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भाग 8 — आठवीं सीढ़ी

Piyashi Atma · Real Experiences · 20 मिनट

Writer
Piyashi Atma
Story
भानपुरा की बावड़ी - चालीस सीढ़ियाँ
Chapter
8 of 31
Category
Real Experiences
Reading time
20 min
Words
3997
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

आईने हमें वो दिखाते हैं जो हम हैं।

यही हम मानते हैं। हर सुबह हम उसके सामने खड़े होते हैं, बाल सँवारते हैं, दाँत साफ़ करते हैं, और वो हमें हमारा ही चेहरा लौटा देता है — उल्टा, पर पूरा। ईमानदार।

पर दादी कहती थीं कि आईना एक दरवाज़ा भी है। कि इसीलिए किसी के मरने पर घर के सारे आईने ढक दिए जाते हैं। ताकि जो जा रहा है, वो उसमें अटक न जाए। और ताकि जो उस पार है, वो इधर न झाँक सके।

उस आठवें दिन, दिल्ली के मेरे फ़्लैट में, मैंने बाथरूम के आईने में देखा।

और आईने ने मुझे वो नहीं दिखाया जो मैं था।

उसने मुझे वो दिखाया जो मैंने सत्रह साल पहले किया था।

फ़ोन कटने के बाद के वो पहले कुछ मिनट मुझे पूरी तरह याद नहीं।

मुझे याद है कि सूरज चीख़ रहा था। मुंडेर पर, धूल में, घुटनों के बल, मेरा मरा हुआ फ़ोन अपने कान से सटाए, और बार-बार अपनी बेटी का नाम ले रहा था। "गुड्डी! गुड्डी! गुड्डी!" जैसे अगर वो काफ़ी ज़ोर से पुकारे तो आवाज़ छह सौ किलोमीटर तक पहुँच जाएगी।

मुझे याद है कि रामप्यारी अम्मा ने उसके कंधे पर हाथ रखा था और कुछ नहीं कहा था।

और मुझे याद है कि मैं सोच रहा था — बहुत साफ़, बहुत ठंडे तरीक़े से, जैसे मेरा दिमाग़ मेरे डर से अलग हो गया हो — किसके पास फ़ोन है? गाँव में किसके पास फ़ोन है जो काम करता हो?

"सरपंच," मैंने कहा। "सरपंच के पास स्मार्टफ़ोन है। मैंने देखा था।"

हम भागे।

सरपंच रामकिशोर यादव सुबह साढ़े छह बजे अपने आँगन में दातुन कर रहे थे। उन्होंने हमें देखा — भीगे हुए, काई से सने, एक आदमी की एक आँख सफ़ेद — और उनके मुँह से दातुन गिर गई।

"फ़ोन," मैंने हाँफते हुए कहा। "प्लीज़। एक बच्ची की जान का सवाल है।"

उन्होंने बिना कुछ पूछे अपना फ़ोन दे दिया।

मेरी उँगलियाँ काँप रही थीं। मुझे अपनी सोसाइटी के गार्ड का नंबर याद नहीं था। किसी पड़ोसी का भी नहीं। सब कुछ मेरे फ़ोन में था — उस मरे हुए, पानी से भरे फ़ोन में।

फिर मुझे याद आया। सोसाइटी का ऑफ़िस नंबर। वो लिफ़्ट के पास एक बोर्ड पर लिखा था, और मैंने उसे इतनी बार देखा था — लिफ़्ट के इंतज़ार में, जो कभी नहीं आती थी — कि वो मेरे दिमाग़ में छप गया था।

घंटी बजी। बजती रही। फिर एक नींद भरी आवाज़।

"हैलो... शांतिकुंज सोसाइटी..."

"बहादुर? बहादुर, मैं विक्रम बोल रहा हूँ। पाँच सौ तीन वाला। फ़ोटोग्राफ़र।"

"हाँ साहब... इतनी सुबह..."

