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भाग 13 — तेरहवीं सीढ़ी

Piyashi Atma · Real Experiences · 21 मिनट

Writer
Piyashi Atma
Story
भानपुरा की बावड़ी - चालीस सीढ़ियाँ
Chapter
13 of 31
Category
Real Experiences
Reading time
21 min
Words
4021
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

बच्चों के खेल बहुत पुराने होते हैं।

इतने पुराने कि कोई नहीं जानता उन्हें किसने बनाया। "अक्कड़-बक्कड़ बम्बे बो।" "पोशम्पा भाई पोशम्पा।" "कोको कोरिया।" हम उन्हें गाते हैं, हमारे बच्चे गाते हैं, उनके बच्चे गाएँगे। कोई नहीं पूछता कि इन शब्दों का मतलब क्या है।

पर दादी कहती थीं कि हर खेल किसी सच से पैदा होता है। किसी डर से। किसी ऐसी चीज़ से जो बड़ों ने देखी थी और जिसे वो भूल जाना चाहते थे — पर बच्चे नहीं भूले। बच्चों ने उसे गीत बना लिया। खेल बना लिया। और आगे पहुँचा दिया।

"पोशम्पा" में सिपाही बच्चों को पकड़कर जेल ले जाता है। "अक्कड़-बक्कड़" में अंत में कोई "आउट" होता है।

हर खेल में, आख़िर में, कोई न कोई जाता है।

उस तेरहवें दिन, भानपुरा के बच्चों ने एक नया खेल खेलना शुरू किया।

और उसमें भी, आख़िर में, कोई गया।

मैंने उन्हें पहली बार सुबह आठ बजे देखा।

नीम के पेड़ के नीचे वाला नया मंदिर। उसके सामने सात सीढ़ियाँ, पत्थर की, जिन पर बैठकर बूढ़े दोपहर में ताश खेलते थे।

उन सीढ़ियों पर पाँच बच्चे थे।

सबसे ऊपर एक लड़की, सात-आठ साल की, दो चोटियाँ, हरे रंग की फ्रॉक। उसकी आँखें बंद थीं। दोनों हाथ बगल में। और वो गा रही थी — एक धीमी, खिंची हुई धुन में, जैसे कोई लोरी:

"सीढ़ी-सीढ़ी उतरी पनिहारिन, घड़ा लिया सिर पे, पाँव में पायल..."

उसके नीचे चार बच्चे, एक कतार में, एक-दूसरे का हाथ पकड़े। हर पंक्ति के साथ वो एक सीढ़ी नीचे उतरते।

"एक गिनो, दो गिनो, तीन गिनो रे, पानी में बैठी है लाल चुनरिया..."

दो सीढ़ी। तीन सीढ़ी।

"जो भी गिनेगा, वो ही उतरेगा, चालीस पे जाके वो पत्थर बनेगा..."

सबसे नीचे पहुँचकर चारों बच्चे अचानक रुक गए। जम गए। मूर्तियों की तरह। आँखें खुली, पलक नहीं झपकती। और फिर एक साथ, एक सुर में, चिल्लाए:

"पानी आ गया!"

और खिलखिलाकर ज़मीन पर गिर पड़े। हँसते हुए। लोटते हुए।

ऊपर वाली लड़की ने आँखें खोलीं। और वो भी हँसने लगी।

मैं वहीं खड़ा रहा। सड़क पर। मेरे हाथ में दूध की थैली थी जो चाची ने मँगवाई थी। और मेरे घुटने काँप रहे थे।

लाल चुनरिया। चालीस पे जाके वो पत्थर बनेगा।

"ये गीत किसने सिखाया?" मैंने पूछा।

बच्चे चुप हो गए। मुझे देखने लगे। वो मुझे पहचानते थे — पूरा गाँव पहचानता था। रमेसर पंडित का पोता। दिल्ली वाला। जो दस दिन से गाँव में घूम रहा था, जिसकी एक आँख में सफ़ेद घेरा था, और जिसके आने के बाद से गाँव में अजीब बातें हो रही थीं।

हरी फ्रॉक वाली लड़की ने कंधे उचकाए। "पता नहीं। सब जानते हैं।"

"सब?"

