Pretika › Real Experiences › भानपुरा की बावड़ी - चालीस सीढ़ियाँ

भाग 32 — बत्तीसवीं सीढ़ी

Piyashi Atma · Real Experiences · 20 मिनट

Writer
Piyashi Atma
Story
भानपुरा की बावड़ी - चालीस सीढ़ियाँ
Chapter
32 of 32
Category
Real Experiences
Reading time
20 min
Words
3987
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

जो पानी पीता है, वो पानी का हो जाता है।

ये बात दादी कहती थीं, जब मैं बचपन में किसी अनजान कुएँ से पानी पीने की ज़िद करता था। हर कुएँ का अपना मालिक होता है, विक्कू। किसी का पानी पियो, तो उसका नमक खाया। और जिसका नमक खाया, उसका क़र्ज़ चढ़ा।

मैं उस बात पर हँसता था। पानी तो पानी है। वो किसी का कैसे हो सकता है?

उस बत्तीसवें दिन, पूरे भानपुरा ने उस पानी को पिया, जो तीन बरस के सूखे के बाद अचानक उनके कुओं में भर आया था।

और उस रात, रुके हुए वक़्त में, पूरे भानपुरा ने मेरे लिए गिनती की।

सुबह तक मेरे पैर टख़नों तक पत्थर के थे।

मैं चल सकता था — बड़ी मुश्किल से। हर क़दम के साथ एक भारी, खुरदुरी ठक। जैसे कोई मूर्ति चलना सीख रही हो। मेरे तलवे ज़मीन पर पड़ते, तो ज़मीन में हल्का-सा गड्ढा बन जाता।

सूरज ने मुझे अपनी बैसाखी दी।

"तुझे मुझसे ज़्यादा ज़रूरत है," उसने कहा। उसकी अपनी टाँगें अब लगभग पूरी तरह ठीक थीं। बस पिंडलियों पर कुछ भूरे धब्बे बचे थे, जैसे पुराने घाव के निशान।

मैंने बैसाखी ली। उसकी लकड़ी पर उसकी पकड़ के निशान थे। उन्नीस रातों के।

"आज गाँव में पूजा है," सूरज ने कहा। "कुएँ पर। सरपंच ने रखवाई है। पानी लौटने की ख़ुशी में। पूरा गाँव आएगा।"

मैंने उसकी तरफ़ देखा।

"तूने वो पानी पिया?"

सूरज ने अपना सिर हिलाया। दाएँ से बाएँ।

"नहीं," उसने कहा। "मैंने कल उसे अपनी इस आँख से देखा।" उसने अपनी सफ़ेद आँख छुई। "जब सब कुएँ पर नाच रहे थे। मैंने देखा कि उसका रंग क्या है।"

"क्या?"

"हरा," उसने फुसफुसाया। "नीचे की तरफ़। तली में। बहुत हल्का। जैसे बावड़ी वाला।"

कुएँ पर पूरा गाँव था।

फूलों की मालाएँ। अगरबत्ती का धुआँ। नए मंदिर के पुजारी — वो जवान वाला, जो रोज़ घड़े से जल चढ़ाता था — मंत्र पढ़ रहे थे। और औरतें गा रही थीं। बरसात वाले गीत। सावन के। मल्हार।

सरपंच रामकिशोर यादव सबसे आगे खड़े थे। उनके हाथ में एक पीतल का लोटा था। कुएँ के पानी से भरा हुआ।

"तीन बरस," उन्होंने ऊँची आवाज़ में कहा, "तीन बरस इस गाँव ने टैंकर का पानी पिया। मोल का पानी। हमारे बच्चों ने प्यास में रातें काटीं। हमारे पशु मरे।" उन्होंने लोटा ऊपर उठाया। "और आज, भगवान की कृपा से, हमारा अपना कुआँ भरा है। हमारा अपना पानी।"

भीड़ ने जयकारा लगाया।

और सरपंच ने लोटे से पानी पिया। गट-गट-गट। पूरा।

फिर मास्टर जी ने पिया। फिर कमला ने, बबलू को गोद में लिए, पहले बबलू को पिलाया, फिर ख़ुद पिया। फिर पूरा गाँव। एक-एक करके। लोटे में। कटोरों में। हथेलियों में।

