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भाग 31 — इकतीसवीं सीढ़ी

Piyashi Atma · Real Experiences · 20 मिनट

Writer
Piyashi Atma
Story
भानपुरा की बावड़ी - चालीस सीढ़ियाँ
Chapter
31 of 31
Category
Real Experiences
Reading time
20 min
Words
3979
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

जब सूखे के बाद पानी लौटता है, तो कोई नहीं पूछता कि वो कहाँ से आया।

लोग नाचते हैं। औरतें गाती हैं। बच्चे कुओं के किनारे झुककर अपनी परछाइयाँ देखते हैं, जो तीन बरस से नहीं दिखी थीं। बूढ़े हाथ जोड़कर आसमान की तरफ़ देखते हैं और भगवान का शुक्र मनाते हैं।

और कोई नहीं पूछता — ये पानी किसका था? ये किसके हिस्से से आया? किसने इसे छोड़ा, ताकि ये यहाँ पहुँचे?

उस इकतीसवें दिन, भानपुरा के हर कुएँ में पानी था। मीठा। ठंडा। साफ़।

और मैं जानता था कि वो कहाँ से आया था।

वो भूख का पानी था। जो वो पीछे छोड़ रही थी। अपनी बावड़ी से निकालकर। किसी पेड़ की तरह, जो सूखे में अपनी सारी पत्तियाँ गिरा देता है, ताकि उसकी जड़ें ज़िंदा रहें।

वो हार नहीं रही थी।

वो सिमट रही थी।

सुबह सूरज की माँ की चिता जली।

नदी नहीं थी — रोती नदी तीन कोस दूर सूखी पड़ी थी — तो श्मशान गाँव के पूरब में था, एक पुराने बरगद के नीचे। वहीं, जहाँ रघु चाचा ने अपने पिता को जलाया था, तीस दिन पहले।

हरिहर शास्त्री ने अंतिम संस्कार करवाया। चौंतीस बरस में पहली बार। उनकी आवाज़ भारी थी, पुरानी, और मंत्रों के बीच-बीच में रुक जाती थी — जैसे वो किसी और को याद कर रहे हों, जिसके लिए उन्हें ये मंत्र कभी पढ़ने का मौक़ा नहीं मिला था।

सूरज ने मुखाग्नि दी।

वो बैसाखी के सहारे खड़ा था। उसकी टाँगें अब लगभग पूरी तरह चमड़ी की थीं — सिर्फ़ पिंडलियों के नीचे पत्थर के कुछ धब्बे बचे थे। उसके हाथ में जलती लकड़ी काँप रही थी।

गुड्डी उसके बगल में थी। मामी की उँगली पकड़े। दूसरे हाथ में घुँघरू। और उसके बगल में — मेरी बाईं आँख में — वो छोटी परछाईं। गुड्डी का हाथ पकड़े। चिता की तरफ़ देखती हुई।

लपटें उठीं।

और तब मैंने कुछ देखा। अपनी बाईं आँख से।

चिता के धुएँ में — जो ऊपर उठ रहा था, सुबह के आसमान की तरफ़ — कुछ नहीं था। कोई धागा नहीं। कोई बाल नहीं। कोई हरा पानी नहीं।

बस धुआँ। सफ़ेद। हल्का। ऊपर जाता हुआ।

सत्रह बरस में पहली बार, सूरज की माँ पूरी तरह अपनी थीं।

गुड्डी ने लपटों की तरफ़ देखा। फिर अपने बगल में बैठी उस परछाईं की तरफ़। और धीरे से, सिर्फ़ उसके लिए, वो नया गीत गुनगुनाने लगी। माँ खड़ी है दरवाज़े पे...

और मैंने देखा — परछाईं ने अपना सिर गुड्डी के कंधे पर टिका दिया।

"पानी!" किसी ने चिल्लाया।

दोपहर थी। गाँव के बीच वाला कुआँ। पुराना। पत्थर की मुंडेर वाला। जिसमें तीन बरस से सिर्फ़ सूखी पत्तियाँ और टूटी बाल्टियाँ थीं।

अब उसमें पानी था। ऊपर तक। मुंडेर से बस दो हाथ नीचे।

औरतें इकट्ठी हो गई थीं। घड़े लेकर। बाल्टियाँ लेकर। कोई रो रहा था। कोई हँस रहा था। किसी ने एक पुराना गीत शुरू कर दिया — बरसात वाला, सावन वाला — और बाक़ी औरतें उसमें शामिल हो गईं।

बच्चे कुएँ के किनारे झुके हुए थे। अपनी परछाइयाँ देखते हुए। पानी में। चिल्लाते हुए — "देखो! देखो, मैं दिख रहा हूँ!"

