Pretika › Real Experiences › भानपुरा की बावड़ी - चालीस सीढ़ियाँ
भाग 15 — पंद्रहवीं सीढ़ी
Piyashi Atma · Real Experiences · 20 मिनट
- Writer
- Piyashi Atma
- Story
- भानपुरा की बावड़ी - चालीस सीढ़ियाँ
- Chapter
- 15 of 31
- Category
- Real Experiences
- Reading time
- 20 min
- Words
- 3988
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
इतिहास हमेशा उनका लिखा होता है जो सूखे में भी पानी पीते थे।
राजाओं का। मंत्रियों का। पंडितों का। जो महलों में बैठते थे और ताम्रपत्रों पर अपनी जीत खुदवाते थे। किताबों में उनके नाम होते हैं। उनकी मूर्तियाँ चौराहों पर खड़ी होती हैं। उनके बनवाए कुओं और बावड़ियों पर पर्यटक सेल्फ़ी लेते हैं और गाइड कहानियाँ सुनाते हैं।
पर हर बावड़ी के नीचे एक और कहानी होती है। जो किसी ताम्रपत्र पर नहीं लिखी गई। जिसका कोई नाम नहीं। जो पत्थर के नीचे दबी है, पानी के नीचे, अँधेरे के नीचे।
और कभी-कभी — बहुत कम — कोई उस कहानी को लिख देता है। चुपचाप। डरते हुए। किसी पोथी के आख़िरी पन्नों पर, जहाँ कोई नहीं देखता।
उस पंद्रहवें दिन, मैंने वो पन्ने पढ़े।
और मुझे पता चला कि मेरा नाम उस कहानी में पहले से लिखा था। ढाई सौ साल पहले से।
गाँव बदल गया था।
सुबह मेरे दरवाज़े पर किसी ने एक पोटली छोड़ी थी। अंदर रोटियाँ थीं, गुड़, और एक छोटी-सी कटोरी में घी। कोई नाम नहीं। कोई चिट्ठी नहीं।
गली में जो मिलता, सिर झुकाकर राम-राम कहता। बच्चे अब भी मुझे "गिनती वाले चाचा" कहते थे, पर अब उनकी माँएँ उन्हें डाँटती नहीं थीं। एक औरत ने — जिसने कल सुबह भीड़ में सबसे ज़ोर से चिल्लाया था — मेरे पास आकर मेरे माथे पर हाथ रखा और कुछ बुदबुदाया। कोई मंत्र। फिर बिना कुछ कहे चली गई।
और बच्चे अब भी "सीढ़ी-सीढ़ी" खेल रहे थे। पर अब उनकी माँएँ उन्हें रोकती नहीं थीं। वो बस दूर खड़ी होकर देखती रहतीं। चुपचाप। जैसे समझ गई हों कि ये खेल रोका नहीं जा सकता। बस देखा जा सकता है।
सुबह सात बजे मास्टर ओमप्रकाश जी मेरे दरवाज़े पर आए।
उन्होंने अपना चश्मा उतारा। पोंछा। फिर पहना। फिर उतारा। जैसे कुछ कहना चाहते हों और शब्द न मिल रहे हों।
"कल मैंने तुम्हें ग़लत समझा, विक्रम," उन्होंने आख़िर में कहा। "मैं शिक्षक हूँ। मुझे तथ्यों पर भरोसा करना चाहिए था, भीड़ पर नहीं।"
"कोई बात नहीं, मास्टर जी।"
"बात है।" उन्होंने चश्मा वापस पहना। "और इसीलिए मैं कुछ दिखाना चाहता हूँ। स्कूल में। आज दोपहर। जब बच्चे चले जाएँ।" उन्होंने आवाज़ धीमी की। "मेरे दादा पटवारी थे। अंग्रेज़ों के ज़माने के। उनके पास एक पोथी थी जो उनके दादा के दादा से चली आ रही थी। मैंने उसे बचपन में एक बार पढ़ा था। फिर डरकर स्कूल की अलमारी में बंद कर दिया। चालीस साल से मैंने उसे नहीं खोला।"
"उसमें क्या है?"