मैंने अपनी बाईं आँख से देखा।

और हर एक के गले से पानी नीचे उतरा। उनके पेट में। और वहाँ — उनके अंदर — वो चमका।

हरा। हल्का। पर साफ़।

और उस हरी चमक से, हर एक के गले से, ऊपर की तरफ़, कुछ निकलने लगा।

धागे।

बहुत पतले। लगभग अदृश्य। उनके होंठों से निकलकर हवा में लहराते हुए। और धीरे-धीरे, सब एक दिशा में मुड़ते हुए।

पीपल की तरफ़। बावड़ी की तरफ़।

"केंचुली," अम्मा ने कहा।

मैं उनके आँगन में था। कुएँ से भागकर आया था। बैसाखी के सहारे। हाँफता हुआ।

"कल आपने कहा था — साँप जब केंचुली छोड़ता है, तो नया होता है।"

"हाँ।" अम्मा का चेहरा पत्थर जैसा था। उनकी पायलें उनकी गोद में। उनके मटके में सरपंच का भेजा हुआ पानी अब भी था — उन्होंने उसे छुआ तक नहीं था। "मैं सोचती थी वो पीछे हट रही है। अपने धागे समेट रही है। डर गई है।"

"पर वो नहीं डरी थी।"

"वो बदल रही थी।" अम्मा ने अपनी सफ़ेद आँखें गाँव की तरफ़ उठाईं। "उसने पुराने धागे छोड़े — वो जो ज़बरदस्ती बाँधे गए थे। बच्चों के। खेल वाले। वो कमज़ोर थे। वो टूट सकते थे।" उनकी आवाज़ बहुत धीमी हो गई। "और उसने नए धागे बाँधे। उनसे, जो ख़ुद आए। अपनी मर्ज़ी से। शुक्रिया कहते हुए।"

मुझे गंगाधर की चिट्ठी याद आई।

भरोसे से बड़ा कोई बंधन नहीं।

"उसने अपना पानी दिया," अम्मा ने फुसफुसाया। "तीन बरस के सूखे के बाद। एक तोहफ़े की तरह। और पूरे गाँव ने उसे भगवान का आशीर्वाद समझकर पिया। शुक्रगुज़ार होकर। भरोसे से।"

"और अब वो पूरे गाँव में है।"

अम्मा ने सिर हिलाया।

"जैसे रघु के लोटे में थी," उन्होंने कहा। "बस इस बार एक लोटा नहीं। तीन सौ घर।"

मैं सरपंच के पास गया।

वो अपने आँगन में थे, पूजा के बाद, गाँव के कुछ बड़े लोगों के साथ बैठे। हँसते हुए। पानी के बारे में बात करते हुए — कि खेतों में अब क्या बोया जाएगा, कि अगले महीने शादियाँ होंगी।

"सरपंच जी," मैंने कहा। "वो पानी मत पीजिए। किसी को मत पीने दीजिए।"

सब चुप हो गए।

सरपंच ने मुझे देखा। मेरी बैसाखी को। मेरे पत्थर वाले पैरों को। मेरी सफ़ेद आँख को।

"क्यों, बेटा?"

"वो बावड़ी का पानी है। उसका। जो सब कुछ कर रही है। उसने अपना पानी गाँव में छोड़ा है, ताकि सब उसे पिएँ, और..."

"और?"

मैंने उनके चेहरे को देखा। वो आदमी, जिसने मुझे अपना फ़ोन दिया था। जिसने चौदहवें दिन मेरे सामने सिर झुकाया था।

"और वो आपके अंदर है अब," मैंने धीरे से कहा।

सरपंच बहुत देर तक चुप रहे। फिर उन्होंने अपने आँगन के मटके की तरफ़ देखा। भरा हुआ। कुएँ के पानी से।

"विक्रम," उन्होंने कहा। उनकी आवाज़ में कोई ग़ुस्सा नहीं था। बस एक थकान। "तुमने इस गाँव के लिए बहुत किया है। मैं जानता हूँ। पूरा गाँव जानता है।" उन्होंने अपना सिर हिलाया। "पर तीन बरस इस गाँव ने प्यास देखी है। और आज पानी आया है। मैं अपने लोगों से ये नहीं कह सकता कि उसे मत पियो।"

"सरपंच जी—"

"अगर ये उसका पानी है," उन्होंने कहा, "तो भी ये पानी है। और प्यासा आदमी ये नहीं पूछता कि पानी किसका है।"

