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भाग 6 — छठी सीढ़ी

Piyashi Atma · Real Experiences · 20 मिनट

Writer
Piyashi Atma
Story
भानपुरा की बावड़ी - चालीस सीढ़ियाँ
Chapter
6 of 31
Category
Real Experiences
Reading time
20 min
Words
3995
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

कुछ दरवाज़े बाहर से खटखटाए जाते हैं।

कुछ अंदर से खोले जाते हैं।

और कुछ दरवाज़े ऐसे होते हैं जिनके सामने कोई अड़सठ बरस तक खड़ा रहता है — और अंदर वाला अड़सठ बरस तक कुंडी पर हाथ रखे बैठा रहता है। दोनों इंतज़ार करते हैं। दोनों डरते हैं। और दोनों जानते हैं कि जिस दिन वो दरवाज़ा खुलेगा, उस दिन कुछ ख़त्म हो जाएगा।

बस ये नहीं जानते कि क्या।

उस छठे दिन, रामप्यारी अम्मा ने वो दरवाज़ा खोला।

और मैं वहाँ था।

पर सुबह, सबसे पहले, दीवार थी।

दादाजी के कमरे में, खिड़की के पास, फ़र्श से कुछ ऊपर, वो चॉक की लकीरें थीं जो मैंने पहली रात देखी थीं। चार खड़ी, एक आड़ी। चार खड़ी, एक आड़ी। सैकड़ों। जेल की कोठरी में दिन गिनने जैसी।

मैंने उन्हें कभी गिना नहीं था। गिनना अब मेरे लिए ज़हर था।

पर पहली रात मैंने उनकी तस्वीर ली थी। फ़ोन से। बस यूँ ही — फ़ोटोग्राफ़र की आदत। उस सुबह, जब मैं दरारों वाली हथेलियों और देवदत्त की सुंदर लिखावट से भागकर इस कमरे में बैठा था, मेरी नज़र फिर उन लकीरों पर गई।

और कुछ अलग लगा।

मैंने फ़ोन निकाला। पुरानी तस्वीर खोली। दीवार के पास रखा। मिलाया।

नई लकीरें थीं।

ऊपर वाली लकीरें — पुरानी, धुँधली, दादाजी के हाथ की — वैसी ही थीं। पर उनके नीचे, बहुत नीचे, फ़र्श से बस एक-डेढ़ फ़ुट ऊपर, कुछ नई लकीरें खिंची थीं। जो पहली रात की तस्वीर में नहीं थीं।

पाँच खड़ी लकीरें। और एक छठी, आधी खिंची हुई। जैसे खींचने वाला बीच में रुक गया हो।

और वो लकीरें चॉक की नहीं थीं।

वो हरी थीं। गीली। उँगली से खींची हुई। और वो सीधी नहीं थीं — टेढ़ी-मेढ़ी, काँपती हुई, जैसे किसी ऐसे हाथ ने खींची हों जिसने अभी-अभी लकीर खींचना सीखा हो।

इतनी नीचे।

किसी बच्चे की ऊँचाई पर।

मैंने अपनी उँगली छठी, आधी लकीर के पास रखी। वो अब भी गीली थी। ठंडी।

पाँच रातें। मैं पाँच सीढ़ियाँ उतरा था। पर ये मेरी गिनती नहीं थी। मेरी सीढ़ियाँ चौथी रात तक खिड़की से दूर उतरी थीं, पलंग के पास — और ये लकीरें पहली रात से थीं ही नहीं।

ये किसी और की गिनती थी।

किसी ऐसे की, जो तीसरी रात से शुरू हुआ था।

तीसरी रात। सूरज का घर। गुड्डी। वीडियो में मेरा शरीर, उसके कान में फुसफुसाता हुआ।

एक के बाद दो आता है... दो के बाद तीन...

मैंने फ़ोन उठाया और सूरज को फ़ोन किया।

"सूरज, गुड्डी कहाँ है?"

"सो रही है। क्यों?"

"उसके कपड़े देख। अभी। उसकी फ्रॉक का किनारा।"

दूसरी तरफ़ ख़ामोशी रही। फिर कपड़ों की सरसराहट। फिर सूरज की साँस — एक झटके से अंदर खिंचती हुई।

"गीला है," उसने फुसफुसाया। "विक्की... अम्मा कह रही थीं, पिछले तीन दिन से रोज़ सुबह इसकी फ्रॉक गीली होती है। नीचे से। उन्होंने सोचा बिस्तर गीला करने लगी है, डर की वजह से। उन्होंने मुझे बताया भी नहीं, शर्म के मारे।"

"बिस्तर गीला है?"

