Pretika › Real Experiences › भानपुरा की बावड़ी - चालीस सीढ़ियाँ
भाग 17 — सत्रहवीं सीढ़ी
Piyashi Atma · Real Experiences · 21 मिनट
- Writer
- Piyashi Atma
- Story
- भानपुरा की बावड़ी - चालीस सीढ़ियाँ
- Chapter
- 17 of 31
- Category
- Real Experiences
- Reading time
- 21 min
- Words
- 4017
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
दादाजी ने एक बार मुझे एक कीड़े के बारे में बताया था।
मैं छह-सात साल का था। गर्मी की छुट्टियाँ। हम आँगन में चारपाई पर लेटे थे, तारे देख रहे थे, और मैं हमेशा की तरह उन्हें गिन रहा था। दादाजी ने मेरा हाथ पकड़ा और कहा — विक्कू, गिनना बंद कर। एक कहानी सुन।
उन्होंने बताया कि दुनिया के किसी कोने में एक कीड़ा होता है, जो सत्रह बरस ज़मीन के नीचे सोता है। अँधेरे में। पेड़ों की जड़ों से रस चूसता हुआ। चुपचाप। कोई नहीं जानता कि वो वहाँ है।
और फिर, सत्रहवें बरस में, एक रात, लाखों की संख्या में, वो सब एक साथ ज़मीन से बाहर निकलते हैं। और इतना शोर करते हैं कि पूरा जंगल काँप जाता है।
इतने बरस क्यों सोते हैं, दादाजी? मैंने पूछा था।
दादाजी बहुत देर चुप रहे थे। फिर बोले थे — क्योंकि वो किसी का इंतज़ार करते हैं, बेटा। कोई आवाज़। कोई पुकार। जो उन्हें जगाए।
मैं भूल गया था वो कहानी। सत्रह साल तक।
उस सत्रहवें दिन, धूप में, नीम के पेड़ के नीचे, रघु चाचा ने मुझे वो कहानी याद दिलाई।
और मुझे पता चला कि दादाजी उस रात मुझे कीड़े के बारे में नहीं बता रहे थे।
दोपहर बारह बजे। धूप सबसे तेज़।
नीम के पेड़ के नीचे, नए मंदिर के चबूतरे पर — वही चबूतरा जिसकी सात सीढ़ियों पर बच्चे "सीढ़ी-सीढ़ी" खेलते थे — रघु चाचा बैठे थे। पालथी मारकर। उनके सामने मैं, और अम्मा। दूर, गली के मोड़ पर, कुछ गाँव वाले खड़े थे, चुपचाप, देखते हुए। किसी को नहीं बुलाया गया था, पर सबको पता था कि आज कुछ कहा जाने वाला है।
चाचा के होंठ सूखे थे। फटे हुए। दो रात से उन्होंने वो लोटा नहीं छुआ था। और मैंने देखा — उनकी हथेलियों की दरारें अब थोड़ी फीकी थीं। जैसे पत्थर पीछे हट रहा हो। धीरे-धीरे।
"बाबूजी ने कहा था," उन्होंने शुरू किया, "कि ये बात सिर्फ़ धूप में कहनी है। क्योंकि धूप में वो सुन नहीं सकती। पानी सूख जाता है। उसके कान बंद हो जाते हैं।"
उन्होंने आसमान की तरफ़ देखा। चौंधियाती, सफ़ेद धूप।
"सब सोचते हैं सत्रह उसकी उम्र थी। पोथी में लिखा है। राज-लेखक ने लिखा। बाबूजी ने भी सत्तर बरस यही माना। मैंने भी।" उन्होंने सिर हिलाया। "पर बानवे में, जब मैं गिन रहा था — जब मैं सत्रहवीं सीढ़ी पर पहुँचा था — बाबूजी और हरिहर पंडित ने कुछ पाया।"
"क्या?"
"एक दरार।"
"हरिहर पंडित के गुरु ने उन्हें बताया था," चाचा ने कहा, "कि हर बावड़ी पाताल से जुड़ी होती है। कहीं न कहीं। ज़मीन के नीचे पानी के रास्ते होते हैं। नसों की तरह।" उन्होंने अपनी दरारों वाली हथेली को देखा। "बाबूजी ने बानवे में, जब मैं रात को नीचे उतरता था और सुबह ऊपर आता था, मुझसे पूछा था कि मुझे नीचे क्या-क्या दिखता है। हर सीढ़ी पर। मैं बताता था। पानी। अँधेरा। पत्थर में लेटे लोग।"
वो रुके।
"सत्रहवीं सीढ़ी पर मैंने उन्हें बताया कि दीवार में एक दरार है। बाक़ी दरारों जैसी नहीं। बड़ी। एक हाथ जितनी चौड़ी। और उसमें से पानी बहता है। बाहर की तरफ़। बावड़ी से कहीं और।"
"और उस दरार से एक आवाज़ आती है।"
मेरे अंदर कुछ ठंडा उतरा।
"कैसी आवाज़?"