"बहादुर, मेरे फ़्लैट में एक बच्ची है। पाँच साल की। अकेली। कुछ हो गया है। प्लीज़, मास्टर चाबी लेकर जाओ और देखो। अभी। मैं फ़ोन पर हूँ।"

बहादुर एक पल चुप रहा। फिर उसकी आवाज़ बदली — नींद उसमें से ग़ायब हो गई। "जाता हूँ साहब।"

मैंने फ़ोन स्पीकर पर रखा। हम तीनों — मैं, सूरज, सरपंच — उसके चारों ओर झुके रहे। रामप्यारी अम्मा आँगन के कोने में बैठी थीं, उनकी सफ़ेद आँखें फ़ोन की तरफ़।

फ़ोन से सीढ़ियाँ चढ़ने की आवाज़ आई। बहादुर की भारी साँसें। लिफ़्ट हमेशा की तरह ख़राब।

पहली मंज़िल। दूसरी। तीसरी।

"साहब," बहादुर ने हाँफते हुए कहा, "सीढ़ियाँ गीली हैं। किसी ने पानी गिराया है।"

सूरज ने अपनी मुट्ठी मुँह में दबा ली।

चौथी मंज़िल।

"साहब... पानी ऊपर से आ रहा है। बहुत पानी। सीढ़ियों पर बह रहा है। हरा-हरा... और बदबू... अरे बाप रे, क्या बदबू है..."

पाँचवीं मंज़िल।

"आपके दरवाज़े के नीचे से आ रहा है, साहब। पूरा पानी आपके फ़्लैट से ही निकल रहा है।"

"खोलो, बहादुर। जल्दी।"

चाबियों की खनखनाहट। ताले में चाबी घूमने की आवाज़। दरवाज़ा खुलने की चरमराहट।

और फिर ख़ामोशी। लंबी। बहुत लंबी।

"बहादुर?"

"साहब..." उसकी आवाज़ में उलझन थी। "साहब, यहाँ तो... कुछ नहीं है। पानी नहीं है। फ़्लैट बिल्कुल सूखा है। बाहर सीढ़ियों पर पानी, अंदर सूखा... ऐसा कैसे..."

"बच्ची, बहादुर! बच्ची कहाँ है?"

पैरों की आवाज़। "बेबी? बेबी?" बहादुर की आवाज़ दूर होती गई, फिर पास आई। बेडरूम। बाथरूम। रसोई। बालकनी।

"साहब," उसने आख़िर में कहा। उसकी आवाज़ अब काँप रही थी। "यहाँ कोई बच्ची नहीं है।"

सूरज की चीख़ पूरे आँगन में गूँजी।

"बिस्तर पर एक गीला निशान है, साहब। एक बच्चे जितना। जैसे कोई भीगा हुआ बच्चा वहाँ लेटा हो। और बाथरूम का टब... ख़ाली है। पर उसके किनारों पर बहुत लंबे काले बाल चिपके हैं। और टब की तली में, नाली के पास, किसी ने उँगली से, काई से, कुछ लिखा है।"

"क्या?"

"नंबर हैं, साहब। एक से दस तक। और दस के बाद एक तीर। नाली की तरफ़।"

"तेरी बेटी ज़िंदा है," रामप्यारी अम्मा ने कहा।

हम सरपंच के आँगन से निकलकर पीपल की तरफ़ भाग रहे थे, जब अम्मा ने सूरज की बाँह पकड़ी। उनकी पकड़ इतनी मज़बूत थी कि सूरज रुक गया।

"आपको कैसे पता?"

अम्मा ने अपनी सफ़ेद आँखें उत्तर की तरफ़ उठाईं। दिल्ली की तरफ़।

"मुझे उसका धागा दिख रहा है। पतला। बहुत दूर। पर धड़क रहा है। वो ज़िंदा है। पर वो..." उनकी भौंहें सिकुड़ीं, "...वो किसी और बावड़ी में है। वो उसे पानी के रास्ते ले गई है। सारी बावड़ियाँ नीचे से जुड़ी हैं, बच्चा। हर कुआँ, हर तालाब, हर घाट। ऊपर से अलग दिखती हैं। नीचे से सब एक हैं। एक ही पानी। एक ही अँधेरा। एक ही वो।"

मुझे अपनी दीवार की तस्वीरें याद आईं। बनारस के घाट। मुंबई का कुआँ।

और अग्रसेन की बावली। दिल्ली के बीचों-बीच। एक सौ तीन सीढ़ियाँ, ऊँची पत्थर की दीवारों के बीच नीचे उतरती हुईं। जिसे मैंने तीन मौसमों में खींचा था, क्योंकि वो जगह मुझे बार-बार अपनी तरफ़ खींचती थी।

झाँसी में वही टैक्सी खड़ी थी।

वही सफ़ेद गाड़ी। वही नीली पगड़ी। वही सरदार जी। ठीक उस जगह जहाँ बस हमें उतारती थी।

