर्फ़ एक ही इंसान था।
और वो अभी-अभी ऊपर आया था।
भाग 5 समाप्त।
अगले भाग में — "छठी सीढ़ी": देवदत्त, रघु चाचा के शरीर में, रामप्यारी अम्मा के दरवाज़े तक पहुँचता है। अड़सठ बरस बाद। और इस बार, दरवाज़ा अम्मा को ख़ुद खोलना होगा। उधर, दादाजी के कमरे की दीवार पर चॉक की लकीरें अपने आप बढ़ने लगती हैं — और वो विक्रम की सीढ़ियाँ नहीं गिन रहीं...
भानपुरा की बावड़ी - चालीस सीढ़ियाँ · सभी भाग →
और कहानियाँ · More stories
- देवभूमि का साया: गढ़वाल की शापित घाटी और डाक-बंगले का रहस्य · Piyashi Atma
- तेरहवीं अमावस · Piyashi Atma
- यक्षिणी: कदंब का श्राप · Piyashi Atma
- Mohabbat ke so imtihan · firoj saifi