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भाग 10 — दसवीं सीढ़ी

Piyashi Atma · Real Experiences · 21 मिनट

Writer
Piyashi Atma
Story
भानपुरा की बावड़ी - चालीस सीढ़ियाँ
Chapter
10 of 31
Category
Real Experiences
Reading time
21 min
Words
4012
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

सब कहते हैं — नीचे मत देखो।

पहाड़ की चोटी पर। किसी ऊँची छत के किनारे। किसी पुल की रेलिंग पर झुकते हुए। नीचे मत देखो।

हम सोचते हैं ये इसलिए कहा जाता है कि नीचे देखने से चक्कर आता है। कि आप गिर सकते हैं।

पर दादी कहती थीं, असली वजह कुछ और है।

नीचे देखने से आप गिरते नहीं। नीचे देखने से आपके अंदर गिरने की इच्छा जागती है। एक छोटी-सी, धीमी, मीठी आवाज़, जो कहती है — कैसा लगेगा? बस एक क़दम। बस एक बार।

और एक बार वो आवाज़ जाग जाए, तो फिर कभी सोती नहीं।

दस रातों तक मैंने नीचे नहीं देखा था।

दसवीं रात, मैंने देखा।

घुँघरू सुबह भर बजता रहा।

हर बार जब मैं चाचा के पास जाता — छन। जब मैं उनसे दूर जाता, आवाज़ धीमी होती। आँगन के उस पार, तुलसी के पास — चुप। रसोई में चाची के पास — चुप। चाचा के कमरे के दरवाज़े पर — छन-छन।

चाचा ने कुछ नहीं सुना। या सुना, और जताया नहीं। वो अपने बिस्तर पर बैठे रहे, दरारों वाली हथेलियों को घुटनों पर रखे, खिड़की से बाहर देखते हुए। कभी-कभी उनके होंठ हिलते थे, पर कोई आवाज़ नहीं आती थी।

मुझे डर लगा। बहुत डर। कि वो चाचा के अंदर है। कि मैं जिस आदमी के साथ एक छत के नीचे सोता हूँ, जिसके हाथ की बनाई चाय पीता हूँ, वो—

फिर मैंने लोटा देखा।

दादाजी वाला पीतल का लोटा। चाचा के बिस्तर के बगल में, ज़मीन पर। पिछले पाँच दिन से वो उसी से पानी पी रहे थे। बार-बार। गट-गट-गट।

मैं कमरे में गया। चाचा ने मेरी तरफ़ नहीं देखा। मैंने लोटा उठाया।

घुँघरू मेरी मुट्ठी में इतनी ज़ोर से बजा कि मेरी हथेली में झनझनाहट हुई।

लोटा भरा हुआ था। ऊपर तक। हरा, गँदला, बर्फ़ीला पानी। वही जो पहली रात बक्से में था।

"चाचा, ये किसने भरा?"

चाचा ने धीरे से सिर घुमाया। "भरा? मैंने तो अभी ख़ाली किया था। पूरा पी गया था।" उन्होंने लोटे को देखा, और उनके चेहरे पर एक उलझन आई। "पता नहीं, विक्की। ये हमेशा भरा रहता है। जब से... जब से मुझे होश आया। मैं पीता हूँ, ये फिर भर जाता है।"

मैं लोटा लेकर कमरे से बाहर आया। आँगन पार किया। घुँघरू बजता रहा — पर चाचा के कमरे से दूर जाते हुए भी तेज़ बजता रहा। वो चाचा के साथ नहीं था।

वो लोटे के साथ था।

चाचा पाँच दिन से उसे पी रहे थे। उसे।

मैं लोटा लेकर खेतों में गया। दूर। आम के सूखे बाग़ से भी आगे, जहाँ एक पुराना सूखा नाला था। मैंने लोटा उल्टा किया। पानी ज़मीन पर गिरा — और ज़मीन ने उसे नहीं सोखा। वो सूखी, फटी मिट्टी पर मोतियों की तरह पड़ा रहा। फिर धीरे-धीरे, सब बूँदें एक-दूसरे की तरफ़ सरकने लगीं। इकट्ठी होने लगीं। एक छोटा-सा गोल तालाब बनाने लगीं।

मैंने लोटा पूरी ताक़त से नाले में फेंका। वो पत्थरों से टकराया, खनका, और झाड़ियों में गायब हो गया।