"हाँ। कल रात से। मैं सोई, सुबह उठी, तो मुझे याद था। बबलू को भी याद था। पिंकी को भी।" उसने एक लड़के की तरफ़ इशारा किया — आठ-नौ साल का, गोल-मटोल, एक दाँत टूटा हुआ। "बबलू ने बताया कि उसे सपने में किसी ने सिखाया।"

मैं बबलू के सामने घुटनों के बल बैठ गया। "किसने, बबलू?"

बबलू ने शरमाकर नीचे देखा। फिर धीरे से बोला:

"नीली कमीज़ वाले भैया ने। वो सपने में आए थे। हम सबके सपने में। उन्होंने कहा कि ये नया खेल है। सबसे अच्छा खेल।"

"सबके सपने में?"

पाँचों बच्चों ने एक साथ सिर हिलाया।

"और भैया ने कहा," बबलू ने अब थोड़ी हिम्मत से कहा, मुस्कुराते हुए, "कि आप सबसे अच्छे गिनने वाले हो। पूरे गाँव में। कि आप चैंपियन हो। गिनती के।"

हरी फ्रॉक वाली लड़की ने ताली बजाई। "गिनती वाले चाचा!"

बाक़ी बच्चे भी हँसने लगे। "गिनती वाले चाचा! गिनती वाले चाचा!"

और फिर वो भाग गए। हँसते हुए। गली में। वही धुन गुनगुनाते हुए।

"सीढ़ी-सीढ़ी उतरी पनिहारिन..."

दोपहर तक पूरा गाँव ये खेल खेल रहा था।

मैंने उन्हें हर जगह देखा। सरकारी स्कूल के आँगन में — जहाँ चबूतरे की तीन सीढ़ियाँ थीं — बीस बच्चे, दो कतारों में, बारी-बारी से। मास्टर जी — ओमप्रकाश जी, एक दुबले-पतले, चश्मे वाले आदमी — डंडा लेकर उन पर चिल्ला रहे थे, पर बच्चे रुक नहीं रहे थे। वो डंडे की मार खाते, रोते, और फिर वापस जाकर खेलने लगते।

"ये क्या बीमारी है, भगवान जाने," मास्टर जी ने मुझसे कहा, जब मैं स्कूल के गेट के पास से गुज़रा। उनका चेहरा पसीने से भीगा था। "सुबह से पढ़ाई नहीं हुई। कोई किताब नहीं खोल रहा। बस ये सीढ़ी-सीढ़ी। और वो गाना।" उन्होंने अपना चश्मा उतारकर पोंछा। "मैंने एक बच्चे से पूछा कि गिनती आती है? पूरे चालीस तक सुना दिया। बिना रुके। वो बच्चा जो कल तक बीस के बाद अटक जाता था।"

मैंने बच्चों की तरफ़ देखा। सबसे ऊपर वाला बच्चा आँखें बंद किए गा रहा था। नीचे वाले उतर रहे थे।

और मैंने गौर किया — आज सुबह वाले बच्चे "पानी आ गया" पर हँसकर गिर गए थे। पर ये बच्चे नहीं गिरे। वो सबसे नीचे पहुँचकर जम गए। और जमे रहे। दस सेकंड। बीस। तीस।

उनके चेहरे पर कोई भाव नहीं। उनकी आँखें सामने की तरफ़, किसी ऐसी चीज़ को देखती हुईं जो वहाँ नहीं थी।

फिर ऊपर वाले बच्चे ने आँखें खोलीं। और नीचे वाले सब एक साथ साँस छोड़कर, ढीले होकर, ज़मीन पर बैठ गए। बिना हँसे।

घर-घर में यही था।

औरतें अपने बच्चों को पीट रही थीं। दरवाज़ों पर नए काले धागे बँध रहे थे। किसी ने घर की सीढ़ियों पर गोबर लीप दिया — जैसे इससे वो सीढ़ियाँ न रहें। एक आदमी ने अपने बेटे के पैर चारपाई से बाँध दिए।

और बच्चे फिर भी खेल रहे थे। बँधे हुए पैरों से। चारपाई पर बैठे-बैठे। हवा में हाथ चलाकर, उतरने का इशारा करते हुए। गाते हुए।

और जहाँ भी मैं जाता, बच्चे मुझे देखकर मुस्कुराते।

"गिनती वाले चाचा!"

और बड़े मुझे देखकर चुप हो जाते। नज़रें फेर लेते। मैंने पीठ पीछे फुसफुसाहटें सुनीं।

"रमेसर का पोता आया, और देखो क्या हो रहा है।"

"सत्रह बरस पहले भी यही था। तब भी ये था। तब भी एक बच्चा..."

