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भाग 9 — नौवीं सीढ़ी

Piyashi Atma · Real Experiences · 20 मिनट

Writer
Piyashi Atma
Story
भानपुरा की बावड़ी - चालीस सीढ़ियाँ
Chapter
9 of 31
Category
Real Experiences
Reading time
20 min
Words
3987
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

हर नाम एक रस्सी होता है।

जब आप किसी का नाम लेते हैं, तो आप उस रस्सी को खींचते हैं। और रस्सी के दूसरे सिरे पर जो भी हो — इंसान, याद, या कुछ और — वो आपकी तरफ़ थोड़ा सरक आता है।

इसीलिए गाँवों में कुछ नाम नहीं लिए जाते। इसीलिए बूढ़ी औरतें मरे हुओं को "वो" कहती हैं। इसीलिए रामप्यारी अम्मा ने अड़सठ साल तक बावड़ी वाली को कोई नाम नहीं दिया।

और इसीलिए, उस नौवें दिन, भानपुरा के पुराने पुजारी ने चौंतीस साल बाद अपना दरवाज़ा आधा खोला — पर एक नाम लेने से मना कर दिया।

वो नाम जो उस घर में रहता था, जिसमें मैं सोता था।

सुबह सात बजे, बावड़ी की मुंडेर पर बैठे-बैठे, हमने तय किया।

"गुड्डी को वापस लाना होगा," रामप्यारी अम्मा ने कहा। "यहाँ। भानपुरा।"

सूरज ने उनकी तरफ़ ऐसे देखा जैसे उन्होंने कोई गाली दी हो। "यहाँ? जहाँ ये सब शुरू हुआ?"

"दूरी बचाती नहीं, बेटा। बस अकेला कर देती है।" अम्मा ने अपना चेहरा उत्तर की तरफ़ घुमाया। "कल रात वो छह सौ कोस दूर अकेली थी। न तू था, न विक्रम। वो उसे किसी और बावड़ी में ले गई क्योंकि उसके पास कोई नहीं था। यहाँ मेरी दीवारें हैं। यहाँ हम हैं। यहाँ कम से कम वो अकेली नहीं होगी।"

"पर हम दिल्ली जाएँगे, आठ घंटे, फिर वापस आठ घंटे—"

"रात के दो बजकर सैंतालीस से पहले नहीं पहुँचोगे," मैंने कहा। "और रास्ते में कहीं भी हुए, वो हमें यहाँ खींच लेगी, और गुड्डी फिर से अकेली रह जाएगी।"

सूरज ने अपना चेहरा अपने हाथों में छुपा लिया। उसका बायाँ हाथ — पत्थर वाला — उसके गाल पर पड़ा, खुरदुरा, ठंडा। वो चौंककर पीछे हटा, जैसे किसी और ने उसे छुआ हो।

"तो कौन लाएगा उसे?" उसने फुसफुसाया।

मैंने सरपंच का फ़ोन निकाला। कॉल हिस्ट्री। कल शाम का एक नंबर। झाँसी से दिल्ली तक की टैक्सी।

सरदार गुरमीत सिंह ने पहली घंटी पर फ़ोन उठाया।

"हाँ जी?"

"सरदार जी, मैं विक्रम। कल वाला। बच्ची मिल गई है। अस्पताल में है। पर हम... हम दिल्ली नहीं आ सकते। बहुत लंबी बात है।"

दूसरी तरफ़ एक पल की चुप्पी। फिर एक गहरी साँस।

"बच्ची को लाना है?"

"हाँ। भानपुरा। आज शाम से पहले। मैं जानता हूँ ये बहुत बड़ी बात है, एक अनजान आदमी से—"

"अनजान?" सरदार जी की आवाज़ में हल्की-सी हँसी थी। थकी हुई। "पुत्तर, वो बच्ची दो रात से मेरे सपने में आ रही है। मैं अनजान नहीं रहा।" फिर उनकी आवाज़ गंभीर हो गई। "अस्पताल वालों से बात करवा दो। बाप की इजाज़त चाहिए होगी। मैं ग्यारह बजे तक निकल जाऊँगा।"

सूरज ने फ़ोन लिया। उसने अस्पताल से बात की। पुलिस से बात की। बहादुर से बात की। उसकी आवाज़ बार-बार टूटती थी, पर वो रुका नहीं।

