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भाग 7 — सातवीं सीढ़ी

Piyashi Atma · Real Experiences · 20 मिनट

Writer
Piyashi Atma
Story
भानपुरा की बावड़ी - चालीस सीढ़ियाँ
Chapter
7 of 31
Category
Real Experiences
Reading time
20 min
Words
3977
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

हम सब मानते हैं कि दूरी हमें बचाती है।

कि अगर आप किसी चीज़ से काफ़ी दूर भाग जाएँ — सैकड़ों किलोमीटर, किसी बड़े शहर में, जहाँ लाखों लोग हों और रात भर रोशनी जलती हो — तो वो चीज़ आपको ढूँढ नहीं पाएगी। कि भूत गाँवों के होते हैं, हवेलियों के, पुराने कुओं के। कि वो अपनी जगह से बँधे होते हैं।

मैं भी यही मानता था।

उस सातवीं रात, दिल्ली के एक फ़्लैट में, पाँचवीं मंज़िल पर, जहाँ खिड़की से मेट्रो की पटरी दिखती थी और नीचे सड़क पर रात के ढाई बजे भी ट्रक गुज़रते थे — मुझे पता चला कि पानी को दूरी से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता।

पानी हर जगह एक है।

और सारे पाइप, आख़िर में, कहीं न कहीं जुड़ते हैं।

"हम जा रहे हैं," मैंने सूरज से कहा।

सुबह के सात बजे थे। हम उसके घर की छत पर थे, जहाँ से पीपल का पेड़ दिखता था — दूर, सूखे खेतों के पार, अपनी लाल धागों वाली डालियों के साथ, सुबह की धुँध में किसी विशाल जीव की तरह खड़ा।

सूरज के हाथ में अब भी गुड्डी की स्लेट थी। वो उसे छोड़ ही नहीं पा रहा था।

"कहाँ?"

"दिल्ली। मेरे फ़्लैट पर। तू, मैं, गुड्डी। आज ही। अभी।"

"और अम्मा? मेरी माँ?"

"वो यहाँ सुरक्षित हैं। उनके धागे नहीं हैं। गुड्डी के हैं। तेरे हैं। मेरे हैं।" मैंने उसके कंधे पकड़े। "सूरज, आज रात वो उसे आठ सिखाएगा। फिर नौ। फिर दस। और जिस दिन वो चालीस सीख जाएगी—"

"मुझे पता है!" सूरज की आवाज़ टूट गई। उसने स्लेट अपने सीने से लगा ली। "मुझे पता है, विक्की।"

"तो चल।"

उसने पीपल की तरफ़ देखा। बहुत देर तक।

"अगर वो पीछे आई तो?"

"तो कम से कम हमने कोशिश की होगी।"

रामप्यारी अम्मा ने हमें रोका नहीं।

मैं उन्हें बताने गया था। वो अपने आँगन में वैसे ही बैठी थीं जैसे कल रात छोड़ा था — लाल चुनरी में, सफ़ेद आँखें आसमान की तरफ़, पायल उँगलियों में घूमती हुई। मुझे नहीं पता वो सोई थीं या नहीं।

"जाओ," उन्होंने कहा। "शायद वो पीछे न आए। कभी-कभी वो अपनी जगह से बहुत दूर नहीं जाती।"

"कभी-कभी?"

उन्होंने अपना चेहरा मेरी तरफ़ घुमाया। थोड़ा बाएँ।

"बयासी में एक लड़का बंबई भाग गया था," उन्होंने कहा। "गिनती के बीच में। उसके बापू ने ज़मीन बेचकर उसे भेजा था।"

"फिर?"

"फिर तीन महीने बाद उसकी चिट्ठी आई। बंबई से। उसने लिखा था कि वो ठीक है। कि उसे अब कोई सीढ़ी नहीं दिखती। कि वो समंदर के किनारे रहता है और रोज़ सुबह समंदर देखता है।" अम्मा ने एक गहरी साँस ली। "और चिट्ठी के आख़िर में, उसके हाथ से नहीं, किसी और के हाथ से, हरी स्याही में, एक लाइन थी।"

"क्या?"