"मुझे पता था तुम लोग आओगे," उन्होंने कहा। उनकी आँखें लाल थीं। "रात को सपने में एक बच्ची आई थी। दो चोटियों वाली। गीली। उसने कहा — 'अंकल, मेरे पापा को वापस ले आना।'" उन्होंने अपनी पगड़ी ठीक की। "मैं सुबह चार बजे दिल्ली से निकला। बैठो।"

उस यात्रा के बारे में मुझे बहुत कम याद है। सूरज पीछे की सीट पर बैठा था, हाथ में गुड्डी की स्लेट। वो उन अंकों को बार-बार देखता था। उसने एक बार भी रोया नहीं। शायद उसके आँसू ख़त्म हो गए थे।

शिवपुरी के पास, जब गाड़ी एक लंबे सुनसान हिस्से से गुज़र रही थी, सूरज ने अचानक बोलना शुरू किया। खिड़की से बाहर देखते हुए। जैसे ख़ुद से बात कर रहा हो।

"जब गुड्डी पैदा हुई थी," उसने कहा, "तो मैंने सबसे पहले उसकी उँगलियाँ गिनी थीं। दस। पूरी दस। मैं इतना ख़ुश था, विक्की। मैंने सोचा — सब ठीक है। भगवान ने सब ठीक दिया है।"

मैं चुप रहा।

"अब सोचता हूँ, मैंने गिना ही क्यों? पहला काम जो मैंने अपनी बेटी के साथ किया — गिनती।" उसने अपनी सफ़ेद आँख पर बँधा कपड़ा छुआ। "शायद वो उसी दिन से जानती थी। शायद उसी दिन उसने उसका नाम लिख लिया था।"

"ऐसा नहीं है, सूरज।"

"तुझे कैसे पता?" उसने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आवाज़ में ग़ुस्सा नहीं था। बस एक थकान। "तुझे तो ये भी याद नहीं कि उस दिन बावड़ी पर क्या हुआ था।"

उसकी बात मुझे चाकू की तरह लगी। पर वो सच थी। सत्रह साल से मैं उस एक दिन के ऊपर एक बंद दरवाज़ा लेकर घूम रहा था, और मुझे उसकी चाबी तक नहीं पता थी।

सरदार जी ने शीशे में हमें देखा और रेडियो पर धीमी आवाज़ में गुरबानी लगा दी। बाक़ी रास्ता हम उसी आवाज़ में चुपचाप कटते रहे।

ग्वालियर के पास सरपंच का फ़ोन — जो उन्होंने ज़बरदस्ती हमें दे दिया था — बजा। दिल्ली पुलिस।

"मिस्टर सूरज? आपकी बेटी मिल गई है। वो ठीक है। थोड़ी सदमे में है। सरकारी अस्पताल में है।"

सूरज की साँस गले में अटकी। "कहाँ... कहाँ मिली?"

"अग्रसेन की बावली में, सर। सुबह सफ़ाई कर्मचारी ने देखा। वो सीढ़ियों पर बैठी थी। दसवीं सीढ़ी पर। पूरी भीगी हुई। और गिनती कर रही थी।" पुलिस वाला एक पल रुका। "अजीब बात ये है, सर, कि बावली में पानी है ही नहीं। सालों से सूखी पड़ी है। तो बच्ची भीगी कैसे... ख़ैर। आप आ जाइए।"

मैंने अपनी आँखें बंद कर लीं।

हम शाम छह बजे अस्पताल पहुँचे।

बच्चों का वार्ड। एक कतार में लोहे के बिस्तर, हरी चादरें, दीवारों पर उखड़ते रंगों वाले कार्टून। गुड्डी खिड़की के पास वाले बिस्तर पर बैठी थी, हाथ में ड्रिप लगी हुई।

"गुड्डी!"

"पापा!"

सूरज ने उसे अपनी बाँहों में भर लिया। उसके माथे को चूमता रहा। उसके गालों को। उसके बालों को।

और तब मैंने उसके बाल देखे।

गुड्डी की हमेशा दो चोटियाँ होती थीं। लाल रिबन वाली। सीधी-सादी।

अब उसकी एक चोटी थी। लंबी, मोटी, बहुत बारीकी से गुँथी हुई। किसी पुराने ज़माने के तरीक़े से — जैसी पुराने मंदिरों की मूर्तियों में दिखती है। सात लड़ों वाली। हर लड़ में एक पतला हरा धागा गुँथा हुआ।

मैंने ध्यान से देखा। वो धागे नहीं थे। वो काई थी।

और चोटी उसकी कमर तक थी। उसके बाल तो कंधों तक ही थे। तो बाक़ी बाल...

