Pretika › Real Experiences › भानपुरा की बावड़ी - चालीस सीढ़ियाँ
भाग 11 — ग्यारहवीं सीढ़ी
Piyashi Atma · Real Experiences · 20 मिनट
- Writer
- Piyashi Atma
- Story
- भानपुरा की बावड़ी - चालीस सीढ़ियाँ
- Chapter
- 11 of 31
- Category
- Real Experiences
- Reading time
- 20 min
- Words
- 3999
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
याद पानी जैसी होती है।
ऊपर से शांत। साफ़। आप झाँकते हैं तो अपना ही चेहरा दिखता है — जैसा आप ख़ुद को देखना चाहते हैं। पर उस सतह के नीचे सब कुछ होता है। जो डूबा, वो वहीं है। जो फेंका, वो वहीं है। कुछ भी सचमुच ग़ायब नहीं होता। बस नीचे चला जाता है। और इंतज़ार करता है।
और पानी — ये बात मुझे उस ग्यारहवें दिन पता चली — पानी भूलता नहीं।
जहाँ भी कभी पानी रहा हो — किसी घड़े में, किसी गड्ढे में, किसी बच्चे की आँख के आँसू में — वहाँ उसने सब देखा होता है। और सब याद रखा होता है।
बस किसी को सही आँख से देखना आना चाहिए।
मैंने उस सुबह सूरज से कुछ नहीं कहा।
मैं रात भर जागता रहा था — बावड़ी से लौटने के बाद भी — उस तस्वीर को देखता हुआ। बाईं आँख से। दाईं से। फिर बाईं से। मेरी पीठ पर वो छोटा हाथ। वो काला धागा। वो ताँबे का सूरज।
और सुबह जब सूरज गुड्डी को लेकर मेरे आँगन में आया, अपने पत्थर वाले हाथ को सँभालता हुआ, और बोला — "चाय पिलाएगा या नहीं, शहरी बाबू?" — तो मैं मुस्कुराया, और चाची से चाय बनवाई, और उसके बगल में बैठा रहा।
क्योंकि मुझे नहीं पता था कि मैं क्या देख रहा हूँ।
एक बच्चे का हाथ, जो शायद धकेलने वाला था। या शायद थामने वाला। एक धुँधली फ़्रेम, जिसका सिर कटा हुआ था। एक बाईं आँख, जो उसकी दी हुई थी — और जिस पर मुझे पूरा भरोसा नहीं था।
उस पर मत भरोसा करना, देवदत्त ने कहा था, आईने के बारे में। और उस पर भरोसा किए बिना भी मत रहना।
सूरज ने चाय का गिलास अपने दाएँ हाथ में लिया। उस कलाई पर वो काला धागा था। फीका। लगभग भूरा। और वो छोटा-सा ताँबे का लॉकेट, धूप में हल्का-सा चमकता हुआ।
"ये धागा," मैंने बहुत लापरवाही से कहा, जैसे यूँ ही पूछ रहा हूँ, "बहुत पुराना लगता है।"
सूरज ने अपनी कलाई देखी। जैसे पहली बार देख रहा हो।
"अम्मा ने बाँधा था। बचपन में।" उसने लॉकेट को अँगूठे से छुआ। "मेरे नाम का है — सूरज। कहती थीं, जब तक ये बँधा है, कोई बुरी नज़र नहीं लगेगी।" वो हल्का-सा हँसा। "देख, कितना काम आया।"
"कब बाँधा था?"