"'समंदर भी एक बावड़ी है, बेटा। बस उसकी सीढ़ियाँ ज़्यादा गहरी हैं।'"

मैं चुप रहा।

"जाओ, विक्की," अम्मा ने फिर कहा। उनकी आवाज़ नरम थी। "तुझे जाना चाहिए। तुझे ख़ुद देखना चाहिए। वरना तू कभी नहीं मानेगा कि कोई और रास्ता नहीं है।" उन्होंने अपनी चुनरी के कोने से एक छोटी-सी पोटली निकाली और मेरे हाथ में रख दी। "ये रख। गाँव की मिट्टी है। मेरे आँगन की। अगर वहाँ कुछ हो, तो इसे अपने पैरों पर मल लेना। शायद वो तुझे पहचान न पाए।"

"शायद?"

उन्होंने मुस्कुराने की कोशिश की।

"अब मेरे पास सिर्फ़ 'शायद' बचे हैं, बच्चा।"

हमने किसी को नहीं बताया।

चाची को नहीं — उनके पास बोली गई हर बात उस तक पहुँचती थी। चाचा को भी नहीं — वो कल की घटना के बाद से बिस्तर पर पड़े थे, बार-बार पानी माँगते, और अपनी दरारों वाली हथेलियों को घूरते रहते।

मैंने बस एक चिट्ठी छोड़ी: "दिल्ली में ज़रूरी काम आ गया है। दो-तीन दिन में लौटूँगा।"

सूरज ने अपनी माँ से कहा कि वो गुड्डी को झाँसी के डॉक्टर को दिखाने ले जा रहा है। उसकी माँ ने कुछ नहीं कहा। बस गुड्डी के माथे पर काला टीका लगाया, उसकी कलाई पर एक काला धागा बाँधा, और दरवाज़े पर खड़ी होकर हमें तब तक देखती रहीं जब तक हम गली के मोड़ से ग़ायब नहीं हो गए।

टेम्पो वाला नहीं मिला। हम पैदल पीपल तक गए। दोपहर बारह बजे। धूप सबसे तेज़।

बावड़ी के पास से गुज़रते हुए मैंने उसकी तरफ़ नहीं देखा। सूरज ने अपनी सफ़ेद आँख पर कपड़ा कसकर बाँध लिया था और गुड्डी को गोद में उठा रखा था, उसका चेहरा अपने कंधे में छुपाकर।

हम बावड़ी से बीस क़दम आगे निकले।

फिर गुड्डी ने अपना सिर उठाया। सूरज के कंधे के ऊपर से पीछे देखा। और हाथ हिलाया।

"बाय, छोटू भैया!"

सूरज के क़दम लड़खड़ाए। पर वो रुका नहीं। मैं भी नहीं रुका।

पीछे से, टीन के नीचे से, एक आवाज़ आई।

टप।

झाँसी से मैंने एक टैक्सी की। ट्रेन में मुझे भरोसा नहीं था — रात को ट्रेन में, अगर दो बजकर सैंतालीस पर कुछ हुआ, तो कहाँ भागेंगे?

टैक्सी वाला एक सरदार जी थे। पचास-पचपन के। लंबी सफ़ेद दाढ़ी, नीली पगड़ी, डैशबोर्ड पर गुरु नानक की तस्वीर। उन्होंने हमें देखा — हमारे थके चेहरे, सूरज की बँधी हुई आँख, गुड्डी के माथे का काला टीका — और कुछ नहीं पूछा।

"दिल्ली? आठ-नौ घंटे लगेंगे, पुत्तर। रात हो जाएगी।"

"कोई बात नहीं। बस रुकना मत।"

टैक्सी चली। झाँसी पीछे छूटा। फिर ग्वालियर। फिर आगरा की तरफ़ हाईवे। सूखे खेत धीरे-धीरे हरे होने लगे। बबूल की जगह शीशम और नीम आने लगे। गाँवों की जगह पेट्रोल पंप, ढाबे, होर्डिंग्स।

और हर किलोमीटर के साथ मेरे अंदर कुछ हल्का होता गया।

मैंने अपने टख़ने को छुआ। निशान अब भी थे। पर क्या वो कम ठंडे थे? या ये सिर्फ़ मेरी उम्मीद थी?

गुड्डी सूरज की गोद में सो गई थी। सूरज खिड़की से बाहर देख रहा था। एक बार उसने अपनी आँख का कपड़ा थोड़ा हटाया — बस एक पल के लिए — और फिर तुरंत वापस बाँध दिया।

"क्या दिखा?"

