Pretika › Real Experiences › भानपुरा की बावड़ी - चालीस सीढ़ियाँ
भाग 16 — सोलहवीं सीढ़ी
Piyashi Atma · Real Experiences · 20 मिनट
- Writer
- Piyashi Atma
- Story
- भानपुरा की बावड़ी - चालीस सीढ़ियाँ
- Chapter
- 16 of 31
- Category
- Real Experiences
- Reading time
- 20 min
- Words
- 3981
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
हर माफ़ी की एक उम्र होती है।
अगर वो वक़्त पर माँगी जाए — उसी दिन, उसी पल, जब ग़लती हुई — तो वो एक पुल बन सकती है। दो लोगों के बीच। दो दिलों के बीच।
अगर देर से माँगी जाए — महीनों बाद, सालों बाद — तो वो एक पत्थर बन जाती है। जिसे आप उस इंसान के सामने रखते हैं, और वो उसे उठाए या न उठाए, उसकी मर्ज़ी।
और अगर वो बहुत देर से माँगी जाए — इतनी देर से कि जिससे माँगनी थी, वो अब इंसान ही न रहा हो — तो वो क्या बनती है?
उस सोलहवें दिन, ओरछा के एक धूल भरे कमरे में, मैंने पौने तीन सौ साल पुरानी एक माफ़ी पढ़ी।
मेरे पुरखे की। उस लड़की से। जिसे उसने उल्टा गाड़ दिया था।
और उस माफ़ी में मुझे "चालीस" का असली मतलब मिला।
वो सीढ़ियों के बारे में नहीं था।
"ओरछा?" मास्टर जी ने अपना चश्मा उतारा।
सुबह के छह बजे थे। मैं उनके दरवाज़े पर खड़ा था। मेरी बाईं आँख पर काला कपड़ा बँधा था। रात को सूरज फिर दो उतरा था — छत्तीस, सैंतीस — और मैं सोलहवीं से लौटा था, हाँफता हुआ, हरा पानी उगलता हुआ।
"पोथी में लिखा था कि राव भानुप्रताप ने ताम्रपत्र बनवाया था," मैंने कहा। "बावड़ी के लिए। अगर वो ताम्रपत्र कहीं बचा है, तो उसके साथ और भी कुछ हो सकता है। भानपुर तो छोटी जागीर थी। उसके काग़ज़ात कहाँ जाते?"
मास्टर जी ने चश्मा वापस पहना। उनकी आँखों में कुछ चमका — एक शिक्षक की वो चमक, जिसे कोई ऐसा सवाल मिल गया हो जिसका जवाब किताबों में ढूँढा जा सके।
"ओरछा दरबार," उन्होंने कहा। "आसपास की सारी बुंदेला जागीरें ओरछा के अधीन थीं। उनके काग़ज़ात, ताम्रपत्र, सब वहीं जाते थे। महल के एक हिस्से में पुराना अभिलेखागार है। ज़्यादातर लोग जानते भी नहीं।" उन्होंने अपनी घड़ी देखी। "मेरा एक पुराना सहपाठी वहाँ चौकीदार है। शिवदयाल। अगर अभी निकलें, तो दोपहर तक पहुँच जाएँगे। और शाम तक लौट आएँगे।"
"अँधेरे से पहले," मैंने कहा।
"अँधेरे से पहले।"
पीपल पर वही पीला टेम्पो खड़ा था।
वही। पीछे लिखा था — "बुरी नज़र वाले तेरा मुँह काला"। वही पान से लाल दाँतों वाला आदमी। जिसने पहले दिन मुझे पीपल पर उतारा था, मेरी कलाई पकड़कर कहा था — उधर मत देखना।
उसने मुझे देखा। मेरी बँधी हुई आँख। मेरे चेहरे की थकान। और कुछ नहीं कहा। बस पीछे की सीट से धूल झाड़ दी।
"झाँसी तक?" मास्टर जी ने पूछा।
"ओरछा तक," उसने कहा। "जहाँ तक जाना हो।"
रास्ते में, जब टेम्पो सूखे खेतों के बीच से उछलता हुआ जा रहा था, उसने बिना मुड़े कहा:
"लल्लन नाम है मेरा, भैया। सोलह दिन पहले आपको पीपल पर छोड़ा था। तब से रोज़ सुबह यहाँ आकर खड़ा होता हूँ।"
"क्यों?"
