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भाग 30 — तीसवीं सीढ़ी

Piyashi Atma · Real Experiences · 20 मिनट

Writer
Piyashi Atma
Story
भानपुरा की बावड़ी - चालीस सीढ़ियाँ
Chapter
30 of 31
Category
Real Experiences
Reading time
20 min
Words
3983
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

धोखा हमेशा अपनों से मिलता है।

अजनबी धोखा नहीं देते। वो बस चोट पहुँचाते हैं। लूटते हैं। झूठ बोलते हैं। पर धोखा — असली धोखा, जो सीने के अंदर तक जाता है — उसके लिए भरोसा चाहिए। और भरोसा सिर्फ़ अपनों पर होता है।

इसीलिए धोखा सबसे ज़्यादा दर्द देता है। क्योंकि वो आपके अपने हाथ से दी गई चाबी से आपका दरवाज़ा खोलता है।

पर उस तीसवीं रात मुझे एक और बात समझ आई।

कि हर धोखा देने वाले के पीछे भी कोई होता है, जिसे वो बचाना चाहता है। और कभी-कभी, सबसे बड़ा धोखा वो नहीं होता जो कोई आपको देता है।

वो होता है, जो कोई अपने आप को देता है — ये मानकर कि वो किसी और के लिए कर रहा है।

मैंने उस शाम सूरज को रोका नहीं।

मैं पीपल के पीछे खड़ा रहा। और उसे मुंडेर से उठते देखा। बैसाखी के सहारे। चाँदनी में। और वापस गाँव की तरफ़ जाते देखा। धीरे-धीरे। सिर झुकाए।

हाँ, सूरज बेटा।

वो आवाज़ मेरे कानों में गूँज रही थी।

मैं उसके पीछे जा सकता था। उसे पकड़ सकता था। उससे पूछ सकता था — तूने क्या कहा? उसने तुझसे क्या माँगा?

पर मैंने नहीं किया।

क्योंकि मुझे पता था वो क्या कहेगा। मैं बारह बरस का था। या मेरी अम्मा मर रही हैं। या बस चुप रहेगा, अपनी एक अच्छी आँख से मुझे देखता हुआ, और उसमें वही होगा जो सत्रह साल पहले एक कुएँ के किनारे था।

और मैं उसे क्या कहता? कि उसकी माँ को मरने दे? कि एक लड़की, जिसे वो जानता भी नहीं, उसकी माँ से ज़्यादा ज़रूरी है?

मैंने सोचा — मैं सुबह बात करूँगा। दिन में। धूप में। जब वो नहीं सुन सकती।

वो मेरी ग़लती थी।

सुबह बहुत दूर थी।

घुँघरू चाची के पास था।

नदी से लौटने के बाद उन्होंने उसे अपनी हथेली से नहीं छोड़ा था। पूरे दिन। उसे एक लाल कपड़े में लपेटकर, मौली से बाँधकर, अपनी साड़ी के पल्लू में गाँठ लगाकर रखा था।

"जब तक चालीसवीं रात नहीं आती," उन्होंने कहा था, "ये मेरे पास रहेगा। मेरा कान अब बंद है। कोई मुझसे झूठ नहीं बोल सकता। कोई मेरे अंदर से नहीं सुन सकता।"

और मुझे उन पर भरोसा था।

सूरज को भी था।

शाम को सूरज चाची के घर आया।

मैं वहाँ नहीं था। मैं मामी के आँगन में था, गुड्डी के साथ, जो पीपल से लौटकर आई थी और उस परछाईं के बारे में बता रही थी। दीदी आज थोड़ा हँसी। जब मैंने नया गाना गाया।

मुझे ये सब बाद में पता चला। चाची से। रोते हुए।

सूरज दरवाज़े पर आया था। थका हुआ। उसकी अच्छी आँख लाल। उसने कहा था — चाची, अम्मा की तबीयत बहुत ख़राब है। खाँसी रुक नहीं रही। आप आकर देख लेंगी? आपके हाथ में जादू है।

चाची तुरंत उठीं। अपना पल्लू सँभाला। घुँघरू वाली गाँठ को छुआ।

और सूरज के साथ चल दीं।

रास्ते में, गली के मोड़ पर, सूरज लड़खड़ाया। उसकी बैसाखी फिसली। वो गिरा। चाची उसे उठाने झुकीं।