मैंने उन्हें देखा। अपनी बाईं आँख से।

और मैंने ग़ौर किया — उनके पैरों के धागे। वो पतले, काले धागे, जो तेरहवें दिन से उनके टख़नों पर बँधे थे। जो भूख ने अगले सत्रह बरस की फ़सल के लिए बोए थे।

वो ढीले थे।

पहले की तरह तने हुए नहीं। बावड़ी की तरफ़ खिंचे हुए नहीं। बस ढीले। लटके हुए। कुछ के तो सिरे पर से टूट चुके थे, और हवा में बेतरतीब लहरा रहे थे।

"वो गीत भूल गए हैं," सूरज ने कहा। वो मेरे बगल में आकर खड़ा हो गया था। चिता से लौटकर। उसकी सफ़ेद आँख पर अब कोई कपड़ा नहीं था। "मैंने सुबह से किसी को सीढ़ी-सीढ़ी खेलते नहीं देखा। पिंकी से पूछा — उसे याद ही नहीं कि वो कैसे खेला जाता था।"

"जैसे किसी ने उसे उनकी याद से निकाल लिया हो।"

"जैसे किसी को उसकी ज़रूरत न रही हो।" सूरज ने अपनी बाईं आँख से बच्चों को देखा। "वो धागे खींच रही है, विक्की। वापस। अपनी तरफ़। सबके। भविष्य वालों के भी।"

दोपहर ढले मैं मामी के आँगन में गया।

गुड्डी वहाँ थी। कुएँ से भरकर लाए गए एक घड़े के पास बैठी। घुँघरू उसकी मुट्ठी में। और उसके बगल में — मेरी बाईं आँख में — वो छोटी परछाईं।

"दीदी को पानी दिखा रही थी," गुड्डी ने कहा। "नया वाला। कुएँ का।"

"फिर?"

गुड्डी ने अपनी भौंहें सिकोड़ीं। "वो डर गई।"

मैंने परछाईं को देखा। वो घड़े से दूर सरक गई थी। गुड्डी के पीछे छुपी हुई। उसका सिर घड़े की तरफ़ मुड़ा हुआ, पर उसका शरीर पीछे की तरफ़ झुका हुआ। जैसे कोई बच्चा किसी ऐसी चीज़ को देखे जिससे उसे कभी चोट लगी हो।

"उसने कहा," गुड्डी ने धीरे से बताया, "कि ये पानी उसका है। कि उसने इसे पहचाना। कि ये वही पानी है जो उसके अंदर था। दो सौ बरस।" उसने घड़े में झाँका। "और कि अब ये बाहर है, और वो अंदर है।"

मामी रसोई के दरवाज़े पर खड़ी थीं। उन्होंने घड़े की तरफ़ देखा। फिर उस जगह की तरफ़, जहाँ उन्हें कुछ नहीं दिखता था पर जहाँ उन्हें पता था कि वो परछाईं है।

"जा, बेटा," उन्होंने गुड्डी से कहा। "घड़ा अंदर रख दे। और उसे बता दे — इस घर में कोई उसे वापस अंदर नहीं भेजेगा।"

गुड्डी ने घड़ा उठाया — मुश्किल से, अपनी छोटी बाँहों से — और अंदर ले गई।

परछाईं उसके पीछे-पीछे गई। घड़े से दूर रहते हुए। पर गुड्डी के पास।

"साँप जब केंचुली छोड़ता है," रामप्यारी अम्मा ने कहा, "तो वो कमज़ोर नहीं होता।"

शाम थी। उनका आँगन। उनके मटके में — जो तीस दिन से पीतल की थाली से ढका रहता था, और जिसके पानी को वो बार-बार उबालती थीं — आज ताज़ा पानी था। गाँव के कुएँ का। सरपंच ने ख़ुद भरकर भेजा था।

अम्मा ने उसे पिया नहीं था।

"वो नया होता है," उन्होंने कहा। "चमकीला। तेज़। और थोड़ी देर के लिए अंधा। जब तक नई चमड़ी सख़्त न हो जाए।"

"तो भूख अभी अंधी है?"