और ग्यारह बजकर दस मिनट पर सरदार जी का मैसेज आया — एक तस्वीर। गुड्डी, टैक्सी की पिछली सीट पर, एक पानी की बोतल और बिस्कुट के पैकेट के साथ, कैमरे की तरफ़ हाथ हिलाती हुई।

उसके बाल छोटे थे। कंधों तक। जहाँ मैंने काटे थे।

पर मैंने तस्वीर ज़ूम की। उसकी गर्दन के पीछे। कान के नीचे।

एक अकेली लट। बाक़ी बालों से लंबी। बहुत पतली। नीचे की तरफ़ झूलती हुई। और उसके सिरे पर, हल्का-सा, हरा रंग।

मैंने फ़ोन सूरज को नहीं दिखाया।

"पुजारी जी से मिलना है," मैंने अम्मा से कहा।

"किसलिए?"

"क्योंकि मुझे पता है कि मैं कुछ नहीं जानता। दादाजी की डायरी में 1975 है, 1992 है, 2009 है। पर 1992 का पन्ना आधा फटा हुआ है। और गाँव में सब कहते हैं कि 1992 में टीन और ज़ंजीर पुजारी जी ने लगवाई थी।"

अम्मा का चेहरा कस गया।

"हरिहर शास्त्री," उन्होंने धीरे से कहा। "वो किसी से नहीं मिलता, बच्चा। सत्रह बरस से नहीं। 2009 के बाद से उसने अपना दरवाज़ा अंदर से ज़ंजीर से बाँध रखा है। खाना उसकी भतीजी खिड़की से देती है। वो बाहर नहीं आता। किसी को अंदर नहीं आने देता।"

"क्यों?"

अम्मा ने बहुत देर तक जवाब नहीं दिया।

"क्योंकि बानवे में उसने भी कुछ खोया था," उन्होंने आख़िर में कहा। "और वो उसे वापस नहीं पा सका। और जिस घर की वजह से खोया, वो उस घर वालों की शक्ल नहीं देखना चाहता।"

"कौन-सा घर?"

अम्मा ने अपनी सफ़ेद आँखें मेरी तरफ़ घुमाईं। बिल्कुल सही जगह पर। जैसे वो मुझे देख रही हों।

"तेरा घर, विक्की।"

हरिहर शास्त्री का घर गाँव के पुराने शिव मंदिर के पीछे था।

मंदिर अब कोई इस्तेमाल नहीं करता था। गाँव ने नीम के पेड़ के नीचे नया मंदिर बना लिया था। ये पुराना वाला टूट रहा था — उसके शिखर पर पीपल का एक पौधा उग आया था, जिसकी जड़ें पत्थरों को धीरे-धीरे अलग कर रही थीं। और उसके पीछे, एक ढहती हुई दीवार से घिरा, एक छोटा-सा पक्का घर।

उसकी खिड़कियों पर ईंटें चुनी हुई थीं। सब खिड़कियों पर। सिर्फ़ एक छोटा-सा छेद छोड़ा गया था, दरवाज़े के बगल में, जिसमें से एक थाली अंदर जा सके।

दरवाज़ा लोहे का था। और उस पर बाहर से भी ताला था — एक बड़ा, काला, पुराना ताला। अंदर से भी कुछ बँधा था, मुझे सुनाई दिया — जब मैंने दस्तक दी, तो दरवाज़े के पीछे ज़ंजीरों की खनखनाहट हुई।

"पुजारी जी," अम्मा ने कहा। "मैं रामप्यारी। दरवाज़ा मत खोलना। बस सुन।"

अंदर से कोई जवाब नहीं आया।

"विक्रम आया है। रमेसर का पोता।"

अंदर कुछ हिला। जैसे कोई कुर्सी से उठा हो। पैरों की धीमी, घिसटती आवाज़। दरवाज़े के ठीक पीछे आकर रुकी।

और फिर एक आवाज़। बहुत बूढ़ी। बहुत सूखी। जैसे बहुत दिनों से किसी ने उसका इस्तेमाल न किया हो।

"मिश्रों के लिए ये दरवाज़ा नहीं खुलेगा।"

"पुजारी जी, मैं—"

"मैं जानता हूँ तू कौन है।" आवाज़ में कोई ग़ुस्सा नहीं था। बस एक ठंडी, पुरानी थकान। "मैं जानता हूँ तू किस सीढ़ी पर है। नौवीं। आज रात। और तेरे साथ भोला का लड़का है। चौबीसवीं। और उसकी बच्ची, जो दस तक सीख गई है। मैं सब जानता हूँ। मेरे पास आँखें नहीं हैं रामप्यारी जैसी, पर मेरे पास कान हैं। और इस गाँव में हर रात सब गिनती सुनाई देती है, अगर कोई सुनना चाहे।"

"तो आप मदद करेंगे?"