और जब वो उठा, तो उसने चाची के कंधे का सहारा लिया। उनके पल्लू के पास। और एक पल के लिए उसका हाथ उस गाँठ पर रुका।

चाची को कुछ महसूस नहीं हुआ। उस पल।

सूरज के घर पहुँचकर उन्होंने उसकी माँ को देखा। जो सच में खाँस रही थीं। हरा पानी। उन्होंने उनकी छाती पर गरम तेल मला। उनके लिए काढ़ा बनाया। एक घंटा वहाँ रहीं।

घर लौटकर, जब उन्होंने पल्लू की गाँठ खोली —

उसमें एक पत्थर था। छोटा। गोल। लाल कपड़े में लिपटा हुआ।

घुँघरू नहीं।

चाची ने उस पत्थर को बहुत देर तक देखा। उनकी हथेली पर। चिकना। भूरा-हरा। बावड़ी की किसी सीढ़ी का एक टूटा हुआ टुकड़ा।

"उसने मुझे एक पत्थर दिया," उन्होंने बाद में कहा। "जैसे मेरे पति को। जैसे चालीसवीं को।" उनकी आवाज़ में कोई ग़ुस्सा नहीं था। बस एक थका हुआ समझ। "सूरज ने सोचा भी नहीं होगा कि उसने क्या चुना। उसने बस... जो हाथ में आया, रख दिया। जैसे बारह बरस की उम्र में, जो हाथ में आया, धकेल दिया।"

"उसने अपनी माँ की खाँसी का इस्तेमाल किया," चाची ने फुसफुसाया। अम्मा के आँगन में। रात के साढ़े नौ बजे। उनका चेहरा आँसुओं से भीगा था। "अपनी बीमार माँ का। मुझे बुलाने के लिए।"

"वो झूठ नहीं था," अम्मा ने धीरे से कहा। "उसकी माँ सच में खाँस रही है। मैं यहाँ से सुन सकती हूँ। उसका धागा... उसका धागा आज बहुत तेज़ धड़क रहा है। जैसे कोई उसे खींच रहा हो।"

"भूख," मैंने कहा।

"भूख सूरज को दिखा रही है कि उसके पास कितना कम वक़्त है।" अम्मा ने अपनी पायलें कसकर पकड़ीं। "जैसे सत्रह बरस पहले दिखाया था। कुएँ के पानी में।"

मैं उठ खड़ा हुआ।

"कहाँ जा रहा है?"

"सूरज के पास।"

"वो वहाँ नहीं है," अम्मा ने कहा। "मैंने उसका धागा देखा। वो गाँव से बाहर जा रहा है। पीपल की तरफ़।"

और फिर उनका चेहरा पीला पड़ गया।

"और वो अकेला नहीं है।"

मैं भागा।

पुजारी के घर की तरफ़ पहले। क्योंकि मुझे एक डर था। एक ऐसा डर, जिसके बारे में मैं सोचना भी नहीं चाहता था।

हरिहर शास्त्री आँगन में बैठे थे। शंकर की ख़ाली चारपाई के पास। उनका चेहरा उलझा हुआ।

"गुड्डी?" मैंने हाँफते हुए पूछा।

"उसका बाप ले गया," पुजारी ने कहा। "आधा घंटा पहले। कहा कि रात को वो उसे अपने पास सुलाना चाहता है। आख़िरी बार। अपनी माँ की तबीयत की वजह से।" उन्होंने अपनी दाढ़ी पर हाथ फेरा। "मैं उसे कैसे रोकता, बेटा? वो उसका बाप है।"

मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई।

"और वो परछाईं?"

पुजारी ने मेरी तरफ़ देखा। "कौन-सी परछाईं?"

मैंने अपनी बाईं आँख से आँगन में देखा। चारपाई के पास। दरवाज़े के पास। गली में।

पीपल के नीचे जो छोटी-सी परछाईं दिन भर गुड्डी के साथ बैठी थी — जिसका हाथ गुड्डी पकड़े रहती थी — वो वहाँ नहीं थी।

वो गुड्डी के साथ गई थी।

क्योंकि गुड्डी जहाँ जाती, वो जाती।

और गुड्डी अपने पापा के साथ गई थी।

"भूख को दो चीज़ें चाहिए थीं," मैंने कहा। दौड़ते हुए। पीपल वाली सड़क पर। अम्मा और चाची मेरे पीछे, जितनी तेज़ी से वो आ सकती थीं।

"घुँघरू," अम्मा ने कहा। हाँफते हुए। "और?"