उसका अँगूठा रुक गया। एक पल के लिए।
"याद नहीं," उसने कहा। और चाय पीने लगा।
"बाईं आँख से क्या दिखता है?" मैंने रामप्यारी अम्मा से पूछा।
दोपहर थी। सूरज गुड्डी को सुलाने घर ले गया था — उसकी बेटी पिछली रातों से ठीक से सो नहीं पा रही थी। मैं और अम्मा अकेले थे।
"जो तुझे दिख रहा है।"
"मुझे... चीज़ें दिख रही हैं, अम्मा। सुबह से। किनारों पर। जैसे दो तस्वीरें एक-दूसरे पर चढ़ी हों।"
मैं फ़ोटोग्राफ़र हूँ। मैं जानता हूँ इसे क्या कहते हैं। डबल एक्सपोज़र। जब कैमरे की एक ही रील पर दो बार तस्वीर खिंच जाए। एक तस्वीर के ऊपर दूसरी, धुँधली, पारदर्शी। पुराने ज़माने में ये ग़लती से होता था। लोग इसे भूत की तस्वीर समझते थे।
"आज सुबह मैंने चाची को रसोई में देखा," मैंने कहा। "दाईं आँख से — चाची। बाईं आँख से — चाची, पर उनके पीछे एक और औरत। धुँधली। वही रसोई, वही चूल्हा। घूँघट में। मुझे लगा... मुझे लगा वो दादी थीं। जवान।"
अम्मा ने सिर हिलाया। धीरे से।
"पानी भूलता नहीं, बच्चा," उन्होंने कहा। "उस रसोई में पचास बरस से पानी भरा गया है। घड़ों में। बाल्टियों में। वो पानी सब देखता है। तेरी दादी का हर दिन। तेरी चाची का हर दिन। और वो सब अपने में रखता है।" उन्होंने अपनी सफ़ेद आँखों को छुआ। "उसकी आँख पानी की आँख है। जो पानी ने देखा, वो तुझे दिखेगा।"
"बीता हुआ वक़्त?"
"बीता हुआ पानी।"
मेरा दिल तेज़ धड़कने लगा। "तो अगर मैं वहाँ जाऊँ जहाँ... जहाँ 2009 में..."
"तो तुझे दिखेगा।" अम्मा का चेहरा कस गया। "पर सुन। हर बार तू उस आँख से पीछे देखेगा, वो घेरा थोड़ा बढ़ेगा। वो सफ़ेदी। वो तेरी आँख को धीरे-धीरे अपना बना लेगी। जितना देखेगा, उतना खोएगा।"
मैंने अपनी बाईं आँख छुई।
"कितना देख सकता हूँ?"
"जितना तू खो सकता है," अम्मा ने कहा।
मैं आम के बाग़ में गया।
वही सूखा बाग़, जहाँ मैं और छोटू — और सूरज, अब मुझे पता था — उस गर्मी में खेलते थे। वही बाग़, जहाँ पाँचवें दिन रघु चाचा ने मुझे चाची की उल्टी गिनती के बारे में बताया था।
पेड़ सूखे थे। पत्तियाँ नहीं। बस काली, मुड़ी हुई डालियाँ, आसमान की तरफ़ उठी हुई, जैसे किसी से भीख माँग रही हों। ज़मीन फटी हुई थी।
पर बीच में एक पुराना कुआँ था। छोटा। सूखा। जिसकी मुंडेर टूट चुकी थी। मुझे वो याद नहीं था — पर जब मैंने उसे देखा, मेरे अंदर कुछ हिला। हम उसमें पत्थर फेंकते थे। गिनते थे कि आवाज़ आने में कितनी देर लगती है।
मैं उस कुएँ के पास बैठ गया। उसकी मुंडेर पर हाथ रखा।
फिर मैंने अपनी दाईं आँख बंद की।
और बाईं से देखा।
पहले कुछ नहीं हुआ। बस वही सूखा बाग़, थोड़ा धुँधला।
फिर रंग बदले।
धीरे-धीरे। जैसे किसी पुरानी फ़ोटो को डेवलप होते देखा जाए — डार्करूम में, लाल रोशनी में, केमिकल की ट्रे में — जब सफ़ेद काग़ज़ पर पहले हल्की परछाइयाँ उभरती हैं, फिर आकार, फिर चेहरे।
पेड़ों पर पत्तियाँ आईं। हरी। घनी। उनके बीच छोटे-छोटे कच्चे आम। ज़मीन पर घास। कुएँ में पानी — मैंने नीचे झाँका — गहरा, पर वहाँ। और हवा — हवा चलने लगी। गर्म, लू वाली जून की हवा, जिसमें आम की ख़ुशबू और धूल घुली थी।
और आवाज़ें।
बच्चों की हँसी।
मैंने सिर घुमाया।
पेड़ों के बीच से तीन बच्चे दौड़ते हुए आ रहे थे। धुँधले। पारदर्शी। जैसे धूप में घुली परछाइयाँ। पर मैं उन्हें पहचान सकता था।
सबसे आगे एक दुबला लड़का, नंगे पैर, हाफ़ पैंट में। माथे पर चोट का निशान। टेढ़ा दाँत। हाथ में एक डंडी, जिससे वो हर पेड़ के तने को छूता जा रहा था — और मैंने सुना, उसके होंठ हिल रहे थे: "सत्रह... अठारह... उन्नीस..."