उसने कंधे उचकाए। "पता नहीं। लगता था आपको कभी न कभी कहीं जाना पड़ेगा। और कोई और आपको ले जाने वाला नहीं होगा।"
उसने शीशे में मुझे देखा।
"मेरा भाई था। बानवे में। शंकर के साथ खेलता था। वो भी उस गीत को गाता था।" उसकी आवाज़ धीमी हो गई। "वो बच गया था। पर वो कभी पहले जैसा नहीं रहा। आज भी रात को उठकर घर की सीढ़ियाँ गिनता है।"
ओरछा का महल बेतवा नदी के किनारे है। पत्थर की विशाल इमारतें, गुंबद, छतरियाँ, जिन पर सदियों की धूप और बारिश ने अपने निशान छोड़े हैं। पर्यटक घूम रहे थे। गाइड ऊँची आवाज़ में कहानियाँ सुना रहे थे। एक विदेशी जोड़ा एक छतरी के सामने सेल्फ़ी ले रहा था।
मास्टर जी मुझे उस भीड़ से दूर ले गए। महल के पीछे। एक ऐसे हिस्से में जहाँ पर्यटक नहीं आते। एक छोटा-सा दरवाज़ा, लोहे का, जिस पर पुरातत्व विभाग का एक फीका बोर्ड लगा था। "प्रवेश निषेध"।
दरवाज़े के बगल में एक बूढ़ा आदमी प्लास्टिक की कुर्सी पर बैठा बीड़ी पी रहा था। सफ़ेद कुर्ता, सफ़ेद टोपी। उसने मास्टर जी को देखा और उसके चेहरे पर मुस्कान फैल गई।
"ओमप्रकाश! चालीस बरस बाद!"
"शिवदयाल।"
दोनों गले मिले। फिर मास्टर जी ने उसे एक तरफ़ ले जाकर कुछ बताया। धीरे-धीरे। शिवदयाल की मुस्कान धीरे-धीरे ग़ायब होती गई। उसने मेरी तरफ़ देखा। मेरी बँधी हुई आँख की तरफ़।
"भानपुर?" उसने आख़िर में कहा। "भानपुर की बावड़ी?"
मास्टर जी ने सिर हिलाया।
शिवदयाल ने अपनी बीड़ी ज़मीन पर फेंकी और पैर से कुचल दी। फिर अपनी जेब से चाबियों का एक गुच्छा निकाला।
"चालीस बरस से यहाँ हूँ," उसने कहा। "और चालीस बरस में दो बार किसी ने भानपुर के काग़ज़ माँगे। एक बार बानवे में। एक पंडित आया था। मिश्र। बूढ़ा। रोता हुआ।" उसने मेरी तरफ़ देखा। "दूसरी बार आज।"
दादाजी।
अभिलेखागार एक लंबा, नीचा कमरा था। पत्थर की दीवारें। ऊपर छोटे-छोटे रोशनदान, जिनसे धूप की पतली, धूल भरी लकीरें अंदर आ रही थीं। और हर तरफ़ लकड़ी की अलमारियाँ, लोहे के संदूक, कपड़े में लिपटी पोथियाँ। हवा में एक गंध थी — पुराना काग़ज़, दीमक, और कुछ और। कुछ सीलन भरा।
शिवदयाल हमें कमरे के सबसे पीछे वाले कोने में ले गया। वहाँ एक लोहे का संदूक था। उस पर एक पुरानी पर्ची चिपकी थी — "जागीरें: भानपुर, टेहरका, बरुआ।"
उसने संदूक खोला।
अंदर कपड़े में लिपटी चीज़ें थीं। उसने एक-एक करके उन्हें निकाला। फ़रमान। नक़्शे। लगान के हिसाब।
और एक ताम्रपत्र।
ताँबे की एक मोटी, भारी पट्टी। हरी पड़ चुकी। किनारों पर मुड़ी हुई। उस पर खुदे हुए अक्षर — पुरानी देवनागरी, गहरे खुदे हुए, जैसे किसी ने उन्हें हथौड़े से ठोका हो।
मास्टर जी ने अपना चश्मा ठीक किया और पढ़ा।
