Pretika › Real Experiences › भानपुरा की बावड़ी - चालीस सीढ़ियाँ
भाग 12 — बारहवीं सीढ़ी
Piyashi Atma · Real Experiences · 20 मिनट
- Writer
- Piyashi Atma
- Story
- भानपुरा की बावड़ी - चालीस सीढ़ियाँ
- Chapter
- 12 of 31
- Category
- Real Experiences
- Reading time
- 20 min
- Words
- 3982
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
चिट्ठियाँ वक़्त की बोतल में बंद आवाज़ें होती हैं।
कोई उन्हें लिखता है, एक ख़ास पल में, एक ख़ास डर या उम्मीद के साथ — और फिर बोतल बंद हो जाती है। लिखने वाला आगे बढ़ जाता है। बड़ा होता है। बदल जाता है। या कहीं चला जाता है, हमेशा के लिए।
पर चिट्ठी वहीं रहती है। उसी पल में। उसी उम्र में। उसी डर में।
और जिस दिन कोई उसे खोलता है, वो आवाज़ फिर से बोलती है। बिल्कुल वैसे ही, जैसे उस दिन बोली थी।
उस बारहवें दिन, मैंने एक ऐसी बोतल खोली।
उसमें एक बारह साल के बच्चे की आवाज़ थी। जो सत्रह साल से किसी का इंतज़ार कर रही थी।
मेरा।
सुबह नौ बजे एक लड़का मेरे दरवाज़े पर आया। दस-ग्यारह साल का। नंगे पैर। हाथ में एक गुड़ की डली, जो उसने शायद रास्ते में इनाम की तरह पाई थी।
"सुशीला ताई ने बुलाया है," उसने कहा। "आपको। अभी।"
सुशीला ताई। मामी। छोटू की माँ।
मैं कुछ देर तक दरवाज़े पर खड़ा रहा। लड़का मुझे अजीब नज़रों से देखता रहा, फिर गुड़ चूसता हुआ भाग गया।
कल शाम मैं उनके दरवाज़े से गुज़रा था। मैंने उन्हें बाईं आँख से देखा था — छह हज़ार शामें, एक-दूसरे पर चढ़ी हुईं। और मैं भाग आया था। बिना कुछ कहे।
उन्होंने मुझे देख लिया था।
मामी का घर गाँव के पूर्वी छोर पर था, जहाँ से खेत शुरू होते थे। एक मंज़िला, कच्चा-पक्का। आँगन में एक सूखा अमरूद का पेड़। दरवाज़े पर कोई नींबू-मिर्च नहीं, कोई काला धागा नहीं। बाक़ी गाँव ने अपने दरवाज़े बाँध रखे थे। इस दरवाज़े पर कुछ नहीं था।
जैसे यहाँ रहने वाले को अब किसी चीज़ से बचने की ज़रूरत न रही हो।
मैंने दस्तक दी।
"खुला है," अंदर से आवाज़ आई।
मैं अंदर गया।
आँगन साफ़ था। बहुत साफ़। गोबर से लिपा हुआ, जैसे आज सुबह ही लीपा गया हो। तुलसी के चौरे पर एक दीया जल रहा था। और आँगन के बीच में, एक चटाई पर, दो थालियाँ रखी थीं।
एक में खाना था। दाल, रोटी, आलू की सब्ज़ी। ढका हुआ।
दूसरी ख़ाली थी।
मामी रसोई के दरवाज़े पर खड़ी थीं। सफ़ेद बाल, बिखरे हुए। वही फीकी साड़ी। उन्होंने मुझे देखा — बहुत देर तक, ऊपर से नीचे — और फिर उनके चेहरे पर कुछ ऐसा आया, जिसे मैं मुस्कान नहीं कह सकता, पर जो मुस्कान के सबसे क़रीब था जो उस चेहरे पर सत्रह साल में आया होगा।
"बड़ा हो गया तू, विक्की।"
मेरे गले में कुछ अटक गया।
"बैठ।" उन्होंने ख़ाली थाली की तरफ़ इशारा किया। "खाना खाएगा?"
"ये थाली..."