"वो लड़की।" मेरी आवाज़ काँप रही थी। "उसकी परछाईं। वो बाहर आ गई है। दो सौ अस्सी बरस में पहली बार। और जितना वो बाहर रहेगी, उतना वो भूख से अलग होगी। उतना पिंजरा कमज़ोर होगा।" मैंने पीपल की तरफ़ देखा। चाँदनी में। उसकी घंटियाँ बज रही थीं। बेतहाशा। "भूख उसे वापस चाहती है। अंदर। और वो ख़ुद उसे पकड़ नहीं सकती — क्योंकि वो गुड्डी का हाथ पकड़े है। और गुड्डी पर उसके बाल नहीं टिकते।"

"तो उसने सूरज से कहा..."

"कि गुड्डी को ले आए। और गुड्डी के साथ, वो लड़की अपने आप आएगी।"

अम्मा ने एक आवाज़ निकाली। चीख़ नहीं। सिसकी भी नहीं। कुछ बीच का।

"अपनी बेटी से," उन्होंने फुसफुसाया। "वो अपनी बेटी का इस्तेमाल कर रहा है। अपनी माँ के लिए।"

दो बजकर सैंतालीस अभी नहीं हुआ था। पर पीपल के पास हवा ठंडी थी। बहुत ठंडी।

और मुंडेर पर सूरज बैठा था।

टीन का एक हिस्सा हटा हुआ। चाँद सीधे पानी पर। और उसकी रोशनी में, पानी की सतह चमक रही थी, जैसे चाँदी का एक गोल आईना।

सूरज के एक हाथ में घुँघरू था। लाल कपड़ा हटा हुआ। वो गुनगुना रहा था। वो लोरी। एक माँ की। दो सौ अस्सी बरस पुरानी।

और उसके दूसरे हाथ में —

गुड्डी का हाथ।

गुड्डी उसके बगल में बैठी थी। मुंडेर पर। पैर नीचे लटकाए। नींद से भरी हुई, आँखें मलती हुई। और उसका दूसरा हाथ — मैंने अपनी बाईं आँख से देखा — एक छोटी परछाईं को पकड़े था।

वो लड़की। उसकी परछाईं। गुड्डी के बगल में बैठी हुई। पर पानी की तरफ़ नहीं देख रही थी। वो घुँघरू की तरफ़ देख रही थी। सूरज के हाथ में। उस गुनगुनाहट की तरफ़।

अपनी माँ की आवाज़ की तरफ़।

"सूरज!"

वो मुड़ा। मुझे देखा। उसकी अच्छी आँख में कुछ नहीं था। न ग़ुस्सा। न शर्म। बस एक बहुत पुरानी, बहुत गहरी थकान।

"मत आ, विक्की," उसने कहा।

मैं रुका। मुंडेर से बीस क़दम दूर।

"सूरज, वो घुँघरू मुझे दे दे।"

"नहीं।"

"वो उस लड़की की माँ की आवाज़ है। उसका नाम। अगर तूने उसे पानी में डाला, तो वो उसे खा जाएगी। हमेशा के लिए। और वो लड़की कभी..."

"मुझे पता है।" उसकी आवाज़ बिल्कुल शांत थी। "उसने बताया। पूरा। वो मुझसे कभी झूठ नहीं बोलती, विक्की। सत्रह बरस पहले भी नहीं बोली थी। उसने कहा था — अम्मा ठीक हो जाएँगी। और वो ठीक हो गईं।"

"सत्रह बरस के लिए।"

"सत्रह बरस मेरी अम्मा ज़िंदा रहीं।" उसकी आवाज़ पहली बार काँपी। "उन्होंने मेरी शादी देखी। गुड्डी को गोद में खिलाया। हर दिवाली पर लड्डू बनाए। सत्रह बरस, विक्की। मेरी वजह से।"

"छोटू की वजह से।"

सूरज का चेहरा ऐंठा।

"हाँ," उसने फुसफुसाया। "छोटू की वजह से। और तेरी। मैंने तुझे धकेला था, और छोटू ने ख़ुद को छोड़ा था, और मेरी अम्मा ज़िंदा रहीं।" उसने घुँघरू को देखा। "और अब उसी का बदला चुकाने का वक़्त है।"

"पापा," गुड्डी ने नींद भरी आवाज़ में कहा। "हम यहाँ क्या कर रहे हैं?"