बाक़ी बाल उसके नहीं थे।

"दीदी ने बनाई," गुड्डी ने गर्व से कहा। "सुंदर है न, चाचा?"

डॉक्टर एक थकी हुई औरत थी, आँखों के नीचे काले घेरे।

"बच्ची ठीक है," उसने कहा। "कोई चोट नहीं। बुख़ार नहीं। बस एक अजीब बात है। जब इसे लाया गया था, इसके फेफड़ों में पानी था। काफ़ी पानी। जैसे डूबने के बाद होता है। पर इसकी साँस बिल्कुल सामान्य थी। ऑक्सीजन लेवल भी ठीक।" उसने भौंहें सिकोड़ीं। "जैसे ये उस पानी में साँस ले रही थी।"

उसने फ़ाइल बंद की।

"एक और बात," उसने आवाज़ धीमी करते हुए कहा। "रात की नर्स ने बताया कि बच्ची सोते हुए बात करती है। किसी से। बड़े प्यार से। और जब नर्स ने पूछा कि किससे बात कर रही हो, तो बच्ची ने सिंक की तरफ़ इशारा किया।" डॉक्टर ने हल्के से कंधे उचकाए, जैसे ख़ुद को यक़ीन दिला रही हो कि ये बच्चों की बातें हैं। "नर्स ने सिंक देखा। नाली से पानी ऊपर आ रहा था। बहुत धीरे। उसने प्लंबर बुलाया। प्लंबर ने कहा पाइप में कोई रुकावट नहीं है।"

"और उस पानी में लैब वालों को ऐसे शैवाल मिले जो सिर्फ़ बहुत पुराने, बंद कुओं में होते हैं। सौ-दो सौ साल पुराने। दिल्ली में ऐसा पानी कहाँ से..."

उसने बात अधूरी छोड़ दी।

"दीदी ने मुझे बहुत कुछ दिखाया," गुड्डी ने कहा।

अँधेरा हो चुका था। वार्ड की बत्तियाँ मद्धम थीं। बाक़ी बच्चे सो रहे थे।

"क्या दिखाया, बेटा?" सूरज ने धीरे से पूछा।

"पानी वाला रास्ता। टब की नाली में से। बहुत अँधेरा था, पर दीदी ने मेरा हाथ पकड़ रखा था, तो डर नहीं लगा। फिर एक और बावड़ी आई। बहुत बड़ी। दीदी ने कहा वो भी उसकी है। कि हर शहर में उसकी एक बावड़ी है। कहीं कुआँ, कहीं तालाब, कहीं नदी के घाट। और नीचे से सब एक हैं।"

उसने अपनी चोटी को प्यार से छुआ।

"दीदी ने कहा, जब मैं चालीस सीख जाऊँगी, तो वो मुझे सारी बावड़ियाँ दिखाएगी। बनारस वाली भी। वहाँ सबसे ज़्यादा सीढ़ियाँ हैं।"

सूरज का चेहरा पत्थर जैसा था।

"और चाचा," गुड्डी ने मेरी तरफ़ मुड़कर कहा, "दीदी ने आपके बारे में भी बताया। कहा कि आप बचपन में बहुत अच्छा गिनते थे। और..." उसकी आवाज़ धीमी हुई, "...और ये कि आपने छोटू भैया के साथ कुछ किया था। कुछ जो आपको याद नहीं। पर आईने को याद है।"

मुझे फ़्लैट जाना था। सूरज का फ़ोन, कपड़े, पैसे — सब वहीं था। और मैं... मैं देखना चाहता था।

गुड्डी सो गई तो मैंने धीरे से पूछा, "गुड्डी, वो दीदी... दिखती कैसी थी?"

वो नींद में मुस्कुराई। आधी जागी, आधी सोई। "बहुत सुंदर। बहुत लंबी। उसके बाल ज़मीन तक थे, चाचा। और आगे भी। जहाँ तक दिखता था, वहाँ तक। और उसने लाल साड़ी पहनी थी। पुरानी वाली। जैसी मंदिर में देवी जी की होती है।" उसने करवट ली। "बस उसका चेहरा मैंने नहीं देखा।"

"क्यों?"

