Pretika › Real Experiences › भानपुरा की बावड़ी - चालीस सीढ़ियाँ
भाग 29 — उनतीसवीं सीढ़ी
Piyashi Atma · Real Experiences · 20 मिनट
- Writer
- Piyashi Atma
- Story
- भानपुरा की बावड़ी - चालीस सीढ़ियाँ
- Chapter
- 29 of 31
- Category
- Real Experiences
- Reading time
- 20 min
- Words
- 3985
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
कुछ फ़ैसले ऐसे होते हैं जिनका कोई सही जवाब नहीं होता।
स्कूल में हमें सिखाया जाता है कि हर सवाल का एक जवाब होता है। गणित में। विज्ञान में। अगर तुम सही तरीक़े से हल करो, तो सही जवाब मिलेगा। और बाक़ी सब ग़लत।
पर ज़िंदगी में ऐसे सवाल आते हैं, जिनके हर जवाब में कोई न कोई डूबता है। जहाँ सही और ग़लत के बीच नहीं, बल्कि दो ग़लतियों के बीच चुनना होता है। या तीन। या चार।
दादाजी ने सत्रह बरस ऐसे सवालों का सामना किया था। और हर बार उन्होंने सबसे कम बुरा जवाब चुना था।
उस उनतीसवें दिन, मैंने पहली बार समझा कि सबसे कम बुरा जवाब भी एक जवाब होता है।
और कभी-कभी, जो सबसे मुश्किल लगता है — किसी का हाथ छोड़ना — वही सबसे सही होता है।
वो पूरे दिन गाँव में घूमती रही।
उस लड़की की परछाईं। छोटी। पतली। कंधों तक खुले बाल। जो सुबह मेरी परछाईं का हाथ पकड़कर बावड़ी से बाहर आई थी।
उसने मेरा हाथ छोड़ा नहीं था। पहले घंटे तक। मैं जहाँ जाता, वो मेरी परछाईं के बगल में चलती। उससे सटी हुई। जैसे कोई डरा हुआ बच्चा किसी बड़े की उँगली पकड़े भीड़ में चलता है।
फिर धीरे-धीरे उसकी पकड़ ढीली हुई। और वो अलग होने लगी।
पहले बस कुछ क़दम। फिर एक गली। फिर पूरा मोहल्ला।
मैंने उसे देखा — अपनी बाईं आँख से, जो अब सिर्फ़ उसकी दुनिया देखती थी — धूप में, ज़मीन पर, एक छोटी-सी काली आकृति, घरों के दरवाज़ों के पास रुकती हुई। दीवारों से सटती हुई। किसी चीज़ को ढूँढती हुई।
और मुझे पता था वो क्या ढूँढ रही थी।
वो सबसे पहले मामी के दरवाज़े पर रुकी।
मामी आँगन में थीं, धूप में, कन्हैया की नीली कमीज़ पर बैठीं कुछ सिल रही थीं। वो परछाईं उनके दरवाज़े की चौखट पर रुकी। बहुत देर तक। फिर धीरे-धीरे अंदर सरकी। आँगन की ज़मीन पर। मामी की परछाईं की तरफ़।
और उसने मामी की परछाईं का पल्लू छुआ।
मामी चौंकीं। उन्होंने अपना कंधा छुआ। फिर पीछे मुड़कर देखा।
"कोई है?" उन्होंने धीरे से पूछा।
कुछ नहीं। बस धूप।
पर मामी ने अपना हाथ अपने कंधे पर रखे रखा। जहाँ वो ठंडक थी। और उनके चेहरे पर कुछ आया — डर नहीं। कुछ और।
"बिटिया?" उन्होंने फुसफुसाया।
परछाईं सिकुड़ी। और भाग गई।
फिर वो चाची के पास गई। रसोई में। चूल्हे के पास। चाची ने अपनी कलाई पर एक ठंडी उँगली महसूस की, और उनके हाथ से चकला गिर गया।
फिर सूरज की माँ के पास। जो खाट पर लेटी खाँस रही थीं। उस परछाईं ने उनके माथे पर अपना हाथ रखा — परछाईं का हाथ, परछाईं के माथे पर — और उनकी खाँसी एक पल के लिए रुक गई।