उनके बगल में बैठे एक बूढ़े ने सिर हिलाया। दूसरे ने अपना कटोरा उठाया और पानी पिया। जैसे मुझे जवाब दे रहा हो।

मैं वहाँ से चला आया।

दोपहर को बबलू मेरे पास आया। कमला के घर से भागकर। उसके हाथ में एक स्टील का गिलास था। कुएँ के पानी से भरा हुआ।

"चाचा," उसने कहा। "देखो।"

मैंने गिलास में झाँका। उसका प्रतिबिंब। गोल-मटोल। एक दाँत टूटा हुआ। पानी की सतह पर। जहाँ होना चाहिए।

"ठीक है न?" मैंने पूछा।

बबलू ने अपना सिर हिलाया। "नहीं, चाचा। ध्यान से देखो।"

मैंने बाईं आँख से देखा।

उसका प्रतिबिंब मुस्कुरा रहा था। वैसे ही, जैसे तीन दिन पहले मटके में लौटा था। पर उसकी आँखों से पानी बह रहा था। प्रतिबिंब की आँखों से। नीचे की तरफ़। गिलास की तली की तरफ़।

"ये रोता है," बबलू ने फुसफुसाया। "जब से मैंने कुएँ का पानी पिया। मैं हँसता हूँ, पर ये रोता है।" उसने गिलास को अपने सीने से लगा लिया। "मम्मी को नहीं दिखता। पर मुझे दिखता है।"

मैंने उसके सिर पर हाथ रखा।

"ये पानी किसी का है, बबलू," मैंने कहा। "और जिसका है, वो बहुत दिनों से रो रही है। शायद तेरा प्रतिबिंब उसके लिए रो रहा है।"

बबलू ने इस बात पर बहुत गंभीरता से सोचा। फिर गिलास का पानी ज़मीन पर उँडेल दिया।

"तो मैं इसे नहीं पिऊँगा," उसने कहा। "जब तक वो ख़ुश न हो जाए।"

"किसने नहीं पिया?" मैंने पूछा।

शाम थी। अम्मा के आँगन में हम सब थे। वो सब, जिन पर मुझे भरोसा था।

"मैंने नहीं," अम्मा ने कहा।

"मैंने भी नहीं," सूरज ने कहा। "मैंने देखा था।"

"मैंने और गुड्डी ने नहीं," मामी ने कहा। उनकी गोद में गुड्डी बैठी थी, घुँघरू मुट्ठी में, और उसके बगल में — मेरी बाईं आँख में — वो परछाईं। "कल दोपहर दीदी ने गुड्डी से कहा था कि वो पानी उसका है। तो हम डर गए। मैंने कल वाला पुराना पानी रखा था, टैंकर वाला। वही पिया।"

"मैंने भी नहीं पिया," हरिहर शास्त्री ने कहा। "चौंतीस बरस से मैं सिर्फ़ अपने कलश में रखा गंगाजल पीता हूँ। थोड़ा-थोड़ा। वो ख़त्म होने वाला था। पर आज भी उसी से काम चलाया।"

"और चाची?"

सबने चाची की तरफ़ देखा।

वो चुप थीं। उनके हाथ उनकी गोद में। उनकी आँखें नीचे।

"मैंने चाय बनाई थी," उन्होंने आख़िर में फुसफुसाया। "सुबह। कुएँ के पानी से। मुझे नहीं पता था।"

मैंने चाची को अपनी बाईं आँख से देखा।

उनके पेट में वो हरी चमक थी। हल्की। बहुत हल्की। उनके गले से एक पतला-सा धागा निकलता था। बावड़ी की तरफ़।

पर उनका कान — बायाँ वाला, जो छब्बीस दिन तक उसकी खिड़की था — बंद था। सूखा। उसमें से कोई धागा नहीं निकलता था।

"आपका कान बंद है, चाची," मैंने कहा। "वो आपके अंदर से सुन नहीं सकती। पर वो आपके अंदर है।"

चाची ने अपने पेट पर हाथ रखा।

"क्या करूँ?"

