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भाग 14 — चौदहवीं सीढ़ी

Piyashi Atma · Real Experiences · 20 मिनट

Writer
Piyashi Atma
Story
भानपुरा की बावड़ी - चालीस सीढ़ियाँ
Chapter
14 of 31
Category
Real Experiences
Reading time
20 min
Words
3993
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

भीड़ का कोई चेहरा नहीं होता।

अलग-अलग, हर इंसान का एक नाम होता है। एक माँ, एक पिता, एक मास्टर जी, एक सरपंच। कोई जो सुबह आपको राम-राम कहता है, कोई जिसकी दुकान से आप दूध लेते हैं, कोई जिसने बचपन में आपके सिर पर हाथ फेरा था।

पर जब वो सब एक साथ खड़े होते हैं, और उनमें से किसी एक के हाथ में पत्थर होता है — तो वो नाम ग़ायब हो जाते हैं। वो चेहरे पिघलकर एक हो जाते हैं। एक बड़ा, भूखा, डरा हुआ चेहरा।

और डर को एक ही चीज़ चाहिए। कोई, जिस पर वो गिर सके।

उस चौदहवें दिन, भानपुरा का डर मुझ पर गिरा।

और एक औरत उसके और मेरे बीच आकर खड़ी हो गई।

पत्थर हवा में था।

मैंने उसे आते देखा। धीरे-धीरे, जैसे किसी फ़िल्म की स्लो-मोशन फ़्रेम। एक ईंट का टुकड़ा। लाल। किनारों से टूटा हुआ। भीड़ के पीछे से, किसी अनदेखे हाथ से फेंका हुआ।

मैंने अपना हाथ नहीं उठाया। मुझे नहीं पता क्यों। शायद मैं थक गया था। चौदह रातें। चौदह सीढ़ियाँ। शायद मेरे अंदर कहीं ये भी था कि मैं इसके लायक़ हूँ। बबलू के बाल मेरी उँगलियों में थे।

और तब कोई मेरे सामने आ गया।

एक झटके में। भीड़ को चीरती हुई। एक फीकी साड़ी। सफ़ेद, बिखरे बाल।

ईंट का टुकड़ा उनके माथे से टकराया।

ठक।

एक भोथरी, भयानक आवाज़।

वो लड़खड़ाईं। पर गिरीं नहीं। उनके माथे पर, बाईं भौंह के ठीक ऊपर, ख़ून की एक लकीर उभरी, और उनके गाल पर बहने लगी।

सुशीला मामी।

भीड़ जम गई। वक़्त रुका नहीं था — अभी सुबह थी, धूप थी — पर भीड़ जम गई, जैसे दो बजकर सैंतालीस हो गया हो।

मामी ने अपने माथे का ख़ून पोंछा नहीं। उन्होंने बस अपना सिर उठाया। और भीड़ की तरफ़ देखा। एक-एक चेहरे को। धीरे-धीरे।

"और मारो," उन्होंने कहा।

उनकी आवाज़ ऊँची नहीं थी। पर पूरी गली में सुनाई दी।

"मारो। पहले मुझे मारो। मेरा बेटा गया था। सत्रह बरस पहले। उसी बावड़ी में। और आज मैं इस लड़के के सामने खड़ी हूँ।" उन्होंने अपना हाथ पीछे बढ़ाया, बिना मुड़े, और मेरी कलाई पकड़ ली। उनका गर्म हाथ। "अगर किसी को इसे छूना है, तो पहले सुशीला को पार करना होगा।"

भीड़ में से कोई नहीं हिला।

बबलू की माँ — कमला, एक दुबली, साँवली औरत, जिसकी आँखें रो-रोकर सूज गई थीं — ज़मीन से उठी। वो मामी के सामने आई। बहुत पास। उनकी साँसें एक-दूसरे से टकरा रही थीं।

"तुम?" कमला ने फुसफुसाया। अविश्वास से। "तुम इसका साथ दे रही हो? इसी की वजह से तुम्हारा कन्हैया..."