सूरज ने अपनी बेटी की तरफ़ देखा। और उसकी आँख भर आई।

"कुछ नहीं, बेटा। बस... दादी के लिए एक पूजा।"

"दीदी डर रही है।" गुड्डी ने अपने बगल वाली परछाईं की तरफ़ देखा। "वो कह रही है पानी में कोई है। जो उसे बुला रहा है।"

"कोई नहीं है।"

"है, पापा।" गुड्डी ने अपनी भौंहें सिकोड़ीं। "वो कह रही है — वो उसे वापस नीचे ले जाना चाहती है। और वो नहीं जाना चाहती। वो अपनी माँ के पास जाना चाहती है।" उसने घुँघरू की तरफ़ इशारा किया। "और उसकी माँ उस चीज़ में है। जो आपके हाथ में है।"

सूरज का हाथ काँपने लगा।

और तब पानी हिला।

चाँदी का आईना टूटा। लहरें उठीं। और पानी से — बावड़ी के अंदर से, बहुत नीचे से — बाल उठे।

काले। हज़ारों। एक लहर की तरह। सीढ़ियों पर चढ़ते हुए। पहली सीढ़ी तक। मुंडेर तक।

और एक आवाज़। मीठी। बहुत मीठी। किसी दीदी जैसी।

"सूरज बेटा। अब। घुँघरू पानी में डाल। और बिटिया को मेरे पास भेज।"

"बिटिया नहीं," सूरज ने कहा। उसकी आवाज़ में घबराहट थी। "तूने कहा था सिर्फ़ परछाईं। गुड्डी को कुछ नहीं होगा। तूने वादा किया था।"

"परछाईं तेरी बिटिया का हाथ पकड़े है।" आवाज़ में अब एक ठंडक थी। "जहाँ परछाईं जाएगी, वहाँ बिटिया जाएगी। तूने सोचा था मैं बस उसे ले लूँगी? बिना उसके, जो उसे थामे है?"

सूरज जम गया।

बाल मुंडेर पर चढ़े। गुड्डी के पैरों की तरफ़। उसके टख़नों की तरफ़।

गुड्डी चीख़ी।

और तब पीछे से एक आवाज़ आई।

एक औरत की। बूढ़ी। खाँसती हुई। पर बहुत साफ़।

"सूरज।"

हम सब मुड़े।

पीपल वाली सड़क पर, चाँदनी में, एक औरत खड़ी थी। सफ़ेद धोती। बिखरे हुए बाल। नंगे पैर। उसकी छाती बहुत तेज़ी से ऊपर-नीचे हो रही थी, और हर साँस के साथ उसके होंठों के कोने से हरा पानी बह रहा था।

सूरज की माँ।

उन्हें चलना नहीं चाहिए था। वो पिछले तीन दिन से खाट से नहीं उठी थीं। पर वो यहाँ थीं। पूरे रास्ते चलकर आई थीं। अपने बेटे के पीछे।

"अम्मा," सूरज ने फुसफुसाया।

वो धीरे-धीरे आगे आईं। लड़खड़ाते हुए। मेरे पास से गुज़रीं। मुझे देखा — एक पल के लिए — और उनकी आँखों में वही था जो ग्यारहवें दिन था, जब उन्होंने मुझे चाय दी थी। कुछ सच ऐसे होते हैं जो बस ज़िंदा रहने के लिए चुप रहते हैं।

पर आज वो चुप नहीं थीं।

वो मुंडेर पर पहुँचीं। सूरज के पास। और उसके सामने घुटनों के बल बैठ गईं।

"मुझे पता है, बेटा," उन्होंने कहा।

सूरज के होंठ काँपे।

"सत्रह बरस से पता है।" उनकी आवाज़ बहुत नरम थी। "जिस रात मेरा बुख़ार उतरा था, उस रात मैंने सपने में उसे देखा था। पानी में। उसने मुझसे कहा था — तेरे बेटे ने तेरे लिए एक सौदा किया है।" उन्होंने सूरज का चेहरा अपने हाथों में लिया। "और मैंने अगले दिन सुना कि सुशीला का बेटा नहीं मिला।"

"अम्मा..."