मास्टर जी ने पीपल की तरफ़ देखा। दूर। सूखे खेतों के पार।
"उस बावड़ी का जन्म," उन्होंने कहा।
सरकारी प्राथमिक विद्यालय, भानपुरा। दो कमरे, एक बरामदा, एक आँगन जिसमें वो हैंडपंप था जहाँ मैंने दो दिन पहले पानी में उल्टा चेहरा देखा था। मैंने उस तरफ़ नहीं देखा।
मास्टर जी मुझे पीछे वाले कमरे में ले गए। वहाँ एक लोहे की पुरानी अलमारी थी, जंग लगी हुई, जिस पर "रिकॉर्ड" लिखा था। उन्होंने अपनी जेब से एक चाबी निकाली। उनका हाथ काँप रहा था।
अलमारी में फ़ाइलें थीं। रजिस्टर। पुराने नक़्शे। और सबसे नीचे वाले ख़ाने में, पीछे की तरफ़, एक लाल कपड़े में लिपटी हुई एक चीज़।
मास्टर जी ने उसे निकाला। मेज़ पर रखा। कपड़ा खोला।
एक पोथी। हाथ से बने मोटे काग़ज़ की। पन्ने पीले, भूरे, किनारों पर टूटते हुए। दो लकड़ी की पट्टियों के बीच, एक मोटे धागे से बँधी हुई। और पूरी पोथी पर पानी के धब्बे थे। पुराने। बड़े-बड़े। जैसे किसी ने उसे कभी पानी में डुबो दिया हो और फिर सुखाया हो।
"पटवारी का रोज़नामचा," मास्टर जी ने कहा। "ज़्यादातर ज़मीन के हिसाब हैं। कौन-सा खेत किसका, कितना लगान। पर आख़िरी पंद्रह पन्ने अलग हैं।" उन्होंने धागा खोला। "वो किसी और ने लिखे थे। उस वक़्त के राज-लेखक ने। मुझे नहीं पता वो पटवारी के पास कैसे पहुँचे।"
उन्होंने पोथी के आख़िरी हिस्से तक पन्ने पलटे। लिखावट बदल गई। ज़मीन के हिसाबों की सीधी, नीरस लकीरों की जगह एक सुंदर, बहती हुई देवनागरी आ गई। पुरानी। शिरोरेखाएँ लंबी। कुछ अक्षर अलग तरह से बने हुए।
और पहले पन्ने के ऊपर, लाल स्याही में — जो अब भूरी हो गई थी — एक पंक्ति:
"जो लिखा है सो सत्य है। जो नहीं लिखा, सो उससे बड़ा सत्य है। भगवान मुझे क्षमा करें।"
मास्टर जी ने पढ़ना शुरू किया। धीरे-धीरे। पुराने शब्दों को आज की भाषा में ढालते हुए।
"संवत् अठारह सौ दो। भानपुर राज्य में सातवाँ बरस अकाल का। न आषाढ़ में मेघ, न सावन में। कुएँ सूखे, तालाब सूखे, नदी तीन कोस दूर चली गई। पशु मरे, फिर बालक। राव भानुप्रताप सिंह बुंदेला ने आज्ञा दी कि एक बावड़ी खोदी जाए, जो इतनी गहरी हो कि पाताल का जल छू ले।"
"सत्रह सौ पैंतालीस," मास्टर जी ने समझाया। "लगभग पौने तीन सौ साल पहले। गाँव का नाम भी उन्हीं राव भानुप्रताप के नाम पर पड़ा। भानपुर। फिर भानपुरा।"
"छह मास खुदाई हुई। सौ हाथ गहरी। पर जल न आया। मिट्टी सूखी रही, पत्थर सूखे रहे। तब राजपुरोहित पंडित गंगाधर मिश्र ने राव से कहा — महाराज, यह धरती जल यूँ न देगी। यह प्यासी नहीं, भूखी है। इसे नींव में प्राण चाहिए। एक जीवित नींव।"
मास्टर जी रुके। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।
मैं कुछ नहीं बोला। पर मेरे अंदर कुछ ठंडा उतरा।
पंडित गंगाधर मिश्र।
"आगे पढ़िए," मैंने कहा।
"कौड़ियाँ डाली गईं। गाँव की हर कुँवारी कन्या का नाम एक कौड़ी पर। राजपुरोहित ने आँखें बाँधकर एक कौड़ी उठाई। वह नाम निकला एक पनिहारिन का। सत्रह बरस की। जो रोज़ तीन कोस दूर नदी से राजमहल के लिए जल लाती थी, सिर पर घड़ा, पाँव में पायल। जिसकी पायल की आवाज़ से पूरा गाँव जागता था।"
सीढ़ी-सीढ़ी उतरी पनिहारिन। घड़ा लिया सिर पे, पाँव में पायल।
बच्चों का गीत। मेरी रीढ़ में सिहरन दौड़ी।
"उसका नाम था —"
मास्टर जी रुक गए।
"क्या?"