"धागे," उसने धीरे से कहा। "हमारे पैरों से। खिड़की से बाहर, पीछे की तरफ़। सड़क पर। बहुत लंबे। पतले होते जा रहे हैं, पर टूटे नहीं।"

आगरा के बाद एक ढाबे पर हम रुके। शाम के सात बजे थे। सरदार जी ने चाय पी, हमने कुछ खाया — या खाने की कोशिश की। गुड्डी ने आलू का पराठा पूरा खाया और फिर एक गिलास पानी माँगा।

ढाबे वाले लड़के ने स्टील का गिलास भरकर रखा।

गुड्डी ने गिलास उठाया। होंठों तक ले गई। और रुक गई।

वो गिलास में देख रही थी।

"पापा," उसने कहा, "इसमें छोटू भैया हैं।"

सूरज ने झपटकर गिलास उसके हाथ से छीना। पानी ज़मीन पर गिरा। मिट्टी पर फैला।

मैंने नीचे देखा। बस पानी था। मिट्टी में सोखता हुआ। एक गीला धब्बा।

पर वो धब्बा फैला नहीं। वो सिकुड़ा। अपने आप। एक आकार में। पाँच छोटी उँगलियों वाला एक हाथ।

और फिर सूख गया।

ढाबे वाले लड़के ने हमें अजीब नज़रों से देखा। सरदार जी ने अपनी चाय आधी छोड़ दी और गाड़ी की चाबी उठा ली।

"चलें, पुत्तर?"

हम रात साढ़े ग्यारह बजे यमुना पर पहुँचे।

दिल्ली में घुसने से पहले वो पुल आता है — लंबा, ऊँचा, नीचे काली नदी, और सामने दूर तक शहर की रोशनियाँ। पीली, सफ़ेद, नारंगी। करोड़ों। मैं हज़ार बार उस पुल से गुज़रा हूँ। पर उस रात, उन रोशनियों को देखकर, मेरी आँखों में आँसू आ गए।

घर। शहर। जहाँ कोई पीपल नहीं। कोई बावड़ी नहीं। जहाँ रात को भी गाड़ियों के हॉर्न बजते हैं और कोई ख़ामोशी नहीं होती।

गुड्डी जागी। अपनी आँखें मलीं। खिड़की से बाहर देखा। नीचे। नदी की तरफ़।

"पापा," उसने कहा, "नदी में कोई तैर रहा है। हमारे साथ-साथ।"

सरदार जी ने शीशे में पीछे देखा। "कहाँ, बेटा?"

"वहाँ।" गुड्डी ने नीचे इशारा किया। "पुल के नीचे। पानी में। उतनी ही तेज़ जितनी हमारी गाड़ी। नीली कमीज़ वाला।"

सरदार जी ने गाड़ी की रफ़्तार बढ़ा दी। उनके होंठ चल रहे थे — "वाहेगुरु, वाहेगुरु।"

मैंने नीचे नहीं देखा। सूरज ने भी नहीं।

पर गुड्डी देखती रही। और हाथ हिलाती रही।

मेरा फ़्लैट पूर्वी दिल्ली में है। एक पुरानी सोसाइटी, छह मंज़िल की इमारत, पाँचवीं मंज़िल पर। दो कमरे। एक बालकनी जहाँ से मेट्रो की ऊपर वाली पटरी दिखती है।

हम साढ़े बारह बजे पहुँचे। सरदार जी ने पैसे लिए, फिर कुछ सोचकर आधे वापस कर दिए। "बच्ची के लिए कुछ ले लेना।" और फिर, जाने से पहले, उन्होंने गुड्डी के सिर पर हाथ रखा और कुछ पढ़ा — गुरबानी का कोई शब्द — और बिना पीछे देखे चले गए।

लिफ़्ट ख़राब थी। वो हमेशा ख़राब रहती है। हम सीढ़ियों से ऊपर गए।

पाँच मंज़िल। हर मंज़िल पर बारह सीढ़ियाँ, दो बार मुड़कर।

मैंने उन्हें नहीं गिना। मैंने जान-बूझकर नहीं गिना। मैं ज़ोर-ज़ोर से गुड्डी से बात करता रहा, सूरज से, ख़ुद से — कुछ भी, ताकि दिमाग़ गिनने न लगे।

फ़्लैट का दरवाज़ा खोला। बत्ती जलाई। वही सोफ़ा, वही बिखरे हुए कैमरा बैग, वही दीवार पर मेरी खींची हुई तस्वीरें — लद्दाख की झील, राजस्थान का किला, बनारस के घाट।

सब कुछ सामान्य।

सूरज सोफ़े पर गिर पड़ा। गुड्डी मेरे बेडरूम में जाकर बिस्तर पर कूदने लगी। "चाचा, आपका बिस्तर कितना नरम है!"