"उसकी आँख देखी? वो सफ़ेदी? जैसी रामप्यारी की..."

"वो फ़सल बो रही है," रामप्यारी अम्मा ने कहा।

दोपहर। उनका आँगन। गुड्डी कोने में बैठी थी, स्लेट लेकर, पर लिख नहीं रही थी। बस बाहर से आती उस धुन को सुन रही थी — गली में कोई खेल रहा था — और उसका चेहरा उदास था।

सूरज खाट पर लेटा था। वो अब ज़्यादा देर बैठ नहीं पाता था। पत्थर का वज़न उसे एक तरफ़ खींचता था। उसके चेहरे का बायाँ हिस्सा पूरा भूरा-हरा था — गाल, कान, आँख के नीचे तक। वो बोल सकता था, पर शब्द आधे ही निकलते थे, जबड़े के एक तरफ़ से।

"फ़सल?"

"अगले सत्रह बरस की।" अम्मा का चेहरा पत्थर जैसा था। "जब वो भूखी होती है — और तू और सूरज उसे धीरे-धीरे खिला रहे हो, एक-एक सीढ़ी — तो वो आगे के लिए बीज बोती है। अट्ठावन में भी यही हुआ था। देवदत्त के उतरने से पहले। पूरे गाँव के बच्चे एक खेल खेलने लगे थे। मैं भी खेली थी।"

"कौन-सा खेल?"

"यही। बस गीत अलग था।" अम्मा ने अपनी सफ़ेद आँखें गली की तरफ़ घुमाईं। "उन बच्चों में से जो बड़े हुए — बयासी वाला लड़का, जो बंबई भागा था। बानवे का..." वो रुकीं। "...बानवे का गिनने वाला। पचहत्तर वाली औरत। सब उसी खेल में थे। बचपन में।"

मेरे अंदर कुछ ठंडा उतरा।

"तो ये बच्चे..."

"आज जो खेल रहे हैं," अम्मा ने धीरे से कहा, "उनमें से कोई दो हज़ार तैंतालीस में गिनेगा। कोई साठ में। कोई सतहत्तर में।" उन्होंने अपनी उँगली पर बँधे उस अदृश्य धागे को छुआ। "वो उनके पैरों में अभी धागे बाँध रही है। बहुत पतले। वो उन्हें महसूस भी नहीं करेंगे। बड़े होंगे, शादियाँ करेंगे, बच्चे पैदा करेंगे। और एक दिन, किसी रात, दो बजकर सैंतालीस पर..."

"चाचा," गुड्डी ने कोने से कहा।

मैंने उसकी तरफ़ देखा।

उसकी आँखों में आँसू थे। "सब बच्चे ग्यारह सीख गए। बारह भी। तेरह भी। पिंकी ने बताया, उसे चालीस तक आता है अब। सबको आता है।" उसने अपनी स्लेट दिखाई। १ से १०। और दस के बाद मिटे हुए धब्बे। "सिर्फ़ मुझे नहीं आता। मैं सबसे पीछे रह गई।"

उसने अपनी बाँह का कड़ा छुआ।

"दीदी अब मेरे पास नहीं आती, चाचा। वो सबके पास जाती है। मेरे पास नहीं।"

और उसकी आवाज़ में — एक पाँच साल की बच्ची की आवाज़ में — जलन थी। अकेले छूट जाने का दर्द।

मुझे उस पल उस बावड़ी वाली से जितनी नफ़रत हुई, उतनी पहले कभी नहीं हुई थी।

स्कूल जाने से पहले मैं पुराने शिव मंदिर के पीछे गया। हरिहर शास्त्री के दरवाज़े पर।

मैंने दस्तक नहीं दी। बस दरवाज़े के पास खड़ा हुआ। और अंदर से, इससे पहले कि मैं कुछ कहूँ, ज़ंजीरों की खनक आई, और वो सूखी, बूढ़ी आवाज़।

"खेल शुरू हो गया?"

"आपको कैसे पता?"

"सुबह से सुन रहा हूँ। मेरी भतीजी की बेटी भी गा रही थी, खाना देते वक़्त।" एक लंबी साँस। "वही धुन है, बेटा। बस शब्द नए हैं। बानवे से पहले भी बच्चे यही गाते थे। पचहत्तर में भी। मेरा शंकर भी गाता था। पाँच बरस का था, पूरा गाँव सिर पर उठा लेता था इस गीत से।"

"आपने रोका नहीं?"