"भूख अभी सिमट रही है। सब कुछ अपने अंदर खींच रही है। अपने पिंजरे की तरफ़।" अम्मा ने अपनी सफ़ेद आँखें बावड़ी की दिशा में उठाईं। "मैं देख रही हूँ, बच्चा। पूरा गाँव। पानी की दुनिया में। कल तक हर घर से सीढ़ियाँ नीचे जाती थीं। हर इंसान के पैर में धागा था। आज..." उन्होंने अपना सिर हिलाया। "आज आधे धागे ग़ायब हैं। और जो बचे हैं, वो सब बावड़ी की तरफ़ सिकुड़ रहे हैं। जैसे कोई जाल समेट रहा हो।"

"क्यों?"

"क्योंकि उसने सुना है, बच्चा।" अम्मा ने अपनी पायलें गोद में रखीं। "उस लड़की का गीत। गुड्डी वाला। माँ खड़ी है दरवाज़े पे। पूरे उल्टे गाँव ने कल रात गाया। और उस लड़की ने गुनगुनाया। भूख के अंदर से।"

उन्होंने मेरी तरफ़ मुँह किया।

"उसे डर है कि लड़की जा रही है। और जब कोई चीज़ डरती है कि उसका सबसे क़ीमती हिस्सा जा रहा है — तो वो बाक़ी सब छोड़ देती है। ताकि उसे थामे रखे।"

मास्टर जी पोथी लेकर आए।

"सूची बदल रही है," उन्होंने कहा। बिना बैठे। "पिछले एक घंटे में तीन बार।"

उन्होंने पोथी खोली। आख़िरी पन्ने के पीछे। वो हरी सूची।

और मैंने देखा — कई नाम फीके पड़ रहे थे। पुराने ज़माने वाले। अठारह सौ वाले। जैसे स्याही धीरे-धीरे काग़ज़ में वापस घुल रही हो।

"ये वो हैं," मास्टर जी ने कहा, "जो उल्टे गाँव में हैं। ज़ंजीर से छूटे हुए। उनके नाम फीके पड़ रहे हैं।"

"वो आज़ाद हो रहे हैं?"

"या ग़ायब हो रहे हैं।" मास्टर जी ने चश्मा ठीक किया। "मैं नहीं जानता कौन-सा। पोथी दोनों में फ़र्क़ नहीं करती।"

और नीचे — सबसे नीचे — मेरा नाम।

२०२६ — विक्रम मिश्र, गंगाधर का रक्त

और उसके नीचे की पंक्ति — (बबलू चुकाएगा) — अब नहीं थी। उसकी जगह एक हल्का-सा धब्बा था। जैसे किसी ने उसे पानी से मिटाया हो।

पर मेरा नाम पहले से ज़्यादा गहरा था। स्याही ताज़ा। गीली। चमकती हुई।

जैसे किसी ने उसे अभी-अभी, बहुत ज़ोर से, दोबारा लिखा हो।

रात को, बावड़ी जाने से ठीक पहले, मैं अपने घर के आँगन से निकल रहा था, जब मैं रुका।

चाची तुलसी के पास बैठी थीं। अकेली। लालटेन की मद्धम रोशनी में। गाँव सो चुका था। उन्होंने नहाया था, और अपने बाल गीले छोड़े थे। उनकी हथेलियों की मेहंदी अब फीकी पड़ गई थी।

और वो बावड़ी की दिशा में मुँह करके, आँखें बंद करके, बहुत धीमे कुछ कह रही थीं।

मैं नहीं रुकना चाहता था। पर मैंने सुन लिया।

"रघुनाथ," उन्होंने फुसफुसाया। "रघुनाथ। रघुनाथ।"

तीन बार। जैसे कोई माला फेरता है।

फिर उन्होंने आँखें खोलीं। और मुझे देखा। दरवाज़े पर खड़े हुए।

वो शरमाईं नहीं। बस मुस्कुराईं। एक छोटी-सी, थकी हुई मुस्कान।

"उन्होंने कहा था, जब कोई न देखे," उन्होंने कहा। "तू देख रहा था। कोई बात नहीं। तू तो घर का है।"

दो बजकर सैंतालीस।

मैं बावड़ी की मुंडेर पर था। और नीचे देखा।

और मैं जम गया।

पानी नहीं था।

पहली सीढ़ी सूखी। दूसरी सूखी। तीसरी, चौथी, पाँचवीं — सब सूखी। सफ़ेद। धूल भरी। चाँदनी में चमकती हुई। उनकी काई सूखकर भूरी हो गई थी, और पत्थरों से पपड़ी की तरह उतर रही थी।