"मेरा कन्हैया अपनी मर्ज़ी से गया था।" मामी की आवाज़ स्थिर थी। "उसने लिखकर गया था। अपने हाथ से। और उसने ये भी लिखा था कि विक्की उसे रोकने की कोशिश करेगा। क्योंकि विक्की हमेशा रोकता है।"

उन्होंने कमला के कंधे पर हाथ रखा।

"कमला, मैं जानती हूँ तुझ पर क्या बीत रही है। मुझसे बेहतर इस गाँव में कोई नहीं जानता। सत्रह बरस से मैं हर शाम दरवाज़े पर खड़ी हूँ।" उनकी आवाज़ एक पल को टूटी। "पर ये लड़का तेरे बबलू को नहीं ले गया। ये उसे बचाने गया था। और इसके हाथ में जो बाल हैं — वो इसलिए हैं क्योंकि इसने उसे पकड़ने की कोशिश की थी। डूबते हुए। अगर ये उसे ले गया होता, तो इसके हाथ ख़ाली होते।"

कमला की आँखें मेरे हाथ पर गईं। फिर मामी पर। फिर वापस मेरे हाथ पर।

और वो टूट गई। घुटनों के बल गिर पड़ी और रोने लगी।

भीड़ धीरे-धीरे ढीली होने लगी। लोग एक-दूसरे को देखने लगे। वो बड़ा, भूखा चेहरा फिर से अलग-अलग चेहरों में टूटने लगा। शर्मिंदा। डरे हुए। उलझे हुए।

सरपंच आगे आए। उनका चेहरा अब भी कठोर था, पर उनकी आँखों में शक के साथ अब कुछ और भी था।

"सुशीला भाभी," उन्होंने कहा, "मैं तुम्हारी इज़्ज़त करता हूँ। पूरा गाँव करता है।" उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। "पर बच्चा गया है। कल सुबह तक बबलू नहीं मिला, तो ये लड़का इस गाँव में नहीं रहेगा। और पुलिस आएगी। मैं ख़ुद बुलाऊँगा।"

"ठीक है," मामी ने कहा। "कल सुबह तक।"

मामी मुझे अपने घर ले गईं।

उन्होंने मुझे आँगन में बिठाया, उसी चटाई पर, जहाँ कल कन्हैया की ख़ाली थाली रखी थी। फिर अंदर गईं, और एक कटोरी में गरम पानी और एक साफ़ कपड़ा लेकर आईं।

"आपका माथा..." मैंने कहा।

"बाद में।" उन्होंने पहले मेरे हाथ पकड़े। दोनों। और गरम पानी से धोने लगीं। धीरे-धीरे। हर उँगली। हर नाख़ून। काई, कीचड़, बावड़ी का वो हरा पानी — सब।

और बबलू के बाल।

उन्होंने उन्हें मेरी उँगलियों से निकाला। एक-एक करके। बहुत सावधानी से। फिर उन्हें एक छोटे-से काग़ज़ में लपेटा और मोड़कर अपने पल्लू में बाँध लिया।

"कमला को दूँगी," उन्होंने कहा। "बाद में। जब वो तैयार होगी।"

फिर उन्होंने अपना माथा पोंछा। घाव गहरा नहीं था, पर ख़ून अब भी रिस रहा था। उन्होंने कपड़े को दबाकर रखा।

"आपने ऐसा क्यों किया, मामी?"

उन्होंने कुछ देर तक जवाब नहीं दिया। अमरूद के सूखे पेड़ की तरफ़ देखती रहीं।

"सत्रह बरस पहले," उन्होंने आख़िर में कहा, "जिस दिन कन्हैया गया था, उसी शाम इसी गली में एक भीड़ जमा हुई थी। रमेसर भैया के दरवाज़े पर। वो तुझे ढूँढ रहे थे। तू बुख़ार में पड़ा था, बेहोश। वो कह रहे थे कि तू ही था बावड़ी पर, तुझे पता है क्या हुआ, तुझे बाहर निकालो।" उन्होंने अपनी आँखें बंद कर लीं। "और रमेसर भैया दरवाज़े पर खड़े रहे। अकेले। एक लाठी लेकर। पूरी रात।"

"मुझे नहीं पता था।"

"तुझे कैसे पता होता?" मामी ने आँखें खोलीं। "और मैं... मैं उस भीड़ में थी, विक्की। मैं सबसे आगे थी। मैं चीख़ रही थी कि उस लड़के को बाहर निकालो। मेरे बेटे को लौटाओ।"

उनकी आवाज़ बहुत धीमी हो गई।

"सत्रह बरस मैंने उस रात के लिए ख़ुद को माफ़ नहीं किया। एक बेहोश बच्चे के दरवाज़े पर पत्थर लेकर खड़ी थी। तो आज..." उन्होंने कंधे उचकाए, "...आज मैं दूसरी तरफ़ खड़ी हो गई। बस।"

