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भाग 18 — अठारहवीं सीढ़ी

Piyashi Atma · Real Experiences · 21 मिनट

Writer
Piyashi Atma
Story
भानपुरा की बावड़ी - चालीस सीढ़ियाँ
Chapter
18 of 31
Category
Real Experiences
Reading time
21 min
Words
4010
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

हर आदमी के अंदर एक कमरा होता है जिसमें वो कभी नहीं जाता।

वो उसके बारे में जानता है। उसका दरवाज़ा रोज़ देखता है। सुबह उठते हुए, रात को सोते हुए, बीच में किसी ख़ाली पल में। पर वो उसे खोलता नहीं। कभी-कभी तो वो भूल भी जाता है कि वो कमरा वहाँ है। सालों तक।

पर कमरा उसे नहीं भूलता।

रघु चाचा ने चौंतीस साल तक अपने कमरे का दरवाज़ा बंद रखा था। उसकी चाबी पीतल के एक लोटे में डुबोकर। हर घूँट के साथ थोड़ा और भूलते हुए।

उस अठारहवें दिन, उन्होंने वो दरवाज़ा खोला।

और उस रात, उन्होंने उस कमरे से बाहर निकलने का एक ही रास्ता चुना।

नीचे।

"बानवे में मैं इक्कीस बरस का था," चाचा ने कहा।

दोपहर। वही नीम का पेड़। वही चबूतरा। पर आज कोई भीड़ नहीं थी। सिर्फ़ मैं। चाचा ने किसी और को आने से मना कर दिया था। अम्मा को भी।

"बीए कर रहा था। झाँसी में। गर्मी की छुट्टियों में घर आया था।" उन्होंने अपनी दरारों वाली हथेलियाँ घुटनों पर रखीं। "एक रात मेरी नींद खुली, और मुझे लगा कोई बाहर गिनती कर रहा है। मैंने सोचा कोई शराबी होगा। मैं खिड़की पर गया। और मैंने... मैंने साथ में गिना। बस यूँ ही। मज़ाक़ में। 'दो।'"

उन्होंने अपनी आँखें बंद कर लीं।

"अगली सुबह मैं बावड़ी की दूसरी सीढ़ी पर था।"

"बाबूजी ने सब कुछ किया," चाचा ने कहा। "जो तूने किया। जो अम्मा ने तुझे सिखाया। रस्सियाँ। जागना। पूजा। कुछ काम नहीं आया। हर रात मैं एक सीढ़ी और नीचे।"

"सत्रहवीं पर मैंने उन्हें दरार के बारे में बताया। उन्होंने और हरिहर पंडित ने नदी ढूँढी। फिर हरिहर पंडित ने कहा — बाँधना होगा। अब। इससे पहले कि ये लड़का चालीस पर पहुँचे।" चाचा की आवाज़ धीमी हो गई। "टीन, ज़ंजीर, उल्टे दीये — वो सब बाहर का था। असली बंधन अंदर का था। और उसके लिए एक खूँटा चाहिए था। कोई, जो बावड़ी के अंदर रहे। जिससे ज़ंजीर बँधे।"

"और वो खूँटा आप बनने वाले थे।"

चाचा ने सिर हिलाया। "हरिहर पंडित ने कहा — गिनने वाला ही खूँटा बनेगा। रघु छब्बीस पर रुक जाएगा। न ऊपर आएगा, न नीचे जाएगा। हमेशा के लिए। पर बाक़ी गाँव बच जाएगा। और आने वाले सत्रह बरस भी।"

वो रुके। उनका जबड़ा कस गया।

"बाबूजी ने हाँ कहा। मेरे सामने। और फिर उस रात, अनुष्ठान से पहले, वो अकेले बावड़ी पर गए।"

"मैं उनके पीछे गया था," चाचा ने कहा। "वो मुझे नहीं दिखे। मैं पीपल के पीछे छुपा था।"

"बाबूजी मुंडेर पर बैठे। पैर नीचे लटकाकर। जैसे वो मरने से पहले बैठे मिले थे। और उन्होंने बावड़ी से बात की। धीरे-धीरे। रोते हुए।" चाचा की आँखें खुलीं। "मैंने सब सुना, विक्की। हर शब्द।"

"उन्होंने कहा — मेरे बेटे को छोड़ दे। मेरा रघु। मैं तुझे उसके बदले कुछ दूँगा।"

"और पानी से एक आवाज़ आई। उसकी। उसने कहा — बदला? तुम मिश्रों के पास देने को क्या है, जो तुम्हारे पुरखे ने नहीं दिया?"