"क्योंकि वो उल्टी चलती थी, चाचा। सिर नीचे, पैर ऊपर। पानी में। और जब भी मैं उसका चेहरा देखने के लिए झुकती, वो अपने बालों से ढक लेती। कहती थी — 'अभी नहीं, गुड्डी। जिस दिन तू मेरा चेहरा देखेगी, उस दिन तू मेरी हो जाएगी। जैसे प्यारी होते-होते रह गई।'"

उसकी साँसें धीमी हो गईं। वो सो गई।

सूरज और मैं एक-दूसरे को देखते रहे। किसी ने कुछ नहीं कहा।

"दो बजे से पहले आ जाना," सूरज ने कहा।

फ़्लैट जाने से पहले मैंने ऑटो वाले से कनॉट प्लेस की तरफ़ चलने को कहा।

मुझे नहीं पता क्यों। शायद वही खिंचाव, जो मुझे बारह साल से इस जगह की तरफ़ खींचता था।

अग्रसेन की बावली हेली रोड की एक तंग गली में है, ऊँची इमारतों के बीच छुपी हुई। दिन में वहाँ कॉलेज के बच्चे सेल्फ़ी लेते हैं। रात को उसका लोहे का गेट बंद रहता है, और ऊपर की मुंडेर पर सिर्फ़ चमगादड़ बैठते हैं।

उस रात गेट पर एक पुलिस वाला खड़ा था। और पीली टेप लगी थी।

"बंद है, भाई साहब," उसने कहा। "सुबह एक बच्ची मिली थी यहाँ।"

"मुझे पता है। मैं उसका चाचा हूँ।"

उसने मुझे ऊपर से नीचे देखा। फिर गेट की सलाखों की तरफ़ सिर हिलाया। "अंदर नहीं जा सकते। यहीं से देख लो।"

मैंने सलाखों के बीच से झाँका।

स्ट्रीट लाइट की पीली रोशनी ऊपर की सीढ़ियों पर पड़ रही थी। पत्थर की चौड़ी, लाल-भूरी सीढ़ियाँ, नीचे उतरती हुईं, दोनों तरफ़ मेहराबों वाली ऊँची दीवारें। और नीचे, बहुत नीचे, वो गोल कुआँ, जो सालों से सूखा पड़ा था।

मैंने सीढ़ियाँ नहीं गिनीं। पर मेरी आँखें अपने आप एक जगह रुक गईं।

ऊपर से कुछ नीचे। जहाँ गुड्डी मिली थी।

उस सीढ़ी पर पत्थर गहरा था। गीला। पूरी सीढ़ी पर एक गीला धब्बा फैला था — और उससे नीचे की तरफ़, हर सीढ़ी पर, एक पतली, काली, चमकती लकीर उतरती जा रही थी। जैसे किसी ने एक बहुत लंबी चोटी सीढ़ियों पर घसीटते हुए नीचे उतारी हो। कुएँ तक।

"सूखी पड़ी है सालों से," पुलिस वाले ने कहा, मेरी नज़र देखकर। "पर आज सुबह से वहाँ नीचे से पानी की आवाज़ आ रही है। टप-टप। मैंने अपने साहब को बताया, तो बोले वहम है।" उसने अपनी बेल्ट ठीक की। "आप सुन रहे हो?"

मैंने सुना।

टप।

टप।

भानपुरा से छह सौ किलोमीटर दूर। दिल्ली के बीचों-बीच। वही आवाज़।

मैंने अपनी बाईं कलाई देखी। उस पर रुद्राक्ष की माला थी — अम्मा वाली। उसका एक दाना चटक गया था। बीच से। एक बारीक दरार, जिसमें से पानी की एक बूँद बाहर आ रही थी।

मैं मुड़ा और चला गया।

फ़्लैट पहुँचा तो नौ बजे थे। बहादुर ने सीढ़ियाँ साफ़ करवा दी थीं, पर हरे पानी की धारियाँ अब भी दीवारों पर थीं। और गंध पूरी इमारत में बस गई थी। पड़ोसी अपने दरवाज़े बंद रखे हुए थे।

फ़्लैट सूखा था। बिस्तर पर वो निशान अब भी था — बच्चे के आकार का, हल्का हरा धब्बा। जैसे कोई वहाँ लेटकर पिघल गया हो।

मैंने सूरज का फ़ोन उठाया। कुछ कपड़े बैग में डाले। फिर बाथरूम में गया।

टब की तली में काई से लिखे अंक: १ से १०। और एक तीर। नाली की तरफ़।

मैं वॉशबेसिन के पास गया। नल से अब सामान्य, साफ़ पानी आ रहा था। मैंने चेहरे पर छींटे मारे। एक बार। दो बार।