एक सूखी, खोखली हँसी। "मदद? मैंने बानवे में मदद की थी। रमेसर मिश्र के कहने पर। अपने पुरखों के मंत्र, अपने गुरु की विद्या, सब लगा दी। टीन लगवाई। ज़ंजीर बँधवाई। उल्टे दीये रखवाए। बावड़ी को बाँध दिया।"

"तो वो काम कर गया?"

"बाँधा था, बेटा," पुजारी ने कहा। "बंद नहीं किया था। बाँधने और बंद करने में फ़र्क़ होता है। कुत्ते को ज़ंजीर से बाँधो तो वो काटना बंद नहीं करता। बस उतनी दूर तक काटता है, जितनी ज़ंजीर लंबी है।"

मैं चुप रहा।

"और उस ज़ंजीर की क़ीमत चुकानी पड़ी थी," पुजारी की आवाज़ अब काँप रही थी। पहली बार। "मिश्रों ने नहीं चुकाई। मैंने चुकाई।"

मैंने अपनी बाईं मुट्ठी खोली। घुँघरू मेरी हथेली पर था। काला पड़ा हुआ। छोटा।

"पुजारी जी," मैंने कहा, "देवदत्त ने मुझे ये दिया है। अट्ठावन वाले देवदत्त ने। वो अब भी नीचे है। वो कहता है कि इस बावड़ी में चालीस नहीं, उनतालीस सीढ़ियाँ हैं।"

दरवाज़े के पीछे ख़ामोशी छा गई। इतनी गहरी कि मुझे अपने दिल की धड़कन सुनाई देने लगी।

फिर ज़ंजीरें खनकीं। एक, दो, तीन। कोई उन्हें खोल रहा था। अंदर से।

दरवाज़ा नहीं खुला। पर दरवाज़े के बगल वाला वो छोटा-सा छेद — जिससे थाली अंदर जाती थी — उसका लकड़ी का ढक्कन सरका।

और अंधेरे में से एक हाथ बाहर आया। बूढ़ा। झुर्रियों से भरा। नसें उभरी हुईं। और उस हाथ की हथेली पर एक चीज़ थी।

एक छोटा-सा मिट्टी का कलश। बंद। उसके मुँह पर लाल कपड़ा बँधा था, और कपड़े पर मौली के सात धागे लिपटे थे।

"इसे कान से लगा," पुजारी ने कहा। "खोलना मत। बस कान से लगा।"

मैंने कलश लिया। वो ठंडा था। बर्फ़ जैसा। और भारी — जितना उसके आकार से होना चाहिए, उससे कहीं ज़्यादा।

मैंने उसे अपने कान से लगाया।

और मैंने सुना।

अंदर से पानी के हिलने की आवाज़। बहुत हल्की। और उसके नीचे, एक बच्चे की आवाज़। बारह-तेरह साल का। थकी हुई। नींद में डूबी हुई। एक ही शब्द, बार-बार, बिना रुके:

"...छब्बीस... छब्बीस... छब्बीस... छब्बीस..."

मेरे हाथ काँपने लगे।

"शंकर," पुजारी ने दरवाज़े के पीछे से कहा। "मेरा बेटा। बानवे में बारह बरस का था। चौंतीस बरस से ये कलश मेरे पास है। चौंतीस बरस से वो छब्बीस पर अटका है। न आगे जा सकता है, न पीछे।"

"ये... ये कैसे..."

"ज़ंजीर की क़ीमत," पुजारी ने कहा। "बावड़ी को बाँधने के लिए किसी को उसके अंदर रहना पड़ता है। खूँटे की तरह। जिससे ज़ंजीर बँधी हो। बानवे में जो गिनने वाला था, वो छब्बीस पर था, जब मैंने बाँधने का अनुष्ठान किया। और गिनने वाले के बदले... खूँटा बनने के लिए..."

उसकी आवाज़ टूट गई।

"...मेरा शंकर उस रात बावड़ी पर गया। मुझे नहीं पता क्यों। मुझे नहीं पता किसने बुलाया। सुबह वो छब्बीसवीं सीढ़ी पर मिला। खड़ा हुआ। आँखें खुली। और उसकी आवाज़ पानी में घुल गई थी। मैंने उसे इस कलश में भर लिया। वो पानी। उसकी आवाज़। जो कुछ बचा था।"

"और उसका शरीर?"