"बाबूजी चुप रहे। बहुत देर तक। फिर उन्होंने कहा..."

चाचा का गला रुँध गया। उन्होंने अपना चेहरा अपने हाथों में छुपा लिया। उनकी पीठ काँपने लगी।

मैं इंतज़ार करता रहा।

"उन्होंने कहा — एक नाम।" चाचा ने अपने हाथों के पीछे से फुसफुसाया। "नाम एक रस्सी है। मैं तुझे एक रस्सी दूँगा। खींच लेना।"

"और उन्होंने नाम लिया।"

"शंकर," मैंने कहा।

चाचा ने अपना चेहरा उठाया। आँसुओं से भीगा हुआ।

"शंकर," उन्होंने कहा। "हरिहर का बेटा। वो भी पंडित का ख़ून है। मिश्रों जितना पवित्र। उसे खूँटा बना ले। मेरे रघु को छोड़ दे।"

नीम के पत्तों में कहीं एक चिड़िया चहकी। फिर चुप हो गई।

"क्यों?" मेरी आवाज़ मुझे किसी और की लगी। "क्यों शंकर?"

"क्योंकि वो पास था।" चाचा की आवाज़ में कोई बचाव नहीं था। बस एक थका हुआ सच। "क्योंकि अनुष्ठान हरिहर कर रहे थे, और उनका ख़ून उस रात बावड़ी के सबसे क़रीब था। क्योंकि बाबूजी एक बाप थे, और एक बाप अपने बेटे के लिए... अपने बेटे के लिए कुछ भी कर सकता है। किसी और के बेटे को भी दे सकता है।"

उन्होंने अपनी हथेलियाँ देखीं।

"फिर बाबूजी ने मुझे नदी पर भेज दिया। उसी रात। कहा कि हरिहर पंडित ने बताया है — अगर मैं दो बजकर सैंतालीस पर वहाँ खड़ा रहूँ, तो माँ की पुकार सुन सकूँगा। नाम सुन सकूँगा।" उनकी हँसी कड़वी थी। "वो झूठ नहीं था। पर वो पूरा सच भी नहीं था। बाबूजी मुझे गाँव से दूर भेज रहे थे। ताकि जब शंकर बावड़ी की तरफ़ जाए, मैं वहाँ न होऊँ। ताकि मैं उसे रोक न पाऊँ। ताकि मुझे कभी पता न चले।"

"पर आपको पता चला।"

"मैंने चीख़ सुनी।" चाचा ने अपनी आँखें बंद कर लीं। "नदी की तली में। माँ की पुकार के बीच में। बिटिया... स... और फिर वो चीख़। एक बच्चे की। गाँव की तरफ़ से। मैं मुड़ा। मैंने पुकार छोड़ी। और भागा। तीन कोस। रुके हुए वक़्त में। नंगे पैर।"

"और?"

"पीपल वाली सड़क पर वो मुझे मिला," चाचा ने कहा। उनकी आवाज़ अब एक फुसफुसाहट थी। "शंकर। बारह बरस का। सफ़ेद कुर्ते में। आँखें बंद। नंगे पैर। बावड़ी की तरफ़ चलता हुआ। उसके पैर से एक काला धागा बँधा था, पीपल से आगे जाता हुआ। और वो चीख़ रहा था। नींद में। 'बाबा! बाबा!' पर उसके पैर रुक नहीं रहे थे।"

"मैं उसके पास पहुँचा। और मैंने उसका हाथ पकड़ा।"

चाचा ने अपना दायाँ हाथ उठाया। और उसे देखा। जैसे अब भी उसमें कुछ पकड़ा हो।

"उसका हाथ ठंडा था, विक्की। बहुत छोटा। उसकी उँगलियाँ मेरी उँगलियों में आईं। और एक पल के लिए उसकी आँखें खुलीं। उसने मुझे देखा। पहचाना। 'रघु भैया,' उसने कहा। 'मुझे घर ले चलो।'"

चाचा का पूरा शरीर काँप रहा था।

"और मुझे पता था, विक्की। मुझे पता था कि अगर मैं उसे घर ले गया, तो वो धागा मेरी तरफ़ मुड़ जाएगा। कि बाबूजी का सौदा टूट जाएगा। कि कल सुबह मैं फिर से सीढ़ी पर होऊँगा। छब्बीसवीं पर। और फिर सत्ताईसवीं पर। और फिर..."