हरिहर शास्त्री ने अपना कलश उठाया। वो छोटा-सा मिट्टी का कलश, जो चौंतीस साल तक शंकर की आवाज़ से भरा रहा था, और अब उसमें गंगाजल था।

"थोड़ा बचा है," उन्होंने कहा। "एक घूँट। शायद दो।" उन्होंने उसे चाची की तरफ़ बढ़ाया। "पी ले, बहू। ये उसे धो नहीं पाएगा। पर शायद उसे थोड़ा पतला कर दे।"

चाची ने पिया।

दो बजकर सैंतालीस से पहले मैं बावड़ी की तरफ़ निकला।

बैसाखी के सहारे। पीपल वाली सड़क पर। चाँदनी में। मेरे पत्थर वाले पैरों की ठक-ठक।

गाँव सो रहा था। हर घर अँधेरा। हर दरवाज़ा बंद।

पर मेरी बाईं आँख में, हर घर से, हवा में लहराते हुए, वो पतले धागे निकल रहे थे। सैकड़ों। हर खिड़की से। हर छत से। हर दरवाज़े की दरार से। और सब पीपल की तरफ़ जा रहे थे। बावड़ी की तरफ़।

और वहाँ, पीपल के ऊपर, वो सब एक-दूसरे में गुँथ रहे थे। एक मोटी, काली रस्सी बनाते हुए। जो बावड़ी के मुँह में उतरती थी।

रास्ते में मैं सूरज के घर के सामने से गुज़रा। अँधेरा। ख़ाली। सूरज आज रात अम्मा के आँगन में था, गुड्डी के पास।

दरवाज़ा खुला था। और आँगन में, चाँदनी में, एक ख़ाली खाट पड़ी थी। उसकी चादर तह की हुई। उसके सिरहाने एक तकिया, जिस पर अब भी किसी के सिर का हल्का-सा गड्ढा था।

सूरज की माँ की खाट। सत्रह बरस की उधार की साँसें इसी पर ली गई थीं।

खाट के बगल में, ज़मीन पर, एक मिट्टी का मटका रखा था। कुएँ के पानी से भरा हुआ। किसी पड़ोसी ने भरकर रख दिया होगा, मातम के घर में।

और मेरी बाईं आँख में, उस मटके से, एक पतला हरा धागा उठ रहा था। हवा में लहराता हुआ। उस ख़ाली खाट की तरफ़। जैसे कुछ ढूँढ रहा हो, जो अब वहाँ नहीं था।

मुंडेर पर पहुँचकर मैंने नीचे देखा।

पानी अब दसवीं से भी नीचे था। पंद्रहवीं तक सीढ़ियाँ सूखी। और पानी — जो बचा था — वो अब बह नहीं रहा था। वो शांत था। बहुत शांत। जैसे कोई जानवर, जिसने शिकार कर लिया हो, और अब आराम कर रहा हो।

मैं उतरा।

दो बजकर सैंतालीस।

वक़्त रुका।

और मैंने आवाज़ सुनी।

ऊपर से। बावड़ी के बाहर से। गाँव की तरफ़ से। बहुत दूर से, पर रुके हुए वक़्त में सब सुनाई देता है।

एक आवाज़। फिर दो। फिर दस। फिर सौ।

एक साथ। एक सुर में। एक लय में। धीमी। नींद में डूबी हुई। जैसे कोई मंदिर में आरती गा रहा हो। पर वो आरती नहीं थी।

"बत्तीस।"

मैं जम गया।

"बत्तीस।"

पूरे गाँव की आवाज़। हर घर से। सरपंच की। मास्टर जी की। कमला की। बबलू की। बूढ़ों की। बच्चों की। औरतों की। वो मोटी आवाज़ें जो कुएँ पर मल्हार गा रही थीं। वो बच्चे जो पानी में अपनी परछाइयाँ देखकर चिल्ला रहे थे।

सब। एक साथ।

"बत्तीस।"

वो मेरे लिए गिन रहे थे।

मैं उल्टे गाँव में पलटा। पनघट। सीढ़ी का मुँह — जो अब और दूर था, और नीचे की तरफ़ झुका हुआ।

मैं बत्तीसवीं पर पहुँचा। मेरे पैर जमे।

उल्टा गाँव कल से भी ज़्यादा सिकुड़ चुका था। पानी की छत इतनी नीचे थी कि उसकी जड़ें अब ज़मीन को छू रही थीं, जैसे किसी पिंजरे की सलाखें। कई उल्टे घर पूरी तरह उसमें समा चुके थे। उनकी जगह बस पानी की सतह पर हल्की लहरें थीं, जैसे वहाँ कभी कुछ था ही नहीं।