मैं घर लौटा। रास्ते भर घुँघरू चुप रहा।

शाम को, जब मैं चाचा को देखने गया, लोटा उनके बिस्तर के बगल में रखा था।

उसी जगह। भरा हुआ। उस पर सूखी मिट्टी और एक झाड़ी का काँटा चिपका था।

चाचा ने मुझे देखा और थकी हुई मुस्कान दी। "तू कहीं ले गया था इसे? मैं उठा तो ये यहीं था। अपने आप आ गया, पता नहीं कैसे।"

उन्होंने लोटा उठाया। और पीने लगे।

गट-गट-गट।

मैंने उन्हें रोकने के लिए हाथ बढ़ाया। और रुक गया। क्योंकि उनकी आँखें — पीते हुए — बंद थीं, और उनके चेहरे पर ऐसा सुकून था, जैसा किसी रेगिस्तान में भटके आदमी के चेहरे पर होता है जिसे अचानक पानी मिल गया हो।

यहाँ कोई प्यासा नहीं है।

"मैं आज रात नीचे देखूँगा," मैंने कहा।

दोपहर थी। अम्मा का आँगन। सूरज, अम्मा, और गुड्डी — जो कोने में बैठी अपनी स्लेट पर चॉक से कुछ बना रही थी।

अम्मा ने कुछ नहीं कहा। सूरज ने अपनी माला — अम्मा ने उसे भी एक दी थी — मुट्ठी में भींच ली।

"तू पागल है," उसने कहा। उसकी आवाज़ थकी हुई थी। पिछले कुछ दिनों में उसकी आवाज़ बदल गई थी — भारी हो गई थी, धीमी, जैसे हर शब्द बोलने में मेहनत लगती हो। "मैंने अठारहवीं पर नीचे देखा था, विक्की। देख, क्या मिला।" उसने अपनी सफ़ेद आँख की तरफ़ इशारा किया। फिर अपने बाएँ हाथ की तरफ़।

पत्थर अब कलाई से ऊपर चढ़ गया था। कोहनी तक। उसकी बाँह की चमड़ी जहाँ पत्थर से मिलती थी, वहाँ एक भूरी-हरी, खुरदुरी लकीर थी — जैसे कोई धीरे-धीरे उस पर चढ़ती आ रही हो। वो अब बाँह हिला नहीं पाता था। वो बस उसके बगल में लटकी रहती थी, भारी, ठंडी।

"मुझे जानना है, सूरज। कल रात दसवीं सीढ़ी पर जो था — वो चाचा थे। जवान। बानवे वाले। मुझे जानना है कि वो वहाँ क्या कर रहे हैं। वो क्या हैं। और..." मैंने गुड्डी की तरफ़ देखा, "...और मुझे जानना है कि नीचे असल में क्या है। कितने लोग हैं। कौन है। क्योंकि अगर मुझे चालीसवीं बनकर उस शिलालेख तक पहुँचना है, तो मुझे पता होना चाहिए कि रास्ते में क्या मिलेगा।"

"नीचे देखने वाले की आँख जाती है," अम्मा ने धीरे से कहा। "या उसकी गिनती बदल जाती है। या दोनों।"

"मुझे पता है।"

अम्मा बहुत देर तक चुप रहीं। फिर उन्होंने अपना चेहरा मेरी तरफ़ घुमाया।

"अगर देखना ही है," उन्होंने कहा, "तो बाईं आँख से देखना। दाईं बंद रखना।"

"क्यों?"

"देवदत्त ने तुझे क्या सिखाया? वो बाएँ हाथ को नहीं पहचानती। अट्ठावन में, जब मैंने नीचे देखा था, मैंने दोनों आँखों से देखा था। उसने मेरी बाईं आँख ली थी — पर दाईं को छुआ तक नहीं। मुझे बहुत बरस बाद समझ आया कि क्यों।" उन्होंने अपनी सफ़ेद आँखों पर हाथ रखा। "उसने जो आँख ली, वो उसके लिए दाईं थी। पानी में सब उल्टा होता है, बच्चा। वो नीचे से ऊपर देखती है। उसकी दाईं, हमारी बाईं। और जो उसकी बाईं है... हमारी दाईं... वो उसे दिखती ही नहीं।"

मैंने इस बात को अपने अंदर उतरने दिया। उल्टा। आईने की तरह।

"तो अगर मैं सिर्फ़ बाईं आँख से देखूँ..."