"कौन रोक पाया है?" उसकी आवाज़ में कड़वी हँसी थी। "बच्चे को मारो, वो रोकर फिर गाता है। मुँह बाँधो, वो मन में गाता है। सुलाओ, वो सपने में गाता है। ये गीत उसके पानी में घुला है, बेटा। जिस-जिस बच्चे ने इस गाँव के कुएँ का पानी पिया है, उसके अंदर है।"

मैं चुप रहा।

"एक बात सुन," पुजारी ने धीमे से कहा। "खेल में हमेशा एक बच्चा बाक़ियों से ज़्यादा झुकता है। पानी की तरफ़। वो सबसे पहले जाता है। बानवे में वो मेरा शंकर था।" उसकी आवाज़ काँपी। "उस बच्चे को पहचान ले। और उसे खेल से दूर रख। पर याद रख — उसकी डोर मत काटना।"

"क्यों?"

"क्योंकि डोर उसे बाँधती भी है, और थामती भी है। जिसकी डोर कट गई, उसे पकड़ने वाला कोई नहीं रहता।"

ज़ंजीरें फिर से खनकीं। और अंदर से वो लोरी आने लगी। उस कलश के लिए।

मैं उस वक़्त पुजारी की बात का मतलब नहीं समझा था।

रात को समझा।

मुझे देखना था।

मुझे पता था मुझे ऐसा नहीं करना चाहिए। मेरी बाईं आँख का सफ़ेद घेरा अब पुतली के आधे हिस्से तक फैल गया था। उस आँख से दुनिया धुँधली दिखती थी — जैसे किसी ने कैमरे के लेंस पर वैसलीन मल दी हो। अब जितनी बार मैं उससे पीछे देखता, उतना ज़्यादा खोता।

पर वो बच्चे। वो गीत। नीली कमीज़ वाले भैया ने सिखाया।

मैं छोटू को जानता था। या जानता था, सत्रह साल पहले। और वो चिट्ठी... वो बच्चा जो ख़ुद अपने दोस्तों के लिए नीचे गया था... वो दूसरे बच्चों को ऐसा गीत नहीं सिखाएगा।

मैं स्कूल गया।

शाम चार बजे। छुट्टी हो चुकी थी, पर बच्चे घर नहीं गए थे। वो आँगन में थे। चबूतरे की तीन सीढ़ियों पर। तीस-चालीस बच्चे। एक बड़े घेरे में। और बीच में, सीढ़ियों पर, खेल चल रहा था।

मैंने दाईं आँख बंद की।

और बाईं से देखा।

धुँधलापन। फिर डबल एक्सपोज़र।

बच्चे। वही बच्चे। सीढ़ियों पर। पर अब उनके ऊपर कुछ और चढ़ा हुआ था।

सबसे ऊपर वाला बच्चा — आज एक दुबला लड़का, दस साल का — आँखें बंद किए गा रहा था। और उसके सिर के चारों ओर बाल लिपटे थे। काले। लंबे। उसके अपने नहीं। किसी घूँघट की तरह उसके सिर को ढके हुए। और वो बाल उसके मुँह में जा रहे थे। उसके होंठों के बीच से। जैसे वो बाल ख़ुद उसके मुँह से गा रहे हों।

बाल ऊपर से आ रहे थे। आसमान से नहीं — हवा से। पतले, काले धागों की तरह, पूरे आँगन के ऊपर फैले हुए। एक जाल। और उस जाल से हर बच्चे के सिर तक एक धागा उतरता था। कठपुतली की डोर की तरह।

वो गिनने वाले बच्चे के मुँह से गा रही थी। और उतरने वाले बच्चों को अपनी डोरियों से उतार रही थी।

और आँगन के कोने में, नीम के पेड़ के नीचे, अलग खड़ा, कोई और था।

नीली कमीज़। गीले बाल।

छोटू।

वो खेल में नहीं था। उसके सिर पर कोई धागा नहीं था। वो बस खड़ा था। पेड़ से टिका। उन बच्चों को देखता हुआ। और उसके चेहरे पर —