"कन्हैया की है," उन्होंने बहुत सहज ढंग से कहा। जैसे कोई मौसम की बात कर रहा हो। "रोज़ लगाती हूँ। सुबह-शाम। सत्रह बरस से। पता नहीं कब भूखा लौट आए।" उन्होंने ढकी हुई थाली की तरफ़ देखा। "पर वो कभी नहीं खाता। मैं शाम को उठाकर गाय को दे देती हूँ।"
मैं वहीं ज़मीन पर बैठ गया। चटाई के किनारे। ख़ाली थाली के बगल में।
और रोने लगा।
मुझे नहीं पता मैं कितनी देर रोया।
सत्रह साल का रोना था। जो उस बुख़ार के बाद से कहीं अटका पड़ा था। जो दादाजी की मौत की ख़बर पर भी नहीं निकला था। जो दस रातों के डर में भी नहीं निकला था।
मामी मेरे पास आईं। ज़मीन पर बैठीं। और मेरे सिर पर हाथ रखा। बस रखा। कुछ नहीं कहा।
उनका हाथ गर्म था।
इस गाँव में दस दिन से मैंने जिसे भी छुआ था — चाची, चाचा, सूरज, अम्मा — सबके हाथ ठंडे थे। पानी जैसे ठंडे।
मामी का हाथ गर्म था।
"तू मेरे पास क्यों नहीं आया, विक्की?" उन्होंने आख़िर में धीरे से पूछा। "सत्रह बरस। एक बार भी।"
"मुझमें हिम्मत नहीं थी, मामी।" मेरी आवाज़ टूटी हुई थी। "मुझे लगता था... मुझे लगता था आप मुझसे नफ़रत करती होंगी। मेरी वजह से..."
"तेरी वजह से?" उन्होंने सिर हिलाया। बहुत धीरे। "तू बारह बरस का था, बेटा। कन्हैया भी बारह का था। बच्चे खेलते हैं। बच्चे वहाँ जाते हैं जहाँ मना किया जाता है। नफ़रत किस बात की?"
"आपको नहीं पता उस दिन क्या हुआ था।"
"नहीं पता।" उन्होंने मेरा चेहरा अपनी हथेलियों में लिया और ऊपर उठाया। उनकी आँखें सूखी थीं। सत्रह साल में शायद सारे आँसू ख़त्म हो गए थे। "और तुझे भी नहीं पता। रमेसर भैया ने बताया था — तुझे कुछ याद नहीं। बुख़ार ने सब ले लिया।" उनकी आवाज़ में कोई शिकायत नहीं थी। "तो नफ़रत किससे करूँ? एक बुख़ार से?"
"फिर आपने मुझे आज क्यों बुलाया?"
मामी ने मेरा चेहरा छोड़ा। उठीं। और अंदर चली गईं।
जब वो लौटीं, तो उनके हाथ में एक चीज़ थी।
एक पुराना स्कूल बैग। नीला। प्लास्टिक का। जिस पर एक कार्टून बना था जिसका रंग उखड़ चुका था। उसकी ज़िप टूटी हुई थी।
"कन्हैया का बस्ता," उन्होंने कहा। "उसके जाने के एक हफ़्ते बाद मैंने इसे खोला था। उसकी किताबें। उसकी पेंसिलें। उसके बनाए हुए चित्र।" उन्होंने बैग मेरी गोद में रखा। "और ये।"
उन्होंने बैग की अंदर वाली जेब खोली। और एक काग़ज़ निकाला।
एक कॉपी का पन्ना। चार तह में मुड़ा हुआ। पीला पड़ चुका। किनारे घिसे हुए — जैसे किसी ने उसे सालों तक बार-बार खोला और बंद किया हो।
और उस पर, बाहर की तरफ़, पेंसिल से, टेढ़े-मेढ़े बच्चों वाले अक्षरों में लिखा था:
"सिर्फ़ विक्की भैया के लिए। कोई और मत पढ़ना। मम्मी भी नहीं।"
"मैंने नहीं पढ़ी," मामी ने कहा।
मैंने उनकी तरफ़ देखा। अविश्वास से।
"सत्रह बरस," उन्होंने कहा, "ये मेरे पास रही। हर रात मैंने इसे निकाला। खोलने की सोची। उसकी लिखावट को छुआ। पर कभी पढ़ा नहीं।" उन्होंने पन्ने के बाहर लिखे अक्षरों को उँगली से छुआ। मम्मी भी नहीं। "मेरे बेटे ने आख़िरी बार मुझसे कुछ माँगा था। यही। कि मैं ये न पढ़ूँ। तो मैंने नहीं पढ़ी।"
"आपने दादाजी को भी नहीं दिखाई?"