लंबी चुप्पी।

"नहीं," सूरज ने कहा। "बिस्तर बिल्कुल सूखा है।"

मैं दौड़कर सूरज के घर पहुँचा।

गुड्डी आँगन में बैठी थी, अपनी दादी की गोद में, और एक पुरानी स्लेट पर कुछ लिख रही थी। चॉक से। सूरज उसके सामने बैठा था, और उसका चेहरा ऐसा था जैसे किसी ने उसे चाँटा मार दिया हो।

"देख," उसने बस इतना कहा।

मैंने स्लेट देखी।

उस पर अंक लिखे थे। टेढ़े-मेढ़े, बड़े-बड़े, बच्चों वाले।

१ २ ३ ४ ५ ६

"ये किसने सिखाया, गुड्डी?" मैंने नरमी से पूछा।

गुड्डी ने ऊपर देखा। उसकी आँखें बिल्कुल सामान्य थीं — काली, बड़ी, मासूम। पर उनके नीचे गहरे काले घेरे थे। पाँच साल की बच्ची की आँखों के नीचे। जैसे वो कई रातों से सोई न हो।

"छोटू भैया ने," उसने गर्व से कहा। "वो रोज़ रात को आते हैं खिड़की पर। और एक नया नंबर सिखाते हैं। दादी तो सिर्फ़ पाँच तक सिखाती थीं। छोटू भैया ने छह सिखाया कल।"

सूरज ने अपना चेहरा हाथों में छुपा लिया।

"और छोटू भैया ने ये भी कहा," गुड्डी ने ख़ुशी-ख़ुशी बताया, जैसे कोई बहुत अच्छा राज़ बता रही हो, "कि जब मैं सारे नंबर सीख जाऊँगी — पूरे चालीस — तब वो मुझे अपना सबसे अच्छा खेल सिखाएँगे। 'सीढ़ी-सीढ़ी'। और तब हम सब साथ खेलेंगे। पापा भी। विक्की चाचा भी।"

उसने अपनी चॉक उठाई और स्लेट पर, छह के बाद, एक और अंक लिखने लगी।

७

उसकी छोटी-सी भौंह सिकुड़ी हुई थी, ध्यान से। जीभ होंठों के कोने में दबी थी।

"ये अभी पूरा नहीं सीखा," उसने बताया। "आज रात सीखूँगी।"

"देवदत्त ऊपर आ गया है," रामप्यारी अम्मा ने कहा।

उन्होंने ये बात मेरे बताने से पहले ही कह दी। मैं और सूरज उनके आँगन में घुसे ही थे, और वो तुलसी के पास खड़ी थीं — और मैंने उन्हें पहचाना नहीं।

उन्होंने नहाया था। अपने सफ़ेद बालों में तेल लगाकर कंघी की थी और पीछे जूड़ा बाँधा था। और उन्होंने सफ़ेद धोती नहीं पहनी थी। उन्होंने एक पुरानी लाल चुनरी ओढ़ी थी, जिसका रंग इतने सालों में फीका होकर गुलाबी हो गया था, और जिसके किनारे पर सुनहरे धागे का गोटा अब भी हल्का-सा चमक रहा था।

और उनके बाएँ पैर में एक पायल थी। चाँदी की। काली पड़ चुकी। जिसमें एक ही घुँघरू बचा था।

"सगाई की पायल," उन्होंने बिना पूछे बताया। "उसकी माँ ने पहनाई थी। अट्ठावन में। दूसरी पायल उसके पास है।"

"अम्मा... आपको कैसे पता—"

"सुबह से मेरी इस आँख में धागा दिख रहा है।" उन्होंने अपनी सफ़ेद आँख छुई। "अड़सठ बरस से बावड़ी से निकलने वाले धागे पीपल से आगे नहीं जाते थे। आज एक धागा गाँव के अंदर तक आया है। तेरे घर तक, विक्की। रघु के पैर तक।" उन्होंने एक गहरी साँस ली। "और वो धागा धड़क रहा है। जैसे कोई नस।"

"वो आपके घर आएगा," मैंने कहा। "सुबह उसने चाची से पूछा, 'प्यारी का घर किधर है'।"

अम्मा के होंठ काँपे। एक पल के लिए। फिर स्थिर हो गए।

"मुझे पता है।"