उन्होंने पोथी मेरी तरफ़ घुमाई। और उँगली से उस जगह को दिखाया।
नाम की जगह पर काग़ज़ खुरचा हुआ था।
किसी नुकीली चीज़ से। बार-बार। इतनी ज़ोर से कि काग़ज़ पतला होकर फट गया था, और उसके पीछे से अगले पन्ने की लिखावट झाँक रही थी।
बिल्कुल वैसे, जैसे मेरी और छोटू की तस्वीर में छोटू का चेहरा। जैसे चाचा और शंकर की तस्वीर में शंकर का चेहरा।
"पूरी पोथी में," मास्टर जी ने धीरे से कहा, "जहाँ भी उसका नाम आता है — ग्यारह जगह — वो खुरचा हुआ है। हर जगह। मैंने बचपन में सोचा था कि लेखक ने ख़ुद ऐसा किया होगा। डर से।" उन्होंने पोथी को वापस अपनी तरफ़ घुमाया। "पर अब मुझे यक़ीन नहीं है कि किसने किया।"
"पनिहारिन के पिता ने राव के पाँव पकड़े। उसकी माँ ने अपना माथा पत्थर पर फोड़ा। पर राजाज्ञा राजाज्ञा थी। और राजपुरोहित ने कहा — यह कन्या देवी बनेगी। इसकी पूजा होगी। जब तक यह बावड़ी रहेगी, भानपुर में कोई प्यासा न रहेगा। यह इसका सौभाग्य है।"
"कन्या को दुल्हन की तरह सजाया गया। लाल जोड़ा, जो रानी ने अपने ब्याह का दिया था। सोने का गोटा। राजपुरोहित ने स्वयं उसके केश गूँथे — सात लड़ों में, हर लड़ में एक हरा धागा। कहा कि यह जल-देवी का श्रृंगार है।"
सात लड़ों वाली चोटी। हर लड़ में हरा धागा। गुड्डी की चोटी। दिल्ली के अस्पताल में। जिसे "दीदी" ने बनाया था।
पौने तीन सौ साल पहले, मेरे पुरखे ने, उसकी चोटी ठीक उसी तरह गूँथी थी।
मेरे हाथ काँपने लगे। मैंने उन्हें मेज़ के नीचे छुपा लिया।
"फिर राजपुरोहित ने उसे गिनती सिखाई।"
मास्टर जी की आवाज़ धीमी हो गई।
"पनिहारिन अनपढ़ थी। दस से आगे न गिन पाती थी। राजपुरोहित ने उसे चालीस तक गिनना सिखाया। एक-एक दिन में एक-एक अंक। कहा — जब बावड़ी की सीढ़ियाँ बनेंगी, तुम हर दिन एक सीढ़ी उतरोगी, और गिनोगी। चालीसवें दिन, जब तुम चालीस बोलोगी, तुम देवी बन जाओगी।"
एक-एक दिन में एक-एक अंक।
गुड्डी की स्लेट। छोटू हर रात खिड़की पर आकर एक नया अंक सिखाता था।
वो वही कर रही थी जो उसके साथ किया गया था।
"उनतालीस दिन सीढ़ियाँ बनीं। हर दिन एक। हर दिन पनिहारिन एक सीढ़ी और नीचे उतरती, और गाँव ऊपर खड़ा होकर देखता, और वह गिनती — एक, दो, तीन — और उसकी पायल बजती। मैंने देखा। मैं वहाँ था। राव ने मुझे आज्ञा दी थी कि यह सब लिखूँ, ताम्रपत्र के लिए।"
"उनतालीसवें दिन वह सबसे नीचे पहुँची। वहाँ जहाँ मिट्टी गीली होने लगी थी। उस रात राजपुरोहित ने एक शिला मँगवाई। काले पत्थर की। उस पर उसने कन्या का नाम खुदवाया। और कुछ मंत्र। उल्टे अक्षरों में।"
"चालीसवें दिन की भोर। पनिहारिन सबसे नीचे खड़ी थी। पानी उसके टखनों तक आ गया था — पहला जल, छह मास में। गाँव ने जयकारा किया। और राजपुरोहित ने कहा — बोलो, पुत्री। चालीस।"
"वह ऊपर देख रही थी। हम सबकी ओर। उसकी आँखों में..."