पूरियों वाली औरत का घर आधा बचा था। वो अपनी ख़ाली थाली लिए उसके दरवाज़े पर बैठी थी। अपने बेटे को बुलाती हुई, जो अंदर था, और जिसका चेहरा अब पानी की सतह के ठीक नीचे था। पलक झपकाता हुआ।

पनघट का खंभा — जो कभी ऊपर की तरफ़ बहता था — अब पूरी तरह शांत था। उसका पानी न ऊपर जाता था, न नीचे। बस ठहरा हुआ। जैसे साँस रोके हुए।

और ऊपर से, पानी की छत के पार — जो अब इतनी नीचे आ गई थी कि मैं उसकी ठंडक अपने सिर पर महसूस कर सकता था — वो आवाज़ आती रही।

"बत्तीस।"

"बत्तीस।"

"बत्तीस।"

और फिर — एक पल की चुप्पी।

"तैंतीस।"

मेरे पैर उखड़े। पत्थर वाले पैर। बत्तीसवीं से। तैंतीसवीं की तरफ़।

मैंने अपने बाएँ हाथ से दीवार पकड़ी। मेरी उँगलियाँ पत्थर में धँसीं।

"तैंतीस।"

मैं खिंचा। नीचे। मेरे पत्थर वाले पैर पत्थर की सीढ़ी पर घिसटे। घर्रर्र। जैसे पाँचवीं रात, जब देवदत्त वाली चीज़ मेरे बगल से ऊपर गई थी।

"तैंतीस।"

"भैया!"

छोटू। वो मेरे बगल में आया। उसने मेरा हाथ पकड़ा। अपने गर्म, छोटे हाथ से। और पीछे की तरफ़ खींचा।

पर वो बहुत हल्का था। और वो आवाज़ — पूरे गाँव की — बहुत भारी।

"तैंतीस।"

"वो एक रात में चालीस करवाना चाहती है," छोटू ने चिल्लाया। "आज ही! पूरे गाँव की आवाज़ से! जैसे चाची ने किया था! जैसे रघु चाचा ने!"

"अगर मैं आज चालीसवीं पहुँचा—"

"तो घुँघरू ऊपर है! गुड्डी के पास! वो नीचे नहीं होगा! और भूख पेट भरकर सोएगी, और कोई उसके कान में कुछ नहीं बजाएगा!" छोटू की आवाज़ टूट गई। "और तुम पत्थर बनोगे, भैया! बेकार! और वो जीत जाएगी!"

"चौंतीस।"

मैं खिंचा। तैंतीसवीं पर। मेरी उँगलियाँ दीवार से फिसलीं।

पनघट पर सरला चिल्ला रही थीं। गंगाधर का पोता और भोला सीढ़ी के मुँह पर खड़े थे, हाथ पकड़े, नीचे झुके हुए, मेरी तरफ़ हाथ बढ़ाते हुए। पर वो बहुत दूर थे।

और तब — ऊपर से — उस आवाज़ के बीच से — एक और आवाज़ आई।

पतली। मीठी। अकेली।

एक बच्ची की।

"...सीढ़ी-सीढ़ी उतरी पनिहारिन..."

गुड्डी।

मुझे बाद में पता चला।

अम्मा के आँगन में, रुके हुए वक़्त में, वो सब जाग रहे थे जिन्होंने पानी नहीं पिया था। या जो पहले से उसके धागे से बँधे थे, और इसलिए रुके हुए वक़्त में जागते थे।

अम्मा। मामी। सूरज। हरिहर शास्त्री। चाची — गंगाजल के बाद भी आधी जमी हुई, पर आँखें खुली। और गुड्डी।

और जब पूरे गाँव से वो गिनती उठी — बत्तीस, बत्तीस, बत्तीस — गुड्डी ने अम्मा का हाथ पकड़ा।

"दादी, वो चाचा को नीचे ले जा रहे हैं।"

"हाँ, बिटिया।"

"तो हम उन्हें सुलाते हैं।"

और उसने गाना शुरू किया। घुँघरू अपनी मुट्ठी में भींचे। उस परछाईं का हाथ पकड़े।

पुराना गीत नहीं। नया वाला।

"...घड़ा लिया सिर पे, घर को चली..."