मैं।
बारह साल का मैं। पेड़ गिनता हुआ।
उसके पीछे छोटू। नीली कमीज़ — अभी जेब फटी नहीं थी। हँसता हुआ। उसके हाथ में एक कच्चा आम।
और सबसे पीछे — थोड़ा मोटा, गोल चेहरा, घुँघराले बाल — सूरज। उसकी कलाई पर एक नया, चमकता काला धागा। और एक ताँबे का लॉकेट, जो हर क़दम के साथ उछल रहा था।
वो तीनों कुएँ के पास आकर रुके। मेरे ठीक सामने। मेरे आर-पार। जैसे मैं वहाँ हूँ ही नहीं।
"आज चलें?" छोटू ने कहा। हाँफते हुए। उसकी आँखें चमक रही थीं।
"कहाँ?" बारह साल के मैं ने पूछा। पर उसकी नज़र छोटू पर नहीं थी। वो कुएँ में झाँक रहा था। गिन रहा था — मुझे पता था — कि कुएँ की दीवार में कितनी ईंटें दिख रही हैं।
"बावड़ी," छोटू ने फुसफुसाकर कहा। जैसे कोई राज़ बता रहा हो। "दीदी ने कहा है आज का दिन अच्छा है। आज दोपहर को। जब सब सो रहे हों।"
"कौन दीदी?"
"बताया था न। बावड़ी वाली दीदी।" छोटू ने आम का एक कौर लिया। "कल रात फिर आई थी। खिड़की पर। उसने कहा कि उन्नीसवीं सीढ़ी के नीचे चाँदी का सिक्का है। राजा के ज़माने का। और जो उसे लाएगा, उसकी एक इच्छा पूरी होगी।"
"कोई भी इच्छा?" सूरज ने पूछा।
उसकी आवाज़ में कुछ था। बारह साल के बच्चे की आवाज़ में। एक उम्मीद, जो बहुत भारी थी।
"कोई भी," छोटू ने कहा।
बारह साल का मैं कुएँ से हटा। "मुझे नहीं जाना। बाबूजी ने मना किया है। दादाजी ने।"
"डरपोक," छोटू ने हँसकर कहा। और उसकी तरफ़ आम की गुठली फेंकी।
"डरपोक नहीं हूँ।"
"तो चल।"
"मैं... मैं गिनूँगा," बारह साल के मैं ने आख़िर में कहा। "ऊपर से। मैं नीचे नहीं उतरूँगा। बस गिनूँगा।"
छोटू ने ताली बजाई। "ठीक! वैसे भी दीदी ने कहा था कि खेल में एक गिनने वाला चाहिए। और तू सबसे अच्छा गिनता है।"
फिर वो दोनों — छोटू और बारह साल का मैं — आगे दौड़ पड़े। पेड़ों के बीच से। हँसते हुए।
सूरज पीछे रह गया।
मैंने सोचा था कि याद वहीं ख़त्म हो जाएगी। कि वो भी उनके पीछे भाग जाएगा।
पर वो नहीं भागा।
वो कुएँ के पास खड़ा रहा। अकेला। बारह साल का गोल-मटोल सूरज। उसने अपनी कलाई का लॉकेट पकड़ा और कुएँ में झाँका। पानी में। अपनी परछाईं में।
और उसके होंठ हिले।
बहुत धीमे। मुझे सुनने के लिए आगे झुकना पड़ा — और जब मैं झुका, तो मेरा चेहरा उसके चेहरे से बस कुछ इंच दूर था। एक धुँधला, पारदर्शी बच्चा, जो सत्रह साल पहले इसी जगह खड़ा था।
"दीदी," उसने कुएँ में फुसफुसाया। "तुम यहाँ हो?"
कुएँ के पानी में कुछ हिला। एक लहर। एक परछाईं, जो सूरज की नहीं थी।
और पानी में से एक आवाज़ आई। वही। उसकी। पर मीठी। बहुत मीठी। किसी दीदी जैसी।
"हाँ, सूरज बेटा। मैं यहाँ हूँ।"
"तुमने वादा किया था," सूरज ने कहा। उसकी आवाज़ काँप रही थी। "अगर खेल पूरा हुआ तो... तो अम्मा ठीक हो जाएँगी?"