फिर मैंने ऊपर देखा। आईने में।

पहले सब सामान्य था।

मेरा चेहरा। थका हुआ। दाढ़ी बढ़ी हुई। होंठ पर वो ज़ख़्म जो मैंने ख़ुद काटा था, पहली रात।

फिर मैंने आईने में अपने कंधे के पीछे देखा।

मेरे पीछे सफ़ेद टाइलें होनी चाहिए थीं। तौलिया टाँगने का स्टैंड।

आईने में मेरे पीछे पत्थर की दीवार थी। काई से ढकी। गीली। ऊपर उठती हुई।

मैं मुड़ा। सफ़ेद टाइलें। तौलिया। सब सामान्य।

फिर आईना। पत्थर की दीवार।

और आईने वाला मैं सीढ़ियों पर खड़ा था। बावड़ी में। पानी उसकी ठोड़ी को छूता हुआ।

पर वो ऊपर नहीं देख रहा था। वो सीधे मेरी तरफ़ देख रहा था। आईने के आर-पार।

मैंने अपना दायाँ हाथ उठाया। उसने बायाँ उठाया। सामान्य। जैसे आईना करता है। मैंने हाथ नीचे किया। उसने भी।

मैंने राहत की साँस ली।

आईने वाले मैं ने अपना हाथ फिर उठाया।

मैंने नहीं उठाया था।

उसने एक उँगली अपने होंठों पर रखी। श्श्श।

फिर उसने उस उँगली से वॉशबेसिन की नाली की तरफ़ इशारा किया। और उसके होंठ हिले। आईने के उस पार से कोई आवाज़ नहीं आई। पर मैंने सुना — मेरे सिर के अंदर, मेरी अपनी आवाज़ में, बहुत धीमी, जैसे पानी के नीचे से:

"तू सोचता है तूने उसका हाथ छोड़ा था। उन्नीसवीं सीढ़ी पर। जब वो नीचे खिंच रहा था। तू सोचता है तूने डर के मारे हाथ छोड़ दिया।"

आईने वाले मैं की आँखें भर आईं।

"नहीं, विक्की। तूने हाथ नहीं छोड़ा था।"

उसने अपने दोनों हाथ आगे बढ़ाए। आईने की सतह की तरफ़। हथेलियाँ बाहर की ओर। जैसे किसी को धकेल रहा हो।

"तूने उसे धक्का दिया था।"

मैं भागा। पाँच मंज़िल की सीढ़ियाँ — मैंने उन्हें नहीं गिना — और सड़क पर एक ऑटो रोका।

पूरे रास्ते वो शब्द मेरे अंदर गूँजते रहे। तूने उसे धक्का दिया था।

नहीं। ये उसका झूठ है। वो मुझे तोड़ना चाहती है। चाहती है कि मैं ख़ुद से नफ़रत करूँ। हार मान लूँ।

पर फिर छोटू की बात याद आई, दूसरी रात, दरवाज़े के बाहर से: तुमने मेरा हाथ छोड़ा था, भैया।

और सूरज की बात, धूप में: तू चीख़ रहा था — 'छोटू, मेरा हाथ पकड़!'

तीन कहानियाँ। तीन सच। और मुझे कुछ भी याद नहीं।

अस्पताल पहुँचकर मैंने सूरज को कुछ नहीं बताया। मैं उसके बगल में बैठ गया, गुड्डी के बिस्तर के पास, और खिड़की से बाहर देखता रहा। बाहर अस्पताल की पार्किंग थी, पीली बत्तियाँ, एक एम्बुलेंस, और उसके आगे एक पुराना कुआँ जिसे लोहे की जाली से ढका गया था। दिल्ली में हर पुरानी इमारत के पास एक कुआँ होता है, जिसके बारे में कोई नहीं सोचता।

"क्या हुआ?" सूरज ने पूछा। "तेरा चेहरा ऐसा क्यों है?"

"सूरज," मैंने धीरे से कहा, "उस दिन, जब तू भाग रहा था... तूने पीछे मुड़कर नहीं देखा था न? एक बार भी?"

"नहीं।"

"तो तुझे पक्का नहीं पता कि मैं चीख़ क्यों रहा था। 'हाथ पकड़' — मैं उससे कह रहा था, या..."

"या?"