दोपहर को मैं गुड्डी को मामी के पास ले आया।

सूरज ने कल रात स्लेट पर लिखा था — अगर मैं न लौटूँ, गुड्डी को मामी के पास छोड़ना। उनका दरवाज़ा कोई नहीं खटखटाता।

सूरज अभी लौटा था। पर मुझे नहीं पता था कि कितनी रातें और लौटेगा। और अम्मा के घर में, दीवारों के बावजूद, गुड्डी रात भर अपने पापा को गिनते हुए सुनती थी। उनके होंठों से। रुके हुए वक़्त में।

वो बच्ची इससे ज़्यादा नहीं झेल सकती थी।

सूरज ने कुछ नहीं कहा। वो बोल नहीं सकता था। पर उसने अपना दायाँ हाथ गुड्डी के सिर पर रखा, बहुत देर तक, और फिर मुझे इशारा किया — ले जा।

गुड्डी मामी के आँगन में घुसी और रुक गई। उसने उस साफ़-सुथरे आँगन को देखा। तुलसी के दीये को। और उस बिना धागे वाले दरवाज़े को।

"यहाँ ठंड नहीं है," उसने धीरे से कहा। हैरानी से।

मामी घुटनों के बल उसके सामने बैठीं। अपने माथे पर पट्टी बाँधे। और मुस्कुराईं। वो मुस्कान जो मुस्कान के सबसे क़रीब थी।

"भूख लगी है, बिटिया?"

गुड्डी ने सिर हिलाया।

मामी उसे अंदर ले गईं। और उस दिन, सत्रह साल में पहली बार, उस आँगन में लगी दूसरी थाली ख़ाली नहीं लौटी।

वहाँ से मैं अपने घर गया। कुछ कपड़े लेने।

चाचा आँगन में बैठे थे। तुलसी के पास। वो पीतल का लोटा उनके सामने था — वो फिर लौट आया था, जैसा मुझे पता था वो आएगा। पर चाचा उसमें से पी नहीं रहे थे। बस उसे देख रहे थे।

"गली में शोर सुना था," उन्होंने बिना सिर उठाए कहा। "तेरे बारे में। पत्थर के बारे में।"

"ठीक हूँ, चाचा।"

उन्होंने ऊपर देखा। उनकी आँखें लाल थीं। "सुशीला बीच में आई?"

"हाँ।"

चाचा का चेहरा सिकुड़ गया। जैसे किसी ने उनके अंदर कोई पुराना घाव छू दिया हो।

"बानवे में," उन्होंने बहुत धीमे कहा, "इसी गली में, इसी तरह, एक भीड़ पुजारी जी के दरवाज़े पर गई थी। शंकर के बाद। वो लोग कह रहे थे कि पुजारी ने अपने ही बेटे की बलि दे दी। कि उसने कोई तंत्र किया। और मैं..." उनकी आवाज़ टूटी, "...मैं उस भीड़ में खड़ा था, विक्की। चुपचाप। मुझे पता था सच क्या है। और मैं चुप रहा।"

मैं उनके पास बैठ गया।

"कोई तेरे लिए खड़ा हुआ," चाचा ने कहा। "अच्छा हुआ। मेरे लिए कभी कोई नहीं खड़ा हुआ। क्योंकि मैंने कभी किसी को सच बताया ही नहीं।"

उन्होंने लोटे को एक तरफ़ सरका दिया। पहली बार।

"आज प्यास कम लग रही है," उन्होंने कहा। और मुझे लगा उनकी आवाज़ में, बहुत दूर, कोई फ़ैसला पक रहा था।

दोपहर तीन बजे गाँव ने आवाज़ सुनी।

पहले सरपंच की पत्नी ने। अपनी रसोई में, पानी के मटके के पास। उन्होंने चीख़ मारी, और मटका ज़मीन पर गिरकर टूट गया।

फिर मास्टर जी ने। स्कूल के हैंडपंप के पास।

फिर मंदिर के पुजारी ने, नए वाले ने, जो घड़े से जल चढ़ा रहा था।

फिर सबने।

हर घर के हर मटके से। हर घड़े से। हर बाल्टी से। हर उस जगह से जहाँ पानी था — एक आवाज़ आ रही थी। बहुत धीमी। गूँजती हुई। जैसे किसी बहुत गहरे कुएँ के तल से।

एक बच्चे की आवाज़।

"...उनतालीस..."