"स्वस्ति श्री। संवत् अठारह सौ दो। राव भानुप्रताप सिंह बुंदेला, भानपुर के स्वामी, अपनी प्रजा के कल्याण हेतु यह जलाशय निर्मित करवाते हैं। जलदेवी की कृपा से यह सदा भरा रहे। इसके जल पर सबका समान अधिकार। जो इसे दूषित करे, उस पर गौ-हत्या का पाप।"
बस इतना।
कोई पनिहारिन नहीं। कोई गंगाधर नहीं। कोई उल्टी गड़ी हुई देह नहीं। बस "जलदेवी की कृपा"।
इतिहास उनका लिखा होता है जो सूखे में भी पानी पीते थे।
"बानवे में," शिवदयाल ने कहा, "वो बूढ़ा पंडित भी यही पढ़कर रोया था। फिर उसने मुझसे पूछा कि क्या इसके साथ कुछ और था। मैंने कहा नहीं।"
उसने ताम्रपत्र को उल्टा किया।
पीछे की तरफ़, ताँबे पर, कपड़े की एक परत चिपकी थी। पुराना, मोटा कपड़ा। लाल। जो अब लगभग भूरा हो गया था। और उस कपड़े के अंदर, बीच में, कुछ सिला हुआ था। एक चौकोर उभार।
"मैंने उसे झूठ कहा था," शिवदयाल ने धीरे से कहा। "बानवे में। मैंने ये उसे नहीं दिखाया। मेरे गुरु ने, जो मुझसे पहले यहाँ थे, मुझसे कहा था — ये कपड़ा कभी मत खोलना। और किसी मिश्र को कभी मत दिखाना। क्योंकि ये उन्हीं के लिए है, और जिस दिन कोई मिश्र इसे पढ़ेगा, उस दिन कुछ ख़त्म होगा।"
उसने मेरी तरफ़ देखा।
"बानवे में मैं डर गया था। वो पंडित बहुत बूढ़ा था। बहुत टूटा हुआ। मुझे लगा अगर उसने इसे पढ़ा तो वो ख़त्म हो जाएगा।" उसने एक छोटा-सा चाकू निकाला। "तुम जवान हो। शायद तुम झेल लो।"
उसने कपड़े की सिलाई काटी।
अंदर एक काग़ज़ था।
तह किया हुआ। हाथ से बना मोटा काग़ज़। और जब मास्टर जी ने उसे खोला, तो उस पर एक अलग लिखावट थी। पोथी वाले राज-लेखक की सुंदर, बहती हुई लिखावट नहीं।
ये लिखावट भारी थी। कठोर। हर अक्षर गहरा दबा हुआ, जैसे लिखने वाले ने क़लम को काग़ज़ में गाड़ दिया हो। और जगह-जगह स्याही फैली हुई थी। पानी से नहीं।
आँसुओं से।
और सबसे ऊपर लिखा था:
"मेरे वंशजों के लिए। गंगाधर मिश्र।"
मास्टर जी ने पढ़ना शुरू किया। पर कुछ पंक्तियों के बाद वो रुक गए। उन्होंने काग़ज़ मेरी तरफ़ बढ़ाया।
"ये तुम्हें पढ़ना चाहिए, विक्रम," उन्होंने कहा। "ख़ुद। ये तुम्हारे लिए लिखा गया है।"
मैंने काग़ज़ लिया। मेरी दाईं आँख से। बाईं पर कपड़ा बँधा रहा।
और पढ़ा।
"मेरे रक्त में जो भी जन्मे, और यह पढ़े — जाने, कि तेरे पुरखे ने पाप किया।
"मैंने उसे बेटी कहा। मैंने उसके केश गूँथे। मैंने उसे गिनना सिखाया। और चालीसवें दिन, जब उसने मेरी ओर देखकर चालीस कहा — भरोसे से, जैसे बेटी पिता पर करती है — मैंने संकेत किया, और उन्होंने उसे उलट दिया।
"उसकी आँखें। मैं अब भी उसकी आँखें देखता हूँ। हर रात। उनमें क्रोध नहीं था, उस पल में। केवल आश्चर्य। जैसे किसी बालक को यह समझ ही न आए कि उसके साथ क्या हो रहा है।
"मैंने राव से कहा था कि यह एक बलि है, और बलि से जल आता है। यह झूठ था। मैं जानता था। मेरे गुरु ने मुझे बताया था कि यह जो अनुष्ठान है, यह बलि का नहीं, बंधन का है। वह बावड़ी जल के लिए नहीं खोदी गई थी। वह एक कारागार थी।"