दुख था। वही दुख जो मैंने दिल्ली में खिड़की के बाहर देखा था।

फिर उसने सिर घुमाया। मेरी तरफ़। सीधे मेरी बाईं आँख में।

और धीरे से, बहुत धीरे से, अपना सिर हिलाया। दाएँ से बाएँ। नहीं।

मैंने नहीं सिखाया।

फिर उसने अपना हाथ उठाया। और आँगन के दूसरे कोने की तरफ़ इशारा किया। जहाँ स्कूल का पुराना हैंडपंप था।

मैंने उस तरफ़ देखा।

हैंडपंप के नीचे, पत्थर के चबूतरे पर, एक छोटा-सा गड्ढा था जिसमें पानी जमा रहता था। और उस पानी में — बाईं आँख में — एक चेहरा था। उल्टा। पानी की सतह के नीचे। लाल साड़ी का किनारा। और बाल, जो उस छोटे-से गड्ढे से निकलकर पूरे आँगन के ऊपर फैले थे।

वो वहाँ थी। हैंडपंप के गड्ढे में। मंदिर के घड़े में। हर घर के मटके में। हर उस जगह, जहाँ थोड़ा-सा भी पानी था।

मैंने छोटू की तरफ़ वापस देखा।

वो ग़ायब था।

और मेरी बाईं आँख में एक तेज़ दर्द उठा। बर्फ़ की सलाई नहीं — उससे धीमा, उससे गहरा। जैसे कोई मेरी आँख के अंदर धीरे-धीरे कुछ जमा रहा हो।

जब मैंने दोबारा देखा, सफ़ेद घेरा पुतली के तीन-चौथाई हिस्से तक पहुँच गया था।

रात को, सोने से पहले, सूरज ने मुझे इशारे से बुलाया।

वो बोल नहीं पा रहा था — उसका जबड़ा अब मुश्किल से खुलता था। उसने गुड्डी की स्लेट की तरफ़ इशारा किया। मैंने उसे दी। और उसने अपने दाएँ हाथ में चॉक लेकर, बहुत धीरे-धीरे, काँपती उँगलियों से, कुछ लिखा।

"अगर मैं न लौटूँ — गुड्डी को मामी के पास छोड़ना। उनका दरवाज़ा कोई नहीं खटखटाता।"

मैंने सिर हिलाया।

उसने स्लेट पोंछी। फिर कुछ और लिखने लगा। रुका। मिटाया। फिर लिखा। फिर मिटाया।

आख़िर में सिर्फ़ दो शब्द बचे।

"माफ़ कर।"

मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसकी एक बची हुई अच्छी आँख मुझे देख रही थी। उसमें आँसू थे।

उसने नहीं लिखा कि किस बात की माफ़ी। मैंने नहीं पूछा।

मैंने बस उसका हाथ पकड़ा। उसकी कलाई पर वो काला धागा, वो ताँबे का सूरज। और तब तक पकड़े रहा जब तक उसकी आँख बंद नहीं हो गई।

उस रात, दो बजकर सैंतालीस पर, मैं अम्मा के घर की खिड़की पर खड़ा था।

वक़्त रुका। घुँघरू बजा। लौ नीली हुई।

सूरज अपनी खाट पर जमा था। उसके होंठ हिलने लगे — "तीस।" "इकतीस।" — और वो ग़ायब हो गया। फिर से दो। मैं उसके लिए कुछ नहीं कर सका।

पर मैं अभी गया नहीं था।

आज मुझे कुछ देर मिली थी। शायद इसलिए कि वो किसी और काम में व्यस्त थी।

मैंने खिड़की से बाहर देखा।

गली में बच्चे थे।

दर्जनों। नंगे पैर। नाइट-ड्रेस में, फ्रॉक में, बनियान में। आँखें बंद। एक कतार में। एक-दूसरे का हाथ पकड़े। चलते हुए।

रुके हुए वक़्त में। जमी हुई दुनिया में। पूरा गाँव पत्थर जैसा स्थिर — और ये बच्चे, अकेले, चल रहे थे। धीरे-धीरे। पीपल की तरफ़।

और गा रहे थे। सब एक साथ। एक धीमे, नींद भरे सुर में।

"सीढ़ी-सीढ़ी उतरी पनिहारिन..."

मैं दरवाज़े की तरफ़ भागा।

"विक्की, मत जा!" अम्मा ने अँधेरे में पुकारा। वो भी रुके हुए वक़्त में जाग रही थीं। "बाहर उसकी दुनिया है! तू उनमें से किसी को नहीं बचा पाएगा!"