मैंने सारी खिड़कियाँ बंद कीं। सारे पर्दे खींचे। फिर रसोई में गया और मुख्य पानी का वाल्व बंद कर दिया। फिर बाथरूम में — गीज़र, नल, शावर, सब। फिर फ़्लश की टंकी का वाल्व।

पूरे फ़्लैट में एक बूँद पानी नहीं आ सकता था।

फिर मैंने अम्मा की पोटली खोली और उसकी मिट्टी तीन हिस्सों में बाँटी। हम तीनों के पैरों पर मली। गुड्डी हँसी — "गुदगुदी होती है!"

फिर हम इंतज़ार करने लगे।

दिल्ली की रात भानपुरा की रात जैसी नहीं होती।

यहाँ ख़ामोशी नहीं होती। नीचे सड़क पर ट्रक गुज़रते हैं। कहीं कोई कुत्ता भौंकता है। पड़ोस के फ़्लैट में किसी का टीवी चलता रहता है। एक बजे आख़िरी मेट्रो गुज़रती है — उसकी गड़गड़ाहट से खिड़की के शीशे हल्के-हल्के काँपते हैं। और ऊपर, हर दस-पंद्रह मिनट में, कोई हवाई जहाज़ एयरपोर्ट की तरफ़ उतरता है।

मैं उन आवाज़ों को सुनता रहा और हर आवाज़ के साथ मेरे अंदर उम्मीद बढ़ती गई।

ये शहर बहुत बड़ा है। बहुत शोर वाला। बहुत ज़िंदा। यहाँ वक़्त नहीं रुक सकता। यहाँ करोड़ों लोग हैं — कोई न कोई हमेशा जागता है।

एक बजे के आसपास, जागते रहने के लिए, मैं अपनी दीवार पर टँगी तस्वीरें देखने लगा। बारह साल का काम। मेरी सबसे अच्छी तस्वीरें, जिन्हें मैंने ख़ुद फ़्रेम करवाया था।

लद्दाख की झील। पानी इतना साफ़ कि उसमें पहाड़ उल्टे दिखते थे।

राजस्थान का किला। पत्थर की चौड़ी सीढ़ियाँ, ऊपर दरबार की तरफ़ जाती हुईं।

बनारस के घाट। सुबह की धुँध। पत्थर की सीढ़ियाँ, नीचे गंगा में उतरती हुईं।

मैं रुक गया।

मैंने अगली तस्वीर देखी। मुंबई का एक पुराना कुआँ, जो मैंने किसी मैगज़ीन के लिए खींचा था। उसके बाद ऋषिकेश का एक घाट। उसके बाद दिल्ली की अग्रसेन की बावली — जिसे मैंने तीन अलग-अलग मौसमों में खींचा था, क्योंकि मुझे वो जगह बार-बार अपनी ओर खींचती थी।

सीढ़ियाँ। हर तस्वीर में सीढ़ियाँ। पानी की तरफ़ उतरती हुई।

बारह साल। मैंने कभी ध्यान नहीं दिया था। मुझे लगता था मुझे बस पुरानी इमारतें पसंद हैं।

मैं बनारस वाली तस्वीर के पास गया। ये मेरी सबसे मशहूर तस्वीर थी। एक अवॉर्ड भी मिला था इसे। धुँध में डूबा घाट, और पानी के किनारे, सबसे निचली सीढ़ी पर, एक छोटी-सी आकृति — एक बच्चा, पीठ कैमरे की तरफ़, नदी में देखता हुआ। जूरी ने लिखा था, "अकेलेपन का एक अद्भुत बिंब।"

मुझे याद था कि मैंने ये तस्वीर सुबह पाँच बजे खींची थी। घाट पर कोई नहीं था। कोई भी नहीं। मुझे वो बच्चा बाद में, कंप्यूटर पर, दिखा था। मैंने सोचा था कोई लोकल लड़का होगा जिसे मैंने ध्यान नहीं दिया।

उस बच्चे ने हाफ़ पैंट पहनी थी।

और नीली कमीज़।

मैंने वो फ़्रेम दीवार से उतारा और उसे उल्टा करके सोफ़े के पीछे रख दिया। सूरज ने देखा, पर कुछ नहीं पूछा।

बारह साल से वो मेरे साथ था। हर घाट पर। हर बावली में। हर कुएँ के किनारे। मैं सोचता था कि मैं भाग गया था।

मैं कभी भागा ही नहीं था।

गुड्डी दो बजे तक सो गई। मेरे बिस्तर पर। सूरज उसके बगल में बैठा था, उसके बालों में हाथ फेरता हुआ।

"आज सातवीं रात है तेरी," उसने धीरे से कहा।

"हाँ।"

"और मेरी बाईसवीं।"

मैं चुप रहा। मैंने कभी हिसाब नहीं लगाया था। सत्रह से शुरू होकर — अठारह, उन्नीस, बीस, इक्कीस...