फिर कमला के पास। बबलू की माँ। जो आँगन में बबलू के बाल काट रही थी।
हर माँ के पास। एक-एक करके। गाँव की हर उस औरत के पास, जिसकी गोद में कभी कोई बच्चा रहा हो।
और हर बार, कुछ पल बाद, वो भाग जाती।
"वो अपनी माँ को ढूँढ रही है," अम्मा ने कहा। जब मैंने उन्हें बताया। "हर माँ को छूकर देख रही है। कि कहीं ये वो तो नहीं।"
दोपहर को वो पश्चिम की तरफ़ गई।
मैंने उसे पीपल वाली सड़क पर देखा। अकेली। धूल में। छोटी-सी परछाईं, जिसके साथ कोई शरीर नहीं था। तेज़-तेज़ चलती हुई। सूखे खेतों की तरफ़। तीन कोस दूर। उस नदी की तरफ़, जहाँ से वो रोज़ पानी भरती थी। जहाँ उसकी माँ पेट के बल लेटी थी, दो सौ अस्सी बरस से।
वो पीपल तक पहुँची।
और रुक गई।
एक झटके से। जैसे किसी अदृश्य दीवार से टकराई हो। वो पीछे गिरी। उठी। फिर आगे बढ़ी। फिर टकराई।
पीपल की घंटियाँ बजीं। हवा नहीं थी।
मैंने अपनी बाईं आँख से देखा। उस परछाईं के पैरों से, बहुत पतला, एक धागा बँधा था। काला। पीछे की तरफ़ जाता हुआ। बावड़ी तक।
वो बँधी थी। अब भी। उसकी परछाईं बाहर आ गई थी, पर उसका धागा अभी भी उसके पिंजरे से जुड़ा था। और वो पीपल से आगे नहीं जाने देता था।
परछाईं वहीं बैठ गई। पीपल के नीचे। धूल में। घुटने सीने से सटाए।
और मैंने — अपनी बाईं आँख से — उसे रोते हुए देखा।
"दीदी रो रही है," गुड्डी ने कहा।
वो मेरे बगल में खड़ी थी। पुजारी के घर से निकलकर वो सीधे पीपल की तरफ़ भागी थी। मुझे नहीं पता कैसे उसे पता चला। बच्चों को पता चल जाता है।
"तू उसे देख सकती है?"
गुड्डी ने सिर हिलाया। "सब बच्चे देख सकते हैं, चाचा। वो सुबह से गली में है। बबलू ने भी देखा। पिंकी ने भी।" उसने अपनी भौंहें सिकोड़ीं। "पर वो बात नहीं करती। बस रोती है।"
वो पीपल के नीचे गई। उस परछाईं के पास। और बैठ गई। ज़मीन पर। धूल में। उसके बगल में।
"तुम्हारा नाम क्या है?" गुड्डी ने पूछा।
परछाईं ने अपना सिर उठाया। गुड्डी की तरफ़। फिर धीरे-धीरे हिलाया। दाएँ से बाएँ।
नहीं पता।
गुड्डी ने इस पर गंभीरता से सोचा।
"कोई बात नहीं," उसने कहा। "मैं तुम्हें दीदी बुलाऊँगी। ठीक है? जब तक तुम्हें अपना नाम याद न आए।"
और उसने अपना छोटा-सा हाथ बढ़ाया। उस परछाईं के हाथ की तरफ़।
परछाईं ने बहुत देर तक उस हाथ को देखा।
फिर उसे पकड़ लिया।
"अड़तीस," मास्टर ओमप्रकाश जी ने कहा।
दोपहर। अम्मा का आँगन। धूप में। सब वहाँ थे — मैं, अम्मा, सूरज, मामी, चाची, हरिहर शास्त्री। और मास्टर जी, पोथी खोले, उस हरी सूची पर उँगली रखे हुए।
"मैंने फिर से गिना," उन्होंने कहा। "सुबह से तीन बार। सूची बदलती रहती है — हर बार जब कोई ज़ंजीर से छूटता है या जुड़ता है, वो अपने आप बदल जाती है।" उन्होंने अपना चश्मा ठीक किया। "शंकर का नाम कट गया है। देवदत्त का भी। रघु जुड़ गया है। और रामेश्वर..." वो रुके। "रामेश्वर का नाम भी जुड़ गया है। नीचे। सबसे नीचे। बाक़ियों से अलग, लाल स्याही में।"
"तो अब?"