मेरे हाथ काँपने लगे।
"भानपुर की धरती के नीचे कुछ था। बहुत पुराना। जो सूखे में जागता था और प्यासा नहीं, भूखा होता था। मेरे गुरु ने कहा था — उसे बाँधना है, तो उसे एक देह देनी होगी। एक ऐसी देह जो भरोसा करती हो। भरोसे से बड़ा कोई बंधन नहीं।
"वह पनिहारिन उस चीज़ को बाँधने के लिए बलि नहीं थी। वह उसका पिंजरा थी।
"और मैंने उसे पिंजरा बनाया, और उस पिंजरे में वह चीज़ घुस गई, और वे दोनों एक हो गए। जिसे तुम बावड़ी वाली कहते हो — वह केवल वह लड़की नहीं है। वह वह लड़की है, और उसके भीतर बँधा वह पुराना भूख। दोनों। एक-दूसरे में उलझे। एक-दूसरे को खाते।"
मैंने काग़ज़ नीचे रखा। मेरी साँस तेज़ चल रही थी।
"क्या हुआ?" मास्टर जी ने पूछा।
मैंने कुछ नहीं कहा। मैंने बस पढ़ना जारी रखा।
"अब सुन, मेरे रक्त। जो सबसे आवश्यक है।
"वह चालीस गिनती नहीं है।
"सीढ़ियाँ उनतालीस हैं। मैंने गिनवाई थीं। और जो चालीसवाँ पत्थर बनता है, वह उसका नहीं, उस भूख का आहार है। हर पत्थर एक प्राण है। और हर प्राण के साथ, वह भूख एक पग ऊपर उठती है।
"मेरे गुरु ने कहा था — जब चालीस प्राण पूरे होंगे, वह पिंजरा टूटेगा। वह बावड़ी से निकलेगी। पर तब वह पनिहारिन नहीं होगी। वह केवल भूख होगी। और उसके पास हर कुआँ होगा, हर तालाब, हर घाट, हर वह पात्र जिसमें जल है।
"चालीस सीढ़ियाँ नहीं। चालीस प्राण।"
मेरे मुँह से कुछ निकला। एक आवाज़। मुझे नहीं पता क्या।
मास्टर जी ने मेरे हाथ से काग़ज़ ले लिया। उन्होंने वो हिस्सा पढ़ा। और उनका चेहरा सफ़ेद पड़ गया।
"चालीस प्राण," उन्होंने फुसफुसाया।
"मास्टर जी," मैंने कहा, "वो सूची। पोथी के पीछे वाली। हरी स्याही वाली। आप उसे लाए हैं?"
उन्होंने अपने झोले से पोथी निकाली। लाल कपड़ा खोला। आख़िरी पन्ना।
हम दोनों ने गिनना शुरू किया।
मैं गिनना नहीं चाहता था। मेरा पूरा शरीर चीख़ रहा था कि मत गिन। पर ये गिनती अलग थी। ये सीढ़ियाँ नहीं थीं। ये नाम थे।
मास्टर जी ने उँगली रखी। हर नाम पर। और धीरे-धीरे, फुसफुसाकर, गिना।
संवत् अठारह सौ उन्नीस — गंगाधर का पौत्र। एक।
अठारह सौ छत्तीस। दो।
और आगे। हर सत्रह साल। कुछ सालों में दो नाम थे — एक गिनने वाला, और एक जिसने उसकी जगह "चुकाया"। मास्टर जी दोनों को गिनते गए।
उन्नीस सौ अट्ठावन — देवदत्त। पैंतीस।
उन्नीस सौ पचहत्तर — सरला। छत्तीस।
उन्नीस सौ बानवे — रघुनाथ मिश्र (शंकर ने चुकाया)। मास्टर जी रुके। "रघु ज़िंदा है। पर शंकर गया।" सैंतीस।
दो हज़ार नौ — विक्रम मिश्र (कन्हैया ने चुकाया)। अड़तीस।
मास्टर जी की उँगली अगली पंक्ति पर गई।
दो हज़ार छब्बीस — विक्रम मिश्र।
उन्होंने कुछ नहीं कहा। उनकी उँगली वहीं रुकी रही।
उनतालीस।
और उसके नीचे। हरी स्याही। गीली।
(बबलू चुकाएगा)