"तो शायद वो तुझे देखते हुए न देख पाए," अम्मा ने कहा। "शायद।"

अब उनके पास सिर्फ़ 'शायद' बचे थे।

गुड्डी मेरे पास आई। स्लेट हाथ में।

"चाचा, देखो।"

स्लेट पर अंक थे। १ से १०। साफ़। उसने उन्हें अपने हाथ से लिखा था, पर अब उसकी लिखावट सधी हुई थी। किसी बड़े जैसी।

और दस के बाद, एक खाली जगह। जहाँ उसने कुछ लिखने की कोशिश की थी और फिर मिटा दिया था। चॉक के धब्बे। बार-बार लिखा, बार-बार मिटाया।

"ग्यारह नहीं आ रहा," उसने मुँह फुलाकर कहा। "दो रात से। मुझे याद ही नहीं आता। दीदी सिखाने आती है, पर फिर कुछ चमकता है और वो भाग जाती है।" उसने अपनी बाँह का कड़ा छुआ। "ये चमकता है।"

"अच्छा है न, बेटा।"

गुड्डी ने अपनी भौंहें सिकोड़ीं। और उसकी आवाज़ में कुछ बदला। वो पाँच साल की बच्ची की आवाज़ नहीं रही।

"दीदी नाराज़ है," उसने कहा। "बहुत नाराज़। कल रात उसने खिड़की के बाहर से कहा — अगर गुड्डी ग्यारह नहीं सीखेगी, तो मैं उसके पापा को जल्दी ले जाऊँगी। एक रात में दो सीढ़ी। फिर तीन।"

सूरज की साँस रुक गई।

गुड्डी ने अपने पापा के पत्थर वाले हाथ को देखा। फिर मुझे। और उसकी आँखों में आँसू आ गए — असली, बच्चों वाले आँसू।

"चाचा... ये कड़ा उतार दूँ? पापा के लिए?"

मैंने उसे अपनी गोद में खींच लिया।

"नहीं, बेटा। कभी नहीं। पापा को कुछ नहीं होगा। मैं वादा करता हूँ।"

पर जब मैंने सूरज की तरफ़ देखा, तो उसकी अच्छी वाली आँख मुझसे कह रही थी — वादा मत कर, विक्की। तू निभा नहीं पाएगा।

उस रात मैं लोटा अपने साथ अम्मा के घर ले गया।

चाचा से दूर। मैंने उसे एक पुराने कपड़े में लपेटा, कपड़े को मौली से बाँधा, और अम्मा के कमरे के कोने में, दीवार के सहारे, रख दिया। उसी दीवार के पास जिस पर दो सौ चौवन हाथ के छापे थे।

"अच्छा किया," अम्मा ने कहा। "आज रात रघु की प्यास बुझाने वाला कोई नहीं होगा। देखते हैं वो क्या करती है।"

"वो क्या करेगी?"

अम्मा ने कंधे उचकाए। "जब किसी भूखे से थाली छीन लो, तो वो या तो रोता है, या थाली छीनने वाले पर झपटता है।"

मैंने लोटे की तरफ़ देखा। कपड़े में लिपटा, कोने में, चुपचाप।

मेरी बाईं मुट्ठी में घुँघरू धीरे-धीरे बज रहा था। लगातार। जैसे किसी के साँस लेने की आवाज़।

आधी रात के आसपास, जब गुड्डी सो चुकी थी और सूरज दीवार से टिका ऊँघ रहा था, अम्मा ने अँधेरे में धीरे से कहा:

"विक्की, एक बात याद रखना। नीचे जो भी दिखे — कोई अपना, कोई पराया, कोई ऐसा चेहरा जिसे तू बहुत प्यार करता हो — उसके चेहरे पर मत रुकना। पानी में चेहरे झूठ बोलते हैं। सिर्फ़ हाथ सच बोलते हैं। देखना कि किसका हाथ किसे पकड़े है।"

"और अगर मुझे उसका चेहरा दिखे?"