चाचा ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखें भरी हुई थीं।
"रोने की," उन्होंने कहा। "एक औरत के रोने की। बहुत दूर से। बहुत धीमे। जैसे कोई किसी को पुकार रहा हो। बार-बार। एक ही शब्द।"
अम्मा ने अपनी पायल मुट्ठी में भींच ली।
"बाबूजी और हरिहर पंडित ने उस दरार का रास्ता ढूँढा। ऊपर से। पुराने नक़्शों से। पटवारी के रिकॉर्ड से। ज़मीन के ढलान से।" चाचा ने पश्चिम की तरफ़ इशारा किया। सूखे खेतों के पार। "वो रास्ता तीन कोस दूर जाता था। उस सूखे नाले तक। जिसे गाँव वाले रोती नदी कहते हैं।"
तीन कोस। गंगाधर की चिट्ठी। उसके पिता ने उसका नाम उस नदी के नाम पर रखा था, जिससे वह जल भरती थी। तीन कोस पर।
"वो नदी," मैंने धीरे से कहा। "उसकी नदी।"
चाचा ने सिर हिलाया।
"बाबूजी ने पुरानी कहानियाँ खोजीं," चाचा ने आगे कहा। "नदी की। गाँव के सबसे बूढ़े लोगों से। उनकी दादियों की सुनाई हुई कहानियों से।" उन्होंने गहरी साँस ली। "और उन्हें पता चला कि जिस दिन पनिहारिन को बावड़ी में उल्टा गाड़ा गया, उसी रात उसकी माँ घर से निकली। अकेली। और तीन कोस चलकर उस नदी तक गई। जहाँ उसकी बेटी रोज़ पानी भरने जाती थी।"
"और?"
"और उसमें कूद गई।"
आँगन में — चबूतरे के आसपास — कोई आवाज़ नहीं थी। दूर गली के मोड़ पर खड़े गाँव वाले भी चुप थे।
"कहते हैं," चाचा ने धीरे से कहा, "कि उसने कूदने से पहले नदी से कहा था — तूने मेरी बेटी को रोज़ पानी दिया। अब उसे मुझे लौटा दे। जब तक वो नहीं लौटेगी, मैं तुझमें रहूँगी, और तुझे पुकारूँगी। और उसके बाद वो नदी धीरे-धीरे सूखने लगी। दस बरस में। बीस बरस में। आज उसमें बरसात में भी पानी नहीं रुकता। सब नीचे चला जाता है। ज़मीन में।"
"बावड़ी की तरफ़," मैंने कहा।
"बावड़ी की तरफ़।"
चाचा ने अपनी हथेली ज़मीन पर रखी। चबूतरे के गरम पत्थर पर।
"अब सुन, विक्की। सत्रह का राज़।"
"हरिहर पंडित ने हिसाब लगाया था," चाचा ने कहा। "पानी का। वो दरार वाला रास्ता — ज़मीन के नीचे-नीचे, पत्थरों के बीच से, मिट्टी के बीच से — वो पानी बहुत धीरे बहता है। बूँद-बूँद। रिसता हुआ। नदी से बावड़ी तक पहुँचने में उसे..."