मेरी साँस रुक गई।
"वादा किया था।"
"कल रात अम्मा को फिर ख़ून आया था। खाँसी में। बहुत सारा। डॉक्टर बाबू ने बापू से कहा कि अब कुछ नहीं हो सकता। कि दो महीने..." सूरज की आवाज़ टूट गई। उसने अपनी आँखें पोंछीं। "मुझे अम्मा चाहिए, दीदी।"
"तो खेल पूरा करना होगा, बेटा। मैंने बताया था न। खेल में तीन चाहिए। एक जो गिने। एक जो उतरे।"
एक ठहराव। कुएँ का पानी बिल्कुल स्थिर।
"और एक जो तय करे कि कौन उतरेगा।"
सूरज ने अपना लॉकेट कसकर पकड़ा।
"विक्की को मत बताना," उसने फुसफुसाया। "प्लीज़। वो मेरा दोस्त है।"
"मैं किसी को नहीं बताऊँगी, सूरज।" पानी में वो परछाईं मुस्कुराई। "ये हमारा राज़ है।"
और फिर बारह साल का सूरज मुड़ा, और दौड़ पड़ा। दूसरों के पीछे। पेड़ों के बीच से।
रंग धुल गए।
पत्तियाँ ग़ायब हो गईं। घास ग़ायब। हवा रुक गई। कुएँ में पानी — ग़ायब। बस सूखी, फटी ज़मीन, और काली डालियाँ, और मैं, एक टूटे कुएँ की मुंडेर पर बैठा हुआ।
मेरी बाईं आँख से कुछ गीला बह रहा था।
मैंने छुआ। मेरी उँगलियाँ हरी थीं। आँसू नहीं। पानी। बावड़ी का पानी। मेरी आँख से निकलता हुआ।
और जब मैंने बाईं आँख से फिर देखा — सिर्फ़ सूखे बाग़ को, बिना किसी याद के — तो किनारे पहले से ज़्यादा धुँधले थे। सफ़ेद घेरा थोड़ा बढ़ गया था।
जितना देखेगा, उतना खोएगा।
मैं बहुत देर तक वहीं बैठा रहा।
मुझे अम्मा चाहिए, दीदी।
बारह साल का एक बच्चा। मरती हुई माँ। और पानी में से एक मीठी आवाज़, जो कहती है — एक जो तय करे कि कौन उतरेगा।
घर लौटते हुए मैं छोटू के घर के सामने से गुज़रा।
मामा-मामी का घर। गाँव के दूसरे छोर पर। मैं दस दिन से यहाँ था और एक बार भी उस तरफ़ नहीं गया था। मुझे डर लगता था। उस दरवाज़े से। उस घर से, जिसका बेटा मेरी वजह से...
शाम हो रही थी। गोधूलि।
मामी दरवाज़े पर खड़ी थीं।
मैंने उन्हें सत्रह साल बाद देखा। वो बूढ़ी हो गई थीं — बहुत बूढ़ी, अपनी उम्र से कहीं ज़्यादा। सफ़ेद बाल, बिखरे हुए। झुकी हुई कमर। एक फीकी साड़ी। और वो दरवाज़े की चौखट पकड़े खड़ी थीं, गली के उस छोर की तरफ़ देखती हुई। पीपल की तरफ़।
उनके होंठ हिल रहे थे।
"कन्हैया..." उन्होंने धीमे से पुकारा। "कन्हैया... खाना ठंडा हो रहा है, बेटा... घर आ जा..."
मैं रुक गया।
मैंने अपनी दाईं आँख बंद की। बाईं से देखा। मुझे नहीं पता क्यों — शायद मुझे यक़ीन नहीं हो रहा था।
बाईं आँख में दो मामी थीं।
एक — बूढ़ी, सफ़ेद बालों वाली, आज की। और उसके ऊपर चढ़ी हुई, धुँधली, पारदर्शी — एक जवान औरत। काले बाल। सिंदूर। उसी चौखट पर। उसी तरफ़ देखती हुई। उसी आवाज़ में पुकारती हुई।
"कन्हैया... खाना ठंडा हो रहा है..."