अम्मा बहुत देर चुप रहीं।

"तो आँख बंद कर लेना," उन्होंने कहा। "इससे पहले कि घूँघट पूरा उठे।"

मैंने अपनी बाईं आँख छुई। फिर दाईं। दोनों अभी मेरी थीं।

पता नहीं कल सुबह तक रहेंगी या नहीं।

दो बजकर सैंतालीस।

लालटेन की लौ नीली हुई।

और कोने में, लोटे का कपड़ा गीला होने लगा।

पहले एक धब्बा। फिर पूरा कपड़ा। पानी उसमें से रिसने लगा, ज़मीन पर फैलने लगा। मौली के धागे अपने आप खुल गए — मैंने देखा, वो साँपों की तरह ढीले होकर गिर गए — और कपड़ा सरककर नीचे गिरा।

लोटा उफन रहा था।

पानी उसके मुँह से बाहर आ रहा था। लगातार। उस छोटे-से पीतल के बर्तन से, जिसमें मुश्किल से एक लीटर पानी आता होगा, पानी की एक धार निकल रही थी जो रुकने का नाम नहीं ले रही थी। फ़र्श पर फैलती हुई। दीवार की तरफ़। हाथ के छापों की तरफ़।

और फिर धार ऊपर उठी।

नीचे गिरने की बजाय, पानी लोटे से ऊपर की तरफ़ उठने लगा। एक खंभे की तरह। पतला, पारदर्शी, लालटेन की नीली रोशनी में चमकता हुआ। दो फ़ुट। चार फ़ुट। छह फ़ुट।

और उस खंभे में एक चेहरा बना।

पानी का चेहरा। पारदर्शी। लहराता हुआ। पर पहचानने लायक़।

एक जवान आदमी। बीस-इक्कीस साल का। घुँघराले बाल जो पानी की लहरों में बदल रहे थे।

रघु चाचा। बानवे वाले।

पानी का चेहरा मेरी तरफ़ मुड़ा। और उसके होंठ हिले। आवाज़ ऐसी थी जैसे कोई गिलास में पानी डाल रहा हो।

"विक्की। आज नीचे देखना है न तुझे?"

मैं चुप रहा।

"डर मत। मैं तुझे दिखाऊँगा। मैं वहीं हूँ। दसवीं से नीचे। मैं रास्ता बताऊँगा।" पानी का चेहरा थोड़ा झुका। उसकी आँखों में — पानी की आँखों में — कुछ ऐसा था जो मैंने चाचा की आँखों में देखा था। वही शर्म। वही बोझ। "मैं तुझे वो दिखाऊँगा जो मैंने बानवे में देखा था। और जो मैंने किया था।"

पानी का खंभा गिर गया। छपाक से। पूरे फ़र्श पर।

और मैं उसके साथ गिर गया।

दसवीं सीढ़ी।

पानी सिर के ऊपर।

इस बार मैंने साँस रोकने की कोशिश नहीं की। मैंने सीधे पानी अंदर लिया। और मेरे फेफड़ों ने उसे ऐसे स्वीकार किया, जैसे वो हमेशा से इसी के लिए बने हों।

यही सबसे बुरा था। कि ये आसान हो गया था।

मैं दसवीं सीढ़ी पर खड़ा था, पानी में, आँखें ऊपर। वो आसमान का टुकड़ा — अब बहुत दूर, बहुत धुँधला, पानी की सतह के पार एक हिलता हुआ धूसर धब्बा।

मैंने अपनी दाईं आँख बंद की।

कसकर। इतनी कसकर कि मेरी पलक में दर्द होने लगा।

और अपनी बाईं आँख से, धीरे-धीरे, बहुत धीरे-धीरे — मैंने नीचे देखा।

मैं उस पल को कभी पूरी तरह शब्दों में नहीं बता पाऊँगा। अम्मा ने ठीक कहा था — जब भी मैं कोशिश करता हूँ, मेरे मुँह में पानी भर जाता है। पर मैं कोशिश करूँगा।

बावड़ी उनतालीस सीढ़ियों की नहीं थी।

मेरा मतलब है — सीढ़ियाँ उनतालीस ही थीं। पर बावड़ी... बावड़ी का कोई अंत नहीं था। सीढ़ियाँ नीचे उतरती गईं, दोनों तरफ़ से, एक उल्टे पिरामिड की तरह, और सबसे नीचे, जहाँ उन्हें ख़त्म होना चाहिए था, वहाँ कोई तली नहीं थी। बस अँधेरा था। गहरा, हरा-काला, अनंत अँधेरा। जैसे बावड़ी धरती में नहीं, किसी और चीज़ में खुदी हो।