"सत्रह बरस लगते हैं," अम्मा ने कहा।
हम दोनों ने उनकी तरफ़ देखा।
अम्मा का चेहरा पत्थर जैसा था। पर उनकी सफ़ेद आँखों से आँसू बह रहे थे।
"मुझे अभी समझ आया," उन्होंने फुसफुसाया। "अड़सठ बरस बाद। वो रोना। जो मैं हर सत्रहवें बरस की शुरुआत में सुनती हूँ। बावड़ी से। पहली रात। उससे पहले कि कोई गिनती शुरू हो। मैंने सोचा था वो उसका रोना है।" उन्होंने अपना चेहरा हाथों में छुपा लिया। "वो उसकी माँ का है।"
चाचा ने सिर हिलाया।
"सत्रह बरस उसकी उम्र नहीं है, विक्की। सत्रह बरस वो वक़्त है, जितना उसकी माँ की पुकार को नदी से बावड़ी तक पहुँचने में लगता है। ज़मीन के नीचे। पानी के रास्ते। बूँद-बूँद।"
उन्होंने मेरी आँखों में देखा।
"हर सत्रह बरस में वो पुकार बावड़ी तक पहुँचती है। और बेटी जागती है। अपनी माँ की आवाज़ सुनकर। जैसे वो कीड़ा, जो सत्रह बरस सोता है और किसी पुकार का इंतज़ार करता है।"
दादाजी की कहानी।
क्योंकि वो किसी का इंतज़ार करते हैं, बेटा। कोई आवाज़। कोई पुकार।
"माँ उसे क्या पुकारती है?" मैंने पूछा। मेरी आवाज़ काँप रही थी।
चाचा बहुत देर तक चुप रहे।
"उसका नाम," उन्होंने आख़िर में कहा।
मेरा दिल रुक गया।
"माँ अपनी बेटी का नाम पुकारती है। दो सौ अस्सी बरस से। हर पल। उस नदी की तली से।" चाचा की आवाज़ टूट रही थी। "और वो पुकार ज़मीन के नीचे से, सत्रह बरस में, बावड़ी तक पहुँचती है। और बेटी सुनती है।"
"तो उसे अपना नाम पता है?"
"नहीं।" चाचा ने सिर हिलाया। "यही तो। यही सबसे बुरा है।" उन्होंने अपनी आँखें पोंछीं। "पुकार पहुँचती है। पर रास्ते में... रास्ते में पानी उसे खा जाता है। वो भूख, जो उस लड़की में बँधी है — वो पूरी पुकार उस तक नहीं पहुँचने देती। वो नाम को रास्ते में ही निगल जाती है। बेटी तक सिर्फ़ रोना पहुँचता है। माँ की आवाज़। पर शब्द नहीं। नाम नहीं।"
मैंने अपनी आँखें बंद कर लीं।
"हर सत्रह बरस वो जागती है। अपनी माँ की आवाज़ सुनकर। और हर बार वो अपना नाम सुनने की कोशिश करती है। और हर बार वो नहीं सुन पाती। और वो भूख उसके कान में फुसफुसाती है — गिनने वाला लाओ। चालीस पूरे करो। तब तुम बाहर निकलोगी। तब तुम ख़ुद अपनी माँ के पास जाओगी।"
"और वो हर बार मान जाती है," अम्मा ने फुसफुसाया।
"क्योंकि वो सत्रह बरस की लड़की है," चाचा ने कहा। "जो अपनी माँ के पास जाना चाहती है।"
"आपने सुना था," मैंने कहा। "बानवे में। आप उस नदी पर गए थे।"
चाचा का चेहरा सफ़ेद पड़ गया।
"बाबूजी मुझे ले गए थे," उन्होंने धीरे से कहा। "मेरी अठारहवीं रात से पहले। हरिहर पंडित ने कहा था कि अगर कोई गिनने वाला — जिसकी गिनती चल रही हो — ठीक दो बजकर सैंतालीस पर उस नदी की तली में खड़ा हो, तो शायद वो माँ की पुकार सीधे सुन सके। रास्ते से पहले। भूख के खाने से पहले।"
"और?"
"मैं खड़ा हुआ। उस सूखे पाट में। बाबूजी ऊपर किनारे पर थे, लालटेन लिए।" चाचा की आँखें कहीं दूर थीं। चौंतीस साल दूर। "और दो बजकर सैंतालीस पर, वक़्त रुका। और मेरे पैरों के नीचे की रेत गीली होने लगी। और उसमें से आवाज़ आई।"
"क्या कहा?"
चाचा ने अपने होंठ काटे।
"बिटिया..." उन्होंने फुसफुसाया। एक औरत की नक़ल करते हुए। टूटी हुई, बहुत पुरानी आवाज़ में। "बिटिया... स..."
"स," मैंने दोहराया। पोथी पर उभरा वो पहला अक्षर।
"और फिर..." चाचा रुक गए। उनका पूरा शरीर काँपने लगा। "...और फिर गाँव की तरफ़ से एक चीख़ आई। एक बच्चे की। बहुत दूर से। रुके हुए वक़्त में भी सुनाई देने वाली। और मैं... मैं मुड़ गया। मैंने पुकार को छोड़ दिया। और जब मैंने दोबारा सुनने की कोशिश की, तो रेत सूख चुकी थी।"
"वो चीख़ किसकी थी?"