"सत्रह बरस, सूरज।" उनकी आँखों से आँसू बहने लगे। "सत्रह बरस मैंने तुझे रातों को रोते सुना। तुझे पीपल वाली सड़क से बचते देखा। तुझे सुशीला के सामने सिर झुकाते देखा। तुझे अपने अंदर सड़ते हुए देखा।"

उन्होंने खाँसी। हरा पानी। उन्होंने उसे अपने पल्लू से पोंछा।

"ये साँस, जो तूने मेरे लिए ख़रीदी थी — ये हर दिन मेरे गले में पत्थर जैसी लगती थी, बेटा। क्योंकि मैं जानती थी इसकी क़ीमत किसने चुकाई है।"

"मुझे जाने दे, सूरज," उन्होंने कहा।

सूरज ने अपना सिर हिलाया। दाएँ से बाएँ। बार-बार। जैसे कोई बच्चा किसी बात को सुनने से इनकार करता है।

"नहीं। नहीं, अम्मा। मैं एक बार फिर... एक बार फिर तुझे खो नहीं सकता।"

"तूने मुझे कभी नहीं खोया था।" उन्होंने उसके माथे को चूमा। "पर तूने ख़ुद को खो दिया था। सत्रह बरस पहले। उस मुंडेर पर। और मैं तुझे वापस चाहती हूँ।"

उन्होंने अपना हाथ बढ़ाया। उसकी मुट्ठी की तरफ़। जिसमें घुँघरू था।

"मुझे दे।"

"अम्मा—"

"दे, सूरज।" उनकी आवाज़ में अब कुछ कठोर आया। एक माँ की आवाज़, जो अपने बच्चे से कुछ ऐसा माँग रही हो जो उसके भले के लिए है। "एक बार तूने मेरे लिए सौदा किया था। अब मुझे अपने लिए करने दे।"

बाल मुंडेर पर थे। गुड्डी के टख़नों पर। उसे खींच रहे थे। गुड्डी चीख़ रही थी, अपने पापा का हाथ पकड़े, अपने दूसरे हाथ में उस परछाईं को पकड़े।

सूरज ने अपनी बेटी को देखा। फिर अपनी माँ को।

और अपनी मुट्ठी खोल दी।

सूरज की माँ ने घुँघरू उठाया।

और उसे गुड्डी की हथेली में रख दिया। उस हाथ में, जो परछाईं को पकड़े था।

"बिटिया," उन्होंने कहा, "इसे अपनी दीदी को सुना।"

गुड्डी ने घुँघरू को देखा। उसकी गुनगुनाहट। वो लोरी।

और उसने उसे उस परछाईं के कान के पास रखा।

नहीं — बजाया नहीं। दादाजी ने कहा था, अभी नहीं। भूख जाग रही है। बस पास रखा। ताकि वो सुन सके। उस गुनगुनाहट को। जो बजने से पहले की आवाज़ थी।

और उस परछाईं ने सुना।

मैंने देखा। अपनी बाईं आँख से। वो छोटी परछाईं, जो बालों से खिंच रही थी — जिसके पैरों का धागा उसे नीचे बुला रहा था — रुक गई। उसका सिर घुँघरू की तरफ़ झुका। और उसके होंठ हिले।

और गुड्डी ने गाना शुरू किया। अपना नया गीत।

"...घड़ा लिया सिर पे, घर को चली, माँ खड़ी है दरवाज़े पे, कहती है — आ जा, मेरी लली..."

और परछाईं ने गुड्डी का हाथ कसकर पकड़ लिया।

और गुड्डी के टख़नों पर जो बाल थे — वो फिसल गए।

जैसे तेल पर पानी।

भूख चीख़ी।

पूरी बावड़ी से। हर दीवार से। पीपल की हर घंटी से। एक आवाज़, जो किसी इंसान की नहीं थी। धरती के फटने जैसी।

"धोखा! सूरज! तूने वादा किया था!"

और बाल — गुड्डी से फिसलकर — मुड़े। सूरज की माँ की तरफ़।

उनके पैरों की तरफ़ नहीं।

उनकी छाती की तरफ़।

मैंने देखा। अपनी बाईं आँख से। वो धागा — जो सत्रह साल से बावड़ी से उनकी छाती तक जाता था, जिसके रास्ते पानी उनके फेफड़ों में बहता था और उन्हें साँस देता था — वो खिंचा।

पीछे की तरफ़। बावड़ी की तरफ़।

"सत्रह बरस मैंने तुझे साँस दी," भूख ने कहा। "अब मैं उसे वापस लूँगी।"

सूरज की माँ का शरीर झटके से पीछे गिरा। उनकी छाती से एक आवाज़ निकली — एक गुड़गुड़ाहट, जैसे किसी बर्तन से पानी निकल रहा हो। उनके मुँह से हरा पानी बहने लगा। तेज़ी से। बहुत सारा।

"अम्मा!"