"रमेसर भैया हर हफ़्ते आते थे। सत्रह बरस। इसी आँगन में बैठते थे। रोते थे। माफ़ी माँगते थे — किस बात की, कभी नहीं बताया।" उन्होंने सिर हिलाया। "उन्होंने कई बार पूछा था कि कन्हैया ने कुछ छोड़ा था क्या। मैंने हर बार मना कर दिया। ये उनके लिए नहीं थी।"
उन्होंने पन्ना मेरे हाथ में रखा। मेरी उँगलियाँ काँप रही थीं।
"ये तेरे लिए है, विक्की। मैं बस इसकी रखवाली कर रही थी।"
वो उठीं और रसोई में चली गईं। मुझे अकेला छोड़कर। कन्हैया की ख़ाली थाली के बगल में।
मैंने पन्ना खोला।
विक्की भैया,
अगर तुम ये पढ़ रहे हो तो मैं वापस नहीं आया। मम्मी से कहना रोए नहीं। और मेरी गुल्लक में सत्तर रुपये हैं, वो मम्मी को दे देना।
मुझे तुमसे एक बात बतानी है जो मैंने नहीं बताई। तुम गुस्सा मत होना।
मैं जानता हूँ बावड़ी वाली दीदी अच्छी नहीं है। मुझे पता है। पहले दिन से। उसकी आवाज़ मीठी है पर उसके हाथ बहुत ठंडे हैं और उसकी उँगलियाँ बहुत लंबी हैं। मैंने देखा है खिड़की से।
पर उसने कहा है कि अगर मैं उन्नीस तक जाऊँगा तो दो लोगों की इच्छा पूरी होगी। सूरज की मम्मी ठीक हो जाएँगी। तुम्हें पता है न वो बहुत बीमार हैं। सूरज रात को रोता है। मैंने सुना है।
और दूसरी इच्छा प्यारी दादी की। दीदी ने कहा कि अगर मैं नीचे जाऊँगा तो देवदत्त भैया ऊपर आ जाएँगे। प्यारी दादी के देवदत्त भैया जो बहुत पहले गिर गए थे। प्यारी दादी उनके लिए बहुत रोती हैं। मैंने देखा है।
प्यारी दादी ने ही मुझे पहली बार बताया था कि रात को खिड़की पर कोई आता है। उन्होंने कहा था अगर वो आए तो उससे बात करना। पूछना कि देवदत्त कैसा है। तो मैंने पूछा। और दीदी ने बताया।
मैं ये सब इसलिए कर रहा हूँ क्योंकि मैं चाहता हूँ। कोई मुझे जबरदस्ती नहीं भेज रहा। सच्ची।
तुम्हें इसलिए नहीं बताया क्योंकि तुम रोक लेते। तुम हमेशा रोक लेते हो। तुम बहुत डरपोक हो भैया। पर अच्छे वाले डरपोक।
दीदी ने कहा है कि कल तुम ऊपर से गिनोगे। अगर तुम बीच में मेरा हाथ पकड़ने नीचे आए तो मुझे तुम्हें धक्का देकर छुड़ाना पड़ेगा। सॉरी पहले से बोल रहा हूँ। तुम गिर मत जाना।
और एक बात। अगर कभी तुम्हें लगे कि तुमने मुझे धक्का दिया, तो ये याद रखना कि मैंने तुम्हें पहले धक्का दिया था। ठीक है?