"या उसे माफ़ी माँग रहा था।"

सूरज बहुत देर तक मुझे देखता रहा। फिर उसने अपनी अच्छी आँख बंद की और सिर्फ़ सफ़ेद आँख से मुझे देखा। बहुत देर तक।

"क्या दिख रहा है?" मैंने पूछा।

उसने आँख खोली। "तेरे अंदर एक बंद कमरा है, विक्की। उन्नीस सीढ़ियाँ नीचे। उसका दरवाज़ा पानी से फूल गया है। उसके अंदर कुछ है।" उसने नज़रें फेर लीं। "पर मुझे नहीं दिखता कि क्या।"

दो बजकर सैंतालीस। अस्पताल का वार्ड।

मैं इस बार तैयार था। मेरे बाएँ हाथ में एक सर्जिकल कैंची थी — नर्स की ट्रे से चुराई हुई।

वक़्त रुका।

नर्स अपनी मेज़ पर जम गई, उसका पेन एक अक्षर के बीच में। और ड्रिप —

हर बिस्तर की ड्रिप की बूँद हवा में जमी थी। नली और बोतल के बीच। पूरे वार्ड में दर्जनों छोटी-छोटी, चमकती, पारदर्शी बूँदें, हवा में टँगी हुईं। जैसे किसी ने समय को मोतियों में बदल दिया हो।

सूरज गुड्डी के बगल में जमा बैठा था।

पर गुड्डी जाग रही थी। बिस्तर पर बैठी। आँखें बंद। और धीरे-धीरे, एक गीत की तरह, गुनगुना रही थी:

"आठ... नौ... दस..."

फिर रुकी। इंतज़ार करती हुई।

वार्ड के कोने में हाथ धोने वाले सिंक की नाली से गुड़गुड़ाहट आई।

फिर बाल निकले। पहले एक लट। फिर कई। काले, गीले, चमकते हुए। सिंक से बाहर गिरते हुए, फ़र्श पर एक काली, सरसराती नदी की तरह बिस्तरों के बीच से गुड्डी की तरफ़ बढ़ते हुए। वो बिस्तर के पाये पर चढ़े। चादर पर। और गुड्डी की चोटी में गुँथने लगे। उसे और लंबा करते हुए। और उस चोटी के अंदर से, गुड्डी के सिर के पीछे से, एक आवाज़ उठने लगी:

"ग्या..."

मैं झपटा।

मैंने अपने बाएँ हाथ से उस काली नदी को पकड़ा और पूरी ताक़त से खींचा।

एक चीख़ आई। पूरे वार्ड से। हर दीवार से। हर नाली से। हर ड्रिप की बोतल से। एक औरत की चीख़, जैसे किसी ने उसकी चोटी पकड़कर ज़मीन पर घसीट दिया हो।

वो बाएँ हाथ को नहीं पहचानती।

बाल मेरे हाथ में छटपटा रहे थे। मेरी कलाई पर लिपटने की कोशिश कर रहे थे — पर जैसे अंधे हों, जैसे उन्हें पता ही न हो कि मेरा हाथ कहाँ है।

मैंने बाएँ हाथ से कैंची उठाई। और गुड्डी की चोटी के ठीक नीचे, जहाँ उसके असली बाल ख़त्म होते थे — मैंने काटा।

कच।

चोटी का लंबा, सात लड़ों वाला हिस्सा ज़मीन पर गिरा। और किसी कटी हुई छिपकली की पूँछ की तरह तड़पने लगा। फिर तेज़ी से सिंक की तरफ़ सरका और नाली में गायब हो गया।

गुड्डी की ड्रिप का पानी एक पल के लिए हरा हुआ। फिर धीरे-धीरे साफ़।

गुड्डी तकिये पर गिरी। उसकी साँसें धीमी, गहरी, शांत।

उसने ग्यारह नहीं सीखा।

और फिर मैं ग़ायब हो गया।

आठवीं सीढ़ी। पानी होंठों के ऊपर।

मैंने सिर पूरा पीछे झुकाया, इतना कि गर्दन की हड्डी चरमराई। बस मेरी नाक पानी से ऊपर थी।

मेरे कान पानी के नीचे थे। और पानी के नीचे बहुत आवाज़ें थीं।

गिनती की आवाज़ें। सैकड़ों। बूढ़े, जवान, बच्चे, औरतें। सब एक साथ, पर अलग-अलग संख्याओं पर। एक "सात", दूसरा "तेईस", तीसरा "चार"। जैसे दुनिया की सारी बावड़ियाँ एक साथ गिन रही हों।