वो रुके।

"मैंने उसका हाथ छोड़ दिया।"

मैं कुछ नहीं बोल पाया।

"मैं वहीं सड़क पर खड़ा रहा," चाचा ने कहा। "और उसे जाते देखा। बावड़ी की तरफ़। उसकी चीख़ धीरे-धीरे बंद हो गई। उसके क़दम धीमे हो गए। और वो मुंडेर पर चढ़ा, और पानी में उतर गया। और मैंने... मैंने कुछ नहीं किया।"

उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।

"अगली सुबह शंकर छब्बीसवीं सीढ़ी पर खड़ा मिला। आँखें खुली। और मैं... मैं ऊपर था। आज़ाद। मेरी गिनती रुक गई थी। बाबूजी का सौदा पूरा हो गया था।"

"हरिहर पंडित को पता है?"

"नहीं।" चाचा ने सिर हिलाया। "वो आज भी सोचते हैं कि ये किस्मत थी। या कोई तंत्र ग़लत हो गया। उन्होंने उस कलश में उसकी आवाज़ भर ली और चौंतीस बरस से उसे लोरी सुनाते हैं। और मैं..." उनकी आवाज़ टूटी। "मैं चौंतीस बरस से उनके मंदिर के सामने से सिर झुकाकर गुज़रता हूँ।"

"और बाबूजी हर हफ़्ते सुशीला मामी के पास जाते थे," मैंने कहा।

"सत्रह बरस। माफ़ी माँगने।" चाचा ने अपनी आँखें पोंछीं। "कन्हैया के लिए नहीं। उन्होंने कन्हैया का नाम कभी नहीं लिया, विक्की। मैं क़सम खाकर कहता हूँ। बानवे के बाद उन्होंने कसम खाई थी कि कभी किसी का नाम नहीं लेंगे। कन्हैया ख़ुद गया था। अपनी मर्ज़ी से।" उन्होंने गहरी साँस ली। "बाबूजी सुशीला से माफ़ी इसलिए माँगते थे क्योंकि वो उनसे शंकर के लिए माफ़ी माँग नहीं सकते थे। किसी से नहीं। तो उन्होंने दूसरी माँ चुन ली।"

हम बहुत देर तक चुप बैठे रहे। धूप ढलने लगी। नीम की छाया लंबी होती गई।

"ग्यारहवीं सीढ़ी पर," मैंने आख़िर में कहा, "आपका एक हिस्सा खड़ा है। जवान। इक्कीस बरस का। शंकर का हाथ थामे हुए।"

चाचा ने सिर हिलाया। "मुझे पता है। मैं उसे सपनों में देखता हूँ। चौंतीस बरस से।" उन्होंने अपनी दरारों वाली हथेली खोली। "उस रात मैंने उसका हाथ छोड़ा था। पर मेरा एक हिस्सा वहाँ सड़क पर रुक गया। उसे पकड़े हुए। कभी नहीं छोड़ा। और वो हिस्सा उसके साथ नीचे चला गया।"

"चौदहवीं रात उसने मेरी मदद की थी। बबलू को ऊपर लाने में।"

चाचा ने मेरी तरफ़ देखा। और पहली बार आज उनके चेहरे पर कुछ और आया। आँसुओं के बीच। कुछ ऐसा जो गर्व जैसा लगता था।

"सच?"

"सच।"

उन्होंने अपनी आँखें बंद कीं। "तो शायद मेरा वो हिस्सा... मुझसे बेहतर है।"

फिर वो उठे। और पश्चिम की तरफ़ देखा। जहाँ सूरज पीपल के पीछे उतर रहा था।

"आज रात सूरज चालीसवीं पर पहुँचेगा," उन्होंने कहा।

"हाँ।"

"जब तक कोई उसकी जगह न ले।"

मैं उठ खड़ा हुआ। "चाचा—"

"मेरी गिनती रुकी थी, विक्की। ख़त्म नहीं हुई थी।" उनकी आवाज़ बिल्कुल शांत थी। "छब्बीस। मेरा धागा अब भी वहीं है। मेरे टख़ने पर। वो निशान। चौंतीस बरस से।" उन्होंने अपनी धोती थोड़ी ऊपर की। वो भूरे, फीके निशान। "एक गिनने वाला अपनी अधूरी गिनती फिर से शुरू कर सकता है। किसी भी रात। अगर वो चाहे। और एक ही साँस में पूरी कर सकता है। जैसे मेरे मुँह से देवदत्त वाली ने पूरी की थी।"

"आप ऐसा नहीं करेंगे।"

"चौंतीस बरस मैंने एक हाथ छोड़ने का बोझ उठाया है।" उन्होंने मेरे कंधे पर अपना हाथ रखा। वो हाथ, जिसने कभी एक बारह साल के लड़के का हाथ छोड़ा था। "आज एक थामने दे।"