तुम्हारा भाई, कन्हैया (छोटू)
पी.एस. — मेरी नीली कमीज़ की जेब फट गई है। मम्मी को मत बताना। वो डाँटेंगी।
मैंने पन्ना नीचे रखा।
मेरे हाथ इतने काँप रहे थे कि मुझे उसे अपने घुटने पर दबाना पड़ा।
मैंने तुम्हें पहले धक्का दिया था।
आईने ने कहा था — तूने उसे धक्का दिया। गुड्डी ने नींद में कहा था। मेरी वो धुँधली याद — मेरी हथेलियाँ उस पर, दबाव आगे की तरफ़।
और छोटू ने, सत्रह साल पहले, एक रात पहले, पेंसिल से लिखा था — अगर कभी लगे कि तुमने मुझे धक्का दिया, तो याद रखना कि मैंने पहले दिया था।
वो जानता था। एक बारह साल का बच्चा। वो जानता था कि मैं ये बोझ उठाऊँगा। और उसने पहले से उसे मेरे कंधे से उतारने की कोशिश की थी।
मैंने चिट्ठी को फिर से पढ़ा। फिर से। हर बार कोई नई पंक्ति मेरे सीने में धँसती।
सूरज रात को रोता है। मैंने सुना है।
वो सूरज के लिए जा रहा था। उस सूरज के लिए, जो उसके कंधे पर हाथ रखकर उसे नीचे ले गया था। शायद सूरज को भी नहीं पता था कि छोटू जानता था। शायद दोनों एक-दूसरे को बचाने की कोशिश में एक-दूसरे को उसी अँधेरे में ले गए थे।
बच्चे। तीन बच्चे। और पानी में एक आवाज़, जिसने हर एक को अलग कहानी सुनाई थी। हर एक को यक़ीन दिलाया था कि फ़ैसला उसका है।
और हर एक ने सत्रह साल तक उस फ़ैसले का बोझ अकेले उठाया था।
और फिर वो नाम।
प्यारी दादी।
रामप्यारी अम्मा। जिन्होंने दस दिन से मेरा हाथ पकड़ रखा था। जिन्होंने अपनी दोनों आँखें खो दी थीं। जो हर सुबह बावड़ी की मुंडेर पर बैठकर मेरा इंतज़ार करती थीं।
प्यारी दादी ने ही मुझे पहली बार बताया था कि रात को खिड़की पर कोई आता है। उन्होंने कहा था — उससे बात करना।
मैंने अपनी दाईं आँख बंद की।
मुझे पता था मुझे ऐसा नहीं करना चाहिए। अम्मा ने कहा था — जितना देखेगा, उतना खोएगा। कल रात के बाद मेरी बाईं आँख का घेरा और बढ़ गया था। किनारों पर अब सब कुछ धुँधला था, हमेशा।
पर मुझे जानना था।
मैं उठा। घर के अंदर गया। मामी रसोई में थीं — उन्होंने मुझे जाते देखा, कुछ नहीं कहा।
एक छोटा कमरा। कन्हैया का। मुझे पता था, बिना बताए।
वो बिल्कुल वैसा ही था। एक खाट, जिस पर एक पुरानी चादर बिछी थी, सिलवटें ठीक की हुईं। दीवार पर सचिन तेंदुलकर का एक पोस्टर, जिसके कोने मुड़ गए थे। एक लकड़ी का बक्सा, जिस पर कंचे रखे थे। और एक छोटी-सी खिड़की, लकड़ी की, जिसके बाहर अमरूद का सूखा पेड़ था।
मैंने बाईं आँख से देखा।
रंग बदले। डार्करूम। डेवलप होती फ़ोटो।
रात। लालटेन की पीली रोशनी। खाट पर एक बच्चा बैठा था। नीली कमीज़। घुटनों पर एक कॉपी। हाथ में पेंसिल। जीभ होंठों के कोने में दबी हुई, ध्यान से। वो लिख रहा था। रुक-रुककर। कभी मिटाता। कभी सोचता।
छोटू। अपनी आख़िरी रात।
और खिड़की पर कोई खड़ा था।
बाहर। अँधेरे में। खिड़की की चौखट से सिर्फ़ चेहरा और कंधे दिख रहे थे। एक औरत। बूढ़ी। सफ़ेद धोती। सिर पर पल्लू।
उसकी बाईं आँख सफ़ेद थी। दाईं काली।
2009 की रामप्यारी अम्मा। तिरेसठ बरस की।
वो कुछ कह रही थीं। बहुत धीमे। छोटू ने सिर उठाया। उनकी तरफ़ देखा। सिर हिलाया। और फिर लिखने लगा।
मैंने सुनने की कोशिश की। पास गया। खिड़की के बिल्कुल पास।
पर आवाज़ नहीं आई। सिर्फ़ उनके होंठ हिलते दिखे। पानी ने तस्वीर याद रखी थी। आवाज़ नहीं।
मैंने उनके चेहरे को ध्यान से देखा। वही झुर्रियाँ। वही तीखी काली आँख। वही पल्लू।
फिर मैंने नीचे देखा। खिड़की की चौखट के नीचे। जहाँ उनका शरीर दीवार के पीछे छुपा था।
मुझे कुछ नहीं दिखा। दीवार थी। सिर्फ़ दीवार।
पर खिड़की की चौखट पर, उनके हाथ के पास, जहाँ उन्होंने उसे पकड़ रखा था — लकड़ी गीली थी। और उस गीलेपन में से, चौखट के किनारे से नीचे लटकता हुआ, एक पतला, काला धागा था।
धागा? या बाल?