और उन आवाज़ों में मैंने कुछ आवाज़ें पहचानीं।

एक बूढ़ी, काँपती आवाज़ — "अड़तीस... अड़तीस... अड़तीस..." — बार-बार, जैसे कोई रिकॉर्ड अटक गया हो। दादाजी।

एक भारी, डरी हुई आवाज़, बहुत नीचे से — "तेईस..." सूरज।

और एक बहुत पतली, बहुत छोटी आवाज़, जो कहीं बहुत दूर से आ रही थी, किसी और पानी से, किसी और शहर से — "दस... दस... दस..." — रुक-रुककर, जैसे कोई अगला अंक याद करने की कोशिश कर रहा हो और याद न आ रहा हो।

गुड्डी।

मैंने अपनी आँखें कसकर बंद कर लीं। उसे ग्यारह याद नहीं आ रहा था। मैंने कैंची से वो रास्ता काट दिया था। कम से कम आज रात के लिए।

पानी मेरी नाक के किनारे तक आया। मैंने साँस रोकी। फिर धीरे से छोड़ी।

और उन सबके बीच, एक आवाज़ मेरे बाएँ कान के बहुत पास थी।

"डर मत।"

देवदत्त।

पानी के नीचे, पत्थर की उँगलियों ने मेरी बाईं मुट्ठी खोली। और उसमें कुछ रखा। छोटा। धातु का। गोल।

"ये पायल का घुँघरू है। जो उसने नीचे फेंकी थी। इसे बाएँ हाथ में रखना। हमेशा। ये उसकी घंटी है। जब वो पास होगी, ये अपने आप बजेगी।"

उँगलियाँ पीछे हटीं। पर आवाज़ रुकी रही।

"और विक्रम... जो आईने ने कहा... उस पर मत भरोसा करना। और उस पर भरोसा किए बिना भी मत रहना।"

और वो चला गया।

मुंडेर पर अम्मा बैठी थीं। हर सुबह की तरह।

मैं ऊपर चढ़ा, बाएँ हाथ में घुँघरू कसकर पकड़े हुए, और उनके बगल में गिरकर हाँफता रहा।

सूरज आधे घंटे बाद निकला। तेईसवीं से। रेंगता हुआ, खाँसता हुआ, मुँह से हरा पानी बहाता हुआ।

और जब उसने मुंडेर पकड़ी, तो मैंने उसका बायाँ हाथ देखा।

उसकी उँगलियाँ भूरी-हरी थीं। खुरदुरी। कठोर। उनमें दरारें थीं।

पत्थर की। कलाई तक।

सूरज ने अपने हाथ को हिलाने की कोशिश की। उँगलियाँ नहीं मुड़ीं।

"विक्की," उसने धीरे से कहा। उसकी आवाज़ में अब डर भी नहीं था। बस एक थकी हुई स्वीकृति। "शुरू हो गया।"

अम्मा ने उसके पत्थर वाले हाथ को छुआ। और कुछ नहीं कहा।

फिर सरपंच का फ़ोन — जो इस बार भीगा नहीं था — बजा। अस्पताल।

"मिस्टर सूरज? बच्ची जाग गई है। वो ठीक है। पर..."

"पर क्या?"

नर्स की आवाज़ हिचकिचाई। "पर वो नींद में बार-बार एक ही बात बोल रही है। रात से। हमें समझ नहीं आ रहा।"

"क्या बोल रही है?"

"'विक्की चाचा ने धक्का दिया था। विक्की चाचा ने धक्का दिया था। छोटू भैया ने बताया। विक्की चाचा ने धक्का दिया था।'"

मैंने फ़ोन से नज़र हटाई।

सूरज मुझे देख रहा था। अपनी एक अच्छी आँख से। और एक सफ़ेद आँख से।

और मेरे बाएँ हाथ में, बंद मुट्ठी के अंदर, बिना हिलाए, बहुत धीरे से —

घुँघरू बजा।

भाग 8 समाप्त।

अगले भाग में — "नौवीं सीढ़ी": गुड्डी को वापस भानपुरा लाना होगा — क्योंकि दूरी बचाती नहीं, बस अकेला कर देती है। और गाँव का पुराना पुजारी, जिसने 1992 में बावड़ी पर टीन और ज़ंजीर लगवाई थी, विक्रम से मिलने से मना कर देता है। क्योंकि 1992 में जो गिनने वाला था — उसका नाम वो पुजारी कभी ज़ुबान पर नहीं लाता...

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