मैं मामी के आँगन में था जब मैंने सुना। तुलसी के पास रखे पीतल के लोटे से। गुड्डी ने अपनी थाली छोड़ दी और मेरे पास दौड़कर आई।

"...अड़तीस..."

"बबलू," गुड्डी ने फुसफुसाया। "वो बबलू है, चाचा। मैं उसकी आवाज़ पहचानती हूँ। वो मेरे साथ स्कूल जाता था।"

"...सैंतीस..."

उल्टा। ऊपर की तरफ़।

वो चढ़ रहा था।

"न उसका, न हमारा," हरिहर शास्त्री ने कहा।

मैं उनके दरवाज़े पर था। पुराने शिव मंदिर के पीछे। शाम हो रही थी। और हर मिनट के साथ, पूरे गाँव के हर मटके से, बबलू की आवाज़ आती रही।

"...अट्ठाईस..."

"मतलब?"

"तूने उसकी डोर काटी थी, बेटा।" पुजारी की आवाज़ में न ग़ुस्सा था, न दया। बस एक थकी हुई सच्चाई। "मैंने कहा था — डोर उसे बाँधती भी है और थामती भी है। वो बच्चा अब उसका नहीं है। उसके बालों ने उसे नहीं बाँधा। उसकी ज़ंजीर में वो कोई कड़ी नहीं है।"

"तो वो ऊपर आ सकता है?"

"पानी उसे ऊपर उछाल रहा है।" पुजारी ने एक लंबी साँस ली। "जैसे डूबी हुई लाश उछलती है। तीन दिन बाद। बिना किसी की मर्ज़ी के। बस इसलिए क्योंकि पानी उसे अपना नहीं मानता।"

"तो वो बाहर आ जाएगा?"

दरवाज़े के पीछे एक लंबी चुप्पी।

"नहीं," पुजारी ने कहा। "बिना थामने वाले के वो सतह तक नहीं पहुँचेगा। पानी उसे ऊपर लाएगा, और लाएगा — और फिर किसी सीढ़ी पर, सतह से ठीक पहले, वो अटक जाएगा। न ऊपर, न नीचे। न उसका, न हमारा। हमेशा के लिए। एक ऐसी सीढ़ी पर, जहाँ कोई उसे न पकड़े।"

"...पच्चीस..."

"कोई तो पकड़ सकता है।"

"कोई भी।" पुजारी की आवाज़ धीमी हो गई। "पर जो पकड़ेगा, वो उसे हमेशा थामे रहेगा, बेटा। रघु की तरह। जो शंकर को चौंतीस बरस से थामे है।" ज़ंजीरें खनकीं। "और अगर पकड़ने वाला नीचे गया — चालीसवीं पर, पत्थर बनकर — तो जिसे उसने थाम रखा है, वो भी साथ जाएगा।"

मैं दरवाज़े से टिक गया।

"...बाईस..."

"तेरे पास ज़्यादा वक़्त नहीं है," पुजारी ने कहा। "आज रात वो चौदह पर पहुँचेगा। तेरी सीढ़ी पर। अगर तूने उसका हाथ पकड़ा, तो वो तेरा हो जाएगा। अगर नहीं पकड़ा, तो वो चौदह पर रुक जाएगा। या तेरह पर। और वहीं रहेगा। जब तक कोई और गिनने वाला उसके पास से न गुज़रे। सत्रह बरस बाद। चौंतीस बरस बाद।"

दरवाज़े के पीछे से वो लोरी शुरू हुई। कलश के लिए।

मुझे पता था मैं क्या करूँगा।

"मत कर, बच्चा," रामप्यारी अम्मा ने कहा।

रात के नौ बजे थे। उनका कमरा। लालटेन। सूरज अपनी खाट पर। दीवारों पर छापे।

और हर कुछ मिनट पर, कोने में रखे मटके से, बबलू की आवाज़।

"...सत्रह..."

"अगर तूने उसका हाथ पकड़ा," अम्मा ने कहा, "तो तेरी ज़ंजीर में एक कड़ी और जुड़ जाएगी। तू सिर्फ़ अपने लिए नहीं लड़ रहा होगा। अगर तू हारा — अगर तू चालीसवीं बना — तो वो बच्चा भी तेरे साथ जाएगा। उस अँधेरे में। हमेशा के लिए।"

"और अगर मैं न पकड़ूँ?"