मैं नहीं कह सकता था। याद धुँधली होने लगी।
और आख़िरी पल में — रंग धुलने से ठीक पहले — खिड़की वाली औरत ने अपना सिर घुमाया। छोटू से हटाकर। कमरे के उस कोने की तरफ़ जहाँ मैं खड़ा था। सत्रह साल बाद।
और मुस्कुराई।
जब मेरी आँख फिर से सामान्य हुई — या जितनी सामान्य अब हो सकती थी — मैं उस छोटे कमरे में अकेला खड़ा था। लालटेन नहीं। रात नहीं। बस दोपहर की धूप, जो खिड़की से अंदर आकर खाट पर पड़ रही थी।
खिड़की की चौखट सूखी थी।
मैं लकड़ी के बक्से के पास गया। कंचों के बगल में एक मिट्टी की गुल्लक रखी थी। हाथी की शक्ल की। उसकी सूँड टूटी हुई थी। मैंने उसे उठाया। भारी थी।
मेरी गुल्लक में सत्तर रुपये हैं, वो मम्मी को दे देना।
सत्रह साल। मामी ने उसे तोड़ा नहीं था। शायद उन्हें पता भी नहीं था कि उसमें कुछ है। शायद पता था, और उनमें हिम्मत नहीं थी।
मैंने उसे हिलाया। सिक्कों की खनक आई।
और उस खनक में एक अलग आवाज़ थी। भारी। धीमी। जैसे कोई बड़ा, पुराना सिक्का बाक़ियों से टकरा रहा हो।
मैंने गुल्लक को उल्टा किया और उसके पेट में बने छोटे-से छेद को धूप की तरफ़ किया। अंदर झाँका।
एक-एक, दो-दो रुपये के सिक्के। कुछ मुड़े हुए नोट। और उन सबके बीच, एक सिक्का जो बाक़ियों जैसा नहीं था।
बड़ा। काला पड़ा हुआ। गोल, पर पूरी तरह नहीं — किनारे थोड़े घिसे हुए, जैसे हाथ से ढाला गया हो। और उस पर, बहुत धुँधला, किसी राजा का चेहरा।
चाँदी का सिक्का। राजा के ज़माने का।
वही, जो देवदत्त की मुट्ठी से पानी में लुढ़ककर अम्मा के पैरों तक आया था। वही, जिसके लिए अट्ठावन में एक लड़का नीचे उतरा था, और 2009 में दूसरा।
वो पहले से छोटू की गुल्लक में था।
उसने नीचे उतरने से पहले ही उसे पा लिया था। या किसी ने उसे दे दिया था। चारे की तरह। पहले दिखाया जाता है, फिर माँगा जाता है।
मैंने गुल्लक वापस बक्से पर रख दी। उसे तोड़ा नहीं। वो सत्तर रुपये मामी के थे। और वो सिक्का...
वो सिक्का किसी का नहीं था। वो बस एक वादा था, जो हर सत्रह साल में किसी नए बच्चे की गुल्लक में पहुँच जाता था।
मैं मामी के घर से निकला तो दोपहर हो चुकी थी।
दरवाज़े पर मामी ने मेरा हाथ पकड़ा। उनका गर्म हाथ।
"उसमें क्या लिखा था, विक्की?"
मैंने उनकी तरफ़ देखा। उनकी सूखी आँखों की तरफ़। उस चेहरे की तरफ़ जिसने सत्रह साल से अपने बेटे की आख़िरी माँग का मान रखा था।
"उसने लिखा है कि आप रोएँ नहीं," मैंने कहा। "और कि उसकी गुल्लक में सत्तर रुपये हैं, वो आपके लिए हैं।"
मामी का होंठ काँपा। एक बार।
"और लिखा है कि उसकी नीली कमीज़ की जेब फट गई थी। और आप उसे डाँटना मत।"
और तब — सत्रह साल बाद पहली बार, शायद — मामी रोईं।
मैं उन्हें पकड़े खड़ा रहा। चौखट पर। बहुत देर तक।
"एक बात और, मामी," मैंने आख़िर में कहा। "वो कभी आपके दरवाज़े पर आता है? रात को? सबके पास आता है — गुड्डी के पास, सूरज के पास, मेरे पास..."