मैं रुका नहीं।

गली में निकला। ठंडी हवा — नहीं, हवा नहीं थी, हवा भी रुकी हुई थी। बस एक ठंडक, जो हर तरफ़ से आ रही थी।

बच्चों की कतार मेरे सामने से गुज़र रही थी। चालीस? पचास? मैं गिन नहीं रहा था। मैं जान-बूझकर नहीं गिन रहा था। पर मेरा दिमाग़ चीख़ रहा था कि गिनूँ।

उनके पैरों से धागे बँधे थे। काले। पतले। सब एक साथ जाकर एक मोटी रस्सी बन रहे थे, जो पीपल की तरफ़ जा रही थी। वो उन्हें खींच रही थी।

मैंने अपने बाएँ हाथ से सबसे पास वाले बच्चे की बाँह पकड़ी।

एक लड़का। गोल-मटोल। एक दाँत टूटा हुआ।

बबलू।

मैंने उसे खींचा। कतार से बाहर। उसका हाथ उसके आगे वाले बच्चे के हाथ से छूटा — और उसके पैर का धागा, जो मोटी रस्सी से जुड़ा था, खिंचा। तना। मैंने बाएँ हाथ से उसे पकड़ा और झटका दिया।

धागा टूट गया। टन्न। जैसे किसी सितार का तार।

बबलू मेरी बाँहों में ढीला पड़ गया। उसकी आँखें बंद। उसकी साँसें गहरी। वो बस सो रहा था। एक आम बच्चे की तरह।

मैंने उसे गली के किनारे, एक चबूतरे पर, धीरे से लिटा दिया।

और कतार की तरफ़ मुड़ा। अगला बच्चा।

पर कतार आगे बढ़ चुकी थी। तेज़। अब वो पीपल के पास थी। और मेरे पैर — मेरे पैर भारी हो रहे थे। मेरे टख़ने का खिंचाव। मेरी अपनी रस्सी।

मैं दौड़ा। कतार के पीछे। पीपल वाली सड़क पर।

बच्चे बावड़ी की मुंडेर तक पहुँचे। और रुक गए।

एक घेरा बनाकर। मुंडेर के चारों ओर। हाथ पकड़े। आँखें बंद। टीन की चादरें अपनी जगह पर थीं, ज़ंजीर बँधी थी — पर बच्चों ने उसकी परवाह नहीं की। वो बस खड़े रहे। और घेरे के सामने वाला बच्चा — हरी फ्रॉक वाली लड़की, जो सुबह मंदिर पर गा रही थी — उसने अपना मुँह खोला।

और एक संख्या बोली। साफ़। ऊँची। पूरे घेरे की तरफ़ से।

"तेरह।"

और सब बच्चे एक साथ मुड़े। मेरी तरफ़।

सबकी आँखें बंद। सबके चेहरे मेरी तरफ़।

"गिनती वाले चाचा," उन्होंने एक साथ कहा। एक सुर में। पचास छोटी आवाज़ें, एक लय में। "आपकी बारी।"

और मेरे पैरों के नीचे से सड़क गायब हो गई।

तेरहवीं सीढ़ी।

पानी। अँधेरा। फेफड़ों में ठंडी शांति।

मैंने ऊपर देखा। ऊपर देखना मना नहीं था।

और ऊपर, पानी की सतह के पार, उस धुँधले आसमान के टुकड़े के चारों ओर — चेहरे थे।

बच्चों के चेहरे। मुंडेर के किनारे पर झुके हुए। टीन के ऊपर से — नहीं, टीन के आर-पार, जैसे टीन हो ही नहीं। दर्जनों छोटे-छोटे चेहरे, एक घेरे में, नीचे झाँकते हुए। पानी में। मेरी तरफ़।

सबकी आँखें अब खुली थीं।

और सब गा रहे थे। पानी के ऊपर से आवाज़ धुँधली, टूटी हुई, पर मैं सुन सकता था।

"...जो भी गिनेगा, वो ही उतरेगा..."

उनकी आँखें पानी की सतह से बस कुछ इंच ऊपर थीं। और वो झुकते जा रहे थे। थोड़ा और। थोड़ा और। जैसे पानी उन्हें बुला रहा हो।

"...चालीस पे जाके वो पत्थर बनेगा..."