"तो वो अटक जाएगा। पर कम से कम तेरे साथ नहीं डूबेगा।"

मैंने सूरज की तरफ़ देखा। वो मुझे देख रहा था। अपनी एक बची हुई आँख से। उसका पत्थर वाला चेहरा कोई भाव नहीं दिखा सकता था। पर उसकी आँख — उसकी आँख कह रही थी कुछ।

उसने अपना दायाँ हाथ उठाया। बहुत धीरे। और उसे अपने सीने पर रखा। दिल के ऊपर।

फिर उसने उसी हाथ से मेरी तरफ़ इशारा किया।

तू कर सकता है।

या शायद — मैंने नहीं किया था। तू कर।

"अम्मा," मैंने कहा, "सत्रह साल पहले उन्नीसवीं सीढ़ी पर मैंने एक हाथ नहीं पकड़ा था। या पकड़ा था, और छोड़ दिया था। या धक्का दिया था। मुझे नहीं पता। मुझे कुछ याद नहीं।" मेरी आवाज़ काँपी। "पर मैं ये जानता हूँ कि सत्रह साल से मैं उस हाथ के बिना जी रहा हूँ। और वो ख़ालीपन... वो किसी भी ज़ंजीर से भारी है।"

अम्मा बहुत देर चुप रहीं।

फिर उन्होंने अपनी उँगली से अपनी पायल उतारी। वही एक घुँघरू वाली। और उसे मेरे दाएँ हाथ में रख दिया।

"बाएँ हाथ में बच्चे को पकड़ना," उन्होंने कहा। "वो बाएँ को नहीं देखती। और दाएँ में ये रख। अगर वो तुझे खींचे, तो ये बजेगी। और जब बजे, तो ऊपर मत देखना, नीचे मत देखना। बस उस आवाज़ की तरफ़ देखना।"

"क्यों?"

"क्योंकि ये पायल अड़सठ बरस से देवदत्त की है। और वो अब भी उस आवाज़ को पहचानता है।"

"...पंद्रह..."

दो बजकर सैंतालीस।

सूरज के होंठ हिले। "बत्तीस।" "तैंतीस।" और वो ग़ायब हो गया।

और मटके से एक आवाज़ आई। बबलू की। पर इस बार कोई संख्या नहीं।

"...चाचा?..."

मैंने अपनी बाईं मुट्ठी में घुँघरू को मुँह में डाला — मुझे बाएँ हाथ को ख़ाली रखना था — और उसे दाँतों के बीच दबाया। वो ठंडा था। धातु का स्वाद। और जैसे ही वो मेरी जीभ पर आया, वो बजा — मेरे सिर के अंदर, मेरी खोपड़ी में गूँजता हुआ।

दाएँ हाथ में अम्मा की पायल।

बायाँ हाथ ख़ाली।

और मैं गिर गया।

चौदहवीं सीढ़ी।

पानी। अँधेरा। फेफड़ों में ठंडक।

घुँघरू मेरे दाँतों के बीच बज रहा था। लगातार। वो पास थी। बहुत पास।

मैंने दोनों आँखें बंद रखीं। पर मेरी बाईं आँख — अब तीन-चौथाई सफ़ेद — पलक के पार देख रही थी।

और मैंने बबलू को देखा।

नीचे से ऊपर आता हुआ। पानी में तैरता हुआ। धीरे-धीरे। जैसे कोई गुब्बारा, जिसकी डोर छूट गई हो। उसके हाथ ऊपर की तरफ़ फैले थे। उसकी आँखें खुली थीं। और उसके होंठ हिल रहे थे।

"...सोलह... पंद्रह..."

और उसके पीछे — उसके पैरों के पास — अँधेरे में से हाथ उठ रहे थे।

लंबे। पतले। जोड़ों पर मुड़े हुए। दर्जनों। उसके टख़नों की तरफ़ बढ़ते हुए। उसे पकड़ने की कोशिश करते हुए। पर जैसे वो उसे देख न पा रहे हों — जैसे वो अंधे हों — वो उसके पैरों के आसपास टटोल रहे थे। कभी छूते, कभी चूकते।

उसकी डोर कटी हुई थी। उसके पास कोई धागा नहीं था जिससे वो उसे खोज सकें।

बबलू चौदहवीं पर पहुँचा। मेरे बगल में।

और रुक गया।

"...चौदह..."