पुजारी ने कोई जवाब नहीं दिया।

मैंने कलश को फिर से कान से लगाया। "...छब्बीस... छब्बीस..."

और फिर — अचानक — आवाज़ रुक गई।

एक लंबी चुप्पी। पानी का हल्का-सा हिलना। और फिर, बहुत धीमे, बहुत साफ़, जैसे वो बच्चा अचानक जाग गया हो और उसे पता चल गया हो कि कोई उसे सुन रहा है:

"बाबा? बाबा, दरवाज़ा खोलो। नौ आ गया है।"

मेरे हाथ से कलश लगभग गिर गया।

दरवाज़े के पीछे से एक आवाज़ आई। एक बूढ़े आदमी के घुटनों के बल गिरने की। और एक सिसकी, जो चौंतीस साल से दबी हुई थी।

"बानवे में गिनने वाला कौन था, पुजारी जी?"

मैंने ये सवाल तीसरी बार पूछा। कलश वापस उस छेद से अंदर जा चुका था। पुजारी दरवाज़े के पीछे बैठा था — मुझे उसकी साँसें सुनाई दे रही थीं, भारी और रुक-रुककर।

"नाम नहीं लूँगा।"

"क्यों?"

"क्योंकि नाम एक रस्सी है, बेटा। और वो नाम इस गाँव में अभी भी साँस ले रहा है। अगर मैंने लिया, तो रस्सी खिंचेगी। और उसके दूसरे सिरे पर जो है, वो सिर्फ़ वो आदमी नहीं है।"

"कम से कम बताइए, वो है कहाँ?"

लंबी चुप्पी।

"जिस घर में तू सोता है," पुजारी ने कहा, "उसी घर में।"

मेरी रीढ़ में ठंड उतरी।

चाचा। उनके टख़ने के वो भूरे, पुराने निशान। उनका सवाल टालना — कल बताऊँगा, दिन में, धूप में। दादाजी की बात — बहुत सी बातें हैं जो मैं भूल जाना चाहता हूँ। और बाग़ में, जब उन्होंने अपनी धोती नीचे की थी, उनकी आँखों में वो शर्म।

"पुजारी जी—"

"बस।" आवाज़ कठोर हो गई। "जो बताना था, बता दिया। अब एक बात और सुन, और चला जा।"

मैं रुका।

"बावड़ी के सबसे नीचे, पानी के अंदर, एक शिलालेख है। बनवाने वाले ने लिखवाया था। मेरे गुरु ने बताया था — उस पत्थर पर उसका नाम लिखा है। उसका। असली नाम। जो उसे बनाते वक़्त दिया गया था।" उसकी आवाज़ एक फुसफुसाहट बन गई। "जो उस नाम को पढ़ ले — ज़ोर से, उसके सामने — वो उसे बाँध नहीं, बंद कर सकता है। हमेशा के लिए।"

"आपने क्यों नहीं पढ़ा?"

"क्योंकि वो पत्थर चालीसवीं सीढ़ी के नीचे है, बेटा।" पुजारी ने धीरे से कहा। "और वहाँ तक जाने के लिए पहले चालीसवीं बनना पड़ता है।"

लकड़ी का ढक्कन वापस सरक गया। ज़ंजीरें फिर से खनकीं। और अंदर से, बहुत धीमे, मुझे एक आवाज़ सुनाई दी — एक बूढ़ा आदमी, किसी बच्चे को लोरी सुनाता हुआ। एक बंद कलश को।

सरदार जी शाम साढ़े पाँच बजे पीपल पर पहुँचे।

हम सब वहाँ थे। मैं, सूरज, अम्मा। सूरज की माँ भी, जिन्हें अब तक किसी ने कुछ नहीं बताया था पर जो सब कुछ जानती थीं, जैसे गाँव की माँएँ हमेशा जानती हैं।

टैक्सी का दरवाज़ा खुला। और गुड्डी बाहर कूदी।

"पापा!"