मैंने उन्हें रोकने की कोशिश की।

मैंने बहस की। चीख़ा। रोया। अम्मा के पास ले गया। मास्टर जी के पास। उन्होंने सबकी बात चुपचाप सुनी। और हर बार बस इतना कहा:

"सूरज की एक बेटी है।"

अम्मा ने कुछ नहीं कहा। बहुत देर तक। फिर उन्होंने अपनी सफ़ेद आँखें चाचा की तरफ़ उठाईं।

"अगर तू चालीसवीं बना, रघु," उन्होंने धीरे से कहा, "तो देवदत्त आज़ाद होगा।"

"मुझे पता है, अम्मा।"

अम्मा के होंठ काँपे। उनके चेहरे पर जो आया — मैं उसे पढ़ नहीं पाया। ख़ुशी? शर्म? दोनों? उन्होंने अपनी पायल वाली मुट्ठी भींच ली और नज़रें फेर लीं।

"तू जा, रघु," उन्होंने फुसफुसाया। "भगवान तेरे साथ हो।"

चाचा आख़िर में चाची के पास गए।

मैं दरवाज़े पर खड़ा था। उन्होंने चाची को कुछ नहीं बताया। वो बता भी नहीं सकते थे — चाची का कान उसका था। जो भी वहाँ कहा जाता, वो सुनती।

तो उन्होंने बस चाची का हाथ पकड़ा। रसोई में। चूल्हे के पास। और बहुत देर तक पकड़े रहे।

चाची ने उन्हें अजीब नज़रों से देखा। "क्या हुआ? आज बड़ा प्यार आ रहा है?"

चाचा मुस्कुराए। वो मुस्कान, जो मैंने चौंतीस साल पुरानी तस्वीर में देखी थी। गुब्बारे वाले के बगल में खड़े एक जवान लड़के की।

"कुछ नहीं, सरोज," उन्होंने कहा। पहली बार मैंने उन्हें चाची का नाम लेते सुना। "बस... आज तुम्हारे हाथ की चाय बहुत अच्छी बनी थी।"

चाची हँस पड़ीं। "पागल हो गए हो।"

पर जब चाचा ने उनका हाथ छोड़ा और दरवाज़े की तरफ़ मुड़े, तो मैंने चाची का चेहरा देखा। हँसी वहाँ से ग़ायब हो चुकी थी। वो अपने हाथ को देख रही थीं। जहाँ चाचा का हाथ था। और उनकी आँखों में — बिना किसी के कुछ कहे — एक समझ उतर रही थी।

पत्नियाँ जानती हैं। हमेशा।

रात साढ़े ग्यारह बजे चाचा बावड़ी पर गए।

मैं उनके साथ था। अम्मा भी। मैंने उन्हें अकेले जाने नहीं दिया।

वो मुंडेर पर बैठे। पैर नीचे लटकाकर। टीन के ऊपर। बिल्कुल वैसे, जैसे दादाजी बैठे मिले थे। उन्होंने पीपल की तरफ़ देखा। आसमान की तरफ़। तारे निकल आए थे। हज़ारों।

"बचपन में तू इन्हें गिनता था," उन्होंने कहा। "मुझे याद है। बाबूजी हमेशा तुझे रोकते थे।"

"अब समझ आया क्यों।"

चाचा हल्का-सा हँसे। फिर उन्होंने अपनी जेब से कुछ निकाला और मेरे हाथ में रखा। एक पुराना, मुड़ा हुआ काग़ज़।

"हरिहर पंडित के लिए," उन्होंने कहा। "सब लिखा है। कल उन्हें दे देना। दरवाज़े के छेद से। वो पढ़ेंगे या नहीं, उनकी मर्ज़ी।"

मैंने काग़ज़ जेब में रखा।

"और सरोज..." उनकी आवाज़ पहली बार काँपी। "उसका ध्यान रखना, विक्की। उसका कान... जिस दिन ये ख़त्म हो, उस दिन उसका कान भी ठीक हो जाएगा। मुझे यक़ीन है।"

"चाचा, प्लीज़—"

"दो बजकर सैंतालीस पर तू नीचे चला जाएगा," उन्होंने कहा। "अठारहवीं पर। मैं तेरे पीछे आऊँगा। तू मुझे देखेगा। मुझे रोकना मत।" उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा। "वादा कर।"

मैंने कुछ नहीं कहा।

"वादा कर, विक्की।"