मैंने गिनना चाहा कि पानी कहाँ से शुरू होता है। और रुक गया।

मैं उतरा। बिना गिने। सूखी सीढ़ियों पर।

और चाँदनी में, उन सूखी सीढ़ियों पर — जहाँ तीस रातों से काई और पानी था — मुझे कुछ दिखा जो पहले कभी नहीं दिखा था।

लकीरें।

पत्थर में खुरची हुई। छोटी-छोटी। चार खड़ी, एक आड़ी। चार खड़ी, एक आड़ी। हर सीढ़ी के किनारे पर। जैसे दादाजी के कमरे की दीवार पर थीं।

सैकड़ों। हज़ारों। अलग-अलग गहराई की। कुछ पुरानी, लगभग मिट चुकी। कुछ ताज़ा। नाख़ूनों से खुरची हुई। जैसे कोई अपनी हर रात को गिनकर इस पत्थर पर छोड़ गया हो।

हर गिनने वाले के निशान। पौने तीन सौ बरस के। काई ने उन्हें छुपा रखा था। अब पानी उतरा, तो वो दिखे।

और पहली सीढ़ी पर, सबसे किनारे पर, एक नई लकीर थी। सबसे ताज़ा।

एक अकेली खड़ी लकीर।

मेरे अपने बाएँ पैर के अँगूठे के नाख़ून से खुरची हुई। पहली सुबह। जब मैं डर से कुछ भी पकड़ने की कोशिश कर रहा था, और मुझे ये पता भी नहीं चला था। मेरे नंगे पैर उस सूखे पत्थर पर पड़े — और ये अजीब था, इतना अजीब कि मेरा पूरा शरीर काँप गया। तीस रातों से ये सीढ़ियाँ मेरे लिए पानी थीं। ठंड थीं। खिंचाव थीं।

अब वो बस पत्थर थीं।

दसवीं सीढ़ी पर पानी मिला।

पहले मेरे टख़नों तक। फिर घुटनों तक। पर ये पानी अलग था। पहले वो ठहरा हुआ होता था, भारी, नीचे की तरफ़ खींचता हुआ। अब वो बह रहा था।

नीचे की तरफ़।

तेज़ी से। जैसे किसी बड़े बर्तन में छेद हो गया हो, और उसका सारा पानी एक ही तरफ़ बह रहा हो।

छोटू दसवीं पर था। पर वो डूबा हुआ नहीं था। पानी उसकी कमर तक था, और वो उसमें खड़ा था, हाथ फैलाए, जैसे संतुलन बनाने की कोशिश कर रहा हो।

"भैया," उसने कहा। उसकी आवाज़ में डर था। "वो सब खींच रही है। सब कुछ। मुझे भी।"

मैंने उसका हाथ पकड़ा। उसका गर्म हाथ।

और नीचे की तरफ़ बहते पानी में, उसके पैर फिसले। मैंने उसे थामा।

"मैं दसवीं से ऊपर नहीं जा सकता," उसने कहा। "और अगर यहाँ रहा, तो ये पानी मुझे नीचे ले जाएगा। उसके पास।"

"तो मेरे साथ चल। नीचे। उल्टे गाँव तक। सरला दीदी वहाँ हैं।"

छोटू ने मेरी तरफ़ देखा। फिर सिर हिलाया।

इक्कीसवीं सीढ़ी पर पानी का आईना था।

पर वो अब आईना नहीं था। वो एक भँवर था।

घूमता हुआ। तेज़ी से। नीचे की तरफ़। जैसे किसी नाली में पानी घूमता है, बहने से पहले। और उस भँवर के बीच से — उल्टे गाँव की हरी-पीली रोशनियाँ, धुँधली, टूटती हुई।

हम उसके पार पलटे।

और उल्टा गाँव बदल चुका था।

पानी की छत नीचे आ गई थी।

पहले वो बहुत ऊपर थी। पूरे गाँव के ऊपर फैली हुई। उसकी जड़ें नीचे लटकती थीं, पेड़ों से जुड़ती थीं।

अब वो पास थी। इतनी पास कि मैं अपना हाथ ऊपर उठाकर उसे छू सकता था। और वो नीचे आ रही थी। धीरे-धीरे। पर लगातार।