"अड़तीस प्राण," मास्टर जी ने कहा। "और उसके बाद..." उन्होंने अपनी उँगली अगली पंक्ति पर रखी।
२०२६ — विक्रम मिश्र, गंगाधर का रक्त (बबलू चुकाएगा)
"तुम उनतालीसवें हो, विक्रम," उन्होंने धीरे से कहा। "और बबलू चालीसवाँ। जिस रात तुम चालीसवीं सीढ़ी बनोगे, बबलू भी तुम्हारे साथ जाएगा। तुम्हारे धागे से। और चालीस प्राण पूरे होंगे।"
"और पिंजरा टूटेगा," गंगाधर की चिट्ठी वाले शब्द मेरे मुँह से निकले।
"पर दादाजी ने कहा था," मैंने कहा, "कि चालीसवीं की रात भूख सबसे गहरी नींद सोती है। पेट भरकर। और उसी रात घुँघरू बजाना है।"
"तो उसी रात पिंजरा भी टूटेगा," हरिहर शास्त्री ने कहा। "और उसी रात वो सबसे गहरी नींद में होगी।" उन्होंने अपनी दाढ़ी पर हाथ फेरा। "दोनों एक साथ।"
"मतलब?"
"मतलब," पुजारी ने कहा, "अगर उस पल लड़की अपनी माँ की आवाज़ सुने — और भूख से अलग हो — तो भूख बिना पिंजरे के होगी। बिना देह के। सोती हुई। गंगाधर ने लिखा था, वो मिट जाएगी।" उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। "पर अगर उस पल कुछ ग़लत हुआ — अगर घुँघरू न बजा, या लड़की ने न सुना, या माफ़ न किया — तो भूख जागेगी। बिना पिंजरे के। आज़ाद।"
"और तब?"
पुजारी ने अपने ख़ाली कलश की तरफ़ देखा।
"तब हर कुआँ, हर तालाब, हर घाट, हर नल उसका होगा," उन्होंने धीरे से कहा। "दिल्ली। बनारस। बंबई। हर जगह। और कोई सत्रह बरस नहीं। कोई गिनती नहीं। बस भूख।"
आँगन में कोई आवाज़ नहीं थी।
"सब कुछ या कुछ नहीं," अम्मा ने फुसफुसाया।
मास्टर जी ने अपना चश्मा उतारा। बहुत देर तक उसे पोंछते रहे।
"चालीस बरस मैंने इस गाँव के बच्चों को गिनती पढ़ाई है," उन्होंने धीरे से कहा। "एक से सौ तक। पहाड़े। जोड़-घटाना। मैंने कभी नहीं सोचा था कि एक दिन मैं बैठकर ये हिसाब लगाऊँगा कि कितने प्राण पूरे हुए, और कितने बाक़ी हैं।" उन्होंने पोथी को देखा। "और ये कि एक ग़लत गिनती का मतलब पूरी दुनिया हो सकता है।"
"आपने ग़लत नहीं गिना, मास्टर जी।"
"मैं जानता हूँ।" उन्होंने चश्मा वापस पहना। "यही तो डर है, बेटा। गिनती सही है। बस उसका जवाब किसी को पसंद नहीं आएगा।"
"बबलू को इसमें मत रखो," मामी ने कहा।
सबने उनकी तरफ़ देखा।
"अगर बबलू चालीसवाँ न हो," मामी ने कहा, धीरे-धीरे, जैसे सोचते हुए, "तो चालीसवीं की रात चालीस प्राण पूरे नहीं होंगे। पिंजरा नहीं टूटेगा। भूख पिंजरे में ही रहेगी। सोती हुई। और अगर उस पल लड़की अलग हुई..."