और उसके पीछे, थोड़ी और धुँधली, एक और। और उसके पीछे एक और। दर्जनों। सैकड़ों। हर शाम की एक मामी। हर गोधूलि की। सत्रह साल की छह हज़ार शामें, एक-दूसरे पर चढ़ी हुईं। हर एक उसी चौखट पर। हर एक वही नाम पुकारती हुई।
पानी ने हर शाम याद रखी थी।
मैंने आँख बंद कर ली। मेरे गाल पर हरा पानी बहा।
मामी ने मुझे नहीं देखा। वो बस पुकारती रहीं।
मैं वहाँ से चला गया। बिना कुछ कहे। मुझमें उस दरवाज़े तक जाने की हिम्मत नहीं थी। अभी नहीं।
उस रात, अम्मा के घर में, सूरज के पास बैठकर, मैंने बहुत सँभलकर पूछा।
"सूरज, तेरी अम्मा... बचपन में बीमार रहती थीं न? मुझे धुँधला-सा याद है।"
सूरज गुड्डी के बालों में हाथ फेर रहा था। उसने ऊपर नहीं देखा।
"हाँ। बहुत बीमार। उस साल। टीबी हो गई थी। बहुत बिगड़ गई थी। डॉक्टरों ने जवाब दे दिया था।" उसकी आवाज़ बिल्कुल सामान्य थी। "फिर अचानक ठीक हो गईं। एक रात में। बुख़ार उतर गया, खाँसी बंद। डॉक्टर बाबू ने कहा चमत्कार है।"
"कब?"
उसका हाथ गुड्डी के बालों में रुक गया।
"उसी गर्मी," उसने धीरे से कहा। "छोटू के... छोटू के जाने के एक-दो दिन बाद।"
उसने अब भी ऊपर नहीं देखा। पर मैंने उसकी अच्छी आँख में कुछ देखा — बहुत छोटा, बहुत तेज़, जैसे किसी गहरे पानी में कोई मछली पलटी हो। और फिर चली गई।
"अजीब संयोग है न," उसने कहा। बहुत हल्के से। "गाँव वाले कहते थे, भगवान ने एक लिया तो एक लौटा दिया।"
मैंने कुछ नहीं कहा।
"क्यों पूछ रहा है?" उसने आख़िर में ऊपर देखा। उसकी अच्छी आँख में सवाल था। उसकी सफ़ेद आँख में — कुछ नहीं। खालीपन।
"बस यूँ ही," मैंने कहा।
वो कुछ देर मुझे देखता रहा। फिर उसने नज़रें फेर लीं और गुड्डी की स्लेट उठा ली। उस पर अब भी १ से १० तक लिखा था, और दस के बाद वही मिटे-मिटे धब्बे।
"जानता है, विक्की," उसने स्लेट को देखते हुए कहा, "जब मैं छोटा था, मुझे गिनती से नफ़रत थी। मास्टर जी पहाड़े रटवाते थे, और मैं हमेशा अटक जाता था। तू हमेशा पूरे सुना देता था। बिना रुके। मुझे बहुत जलन होती थी तुझसे।"
उसने अपने पत्थर वाले हाथ की तरफ़ देखा।
"अब सोचता हूँ, काश मुझे कभी गिनती आती ही नहीं।"
उसकी आवाज़ में कुछ ऐसा था जो माफ़ी जैसा लगता था। पर उसने माफ़ी नहीं माँगी। और मैंने पूछा नहीं कि किस बात की।
लालटेन की लौ हल्के से काँपी। बाहर कहीं एक उल्लू बोला। और हम दोनों चुपचाप उस रात का इंतज़ार करते रहे, जो हम दोनों को एक-दूसरे से थोड़ा और दूर ले जाने वाली थी।
दो बजकर सैंतालीस।
घुँघरू बजा। लौ नीली हुई।
और इस बार कुछ अलग हुआ।
गुड्डी नींद में रोने लगी। आँखें बंद। बहुत धीमे। एक पाँच साल की बच्ची का रोना, जो किसी बुरे सपने में फँसी हो।
"नहीं दीदी... नहीं... पापा को नहीं... मैं सीख लूँगी... मैं ग्यारह सीख लूँगी... पापा को नहीं..."