चाचा ने मेरी तरफ़ देखा। और उनकी आँखों में वो चीज़ थी जो मैंने ग्यारहवीं सीढ़ी पर, उनके जवान चेहरे पर, देखी थी।
"शंकर की," उन्होंने कहा।
वो उठ खड़े हुए। अचानक। जैसे अब और नहीं बैठ सकते।
"बाक़ी कल, विक्की। मुझमें आज इससे ज़्यादा हिम्मत नहीं है।" उनकी आवाज़ टूटी हुई थी। "कल बताऊँगा कि उस रात मेरे पीछे गाँव में क्या हुआ। बाबूजी ने क्या किया। और मैंने... मैंने क्या होने दिया।"
और वो धूप में, नंगे पैर, अपने घर की तरफ़ चले गए। अकेले। गाँव वालों की ख़ामोश भीड़ के बीच से।
"मुझे उस नदी पर जाना है," मैंने अम्मा से कहा।
वो चबूतरे पर वैसे ही बैठी रहीं। चाचा के जाने के बाद भी। उनकी उँगलियों में पायल घूमती रही।
"आज नहीं, बच्चा," उन्होंने कहा। "रघु ने बताया न — उसकी पुकार सिर्फ़ दो बजकर सैंतालीस पर सुनाई देती है। और उस वक़्त तू बावड़ी में होगा। सीढ़ी पर। तू दो जगह नहीं हो सकता।"
"दिन में ही सही। मुझे बस देखना है।"
अम्मा ने अपना चेहरा पश्चिम की तरफ़ घुमाया। उस तरफ़, जहाँ मुझे पता था — अब — वो नदी थी। तीन कोस दूर।
"अड़सठ बरस में मैं वहाँ कभी नहीं गई," उन्होंने धीरे से कहा। "मुझे पता नहीं था क्यों। बस डर लगता था। उस तरफ़ देखने से भी।" उन्होंने अपनी उँगली का धागा छुआ। "अब पता है। कोई माँ वहाँ रोती है। और मैं... मैं किसी की माँ नहीं बनी, विक्की। मुझे डर था कि उसका रोना मुझे अपने में खींच लेगा।"
लल्लन मुझे ले गया। टेम्पो में। दोपहर दो बजे, धूप में।
तीन कोस। सूखे खेत। फिर बंजर ज़मीन, जहाँ खेती भी नहीं होती थी। फिर कँटीली झाड़ियाँ। और फिर, अचानक, ज़मीन में एक घाव।
एक चौड़ी, गहरी, टेढ़ी-मेढ़ी खाई। जिसके किनारे ढहे हुए थे। जिसकी तली में सफ़ेद, फटी हुई रेत थी। और बड़े-बड़े गोल पत्थर, चिकने, जैसे कभी पानी ने उन्हें सदियों तक घिसा हो।
रोती नदी।
लल्लन टेम्पो से नहीं उतरा। "मैं यहीं रुकता हूँ, भैया," उसने कहा। उसकी आवाज़ में डर था।
मैं किनारे से नीचे उतरा। सूखी रेत पर। मेरे पैर उसमें धँसे। गरम थी। बहुत गरम।
मैंने बाईं आँख से कपड़ा हटाया।
और नदी भर गई।
पानी की दुनिया में, वो नदी सूखी नहीं थी। उसमें पानी बह रहा था। धीमा, गहरा, हरा। और उसकी तली में — मेरे पैरों से बस कुछ क़दम दूर — एक औरत लेटी थी। पेट के बल। चेहरा रेत में धँसा हुआ। उसके सफ़ेद बाल पानी में फैले थे। और उसकी बाँहें आगे की तरफ़ फैली थीं। पूर्व की तरफ़। भानपुरा की तरफ़। बावड़ी की तरफ़।
जैसे कोई तैरकर कहीं पहुँचना चाहता हो। और दो सौ अस्सी बरस से बस एक ही जगह पड़ा हो।
उसके होंठ रेत में दबे थे। पर हिल रहे थे। दिन में कोई आवाज़ नहीं आती थी — धूप ने उसे सुखा दिया था। पर मुझे पता था वो क्या कह रही है।
मैं उसके पास घुटनों के बल बैठा। और तब मैंने देखा — रेत में, उसकी फैली हुई उँगलियों के पास, कुछ चमक रहा था।