मामी ने मुझसे अलग होकर अपनी आँखें पोंछीं।
"कभी नहीं," उन्होंने कहा। "सत्रह बरस। एक बार भी नहीं। पूरे गाँव के दरवाज़े खटखटाता है। मेरा नहीं।" उन्होंने अपने दरवाज़े की तरफ़ देखा। बिना किसी धागे के। बिना किसी नींबू-मिर्च के। "इसीलिए मैंने कुछ नहीं बाँधा। ताकि अगर वो आए, तो उसे कुछ रोके नहीं।"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।
"शायद वो मुझसे नाराज़ है। या शायद..." उनकी आवाज़ धीमी हो गई, "...शायद वो जानता है कि अगर वो मेरे दरवाज़े पर आया, तो मैं खोल दूँगी। और मैं उसके साथ चली जाऊँगी। बिना एक पल सोचे।"
मैं सीधे रामप्यारी अम्मा के घर गया।
वो आँगन में बैठी थीं। अब भी लाल चुनरी में — उन्होंने उसे उतारा नहीं था, उस शाम के बाद से। एक घुँघरू वाली पायल उनकी उँगलियों में घूम रही थी।
"आ गया, बच्चा?" उन्होंने कहा। "तेरे धागे में आज कुछ भारी बँधा है।"
मैं उनके सामने बैठ गया। चिट्ठी मेरी जेब में थी। मेरी बाईं मुट्ठी में घुँघरू — चुप।
"अम्मा," मैंने बहुत धीरे से कहा, "2009 में... आप छोटू से मिली थीं? उसके जाने से पहले?"
अम्मा की उँगलियाँ रुक गईं। पायल उनकी हथेली में ठहर गई।
बहुत देर तक आँगन में कोई आवाज़ नहीं थी। एक गिलहरी दीवार पर दौड़ी, रुकी, हमें देखा, और भाग गई।
"हाँ," अम्मा ने आख़िर में कहा।
"आपने उसे क्या बताया था?"
"वही जो मैं सबको बताती हूँ। सत्रहवें बरस में।" उनकी आवाज़ बिल्कुल स्थिर थी। "कि रात को खिड़की पर कोई आता है। उससे बात मत करना।"
"उसने लिखा है कि आपने कहा था — उससे बात करना।"
अम्मा ने अपना चेहरा मेरी तरफ़ घुमाया। सफ़ेद आँखें। थोड़ी बाएँ। पर इस बार उनमें कुछ था। एक दरार।
"उसने ऐसा लिखा है?"
"हाँ।"
वो चुप रहीं। फिर उन्होंने पायल को मुट्ठी में भींच लिया।
"मैंने कहा था," उन्होंने धीरे से कहा, "कि अगर वो आए, तो उससे पूछना देवदत्त कैसा है।" उनकी आवाज़ टूटी। पहली बार। "इक्यावन बरस हो गए थे तब। इक्यावन बरस मैंने नहीं जाना था कि वो ज़िंदा है या मरा, नीचे है या कहीं और। और एक बच्चा था जिससे वो बात करती थी। मैं... मैं बस जानना चाहती थी, विक्की।"
"और उसने बताया?"
"छोटू ने अगली सुबह आकर बताया।" अम्मा की आँखों से — दोनों सफ़ेद आँखों से — पानी बहने लगा। "कहा कि देवदत्त ठीक है। कि वो ऊपर आना चाहता है। कि उसके लिए बस किसी को नीचे जाना होगा।" उन्होंने अपना चेहरा हाथों में छुपा लिया। "मैंने उसे मना किया था, विक्की। मैंने कहा था — नहीं बेटा, कभी नहीं। पर मैंने उससे बात करने को कहा था। मैंने ही रस्सी पकड़ाई थी। और वो रस्सी पकड़कर नीचे चला गया।"
मैं उन्हें देखता रहा। एक अस्सी बरस की अंधी औरत, लाल चुनरी में, जो सत्रह साल से ये बोझ उठाए थी।
और मुझे नहीं पता था कि उन पर भरोसा करूँ या नहीं।
क्योंकि उनकी कहानी सच लग रही थी। पूरी तरह। हर शब्द।
पर सूरज की कहानी भी सच लगी थी। धूप में।
"अगर शक है," अम्मा ने अपना चेहरा उठाकर कहा, "तो वही कर जो मैंने तुझे सिखाया।"
"क्या?"