सूरज ने उसे उठा लिया। इस बार वो रोया। बहुत देर तक। अपना चेहरा अपनी बेटी के छोटे-से कंधे में छुपाकर। और गुड्डी, जिसे कुछ समझ नहीं आ रहा था, अपने पापा की पीठ थपथपाती रही, जैसे बड़े बच्चों को चुप कराते हैं।

सरदार जी गाड़ी के बगल में खड़े रहे। उन्होंने पीपल की तरफ़ देखा। उसके लाल धागों की तरफ़। फिर बावड़ी की टीन की तरफ़, जो सड़क से दिख रही थी। और उनका हाथ अपने आप उनकी कलाई पर गया, जहाँ स्टील का कड़ा था।

"कैसा रहा रास्ता, सरदार जी?"

उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में कुछ था जो उन्होंने बच्ची के सामने नहीं कहा था।

"ठीक रहा, पुत्तर।" फिर उन्होंने आवाज़ धीमी की। "चंबल के पुल पर, बच्ची सो रही थी। पिछली सीट पर। मैंने शीशे में देखा।" उन्होंने निगला। "उसके बगल में कोई बैठा था। एक औरत। लाल साड़ी। चेहरा बालों से ढका हुआ। बाल... बाल सीट से नीचे फ़र्श तक, और फ़र्श से... पता नहीं कहाँ तक। दरवाज़े की दरार से बाहर निकलकर, सड़क पर घिसटते हुए।"

"आपने क्या किया?"

"कुछ नहीं। मैं गाड़ी चलाता रहा। जपजी साहिब पढ़ता रहा। शीशे में दोबारा नहीं देखा।" उन्होंने अपनी दाढ़ी पर हाथ फेरा। "पर पुल ख़त्म होते ही बच्ची जागी, और बोली — 'अंकल, दीदी कहती है आपको धन्यवाद बोलूँ। आप बहुत अच्छे से गाड़ी चलाते हो।'"

उन्होंने अपनी कलाई से कड़ा उतारा। स्टील का। पुराना। घिसा हुआ। और गुड्डी के पास गए।

"बेटा, हाथ दे।"

गुड्डी ने अपना छोटा-सा हाथ बढ़ाया। सरदार जी ने कड़ा उसकी कलाई में डाला। वो बहुत बड़ा था, कोहनी तक सरक गया। सरदार जी ने उसे ऊपर किया और गुड्डी की बाँह पर, कोहनी के ऊपर, कस दिया।

"इसे उतारना मत। कभी नहीं। ठीक है?"

"ठीक है अंकल।"

उन्होंने पैसे नहीं लिए। मैंने ज़बरदस्ती करने की कोशिश की, उन्होंने मेरा हाथ पकड़कर मोड़ दिया। फिर उन्होंने गाड़ी स्टार्ट की, और जाने से पहले खिड़की से बाहर झाँककर कहा:

"अँधेरा होने से पहले निकलना चाहता हूँ, पुत्तर। बुरा मत मानना।"

और वो चले गए। धूल उड़ाते हुए। उसी तरह, जैसे पहले दिन टेम्पो वाला गया था।

उस रात हम सब रामप्यारी अम्मा के घर में थे।

मैं। सूरज। गुड्डी। अम्मा। दीवारों पर दो सौ चौवन हाथ के छापे — अब मेरा भी। चौखट पर कीलें। कोने में लालटेन।

मैं चाचा-चाची को अकेला छोड़कर आया था। मुझे अच्छा नहीं लग रहा था। पर पुजारी के शब्द मेरे कानों में गूँज रहे थे — जिस घर में तू सोता है, उसी घर में — और मुझे नहीं पता था कि आज रात उस घर में सोना मेरे लिए ठीक होगा या नहीं।

गुड्डी जल्दी सो गई। अपनी दादी की गोद में — सूरज की माँ भी आ गई थीं। कड़ा उसकी बाँह पर चमक रहा था।

"आज नौवीं है," अम्मा ने अँधेरे में कहा।

"हाँ।"

"आठवीं पर पानी तेरी नाक तक था।"

मैंने कुछ नहीं कहा। मैं इसके बारे में सोचना नहीं चाहता था। पूरा दिन नहीं सोचा था। पर अब, अँधेरे में, वो सच मेरे सामने बैठा था, और मुझसे नज़रें मिला रहा था।

आठवीं पर मेरी नाक पानी से बस ऊपर थी।

नौवीं पर...

"कोई नहीं बचा, बच्चा," अम्मा ने धीरे से कहा, "जो नौवीं से आगे साँस लेता रहा हो। ऊपर वाली हवा में। नौवीं के बाद, सब पानी में साँस लेते हैं।"

"और जो नहीं ले पाता?"