यहाँ एक पानी का धब्बा था। बड़ा। पूरी पंक्ति धुल गई थी।
"...और उसने कहा — चालीस।"
"तब राजपुरोहित के संकेत पर उन्होंने उसे उलट दिया।"
मास्टर जी रुक गए। उनका गला सूख गया था। उन्होंने अपनी बोतल से पानी पीने के लिए उसे उठाया — और फिर रुककर, बिना पिए, वापस रख दिया।
"चार आदमियों ने उसे पकड़ा। सिर नीचे, पाँव ऊपर। और उस गीली मिट्टी में, सबसे नीचे, उल्टा गाड़ दिया। उसके केश — वे सात लड़ें — खोल दिए गए और चूने में मिला दिए गए। चूना हर सीढ़ी के नीचे डाला गया, हर पत्थर के जोड़ में। और उसके ऊपर — उसके पाँवों पर, जो ऊपर की ओर थे — वह काली शिला रखी गई। जिस पर उसका नाम था।"
"राजपुरोहित ने कहा — उल्टा इसलिए, कि वह कभी ऊपर न चढ़ सके। नाम पाँवों पर इसलिए, कि वह कभी अपना नाम न पढ़ सके।"
"उसी रात जल आया।"
कमरे में कोई आवाज़ नहीं थी। बाहर आँगन में कहीं दूर बच्चे गा रहे थे। वही धुन।
मास्टर जी ने अगला पन्ना पलटा। लिखावट अब बदल गई थी। पहले जितनी सधी हुई नहीं। काँपती हुई। जैसे लिखने वाले का हाथ स्थिर न रहा हो।
"उस रात जब बावड़ी भरी, मैंने बावड़ी से गिनती सुनी। एक से चालीस। फिर उल्टी — चालीस से एक। फिर सीधी। सारी रात। पूरे गाँव ने सुनी। किसी ने कुछ न कहा। राव ने उत्सव की घोषणा की। ब्राह्मणों को भोज दिया गया।"
"सत्रहवें दिन राजपुरोहित का पुत्र — बारह बरस का — भोर में बावड़ी की पहली सीढ़ी पर मिला। गीला। उसके टखनों पर उँगलियों के नीले निशान।"
"उस रात, बावड़ी से एक स्वर आया। उस पनिहारिन का। मैंने स्वयं सुना। उसने कहा —"
मास्टर जी ने धीरे से पढ़ा। शब्द-शब्द।
"'तुमने मुझे गिनना सिखाया। अब मैं तुम्हें सिखाऊँगी। जो गिनेगा, वह उतरेगा। हर सत्रह बरस — जितने बरस मैं जी — मैं एक गिनने वाला माँगूँगी। और जो चालीस पूरी करेगा, वह मेरी जगह पत्थर बनेगा, ताकि मैं उसके ऊपर से एक सीढ़ी और चढ़ सकूँ। जब तक कोई मुझे मेरे नाम से न पुकारे। मेरे असली नाम से। जो तुमने मेरे पाँवों तले दबा दिया।'"
मैंने अपनी आँखें बंद कर लीं।
"गंगाधर मिश्र ने अपने पुत्र को बचा लिया। मुझे नहीं पता कैसे। किसी और के बालक को उसकी जगह... नहीं, यह मैं नहीं लिखूँगा।"
"राव भानुप्रताप का वंश ठाकुरों में चलेगा। गंगाधर का वंश पुरोहितों में। और यह बावड़ी दोनों के रक्त को याद रखेगी। मैं जानता हूँ। मैं उसकी आँखें देख चुका हूँ।"
"मैं यह पन्ने किसी ताम्रपत्र पर नहीं लिखूँगा। राव को यह न दिखाऊँगा। इन्हें किसी ऐसे के पास छोड़ जाऊँगा जो सत्य से डरता हो पर उसे मिटाता न हो।"
"और यदि कभी कोई इसे पढ़े — गंगाधर के रक्त का कोई — तो जाने, कि कर्ज़ अभी बाक़ी है।"
पोथी वहीं ख़त्म हो गई।
मास्टर जी ने पोथी बंद की। धीरे से। जैसे कोई सोते बच्चे के ऊपर से चादर हटाता है।
"राव भानुप्रताप का वंश," उन्होंने कहा, "ठाकुर गजराज सिंह तक आया। अट्ठावन वाले मुखिया। देवदत्त के पिता।"
देवदत्त। चालीसवीं सीढ़ी। अड़सठ साल से पत्थर। राजा का ख़ून।
"और गंगाधर मिश्र का वंश..." मास्टर जी ने मेरी तरफ़ देखा। चश्मे के पीछे उनकी आँखों में दया थी, "...रामेश्वर प्रसाद मिश्र तक। तुम्हारे दादा। रघुनाथ। और तुम।"
मैं कुछ नहीं बोला।
"अट्ठावन में राजा का ख़ून चालीसवीं बना," मास्टर जी ने धीरे से कहा। "पचहत्तर और बानवे में... मुझे नहीं पता। पर बानवे में गिनने वाला मिश्र था। रघु।" वो रुके। "और दो हज़ार नौ में..."