"वादा," मैंने फुसफुसाया।

दो बजकर सैंतालीस।

अठारहवीं सीढ़ी।

पानी। अँधेरा। मेरी बाईं आँख में सब साफ़।

और ऊपर से — मुंडेर से — एक आवाज़। चाचा की। शांत। स्थिर। जैसे कोई पूजा में मंत्र पढ़ रहा हो।

"सत्ताईस।"

पानी हिला। कोई उतरा।

"अट्ठाईस।"

मैंने ऊपर देखा। पानी की सतह के पार। एक आकृति। नीचे आती हुई। धीरे-धीरे। हर संख्या के साथ एक सीढ़ी।

वो पहली सीढ़ी पर आए। दूसरी। तीसरी। उनकी गिनती छब्बीस से आगे थी, पर उनका शरीर ऊपर से उतर रहा था — जैसे बावड़ी ख़ुद उन्हें उनकी सही जगह तक ला रही हो।

वो ग्यारहवीं पर पहुँचे।

और रुके।

ग्यारहवीं सीढ़ी पर उनका जवान हिस्सा खड़ा था। इक्कीस बरस का। घुँघराले बाल। दायाँ हाथ नीचे की तरफ़ फैला हुआ, शंकर तक। चौंतीस साल से।

बूढ़े चाचा ने अपने जवान हिस्से को देखा। जवान हिस्से ने ऊपर से नज़र हटाई। और बूढ़े चाचा को देखा।

दोनों एक-दूसरे को देखते रहे। पानी में।

फिर बूढ़े चाचा ने अपना हाथ बढ़ाया। और अपने जवान हिस्से के कंधे पर रखा।

और जवान हिस्सा — धीरे-धीरे — उनमें घुल गया। पानी में स्याही की तरह। उनके शरीर में समाता हुआ। और जब वो पूरी तरह घुल गया, तो बूढ़े चाचा का दायाँ हाथ — जो अब तक ख़ाली था — नीचे की तरफ़ फैला हुआ था। पारदर्शी। खिंचा हुआ।

शंकर तक।

वो पूरे हो गए थे।

"उनतीस," उन्होंने कहा। और आगे बढ़े।

वो मेरे बगल से गुज़रे। अठारहवीं पर।

उनका कंधा मेरे कंधे से छुआ। उनका चेहरा मेरी तरफ़ मुड़ा। पानी में उनके बाल लहरा रहे थे। और वो मुस्कुरा रहे थे।

"अपना वादा याद रखना," उन्होंने कहा।

मैंने अपनी मुट्ठियाँ भींच लीं। मेरी उँगलियाँ चाहती थीं कि उन्हें पकड़ लूँ। खींच लूँ। रोक लूँ।

मैंने नहीं पकड़ा।

सत्रह साल पहले, इसी बावड़ी में, एक बारह साल के लड़के ने एक हाथ पकड़ना चाहा था, और पकड़ नहीं पाया था। चौंतीस साल पहले, पीपल वाली सड़क पर, एक इक्कीस साल के लड़के ने एक हाथ पकड़ा था, और छोड़ दिया था।

और आज, अठारहवीं सीढ़ी पर, मैं एक हाथ को जाने दे रहा था। जान-बूझकर। क्योंकि उस हाथ ने मुझसे वादा माँगा था।

हर पीढ़ी का अपना हाथ होता है, जिसे वो नहीं थाम पाती। शायद यही इस बावड़ी का असली श्राप था। सीढ़ियाँ नहीं। हाथ।

"तीस," उन्होंने कहा। और आगे बढ़ गए। नीचे। अँधेरे में। पर मेरी बाईं आँख उन्हें देखती रही।

इकतीस। बत्तीस। तैंतीस।

छब्बीसवीं सीढ़ी — वो पहले ही उसके पार जा चुके थे — पर उनका पारदर्शी हाथ उसी तरह शंकर को थामे था। और जैसे-जैसे वो नीचे उतरते गए, उनका हाथ छोटा होता गया। खिंचाव कम होता गया। जब तक कि वो शंकर के ठीक बगल में नहीं पहुँच गए।

उन्होंने शंकर का हाथ पकड़ा। असली हाथ। अपने असली हाथ में।

"शंकर," उन्होंने कहा। "मैं तुझे छोड़ने आया था, बानवे में। आज ले चलने आया हूँ।"

और शंकर — छब्बीसवीं पर, चौंतीस साल से एक ही संख्या दोहराता हुआ — रुक गया।

उसकी गिनती रुक गई।

उसने अपना सिर घुमाया। पहली बार। ऊपर से हटाकर। चाचा की तरफ़।

"रघु भैया?"