"तो भूख पिंजरे में अकेली होगी," पुजारी ने कहा। उनकी आँखें चमकीं। "बिना लड़की के। बिना भरोसे के। बिना देह के। एक ख़ाली पिंजरे में बंद एक भूख।" उन्होंने सिर हिलाया। "वो तब भी मिटेगी। पर अगर कुछ ग़लत हुआ, तो कम से कम वो बाहर नहीं निकलेगी।"
"और अगर सब ठीक हुआ?"
"तो दोनों रास्तों का एक ही अंजाम।" पुजारी ने कहा। "बस एक में दुनिया दाँव पर है। दूसरे में नहीं।"
सबकी आँखें मेरी तरफ़ मुड़ीं।
मैंने अपनी बाईं कलाई को देखा। अपनी बाईं आँख से। वो धागा। सफ़ेद। पारदर्शी। मेरी नस से निकलकर, गाँव की तरफ़, कमला के घर तक। एक आठ साल के लड़के की कलाई तक।
जो किसी का हाथ पकड़ता है, वो उसे हमेशा के लिए थामे रहता है।
"मुझे बबलू का हाथ छोड़ना होगा," मैंने कहा।
मुझे नहीं पता कि उस पल मैंने क्या महसूस किया।
उनतीस दिन। उनतीस दिन की मेरी पूरी लड़ाई एक ही चीज़ के बारे में थी — किसी का हाथ न छोड़ना। सत्रह साल पहले मैं छोटू का हाथ नहीं थाम पाया था। और उस दिन से मैंने ख़ुद से वादा किया था — बिना जाने — कि फिर कभी नहीं।
बबलू का हाथ मैंने चौदहवीं रात पकड़ा था। पानी में। उसके डूबते हुए शरीर को ऊपर खींचते हुए। रघु चाचा ने मेरी कलाई थामी थी। और देवदत्त के पत्थर ने नीचे से उन हाथों को धकेला था।
और मैंने वादा किया था। ख़ुद से। कभी नहीं छोड़ूँगा।
चाची ने मेरा हाथ पकड़ा।
"तूने मेरा हाथ नहीं छोड़ा था," उन्होंने कहा। "जब मैंने तीन बार कहा। और तू सही था।" उनकी आँखें नम थीं। "पर इस बार, विक्की... इस बार शायद छोड़ना ही थामना है।"
"कैसे छोड़ूँ? पिछली बार जब मैंने उसकी डोर काटी थी, वो डूब गया था। कोई उसे पकड़ने वाला नहीं था।"
"तो कोई और पकड़े," हरिहर शास्त्री ने कहा।
सबने उनकी तरफ़ देखा।
"धागा तोड़ना नहीं है, बेटा," पुजारी ने कहा। "सौंपना है। जैसे चाची ने अपनी परछाईं सौंपी थी — पर इस बार ज़िंदा से ज़िंदा को। और किसी ऐसे को, जिसकी पकड़ ज़ंजीर न बने।"
"ऐसा कौन है?"
पुजारी ने अपने ख़ाली कलश को छुआ।
"जिसकी पकड़ लोरी जैसी हो," उन्होंने कहा। "जो भरोसा न माँगे। बस दे।"
कमला अपने आँगन में थी।
बबलू खाट पर बैठा था, एक कंबल में लिपटा, हाथ में गुड़ की डली। वो अब ठीक था — ज़्यादातर। बस रात को कभी-कभी नींद में उठकर बैठ जाता था, और कुछ गिनने लगता था। चौदह। चौदह। चौदह।
मैंने कमला को सब बताया। शुरू से। बावड़ी। ज़ंजीर। चालीस प्राण। वो धागा जो मेरी नस से उसके बेटे तक जाता था।
कमला ने चुपचाप सुना। उसकी आँखें बबलू पर टिकी रहीं।
"अगर तुम नीचे गए," उसने आख़िर में कहा, "तो मेरा बबलू भी जाएगा।"
"हाँ।"
"और अगर तुम उसका धागा मुझे दो?"