और उल्टे घर — जो उस छत से लटकते थे, जिनकी नींव ऊपर थी — वो उसमें धँस रहे थे। पानी में। नीचे की तरफ़ नहीं — ऊपर की तरफ़, उस छत में, जैसे छत उन्हें निगल रही हो। कुछ घरों की छतें अब भी ज़मीन पर थीं, पर उनकी दीवारें आधी पानी में डूबी थीं।

और लोग।

उल्टे गाँव के लोग गलियों में थे। घबराए हुए। अपने घरों से निकलकर। कुछ अपने बच्चों को उठाए। कुछ अपना सामान। वो मोटी औरत — पूरियों वाली — अपनी ख़ाली थाली लिए खड़ी थी, और अपने घर को देख रही थी, जो आधा पानी में धँसा था। उसके अंदर, उल्टी कुर्सी पर, एक लड़का बैठा था। उसका बेटा। सवा सौ बरस से।

"वो सब खींच रही है," सरला ने कहा। वो पनघट पर थीं। उनके चेहरे पर डर था। "पूरा गाँव। अपनी तरफ़। अपने पिंजरे की तरफ़।"

"क्यों?"

"क्योंकि वो डर गई है।" गंगाधर का पोता आगे आया। भोला का हाथ पकड़े। "उसने कल रात लड़की को गुनगुनाते सुना। भूख के अंदर से। और उसे समझ आ गया कि लड़की जा सकती है।" उसकी मिश्रों वाली आँखें पानी की छत पर थीं। "तो वो सब कुछ समेट रही है। हर प्राण। हर धागा। हर घर। अपने चारों ओर। एक दीवार की तरह। ताकि लड़की को निकलने के लिए उस सबसे होकर जाना पड़े।"

पनघट के कुएँ का खंभा — जिसमें पानी हमेशा ऊपर की तरफ़ बहता था, बावड़ी की तरफ़ — उल्टा बह रहा था।

नीचे की तरफ़। ज़मीन में। तेज़ी से।

और उसकी जड़ में वो पत्थर — गोल, जिस पर घड़ा और लहरें बनी थीं — हिल रहा था। जैसे नीचे से कोई उसे धकेल रहा हो।

"सुरंग बंद हो रही है," सरला ने फुसफुसाया। "माँ वाली। जिससे पुकार आती है।"

"अगर वो बंद हुई—"

"तो चालीसवीं रात तुम नीचे नहीं जा पाओगे," भोला ने कहा। उसकी पतली, पुरानी आवाज़ में। "उस तक नहीं। उस शिला तक नहीं।"

मैंने अपनी बाईं आँख से उस खंभे में देखा। उसके अंदर। नीचे की तरफ़। वो सुरंग। उसकी नरम, साँस लेती दीवारें।

अब वो साँस नहीं ले रही थीं।

वो सिकुड़ रही थीं। धीरे-धीरे। जैसे कोई मुट्ठी बंद हो रही हो।

और तब पनघट के चौक में एक आदमी आया।

पहले मुझे वो दिखा नहीं। लोग भाग रहे थे, चिल्ला रहे थे, अपने घरों को देख रहे थे। और फिर अचानक सब रुक गए।

जैसे किसी ने एक पल में पूरे गाँव की आवाज़ बंद कर दी हो।

और भीड़ बीच से फटी।

वो बूढ़ा था। लंबा। दुबला। एक पुरानी, हाथ से बुनी धोती। कंधे पर जनेऊ — मोटा, पीला, नया जैसा। माथे पर चंदन का त्रिपुंड। सिर पर एक लंबी, सफ़ेद चोटी। और उसके हाथ में एक पोथी। लाल कपड़े में लिपटी हुई।

उसकी आँखें — गहरी। थोड़ी झुकी हुई।

मिश्रों की आँखें।

मेरे बगल में गंगाधर का पोता जम गया। उसका हाथ भोला के हाथ में काँपने लगा।

"पितामह," उसने फुसफुसाया।

वो आदमी पनघट की तरफ़ आया। धीरे-धीरे। गरिमा से। जैसे कोई राजपुरोहित दरबार में आता है।

और मेरे सामने रुका।

"वत्स," उसने कहा।

उसकी आवाज़ पुरानी थी। बहुत पुरानी। पर गर्म। किसी दादा जैसी।

"गंगाधर के वंश का आख़िरी दीपक।" उसने मेरे चेहरे को ऐसे देखा जैसे कोई अपनी खोई हुई चीज़ को देखता है। "कितने बरस हो गए, जब मेरे रक्त का कोई इतनी दूर तक आया था।"