"मैं," मैंने कहा।
"और अब भी।"
मैंने पोथी की तरफ़ देखा। उन खुरचे हुए नामों की तरफ़।
"मास्टर जी, मैं एक बार देख सकता हूँ? उस पन्ने को? जहाँ नाम था?"
उन्होंने पोथी खोली। उस पन्ने पर। पहली जगह, जहाँ उसका नाम खुरचा गया था।
मैंने अपनी दाईं आँख बंद की।
मेरी बाईं आँख अब लगभग पूरी सफ़ेद थी। उससे आज की दुनिया बहुत धुँधली दिखती थी — जैसे किसी गाढ़े कोहरे के पार से। पर पानी की दुनिया... पानी की दुनिया साफ़ होती जा रही थी।
और पोथी पर पानी के धब्बे थे। पुराने। बड़े।
पानी भूलता नहीं।
मैंने उस खुरचे हुए हिस्से को देखा। पहले कुछ नहीं। बस फटा हुआ काग़ज़।
फिर धब्बों में हलचल हुई। पुराना पानी। जो सूख चुका था, पर जिसने देखा था। और उस पानी की याद में, खुरचे हुए काग़ज़ पर, धीरे-धीरे, अक्षर उभरने लगे।
स्याही के नहीं। पानी के। हल्के, पारदर्शी, जैसे किसी गीली उँगली से लिखे गए हों।
पहला अक्षर उभरा।
स
मेरी साँस रुक गई। मैं आगे झुका।
दूसरा अक्षर उभरने लगा। उसकी शिरोरेखा। उसकी पहली लकीर—
और मेरी जेब में घुँघरू चीख़ा।
बजा नहीं — चीख़ा। एक तेज़, कर्कश, धातु की आवाज़, जो कमरे की दीवारों से टकराई। और पोथी पर, उस पन्ने पर, जहाँ अक्षर उभर रहे थे — स्याही फैलने लगी। काली। गीली। पुराने लिखे हुए शब्दों से, आसपास की पंक्तियों से, स्याही बहने लगी और उस खुरचे हुए हिस्से पर फैल गई। उन उभरते अक्षरों को ढकती हुई। निगलती हुई।
जैसे किसी ने बहुत तेज़ी से हाथ रखकर कोई राज़ छुपा लिया हो।
और मेरी बाईं आँख में एक दर्द उठा। पहले से कहीं गहरा। पहले से कहीं ठंडा। जैसे आँख के अंदर का आख़िरी हिस्सा भी जम गया हो।
मैं पीछे गिरा। कुर्सी से। ज़मीन पर।
"विक्रम!" मास्टर जी दौड़े।
मैंने अपनी आँखें खोलीं।
दाईं आँख से — मास्टर जी का चेहरा। स्कूल की छत। सामान्य।
बाईं आँख से — पानी।
सब कुछ पानी था। कमरा पानी में डूबा हुआ। मास्टर जी पानी में तैरते हुए, उनके बाल धीरे-धीरे लहराते हुए। और कमरे की दीवारों में, हर दरार से, बाल निकल रहे थे। काले। लंबे। चूने में मिले हुए। पौने तीन सौ साल से।
मेरी बाईं आँख अब पूरी सफ़ेद थी।
अब वो सिर्फ़ उसकी दुनिया देखती थी।
शाम को मैं अम्मा के पास गया। मेरी बाईं आँख पर मैंने एक कपड़ा बाँध लिया था — सूरज की तरह। उस आँख से दुनिया देखना अब ऐसा था जैसे किसी गहरे तालाब की तली से ऊपर देखना।
मैंने उन्हें सब बताया। पोथी। पनिहारिन। सात लड़ों वाली चोटी। उल्टी गड़ी हुई देह। पैरों पर नाम वाली शिला। गंगाधर मिश्र।
अम्मा बहुत देर तक चुप रहीं। उनकी उँगलियों में पायल घूमती रही।
"सीढ़ी-सीढ़ी उतरी पनिहारिन," उन्होंने आख़िर में धीरे से गुनगुनाया। बच्चों की धुन में। "अट्ठावन में हम यही गाते थे। पर हमारे गीत में एक पंक्ति और थी, जो आज के बच्चे नहीं गाते।"
"कौन-सी?"