चालीस।
कमरे में कोई आवाज़ नहीं थी। रोशनदान से आती धूप की लकीरों में धूल के कण तैर रहे थे। धीरे-धीरे। जैसे पानी में।
"मैं उनतालीसवाँ हूँ," मैंने कहा।
मेरी आवाज़ मुझे किसी और की लगी।
"और अगर मैं चालीसवीं सीढ़ी पर पहुँचकर पत्थर बनता हूँ, तो मैं उनतालीसवाँ प्राण होऊँगा। और क्योंकि मैंने बबलू का हाथ थामा है — क्योंकि वो मुझसे बँधा है — वो मेरे साथ नीचे जाएगा। चालीसवाँ।"
मास्टर जी ने कुछ नहीं कहा।
"और तब पिंजरा टूटेगा।"
मैंने अपनी बाईं आँख से कपड़ा हटाया। पता नहीं क्यों। शायद मुझे देखना था।
और उस पूरी सफ़ेद आँख से, उस धूल भरे अभिलेखागार में, मैंने देखा — हर दीवार की दरार से पानी रिस रहा था। पतली, काली लकीरें। और उस पानी में बाल थे। ओरछा में। भानपुरा से पचास किलोमीटर दूर।
वो यहाँ भी थी। हर जगह जहाँ पानी था। बस अभी पिंजरे में। अभी।
"मैंने उसका हाथ पकड़कर उसे बचाया था," मैंने धीरे से कहा। "बबलू को। और उसी ने उसे चालीसवाँ बना दिया।"
"तुम्हें पता नहीं था।"
"उसे पता था।" मैंने आँख पर कपड़ा वापस बाँधा। "उसे हमेशा पता होता है। वो हर बार ऐसी जगह ले आती है, जहाँ हर अच्छा काम किसी न किसी को डुबोता है।"
"आगे पढ़ो," शिवदयाल ने कहा।
हम दोनों चौंके। वो दरवाज़े पर खड़ा था। पूरे वक़्त। चुपचाप।
"काग़ज़ में और है," उसने कहा। "मेरे गुरु ने बताया था। आख़िरी हिस्सा। उन्होंने कहा था कि वही सबसे ज़रूरी है।"
मैंने काग़ज़ फिर से उठाया। आख़िरी हिस्सा। लिखावट अब और भारी। और टेढ़ी। जैसे लिखने वाला बहुत बूढ़ा हो गया हो, या बहुत थका हुआ।
"मैंने उसका नाम उस शिला पर खुदवाया। अपने हाथ से अक्षर बनाए, संगतराश ने उन्हें खोदा। पर मैं इस पत्र में उसका नाम नहीं लिख सकता। मैंने प्रयास किया है। सौ बार। हर बार मेरा हाथ काँपता है, स्याही फैलती है, और मेरे मुँह में जल भर जाता है। वह मुझे अपना नाम नहीं लिखने देती। या शायद वह भूख नहीं लिखने देती, जो उसमें बँधी है।
"इतना कह सकता हूँ — उसके पिता ने उसका नाम उस नदी के नाम पर रखा था, जिससे वह जल भरती थी। तीन कोस पर। जो अब शायद सूख चुकी हो, जब तू यह पढ़े।
"और यह भी जान — नाम पढ़ना ही एकमात्र मार्ग नहीं है। नाम पढ़ने से वह बँधेगी। सदा के लिए। पिंजरा पत्थर का हो जाएगा। पर वह लड़की भी उसी पिंजरे में सदा के लिए बँध जाएगी, उस भूख के साथ। और यह मैंने पहले भी एक बार किया है।
"एक दूसरा मार्ग है। जो मैं कायर होने के कारण न कर सका।
"उससे क्षमा माँगना। उसके पाँवों तले। उसकी शिला हटाकर। उसे सीधा करके। उसकी जगह लेकर।
"यदि वह लड़की क्षमा कर दे — तो वह भूख से अलग हो जाएगी। और भूख, बिना पिंजरे के, बिना देह के, बिना भरोसे के — मिट जाएगी। क्योंकि भरोसे के बिना वह कुछ नहीं बाँध सकती।
"पर यदि वह क्षमा न करे..."