और हर सीढ़ी पर, पत्थर में जड़े, लोग थे।

मैंने उन्हें दिन में, धूप में, आकृतियों के रूप में देखा था। पर अब, पानी के अंदर, अपनी बाईं आँख से, मैंने उन्हें असली देखा। लेटे हुए। चेहरे ऊपर। आँखें खुली। पत्थर उनके शरीर के चारों ओर ऐसे उगा था जैसे पेड़ की छाल। उनके बाल पानी में लहरा रहे थे। उनकी पलकें — सूरज ने ठीक कहा था — बहुत धीरे-धीरे झपकती थीं।

पर मेरी नज़र उन पर नहीं रुकी।

मेरी नज़र उस पर रुकी जो खड़ा था।

ग्यारहवीं सीढ़ी पर, मेरे ठीक नीचे, जवान रघु चाचा खड़े थे।

पत्थर में जड़े नहीं। खड़े। उनके पैर पत्थर में धँसे थे, टख़नों तक, पर बाक़ी शरीर आज़ाद था। उनका चेहरा ऊपर की तरफ़ था। मेरी तरफ़ नहीं — आसमान की तरफ़। जैसे चौंतीस साल से वो उसी को देख रहे हों।

और उनका दायाँ हाथ नीचे की तरफ़ बढ़ा हुआ था।

किसी का हाथ पकड़े हुए।

मैंने उनके हाथ के साथ अपनी नज़र नीचे उतारी।

उनकी उँगलियाँ एक छोटे हाथ में फँसी थीं। एक बच्चे का हाथ। और वो बच्चा — बारह-तेरह साल का, पतला, सफ़ेद कुर्ते में — नीचे खड़ा था। बहुत नीचे। मुझे सीढ़ियाँ गिनने की ज़रूरत नहीं थी। मुझे पता था।

छब्बीसवीं सीढ़ी पर।

शंकर।

पुजारी का बेटा। उसका चेहरा भी ऊपर था। उसकी आँखें खुली थीं। और उसके होंठ हिल रहे थे — छब्बीस, छब्बीस, छब्बीस — चौंतीस साल से।

पर रघु चाचा और शंकर के बीच पंद्रह सीढ़ियाँ थीं। कोई हाथ इतना लंबा नहीं होता।

मैंने ध्यान से देखा।

रघु चाचा का हाथ लंबा नहीं था। वो हाथ खिंच गया था। पानी में, पत्थर में। उनकी बाँह एक पतली, सफ़ेद, पारदर्शी डोरी बन गई थी — जैसे पानी में घुली हुई चमड़ी — जो पंद्रह सीढ़ियाँ नीचे उतरकर शंकर की उँगलियों तक पहुँचती थी।

और शंकर का दूसरा हाथ भी नीचे बढ़ा हुआ था।

किसी और का हाथ पकड़े हुए।

मेरी साँस — मेरी पानी वाली साँस — मेरे गले में अटक गई।

एक शृंखला।

हाथ से हाथ। सीढ़ी से सीढ़ी। नीचे। और नीचे। रघु चाचा से शंकर तक। शंकर से किसी और तक — एक औरत, सत्ताईसवीं पर, जिसे मैं नहीं पहचानता था। उससे एक बूढ़े तक। उससे एक लड़की तक। हर एक का हाथ ऊपर वाले से बँधा हुआ, और नीचे वाले को थामे हुए। पानी में खिंची हुई, पारदर्शी, सफ़ेद बाँहें। जैसे कोई मानव-ज़ंजीर, जो बावड़ी के ऊपर से शुरू होकर उसकी अनंत तली तक उतरती हो।

हर गिनने वाला। और हर वो, जो गिनने वाले की जगह नीचे गया था।

हाथ पकड़े हुए। एक-दूसरे को छोड़ने न देते हुए। या एक-दूसरे को नीचे खींचते हुए। मैं नहीं कह सकता।

ज़ंजीर नीचे जाती गई। पैंतीस। अड़तीस। उनतालीस।

और उनतालीसवीं से नीचे — जहाँ कोई सीढ़ी नहीं थी — एक पत्थर था। खड़ा हुआ। एक लड़के का आकार। चौदह-पंद्रह बरस का। पूरी तरह पत्थर। सिर से पाँव तक। उसका बायाँ हाथ ऊपर उठा हुआ था — उनतालीसवीं वाले का हाथ थामे हुए।

देवदत्त। चालीसवीं सीढ़ी। अट्ठावन से।

और देवदत्त के नीचे...