"अम्मा, दरवाज़ा मत खोलना। प्लीज़। आपने अड़सठ साल नहीं खोला—"

"अड़सठ बरस जो खटखटाता था, वो वो नहीं था," अम्मा ने कहा। "तूने ख़ुद बताया। देवदत्त ने ख़ुद कहा — वो कभी मेरे दरवाज़े पर नहीं आया। वो आवाज़ चुराकर कोई और आती थी।" उनकी आवाज़ टूटी। "अड़सठ बरस मैंने सोचा कि मैं उसे ठंड में खड़ा छोड़ रही हूँ, विक्की। अड़सठ बरस। हर सत्रहवें बरस, हर रात। मैंने सोचा वो मुझे कोस रहा है।"

उन्होंने अपनी चुनरी का पल्लू ठीक किया।

"अगर इस बार सच में वो है... तो मैं उसे फिर से ठंड में खड़ा नहीं छोड़ूँगी।"

वो शाम को आया।

गोधूलि के वक़्त। जब दिन और रात एक-दूसरे को पहचानने की कोशिश करते हैं।

मैंने उसे आते देखा। मैं और सूरज अम्मा के घर के सामने, नीम के पेड़ के पीछे खड़े थे। अम्मा ने हमें अंदर रहने को कहा था, पर मैं नहीं रह सका।

गली के उस छोर से रघु चाचा चलकर आ रहे थे।

पर वो रघु चाचा की चाल नहीं थी। चाचा हमेशा थोड़ा झुककर चलते थे, जल्दी-जल्दी, जैसे किसी काम के लिए देर हो रही हो। ये आदमी सीधा चल रहा था। बहुत सीधा। कंधे पीछे, सिर ऊँचा। धीरे-धीरे। हर क़दम सोच-समझकर। जैसे कोई ऐसा आदमी जो बहुत समय बाद चलना सीख रहा हो और हर क़दम का स्वाद ले रहा हो।

और हर क़दम के साथ, धूल भरी गली में, एक गीला निशान छूट रहा था।

गाँव के लोग अपने दरवाज़ों पर खड़े थे। चुपचाप। किसी ने कुछ नहीं कहा। एक औरत ने अपने बच्चे की आँखों पर हाथ रख दिया। एक बूढ़ा आदमी अपने चबूतरे से उठकर अंदर चला गया और कुंडी लगा ली।

चाचा ने किसी की तरफ़ नहीं देखा। वो बस चलते रहे। हर घर के सामने से गुज़रते हुए, हर दरवाज़े को देखते हुए — जैसे पहचानने की कोशिश कर रहे हों। जैसे अड़सठ बरस पुराना एक नक़्शा उनके दिमाग़ में हो, और वो उसे इस नए गाँव पर बिठाने की कोशिश कर रहे हों।

फिर वो रामप्यारी अम्मा के दरवाज़े के सामने रुके।

उन्होंने दीवार पर बने सैकड़ों हाथ के छापों को देखा। चौखट पर ठुकी कीलों को देखा। और उनके चेहरे पर — चाचा के चेहरे पर — कुछ ऐसा आया जो मैंने पहले कभी नहीं देखा था। एक कोमलता। एक दर्द।

उन्होंने हाथ नहीं उठाया। दस्तक नहीं दी।

"प्यारी," उन्होंने कहा। चाचा के गले से। पर वो आवाज़ चौदह बरस के लड़के की थी — टूटती हुई, बड़े होने के बीच में अटकी हुई। "इस बार मैं दस्तक नहीं दूँगा। अड़सठ बरस जो दस्तक तूने सुनी, वो मेरी नहीं थी। इसलिए इस बार... इस बार दरवाज़ा तुझे ख़ुद खोलना होगा। अगर तू चाहे।"

अंदर से कोई आवाज़ नहीं आई।

चाचा वहीं खड़े रहे। गोधूलि गहराती गई। नीम के पत्ते काले पड़ने लगे। एक कौवा कहीं दूर से बोला, फिर चुप हो गया।

"अगर तू नहीं खोलेगी," उन्होंने कहा, "तो मैं समझ जाऊँगा। मैं नाराज़ नहीं होऊँगा। मैं वापस चला जाऊँगा।"

और फिर — बहुत धीरे — कुंडी खिसकने की आवाज़ आई।

दरवाज़ा खुला।

अम्मा चौखट पर खड़ी थीं। लाल चुनरी में। एक घुँघरू वाली पायल में। उनकी काली आँख चमक रही थी। उनकी सफ़ेद आँख से आँसू बह रहा था।