अम्मा ने कोई जवाब नहीं दिया।

दो बजकर सैंतालीस।

मेरी बाईं मुट्ठी में घुँघरू बजा।

धीरे से नहीं। तेज़। बार-बार। छन-छन-छन-छन। जैसे कोई उसे ज़ोर से हिला रहा हो। मेरी मुट्ठी के अंदर, बिना किसी के छुए।

वो पास थी। बहुत पास।

लालटेन की लौ नीली हुई। दीवारों के छापे — मैंने देखा — गीले होने लगे। एक के बाद एक। जैसे हर हाथ से पसीना छूट रहा हो।

और दरवाज़े के नीचे से बाल अंदर आए।

काले। चमकते। एक पतली धार में। फ़र्श पर फैलते हुए। कमरे के बीच से। गुड्डी की तरफ़।

सूरज अपनी जगह पर जमा था। उसकी माँ जमी थीं। अम्मा — अम्मा हिल रही थीं। उन्होंने अपना हाथ उठाया, जैसे कुछ कहना चाहती हों।

बाल गुड्डी की दादी की गोद तक पहुँचे। गुड्डी की फ्रॉक तक। उसकी बाँह तक।

और कड़े को छुआ।

छन्न।

एक आवाज़ — धातु की, पर घुँघरू की नहीं। कुछ जलने जैसी। बाल एक झटके में पीछे हटे, जैसे किसी ने उन्हें आग दिखा दी हो। उनके सिरे मुड़ गए, सिकुड़ गए। और वो तेज़ी से वापस दरवाज़े की तरफ़ सरकने लगे।

दरवाज़े के बाहर से एक सिसकारी आई। दर्द की। या ग़ुस्से की।

गुड्डी सोती रही। उसकी गर्दन के पीछे वाली वो अकेली लंबी लट — मैंने देखा — एक पल के लिए उठी, हवा में, दरवाज़े की तरफ़, जैसे बुलावे का जवाब देना चाहती हो।

फिर ढीली पड़कर गिर गई।

उसने ग्यारह नहीं सीखा। आज रात भी नहीं।

और मेरे पैरों के नीचे से ज़मीन गायब हो गई।

नौवीं सीढ़ी।

पानी मेरे सिर के ऊपर।

मैं डूब रहा था।

पहली बार। सच में। मेरे मुँह में पानी, मेरी नाक में पानी, मेरे कानों में, मेरी आँखों में। ऊपर, बहुत ऊपर, पानी की सतह के पार, वो आसमान का टुकड़ा — अब एक धुँधला, हिलता हुआ, धूसर सिक्का — जिसकी रोशनी पानी में टूटकर लहरों में बदल रही थी।

मैंने साँस रोकी। एक सेकंड। दो। पाँच। दस।

मेरी छाती जलने लगी। मेरे फेफड़े चीख़ रहे थे। मेरा शरीर ऊपर जाना चाहता था — एक सीढ़ी, बस एक सीढ़ी ऊपर, आठवीं पर, जहाँ नाक बाहर होती थी — पर मेरे पैर नौवीं पर चिपके थे। जैसे पत्थर ने उन्हें पकड़ लिया हो।

पंद्रह। बीस।

आँखें ऊपर। नियम। आँखें ऊपर।

पच्चीस।

और फिर मेरा शरीर हार गया। मेरा मुँह खुला। और मैंने साँस ली।

पानी मेरे अंदर गया। ठंडा। भारी। मेरे गले से होता हुआ, मेरी छाती में, मेरे फेफड़ों में। मैं खाँसने को हुआ — और नहीं खाँसा।

क्योंकि दर्द नहीं हुआ।

मेरे फेफड़े पानी से भर गए, और... ठीक थे। शांत। जलन ग़ायब हो गई। मेरा दिल, जो पागलों की तरह धड़क रहा था, धीमा होने लगा। मैंने एक और साँस ली। पानी की। और एक और।

और ये अच्छा लग रहा था।

यही सबसे डरावनी बात थी। ये अच्छा लग रहा था। ठंडा, शांत, भारी — जैसे किसी बहुत थके हुए आदमी को आख़िरकार बिस्तर मिल गया हो। मेरी सारी थकान, नौ दिनों का सारा डर, सत्रह सालों का सारा बोझ — सब उस पानी में घुलने लगा।

यहाँ कोई प्यासा नहीं है। देवदत्त ने अम्मा से कहा था। अट्ठावन में।

अब मैं समझा।

पानी के नीचे मैं अब सब सुन सकता था। बिल्कुल साफ़।

गिनती। सैकड़ों आवाज़ें। और उनके बीच, बहुत पास, एक आवाज़ जो गिन नहीं रही थी।

"...भाग..."