अम्मा ने अपनी सफ़ेद आँखें बंद कर लीं। और गाया — बहुत धीमे, बहुत पुरानी आवाज़ में:
"नाम दबा है पाँव के नीचे, कौन पुकारे, कौन पुकारे..."
उनकी आवाज़ काँप गई।
"हम समझते थे ये बस तुकबंदी है," उन्होंने कहा। "किसी ने कभी नहीं पूछा कि किसका नाम। किसके पाँव।"
"अम्मा, पोथी की सूची में एक नाम था। उन्नीस सौ पचहत्तर। सरला।"
अम्मा की उँगलियाँ रुक गईं। पायल उनकी हथेली में ठहर गई।
"आपने कभी पचहत्तर के बारे में नहीं बताया," मैंने धीरे से कहा। "अट्ठावन बताया। बानवे बताया। पचहत्तर कभी नहीं।"
बहुत देर तक आँगन में कोई आवाज़ नहीं थी।
"सरला मेरी छोटी बहन थी," अम्मा ने कहा। उनकी आवाज़ में कुछ नहीं था। कोई भाव नहीं। जैसे बहुत पहले उन्होंने उस नाम के सारे भाव कहीं दफ़ना दिए हों। "मुझसे बारह बरस छोटी। अट्ठावन में वो बस एक बरस की थी। पचहत्तर में अठारह की। ब्याह तय हो गया था।"
"फिर?"
"फिर उसने गिनना शुरू किया।" अम्मा ने अपना चेहरा पीपल की तरफ़ घुमाया। "मैंने उसे बचाने की हर कोशिश की, विक्की। हर वो चीज़ जो मैंने अट्ठावन में सीखी थी। मेरी आधी आँख उस पानी को देखती थी — पर मैं उसे रोक नहीं पाई। वो चालीस तक नहीं पहुँची। पैंतीस पर... पैंतीस पर वो सुबह मुंडेर पर नहीं लौटी।"
"वो कहाँ है?"
"नीचे। कहीं। ज़ंजीर में।" अम्मा ने अपनी उँगली का धागा छुआ — देवदत्त वाला। "मैंने कभी उसे ढूँढने की हिम्मत नहीं की। अड़सठ बरस से मैं एक को ऊपर बुलाती रही, और इक्यावन बरस से दूसरी को नीचे भूलती रही।"
उन्होंने पहली बार मेरी तरफ़ ठीक से मुँह किया।
"अब समझा, बच्चा, मैं तुझसे पूरा सच क्यों नहीं कहती? क्योंकि मेरा पूरा सच इतना भारी है कि उसे कहते ही मैं डूब जाऊँगी।"
वहाँ से मैं सूरज के घर गया।
वो अपनी खाट पर लेटा था। अब वो उठ नहीं पाता था। उसकी माँ उसके सिरहाने बैठी थीं, एक गीले कपड़े से उसके चेहरे का वो छोटा-सा हिस्सा पोंछ रही थीं जो अब भी चमड़ी था — दाईं आँख के आसपास, होंठों का एक कोना।
उन्होंने मुझे देखा और उठकर मेरे लिए पानी लाईं। एक पीतल के गिलास में।
मैंने गिलास लिया। और उनकी तरफ़ नहीं देख पाया।
मेरी बाईं आँख पर कपड़ा बँधा था। पर मुझे उसकी ज़रूरत नहीं थी। मुझे पता था कि उनकी छाती में क्या है। वो हरा-काला पानी। वो धागा, जो बावड़ी से उनके फेफड़ों तक सत्रह साल से बह रहा था।
मेरा नाम पुकारेगा, तो ये सब धागे टूटेंगे। एक साथ।
"क्या हुआ, बेटा?" उन्होंने पूछा। "ऐसे क्यों देख रहा है?"