चाचा ने उसका हाथ छोड़ा नहीं। उन्होंने उसे ऊपर की तरफ़ धकेला। धीरे से। प्यार से।

"जा, शंकर। बाबा के पास जा। वो लोरी गाते हैं। हर रात।"

और शंकर का शरीर — पत्थर जैसा, चौंतीस साल से जमा हुआ — पानी में घुलने लगा। रोशनी बनकर। छोटे-छोटे बुलबुलों में। ऊपर की तरफ़ उठता हुआ। मेरे बगल से। सतह की तरफ़।

और ज़ंजीर की एक कड़ी टूट गई।

"चौंतीस। पैंतीस।"

चाचा उतरते रहे।

"छत्तीस। सैंतीस। अड़तीस।"

और फिर वो उनतालीसवीं पर पहुँचे।

सूरज वहाँ खड़ा था। पूरा पत्थर। चेहरा ऊपर। उसकी एक बची हुई आँख खुली।

चाचा उसके सामने रुके। उन्होंने उसके पत्थर के चेहरे को छुआ। दोनों हाथों से। जैसे कोई बाप अपने बेटे का चेहरा छूता है।

"तेरी बेटी को ग्यारह मत सीखने देना, सूरज," उन्होंने कहा।

और सूरज की आँख से एक आँसू निकला।

और उसके पत्थर के चेहरे पर एक दरार पड़ी।

एक बारीक लकीर। माथे से ठोड़ी तक। और उस दरार से, पत्थर के नीचे, कुछ चमका। गुलाबी। गर्म।

चाचा ने उसे छोड़ा। और उनतालीसवीं से आगे पैर बढ़ाया।

नीचे कुछ नहीं था। कोई सीढ़ी नहीं। सिर्फ़ अँधेरा। और एक पत्थर का लड़का, चौदह बरस का, जो अड़सठ बरस से वहाँ खड़ा था।

"चालीस," चाचा ने कहा।

मैंने देखा।

मुझे नहीं देखना चाहिए था। पर मैंने देखा।

चाचा के पैर अँधेरे में उतरे। देवदत्त के पत्थर के ठीक बगल में। और जहाँ उनके पैर पड़े, वहाँ पानी जम गया। पत्थर बन गया। उनके तलवे। उनकी एड़ियाँ। उनके टख़ने।

पत्थर ऊपर चढ़ने लगा। धीरे-धीरे। उनकी पिंडलियाँ। उनके घुटने।

और उनके बगल में, देवदत्त के पत्थर में, दरारें पड़ने लगीं।

हर दरार के साथ जो चाचा पर चढ़ता, एक दरार देवदत्त से उतरती। जैसे पत्थर एक शरीर से दूसरे शरीर में बह रहा हो। एक जाता है, एक आता है।

चाचा की कमर। उनकी छाती।

देवदत्त का सिर। पत्थर उसके माथे से झड़ने लगा। टुकड़ों में। और नीचे से एक चेहरा — पीला, पर ज़िंदा — झाँकने लगा।

चाचा की गर्दन। उनकी ठोड़ी।

उन्होंने आख़िरी बार ऊपर देखा। मेरी तरफ़। अठारहवीं सीढ़ी की तरफ़।

"विक्की," उन्होंने कहा। उनके होंठ अब भी चमड़ी थे। आख़िरी पल तक। "उस लड़की से... मेरी तरफ़ से माफ़ी माँगना। गंगाधर का ख़ून आज पहली बार अपनी मर्ज़ी से नीचे आया है। उसे बताना।"

पत्थर उनके होंठों पर चढ़ा।

उनकी आँखें।

और रघुनाथ मिश्र — मेरे चाचा, पचपन बरस के, जिन्होंने चौंतीस साल एक हाथ छोड़ने का बोझ उठाया था — चालीसवीं सीढ़ी बन गए।

मैं ऊपर कैसे आया, मुझे याद नहीं।

मुझे याद है मुंडेर। धूल। अम्मा की चीख़। और सुबह की पहली रोशनी।

और फिर पानी हिला।

और एक हाथ मुंडेर के किनारे पर आया।

दायाँ। काले धागे वाला। ताँबे का सूरज।

और वो हाथ चमड़ी का था। गुलाबी। गर्म। जगह-जगह पत्थर के टुकड़े उस पर चिपके थे, पर वो झड़ रहे थे। धूप में। जैसे सूखी मिट्टी झड़ती है।

मैंने उसे पकड़ा। और खींचा।

सूरज।

उसका चेहरा आधा पत्थर था, आधा चमड़ी। दरारों से भरा। पर हर पल पत्थर झड़ रहा था। उसकी दोनों आँखें — दोनों — खुली थीं। बाईं अब भी सफ़ेद। पर वहाँ। उसकी अपनी।

वो मुंडेर पर गिरा। और खाँसा। और साँस ली। पूरी साँस। दोनों तरफ़ से छाती उठी।

"विक्की," उसने कहा। उसकी आवाज़ टूटी हुई थी। पर वो बोल सकता था। "रघु चाचा... रघु चाचा ने..."