मामी ने उसके साथ गाया। फिर अम्मा ने। फिर सूरज ने — उसकी आवाज़ टूटी हुई, बेसुरी, पर ऊँची। फिर हरिहर शास्त्री ने, अपनी भारी, पुरानी आवाज़ में, वो जो चौंतीस साल एक कलश को लोरी सुनाते रहे थे।

और चाची भी। आधी जमी हुई, उनके पेट में वो हरी चमक अब भी, पर गंगाजल ने उसे पतला कर दिया था। वो धीरे-धीरे अपनी जगह से उठीं। लड़खड़ाते हुए। और उनके होंठों से पहले तो कुछ और निकला — बत्ती... — फिर वो रुकीं। अपने होंठ काटे। और गाने लगीं। ...घड़ा लिया सिर पे...

सूरज ने अम्मा का हाथ पकड़ा। मामी ने गुड्डी का। हरिहर शास्त्री ने अपना ख़ाली कलश सीने से लगाया।

एक अंधी बूढ़ी। एक बाप, जिसने कल रात अपनी बेटी को पानी के किनारे बिठाया था। एक माँ, जिसका बेटा सत्रह बरस पहले गया था। एक पुजारी, जिसका बेटा अभी-अभी रोशनी बनकर गया था। एक विधवा, जो सुबह-सुबह अपने पति का नाम लेती थी। और एक पाँच साल की बच्ची, एक परछाईं का हाथ पकड़े।

भानपुरा की सबसे अजीब टोली। रुकी हुई रात में। एक लोरी गाती हुई।

और वो आँगन से बाहर निकले। गली में। रुके हुए गाँव में। गाते हुए।

"...माँ खड़ी है दरवाज़े पे..."

वो हर घर के सामने से गुज़रे।

सरपंच का घर। खिड़की से मैंने बाद में सुना — सरपंच अपनी खाट पर बैठे थे, आँखें बंद, होंठ हिलते हुए, चौंतीस, चौंतीस। और उनके गले से वो पतला धागा निकलता था, पीपल की तरफ़।

गुड्डी उनकी खिड़की के नीचे रुकी। और गाया।

"...कहती है — आ जा, मेरी लली..."

और सरपंच के पेट में जो हरी चमक थी — अम्मा ने बाद में बताया, वो उसे देख सकती थीं — वो हिली।

जैसे किसी ने कुछ पहचाना हो।

और तब अम्मा को समझ आया।

"वो पानी उसका है," उन्होंने फुसफुसाया। रुके हुए गाँव में। गुड्डी के बगल में खड़े होकर। "भूख का नहीं। लड़की का।"

"क्या मतलब, अम्मा?" सूरज ने पूछा।

"दो सौ अस्सी बरस पहले, जब उसे उल्टा गाड़ा गया — उसी रात पानी आया था। पोथी में लिखा है न? वो पानी लड़की के साथ आया था। उसकी देह से। उसके आँसुओं से।" अम्मा की आवाज़ काँप रही थी। "भूख ने उसे अपना बनाया। पर वो पानी पहले उसका था। उस पनिहारिन का। जो रोज़ नदी से पानी भरती थी।"

उन्होंने गुड्डी के बगल वाली परछाईं की तरफ़ मुँह किया।

"और पानी भूलता नहीं, बिटिया। वो अपने असली मालिक की आवाज़ पहचानता है।"

और उस परछाईं ने गाना शुरू किया।

गुड्डी के साथ। उसकी धुन में। बहुत धीमे। एक ऐसी आवाज़ में, जो किसी इंसान की नहीं थी — पानी की थी। किसी झरने की। किसी नदी की। किसी घड़े के भरने की।

"...माँ खड़ी है दरवाज़े पे..."

और सरपंच के होंठ — जो चौंतीस, चौंतीस दोहरा रहे थे — रुके।

और फिर हिले।

"...कहती है — आ जा, मेरी लली..."

उनके पेट का पानी — वो पानी जो उस लड़की का था, दो सौ अस्सी बरस पहले — अपनी मालकिन की आवाज़ सुनकर उसकी लोरी गाने लगा था।

नीचे, तैंतीसवीं सीढ़ी पर, मैंने सुना।

ऊपर से आती गिनती बदल रही थी। धीरे-धीरे। एक घर। फिर दूसरा। फिर दस।

"चौंतीस... चौं... माँ खड़ी है..."

"चौंतीस... सीढ़ी-सीढ़ी..."

"...आ जा, मेरी लली..."