उसके हाथ ऊपर की तरफ़ बढ़े रहे। पर वो और ऊपर नहीं जा पाया। पानी ने उसे यहाँ तक उछाला था — और अब उसे छोड़ दिया था। वो वहाँ लटका था। मेरी सीढ़ी पर। मेरे कंधे के बगल में।

"...चाचा..." उसने धीरे से कहा। उसकी आँखें मेरी तरफ़ मुड़ीं। "मुझे ठंड लग रही है। मुझे मम्मी के पास जाना है।"

नीचे से हाथ ऊपर आए। अब वो उसके टख़नों को छू रहे थे। उन्हें उसकी गंध मिल गई थी — या उसकी आवाज़।

मैंने अपना बायाँ हाथ बढ़ाया।

और बबलू का हाथ पकड़ लिया।

उस पल को मैं कभी नहीं भूलूँगा।

उसकी उँगलियाँ मेरी उँगलियों से उलझीं। छोटी। ठंडी। एक डूबे हुए बच्चे की उँगलियाँ। और जैसे ही उन्होंने मेरी हथेली को छुआ, मेरी कलाई से कुछ निकला।

एक धागा। सफ़ेद। पारदर्शी। मेरी चमड़ी से, मेरी नसों से, मेरे अंदर से — बाहर निकलता हुआ। और उसकी कलाई तक जाता हुआ। और वहाँ बँधता हुआ। एक गाँठ में।

मैंने उसे महसूस किया। मेरे सीने के अंदर तक। जैसे मेरे दिल की एक नस अब इस बच्चे के दिल तक जाती हो।

जो किसी का हाथ पकड़ता है, वो उसे हमेशा थामे रहता है।

बबलू की आँखें फैलीं। "चाचा, गर्म है।"

और नीचे से हाथों ने उसके टख़ने पकड़ लिए।

झटका।

बबलू मेरे हाथ से नीचे खिंचा। मेरी बाँह तन गई। मेरा कंधा चरमराया। मेरा पूरा शरीर उसके साथ नीचे खिसका — चौदहवीं से पंद्रहवीं की तरफ़।

मैंने अपने पैर पत्थर में गड़ाए। घुँघरू मेरे दाँतों के बीच पागलों की तरह बज रहा था। छन-छन-छन-छन-छन।

नीचे से खिंचाव बढ़ा। वो लंबे हाथ बबलू के टख़नों पर, उसके घुटनों पर, उसकी जाँघों पर चढ़ रहे थे। उसे वापस नीचे ले जाने के लिए। उसे अपना बनाने के लिए। अब जब उन्हें पता चल गया था कि वो कहाँ है।

बबलू चीख़ा। पानी में। बुलबुलों में।

मेरा बायाँ हाथ फिसलने लगा। उसकी उँगलियाँ मेरी उँगलियों से छूटने लगीं।

नहीं। इस बार नहीं। इस बार नहीं।

मैंने अपने दाएँ हाथ की पायल को ऊपर उठाया — और हिलाया।

छन्न।

एक अकेला घुँघरू। पानी में। उसकी आवाज़ पानी में अलग तरह से गई — गहरी, लंबी, जैसे किसी मंदिर की घंटी। नीचे की तरफ़। अँधेरे में। चालीसवीं तक।

और उस आवाज़ के जवाब में, ऊपर से — मेरे ऊपर से — कुछ हिला।

ग्यारहवीं सीढ़ी।

जवान रघु चाचा।

उनका दायाँ हाथ अब भी नीचे की तरफ़ फैला था, पारदर्शी, शंकर को थामे हुए। पर उनका बायाँ हाथ — जो चौंतीस साल से ख़ाली लटका था — हिला।

वो नीचे की तरफ़ बढ़ा। खिंचता हुआ। पारदर्शी होता हुआ। तीन सीढ़ियाँ नीचे। मेरी तरफ़।

और उसने मेरी कलाई पकड़ ली। मेरे बाएँ हाथ की कलाई। जिससे मैं बबलू को थामे था।

"खींच, विक्की," उन्होंने कहा। उनकी आवाज़ पानी में घुली हुई, पर साफ़। "मैं तुझे थामे हूँ। तू उसे थाम। खींच!"