"तो वो आपसे बँधेगा। आपके हाथ से।" मैंने उसकी आँखों में देखा। "माँ की पकड़ ज़ंजीर नहीं होती। पुजारी जी कहते हैं। वो बस... रखवाली होती है। और जब आप उसे छोड़ना चाहेंगी — जब वो बड़ा होगा — तो वो अपने आप ढीली हो जाएगी।"
कमला ने बहुत देर तक सोचा।
फिर वो उठी। खाट के पास गई। और बबलू का हाथ पकड़ा। उसका छोटा, गोल-मटोल हाथ। अपने दोनों हाथों में।
"बता," उसने कहा। "क्या करना है।"
मैंने अपनी बाईं कलाई आगे बढ़ाई। बबलू की कलाई के पास। कमला के हाथों के पास।
और अपनी बाईं आँख से उस धागे को देखा। सफ़ेद। पारदर्शी। धड़कता हुआ। मेरे दिल की धड़कन के साथ।
मैंने अपने दाएँ हाथ की उँगलियों से उसे पकड़ा। मेरी कलाई के पास। जहाँ वो मेरी चमड़ी से निकलता था।
और खींचा।
दर्द हुआ। जैसे कोई मेरी एक नस बाहर निकाल रहा हो। धीरे-धीरे। इंच-इंच। मेरी आँखों में आँसू आए। मेरे दाँत भिंच गए।
धागा बाहर आया। मेरी नस से। एक लंबी, पतली, चमकती लकीर।
और उसका सिरा मेरी उँगलियों में था।
"कमला जी," मैंने हाँफते हुए कहा, "अपना हाथ खोलिए।"
कमला ने अपनी हथेली खोली। बबलू के हाथ के ऊपर।
मैंने धागे का सिरा उसकी हथेली पर रखा।
कुछ पल कुछ नहीं हुआ।
फिर धागा — सफ़ेद, पारदर्शी — कमला की हथेली में घुलने लगा। अंदर की तरफ़। उसकी चमड़ी में। जैसे पानी सूखी मिट्टी में समाता है।
और मैंने देखा — अपनी बाईं आँख से — कि कमला की कलाई से बबलू की कलाई तक अब एक नया धागा था।
पर वो धागा अलग था।
सफ़ेद नहीं। सुनहरा। हल्का। और उसमें कोई गाँठ नहीं थी। बस एक ढीला-सा घेरा। बबलू की कलाई के चारों ओर। जैसे कोई राखी। जैसे कोई माँ अपने बच्चे की कलाई पर काला धागा बाँधती है, बुरी नज़र से बचाने के लिए।
और मेरी बाईं कलाई — जहाँ चौदह रातों से वो धागा निकलता था — ख़ाली थी।
हल्की।
ठंडी।
मैंने अपना हाथ मुट्ठी में बंद किया। कुछ नहीं। कोई खिंचाव नहीं। कोई धड़कन नहीं जो किसी और के दिल तक जाती हो।
मैंने एक हाथ छोड़ दिया था।
और वो डूबा नहीं था।
बबलू ने अपनी माँ की तरफ़ देखा। फिर अपनी कलाई की तरफ़।
"मम्मी," उसने कहा, "मेरा हाथ गर्म हो गया।"
कमला ने उसे अपनी छाती से लगा लिया। और मेरी तरफ़ देखा। उस औरत की आँखों में, जिसने तेरह दिन पहले भीड़ में मुझ पर चीख़ मारी थी, अब आँसू थे।
"तूने उसे दो बार बचाया," उसने फुसफुसाया। "एक बार पानी से निकालकर। एक बार अपने से छोड़कर।"
और तब आँगन के कोने में रखे मटके से एक आवाज़ आई। पानी की। हल्की। जैसे कोई बुलबुला फूटा हो।
मैंने मटके में झाँका।
पानी की सतह। मिट्टी के किनारे। और उसमें एक चेहरा।
बबलू का। गोल-मटोल। एक दाँत टूटा हुआ।
पर वो मटके की तली में नहीं था। वो सतह पर था। जहाँ प्रतिबिंब होना चाहिए। और वो गिनती नहीं कर रहा था।
वो मुस्कुरा रहा था।
बावड़ी ने कुछ लौटाया था। पहली बार। उनतीस दिनों में। सुरंग के उस ताक में, जहाँ मैंने कल रात बबलू का प्रतिबिंब देखा था — अब, मुझे यक़ीन था — एक ख़ाली गड्ढा होगा।
"दीदी कहती है," गुड्डी ने कहा, "कि घुँघरू की दरार भर सकती है।"
शाम थी। हम सब अम्मा के आँगन में लौटे थे। और गुड्डी — जो पूरी दोपहर पीपल के नीचे उस परछाईं के साथ बैठी रही थी — दौड़ती हुई आई थी।
"क्या?"