सूरज उनकी तरफ़ झपटा। उन्हें पकड़ा। अपनी गोद में लिया।

मैं मुंडेर तक पहुँचा। चाची और अम्मा मेरे पीछे।

सूरज की माँ सूरज की गोद में थीं। उनकी आँखें खुली थीं। उनकी छाती अब भी ऊपर-नीचे हो रही थी — पर अब धीरे। बहुत धीरे। और हर साँस के साथ कम पानी निकल रहा था।

बावड़ी का पानी उनके अंदर से बाहर आ रहा था। सत्रह साल का।

और उसकी जगह — मैंने देखा — हवा जा रही थी। असली हवा। ठंडी। रात की। चाँदनी वाली।

"सूरज," उन्होंने फुसफुसाया।

"अम्मा, मत जा। प्लीज़। मैं... मैं कुछ करूँगा। मैं उससे फिर बात करूँगा—"

"श्श्श।" उन्होंने अपना हाथ उठाया। उसके गाल पर रखा। उसके उस गाल पर, जहाँ अब भी पत्थर का एक छोटा-सा धब्बा बचा था। "कोई और सौदा नहीं, बेटा। कभी नहीं। वादा कर।"

सूरज रो रहा था। बिना आवाज़ के।

"वादा कर।"

"वादा," उसने फुसफुसाया।

सूरज की माँ ने एक लंबी साँस ली।

असली। हवा की। उनके फेफड़े भरे। और मैंने उनके चेहरे पर एक ऐसा भाव देखा जो मैंने पहले कभी नहीं देखा था।

हैरानी।

जैसे किसी ने सत्रह साल बाद पहली बार साँस ली हो। अपनी। किसी की उधार दी हुई नहीं।

"कितनी मीठी है," उन्होंने फुसफुसाया। "हवा। मैं भूल गई थी।"

फिर उन्होंने गुड्डी की तरफ़ देखा। जो उनके बगल में बैठी थी। घुँघरू हाथ में। परछाईं का हाथ पकड़े।

"बिटिया," उन्होंने कहा, "अपनी दीदी का ध्यान रखना।"

"रखूँगी, दादी।"

फिर उन्होंने सूरज की तरफ़ देखा। आख़िरी बार।

"सत्रह बरस उधार के थे, बेटा," उन्होंने कहा। मुस्कुराते हुए। "आज सूद समेत लौटा दिए। अब तू आज़ाद है।"

और उनकी आँखें बंद हो गईं।

मुंडेर पर कोई आवाज़ नहीं थी।

सूरज अपनी माँ को गोद में लिए बैठा रहा। उसका चेहरा उनके बालों में छुपा हुआ। उसकी पीठ हिलती हुई।

गुड्डी ने अपना सिर अपने पापा के कंधे पर रख दिया।

अम्मा ने सूरज की पीठ पर अपना हाथ रखा। चाची ने गुड्डी के बालों में।

और मैं खड़ा रहा। मुंडेर के किनारे। पानी की तरफ़ देखता हुआ।

बाल वापस पानी में खिंच गए थे। चाँदी का आईना फिर से शांत था। पर उसके नीचे — बहुत नीचे — मुझे अब भी वो चीख़ सुनाई दे रही थी। भूख की। धोखा खाई हुई। ग़ुस्से से भरी।

और उसके नीचे, उससे भी गहरे, एक और आवाज़।

पतली। टूटी हुई। एक लड़की की।

वो रो नहीं रही थी।

वो गुनगुना रही थी।

माँ खड़ी है दरवाज़े पे...