मैंने दाईं आँख से देखा। असली दुनिया में।
सूखी रेत में, आधा धँसा हुआ, एक मिट्टी का टूटा घड़ा। बहुत पुराना। उसकी गर्दन टूटी हुई। और उसके पास, रेत में फँसा हुआ, एक छोटा-सा काला पड़ा हुआ घुँघरू।
मैंने उसे उठाया।
वो मेरी हथेली में बहुत हल्का था। और जैसे ही मैंने उसे छुआ, वो बजा। अपने आप। बहुत धीमे। एक ऐसी आवाज़ में, जो मेरी जेब वाले घुँघरू से अलग थी। मीठी। पतली। किसी लड़की के पायल की।
पाँव में पायल। जिसकी पायल की आवाज़ से पूरा गाँव जागता था।
उसका घुँघरू। दो सौ अस्सी बरस पहले, इसी नदी पर, पानी भरते हुए गिरा हुआ। शायद आख़िरी दिन।
मैंने उसे अपनी दाईं मुट्ठी में बंद कर लिया। और रेत में लेटी उस माँ की तरफ़ देखा, बाईं आँख से।
"मैं कोशिश करूँगा," मैंने उससे कहा। धीरे से। "मैं उसे आपकी आवाज़ पहुँचाने की कोशिश करूँगा।"
उसके होंठ रुक गए। एक पल के लिए।
और रेत में धँसा हुआ उसका चेहरा — धीरे से — थोड़ा-सा मेरी तरफ़ मुड़ा।
शाम को मैं सूरज के घर गया।
वो अपनी खाट पर था। एक पत्थर की मूर्ति। सिर से पाँव तक भूरा-हरा, खुरदुरा, दरारों से भरा। उसकी माँ ने उस पर एक चादर डाल रखी थी, गर्दन तक। जैसे वो सो रहा हो।
सिर्फ़ उसकी दाईं आँख बची थी। और होंठों का एक कोना। दोनों अब भी चमड़ी थे। अब भी ज़िंदा।
उसकी आँख खुली थी। मुझे देख रही थी।
"सुशीला मामी गुड्डी को ला रही हैं," उसकी माँ ने कहा। उनकी आवाज़ में कुछ नहीं था। सब कुछ बहुत पहले ख़त्म हो चुका था। "उसे देखना चाहिए। अपने पापा को। आज।"
मैं खाट के पास बैठ गया। सूरज की पत्थर वाली बाँह पर हाथ रखा। ठंडी। बहुत ठंडी। पर उसके अंदर — बहुत गहरे — मुझे कुछ महसूस हुआ। एक धड़कन। बहुत धीमी। बहुत कमज़ोर।
"सूरज," मैंने धीरे से कहा, "मैं जानता हूँ।"
उसकी आँख थोड़ी सिकुड़ी।
"आम का बाग़। वो कुआँ। तेरी अम्मा। वो सौदा।" मैंने उसकी पत्थर वाली उँगलियों को अपनी उँगलियों में लिया। "और मैं जानता हूँ कि तू बारह साल का था। और तेरी अम्मा मर रही थीं। और एक आवाज़ ने तुझसे कहा कि तू उन्हें बचा सकता है।"
उसकी आँख से एक आँसू निकला। उसके पत्थर के गाल पर बहा। पत्थर ने उसे सोखा नहीं। वो बस बहता रहा। नीचे। चादर तक।
"मैं तुझसे नाराज़ नहीं हूँ," मैंने कहा। "छोटू भी नहीं था। उसने चिट्ठी में लिखा था। वो तेरे लिए गया था, सूरज। अपनी मर्ज़ी से। वो जानता था कि तू रात को रोता है।"
सूरज के होंठ का वो ज़िंदा कोना काँपा। कुछ कहने की कोशिश में।
कोई आवाज़ नहीं निकली।
गुड्डी आई।
मामी उसे गोद में उठाकर लाईं। वो दरवाज़े पर रुकी। खाट की तरफ़ देखा। उस पत्थर की मूर्ति की तरफ़, जिस पर चादर पड़ी थी।
उसने कुछ नहीं कहा। बस मामी की गोद से उतरी। और धीरे-धीरे खाट की तरफ़ चली।