"मुझे पता है।"

वो रोने लगा। मैंने उसे पकड़े रखा।

पीपल वाली सड़क से किसी के दौड़ने की आवाज़ आई। छोटे-छोटे, नंगे पैर। और उनके पीछे भारी, धीमे क़दम।

"पापा!"

गुड्डी। मामी का हाथ छुड़ाकर दौड़ती हुई। उसकी चोटियाँ खुली हुईं, उसकी फ्रॉक पर रात की धूल। वो पूरी रात सोई नहीं थी — मामी ने बाद में बताया — बस खिड़की पर बैठी रही थी, पीपल की तरफ़ देखती हुई। और सुबह होते ही, बिना किसी के कहे, दौड़ पड़ी थी।

सूरज ने उसे देखा। और उठने की कोशिश की। उसकी टाँगें अब भी आधी पत्थर थीं। वो गिर पड़ा।

गुड्डी उसके ऊपर गिरी। अपनी छोटी-छोटी बाँहें उसकी गर्दन में डालकर। और जहाँ-जहाँ उसने छुआ — उसका चेहरा, उसके कंधे, उसकी छाती — कड़ा चमका, और पत्थर झड़ा। तेज़ी से। धूल बनकर।

"पापा, आप नीचे नहीं गए," उसने रोते हुए कहा। "मैंने कहा था न। मैंने ग्यारह नहीं सीखा। देखो। मैंने नहीं सीखा।"

सूरज कुछ नहीं बोल पाया। वो बस अपनी बेटी को पकड़े रहा। अपने दोनों हाथों से। पहली बार कई दिनों में — दोनों हाथों से।

मामी मुंडेर के पास आकर रुकीं। उन्होंने बाप-बेटी को देखा। फिर मेरी तरफ़। फिर बावड़ी की टीन की तरफ़।

"रघु?" उन्होंने धीरे से पूछा।

मैंने सिर हिलाया।

मामी ने अपनी आँखें बंद कर लीं। और मैंने देखा, उनके होंठ हिले। कोई प्रार्थना। या शायद सिर्फ़ एक नाम।

और तब पानी फिर हिला।

एक और हाथ। मुंडेर के किनारे पर।

बायाँ।

पतला। पीला। एक चौदह बरस के लड़के का। उस पर पत्थर की महीन धूल चिपकी थी। और वो काँप रहा था। जैसे अड़सठ बरस में पहली बार उसने कुछ पकड़ा हो।

अम्मा की चीख़ रुक गई।

वो मुंडेर के किनारे पर थीं। उनकी सफ़ेद आँखें उस हाथ की तरफ़। वो उसे देख नहीं सकती थीं — पर उन्हें पता था। मैंने उनके चेहरे पर देखा। उन्हें पता था।

एक लड़का ऊपर चढ़ा। चौदह-पंद्रह बरस का। दुबला। सफ़ेद, लगभग पारदर्शी चमड़ी। बाल पानी से चिपके हुए। और आँखें — बड़ी, काली, डरी हुई — जो दुनिया को ऐसे देख रही थीं जैसे कोई अंधा अचानक देखने लगा हो।

वो मुंडेर पर घुटनों के बल गिरा। और हाँफता रहा। हवा को ऐसे निगलता हुआ जैसे वो ज़हर हो और अमृत दोनों।

फिर उसने सिर उठाया। और अम्मा को देखा।

एक अस्सी बरस की अंधी औरत। लाल चुनरी में। एक घुँघरू वाली पायल हाथ में।

उसके होंठ हिले।

"प्यारी?"

अम्मा ने अपना हाथ बढ़ाया। हवा में। टटोलते हुए।

और देवदत्त ने उसे पकड़ा।

अपने बाएँ हाथ से।

अम्मा का पूरा शरीर काँप गया। उनकी उँगलियाँ उसकी उँगलियों को टटोलती रहीं। और फिर उन्होंने उसे अपनी तरफ़ खींचा, और अपनी छाती से लगा लिया, और उनके मुँह से एक आवाज़ निकली — अड़सठ बरस पुरानी — जो किसी शब्द में नहीं बँध सकती थी।

मैंने अपनी जेब का घुँघरू छुआ।

चुप। बिल्कुल चुप।

ये वो नहीं थी। ये सच में वो था।

और उसी वक़्त, गाँव की तरफ़ से, पुराने शिव मंदिर के पीछे से, एक आवाज़ आई। एक बूढ़े आदमी की। ज़ंजीरों की खनक के साथ। एक लोहे का दरवाज़ा, जो चौंतीस साल से बंद था, ज़ोर से खुलने की आवाज़।

और फिर एक चीख़। जो पूरे भानपुरा में गूँजी।

"शंकर!"