दो बजकर सैंतालीस।

वक़्त रुका। और मैं नीचे गया।

मुंडेर पर सब जम गए — सूरज, उसकी माँ का शरीर, अम्मा, चाची। पर गुड्डी जागती रही। घुँघरू हाथ में। परछाईं का हाथ पकड़े। वो मुझे पानी में उतरते देखती रही।

"चाचा," उसने कहा। "सुबह आना।"

"आऊँगा।"

पहली सीढ़ी। दसवीं — छोटू वहाँ था, और उसने सब देखा था, और उसकी आँखों में आँसू थे। उसने कुछ नहीं कहा। बस मेरा हाथ पकड़ा, और छोड़ा।

इक्कीसवीं। उल्टा गाँव। पनघट। सीढ़ी का मुँह।

तीसवीं।

मेरे पैर जमे।

और भूख ने मुझ पर हमला किया।

उसने मुझे नीचे खींचा।

एक झटके से। मेरे टख़नों पर। मेरे गिनती के धागे पर। तीसवीं से इकतीसवीं की तरफ़।

"गंगाधर के पोते। तू भी। तेरे दोस्त ने धोखा दिया। पर तेरे दोस्त की माँ ने मुझसे मेरी साँस छीन ली। और तू... तू मुझसे मेरी लड़की छीन रहा है।"

मेरे पैर फिसले। मैं इकतीसवीं की तरफ़ खिंचा।

"एक रात में दो। जैसे सूरज उतरा था। चल।"

मैंने अपने बाएँ हाथ से सीढ़ी की दीवार पकड़ी। पत्थर। खुरदुरा।

बाल मेरे बाएँ हाथ को नहीं देख पाए। वो मेरे टख़नों पर कसे रहे। पर मेरा हाथ दीवार से चिपका रहा।

और तब — ऊपर से, सीढ़ी के मुँह से — एक गीत आया।

सरला का।

"सीढ़ी-सीढ़ी उतरी पनिहारिन..."

और उसके साथ एक और आवाज़। एक बच्चे की। दसवीं से। बहुत ऊपर से। पानी में घुलकर यहाँ तक आती हुई।

छोटू।

"...माँ खड़ी है दरवाज़े पे..."

उसने गुड्डी का नया गीत सुना था। और उसे गा रहा था।

और फिर और आवाज़ें। पनघट से। उल्टे गाँव के घरों से। गंगाधर का पोता। भोला। बयासी वाला लड़का। वो मोटी औरत, पूरियों वाली। वो बूढ़ी, चरखे वाली।

सब। एक साथ। वो लोरी। नई वाली।

"...कहती है — आ जा, मेरी लली..."

और बाल ढीले पड़े।

सो गए।

मैं तीसवीं पर रहा।

और उस रात, पहली बार, मुझे लगा कि पूरी बावड़ी में — ऊपर से नीचे तक, पहली सीढ़ी से उल्टे गाँव के आख़िरी घर तक — कोई उसके साथ नहीं था। सिवाय उसके पिंजरे के।

सुबह मैं ऊपर आया।

मुंडेर पर सूरज अब भी बैठा था। अपनी माँ के शरीर को गोद में लिए। गाँव के लोग आ गए थे — मामी, मास्टर जी, पुजारी, कमला, सरपंच। सब चुपचाप। खड़े हुए।

किसी ने सूरज से कुछ नहीं पूछा।

मामी आगे आईं। वो औरत, जिसके बेटे को सत्रह साल पहले इसी आदमी ने, बारह बरस की उम्र में, नीचे जाने दिया था। उन्होंने सूरज की माँ के चेहरे को देखा। शांत। मुस्कुराता हुआ।

फिर वो सूरज के बगल में बैठ गईं। ज़मीन पर। और अपना गर्म हाथ उसकी पीठ पर रख दिया।

सूरज का पूरा शरीर काँप गया।

"मामी..."

"चुप रह," मामी ने कहा। बहुत धीरे। "आज बस अपनी माँ के लिए रो। बाक़ी हिसाब बाद में।"

मैं उसके पास बैठा।

उसने मेरी तरफ़ नहीं देखा। पर उसने अपना हाथ बढ़ाया। और मेरी कलाई पकड़ी। कसकर।

"मैंने धोखा दिया, विक्की," उसने फुसफुसाया। "फिर से।"

"तूने घुँघरू दे दिया। आख़िर में।"

"अम्मा ने लिया।" उसकी आवाज़ टूटी। "मैंने नहीं दिया। मैं नहीं दे पा रहा था।"

"पर तूने मुट्ठी खोली।"

सूरज बहुत देर तक चुप रहा।

"सत्रह बरस पहले," उसने कहा, "मैंने तुझे धकेला था, और तू गिरा था। आज मैंने अपनी बेटी को पानी के किनारे बिठाया।" उसने अपनी अच्छी आँख बंद कर ली। "मैं कभी ख़ुद को माफ़ नहीं कर पाऊँगा।"

"तुझे करना होगा," मैंने कहा। "तेरी अम्मा ने तुझसे यही माँगा था। कि तू आज़ाद हो।"

और तब मास्टर जी की आवाज़ आई। गाँव की तरफ़ से। दौड़ते हुए।

"विक्रम! विक्रम, इधर आओ! जल्दी!"