उसने अपने पापा का चेहरा देखा। पत्थर का चेहरा। और वो एक आँख, जो अब भी उसकी तरफ़ देख रही थी।
"पापा," उसने धीरे से कहा।
और उसने अपना छोटा-सा हाथ उठाया — वो हाथ जिसकी बाँह पर सरदार जी का कड़ा बँधा था — और अपने पापा के पत्थर वाले गाल पर रखा।
कड़ा चमका।
एक पल के लिए। तेज़, सफ़ेद रोशनी में। और उस रोशनी में, जहाँ गुड्डी की हथेली थी, पत्थर पीछे हटा। एक छोटा-सा हिस्सा। उसकी हथेली जितना। भूरा-हरा पत्थर हल्का होकर वापस चमड़ी बन गया। गुलाबी। गर्म।
सूरज की आँख फैल गई।
पर जैसे ही गुड्डी ने अपना हाथ हटाया, पत्थर वापस आया। धीरे-धीरे। उस छोटे-से हिस्से पर फिर से चढ़ता हुआ।
गुड्डी ने अपना हाथ फिर रखा। पत्थर फिर पीछे हटा। उसने हटाया। वो फिर आया।
"पापा," गुड्डी ने कहा। अब उसकी आवाज़ में आँसू थे। "मैं हाथ रखे रहूँगी। पूरी रात। आप ठीक हो जाओगे।"
सूरज की आँख मुझे देख रही थी। और मैंने उसमें वो पढ़ा जो वो कहना चाहता था।
इसे यहाँ से ले जा।
क्योंकि कड़ा गुड्डी की रक्षा करता था। पर अगर वो उस रक्षा को अपने पापा पर लगाती रही — पूरी रात — तो वो ख़ुद असुरक्षित हो जाती।
"चलो, बिटिया," मामी ने धीरे से कहा। उन्होंने भी समझ लिया था।
गुड्डी ने मना किया। रोई। चीख़ी। अपने पापा के पत्थर वाले सीने से लिपट गई।
मामी ने उसे उठाया। बहुत प्यार से। बहुत मज़बूती से। और ले गईं।
दरवाज़े पर गुड्डी ने पलटकर देखा। और चीख़ी — एक ऐसी चीख़ जो मैं ज़िंदगी भर नहीं भूलूँगा:
"पापा, नीचे मत जाना! पापा, मैं ग्यारह सीख लूँगी! पापा!"
सूरज की आँख बंद हो गई।
उस रात अम्मा के घर में सिर्फ़ हम दो थे। सूरज की खाट ख़ाली थी — वो अपने घर पर था, अपनी माँ के पास। मैंने ज़ोर नहीं दिया था। अब उसे किसी दीवार की ज़रूरत नहीं थी।
मेरे बाएँ हाथ में देवदत्त वाला घुँघरू था। दाएँ में वो, जो नदी से लाया था।
"दो घुँघरू," अम्मा ने अँधेरे में कहा। वो उनकी आवाज़ पहचान गई थीं। "दूसरा किसका है?"
मैंने उसे उनकी हथेली में रखा।
अम्मा ने उसे अपनी उँगलियों से टटोला। बहुत देर तक। उसकी गोलाई। उसकी घिसी हुई सतह। फिर उन्होंने उसे अपने कान के पास ले जाकर हल्के से हिलाया।
वो बजा। वही पतली, मीठी आवाज़।
अम्मा का चेहरा बदल गया।
"ये किसी लड़की का है," उन्होंने फुसफुसाया। "बहुत पुराना। और ये..." वो रुकीं। "ये रो रहा है, विक्की। इसकी आवाज़ में। जैसे किसी को ढूँढ रहा हो।"
उन्होंने घुँघरू वापस मेरी हथेली में रखा। और मेरी मुट्ठी को अपने दोनों हाथों से बंद कर दिया।
"इसे सँभालकर रखना। ये उसका है। उसकी अपनी आवाज़। जो भूख ने अभी तक नहीं खाई।"
दो बजकर सैंतालीस।
दूर, सूरज के घर की तरफ़ से — रुके हुए वक़्त में — एक आवाज़ आई। बहुत धीमी। पत्थर के होंठों से निकलती हुई।
"...अड़तीस..."
और फिर।
"...उनतालीस..."