वो दोनों एक-दूसरे को देखते रहे।

एक अस्सी बरस की औरत। और एक पचपन बरस के आदमी का शरीर, जिसके अंदर चौदह बरस का एक लड़का था।

"बूढ़ी हो गई तू, प्यारी," चाचा ने कहा। और मुस्कुराए। वो मुस्कान चाचा की नहीं थी। वो किसी ऐसे लड़के की थी जो किसी लड़की की चोटी खींचने वाला हो।

अम्मा के होंठ काँपे। "और तू... तू किसी और का चेहरा पहनकर आया है।"

"क्या करता? मेरा अपना चेहरा पत्थर का है। तुझे डर लगता।" उन्होंने अपना हाथ आगे बढ़ाया। धीरे से। हथेली ऊपर। उस पर दरारें थीं — भूरी-हरी, पत्थर जैसी। "छुएगी? डर मत। बस ठंडा है।"

अम्मा ने बहुत देर तक उस हाथ को देखा।

फिर उन्होंने उसे छुआ।

मैंने उनके चेहरे पर ठंड की लहर दौड़ते देखी। पर उन्होंने हाथ नहीं हटाया। उन्होंने उसे पकड़ लिया। दोनों हाथों से। जैसे कोई बहुत पुरानी, बहुत क़ीमती चीज़ पकड़ता है जो टूट सकती हो।

"अड़सठ बरस," अम्मा ने फुसफुसाया।

"अड़सठ बरस," उसने दोहराया। "हर रात मैंने ऊपर देखा, प्यारी। हर रात। उस छोटे-से आसमान के टुकड़े को। और सोचा कि कहीं तू उसके नीचे है। बूढ़ी हो रही है। जी रही है। मेरे बिना।"

उसने अपना दूसरा हाथ खोला। उसमें एक चीज़ चमकी।

एक पायल। चाँदी की। काली पड़ चुकी। अम्मा की पायल जैसी — पर इसमें सारे घुँघरू थे।

"तेरी दूसरी पायल। मैंने सँभालकर रखी। अड़सठ बरस।"

अम्मा ने पायल को देखा। और मैंने देखा कि वो टूट रही थीं। अंदर से। वो अस्सी बरस की औरत, जिसने अड़सठ बरस एक दरवाज़े के पीछे अकेले काटे थे, अब एक बारह बरस की लड़की बन रही थी।

"चल, प्यारी," उसने कहा। उसकी आवाज़ बहुत नरम थी। "इस बार साथ चलते हैं। तू ऊपर रहकर सूख गई। मैं नीचे रहकर पत्थर हो गया। दोनों ने बहुत सहा। अब साथ चलते हैं। नीचे बहुत शांति है। वहाँ कोई प्यासा नहीं है। वहाँ कोई बूढ़ा नहीं होता।"

अम्मा ने एक क़दम आगे बढ़ाया। चौखट के बाहर।

"अम्मा!" मैं नीम के पीछे से निकला।

"रुक जा, विक्की," सूरज ने मेरी बाँह पकड़ी।

उसकी आवाज़ में कुछ ऐसा था कि मैं रुक गया। मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसने अपनी आँख से काला कपड़ा हटा दिया था, और वो अपनी सफ़ेद आँख से चाचा को देख रहा था।

और उसका चेहरा पीला पड़ गया था।

"क्या दिख रहा है?"

"बाल," उसने फुसफुसाया। "विक्की, उसके अंदर बाल हैं। चाचा के शरीर में... लड़का है, हाँ। एक लड़का। पत्थर का। मुझे दिख रहा है। पर उस लड़के के अंदर... उसके मुँह से, उसकी आँखों से, उसके कानों से... बाल निकल रहे हैं। काले। गीले। सैकड़ों। और वो सब पीछे जा रहे हैं। गली में। पीपल की तरफ़। बावड़ी की तरफ़।"

उसने निगला।

"वो कठपुतली है, विक्की। लड़का ख़ुद एक कठपुतली है। और डोरियाँ पानी में जाती हैं।"

मैंने अम्मा की तरफ़ देखा।

वो रुक गई थीं। चौखट से एक क़दम बाहर। चाचा का हाथ पकड़े हुए। पर उनका चेहरा — उनका चेहरा बदल रहा था।

उनकी सफ़ेद आँख खुली थी। पूरी खुली। वो चाचा को देख रही थी।

और अम्मा वही देख रही थीं जो सूरज देख रहा था।

"देवदत्त," उन्होंने धीरे से कहा। "तुझे याद है, तू मेरी चोटी कैसे खींचता था?"