देवदत्त के नीचे वो थी।

उल्टी।

सिर नीचे, पैर ऊपर। जैसा सूरज ने बताया था। जैसा अम्मा ने बताया था। पानी के अंदर, अनंत अँधेरे में, जैसे वो उस अँधेरे की छत से लटकी हो।

उसने लाल साड़ी पहनी थी। गुड्डी ने ठीक कहा था। पुरानी। भारी। मंदिर की देवी जैसी। उसके किनारों पर सोने का गोटा, जो पानी में हल्का-हल्का चमक रहा था।

और उसके बाल।

उसके बाल पूरी बावड़ी में थे। हर तरफ़। हर सीढ़ी के नीचे से होते हुए। हर पत्थर की दरार में घुसते हुए। हर लेटे हुए इंसान के चारों ओर लिपटे हुए। और उस मानव-ज़ंजीर के — उन पारदर्शी बाँहों के — हर जोड़ पर एक गाँठ बनाते हुए। जैसे वो बाँहें हाथों से नहीं, उसके बालों से बँधी हों।

वो ज़ंजीर उसकी थी। हर कड़ी। हर हाथ।

उसका चेहरा ऊपर की तरफ़ था। मेरी तरफ़। पर मुझे वो दिखा नहीं। उसके बाल उसके चेहरे पर पर्दे की तरह गिरे थे।

मैंने नज़र हटाने की कोशिश की।

और तब मैंने ज़ंजीर में एक ख़ाली जगह देखी।

उन्नीसवीं सीढ़ी पर।

ज़ंजीर वहाँ टूटी हुई थी। अठारहवीं वाले का हाथ नीचे बढ़ा था — और नीचे कुछ नहीं था। बीसवीं वाले का हाथ ऊपर बढ़ा था — और ऊपर कुछ नहीं था।

और बीच में, उन्नीसवीं सीढ़ी पर, एक बच्चा खड़ा था।

हाफ़ पैंट। नीली कमीज़, जिसकी जेब फटी हुई थी। गीले बाल माथे पर चिपके हुए।

छोटू।

वो ज़ंजीर का हिस्सा नहीं था। उसके दोनों हाथ आज़ाद थे। पर उसका एक हाथ — दायाँ — ऊपर की तरफ़ बढ़ा हुआ था। खुला। उँगलियाँ फैली हुईं। जैसे किसी ऐसे हाथ का इंतज़ार कर रहा हो जो उसे सत्रह साल पहले पकड़ना चाहिए था।

मेरे हाथ का।

वो ऊपर देख रहा था। आसमान की तरफ़ नहीं। मेरी तरफ़।

और जब मेरी बाईं आँख उसकी आँखों से मिली — उस पल, उस अनंत पानी में — मेरे अंदर कुछ टूटा।

एक दरवाज़ा। उन्नीस सीढ़ियाँ नीचे। पानी से फूला हुआ। जो सत्रह साल से बंद था।

मुझे एक पल याद आया।

सिर्फ़ एक। टुकड़ा। जैसे किसी जली हुई फ़िल्म की एक फ़्रेम।

धूप। दोपहर। बावड़ी। मैं सीढ़ियों पर था — ऊपर नहीं, गिनते हुए नहीं — नीचे। उन्नीसवीं के पास। मेरे पैर पानी में। छोटू मेरे ठीक सामने था, एक सीढ़ी नीचे। उसकी आँखें डर से फैली थीं। उसका मुँह खुला था। वो चीख़ रहा था।

और मेरी हथेलियाँ उसकी पीठ पर थीं।

नहीं। उसकी छाती पर। नहीं — मुझे नहीं पता। मेरी हथेलियाँ उस पर थीं। उसे छू रही थीं। और मैं उसे... धकेल रहा था? या पकड़ रहा था? मेरी हथेलियों में दबाव था। आगे की तरफ़।

और फिर — ये सबसे अजीब था — मुझे अपनी पीठ पर भी दबाव महसूस हुआ।

किसी और की हथेलियाँ। छोटी। मेरी पीठ पर। मुझे आगे धकेलती हुईं।

फ़्रेम ख़त्म हो गई।

और तब, ग्यारहवीं सीढ़ी पर, जवान रघु चाचा ने अपना चेहरा नीचे किया। आसमान से हटाकर। मेरी तरफ़।

"अब तूने देख लिया," उन्होंने कहा। उनकी आवाज़ पानी में घुली हुई थी। "मैं शंकर को पकड़े हूँ। चौंतीस बरस से। क्योंकि मैंने उसे मेरी जगह भेजा था। और अब मैं उसे छोड़ नहीं सकता। जो किसी को अपनी जगह भेजता है, वो उसका हाथ हमेशा के लिए थामे रहता है।"