यहाँ पंक्ति अधूरी थी। उसके बाद स्याही का एक बड़ा धब्बा। आँसुओं का। और फिर, पन्ने के बिल्कुल नीचे, बहुत छोटे अक्षरों में:
"...मैं नहीं जानता। मैं कभी जानने का साहस न कर सका। मुझे क्षमा करना, मेरे रक्त। मैंने यह बोझ तुझ पर छोड़ा।"
निकलने से पहले मैं कुछ देर बेतवा के किनारे खड़ा रहा।
नदी चौड़ी थी। धीमी। उसके पानी में छतरियों की परछाइयाँ काँप रही थीं। किनारे पर पत्थर की सीढ़ियाँ थीं — एक घाट — जहाँ कुछ औरतें कपड़े धो रही थीं और बच्चे पानी में छपाक-छपाक खेल रहे थे।
मैंने कपड़ा हटाया और बाईं आँख से देखा।
घाट की सीढ़ियाँ पानी में उतरती जा रही थीं। नीचे। और नीचे। वहाँ भी। और पानी के नीचे, बहुत गहराई में, नदी की तली पर — बाल थे। काले। लंबे। नदी की धारा के साथ लहराते हुए। जैसे कोई बहुत बड़ी चीज़ वहाँ सो रही हो, और उसके बाल पानी में फैले हों।
वो यहाँ सोती थी। अभी। पिंजरे के बाहर का उसका हिस्सा। इंतज़ार करता हुआ।
एक बच्चा घाट की सबसे निचली सीढ़ी पर खड़ा होकर नदी में झाँक रहा था। और उसके होंठ हिल रहे थे।
मैंने आँख बंद कर ली और मुड़ गया।
हम शाम पाँच बजे ओरछा से निकले।
लल्लन का टेम्पो सूखे खेतों के बीच से उछलता रहा। सूरज पश्चिम में झुकने लगा। मास्टर जी चुप थे। मैं चुप था।
"तीन कोस," मास्टर जी ने आख़िर में कहा। "भानपुरा से तीन कोस। नौ-दस किलोमीटर।" उन्होंने अपना चश्मा उतारा। "वहाँ कोई नदी नहीं है, विक्रम। अब। सिर्फ़ एक सूखा नाला। जो कहाँ से आता है और कहाँ जाता है, किसी को नहीं पता। बरसात में भी उसमें पानी नहीं भरता।"
"उसका कोई नाम है?"
मास्टर जी ने बहुत देर तक सोचा।
"गाँव के बूढ़े उसे 'रोती नदी' कहते हैं," उन्होंने कहा। "क्योंकि कहते हैं रात को उसके सूखे पाट से किसी के रोने की आवाज़ आती है। पर उसका असली नाम..." उन्होंने सिर हिलाया। "किसी को याद नहीं। जैसे किसी ने उसे भी खुरच दिया हो।"
मैंने टेम्पो की खिड़की से बाहर देखा। सूखे खेत। फटी ज़मीन। और कहीं दूर, पश्चिम में, सूरज की लाल रोशनी में, एक पतली, टेढ़ी-मेढ़ी लकीर। ज़मीन में धँसी हुई। सूखी।
एक नदी, जिसका नाम खो गया था। उस लड़की के साथ।
हम अँधेरा होने से ठीक पहले भानपुरा पहुँचे।
मैं सीधे सुशीला मामी के घर गया। गुड्डी आँगन में बैठी थी, मामी की गोद में सिर रखे, और मामी उसके बालों में तेल लगा रही थीं। धीरे-धीरे। जैसे सत्रह साल बाद उनके हाथों को फिर से कोई काम मिल गया हो।
गुड्डी ने मुझे देखा और उठकर दौड़ी। "चाचा!"
मैंने उसे उठाया। वो अब हल्की लग रही थी। पहले से ज़्यादा हल्की। जैसे इन दिनों ने उसके अंदर से कुछ निकाल लिया हो।
"पापा कैसे हैं?" उसने पूछा।
मैंने उसकी आँखों में देखा। और झूठ नहीं बोल पाया।
"पापा बहुत थके हुए हैं, बेटा।"
गुड्डी ने सिर हिलाया। जैसे उसे पहले से पता हो। फिर उसने अपनी स्लेट दिखाई। उस पर अब भी १ से १० तक लिखा था। पर दस के बाद के धब्बे अब नहीं थे। उसने उन्हें पूरी तरह पोंछ दिया था।
"मैंने ग्यारह सीखने की कोशिश बंद कर दी," उसने कहा। "मामी ने कहा कि कुछ चीज़ें न सीखना भी अच्छा होता है।"
मैंने मामी की तरफ़ देखा। वो मुस्कुराईं। वो मुस्कान, जो मुस्कान के सबसे क़रीब थी।
"चाचा," गुड्डी ने मेरे कान में फुसफुसाया, "रात को छोटू भैया आए थे। मामी के दरवाज़े तक। पहली बार।"
मेरा दिल रुक गया। "फिर?"