"दीदी ने बताया। इशारों से।" गुड्डी ने अपने हाथों से कुछ दिखाया। दो हाथ, एक-दूसरे पर। कुछ बहता हुआ। "उसकी माँ के आँसू। अगर घुँघरू को उसकी माँ के पास ले जाओ, और माँ उस पर रोए — तो आँसू दरार भर देंगे।"
मैंने घुँघरू निकाला। उसकी दरार। उसकी गुनगुनाहट — जो कल से थोड़ी और धीमी हो गई थी।
"नदी पर," मैंने कहा। "दो बजकर सैंतालीस पर।"
"मैं जाऊँगी," चाची ने कहा।
सबने उनकी तरफ़ देखा।
"मेरा कान अब बंद है," उन्होंने कहा। "मुझ पर अब कोई धागा नहीं। मैं उस माँ से बात कर सकती हूँ। एक औरत, जो अपने पति के लिए नीचे जाने वाली थी — एक औरत, जो अपनी बेटी के लिए नदी में कूदी थी।" उन्होंने अपनी मेहंदी वाली हथेलियाँ देखीं। "हम दोनों एक-दूसरे को समझेंगी।"
"मैं भी चलूँगा," सूरज ने कहा।
शाम ढलने से पहले मैं पीपल के पास गया।
गुड्डी अब भी वहाँ थी। उस परछाईं के बगल में। धूल में। दोनों के हाथ जुड़े हुए — एक असली, एक परछाईं का।
और गुड्डी गा रही थी। धीरे-धीरे। वही धुन।
"सीढ़ी-सीढ़ी उतरी पनिहारिन..."
पर उसने शब्द बदल दिए थे। मैंने ग़ौर किया।
"...घड़ा लिया सिर पे, घर को चली, माँ खड़ी है दरवाज़े पे, कहती है — आ जा, मेरी लली..."
"ये किसने सिखाया?" मैंने पूछा।
"किसी ने नहीं।" गुड्डी ने कंधे उचकाए। "मैंने बनाया। पुराना वाला दीदी को डराता था। वो रोने लगती थी। तो मैंने नया बनाया।"
मैंने उस परछाईं की तरफ़ देखा। बाईं आँख से।
वो गुड्डी के बगल में बैठी थी। अब भी पश्चिम की तरफ़ मुँह किए। पर उसका सिर थोड़ा-सा झुका हुआ था। गुड्डी की तरफ़। सुनता हुआ।
और उसके होंठ — परछाईं के होंठ — हिल रहे थे।
गुड्डी के साथ। उसी धुन में।
माँ खड़ी है दरवाज़े पे...