मैंने खींचा।

रघु चाचा ने खींचा।

और एक पल के लिए — सिर्फ़ एक पल के लिए — मुझे नीचे से एक आवाज़ सुनाई दी। एक पत्थर की आवाज़। जैसे चालीसवीं सीढ़ी ने करवट ली हो। और उन लंबे हाथों पर, नीचे से, कुछ टकराया। कुछ भारी। कुछ पत्थर का।

हाथ ढीले पड़े।

बबलू मेरी बाँहों में आया।

मैं ऊपर चढ़ा। बाएँ हाथ से बबलू को सीने से लगाए। दाएँ हाथ से दीवार पकड़े। घुँघरू दाँतों में।

तेरहवीं। बारहवीं। ग्यारहवीं — मैंने रघु चाचा के बगल से गुज़रते हुए उनकी तरफ़ नहीं देखा, पर मैंने महसूस किया कि उनका बायाँ हाथ मेरी कलाई से छूटा, और वापस अपनी जगह पर लौट गया। ख़ाली। और मैंने सुना, बहुत धीमे:

"...मुझसे जो नहीं हुआ, तुझसे हो गया..."

दसवीं। नौवीं — पानी मेरी नाक से नीचे उतरा। मैंने हवा को साँस लेने की कोशिश की, और मेरे फेफड़े जले, और मैं खाँसा, और बबलू भी खाँसा — उसकी छोटी-सी छाती मेरी छाती से सटी हुई, पानी उगलती हुई।

आठवीं। सातवीं।

ऊपर रोशनी थी। सुबह की।

और आवाज़ें। बहुत सारी आवाज़ें।

मुंडेर पर भीड़ थी।

पूरा गाँव। सरपंच। मास्टर जी। कमला। वो बूढ़ा आदमी लाठी वाला। बच्चे, अपनी माँओं के पीछे। और सबसे आगे, मुंडेर के किनारे पर, पट्टी बँधे माथे के साथ —

सुशीला मामी।

बाद में मुझे पता चला। सुबह चार बजे मामी ने गाँव के हर दरवाज़े पर दस्तक दी थी। गुड्डी को अपनी गोद में उठाए। और कहा था — "चलो। बावड़ी पर। जो देखना है, अपनी आँखों से देखो।"

और वो सब आए थे।

मैं पहली सीढ़ी पर आया। मेरे कपड़े फटे हुए। मेरे पैर लहूलुहान। मेरे मुँह में एक घुँघरू। और मेरी बाँहों में एक आठ साल का लड़का, गोल-मटोल, एक दाँत टूटा हुआ, खाँसता हुआ, रोता हुआ।

ज़िंदा।

कमला की चीख़ पूरे आसमान में गूँजी।

वो मुंडेर पर झुकी। उसकी बाँहें नीचे बढ़ीं। मैंने बबलू को ऊपर उठाया। उसकी माँ ने उसे पकड़ा। और खींच लिया। और अपनी छाती से लगा लिया। और ज़मीन पर बैठ गई, उसे झुलाती हुई, उसके बालों को चूमती हुई, एक ऐसी आवाज़ में रोती हुई जो किसी शब्द में नहीं बँध सकती।

भीड़ ख़ामोश थी।

मैं मुंडेर पर चढ़ा और गिर गया। धूल में। पीठ के बल। आसमान की तरफ़ मुँह किए। घुँघरू मेरे मुँह से निकलकर मेरी छाती पर गिरा।

किसी ने कुछ नहीं कहा।

फिर एक परछाईं मेरे ऊपर आई। सरपंच रामकिशोर यादव। उन्होंने मुझे देखा। बहुत देर तक। फिर उन्होंने अपना हाथ बढ़ाया।

मैंने उसे पकड़ा। उन्होंने मुझे उठाया।

और उन्होंने कुछ नहीं कहा। बस सिर झुका लिया।

सूरज आधे घंटे बाद निकला। तैंतीसवीं से।

और भीड़ ने उसे देखा।

पहली बार। पूरा। उसका पत्थर वाला चेहरा। उसकी पत्थर वाली बाँह, कंधे तक। उसकी गर्दन, जिस पर भूरी-हरी दरारें ऊपर-नीचे फैली थीं। उसकी अकेली बची हुई आँख। वो मुंडेर पर रेंगता हुआ आया, और उसकी माँ — जो भीड़ में थीं — दौड़कर उसके पास पहुँचीं।

गाँव वालों ने अपनी आँखों से वो देखा जो मैं चौदह दिन से देख रहा था।

और मैंने उनके चेहरों पर वो बदलाव देखा। शक से डर। डर से समझ। और समझ से एक ऐसी चुप्पी, जिसमें अब कोई पत्थर नहीं था।