"पानी में चेहरे झूठ बोलते हैं। हाथ देख।" उन्होंने अपने दोनों हाथ आगे बढ़ाए। हथेलियाँ ऊपर। झुर्रियों से भरी। काँपती हुई। "बाईं आँख से देख। और बता, मेरे हाथ किसे पकड़े हैं।"
मैंने दाईं आँख बंद की।
और देखा।
उनके बाएँ हाथ में कुछ नहीं था। ख़ाली। पर उनके दाएँ हाथ की अनामिका — शादी की अँगूठी वाली उँगली — उस पर एक धागा बँधा था। पारदर्शी। बहुत पतला। चाँदी जैसा चमकता हुआ। और वो धागा आँगन से बाहर जा रहा था। गली में। पीपल की तरफ़। बावड़ी की तरफ़।
और नीचे।
मैं उसे देख नहीं सकता था, पर मुझे पता था वो कहाँ जाता है। चालीसवीं तक। एक पत्थर के लड़के के बाएँ हाथ तक।
"देवदत्त," मैंने धीरे से कहा।
अम्मा ने सिर हिलाया। "अड़सठ बरस से। सगाई के दिन उसकी माँ ने मौली बाँधी थी। हम दोनों की उँगलियों पर। कहा था, अब ये कभी नहीं टूटेगी।" उन्होंने अपनी उँगली को छुआ, जहाँ मुझे धागा दिख रहा था और उन्हें सिर्फ़ महसूस होता होगा। "नहीं टूटी।"
"तो आप चाहती हैं कि वो ऊपर आए।"
"हर पल, बच्चा।" उन्होंने अपना हाथ नीचे कर लिया। "अड़सठ बरस से हर पल। और इसीलिए तुझे मुझ पर पूरा भरोसा नहीं करना चाहिए।"
वो मुस्कुराईं। बहुत थकी हुई मुस्कान।
"क्योंकि उसे ऊपर लाने के लिए किसी को चालीसवीं बनना होगा। और वो तू है।"
उस रात सूरज फिर दो उतरा।
अट्ठाईस। उनतीस।
मैंने उसे गिनते सुना — अम्मा के कमरे में, दो बजकर सैंतालीस पर, उसके जमे हुए होंठों से। और गुड्डी की चीख़ सुनी। और उसके कड़े की चमक देखी, जो उसे तो बचा रही थी पर उसके पापा को नहीं।
और फिर मैं।
बारहवीं सीढ़ी।
मैं जानता था कि आज मैं नीचे नहीं देखूँगा। मेरी बाईं आँख में अब जितनी सफ़ेदी थी, उसके बाद एक और बार देखना शायद उसे पूरी तरह ले लेता।
मैंने दोनों आँखें बंद रखीं। पानी मेरे फेफड़ों में। ठंडा। शांत।
और तब, पानी में, मेरे दाएँ हाथ को किसी ने छुआ।
एक छोटा हाथ। नीचे से। ठंडा। उँगलियाँ मेरी उँगलियों से उलझने की कोशिश करतीं।
"भैया।"
छोटू की आवाज़। बहुत पास। बहुत प्यार भरी।
"भैया, हाथ पकड़ो। सत्रह बरस से इंतज़ार कर रहा हूँ। बस एक बार पकड़ लो। इस बार मैं धक्का नहीं दूँगा। वादा।"
मेरी मुट्ठी अपने आप खुलने लगी। मेरी उँगलियाँ उस छोटे हाथ की तरफ़ बढ़ीं। मेरे अंदर सब कुछ चाहता था उसे पकड़ना। सत्रह साल की माफ़ी। सत्रह साल की अधूरी बात।
ज़ंजीर में वो जगह तेरी है। जवान रघु चाचा ने कहा था। जो किसी का हाथ पकड़ता है, वो उसे हमेशा के लिए थामे रहता है।
मैंने अपनी मुट्ठी भींच ली।
छोटी उँगलियाँ मेरी मुट्ठी पर टटोलती रहीं। उसे खोलने की कोशिश करतीं। एक-एक उँगली पकड़कर मोड़ने की कोशिश करतीं। वो बहुत ताक़तवर थीं। किसी बच्चे की उँगलियों से कहीं ज़्यादा।
फिर वो मेरे बाएँ हाथ पर गईं। मेरी बाईं मुट्ठी पर, जिसमें घुँघरू बंद था।
और घुँघरू पागलों की तरह बजने लगा।
छन-छन-छन-छन-छन—
उँगलियाँ झटके से पीछे हटीं। जैसे जल गई हों।