"हाँ," उसने मुस्कुराकर कहा। "बहुत बार।"

"किस हाथ से?"

मुस्कान एक पल के लिए अटकी। बहुत छोटा पल। किसी और को शायद पता भी न चलता।

"दाएँ से," उसने कहा।

अम्मा ने अपना हाथ छुड़ा लिया।

"देवदत्त उल्टे हाथ का था," उन्होंने कहा। उनकी आवाज़ अब काँप नहीं रही थी। उसमें लोहा था। "पूरे गाँव में इकलौता। उसके बापू उसे मारते थे इसके लिए। वो हमेशा बाएँ हाथ से मेरी चोटी खींचता था, और मैं हमेशा दाईं तरफ़ मुड़कर उसे मारती थी।"

उन्होंने एक क़दम पीछे लिया। चौखट के अंदर।

"अड़सठ बरस तूने उसकी आवाज़ चुराई। अब तू उसका चेहरा भी चुराकर आई है। पर तू उसका हाथ नहीं चुरा पाई।"

उन्होंने सीधे चाचा की आँखों में देखा। अपनी दोनों आँखों से। सफ़ेद और काली।

"तू देवदत्त नहीं है," उन्होंने कहा। "मैं तुझे पहचानती हूँ।"

चाचा का चेहरा ऐंठा।

धीरे-धीरे। जैसे कोई मोम का मुखौटा गर्मी में पिघलता है। मुस्कान फैली। और फैली। होंठों के कोने कानों की तरफ़ खिंचे। दाँत दिखे — और दाँतों के बीच से, मसूड़ों से, कुछ काला निकलने लगा।

बाल।

गीले। चमकते हुए। चाचा के मुँह से बाहर आते हुए। पहले एक लट। फिर कई। फिर एक गुच्छा। उनकी ठोड़ी पर, उनकी छाती पर, ज़मीन पर गिरते हुए। उनकी नाक से। उनके कानों से। उनकी आँखों के कोनों से — आँसुओं की तरह — पतले, काले धागे।

और एक आवाज़ आई।

वो आवाज़ देवदत्त की नहीं थी। न चाचा की। वो वही थी जो मैंने चाची के मुँह से सुनी थी। एक औरत की। बहुत पुरानी। बहुत गहरी। जैसे बावड़ी की तलहटी से आ रही हो।

"पहचान लिया?"

हँसी। पानी में बुलबुलों जैसी।

"अड़सठ बरस में पहली बार तूने ठीक से देखा, प्यारी। अट्ठावन में तूने आधा देखा था। आधा पहचाना था। इसलिए आधी आँख दी थी।"

अम्मा चौखट पर खड़ी रहीं। हिलीं नहीं।

"अब तूने पूरा देखा। पूरा पहचाना।" बालों से भरा मुँह मुस्कुराया। "जानती है न, पूरा पहचानने की क्या दक्षिणा है?"

अम्मा ने कुछ नहीं कहा।

और मैंने देखा — उसी पल, उसी गोधूलि में — अम्मा की काली आँख, उनकी इकलौती अच्छी आँख, धीरे-धीरे धुँधली होने लगी। जैसे किसी शीशे पर भाप जम रही हो। पहले किनारों से। फिर बीच में। एक सफ़ेद, दूधिया परत, फैलती हुई।

"अम्मा!" मैं दौड़ा।

"कोई बात नहीं," उस आवाज़ ने कहा। "अब वो सिर्फ़ मेरी दुनिया देखेगी। पूरी तरह। तुम्हारी दुनिया अब उसके लिए अँधेरी है। जैसे मेरे लिए।"

और फिर — एक झटके से — बाल वापस अंदर खिंचे। चाचा के मुँह में, नाक में, कानों में। एक पल में। जैसे किसी ने धागे का गोला लपेट लिया हो।

चाचा का शरीर ज़मीन पर गिरा। बेजान। धूल में।

और अम्मा चौखट पर खड़ी रहीं। दोनों आँखें सफ़ेद। उनका चेहरा आसमान की तरफ़ उठा हुआ, जहाँ अब आख़िरी रोशनी भी ख़त्म हो रही थी।