सूरज ने अपना दायाँ हाथ उठाया। मेरी तरफ़। उँगलियाँ दिखाईं।

सात।

बबलू ठीक था।

वैद्य ने देखा। कहा कि बच्चा बिल्कुल ठीक है। थोड़ा कमज़ोर, थोड़ा ठंडा — पर ठीक।

दोपहर को मैं कमला के घर गया। मामी ने ज़ोर दिया था। बबलू अपनी खाट पर बैठा था, एक कंबल में लिपटा, हाथ में एक गुड़ की डली। उसने मुझे देखा और मुस्कुराया। उसका टूटा हुआ दाँत।

"गिनती वाले चाचा," उसने कहा। पर इस बार उसकी आवाज़ में कोई खेल नहीं था। बस एक शर्मीली ख़ुशी।

मैंने अपनी बाईं आँख से उसे देखा।

मेरी बाईं कलाई से एक धागा निकलता था। सफ़ेद। पारदर्शी। चाँदी जैसा चमकता हुआ। और वो बबलू की कलाई तक जाता था। वहाँ एक छोटी-सी गाँठ में बँधा हुआ।

अब वो मेरा था। या मैं उसका था। मुझे नहीं पता कौन-सा ज़्यादा सच था।

"चाचा," बबलू ने धीरे से कहा, जब उसकी माँ रसोई में गई, "नीचे एक लड़का था। पानी में। बहुत नीचे। सफ़ेद कुर्ते वाला। जब मैं ऊपर आ रहा था, उसने मुझसे बात की।"

"क्या कहा?"

"कहा कि उसके बाबा को बोल देना कि वो ठीक है। कि उसे ठंड नहीं लगती अब। और कि वो लोरी सुनता है। हर रात।"

शंकर।

"बोल दूँगा," मैंने कहा। मेरी आवाज़ रुँध गई थी।

मैं सोच रहा था उस बूढ़े आदमी के बारे में, जो चौंतीस साल से एक बंद कमरे में बैठकर एक मिट्टी के कलश को लोरी सुनाता था। बिना ये जाने कि कोई उसे सुनता भी है या नहीं।

वो सुनता था। शंकर सुनता था। हर रात।

कुछ बातें सिर्फ़ एक बच्चा ही नीचे से ऊपर ला सकता है।

बबलू ने सिर हिलाया। फिर उसने कहा, "पानी चाहिए, मम्मी।"

कमला ने रसोई से एक स्टील का गिलास लाकर उसे दिया। मटके से भरा हुआ। बबलू ने दोनों हाथों से पकड़ा और पीने लगा। गट-गट-गट।

और मैंने — पता नहीं क्यों, आदत पड़ गई थी — उस गिलास में झाँका।

पानी की सतह। स्टील के किनारे। और उसमें बबलू का चेहरा। उल्टा। झुका हुआ। पीता हुआ।

नहीं।

पानी में बबलू का चेहरा पी नहीं रहा था।

पानी में बबलू का चेहरा गिलास की तली में था। बहुत नीचे। जैसे गिलास एक कुआँ हो। उसकी आँखें खुली थीं। ऊपर की तरफ़ देखती हुईं। और उसके होंठ हिल रहे थे।

"...चौदह... चौदह... चौदह..."

बबलू ने गिलास नीचे रखा। मुस्कुराया। गुड़ का एक कौर लिया।

और उसे कुछ पता नहीं था।

मैं वहाँ से चला आया।

बबलू ऊपर आ गया था। पर पानी ने उसका कुछ अपने पास रख लिया था। जैसे मेरी एड़ियों की चमड़ी। जैसे अम्मा की आँखें। जैसे चाचा का वो जवान टुकड़ा, जो चौंतीस साल से ग्यारहवीं पर खड़ा था।

वो कभी कुछ पूरा वापस नहीं करती।

और जैसे ही मैं कमला के आँगन से बाहर निकला, मेरी जेब में रखा घुँघरू बजा। एक बार। बहुत धीरे।

जैसे किसी ने, बहुत नीचे से, मुस्कुराकर कहा हो — अब तुम दो हो।

भाग 14 समाप्त।

अगले भाग में — "पंद्रहवीं सीढ़ी": गाँव अब विक्रम के साथ है। और मास्टर ओमप्रकाश जी, जो गाँव का इतिहास जानते हैं, उसे स्कूल की पुरानी अलमारी में बंद एक पोथी दिखाते हैं। बावड़ी किसने बनवाई थी। कब। क्यों। और उसकी नींव में, पहला पत्थर रखने से पहले, क्या डाला गया था...

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