"कुछ नहीं, काकी।"
उन्होंने मेरे सिर पर हाथ रखा। ठंडा हाथ। पानी जैसा। और मुस्कुराईं।
"जो भी करना हो, कर लेना, विक्की," उन्होंने बहुत धीरे से कहा। इतना धीरे कि सूरज न सुन पाए। "मेरी चिंता मत करना। सत्रह बरस मुफ़्त के मिले थे। उधार के। उधार एक दिन लौटाना ही पड़ता है।"
मैंने गिलास का पानी नहीं पिया। बस उसे पकड़े बैठा रहा। जब तक वो गर्म नहीं हो गया।
उस रात सूरज फिर दो उतरा। चौंतीस। पैंतीस।
और मैं पंद्रहवीं पर।
पानी में, मेरी बाईं आँख पहली बार पूरी तरह साफ़ देख रही थी। बिना पलक खोले, बिना कोशिश किए। जैसे पानी उसका घर हो। मैंने बावड़ी की दीवारें देखीं — और अब मुझे पता था कि उनकी दरारों में क्या है। चूना। और उस चूने में उसके बाल। सात लड़ें। खोली हुई। हर पत्थर के नीचे फैली हुई।
और बहुत नीचे, देवदत्त के पत्थर के नीचे, अँधेरे में — एक काली शिला।
मैं उसे देख सकता था। पहली बार। उल्टी गड़ी हुई उस औरत के ऊपर उठे हुए पैरों पर रखी हुई। उस पर कुछ खुदा था। पर इतनी दूर से, इतने अँधेरे में, मैं पढ़ नहीं सकता था।
और तब वो बोली।
पहली बार। लंबे समय तक। बिना हँसी के। बिना मिठास के। बस एक आवाज़, बहुत पुरानी, बहुत थकी हुई, जो मेरे चारों ओर के पानी से आ रही थी।
"पढ़ ली पोथी?"
मैं चुप रहा।
"तेरे पुरखे ने मेरे बाल गूँथे थे। अपने हाथों से। बहुत प्यार से। मुझे लगा था वो मुझे बेटी मानता है। हर दिन वो मुझे एक अंक सिखाता था, और मेरी तारीफ़ करता था — 'बहुत होशियार है तू, पुत्री।'" आवाज़ एक पल को टूटी। "सत्रह बरस की थी मैं, गंगाधर के पोते। मुझे पढ़ना नहीं आता था। मुझे नहीं पता था कि उस शिला पर क्या खुदवाया जा रहा है।"
मेरी आँखों में — पानी में — आँसू आए।
"अब तू भी वही कर रहा है। मेरी तरफ़ उतर रहा है। एक-एक सीढ़ी। मेरा नाम पढ़ने के लिए। मुझे फिर से बाँधने के लिए। हमेशा के लिए। जैसे तेरे पुरखे ने किया था।"
"मैं बाँधना नहीं चाहता," मैंने कहा। पानी में। बुलबुलों में। मुझे नहीं पता वो सुन सकती थी या नहीं। "मैं बस चाहता हूँ कि ये रुके।"
"रुकेगा।" उसकी आवाज़ बहुत पास आई। मेरे कान के पास। "जिस दिन कोई मेरा नाम पुकारेगा, सब रुक जाएगा। पर सोच, गंगाधर के पोते। सोच, जिस दिन मैं रुकूँगी, उस दिन क्या-क्या रुकेगा।"
और मेरी बाईं आँख ने मुझे दिखाया।
धागे। पूरे गाँव से। सैकड़ों। नीचे आते हुए। पानी में। उसके बालों से जुड़ते हुए।
एक धागा — मोटा, तेज़ धड़कता हुआ — सूरज की माँ का। जो सत्रह साल से उन्हें साँस दे रहा था।
एक धागा — पतला, चाँदी जैसा — अम्मा की उँगली से देवदत्त तक।
और एक धागा — सफ़ेद, पारदर्शी — मेरी अपनी कलाई से। बबलू तक।
"मेरा नाम पुकारेगा, तो ये सब धागे टूटेंगे। एक साथ।" उसने फुसफुसाया। "सूरज की माँ की साँस। वो बच्चा जिसे तूने थामा है। वो पत्थर जिसे प्यारी अड़सठ बरस से चाहती है। सब।"
एक ठहराव।
"और तू? तू तब भी चालीसवीं पर होगा। पत्थर बनकर। क्योंकि मेरे पैरों तक पहुँचने के लिए पहले चालीसवीं बनना पड़ता है। तू नाम पढ़ेगा — और मेरी जगह वहीं रहेगा। हमेशा। उल्टा। अपना नाम अपने पैरों तले दबाए।"
"झूठ।"