"अठारह बची हैं," सूरज ने कहा। "मेरी। अगर ये काम नहीं आया।"

"आएगा।"

उसने मुझे देखा। उसकी दाईं आँख में — अच्छी वाली आँख में — एक थकी हुई दया थी। जैसे वो मुझसे ज़्यादा जानता हो।

दो बजकर चालीस।

नीचे एक ट्रक गुज़रा।

दो बजकर पैंतालीस।

ऊपर एक हवाई जहाज़। उसकी लाल-हरी बत्तियाँ पर्दे की दरार से दिख रही थीं। टिमटिमाती हुई। नीचे उतरती हुई।

दो बजकर सैंतालीस।

सब कुछ एक साथ रुका।

नीचे सड़क की गड़गड़ाहट — बीच में कट गई। पड़ोस का टीवी — एक शब्द के बीच में, एक एंकर की आवाज़ आधी हवा में अटकी। कुत्ता — भौंकते-भौंकते चुप।

पंखा।

छत का पंखा बीच में रुक गया। उसकी तीन पंखुड़ियाँ हवा में जमी हुईं, एक तिरछे कोण पर। और उसकी हवा — जो अभी मेरे चेहरे पर लग रही थी — अचानक ग़ायब।

मैं उठकर खिड़की के पास गया। पर्दा हटाया।

दिल्ली जमी हुई थी।

सड़क पर एक ट्रक खड़ा था, उसकी हेडलाइट की रोशनी हवा में धूल के कणों को पकड़े हुए — हर कण बिल्कुल स्थिर। एक आदमी सड़क पार कर रहा था — एक पैर हवा में। मेट्रो की पटरी पर कोई नहीं था।

और आसमान में वो हवाई जहाज़।

जमा हुआ। हवा में टँगा हुआ। उसकी बत्तियाँ जल रही थीं — पर टिमटिमा नहीं रही थीं। बस जल रही थीं। स्थिर। जैसे किसी ने आसमान की एक तस्वीर में उसे चिपका दिया हो।

करोड़ों लोगों का शहर। और हर एक इंसान, इसी पल, जमा हुआ।

मैं इस पूरे शहर में अकेला जागा था।

और फिर मैंने सुना।

टप।

बाथरूम से।

मैं जम गया।

टप। टप।

मैंने सारे वाल्व बंद किए थे। मैंने ख़ुद। अपने हाथों से। हर एक।

टप टप टप टप—

और फिर एक तेज़ आवाज़। पानी की धार। पूरे ज़ोर से। नल पूरा खुला हुआ।

मैं बाथरूम की तरफ़ गया। मेरे पैर मेरी मर्ज़ी से नहीं चल रहे थे — या शायद चल रहे थे, मुझे अब फ़र्क़ नहीं पता चलता था।

बाथरूम का दरवाज़ा खुला था। अंदर अँधेरा। मैंने बत्ती का बटन दबाया। बत्ती नहीं जली। पर अंदर रोशनी थी — एक हल्की, हरी-सी रोशनी, जो कहीं से नहीं आ रही थी और हर जगह से आ रही थी।

वॉशबेसिन का नल पूरा खुला था।

और उससे पानी गिर रहा था। हरा। गाढ़ा। बदबूदार। वही बावड़ी का पानी। बेसिन भर चुका था और किनारों से बह रहा था। फ़र्श पर फैल रहा था।

शावर भी खुला था। उससे भी वही हरा पानी बरस रहा था।

और टॉयलेट में — मैंने देखा, और मुझे उल्टी आने को हुई — टॉयलेट में से पानी ऊपर उठ रहा था। बहकर बाहर आ रहा था। और उसके साथ काले, गीले बाल। बहुत सारे। बाहर निकलते हुए। फ़र्श पर फैलते हुए।

मैं पीछे हटा।

रसोई से आवाज़ आई। वहाँ का नल भी खुल गया था।

और फिर — ऊपर से। छत से। एक गड़गड़ाहट। इमारत की छत पर पानी की बड़ी टंकी। मुझे सुनाई दिया कि वो भर रही थी। और भर रही थी। और उफन रही थी।

और फिर पूरी इमारत से आवाज़ आने लगी।

हर फ़्लैट से। हर मंज़िल से। ऊपर, नीचे, दाएँ, बाएँ। हर नल। हर पाइप। हर टंकी। एक साथ। एक ऐसी आवाज़, जैसे पूरी इमारत की नसें फट गई हों और उनमें से ख़ून की जगह पानी बह रहा हो।

मैंने मुख्य दरवाज़े के नीचे देखा।

पानी अंदर आ रहा था। बाहर से। सीढ़ियों की तरफ़ से।

"सूरज!"