सैकड़ों आवाज़ें। पूरे गाँव की। जो अभी गिनती कर रही थीं। अब एक लोरी गा रही थीं। नींद में। रुके हुए वक़्त में। बिना जाने।

और पानी की छत से — उल्टे गाँव के ऊपर से — वो पनघट के खंभे में, सुरंग में, सीढ़ियों की दरारों में — बालों में एक सरसराहट दौड़ी।

भूख चीख़ी।

"नहीं! वो मेरा पानी है! मेरा!"

पर पानी ने नहीं सुना।

पानी ने लोरी सुनी।

और मेरे पैरों का खिंचाव ढीला पड़ा। तैंतीसवीं पर।

छोटू ने खींचा। इस बार पूरी ताक़त से। और मैं ऊपर आया। एक सीढ़ी।

बत्तीसवीं।

मेरे पैर वहाँ टिके। जम गए। अपनी जगह पर।

सारी रात गाँव गाता रहा।

मैं बत्तीसवीं पर खड़ा रहा और उसे सुनता रहा। ऊपर से, पानी की छत के पार, बहुत दूर से। सैकड़ों आवाज़ें। नींद में। एक लोरी।

पनघट पर सरला भी गा रही थीं। और गंगाधर का पोता। और भोला। और उल्टे गाँव के बाक़ी लोग — जो अपने डूबते घरों के बाहर बैठे थे।

और छोटू मेरे बगल में बैठा था। उसने अपना सिर मेरे कंधे पर टिका रखा था। जैसे बचपन में। आम के पेड़ के नीचे।

"भैया," उसने बहुत देर बाद कहा, "वो लड़की... वो भी गा रही है। नीचे। मैं उसकी आवाज़ सुन सकता हूँ।"

मैंने सुनने की कोशिश की।

और बहुत नीचे से — पत्थरों के बीच से, बालों के नीचे से, उस गहरी, बंद होती सुरंग के पार से — मुझे एक आवाज़ सुनाई दी।

पतली। टूटी हुई। दो सौ अस्सी बरस से बिना इस्तेमाल हुई। पर गाती हुई।

"...माँ खड़ी है दरवाज़े पे..."

और उसके साथ एक और आवाज़। बूढ़ी। भारी। रोती हुई।

दादाजी।

"...कहती है — आ जा, मेरी लली..."

सुबह गाँव जागा।

और किसी को कुछ याद नहीं था।

सरपंच आँगन में बैठे चाय पी रहे थे — कुएँ के पानी से बनी। मास्टर जी स्कूल जा रहे थे। कमला बबलू के बाल सँवार रही थी।

पर मैंने ग़ौर किया।

सब गुनगुना रहे थे।

सरपंच, अपनी चाय के ऊपर। मास्टर जी, साइकिल चलाते हुए। कमला, कंघी करते हुए। बबलू, अपनी गुड़ की डली चूसते हुए।

एक ही धुन। बिना जाने।

माँ खड़ी है दरवाज़े पे...

मैंने अपनी बाईं आँख से उन्हें देखा। उनके गले से वो धागे अब भी निकलते थे। पीपल की तरफ़।

पर अब वो काले नहीं थे।

वो हरे थे। हल्के। पारदर्शी। नदी के पानी जैसे।

और वो पीपल की तरफ़ नहीं जा रहे थे।

वो पश्चिम की तरफ़ जा रहे थे। तीन कोस दूर। एक सूखी नदी की तरफ़।

पत्थर मेरी पिंडलियों तक पहुँच चुका था।

मैं मुंडेर पर बैठा था। अम्मा, सूरज, मामी, गुड्डी मेरे चारों ओर। सुबह की धूप में। थके हुए। पर ज़िंदा।

"आठ रातें," सूरज ने कहा। मेरे पैरों को देखते हुए।

"आठ रातें," मैंने दोहराया।

अम्मा ने अपना हाथ मेरी पत्थर वाली पिंडली पर रखा। उसकी ठंडक को महसूस किया। फिर अपना चेहरा मेरी तरफ़ घुमाया।

"कल रात पूरा गाँव गाया, बच्चा," उन्होंने कहा। "नींद में। बिना जाने। उस लड़की की लोरी।" उनकी आवाज़ में कुछ ऐसा था जो मैंने उनमें पहले कभी नहीं सुना था। उम्मीद। "अड़सठ बरस मैंने इस गाँव को उससे डरते देखा है। कल रात पहली बार मैंने इस गाँव को उसके लिए गाते सुना।"