मेरे ठीक नीचे। दसवीं सीढ़ी पर।

मैंने नीचे नहीं देखा। पर पानी में चीज़ें अलग तरह से दिखती हैं — धुँधली, हिलती हुई, हर तरफ़ से। और मेरी आँखों के सबसे निचले किनारे पर, दसवीं सीढ़ी पर, कोई खड़ा था।

एक आदमी। जवान। बीस-इक्कीस साल का। दुबला। घुँघराले बाल, जो पानी में ऊपर की तरफ़ लहरा रहे थे। चेहरा ऊपर की तरफ़ — मेरी तरफ़ नहीं, उस आसमान वाले सिक्के की तरफ़।

पर उसके होंठ हिल रहे थे।

"भाग, विक्की। नौ पर रुकना मत। यहाँ बहुत अच्छा लगता है। बहुत। इसीलिए भाग।"

वो आवाज़... मैं उसे जानता था। पर उस तरह नहीं जैसे मैं उसे जानता था। वो आवाज़ जवान थी। हल्की। उसमें वो थकान नहीं थी, वो खाँसी नहीं थी, जो—

"मैं भी इतना ही आया था, बानवे में। नौ तक। मुझे भी अच्छा लगा था। मैं रुक गया था।" उसके चेहरे पर कुछ ऐसा आया जिससे मेरा पानी से भरा दिल मरोड़ उठा। "और जब मैं रुका था, तो मेरी जगह किसी और को नीचे जाना पड़ा।"

उसने अपनी आँखें बंद कर लीं।

"भाग, बेटा। अपनी जगह किसी और को मत भेजना। जैसे मैंने भेजा था।"

मैंने पलटकर बाएँ हाथ से दीवार पकड़ी। और ऊपर खींचा। अपने आप को। अपने पैरों को, जो पत्थर से चिपके थे। मेरी एड़ियों की चमड़ी फटी — मुझे महसूस हुआ, पत्थर ने मेरे पैरों की चमड़ी की एक परत अपने पास रख ली — और मैं आठवीं पर आया।

मेरी नाक पानी से बाहर निकली। और मैंने हवा में साँस लेने की कोशिश की।

और मेरे फेफड़ों ने मना कर दिया।

मुझे नहीं पता मैं कैसे ऊपर पहुँचा।

मुझे याद है कि मैं मुंडेर पर गिरा था और उल्टी कर रहा था। पानी। हरा, काला, गाढ़ा पानी। मेरे मुँह से, मेरी नाक से। लीटरों। जैसे मेरे अंदर एक पूरा कुआँ हो। और हर बार जब मैं हवा अंदर लेने की कोशिश करता, मेरा गला बंद हो जाता, जैसे हवा ज़हर हो।

अम्मा ने मेरी पीठ पर मारा। ज़ोर से। बार-बार। कुछ पढ़ते हुए।

और आख़िरकार — बहुत देर बाद — मेरे फेफड़ों ने हवा को स्वीकार किया। एक छोटी-सी, दर्द भरी, जलती हुई साँस। फिर एक और।

"नौवीं से लौटने वाला," अम्मा ने फुसफुसाया, "मैंने अड़सठ बरस में नहीं देखा।"

मैं उनके बगल में लेटा रहा, आसमान की तरफ़ मुँह किए, हर साँस के लिए लड़ता हुआ। और उस आदमी का चेहरा मेरी आँखों के सामने घूमता रहा। दसवीं सीढ़ी वाला। घुँघराले बालों वाला। बीस-इक्कीस साल का।

मैं उसे जानता था। मुझे पता था कि मैं उसे जानता था।

घर पहुँचा तो सुबह के छह बजे थे।

चाची सो रही थीं। चाचा अपने कमरे में। मैंने उनके दरवाज़े से झाँका — वो करवट लिए लेटे थे, बगल में पीतल का लोटा, ख़ाली।

मैं दादाजी के कमरे में नहीं गया। मैं बैठक में गया। वहाँ एक पुरानी लकड़ी की अलमारी थी, जिसमें दादी के ज़माने की चीज़ें रखी रहती थीं। शादी के कार्ड। पुराने पीतल के बर्तन। और एक मोटा, भूरी जिल्द वाला फ़ोटो एल्बम।