रात को, जब सब सो गए, सूरज मेरे पास आया।
अम्मा के आँगन में। लालटेन की रोशनी में। उसकी बैसाखी की ठक-ठक। उसकी पत्थर वाली टाँगें, जो अब घुटनों से नीचे ही बची थीं।
वो मेरे बगल में बैठा। बहुत देर तक कुछ नहीं कहा।
"विक्की," उसने आख़िर में कहा। "आज दोपहर पुजारी जी ने कहा था — जब लड़की अलग होगी, तो भूख मिट जाएगी।"
"हाँ।"
"और जब भूख मिटेगी..." उसने निगला, "...तो उसके सारे धागे टूटेंगे।"
मैं चुप रहा।
"मेरी अम्मा का धागा भी।" उसकी आवाज़ बहुत धीमी थी। "जो सत्रह बरस से उन्हें साँस दे रहा है। जो मैंने बारह बरस की उम्र में ख़रीदा था। तुझे धकेलकर।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसकी अच्छी आँख मेरी तरफ़ थी। उसमें आँसू थे।
"तूने देखा है न, विक्की? अपनी उस आँख से? उनकी छाती में वो पानी?"
"हाँ।"
"जब भूख मिटेगी, तो वो पानी भी सूख जाएगा।" सूरज ने अपनी आँखें बंद कर लीं। "और मेरी अम्मा..."
उसने बात पूरी नहीं की।
मैंने उसके कंधे पर हाथ रखा। कुछ नहीं कह पाया। कोई ऐसी बात नहीं थी जो मैं कह सकता।
"तू क्या करेगा, विक्की?" उसने पूछा। "अगर तेरी माँ होतीं?"
मेरे पास कोई जवाब नहीं था।
उनतीसवीं सीढ़ी।
मैं उल्टे गाँव में उतरा। पनघट। सीढ़ी का मुँह। मैं सीधे उनतीसवीं पर गया। आज मुझे कहीं और नहीं जाना था।
मेरे पैर जमे।
और तब मैंने उसकी आवाज़ सुनी।
दोहरी नहीं। अकेली। भूख की। गहरी। धरती के खिसकने जैसी। पर इस बार उसमें कोई ग़ुस्सा नहीं था। कोई धमकी नहीं।
बस एक प्रस्ताव।
"गंगाधर के पोते।"
मैं चुप रहा।
"तूने बच्चे का धागा उसकी माँ को दे दिया। अब चालीस प्राण पूरे नहीं होंगे। चालाक है तू।"
पानी की छत से, पनघट के खंभे से, सीढ़ी की दरारों से — वो आवाज़ हर तरफ़ से आ रही थी।
"तो एक सौदा कर। मेरे साथ। जैसे तेरे पुरखे ने किया था।"
"कोई सौदा नहीं।"
"सुन तो ले।" उस आवाज़ में कुछ नरम आया। लगभग मीठा। "घुँघरू मत बजा। मेरा नाम मत पढ़। लड़की को उसकी माँ की आवाज़ मत सुना। बस इतना कर।
"और मैं तुझे छोड़ दूँगी। तेरी गिनती यहीं रुकेगी। उनतीस पर। तू चालीसवीं नहीं बनेगा। तू ज़िंदा ऊपर जाएगा। दिल्ली। तस्वीरें खींचेगा। शादी करेगा। बूढ़ा होगा।"
"रघु तो वहाँ है ही। चालीसवीं पर। वो जगह भरी है। मुझे तेरी ज़रूरत नहीं।"
एक ठहराव।
"और सूरज की माँ ज़िंदा रहेगी। मेरे पानी से। सत्रह बरस और। उसके बाद और।"
"बस सत्रह बरस बाद, मैं फिर जागूँगी। जैसे हमेशा जागती हूँ। कोई और बच्चा गिनेगा। शायद गुड्डी। शायद बबलू। शायद कोई और। पर तू नहीं। तू तब दिल्ली में होगा। बहुत दूर।"
मैंने अपनी आँखें बंद कर लीं।
वो सब सच था। हर शब्द।
और मेरे अंदर कुछ — बहुत छोटा, बहुत थका हुआ, बहुत डरा हुआ — कह रहा था, हाँ।