उन्होंने छोटू की तरफ़ देखा। उसके खुले, इंतज़ार करते हाथ की तरफ़।

"वो हाथ तेरा है, विक्की। ज़ंजीर में वो जगह तेरी है। तू जिस दिन चालीसवीं पर पहुँचेगा, वो जगह भरेगी।"

फिर उनकी आँखें फैल गईं। डर से।

"आँख बंद कर। अभी। वो मुड़ रही है।"

मैंने नीचे देखा। अपनी बाईं आँख से। सबसे नीचे। अँधेरे में।

उसके बाल हिल रहे थे।

उसके चेहरे पर गिरे बाल — वो पर्दा — धीरे-धीरे हट रहा था। जैसे कोई अपने चेहरे से घूँघट उठाता है। बहुत धीरे। बहुत प्यार से।

मैंने उसकी ठोड़ी देखी। सफ़ेद। पत्थर जैसी सफ़ेद।

उसके होंठ देखे। लाल। मुस्कुराते हुए।

और उसके खुले मुँह के अंदर — सूरज ने ठीक कहा था — दाँत नहीं थे। सीढ़ियाँ थीं। छोटी-छोटी पत्थर की सीढ़ियाँ। उसके गले के अंदर उतरती हुईं। अँधेरे में।

पर्दा और ऊपर उठा। उसकी नाक—

जिस दिन तू मेरा चेहरा देखेगी, उस दिन तू मेरी हो जाएगी।

मैंने अपनी बाईं आँख बंद कर ली।

अँधेरा। दोनों आँखें बंद।

और उस अँधेरे में, मेरे बहुत पास, मेरे कान के पास, एक फुसफुसाहट आई। उसकी। पहली बार इतनी पास। इतनी साफ़।

"बाईं आँख से देखा? चालाक है तू, रमेसर के पोते।"

हँसी। पानी में बुलबुले।

"मैं तुझे नहीं देख पाई। सच्ची। तेरी बाईं आँख मुझे नहीं दिखती। पर तूने मुझे देखा। आधा। ठोड़ी तक। होंठ तक।"

कुछ ठंडा मेरी बाईं पलक पर छुआ। एक उँगली। लंबी। पतली। जोड़ों पर अजीब तरह से मुड़ी हुई।

"आधा देखने की आधी दक्षिणा।"

मेरी बाईं आँख में बर्फ़ की एक सलाई घुसी।

मैं चीख़ा। पानी में। बुलबुलों में। और मैंने बाएँ हाथ से दीवार पकड़ी, और खींचा, और ऊपर गया — नौवीं, आठवीं, सातवीं — पानी मेरे फेफड़ों से निकलने की कोशिश करता हुआ, मेरा शरीर हवा को फिर से सीखने की कोशिश करता हुआ — छठी, पाँचवीं —

और हर सीढ़ी के साथ, मेरे पीछे, नीचे से, उसकी हँसी आती रही।

मुंडेर पर मैं उल्टा पड़ा था। पानी उगलता हुआ। हवा के लिए लड़ता हुआ।

अम्मा ने मेरी पीठ ठोकी। सूरज — जो कुछ देर पहले पच्चीसवीं से निकला था, हाँफता हुआ, उसका पत्थर वाला हाथ अब कोहनी के ऊपर तक चढ़ गया था — मेरे बगल में बैठा था।

जब मैं आख़िरकार बैठ पाया, तो सूरज ने मेरा चेहरा देखा। और उसका चेहरा पीला पड़ गया।

"तेरी आँख," उसने कहा।

मैंने अपनी बाईं आँख छुई। वो खुली थी। मैं उससे देख पा रहा था। पर कुछ अलग था। धुँधला-सा। किनारों पर।

अम्मा ने अपनी उँगलियों से मेरा चेहरा टटोला। मेरी बाईं आँख के चारों ओर।

"उसने पूरी नहीं ली," उन्होंने धीरे से कहा। "बस एक घेरा। पुतली के चारों ओर। सफ़ेद।" उनकी आवाज़ में कुछ था — राहत? या डर? "तू अब थोड़ा-थोड़ा देखेगा, बच्चा। उसकी दुनिया। किनारों से।"