मैं बेडरूम की तरफ़ दौड़ा।

सूरज जमा हुआ था। बिस्तर के किनारे बैठा। उसका हाथ गुड्डी के बालों में। उसकी आँख खुली, पलक नहीं झपकती हुई।

पर गुड्डी जाग रही थी।

वो बिस्तर पर बैठी थी। आँखें खुली। और वो खिड़की की तरफ़ देख रही थी — बेडरूम की खिड़की, जिसका पर्दा मैंने खींचा था।

पर्दा अब हटा हुआ था।

और खिड़की के बाहर — पाँचवीं मंज़िल पर, पचास-साठ फ़ुट हवा में, जमी हुई दिल्ली के ऊपर — छोटू खड़ा था।

खड़ा नहीं। तैर रहा था। जैसे वो हवा में नहीं, पानी में हो। उसके बाल ऊपर की तरफ़ लहरा रहे थे, धीरे-धीरे। उसकी नीली कमीज़ उसके शरीर के चारों ओर फूली हुई थी। उसके पैर नीचे लटक रहे थे, और उनके नीचे — पचास फ़ुट नीचे — जमी हुई सड़क।

उसने खिड़की के शीशे पर अपना हाथ रखा। पाँच छोटी उँगलियाँ। शीशे पर भाप का एक निशान बना।

और मुस्कुराया।

"हैलो, गुड्डी।"

"छोटू भैया!" गुड्डी ख़ुशी से उछली। "आप यहाँ भी आ गए!"

"मैं हर जगह आ सकता हूँ, गुड्डी। जहाँ पानी है, वहाँ मैं हूँ।" उसने शीशे पर उँगली से कुछ बनाना शुरू किया। भाप में। एक आकृति। एक अंक। "देखो। आज का नंबर।"

८

"आठ!" गुड्डी ने ताली बजाई।

मैं उसकी तरफ़ झपटा। मैंने उसकी आँखों पर हाथ रख दिए। "गुड्डी, मत देखो। मत देखो, बेटा।"

"पर चाचा, वो मुझे आठ सिखा रहे हैं—"

"मुझे पता है।" मैंने उसे अपनी गोद में खींचा। उसका चेहरा अपनी छाती में छुपाया। उसके कानों पर अपनी हथेलियाँ रखीं। "पर आज नहीं। आज नहीं सीखना।"

खिड़की के बाहर, छोटू की मुस्कान थोड़ी फीकी पड़ी।

उसने मुझे देखा। सीधे। और एक पल के लिए — सिर्फ़ एक पल के लिए — उसकी आँखों में वो पुरानी, भूखी चमक नहीं थी। उसकी आँखों में कुछ और था। कुछ ऐसा जो मैंने अम्मा के आँगन में महसूस किया था, अपनी पीठ पर।

दुख।

"भैया," उसने कहा। उसकी आवाज़ बहुत धीमी थी। "तुम्हें भागना नहीं चाहिए था।"

"क्यों?"

"क्योंकि अब वो नाराज़ है। और जब वो नाराज़ होती है..." उसने नीचे देखा। अपने पैरों के नीचे। जमी हुई सड़क की तरफ़। "...तो वो खेल के नियम बदल देती है।"

और फिर मैंने अपने टख़ने में खिंचाव महसूस किया।

पहले से कहीं ज़्यादा तेज़। कहीं ज़्यादा ग़ुस्से से भरा। अम्मा की मिट्टी मेरे पैरों पर थी — मैंने नीचे देखा — और वो मिट्टी पिघल रही थी। कीचड़ बनकर बह रही थी। जैसे वो गाँव की मिट्टी यहाँ, इस शहर में, टिक ही नहीं पा रही हो।

"गुड्डी को मत ले जाना," मैंने छोटू से कहा। "प्लीज़। मुझे ले जाओ। आज रात दस सीढ़ियाँ। बीस। जितनी चाहो। पर इसे मत ले जाना।"

छोटू ने मुझे देखा। बहुत देर तक।

"मैं उसे नहीं ले जाऊँगा, भैया," उसने कहा। "आज रात नहीं। आज रात तो तुम्हें और सूरज भैया को जाना है।"

"और गुड्डी?"