"विक्की?" उन्होंने धीरे से कहा। उनका हाथ हवा में टटोल रहा था। "तू कहाँ है, बच्चा? मुझे... मुझे सिर्फ़ बावड़ी दिख रही है। हर तरफ़। हर जगह। सिर्फ़ पानी। और सीढ़ियाँ।"

मैंने उनका हाथ पकड़ा।

"मैं यहाँ हूँ, अम्मा।"

उन्होंने मेरे हाथ को महसूस किया। फिर मेरी तरफ़ मुँह किया — पर उनकी आँखें मेरे चेहरे से थोड़ी ऊपर थीं। थोड़ा बाएँ।

"हाँ," उन्होंने कहा। "अब दिख रहा है। तू तीन सीढ़ियों जितना दूर खड़ा है मुझसे। और तेरे कंधे पर उसका हाथ है।"

चाचा को होश आया तो वो रघु चाचा थे।

बस रघु चाचा। डरे हुए, उलझे हुए, कमज़ोर। उन्हें कुछ याद नहीं था — न सुबह, न दोपहर, न गली, न दरवाज़ा। वो बस अपने हाथों को देखते रहे। उन दरारों को। और रोते रहे।

"ये क्या हो गया है मुझे, विक्की? ये क्या हो गया है?"

मैंने उन्हें घर पहुँचाया। चाची ने उन्हें देखकर चीख़ मारी। मैंने उन्हें कुछ नहीं बताया। मैं कुछ बता भी नहीं सकता था — चाची के पास बोली गई हर बात उस तक पहुँचती थी। मैंने बस इतना कहा कि चाचा को चक्कर आ गया था।

पर एक सवाल मेरे अंदर घूम रहा था, बार-बार, एक गिनती की तरह:

अगर जो ऊपर आया वो देवदत्त नहीं था — अगर वो वो थी, देवदत्त का चेहरा पहनकर — तो कल रात, पाँचवीं सीढ़ी पर, मेरे कंधे से छूता हुआ जो पत्थर ऊपर चढ़ा था...

वो कौन था?

और देवदत्त — असली देवदत्त, बाएँ हाथ वाला, जो चौथी सीढ़ी पर मुझसे माफ़ी माँग रहा था — वो अब कहाँ था?

रात होने से पहले मैं अम्मा के पास लौटा। सूरज गुड्डी के पास था। मैं अम्मा को अकेला नहीं छोड़ सकता था।

वो अपने आँगन में बैठी थीं। अब भी लाल चुनरी में। चेहरा ऊपर। उनके हाथ गोद में थे, और एक घुँघरू वाली पायल उनकी उँगलियों के बीच घूम रही थी। बार-बार। जैसे माला।

"आ गया, बच्चा?" उन्होंने मेरे बोलने से पहले कहा।

"आपको कैसे पता?"

"तेरे पैरों का धागा मेरे आँगन में घुसा है। उसी से पहचाना।" उन्होंने हल्का-सा मुस्कुराने की कोशिश की। "अब मैं लोगों को उनके चेहरों से नहीं, उनके धागों से पहचानूँगी।"

मैं उनके पास बैठ गया। बहुत देर तक हम दोनों चुप रहे।

"अम्मा," मैंने आख़िर में पूछा, "अब आपको क्या दिखता है?"

उन्होंने बहुत देर तक जवाब नहीं दिया। उनकी सफ़ेद आँखें आँगन में घूमती रहीं — जैसे किसी ऐसी चीज़ को देख रही हों जो बहुत बड़ी हो और जिसका कोई किनारा न हो।

"पानी," उन्होंने कहा। "पूरा गाँव पानी में डूबा हुआ है, विक्की। ऊपर तक। घर, पेड़, मंदिर — सब पानी के नीचे। और हर चीज़ से, नीचे की तरफ़, सीढ़ियाँ उतर रही हैं। मेरे आँगन से। तेरे घर से। मंदिर के चबूतरे से। हर जगह से सीढ़ियाँ। सब नीचे एक ही जगह जा रही हैं।"

"और लोग?"

"लोग तैर रहे हैं। धीरे-धीरे। सोते हुए। उनके पैरों से धागे बँधे हैं, और धागे उन्हें हल्के-हल्के नीचे खींच रहे हैं। उन्हें पता भी नहीं।" उनकी आवाज़ काँपी। "अड़सठ बरस मैंने आधी आँख से ये देखा। आधा पानी। आधा गाँव। आज पूरा पानी है।"

उन्होंने अपना चेहरा मेरी तरफ़ घुमाया। फिर थोड़ा बाएँ।

"और वो यहाँ है। अभी। तेरे पीछे।"

मेरी रीढ़ में ठंड दौड़ गई। "छोटू?"