हम मुड़े।

मास्टर जी पीपल के पास खड़े थे। उनका चश्मा टेढ़ा। उनके चेहरे पर एक ऐसा भाव जो मैंने किसी के चेहरे पर इन तीस दिनों में नहीं देखा था।

"गाँव का कुआँ," उन्होंने हाँफते हुए कहा। "स्कूल वाला हैंडपंप। मंदिर का घड़ा। सब।"

"क्या हुआ?"

"भर गए हैं।" उनकी आवाज़ काँप रही थी। "तीन बरस से सूखे पड़े थे। आज सुबह — पौ फटते ही — सब में पानी आ गया। साफ़। ठंडा। मीठा।"

मैंने बावड़ी की तरफ़ देखा।

टीन का हटा हुआ हिस्सा। उसके नीचे की सीढ़ियाँ।

पहली सीढ़ी — जो तीस दिनों से हमेशा गीली थी, काई से ढकी, पानी में डूबी — सूखी थी।

सफ़ेद। धूल भरी। सुबह की धूप में चमकती हुई।

और दूसरी सीढ़ी का पानी — वो भी उतर रहा था। धीरे-धीरे। नीचे की तरफ़।

बावड़ी सूख रही थी।

और गाँव भर रहा था।

गुड्डी मेरे पास आई। अपने पापा की गोद से उतरकर। उसके हाथ में अब भी घुँघरू था। और उसका दूसरा हाथ — मेरी बाईं आँख में — उस परछाईं को पकड़े था।

उसने घुँघरू मेरी तरफ़ बढ़ाया।

"चाचा, ये आपका है।"

मैंने उसे देखा। वो गुनगुना रहा था। पूरा। साफ़। उसकी दरार अब भी चाँदी से भरी हुई। और मैंने उस पाँच साल की बच्ची को देखा, जिसने आज रात उस परछाईं का हाथ नहीं छोड़ा था, जब भूख ने उसे खींचा था। जिसने अपने पापा के धोखे के बीच भी एक लोरी गाई थी।

"नहीं, गुड्डी," मैंने कहा। "तू इसे रख।"

"मैं?"

"तेरी दीदी की माँ की आवाज़ है इसमें।" मैंने उसके छोटे-से हाथ को उसकी मुट्ठी में बंद किया। घुँघरू के चारों ओर। "और उस पर उसके बाल नहीं टिकते जो उसके ख़िलाफ़ भरोसा करता है। तू बड़ों जैसी नहीं है। तू सौदा नहीं करती।"

गुड्डी ने घुँघरू को देखा। फिर अपने बगल में बैठी उस परछाईं को।

"दीदी भी कह रही है मैं रखूँ," उसने कहा। "चालीसवीं रात तक।"

मामी ने उसके पीछे आकर उसके कंधों पर अपने हाथ रखे। गर्म हाथ।

"मैं इसके साथ रहूँगी," उन्होंने कहा। "दिन-रात। और पुजारी जी की लोरी भी।"

सूरज ने अपनी माँ के बालों से अपना चेहरा उठाया। अपनी बेटी को देखा। और कुछ नहीं कहा। पर उसकी अच्छी आँख में, आँसुओं के बीच, कुछ था जो मैंने उसमें सत्रह साल बाद पहली बार देखा था।

शर्म नहीं। डर नहीं।

गर्व।

भाग 30 समाप्त।

— तीसरा खंड: "नीचे" समाप्त —

अगले भाग में — "इकतीसवीं सीढ़ी": चौथा और आख़िरी खंड शुरू होता है — "चालीस"। बावड़ी का पानी उतर रहा है, और तीन बरस से सूखे गाँव के कुएँ भर रहे हैं। पर ये जीत नहीं है। ये पीछे हटना है। भूख अपना पानी समेट रही है — अपने पिंजरे की तरफ़। दस रातें बचीं। और हर रात वो थोड़ी और भारी होती जा रही है...

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