"उन्होंने दस्तक नहीं दी। बस बाहर खड़े रहे। बहुत देर तक। और रोते रहे।" गुड्डी की आवाज़ और धीमी हो गई। "मामी सो रही थीं। मैंने उन्हें नहीं जगाया। मुझे लगा... मुझे लगा छोटू भैया नहीं चाहते थे कि मामी उन्हें ऐसे देखें।"
मैंने गुड्डी को नीचे उतारा। मामी अब भी मुस्कुरा रही थीं। उन्हें कुछ नहीं पता था।
मैंने कुछ नहीं बताया।
सत्रह साल वो उस दरवाज़े पर नहीं आया था। और कल रात आया। और खड़ा रहा। और दस्तक नहीं दी।
शायद वो भी किसी फ़ैसले के क़रीब था। शायद हम सब थे। उस गाँव में, उस हफ़्ते, हर कोई किसी ऐसे दरवाज़े के सामने खड़ा था, जिसे खोलने से डरता था।
सोलहवीं सीढ़ी।
वो ग़ुस्से में थी।
मुझे पता चल गया जैसे ही मैं पानी में उतरा। पानी अलग था। बेचैन। उसमें लहरें उठ रही थीं — बावड़ी के अंदर, जहाँ कोई हवा नहीं पहुँचती — जैसे कोई नीचे करवटें बदल रहा हो। और मेरी बाईं आँख ने, पूरी सफ़ेद, पानी में सब कुछ साफ़ देखते हुए, उसके बाल देखे। हर दीवार में। हर दरार में। हिलते हुए। तने हुए। जैसे किसी जानवर के बाल खड़े हो गए हों।
"गंगाधर की चिट्ठी पढ़ी?"
उसकी आवाज़ पहले जैसी नहीं थी। न मीठी। न थकी हुई। कुछ और। कुछ दोहरा। जैसे दो आवाज़ें एक साथ बोल रही हों — एक लड़की की, और एक उसके नीचे, बहुत गहरी, बहुत पुरानी, जो किसी आवाज़ जैसी नहीं, बल्कि धरती के खिसकने जैसी लगती थी।
"दो सौ अस्सी बरस बाद। काग़ज़ पर। माफ़ी।"
लड़की वाली आवाज़ में कड़वाहट थी। और नीचे वाली में... भूख।
"उसने तुझे बताया कि मुझमें कुछ और है? कि मैं दो हूँ?"
हँसी। पर वो हँसी भी दोहरी थी।
"उसने तुझे ये नहीं बताया, गंगाधर के पोते, कि दो सौ अस्सी बरस बाद, दोनों में कोई फ़र्क़ नहीं बचता। कि जब आप किसी भूख के साथ इतने बरस उल्टे गड़े रहें, तो आप ख़ुद भूख बन जाते हैं।"
और मेरी बाईं कलाई में, वो धागा — बबलू वाला — खिंचा।
ज़ोर से।
मैंने उसे महसूस किया। मेरे सीने तक। मेरे दिल तक। जैसे कोई मेरी एक नस पकड़कर खींच रहा हो। और उस धागे के दूसरे सिरे पर — गाँव में, कमला के घर में — कुछ हिला।
"वो बच्चा मेरा है," वो दोहरी आवाज़ फुसफुसाई। "तूने उसे मुझसे छीना था। अब तू उसे मेरे पास लाएगा। तेरी गिनती के साथ। तेरी हर सीढ़ी के साथ। एक-एक सीढ़ी। वो भी उतरेगा।"
मैंने धागे को अपने बाएँ हाथ में लपेटा। कसकर। अपनी तरफ़ खींचा।
वो और ज़ोर से खिंचा।
मैंने दीवार पकड़ी और ऊपर चढ़ा। हर सीढ़ी पर धागा खिंचता रहा। नीचे की तरफ़। जैसे कोई भारी चीज़ उससे बँधी हो।
मुंडेर पर अम्मा थीं।
और उनके बगल में, धूल में, पैर मोड़कर बैठा, कंबल में लिपटा, एक आठ साल का लड़का। गोल-मटोल। एक दाँत टूटा हुआ।
बबलू।
उसके पैर घुटनों तक भीगे थे। काई से सने। उसकी आँखें खुली थीं, पर वो किसी चीज़ को नहीं देख रही थीं। उसके होंठ धीरे-धीरे हिल रहे थे।
"...सोलह... सोलह... सोलह..."