"पीछे हटो!" मैं चीख़ा। पानी में। बुलबुलों में। कोई आवाज़ नहीं निकली।

और घेरे में एक चेहरा — गोल-मटोल, एक दाँत टूटा हुआ — बाक़ियों से ज़्यादा झुका। बहुत ज़्यादा। उसकी नाक पानी की सतह को छूने लगी।

बबलू।

पर मैंने बबलू को चबूतरे पर लिटाया था। गाँव में। सोते हुए। मैंने उसका धागा तोड़ा था।

मैंने देखा — बबलू के पैर में कोई धागा नहीं था। बाक़ी सब बच्चों के पैरों से काले धागे नीचे पानी में जा रहे थे। बबलू का पैर ख़ाली था।

और शायद इसीलिए — क्योंकि उसे कोई रस्सी नहीं बाँधे थी, कोई डोर नहीं थामे थी — वो गिर गया।

एक छोटा-सा छपाक। पानी में।

और उसका चेहरा, डूबता हुआ, मेरे बगल से गुज़रा। नीचे। अँधेरे में। उसकी आँखें खुली थीं, और उनमें कोई डर नहीं था। बस हैरानी। जैसे किसी ने उसे नींद से जगा दिया हो।

मैंने बाएँ हाथ से उसकी तरफ़ झपट्टा मारा।

मेरी उँगलियाँ उसके बालों को छू गईं। बस छू गईं।

और वो नीचे चला गया।

नीचे। चौदहवीं। पंद्रहवीं। मेरी आँखें बंद करने से पहले मैंने देखा — अँधेरे में से लंबे, पतले, जोड़ों पर मुड़े हुए हाथ ऊपर उठे, और उसे थाम लिया। बहुत प्यार से। जैसे कोई माँ सोते बच्चे को उठाती है।

मैं ऊपर आया तो सुबह हो चुकी थी।

मुंडेर पर कोई बच्चा नहीं था। टीन अपनी जगह पर थी। ज़ंजीर बँधी थी। पर मुंडेर के चारों ओर की धूल में सैकड़ों छोटे-छोटे पैरों के निशान थे। गीले। एक घेरे में।

और एक जगह, घेरे में, निशान अलग थे। पैरों के पंजे मुंडेर की तरफ़। बहुत पास। और फिर — कुछ नहीं। जैसे उस जगह खड़ा बच्चा आगे झुका हो, और फिर वहाँ से ग़ायब हो गया हो।

अम्मा मुंडेर पर बैठी थीं। उनका चेहरा आँसुओं से भीगा था।

"मैंने कहा था, बच्चा," उन्होंने धीरे से कहा। "बाहर उसकी दुनिया है।"

सूरज आधे घंटे बाद निकला। इकतीसवीं से।

हमने उसे खींचा। वो रेंगता हुआ आया, और मुंडेर पर गिरा, और मैंने उसका चेहरा देखा — और मुझे अपनी चीख़ दबानी पड़ी।

पत्थर उसके चेहरे के आधे हिस्से तक पहुँच गया था। पूरा बायाँ हिस्सा। माथा, गाल, होंठ का आधा हिस्सा। और उसकी बाईं आँख — वो सफ़ेद आँख — अब आँख नहीं थी। वो पत्थर थी। एक चिकना, भूरा-हरा पत्थर, आँख के गड्ढे में जमा हुआ।

वो बोल नहीं पाया। उसने अपना दायाँ हाथ उठाया। उँगलियों से दिखाया।

नौ।

नौ रातें बचीं। अगर एक-एक। अगर दो-दो — साढ़े चार।

गाँव में घुसते ही मैंने चीख़ सुनी।

एक औरत की। गली के उस छोर से। बार-बार। एक नाम।

"बबलू! बबलू! मेरा बबलू कहाँ है!"

लोग इकट्ठे हो रहे थे। दरवाज़े खुल रहे थे। मर्द बाहर आ रहे थे, औरतें, बच्चे — वो बच्चे जो रात को गली में चल रहे थे, और अब अपनी माँओं के पीछे छुपे खड़े थे, आँखें मलते हुए, जैसे कुछ याद न हो।

बबलू की माँ चबूतरे के पास ज़मीन पर बैठी थी। उसी चबूतरे के पास, जहाँ मैंने रात को उसे लिटाया था। चबूतरे पर एक गीला निशान था। एक बच्चे के आकार का।

और मैं वहाँ पहुँचा।

भीगा हुआ। काई से सना। बावड़ी की तरफ़ से आता हुआ। मेरी बाईं आँख में वो सफ़ेदी।

भीड़ मेरी तरफ़ मुड़ी।

और ख़ामोश हो गई।

सरपंच रामकिशोर यादव आगे आए। उनका चेहरा कठोर था। जिस आदमी ने मुझे अपना फ़ोन दिया था, बिना कुछ पूछे — उसकी आँखों में अब कुछ और था।

"विक्रम," उन्होंने कहा। "रात को तुम कहाँ थे?"