"वो तेरे पीछे बैठा है। पालथी मारकर। तेरी पीठ से पीठ टिकाए। जैसे बचपन में तुम दोनों बैठते थे।" अम्मा ने एक गहरी साँस ली। "वो रो रहा है, विक्की।"

"रो रहा है?"

"चुपचाप। उसके आँसू पानी में घुल जाते हैं, इसलिए कोई देख नहीं पाता। पर मुझे दिखते हैं। वो बार-बार तेरे कंधे की तरफ़ हाथ बढ़ाता है, और फिर रुक जाता है।" अम्मा ने सिर हिलाया। "मैंने सोचा था वो सिर्फ़ उसकी कठपुतली है। पर कठपुतलियाँ नहीं रोतीं, बच्चा।"

मैंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। पर मैंने अपनी पीठ को थोड़ा पीछे टिकाया। बहुत हल्के से।

और मुझे वहाँ एक ठंडक महसूस हुई। एक छोटी-सी पीठ के आकार की।

जो एक पल के लिए — सिर्फ़ एक पल के लिए — मुझसे टिक गई। और फिर गायब हो गई।

दो बजकर सैंतालीस।

छठी सीढ़ी।

पानी छाती तक।

इस बार मैं गिरा नहीं। मैं बस वहाँ था। जैसे कोई आँख झपकाकर दूसरे कमरे में पहुँच जाए। मेरा शरीर अब आदी हो गया था। ये सबसे डरावनी बात थी।

पानी का खिंचाव अब बहुत तेज़ था। वो मेरी छाती को दबा रहा था। हर साँस के लिए मुझे ज़ोर लगाना पड़ रहा था। और वो ठंड... वो ठंड अब मेरी हड्डियों में नहीं, मेरे दिमाग़ में थी। मेरे विचार धीमे हो रहे थे। जैसे वो भी जम रहे हों।

मैंने आँखें ऊपर कीं। नियम। आसमान।

आसमान का टुकड़ा अब एक हथेली जितना था।

और उस टुकड़े में — मुंडेर के किनारे पर — कुछ था।

एक सिर।

किसी ने ऊपर से झाँका। बावड़ी में। नीचे। मेरी तरफ़।

मेरा दिल रुक गया।

नियम कहता था नीचे मत देखो। नियम ये नहीं कहता था कि ऊपर से कोई तुम्हें देखे तो क्या करो। मैं नज़र नहीं हटा सकता था। ऊपर के अलावा देखने की और कोई जगह नहीं थी। दाएँ-बाएँ पत्थर की दीवारें थीं। और नीचे...

वो सिर मुंडेर पर झुका। धुँधली रोशनी उसके पीछे थी, इसलिए चेहरा अँधेरे में था। पर मैंने आकार पहचाना। कंधे। गर्दन। सिर का वो ख़ास झुकाव।

रघु चाचा।

पर चाचा घर पर थे। मैंने ख़ुद उन्हें पलंग पर लिटाया था।

वो सिर और झुका। और उसके चेहरे से, उसके मुँह से, कुछ नीचे लटकने लगा। पतले, काले धागे। बाल। लंबे। और लंबे। मुंडेर से नीचे, बावड़ी में, सीढ़ियों के साथ-साथ, मेरी तरफ़ उतरते हुए।

"अब ऊपर देखना भी मना है, विक्की," उसने कहा। उस औरत की आवाज़ में। "नियम बदल गए हैं। तूने एक पत्थर को ऊपर आने दिया। अब ऊपर भी मैं हूँ। नीचे भी मैं हूँ। तू कहाँ देखेगा?"