और दरवाज़े के बाहर से, उसकी आवाज़ आई। ठंडी। कठोर। पहली बार उसमें कोई मिठास नहीं थी।
"बहुत देर हो गई, गुड्डी। मैंने कहा था।"
सूरज अपनी जगह पर जमा था। पर मैंने देखा — उसके होंठ हिलने लगे। अपने आप। बिना उसकी मर्ज़ी के।
"छब्बीस," उसके मुँह से निकला।
और तुरंत, बिना रुके —
"सत्ताईस।"
दो। एक रात में दो।
गुड्डी की चीख़ कमरे में गूँजी — और उसकी बाँह का कड़ा चमका, एक पल के लिए, तेज़ सफ़ेद रोशनी में — पर उससे कुछ नहीं रुका। कड़ा गुड्डी को बचा सकता था। उसके पापा को नहीं।
सूरज ग़ायब हो गया।
और फिर मैं।
ग्यारहवीं सीढ़ी।
पानी। अँधेरा। मेरे फेफड़ों में ठंडी शांति।
मैंने दोनों आँखें बंद रखीं। मैं नीचे नहीं देखना चाहता था। आज नहीं।
पर मेरी बाईं आँख — बंद होने के बावजूद — देख रही थी।
पलक के पीछे से। जैसे पलक पारदर्शी हो गई हो। पानी की आँख पानी में सब देखती है। बंद हो या खुली।
और उसने मुझे दिखाया।
बावड़ी का पानी हिला। रंग बदले। वही डार्करूम वाला जादू। वही डेवलप होती फ़ोटो।
पानी हल्का होने लगा। नीचे उतरने लगा। मेरे सिर से नीचे। कंधों से। कमर से। घुटनों से। जैसे कोई बावड़ी को ख़ाली कर रहा हो — नहीं। जैसे मैं किसी ऐसे वक़्त में देख रहा था जब बावड़ी में पानी कम था। बहुत कम।
धूप। ऊपर से। तेज़। दोपहर की।
बावड़ी खुली थी। न टीन, न ज़ंजीर। बस एक टूटा हुआ लकड़ी का दरवाज़ा, ऊपर मुंडेर पर।
2009।
और ऊपर से, मुंडेर पर से, एक आवाज़ आ रही थी। एक बच्चे की। धीमी। गहरी। जैसे कुएँ के अंदर से बोल रहा हो।
"...दस... ग्यारह..."
मैंने ऊपर देखा — बाईं आँख से, बंद पलक के पीछे से।
मुंडेर पर बारह साल का मैं खड़ा था। आँखें बंद। हाथ अपने बगल में। मुस्कुराता हुआ। वो मुस्कान जो मैंने उस वीडियो में देखी थी — छोटू वाली। होंठ का एक कोना ऊपर, एक नीचे।
और उसके पीछे कोई नहीं था।
मुंडेर पर वो अकेला था।
फिर मेरे बगल से कोई गुज़रा। ग्यारहवीं सीढ़ी पर। नीचे उतरता हुआ। नीली कमीज़।
छोटू। पारदर्शी। धुँधला। हँसता हुआ — पर उसकी हँसी में अब डर घुलने लगा था। उसके पैर ठंडे पत्थर पर पड़ रहे थे, और वो बार-बार ऊपर देख रहा था, मुंडेर की तरफ़, जैसे पूछ रहा हो कि कब रुकना है।
और उसके ठीक पीछे, उसकी पीठ के बहुत पास — सूरज।
गोल चेहरा। घुँघराले बाल। कलाई पर ताँबे का सूरज। उसका हाथ छोटू के कंधे पर था। हल्के से। दोस्ताना। पर लगातार। आगे की तरफ़।
वो भी मेरे आर-पार से गुज़रे। ग्यारहवीं से बारहवीं पर।
और तब सूरज ने छोटू के कान में फुसफुसाया — मुझे साफ़ सुनाई दिया, पानी की याद में, सत्रह साल पुरानी फुसफुसाहट:
"आगे चल, छोटू। डर मत। दीदी ने कहा है सिक्का उन्नीसवीं पर है। बस उन्नीस तक चलना है।"
छोटू ने ऊपर देखा। मुंडेर की तरफ़। "विक्की रुकने को कहेगा तो?"
सूरज ने भी ऊपर देखा। बारह साल के मैं की तरफ़, जो आँखें बंद किए, मुस्कुराता हुआ, गिन रहा था।
"विक्की नहीं रुकेगा," सूरज ने कहा। "दीदी ने उसकी आवाज़ ले ली है। देख, वो अब वो नहीं गिन रहा। वो गिन रही है।"
उन दोनों की परछाइयाँ नीचे उतरती गईं। बारहवीं। तेरहवीं। धूप से निकलकर छाँव में। छाँव से अँधेरे में।
और ऊपर से वो आवाज़ आती रही। मेरी। पर मेरी नहीं।
"...बारह... तेरह..."