मैंने अपनी आँखें बंद कर लीं।
सत्रहवीं सीढ़ी।
मैं जानता था कि मुझे क्या ढूँढना है।
पानी में, मेरी पूरी सफ़ेद बाईं आँख ने सब कुछ साफ़ देखा। दीवारें। उनकी दरारें। उनमें से झाँकते बाल।
और मेरे बाईं तरफ़, दीवार में, एक दरार।
बाक़ियों जैसी नहीं। बड़ी। एक हाथ जितनी चौड़ी। किसी घाव की तरह पत्थर में खुली हुई। और उसमें से पानी बह रहा था। बहुत धीरे। बाहर की तरफ़ नहीं — अंदर की तरफ़। उस दरार से होकर बावड़ी में आता हुआ। ज़मीन के नीचे से। कहीं दूर से।
और उस पानी के साथ, एक आवाज़।
मैं दीवार की तरफ़ सरका। अपनी सीढ़ी पर रहते हुए, जितना पास जा सकता था। और अपना कान उस दरार पर लगाया।
ठंडा पत्थर। बहता पानी। और उसके अंदर —
रोना।
एक औरत का। बहुत दूर से। बहुत धीमे। टूटा हुआ। जैसे किसी बहुत लंबी सुरंग के दूसरे छोर से आ रहा हो।
"...बिटिया..."
मेरी साँस — मेरी पानी वाली साँस — रुक गई।
"...बिटिया... घर आ जा... स..."
मैंने अपना कान और दबाया। पत्थर में। जितना दबा सकता था।
"...स... सु..."
दूसरा अक्षर। "सु"।
"...सुख..."
और तब दरार के अंदर कुछ हिला।
बाल।
काले। गीले। अचानक। एक झटके में दरार के अंदर से बाहर निकलते हुए। मेरे कान की तरफ़। मेरे चेहरे की तरफ़। दरार को भरते हुए। उस आवाज़ को ढकते हुए। निगलते हुए।
मैं पीछे हटा।
बाल दरार में ठुँस गए। पूरी तरह। एक काली, गीली गाँठ। और उसके पीछे से आती वो आवाज़ — वो माँ की पुकार — दब गई। बंद हो गई।
और मेरे चारों ओर के पानी से, वो दोहरी आवाज़ आई। लड़की की, और उसके नीचे वाली भूख की। पर इस बार लड़की की आवाज़ बहुत कमज़ोर थी। लगभग ग़ायब। और भूख वाली आवाज़ बहुत ज़ोर से।
"नहीं।"
बस इतना। एक शब्द। धरती के खिसकने जैसा।
"वो मेरी है। उसकी माँ की नहीं। तेरी नहीं। मेरी।"
और पानी में — बहुत नीचे — कुछ रोया। बहुत धीमे। एक सत्रह बरस की लड़की की तरह। जिसने अभी-अभी, दो सौ अस्सी बरस में पहली बार, अपने नाम के दो अक्षर सुने थे।
और फिर उनसे छीन लिए गए।
मैंने अपनी दाईं मुट्ठी खोली। उसका घुँघरू। नदी वाला। पानी में वो बजा — अपने आप — एक पतली, मीठी आवाज़, जो नीचे की तरफ़ गई। अँधेरे में।
और नीचे का रोना एक पल के लिए रुक गया।
जैसे किसी ने, दो सौ अस्सी बरस बाद, अपनी पायल की आवाज़ पहचान ली हो।
फिर भूख वाली आवाज़ गुर्राई, और बाल दरार में और कसकर ठुँस गए, और मैं ऊपर की तरफ़ चढ़ने लगा। पर मेरे पीछे, बहुत नीचे, मैंने सुना — एक बहुत कमज़ोर, बहुत टूटी हुई फुसफुसाहट, लड़की वाली आवाज़ में, भूख के नीचे से:
"...वो मेरी है... वो पायल मेरी है..."