उसने कुछ नहीं कहा।

खिड़की के शीशे पर बना आठ का अंक धीरे-धीरे नीचे बहने लगा। भाप पानी बनकर। टपकता हुआ।

और मेरी बाँहों से गुड्डी ग़ायब हो गई।

नहीं — गुड्डी वहीं थी। मैं ग़ायब हो गया था।

सातवीं सीढ़ी।

पानी ठोड़ी तक।

मैंने पहली साँस ली और मुँह में पानी भर गया। मैं खाँसा। थूका। अपना सिर पीछे झुकाया, जितना झुका सकता था, ताकि मेरी नाक पानी से ऊपर रहे।

पत्थर की दीवारें। काई। ऊपर वो आसमान का टुकड़ा — अब सिर्फ़ एक सिक्के जितना। धूसर।

भानपुरा।

मैं भानपुरा में था। बावड़ी में। दिल्ली से छह सौ किलोमीटर दूर। आठ घंटे की उस यात्रा का कोई मतलब नहीं था। उस टैक्सी का, उस पुल का, उस फ़्लैट का, उन बंद वाल्वों का।

पानी को दूरी से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता।

मेरे बगल में — छठी सीढ़ी पर? आठवीं पर? मैं नहीं जानता था — किसी की खाँसी की आवाज़ आई। हाँफती हुई।

"विक्की..."

"सूरज?"

"मैं... बहुत नीचे हूँ, विक्की... बाईसवीं..." उसकी आवाज़ पानी से घुली हुई थी। बुलबुलों से भरी। "यहाँ... यहाँ पानी सिर के ऊपर है... मैं... साँस नहीं..."

"ऊपर आ! उल्टा गिन, सूरज! ऊपर आ!"

"...गुड्डी... विक्की, गुड्डी वहाँ अकेली है..."

मैं कुछ नहीं बोल पाया। मैंने दीवार पकड़ी — बाएँ हाथ से, जैसा देवदत्त ने सिखाया था — और ऊपर चढ़ने लगा। छठी। पाँचवीं। पानी मेरी छाती से नीचे उतरा। कमर। घुटने। चौथी। तीसरी।

नीचे से सूरज की आवाज़ आती रही। उल्टी गिनती करती हुई। रोती हुई। "इक्कीस... बीस... उन्नीस..."

मैं मुंडेर पर पहुँचा।

और वहाँ कोई बैठा था।

रामप्यारी अम्मा। मुंडेर के किनारे। लाल चुनरी में। उनकी सफ़ेद आँखें सीधे मेरी तरफ़ थीं — इस बार बिल्कुल सही जगह पर। जैसे वो मुझे सचमुच देख पा रही हों।

"आ गया, बच्चा?" उन्होंने धीरे से कहा। "मैंने कहा था न। पानी हर जगह एक है।"

"अम्मा... गुड्डी..."

"मुझे पता है।" उन्होंने अपना हाथ बढ़ाया। मैंने उसे पकड़ा। उनकी उँगलियाँ ठंडी थीं, पर मज़बूत। "मैं रात भर यहाँ बैठी थी। तुम दोनों का इंतज़ार करती। मुझे पता था तुम लौटोगे। छोटू ने बताया था।"

"छोटू?"

"वो आया था। आधी रात को। मेरे पास बैठा। बहुत देर तक।" अम्मा ने बावड़ी की तरफ़ चेहरा घुमाया। "बोला — 'अम्मा, भैया को बता देना, मैंने गुड्डी को छुआ नहीं। मैंने वादा निभाया।'"

और फिर, बहुत धीमी आवाज़ में:

"पर उसने ये नहीं बताया कि वो कौन है, जो गुड्डी के पास अभी भी बैठा है।"

सूरज आधे घंटे बाद निकला।

मैंने और अम्मा ने मिलकर उसे मुंडेर पर खींचा। वो हाँफ रहा था, खाँस रहा था, उसके मुँह से हरा पानी निकल रहा था। उसकी दोनों आँखें अब लाल थीं — सफ़ेद वाली भी।

"गुड्डी," उसने सबसे पहले कहा। "विक्की, गुड्डी—"

"मुझे पता है।"

"वो दिल्ली में अकेली है! पाँचवीं मंज़िल पर! एक बंद फ़्लैट में! पानी से भरे फ़्लैट में! पाँच साल की बच्ची—"

"मुझे पता है, सूरज!"