बाल मेरे चेहरे तक पहुँच गए। मेरे गालों को छुआ। ठंडे। गीले। मेरी गर्दन के चारों ओर लिपटने लगे। धीरे-धीरे। बहुत प्यार से।

मैंने आँखें बंद कर लीं।

यही एक रास्ता था। न ऊपर, न नीचे। अँधेरा।

और अँधेरे में, बंद आँखों के पीछे, मैंने आवाज़ सुनी।

नीचे से। बहुत नीचे से। पानी के अंदर से। एक लड़के की आवाज़। थकी हुई। पर सच्ची।

"आँखें बंद रख, विक्रम। और बाएँ हाथ से दीवार पकड़। बाएँ। वो बाएँ हाथ को नहीं पहचानती। कभी नहीं पहचान पाई।"

देवदत्त।

मैंने बाएँ हाथ से दीवार टटोली। पत्थर। खुरदुरा। मैंने उसे पकड़ा।

और मेरी गर्दन के चारों ओर लिपटे बाल ढीले पड़ गए। जैसे उन्हें अचानक पता ही न चल रहा हो कि मैं कहाँ हूँ। वो मेरे चेहरे पर टटोलते रहे। अंधों की तरह। फिर धीरे-धीरे पीछे हटने लगे।

ऊपर से एक गुर्राहट आई। निराशा की।

"...तू भी..." उस औरत ने फुसफुसाया। पर मुझसे नहीं। नीचे। देवदत्त से। "...अड़सठ बरस बाद भी तू..."

और फिर मुंडेर से एक आवाज़ आई — किसी चीज़ के पानी में गिरने की। छोटी। धातु की।

छप।

वो मेरे बगल से गिरा। मैंने आँखें बंद रखीं। पर मैंने उसे डूबते हुए सुना — हल्की-सी घंटी की आवाज़। घुँघरू की।

पायल। देवदत्त वाली। जो उसने अम्मा को दिखाई थी।

उसने उसे वापस नीचे फेंक दिया था।

और नीचे, बहुत नीचे, किसी ने उसे पकड़ लिया। मैंने सुना — एक छोटी-सी खनक, जैसे किसी ने उसे अपनी मुट्ठी में बंद कर लिया हो। और एक सिसकी।

मैं बाएँ हाथ से दीवार पकड़े, आँखें बंद किए, ऊपर चढ़ा। छह सीढ़ियाँ। उल्टी। बिना गिने। बस पत्थर को महसूस करते हुए।

मुंडेर पर कोई नहीं था।

पर धूल में, मुंडेर के किनारे, दो घुटनों के निशान थे। जैसे कोई वहाँ बहुत देर तक झुककर बैठा रहा हो। और उनके बीच, ज़मीन पर, बालों का एक गीला गुच्छा पड़ा था। मैंने उसे छुआ नहीं।

घर पहुँचा तो सुबह हो चुकी थी।

और सूरज मेरे दरवाज़े पर बैठा था। घुटनों में सिर दिए। हाथ में गुड्डी की स्लेट।

उसने ऊपर देखा। उसकी आँखें लाल थीं। उसने बिना कुछ कहे स्लेट मेरी तरफ़ बढ़ा दी।

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सात पूरा हो गया था। साफ़। सधा हुआ। किसी बड़े के हाथ जैसा।

और उसके नीचे, छोटे-छोटे अक्षरों में, एक पंक्ति लिखी थी। टेढ़ी-मेढ़ी। बच्चे की लिखावट में। पर गुड्डी को अभी अक्षर लिखना नहीं आता था। सिर्फ़ अंक।

"आज छोटू भैया ने बताया — खेल में जो सबसे नीचे होता है, वो सीढ़ी बन जाता है। और बाक़ी सब उसके ऊपर से कूदकर जाते हैं। विक्की चाचा हमारी सीढ़ी बनेंगे। मैं सबसे पहले कूदूँगी।"

मैंने दादाजी के कमरे की तरफ़ देखा। ऊपर। खिड़की की तरफ़।

मुझे पता था कि अंदर, दीवार पर, फ़र्श से डेढ़ फ़ुट ऊपर, अब सात हरी लकीरें होंगी।

और मुझे ये भी पता था — अब, पहली बार, बिना किसी शक के — कि वो लकीरें दादाजी की दीवार पर क्यों बन रही थीं। मेरे कमरे में। मेरी खिड़की के पास।

क्योंकि छोटू मुझे दिखाना चाहता था।

वो चाहता था कि मैं हर सुबह जागूँ, और देखूँ, और जानूँ कि गुड्डी कितना सीख गई है।

और हर सुबह, एक और लकीर गिनूँ।

भाग 6 समाप्त।

अगले भाग में — "सातवीं सीढ़ी": विक्रम तय करता है कि गुड्डी को बचाने का एक ही तरीक़ा है — भानपुरा से भाग जाना। दिल्ली। पर पानी हर जगह पहुँचता है। और दिल्ली के फ़्लैट में, पहली ही रात, बाथरूम का नल अपने आप खुलता है... और उससे हरा पानी गिरता है...

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