याद धुल गई। पानी वापस आया। ठंडा। काला। मेरे सिर के ऊपर तक।
मैं ग्यारहवीं सीढ़ी पर खड़ा था, और रो रहा था — पानी में रोने का कोई मतलब नहीं होता, आँसू कहीं जाते नहीं — और मेरे अंदर एक सवाल घूम रहा था, एक ज़हरीली मछली की तरह।
अगर उस दिन गिनती मैं नहीं कर रहा था — अगर वो मेरी आवाज़ में गिन रही थी — और सूरज छोटू को नीचे ले जा रहा था, उसके कंधे पर हाथ रखकर...
तो मैं उन्नीसवीं सीढ़ी पर कैसे पहुँचा? मेरी हथेलियाँ छोटू पर कैसे थीं? और तस्वीर में, मुंडेर पर, मेरी पीठ पर सूरज का हाथ कैसे था, जब सूरज नीचे था?
कुछ मेल नहीं खा रहा था। याद के टुकड़े एक-दूसरे पर चढ़े थे, उल्टे-सीधे, जैसे किसी ने पुरानी फ़ोटो को फाड़कर ग़लत तरह से जोड़ दिया हो।
और मेरे कान के पास, पानी में, उसकी हँसी आई। बहुत धीमी।
"याद पानी जैसी होती है, रमेसर के पोते। जिस बर्तन में डालो, उसी का आकार ले लेती है।"
मैंने बाएँ हाथ से दीवार पकड़ी और ऊपर चढ़ा।
सूरज सुबह सात बजे निकला।
सत्ताईसवीं से। वो इतनी देर से निकला कि मुझे लगा वो नहीं निकलेगा। अम्मा और मैं मुंडेर पर बैठे रहे, और हर मिनट के साथ मेरा डर बढ़ता गया।
फिर पानी हिला। और एक हाथ मुंडेर के किनारे पर आया। उसका दायाँ हाथ। काले धागे वाला।
मैंने उसे खींचा।
उसका बायाँ हाथ अब पूरी तरह पत्थर था। कंधे तक। और पत्थर उसके कंधे से आगे बढ़ रहा था — उसकी गर्दन की तरफ़। मैंने देखा, उसकी गर्दन के बाईं तरफ़, कॉलरबोन के ऊपर, चमड़ी भूरी-हरी हो रही थी। खुरदुरी। उसमें बारीक दरारें।
उसके बालों की सफ़ेद लट अब चौड़ी हो गई थी। उसके आधे सिर पर।
वो हाँफता रहा। खाँसता रहा। हरा पानी उगलता रहा। और फिर, जब वो बोल पाया, उसने बस इतना कहा:
"दो। उसने एक रात में दो ले लीं।"
"मुझे पता है।"
"अगर हर रात दो... तो..." उसने हिसाब लगाने की कोशिश की, और रुक गया। उसकी आँखें भर आईं। "विक्की, मेरे पास बहुत कम रातें हैं।"
मैंने उसके कंधे पर हाथ रखा। उसके अच्छे वाले कंधे पर। और मैंने उसकी आँखों में देखा — इस आदमी की, जिसने शायद सत्रह साल पहले मेरे सबसे अच्छे दोस्त को नीचे भेजा था, अपनी माँ के लिए — और मुझे उससे नफ़रत नहीं हुई।
मुझे बस बहुत दुख हुआ। दोनों के लिए।
हम अम्मा के घर लौटे। गुड्डी जाग गई थी। वो अपने पापा से लिपट गई और रोती रही — उसे पता था, कैसे पता था मुझे नहीं पता, कि रात को क्या हुआ।
सूरज की माँ आँगन में आईं। हाथ में चाय की केतली। चुपचाप। उन्होंने सूरज के पत्थर वाले कंधे को देखा, और उनका चेहरा एक पल के लिए ऐसे सिकुड़ा जैसे किसी ने उन्हें चाकू मारा हो। फिर उन्होंने ख़ुद को सँभाला और गिलासों में चाय डालने लगीं।
मैंने उन्हें देखा। पता नहीं क्यों — शायद आदत पड़ गई थी — मैंने अपनी दाईं आँख बंद की। और बाईं से देखा।