"गंगाधर ने भी यही कहा था। जब मैंने चालीस बोला था।"
मैंने बाएँ हाथ से दीवार पकड़ी और ऊपर चढ़ा। और उसकी आवाज़ मेरे पीछे आती रही। न हँसती हुई। न चिढ़ाती हुई। बस थकी हुई। बहुत थकी हुई।
"सोचना, गंगाधर के पोते। पच्चीस सीढ़ियाँ बची हैं। सोचने का वक़्त है।"
सूरज सुबह निकला। पैंतीसवीं से।
हमने उसे खींचा। वो अब रेंग भी नहीं पा रहा था। पत्थर उसके पूरे चेहरे पर था — सिर्फ़ दाईं आँख और होंठों का एक कोना बचा था। उसकी गर्दन पूरी पत्थर। उसकी छाती का बायाँ हिस्सा। वो साँस लेता, तो उसकी छाती का सिर्फ़ आधा हिस्सा उठता।
उसने अपनी उँगलियाँ उठाईं। बहुत धीरे। जैसे हर उँगली का वज़न एक पत्थर जितना हो।
पाँच।
पाँच रातें। अगर वो हर रात दो ले। और मेरे पास पच्चीस सीढ़ियाँ। पच्चीस रातें।
मैं अपने दोस्त को पत्थर बनते देख रहा था, और उसे बचाने का एक ही रास्ता था — उस शिला तक पहुँचना, जिसके लिए मुझे ख़ुद पत्थर बनना था। और उस शिला पर लिखा नाम पढ़ना, जो उसकी माँ की साँस छीन लेता।
हर रास्ता किसी न किसी को डुबोता था।
शायद यही उसका असली खेल था। पौने तीन सौ साल से। सीढ़ियाँ नहीं। ये। हर गिनने वाले को ऐसी जगह ले आना, जहाँ कोई भी सही जवाब न बचे।
मैं घर लौट रहा था जब मास्टर जी दौड़ते हुए मेरे पास आए।
उनका चश्मा टेढ़ा था। उनकी साँस फूली हुई। उनके हाथ में वो पोथी थी, लाल कपड़े में लिपटी हुई।
"विक्रम," उन्होंने हाँफते हुए कहा। "रात को... मैं इसे घर ले गया था। तुम्हारे जाने के बाद। मैं... मैं फिर से पढ़ना चाहता था। पर सुबह जब खोला..."
उन्होंने पोथी खोली। आख़िरी पन्ने पर। जहाँ राज-लेखक ने लिखा था — कर्ज़ अभी बाक़ी है।
उस पन्ने के पीछे। जो कल ख़ाली था।
अब उस पर लिखा था।
हरी स्याही में। गीली। चमकती हुई। अभी-अभी लिखी हुई। एक सूची। नाम और साल। एक के नीचे एक।
संवत् १८१९ — गंगाधर का पौत्र संवत् १८३६ — ... संवत् १८५३ — ...
मैंने नीचे देखा। नाम बदलते गए। साल बदलते गए। संवत् से ईस्वी सन् में। पन्ना भरता गया।
१९५८ — देवदत्त, भानुप्रताप का रक्त १९७५ — सरला १९९२ — रघुनाथ मिश्र, गंगाधर का रक्त (शंकर ने चुकाया) २००९ — विक्रम मिश्र, गंगाधर का रक्त (कन्हैया ने चुकाया) २०२६ — विक्रम मिश्र, गंगाधर का रक्त
मेरा नाम। दो बार।
और उसके नीचे, एक आख़िरी पंक्ति। बाक़ियों से ज़्यादा गीली। स्याही अब भी बह रही थी, नीचे की तरफ़।
(बबलू चुकाएगा)
मैंने अपनी बाईं कलाई की तरफ़ देखा।
मेरी दाईं आँख में — कुछ नहीं। बस मेरी कलाई।
मेरी बाईं आँख में — वो धागा। सफ़ेद। पारदर्शी। मेरी नस से निकलकर गाँव की तरफ़ जाता हुआ। कमला के घर की तरफ़। एक आठ साल के लड़के की कलाई तक।
और वो धागा धड़क रहा था।
मेरे दिल की धड़कन के साथ।
भाग 15 समाप्त।
अगले भाग में — "सोलहवीं सीढ़ी": विक्रम ओरछा जाता है। राजदरबार के पुराने अभिलेखागार में। वहाँ, राव भानुप्रताप के ताम्रपत्र के नीचे, एक और पन्ना है — जो राज-लेखक ने नहीं, गंगाधर मिश्र ने ख़ुद लिखा था। और उसमें "चालीस" का असली मतलब है... जो किसी सीढ़ी के बारे में नहीं है।
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