बाद में, दोपहर को, हरिहर शास्त्री की भतीजी ने बताया। सुबह पौ फटते ही वो कलश, जो चौंतीस साल से छब्बीस-छब्बीस दोहराता था, अचानक चुप हो गया था। और फिर उसके अंदर से एक आख़िरी आवाज़ आई थी। एक बच्चे की। साफ़। ख़ुश।

"बाबा, मैं आ गया।"

और फिर कलश का पानी सूख गया। एक पल में। जैसे किसी ने उसे पी लिया हो।

पुजारी ने चौंतीस साल में पहली बार अपना दरवाज़ा खोला था। और नंगे पैर गली में खड़े होकर, आसमान की तरफ़ देखकर, अपने बेटे का नाम पुकारा था।

मेरी जेब में चाचा का काग़ज़ था। पुजारी के लिए। सब कुछ लिखा हुआ।

मुझे नहीं पता था कि उसे देने की हिम्मत कब होगी।

मैं घर लौटा तो चाची आँगन में ज़मीन पर बैठी थीं।

उन्हें किसी ने नहीं बताया था। उन्हें ज़रूरत नहीं थी।

वो तुलसी के पास बैठी थीं। चाचा का पीतल वाला लोटा उनकी गोद में था। ख़ाली। और वो उसे ऐसे पकड़े थीं जैसे कोई बच्चे को पकड़ता है।

मैं उनके पास गया। घुटनों के बल बैठा। "चाची..."

उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। और उनके बाएँ कान से कुछ बहा।

हरा पानी। गाढ़ा। और उसमें ख़ून की लकीरें।

और उनके होंठ हिले। पर वो आवाज़ चाची की नहीं थी। वो उसकी थी। दोहरी। लड़की वाली और भूख वाली। पर आज लड़की वाली आवाज़ सुनाई ही नहीं दे रही थी। सिर्फ़ भूख। गहरी। संतुष्ट। धरती के खिसकने जैसी।

"गंगाधर का ख़ून। चालीसवीं पर। दो सौ अस्सी बरस बाद।"

चाची की आँखें ऊपर पलट गईं। सिर्फ़ सफ़ेदी।

"अपनी मर्ज़ी से आया। भरोसे से। जैसे वो लड़की आई थी।" हँसी। बुलबुलों वाली। "भरोसे से बड़ा कोई बंधन नहीं, गंगाधर के पोते। तेरे पुरखे ने सिखाया था।"

एक ठहराव।

"अब मैं एक सीढ़ी नहीं चढ़ूँगी। अब मैं तीन चढ़ूँगी।"

चाची की आँखें वापस आईं। उन्होंने पलकें झपकाईं। लोटे को देखा। फिर मुझे।

"विक्की," उन्होंने बहुत धीरे से कहा। उनकी अपनी आवाज़ में। "तेरे चाचा कहाँ हैं?"

मैंने उनका हाथ पकड़ा। वही हाथ, जो कल रात रसोई में चाचा ने पकड़ा था। बहुत देर तक।

और मैं कुछ नहीं कह पाया।

क्योंकि उनके कान से अब भी वो हरा पानी बह रहा था। और मुझे पता था कि जो भी मैं इस आँगन में कहूँगा, वो नीचे तक पहुँचेगा। चालीसवीं सीढ़ी तक। एक पत्थर के आदमी तक, जिसने कल रात अपनी पत्नी का नाम लिया था, पहली बार, और कहा था कि उसकी चाय बहुत अच्छी बनी थी।

भाग 18 समाप्त।

अगले भाग में — "उन्नीसवीं सीढ़ी": वो सीढ़ी, जहाँ सत्रह साल पहले सब हुआ था। विक्रम की बाईं आँख उसे आख़िरकार पूरी याद दिखाती है। 2009 की वो दोपहर। शुरू से अंत तक। कौन गिन रहा था। कौन उतर रहा था। किसका हाथ किसकी पीठ पर था। और उन्नीसवीं सीढ़ी पर, छोटू का खुला हाथ, अब भी इंतज़ार कर रहा है...

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