सूरज की माँ के पैर से एक धागा बँधा था। काला। पतला। बाक़ी गाँव वालों की तरह। आँगन से बाहर, गली में, पीपल की तरफ़।
पर वो धागा अलग था।
वो धड़क रहा था। चाचा वाले की तरह नहीं — कमज़ोर, थका हुआ — बल्कि तेज़। लगातार। जैसे कोई नस, जिसमें से कुछ बह रहा हो। बावड़ी की तरफ़ से। उनकी तरफ़।
और उनकी छाती।
बाईं आँख में, उनकी साड़ी के नीचे, उनकी छाती के अंदर, मुझे कुछ दिखा। एक गहरा, हरा-काला धब्बा। जैसे उनके फेफड़े पानी से भरे हों। वही पानी। और वो पानी हिल रहा था। हर साँस के साथ। उनके फेफड़े हवा से नहीं, उस पानी से साँस ले रहे थे।
बावड़ी का पानी।
जो सत्रह साल से उस धागे के रास्ते उनके अंदर बह रहा था। उन्हें ज़िंदा रखता हुआ।
तभी उन्हें खाँसी आई। छोटी-सी। उन्होंने मुँह पर हथेली रखी। और जब हथेली हटाई, तो उस पर कुछ था — मैंने देखा, उन्होंने जल्दी से उसे अपने पल्लू में पोंछ लिया — हरे पानी की दो बूँदें।
उन्होंने ऊपर देखा। और उनकी नज़र मेरी नज़र से मिली। मेरी बाईं आँख से।
और उन्होंने मुझे पहचाना। मैंने उनके चेहरे पर देखा — उन्हें पता चल गया था कि मैं क्या देख रहा हूँ।
उन्होंने चाय का गिलास मेरी तरफ़ बढ़ाया। उनका हाथ बिल्कुल स्थिर था।
"सत्रह बरस पहले भी तू ऐसे ही देखता था, विक्की," उन्होंने बहुत धीमे कहा। इतना धीमे कि सिर्फ़ मैं सुन सकूँ। "जैसे सब जानता हो। और कुछ नहीं कहता था।"
उन्होंने गिलास मेरे हाथ में रखा।
"अब भी मत कहना, बेटा। कुछ सच ऐसे होते हैं जो बस ज़िंदा रहने के लिए चुप रहते हैं।"
वो मुड़ीं और रसोई में चली गईं।
मैं चाय का गिलास हाथ में लिए खड़ा रहा।
और तब मुझे वो बात समझ आई जो पूरी रात, पूरी सुबह, मेरे अंदर घूम रही थी और जिसे मैं शब्दों में नहीं ढाल पा रहा था।
अगर मैं चालीसवीं तक पहुँचा — अगर मैंने उस शिलालेख पर उसका नाम पढ़ा — अगर मैंने बावड़ी को बाँधा नहीं, बंद कर दिया, हमेशा के लिए —
तो वो धागा टूट जाएगा।
वो पानी, जो सत्रह साल से उस धागे के रास्ते सूरज की माँ के फेफड़ों में बह रहा था, रुक जाएगा।
और सूरज की माँ मर जाएगी।
मैंने सूरज की तरफ़ देखा।
वो गुड्डी को गोद में लिए बैठा था। उसके पत्थर वाले कंधे पर गुड्डी का सिर टिका था। और वो मुझे देख रहा था। अपनी अच्छी आँख से। बहुत ध्यान से। जैसे जानना चाहता हो कि मैंने क्या देखा।
और उस आँख में मैंने वही देखा, जो सत्रह साल पहले, एक सूखे कुएँ के किनारे, एक बारह साल के मोटे-से लड़के की आँख में रहा होगा।
एक बेटे का सौदा।
जो अब भी चल रहा था।
भाग 11 समाप्त।
अगले भाग में — "बारहवीं सीढ़ी": छोटू की माँ, जो सत्रह साल से हर शाम दरवाज़े पर खड़ी होकर बेटे को पुकारती है, विक्रम को अपने घर बुलाती है। उसके पास एक चिट्ठी है — जो कन्हैया ने गायब होने से एक रात पहले लिखी थी। और उसमें एक नाम है, जो विक्रम ने सोचा भी नहीं था...
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