मैंने अपनी बाईं आँख से उसे देखा।

और उसके अंदर बाल थे।

हर जगह। उसकी चमड़ी के नीचे। उसकी नसों में। उसकी आँखों के पीछे। उसकी पोथी के पन्नों में। जैसे कोई कठपुतली, जिसके अंदर से हज़ारों डोरियाँ निकलती हों, और सब नीचे की तरफ़ जाती हों।

भूख। गंगाधर का चेहरा पहनकर।

"तुम वो नहीं हो," मैंने कहा।

उस बूढ़े आदमी ने मुस्कुराया। एक दुखी, समझदार मुस्कान।

"हाँ भी, और नहीं भी, वत्स।" उसने अपनी पोथी खोली। "मैंने इसे बनाया था। ये पिंजरा। अपने हाथों से। मैंने उसके केश गूँथे थे। मैंने उसे गिनना सिखाया था।" उसने पन्ने पलटे। "और जब मैं मरा — बहुत बूढ़ा होकर, अपने पोते को बचाकर, अपने पाप को छिपाकर — तो मैं कहीं और नहीं गया। मैं यहाँ आया। अपने बनाए पिंजरे में।"

उसने अपनी आँखें उठाईं। मेरी तरफ़।

"और उसने मुझे खा लिया।"

"गुरु," मैंने फुसफुसाया। "आपकी चिट्ठी में। आपके गुरु ने आपको बताया था कि ये बंधन का अनुष्ठान है।"

गंगाधर — या जो भी वो था — ने सिर हिलाया।

"मेरा कोई गुरु नहीं था, वत्स।" उसकी आवाज़ बहुत धीमी हो गई। "मैंने अपनी चिट्ठी में झूठ लिखा था। अपने वंशजों से। मुझमें साहस नहीं था सच लिखने का।"

"सच क्या है?"

"सच ये है कि सातवें बरस के सूखे में, एक रात, मैं अकेला उस गड्ढे पर गया था। जो तब बावड़ी नहीं बना था। बस सौ हाथ गहरा एक सूखा गड्ढा। और मैंने नीचे देखा।" उसकी आँखें कहीं दूर थीं। पौने तीन सौ बरस दूर। "और नीचे से एक आवाज़ आई। उसने मुझसे बात की। उसने मुझे बताया कि पानी कैसे आएगा। उसने मुझे बताया कि एक जीवित नींव चाहिए। एक भरोसा करने वाली देह।"

"भूख ने।"

"मैंने उसे गुरु कहा," गंगाधर ने फुसफुसाया। "अपनी चिट्ठी में। क्योंकि मैं ये नहीं लिख सकता था कि मैंने एक भूख की बात मानी थी।"

"तुम क्या चाहते हो?" मैंने पूछा।

गंगाधर ने अपनी पोथी बंद की।

"वही, जो हमेशा से चाहता था।" उसकी आवाज़ में अब कुछ बदला। वो गर्माहट ग़ायब होने लगी। उसके नीचे, उसके साथ, एक दूसरी आवाज़ — गहरी, धरती के खिसकने जैसी — उभरने लगी। "कि गाँव बचे। कि पानी आए। कि मेरे वंश का आख़िरी दीपक बुझने से बचे।"

उसने अपना हाथ मेरी तरफ़ बढ़ाया। उसकी उँगलियाँ लंबी थीं। पतली। जोड़ों पर अजीब तरह से मुड़ी हुई। वैसी ही, जैसी दूसरे दिन डायरी के पन्ने पर हाथ के छापे में थीं।

"चालीसवीं रात, वत्स, घुँघरू मत बजाना। उस बच्ची से कह — गुड्डी से — कि वो उसे पानी में डाल दे। एक बार। बस इतना।"

"और फिर?"

"और फिर सब ठीक हो जाएगा। कुएँ भरे रहेंगे। तुम्हारे गाँव में कभी सूखा नहीं पड़ेगा। कभी कोई बच्चा नहीं गिनेगा।" उसकी आँखें चमकीं। "मैं वादा करता हूँ। अपने रक्त की सौगंध।"

"और लड़की?"