"मैं..."

"जग्गू ने तुम्हें देखा। रात को। गली में।" उन्होंने भीड़ में एक आदमी की तरफ़ इशारा किया — दुबला, शराबी-सा दिखने वाला, जो अपनी खिड़की पर खड़ा था। "बच्चों के बीच। बहुत रात को।"

"मैं उन्हें बचाने की कोशिश कर रहा था—"

"बचाने?" भीड़ में से किसी ने कहा। एक औरत। "किससे?"

"सत्रह बरस पहले भी तू ही था," एक बूढ़े आदमी ने कहा। सफ़ेद मूँछें, हाथ में लाठी। "बावड़ी पर। जब भोला का लड़का भागकर आया था, और सुशीला का कन्हैया नहीं लौटा था। तू ही था वहाँ, मुंडेर पर। हमने देखा था। रमेसर ने सब दबा दिया। तुझे शहर भेज दिया।"

"और अब तू लौटा है," किसी और ने कहा, "और रमेसर मर गया, और रघु पागल हो गया, और रामप्यारी अंधी हो गई, और भोला का लड़का पत्थर बन रहा है, और बच्चे..."

मास्टर ओमप्रकाश जी भीड़ में खड़े थे। उन्होंने कुछ नहीं कहा। पर उन्होंने अपना चश्मा उतारा, और मेरी तरफ़ ऐसे देखा जैसे कोई किसी ऐसे छात्र को देखता है जिस पर उसे भरोसा था, और जिसने उसे धोखा दिया हो।

"मैं भी इसी गाँव का हूँ," मैंने कहा। मेरी आवाज़ काँप रही थी। "मैं भी उसी से लड़ रहा हूँ जिससे आप डरते हैं।"

किसी ने जवाब नहीं दिया। भीड़ बस मुझे देखती रही। सौ आँखें। और उनमें से एक में भी भरोसा नहीं था।

और तब, भीड़ के पीछे से, एक छोटी आवाज़ आई।

हरी फ्रॉक वाली लड़की। अपनी माँ के पल्लू के पीछे से। आँखें अब भी नींद से भरी।

"गिनती वाले चाचा बबलू को ले गए," उसने कहा। बहुत सीधे। बहुत मासूमियत से। जैसे कोई सपना सुना रही हो। "मैंने देखा। उन्होंने उसका हाथ पकड़ा और हम सबसे अलग खींच लिया। फिर बबलू वापस नहीं आया।"

भीड़ में एक सिहरन दौड़ी।

और मैंने अपना बायाँ हाथ देखा। वही हाथ जिससे मैंने बबलू को खींचा था। उसका धागा तोड़ा था। उसे बचाया था।

उस हाथ की उँगलियों में अब भी कुछ उलझा था। मैंने उसे अब तक ध्यान नहीं दिया था।

कुछ बाल। छोटे। भूरे। एक बच्चे के।

जो पानी में, आख़िरी पल में, मेरी उँगलियों में रह गए थे।

भीड़ ने उन्हें देखा।

मैंने अपनी मुट्ठी बंद करनी चाही। बाल छुपाने के लिए। पर बहुत देर हो चुकी थी। बबलू की माँ की आँखें उन बालों पर टिकी थीं, और उनमें से एक चीख़ उठी जो किसी इंसान की नहीं, किसी घायल जानवर की लगती थी।

और किसी ने, कहीं पीछे से, एक पत्थर उठाया।

भाग 13 समाप्त।

अगले भाग में — "चौदहवीं सीढ़ी": पूरा गाँव विक्रम के ख़िलाफ़ है। बबलू की माँ, सरपंच, मास्टर जी — सब। और एक ही इंसान उसके साथ खड़ा होता है — कोई ऐसा, जिसकी उसे बिल्कुल उम्मीद नहीं थी। उधर, बावड़ी में, बबलू की आवाज़ गिनती करने लगी है। पर वो ऊपर की तरफ़ गिन रहा है...

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