मैंने उसे निकाला। ज़मीन पर बैठकर खोला।

काली-सफ़ेद तस्वीरें। दादाजी जवानी में। दादी दुल्हन के जोड़े में। पापा बच्चे। चाचा बच्चे।

मैंने पन्ने पलटे। अस्सी का दशक। नब्बे का।

और फिर वो तस्वीर आई।

रंगीन, पर फीकी। एक जवान आदमी। बीस-इक्कीस साल का। दुबला। घुँघराले बाल। मुस्कुराता हुआ। किसी मेले में, एक गुब्बारे वाले के बगल में।

रघु चाचा। 1992 से पहले।

वही चेहरा। वही जो दसवीं सीढ़ी पर पानी में खड़ा था।

मेरा हाथ काँपने लगा। मैंने अगला पन्ना पलटा।

वहाँ एक और तस्वीर थी। उसी जवान आदमी की। बावड़ी की सीढ़ियों पर। तब टीन नहीं थी। वो पहली सीढ़ी पर खड़ा था, मुस्कुराता हुआ। और उससे कुछ सीढ़ियाँ नीचे, एक छोटा लड़का। बारह-तेरह साल का।

उस लड़के का चेहरा खुरचा हुआ था।

किसी नुकीली चीज़ से। बार-बार। इतनी ज़ोर से कि काग़ज़ फट गया था।

बिल्कुल वैसे ही, जैसे मेरी और छोटू की तस्वीर में छोटू का चेहरा खुरचा गया था।

मैंने तस्वीर पलटी। पीछे, नीली स्याही में, दादाजी की लिखावट:

"जून 1992। रघु और शंकर। भगवान रघु को माफ़ करे। भगवान मुझे माफ़ करे, कि मैंने उसे बचाने के लिए वो किया जो किया।"

"वो तस्वीर रख दे, विक्की।"

मैं उछल पड़ा।

दरवाज़े पर चाचा खड़े थे। उनके पैर नंगे थे, और उनके नीचे फ़र्श पर एक गीला धब्बा फैल रहा था। उनकी दरारों वाली हथेली चौखट पर टिकी थी। और उनकी आँखें — भरी हुई थीं।

"चाचा..."

"पुजारी ने नाम नहीं लिया न?" उन्होंने धीरे से पूछा। "अच्छा किया। वो नाम उसे नहीं लेना चाहिए। चौंतीस बरस में उसने एक बार भी नहीं लिया।" उनका होंठ काँपा। "वो नाम मैं ख़ुद लूँगा, विक्की। तुझे सब बताऊँगा। शंकर के बारे में। उस रात के बारे में। बाबूजी ने मुझे बचाने के लिए क्या किया, उसके बारे में।"

"कब?"

"जब मैं तैयार होऊँगा।" उन्होंने अपनी आँखें पोंछीं। "अभी नहीं। अभी मुझमें हिम्मत नहीं है।"

उन्होंने एक क़दम कमरे के अंदर रखा। गीला निशान उनके पीछे-पीछे।

और मेरी बाईं मुट्ठी में, घुँघरू बजने लगा।

छन।

मैंने चाचा की तरफ़ देखा। फिर कमरे में चारों तरफ़। बैठक ख़ाली थी। सुबह की धूप खिड़की से अंदर आ रही थी। कोई बाल नहीं। कोई पानी नहीं। कोई परछाईं नहीं।

छन। छन।

"क्या हुआ, विक्की?" चाचा ने पूछा। "तू ऐसे क्यों देख रहा है?"

छन-छन-छन।

घुँघरू बज रहा था। तेज़। और तेज़। उस तरह जैसे रात को, अम्मा के घर में, जब बाल दरवाज़े के नीचे से अंदर आए थे।

वो पास थी। बहुत पास।

और कमरे में, मेरे और चाचा के अलावा, कोई नहीं था।

भाग 9 समाप्त।

अगले भाग में — "दसवीं सीढ़ी": पहली बार विक्रम नीचे देखता है। जानबूझकर। क्योंकि उसे जानना है कि दसवीं सीढ़ी पर खड़ा वो जवान रघु कौन है — याद, भूत, या चाचा का वो टुकड़ा जो 1992 में वहीं छूट गया था। और जो नीचे से ऊपर देख रहा है, वो आख़िरकार मुस्कुराता है...

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