"वो याद नहीं रखेंगे।"

"याद नहीं रखेंगे," अम्मा ने कहा। "पर पानी रखेगा।"

गुड्डी मेरी गोद में चढ़ी। अपना घुँघरू वाला हाथ मेरी तरफ़ बढ़ाया।

"चाचा, छोटू भैया कहाँ गए? रात को वो आपके साथ थे। मैंने ऊपर से गाते हुए उनकी आवाज़ सुनी थी।"

"वो दसवीं पर होगा। सुबह वो वहीं रहता है।"

गुड्डी ने अपनी भौंहें सिकोड़ीं। "नहीं, चाचा। दीदी कह रही है — छोटू भैया आज दसवीं पर नहीं हैं।"

मेरा दिल रुक गया।

"तो कहाँ हैं?"

गुड्डी ने अपने बगल में बैठी परछाईं की तरफ़ देखा। बहुत ध्यान से। जैसे उसकी बात सुन रही हो।

"दीदी कह रही है," उसने धीरे से कहा, "कि वो नीचे गए हैं। बहुत नीचे। उसके पास। और..." उसकी आवाज़ रुकी।

"और क्या, बेटा?"

गुड्डी ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में डर था।

"और दीदी पूछ रही है — छोटू भैया उसके पास क्यों गए हैं, अगर उन्हें उसकी मदद नहीं करनी?"

मैंने उस परछाईं की तरफ़ देखा। गुड्डी के बगल में। उसका सिर झुका हुआ। उसके हाथ गुड्डी की उँगली को कसकर पकड़े हुए।

वो डरी हुई थी। पहली बार, जब से वो ऊपर आई थी, वो भूख से नहीं, पानी से नहीं, किसी और चीज़ से डरी हुई थी।

उस बच्चे से, जिसका हाथ गर्म था।

मैंने सूरज की तरफ़ देखा। सूरज ने मेरी तरफ़। और हम दोनों के बीच, बिना किसी शब्द के, एक पुराना सवाल लौट आया। दसवीं रात वाला। जब सब कुछ शुरू हुआ था।

मेरी जगह, हर रात, ऊपर कौन आ रहा है?

मैं उठा। बैसाखी के सहारे। अपने पत्थर वाले पैरों पर। हर क़दम के साथ वो ठक की आवाज़, जो अब मेरी अपनी धड़कन जैसी लगने लगी थी। और गाँव के कुएँ की तरफ़ गया।

सूरज मेरे पीछे आया। "विक्की, क्या हुआ?"

मैंने कुएँ में झाँका। पानी ऊपर तक भरा था। हरे धागों वाला पानी। लड़की का पानी।

और उसमें — मेरी बाईं आँख में — एक चेहरा था।

छोटू का।

पानी के नीचे। बहुत गहरे। कुएँ की तली में। उसकी आँखें खुली थीं। और वो ऊपर देख रहा था। मेरी तरफ़।

पर वो आँखें भूरी नहीं थीं। शरारती नहीं थीं। वो गर्म नहीं थीं।

वो पुरानी थीं। भूखी। दो सिक्कों वाली।

और गुड्डी — जो मेरे पीछे खड़ी थी, सूरज की उँगली पकड़े — उसकी मुट्ठी में लड़की वाला घुँघरू था। माँ की आवाज़ वाला। वो चुप था। वो हमेशा गुनगुनाता था, बजता नहीं था।

पर मेरी अपनी जेब में — जहाँ देवदत्त वाला घुँघरू था, जो भूख के पास आने पर बजता था —

वो बजा।

छन्न।

भाग 32 समाप्त।

अगले भाग में — "तैंतीसवीं सीढ़ी": छोटू का सच। तेरह रातों से वो विक्रम के साथ है। उसका गर्म हाथ। उसकी बातें। उसकी चिट्ठी। पर वो उस लड़की के पास क्यों गया है? और कुएँ के पानी में उसकी आँखें भूखी क्यों थीं? क्या छोटू बचाना चाहता है — या ले जाना? सत्रह साल पहले उसने अपनी मर्ज़ी से हाथ छोड़ा था। पर क्या वो सच में उसकी मर्ज़ी थी?

← पिछला भाग

भानपुरा की बावड़ी - चालीस सीढ़ियाँ · सभी भाग →

और कहानियाँ · More stories