"रात को आया," अम्मा ने धीरे से कहा। "अकेला। नींद में। उसकी माँ ने दरवाज़ा अंदर से बंद किया था। मैंने उसे पीपल वाली सड़क पर चलते देखा — उसका धागा। तेरे धागे से बँधा हुआ। वो तेरे पीछे-पीछे आ रहा था, विक्की। तू जितना उतरता, वो उतनी दूर चलता।"
मैं बबलू के पास बैठा। उसका चेहरा अपने हाथों में लिया। "बबलू? बबलू, मेरी तरफ़ देख।"
उसकी आँखें धीरे-धीरे मेरे चेहरे पर आईं। पहचान लौटी। और फिर डर।
"चाचा," उसने फुसफुसाया। "मैं कहाँ हूँ? मुझे ठंड लग रही है। मैं... मैं सपने में सीढ़ियाँ उतर रहा था। आपके पीछे-पीछे।"
मैंने उसे अपनी छाती से लगा लिया।
सूरज आधे घंटे बाद निकला। सैंतीसवीं से।
हमने उसे खींचा। अम्मा और मैं। वो अब बहुत भारी था। पत्थर जितना भारी।
उसका पूरा शरीर पत्थर था। सिर से पाँव तक। सिवाय दाईं आँख के। और होंठों के उस छोटे-से कोने के।
वो बोल नहीं सकता था। वो अपनी उँगलियाँ नहीं उठा सकता था। वो बस लेटा रहा। मुंडेर पर। एक पत्थर की मूर्ति की तरह। और उसकी एक बची हुई आँख मुझे देखती रही। उसमें आँसू थे।
उसे उँगलियाँ दिखाने की ज़रूरत नहीं थी। मुझे पता था।
तीन। तीन सीढ़ियाँ। अगर वो हर रात दो ले — डेढ़ रात।
और तब, पीपल वाली सड़क से, कोई आता दिखा।
सुबह की धुँधली रोशनी में। अकेला। धीरे-धीरे चलता हुआ। हाथ में एक पुरानी, बुझी हुई लालटेन।
रघु चाचा।
वो सीधे चल रहे थे। झुके हुए नहीं। उनकी आँखें साफ़ थीं। पिछले दस दिनों में पहली बार। उनके हाथों की दरारें अब भी थीं, पर वो पीतल का लोटा उनके साथ नहीं था।
वो मुंडेर के पास आकर रुके। उन्होंने सूरज को देखा। पत्थर बन चुके सूरज को। फिर बबलू को, जो मेरी बाँहों में काँप रहा था। फिर मुझे।
"मैंने कल रात लोटे को छुआ तक नहीं," उन्होंने कहा। उनकी आवाज़ शांत थी। थकी हुई, पर शांत। "पहली बार। पूरी रात प्यास से तड़पता रहा। पर पिया नहीं।" उन्होंने अपनी सूखी होंठों पर जीभ फेरी। "और सुबह चार बजे, जब प्यास सबसे ज़्यादा थी, मुझे सब याद आ गया। सब कुछ। जो मैं चौंतीस बरस से भूलने की कोशिश कर रहा था।"
वो धीरे से मेरे सामने बैठ गए। धूल में।
"आज दोपहर," उन्होंने कहा। "धूप में। सब बताऊँगा, विक्की। बानवे। शंकर। बाबूजी ने क्या किया।"
वो रुके। उनकी आँखें बावड़ी की टीन पर गईं।
"और ये भी, कि सत्रह का राज़ क्या है।"
"पोथी में लिखा है," मैंने कहा। "सत्रह उसकी उम्र थी। जब उसे गाड़ा गया था।"
रघु चाचा ने धीरे से सिर हिलाया। दाएँ से बाएँ।
"बाबूजी भी यही मानते थे। सत्तर बरस तक।" उन्होंने अपनी दरारों वाली हथेली मेरे कंधे पर रखी। "फिर बानवे में, शंकर के जाने की रात, उन्हें सच पता चला। और उन्होंने मुझे बताया। और फिर हम दोनों ने कसम खाई कि ये बात कभी किसी को नहीं बताएँगे।"
"क्या सच?"
चाचा ने मेरी आँखों में देखा।
"सत्रह बरस उसकी उम्र नहीं है, विक्की।"
भाग 16 समाप्त।
अगले भाग में — "सत्रहवीं सीढ़ी": सत्रह का रहस्य। रघु चाचा धूप में बैठकर वो बताते हैं जो दादाजी ने चौंतीस साल तक छुपाया। सत्रह क्या है, किसका है, और क्यों हर सत्रह साल में वो जागती है। और उस रात, सूरज आख़िरी दो सीढ़ियाँ उतरता है...
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