मैंने बाईं आँख से पीपल की तरफ़ देखा।

और पीपल के हर लाल धागे के सिरे पर — जहाँ मैंने बच्चों के बाल की लटें देखी थीं पहले दिन — मुझे अब छोटे-छोटे हाथ दिखे। पारदर्शी। लटके हुए। धागों को पकड़े हुए। हवा में झूलते हुए।

मैंने आँख बंद कर ली।

घर पर, दादाजी के कमरे में, मैंने बक्सा खोला।

मुझे वो तस्वीर देखनी थी। मेरी और छोटू की। बावड़ी की सीढ़ियों पर। 2009।

मैंने उसे निकाला। रोशनी में रखा। पहले दाईं आँख से देखा।

वही तस्वीर। मैं पहली सीढ़ी पर, मुस्कुराता हुआ। छोटू तीन सीढ़ी नीचे, उसका चेहरा खुरचा हुआ। नीचे अँधेरे में वो धुँधला आकार।

फिर मैंने दाईं आँख बंद की। और बाईं से देखा। उस सफ़ेद घेरे वाली आँख से।

तस्वीर बदल गई।

छोटू का चेहरा खुरचा हुआ नहीं था। वो साफ़ था। पूरा। और वो कैमरे की तरफ़ नहीं देख रहा था। वो ऊपर देख रहा था — मेरी तरफ़, पहली सीढ़ी की तरफ़ — और उसकी आँखों में डर था। इतना डर कि मेरे हाथ काँपने लगे।

नीचे का धुँधला आकार अब धुँधला नहीं था। लाल साड़ी। उल्टी। बाल ऊपर की तरफ़ लहराते हुए। छोटू के टख़नों की तरफ़।

और मेरे पीछे।

तस्वीर में, मेरे ठीक पीछे, मुंडेर पर, कोई था। जो दाईं आँख से नहीं दिखता था।

एक और बच्चा।

उसका चेहरा फ़्रेम के ऊपरी किनारे से कटा हुआ था — सिर्फ़ उसकी ठोड़ी और गर्दन दिख रही थी। पर उसका हाथ दिख रहा था। वो मेरी पीठ पर था। मेरे कंधों के बीच। हथेली फैली हुई। जैसे मुझे आगे धकेलने वाला हो।

और उस हाथ की कलाई पर एक काला धागा बँधा था। और उस धागे में एक छोटा-सा ताँबे का लॉकेट था। गोल। किरणों वाला।

सूरज की शक्ल का।

मैंने धीरे से तस्वीर नीचे रखी।

मुझे याद आया। पहले दिन, सूरज की दुकान पर। जब उसने मुझे गले लगाया था। उसकी सोने की चेन के अलावा... उसकी कलाई पर...

मैं उठा। खिड़की के पास गया। नीचे देखा।

सूरज आँगन में बैठा था। रामप्यारी अम्मा के घर से गुड्डी को लेकर आया था, मुझे देखने। गुड्डी उसकी गोद में थी, स्लेट पर कुछ बना रही थी। सूरज का पत्थर वाला बायाँ हाथ उसके बगल में लटका हुआ था।

और उसके दाएँ हाथ की कलाई पर — जिससे वो गुड्डी को थामे था — एक काला धागा बँधा था। पुराना। बहुत पुराना। इतना फीका कि लगभग भूरा हो गया था। और उस धागे में एक छोटा-सा लॉकेट था।

ताँबे का। गोल। किरणों वाला।

सूरज ने ऊपर देखा। मेरी खिड़की की तरफ़। और मुस्कुराया। वही पुरानी, गर्म, दोस्ताना मुस्कान। और हाथ हिलाया।

मैंने भी हाथ हिलाया।

और मेरी बाईं मुट्ठी में, घुँघरू चुप था। बिल्कुल चुप।

जिसका मतलब था — वो पास नहीं थी।

जो भी सूरज के अंदर था, जो भी उस मुस्कान के पीछे था — वो वो नहीं थी।

वो सूरज ख़ुद था।

भाग 10 समाप्त।

— पहला खंड: "जागना" समाप्त —

अगले भाग में — "ग्यारहवीं सीढ़ी": दूसरा खंड शुरू होता है — "याद"। विक्रम की बाईं आँख अब सिर्फ़ बावड़ी नहीं, बीता हुआ वक़्त भी देखने लगती है। 2009 की उस गर्मी का पहला पूरा टुकड़ा लौटता है — और उसमें सूरज की एक बात है, जो उसने धूप में बताई कहानी में कभी नहीं कही थी...

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