मैं सुबह ऊपर आया।
अम्मा मुंडेर पर थीं। और उनके साथ सूरज की माँ। और मामी, गुड्डी को गोद में लिए — गुड्डी रात भर रोती रही थी, और अब सो गई थी, थककर, मामी के कंधे पर। और बबलू — उसकी माँ कमला ने उसे रात भर अपनी कलाई से बाँधकर रखा था, और फिर भी वो सुबह मुंडेर पर आ पहुँचा था, और अब कंबल में लिपटा बैठा था, उसके पैर घुटनों तक भीगे।
हम इंतज़ार करने लगे।
सूरज का।
सूरज उगा। पीपल की घंटियाँ बजने लगीं। आधा घंटा। एक घंटा।
सूरज नहीं निकला।
"विक्की," अम्मा ने धीरे से कहा।
मुझे पता था। मुझे पता था कि वो क्या कहने वाली थीं।
मैंने टीन की एक चादर सरकाई। थोड़ी-सी। और अपनी बाईं आँख से कपड़ा हटाया। और नीचे देखा।
धूप। ऊपर की सीढ़ियों पर। फिर पानी। फिर अँधेरा। पर मेरी बाईं आँख उस अँधेरे में देख सकती थी। पानी के आर-पार। नीचे। और नीचे।
उनतालीसवीं सीढ़ी पर सूरज खड़ा था।
सबसे आख़िरी सीढ़ी। उसके नीचे कुछ नहीं था — सिवाय एक पत्थर के लड़के के, जो चालीसवीं बनकर अड़सठ बरस से वहाँ खड़ा था।
सूरज पूरा पत्थर था। खड़ा हुआ। उसके पैर उनतालीसवीं में धँसे हुए। उसका चेहरा ऊपर की तरफ़। और उसकी दाईं आँख — अब भी खुली, अब भी ज़िंदा — मुझे देख रही थी। पूरी बावड़ी के पार। पानी के पार। उनतालीस सीढ़ियों के पार।
वो चढ़ नहीं सकता था। उसका शरीर अब चढ़ने लायक़ नहीं रहा था। वो बस वहाँ खड़ा था। और इंतज़ार कर रहा था।
आज रात का।
चालीसवीं का।
उसके होंठ का वो आख़िरी ज़िंदा कोना हिला। पानी में। कोई आवाज़ ऊपर तक नहीं आई। पर मैंने पढ़ लिया।
"गुड्डी..."
मैं वहीं मुंडेर पर गिर पड़ा।
सूरज की माँ ने नीचे नहीं देखा। उन्हें ज़रूरत नहीं थी। उन्होंने मेरा चेहरा देखा, और समझ गईं। वो मुंडेर के किनारे बैठ गईं। बहुत धीरे से। और अपनी हथेली बावड़ी की टीन पर रख दी। जैसे किसी बच्चे के माथे पर रखते हैं, जब वो बुख़ार में हो।
और तब, बावड़ी के अंदर से, बहुत नीचे से, एक आवाज़ आई।
एक लड़के की। चौदह-पंद्रह बरस का। पत्थर में घिसटती हुई। अड़सठ बरस पुरानी।
"...प्यारी..."
देवदत्त।
"...कल रात... कल रात मैं आज़ाद हो जाऊँगा। वो मेरी जगह ले लेगा। चालीसवीं। और मैं... मैं ऊपर आऊँगा, प्यारी। सच में। इस बार सच में।"
मैंने अम्मा की तरफ़ देखा।
वो मुंडेर पर बैठी थीं। लाल चुनरी में। उनकी सफ़ेद आँखें बावड़ी की तरफ़। और उनकी उँगलियों में वो पायल — जिसमें एक घुँघरू बचा था — धीरे-धीरे घूम रही थी।
अड़सठ बरस। अड़सठ बरस उन्होंने इस आवाज़ का इंतज़ार किया था। इस वादे का। इस पल का।
और उसके लिए, कल रात, सूरज को पत्थर बनना था। हमेशा के लिए। गुड्डी के पापा को।
मैंने अम्मा के चेहरे को देखा। उसमें दुख ढूँढा। डर ढूँढा। वो शर्म ढूँढी, जो उन्होंने कल मुझसे कहा था — मुझ पर पूरा भरोसा मत करना।
पर उनके चेहरे पर कुछ और था।
अड़सठ बरस में पहली बार — मैंने देखा — रामप्यारी अम्मा मुस्कुराईं।
एक छोटी-सी, काँपती हुई, बारह बरस की लड़की वाली मुस्कान।
और मुझे उस मुस्कान से, पूरी बावड़ी से ज़्यादा डर लगा।
भाग 17 समाप्त।
अगले भाग में — "अठारहवीं सीढ़ी": रघु चाचा का सच। बानवे की उस रात, जब वो रोती नदी की तली में खड़े थे, गाँव में क्या हुआ। दादाजी ने अपने बेटे को बचाने के लिए किसके बच्चे का नाम लिया। और आज रात, सूरज चालीसवीं पर पहुँचेगा — जब तक कोई उसकी जगह न ले...
भानपुरा की बावड़ी - चालीस सीढ़ियाँ · सभी भाग →
और कहानियाँ · More stories
- देवभूमि का साया: गढ़वाल की शापित घाटी और डाक-बंगले का रहस्य · Piyashi Atma
- तेरहवीं अमावस · Piyashi Atma
- यक्षिणी: कदंब का श्राप · Piyashi Atma
- Mohabbat ke so imtihan · firoj saifi