और एक पल के लिए — पानी में, मेरी बंद पलकों के पीछे, मेरी बाईं आँख ने बिना चाहे देखा — मैंने वो हाथ देखा जो मेरी मुट्ठी से पीछे हट रहा था।
वो छोटा था। एक बच्चे के हाथ जितना।
पर उसकी उँगलियाँ बहुत लंबी थीं। पतली। जोड़ों पर अजीब तरह से मुड़ी हुई। वैसी, जैसी दूसरे दिन डायरी के पन्ने पर हाथ के छापे में थीं।
एक दस्ताना। बच्चे की चमड़ी का। और अंदर से असली उँगलियाँ बाहर झाँकती हुईं।
वो छोटू नहीं था।
मैंने बाएँ हाथ से दीवार पकड़ी और ऊपर चढ़ा।
सूरज उनतीसवीं से निकला।
मैं और अम्मा उसे खींचकर ऊपर लाए। वो बोल नहीं पा रहा था। पत्थर उसकी गर्दन के बाईं तरफ़ से ऊपर चढ़कर उसके जबड़े तक पहुँच गया था। उसके चेहरे का बायाँ हिस्सा — गाल, कान के नीचे — भूरा-हरा, खुरदुरा। जब वो मुँह खोलता, तो उसका जबड़ा आधा ही खुलता।
उसने अपना दायाँ हाथ उठाया। उँगलियों से गिनती बताई। ग्यारह।
ग्यारह रातें बचीं। अगर वो रोज़ एक उतरता। अगर दो... छह रातें।
मैंने उसका हाथ पकड़ा। उसकी कलाई पर वो काला धागा। वो ताँबे का सूरज।
और कुछ नहीं कहा।
घर लौटकर, दादाजी के कमरे में, मैंने छोटू की चिट्ठी फिर से खोली।
मैं उसे बार-बार पढ़ना चाहता था। उसकी लिखावट को छूना चाहता था। उसके टेढ़े अक्षर। उसकी ग़लत मात्राएँ। "तुम बहुत डरपोक हो भैया। पर अच्छे वाले डरपोक।"
मैंने उसे खिड़की की रोशनी में रखा।
और तब मुझे कुछ दिखा जो पहले नहीं दिखा था।
पंक्तियों के बीच। पेंसिल की लिखावट के बीच की ख़ाली जगहों में। बहुत हल्की, जैसे अदृश्य स्याही जो सिर्फ़ किसी ख़ास रोशनी में दिखती हो। मैंने पन्ने को थोड़ा घुमाया।
दाईं आँख से — कुछ नहीं।
बाईं आँख से — अक्षर।
हरे। गीले। चमकते हुए। अभी-अभी लिखे हुए। पर उसी बच्चे की लिखावट में। वही टेढ़े अक्षर। वही ग़लत मात्राएँ।
"विक्की भैया, अगर तुम ये पढ़ रहे हो तो तुम बारहवीं पर पहुँच गए हो।
मैं उन्नीसवीं पर इंतज़ार कर रहा हूँ। सात सीढ़ियाँ और।
जल्दी आना। सूरज भैया के पास ज़्यादा वक़्त नहीं है।
और प्यारी दादी के पास उससे भी कम।"
मेरी साँस रुक गई।
मैंने अपनी बाईं मुट्ठी की तरफ़ देखा। जिसमें घुँघरू बंद था।
वो बज रहा था।
धीरे से। लगातार। छन... छन... छन...
मैंने चिट्ठी को देखा। उन हरे अक्षरों को। उस प्यारी, टेढ़ी-मेढ़ी, बच्चों वाली लिखावट को।
और मुझे समझ आया कि घुँघरू क्यों बज रहा था।
ये आख़िरी पंक्तियाँ छोटू ने नहीं लिखी थीं।
भाग 12 समाप्त।
अगले भाग में — "तेरहवीं सीढ़ी": भानपुरा के बच्चे एक नया खेल खेलने लगते हैं। गलियों में। मंदिर के चबूतरे पर। स्कूल के आँगन में। कोई नहीं जानता उन्हें किसने सिखाया। खेल का नाम है — "सीढ़ी-सीढ़ी"। और उसमें हर बार एक बच्चा आँखें बंद करके गिनता है, और बाक़ी उतरते हैं...
भानपुरा की बावड़ी - चालीस सीढ़ियाँ · सभी भाग →
और कहानियाँ · More stories
- देवभूमि का साया: गढ़वाल की शापित घाटी और डाक-बंगले का रहस्य · Piyashi Atma
- तेरहवीं अमावस · Piyashi Atma
- यक्षिणी: कदंब का श्राप · Piyashi Atma
- Mohabbat ke so imtihan · firoj saifi