गंगाधर का चेहरा एक पल के लिए अटका।

"वो वहीं रहेगी," उसने कहा। "जहाँ वो है। जहाँ मैंने उसे रखा था।"

"पितामह।"

गंगाधर का पोता आगे आया। भोला का हाथ छोड़े बिना। वो उस बूढ़े आदमी के सामने खड़ा हो गया। बारह बरस का। उसकी धोती, उसका जनेऊ, उसकी चोटी — उसी बूढ़े आदमी जैसी। बस छोटी।

"पितामह," उसने फिर कहा। "आपने मुझे बचाया था। दो सौ चौंसठ बरस पहले। भोला को आगे करके।"

गंगाधर ने उसे देखा। और उसके चेहरे पर कुछ आया। एक दर्द। असली।

"मैंने तुझे बचाया था, वत्स," उसने फुसफुसाया। अपनी आवाज़ में। सिर्फ़ अपनी।

"और मैं दो सौ चौंसठ बरस से भोला के साथ हूँ।" पोते ने अपना और भोला का जुड़ा हुआ हाथ उठाया। "और हमने एक-दूसरे को माफ़ कर दिया है। पर आपने कभी किसी से माफ़ी नहीं माँगी।"

गंगाधर का चेहरा काँपा।

"आप अब भी सौदा कर रहे हैं, पितामह। भूख की तरफ़ से। आपके अपने रक्त से।" पोते की आवाज़ टूट गई। "मैं आपको पहचानता हूँ। आप वो हैं, जो डर गए थे। और आप वो भी हैं, जो भूख बन गए।"

उसने अपनी मिश्रों वाली आँखें उस बूढ़े आदमी की आँखों में गड़ा दीं।

"पर मैं आपको पूरा नहीं पहचानूँगा, पितामह। क्योंकि अगर मैंने पूरा पहचाना, तो आप मुझसे मेरी आँखें ले लेंगे। और मुझे उनकी ज़रूरत है। भोला को देखने के लिए।"

गंगाधर का चेहरा बदला।

वो गर्माहट पूरी तरह ग़ायब हो गई। उसकी जगह वो दूसरी आवाज़ आई। अकेली। भूख की।

"चालाक बच्चे।"

और उस बूढ़े आदमी का शरीर पिघलने लगा। धीरे-धीरे। मोम की तरह। उसकी धोती, उसका जनेऊ, उसकी चोटी — सब काले, गीले बालों में घुलता हुआ। ज़मीन पर गिरता हुआ। पनघट के कुएँ के खंभे की तरफ़ बहता हुआ।

पर एक पल के लिए — सिर्फ़ एक पल के लिए — उस पिघलते चेहरे में, बालों के बीच से, दो आँखें झाँकीं। पुरानी। मिश्रों वाली। आँसुओं से भरी।

असली गंगाधर। भूख के अंदर। पौने तीन सौ बरस से।

और उसके होंठ हिले। बहुत धीरे। मैंने पढ़ लिया।

"मुझे मत बचाना, वत्स। उसे बचाना।"

और फिर वो भी घुल गया।

मैं इकतीसवीं सीढ़ी पर गया। सीढ़ी के मुँह से नीचे। जहाँ मेरी सीढ़ी थी।

पर वो अब वहाँ नहीं थी जहाँ होनी चाहिए थी।

उल्टे गाँव की ज़मीन भी नीचे खिसक रही थी। सीढ़ी का मुँह, जो पहले पनघट के ठीक बगल में था, अब कुछ क़दम दूर था। और सीढ़ियाँ — बाईसवीं से आगे — पहले से ज़्यादा ढलान वाली थीं। जैसे कोई उन्हें नीचे की तरफ़ खींचकर लंबा कर रहा हो।

मैं इकतीसवीं पर पहुँचा। छोटू मेरे साथ था, मेरा हाथ पकड़े, और उसने एक बार भी पीछे मुड़कर नहीं देखा। और मेरे पैर जमे।

और वो भारी थे।

पहले भी जमते थे। पत्थर से चिपक जाते थे। पर आज वो भारी थे। जैसे मेरे पैरों में सीसा भर दिया गया हो।

मैंने नीचे देखा।

लालटेन की रोशनी में, मेरे पैर। नंगे। इकतीसवीं सीढ़ी पर।

मेरे पैरों की उँगलियाँ।

भूरी-हरी। खुरदुरी। पत्थर की।

मैं वहाँ पूरी रात खड़ा रहा।

छोटू मेरे बगल में था। उसने मेरे पैरों को देखा और कुछ नहीं कहा। बस मेरा हाथ पकड़े रहा।