मैंने अपनी जेब टटोली। फ़ोन। वो भीगा हुआ था। पूरी तरह। स्क्रीन पर पानी की बूँदें, अंदर तक। मैंने बटन दबाया। कुछ नहीं। फिर से दबाया।

कुछ नहीं।

मैंने उसे झटका, पोंछा, फिर से दबाया।

और तब वो बजा।

मेरे हाथ में। मरा हुआ, पानी से भरा फ़ोन। उसकी स्क्रीन जली — धुँधली, टूटी हुई रोशनी, पानी के पीछे से। और उस पर एक नाम था।

सूरज कॉलिंग।

मैंने सूरज की तरफ़ देखा। वो मेरे बगल में बैठा था। उसकी जेबें ख़ाली थीं। उसका फ़ोन — मुझे याद आया — दिल्ली के फ़्लैट में, बेडरूम में, बिस्तर पर पड़ा था। गुड्डी के पास।

मैंने फ़ोन उठाया। कान से लगाया।

दूसरी तरफ़ से पानी की आवाज़ आ रही थी। बहुत सारा पानी। जैसे कोई बाथरूम में खड़ा हो और सारे नल खुले हों।

और फिर एक छोटी-सी आवाज़। पतली। मीठी। नींद में डूबी हुई।

"हैलो? विक्की चाचा?"

"गुड्डी!" मेरा गला रुँध गया। "गुड्डी, बेटा, तू ठीक है?"

"हाँ चाचा। पापा कहाँ हैं? मैं उठी तो कोई नहीं था।"

सूरज ने मेरे हाथ से फ़ोन छीना। "गुड्डी! गुड्डी, पापा यहाँ है! तू ठीक है न बेटा? तू डरी तो नहीं?"

"नहीं पापा।" गुड्डी की आवाज़ में कोई डर नहीं था। बस एक बच्चे वाली ख़ुशी। "मैं अकेली नहीं हूँ। छोटू भैया के दोस्त आए हैं। एक दीदी। बहुत लंबे बालों वाली। वो मेरे पास बैठी हैं। वो मेरी चोटी बना रही हैं।"

सूरज के हाथ से फ़ोन लगभग छूट गया।

"और पापा," गुड्डी ने आगे कहा, "दीदी ने मुझे नौ भी सिखा दिया। और दस भी। छोटू भैया से ज़्यादा जल्दी सिखाती हैं। वो कहती हैं मैं बहुत होशियार हूँ।"

पीछे से पानी की आवाज़ तेज़ हुई।

"और पापा... दीदी कह रही हैं बाथरूम का टब भर गया है। बहुत अच्छा, ठंडा पानी है। वो कह रही हैं, चलो गुड्डी, नहाते हैं। पर पापा, मुझे तो तैरना नहीं आता..."

"गुड्डी, नहीं! गुड्डी, बाथरूम में मत जाना! सुन रही है? मत जाना!"

"...दीदी कहती हैं तैरना नहीं आता तो कोई बात नहीं... वो कहती हैं टब में भी सीढ़ियाँ होती हैं..."

फिर एक और आवाज़ आई। गुड्डी के ठीक पीछे से। फ़ोन के बहुत पास से।

एक औरत की आवाज़। बहुत पुरानी। बहुत गहरी। बहुत प्यार भरी।

"सूरज, बेटा... भागे क्यों थे? अब देखो, मुझे तुम्हारी बेटी को अकेले नहलाना पड़ रहा है।"

और फिर पानी में किसी के उतरने की आवाज़।

छप।

और फ़ोन कट गया।

भाग 7 समाप्त।

अगले भाग में — "आठवीं सीढ़ी": छह सौ किलोमीटर। आठ घंटे। और एक पाँच साल की बच्ची, पानी से भरे फ़्लैट में, उस "दीदी" के साथ। विक्रम और सूरज दिल्ली वापस भागते हैं — पर क्या वो वक़्त पर पहुँच पाएँगे? और फ़्लैट के बाथरूम के आईने में विक्रम को ख़ुद का एक ऐसा रूप दिखता है, जो सीढ़ियों पर खड़ा है... और ऊपर नहीं, सीधे उसकी तरफ़ देख रहा है...

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