सरला ने गीत गाया। पुराना वाला नहीं — गुड्डी वाला नया। माँ खड़ी है दरवाज़े पे। और उनके साथ भोला और गंगाधर का पोता। और उल्टे गाँव के कुछ और लोग, जो अपने डूबते घरों के बाहर बैठे थे।

और पानी की छत नीचे आती रही। धीरे-धीरे।

और सुबह से ठीक पहले, जब बावड़ी ने मुझे छोड़ा, और मैं ऊपर की तरफ़ पलटा — मैंने नीचे देखा, एक आख़िरी बार, इकतीसवीं सीढ़ी पर।

और मेरी सीढ़ी पर, जहाँ मैं खड़ा था, दो पैरों के निशान थे।

गीले नहीं। पत्थर में खुदे हुए। गहरे। जैसे कोई वहाँ इतने भारी पैरों से खड़ा रहा हो कि पत्थर दब गया हो।

सुबह मैं मुंडेर पर आया।

और खड़ा नहीं हो पाया।

मेरे पैर। मेरी उँगलियाँ। पत्थर की। भूरी-हरी। खुरदुरी। और पत्थर मेरे पंजों पर चढ़ रहा था। तलवों तक। एड़ियों की तरफ़।

अम्मा ने अपने हाथों से मेरे पैरों को टटोला। उनकी उँगलियाँ रुकीं।

"शुरू हो गया," उन्होंने फुसफुसाया।

"सूरज के साथ भी हुआ था," मैंने कहा। "पहले उँगलियाँ। फिर हाथ। फिर..."

"सूरज के साथ बाईसवीं पर शुरू हुआ था। तेरे साथ इकतीसवीं पर।" अम्मा ने मेरी पत्थर वाली उँगली को छुआ। "तू बहुत देर तक लड़ा, बच्चा। पर अब चालीस पास है। और वो तुझे तैयार कर रही है।"

"तैयार?"

"चालीसवीं बनने के लिए।" अम्मा की आवाज़ काँपी। "सीढ़ी को वक़्त लगता है, बनने में। नौ रातें। उँगलियों से सिर तक।"

सूरज मुंडेर के पास आया। बैसाखी के सहारे। उसने मेरे पैरों को देखा। और उसका चेहरा पीला पड़ गया।

वो मेरे पास बैठ गया। और अपना हाथ मेरे पत्थर वाले पंजे पर रखा। बिना कुछ कहे।

उसकी उँगलियाँ जानती थीं। वो खुरदुरापन। वो ठंडक। वो धीरे-धीरे ऊपर चढ़ता भार। उसने उन्नीस रातें इसे झेला था।

"नौ रातें," उसने आख़िर में कहा। "मेरे पास भी नौ ही थीं, जब ये मेरे चेहरे तक पहुँचा था।" उसकी आवाज़ टूट गई। "और मैं हर रात सोचता था कि कोई मेरी जगह ले ले। कोई भी।"

"रघु चाचा ने ली।"

"हाँ।" उसने मेरी तरफ़ देखा। "और तेरी जगह कोई नहीं लेगा, विक्की। मैं जानता हूँ। तू किसी को लेने नहीं देगा।"

मैंने कुछ नहीं कहा।

"इसीलिए," सूरज ने फुसफुसाया, "मैं तुझसे डरता हूँ।"

मैंने अपने पैरों को देखा। सुबह की धूप में।

और मैंने अपनी परछाईं को देखा। ज़मीन पर। लंबी।

उसके पैर — परछाईं के पैर — ठोस थे। काले। भारी।

और हल्के-हल्के, बहुत धीरे, नीचे की तरफ़ झुक रहे थे। ज़मीन में। जैसे कोई जड़ें निकाल रहा हो।

भाग 31 समाप्त।

अगले भाग में — "बत्तीसवीं सीढ़ी": पत्थर विक्रम के टख़नों तक चढ़ चुका है। और उस रात, पहली बार, पूरे गाँव से एक आवाज़ उठती है। हर घर से। हर खिड़की से। रुके हुए वक़्त में। सैकड़ों आवाज़ें। एक साथ। गिनती करती हुईं। बत्तीस। बत्तीस। बत्तीस। पूरा भानपुरा उसके लिए गिन रहा है...

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