मैंने अपनी बाईं आँख से ऊपर देखा। पानी की छत के पार। बावड़ी के पार।
और मैंने गाँव देखा। पानी की दुनिया में। हर घर। हर दरवाज़ा।
मामी का घर — जहाँ कन्हैया की थाली अब नहीं लगती थी।
अम्मा का घर — जहाँ दो पायलें एक जोड़ी बनकर रखी थीं।
पुजारी का घर — जहाँ एक बूढ़ा आदमी एक ज़िंदा बच्ची के सिरहाने बैठकर लोरी गा रहा था।
और पीपल।
पीपल के नीचे, धूल में, एक छोटी-सी परछाईं बैठी थी। घुटने सीने से सटाए। पश्चिम की तरफ़ देखती हुई। नदी की तरफ़। अपनी माँ की तरफ़। जहाँ वो नहीं जा सकती थी।
दो सौ अस्सी बरस।
"नहीं," मैंने कहा।
भूख चुप रही।
"सत्रह बरस बाद कोई और बच्चा," मैंने कहा। "और उसके सत्रह बरस बाद कोई और। और पीपल के नीचे वो लड़की। हमेशा। अपनी माँ की तरफ़ देखती हुई।" मेरी आवाज़ काँप रही थी। "गंगाधर ने भी सबसे कम बुरा रास्ता चुना था। दादाजी ने भी। चाचा ने भी। हर मिश्र ने।"
मैंने अपनी आँखें खोलीं।
"मैं आख़िरी मिश्र हूँ। और मैं सबसे कम बुरा रास्ता नहीं चुनूँगा।"
पानी की छत काँपी।
और भूख की आवाज़ बदली। वो मीठापन ग़ायब हो गया।
"तो ठीक है," उसने कहा। "तू नहीं मानेगा। कोई बात नहीं।"
"पर कोई और मानेगा।"
और उस आवाज़ में एक हँसी थी। धीमी। गीली। बुलबुलों वाली।
"सबके पास एक माँ होती है, गंगाधर के पोते। और हर माँ के लिए कोई न कोई सौदा करता है।"
और फिर वो आवाज़ चली गई। पानी की छत शांत हो गई। पनघट के खंभे में पानी फिर से धीरे-धीरे ऊपर बहने लगा।
कुछ देर बाद छोटू मेरे पास आया। सीढ़ी के मुँह से। उसका चेहरा पीला था।
"मैंने सुना, भैया," उसने कहा। "पूरा उल्टा गाँव सुन रहा था।"
"उसने कहा कोई और मानेगा।"
छोटू ने मेरी बगल वाली सीढ़ी पर बैठकर अपने घुटने मोड़ लिए।
"सत्रह बरस पहले," उसने धीरे से कहा, "उसने सूरज से भी यही कहा था। कुएँ में। सबके पास एक माँ होती है।" उसकी आवाज़ काँपी। "भैया, वो सूरज के पास जाएगी।"
"सूरज अब बारह बरस का नहीं है।"
"नहीं।" छोटू ने ऊपर देखा। पानी की छत की तरफ़। "पर उसकी अम्मा अब भी मर रही हैं। बस इस बार धीरे-धीरे। उसकी आँखों के सामने। हर खाँसी के साथ।"
मैं कुछ नहीं बोल पाया।
"मैंने उसे माफ़ किया था, भैया," छोटू ने फुसफुसाया। "डूबते हुए। पर मैंने ये नहीं सोचा था कि उसे फिर से वही चुनना पड़ेगा।"
सुबह चाची लौटीं। नदी से। सूरज और लल्लन के साथ।
और घुँघरू उनकी हथेली में था।
उसकी दरार भर गई थी। मैंने देखा — एक पतली, चाँदी जैसी लकीर, जैसे किसी ने उसे पिघली हुई चाँदी से जोड़ा हो। और उसकी गुनगुनाहट — वो लोरी — फिर से पूरी थी। ऊँची। साफ़।
"उसने रोया," चाची ने फुसफुसाया। उनकी आँखें सूजी हुई थीं। "उस माँ ने। रेत के नीचे से। घुँघरू पर। बहुत देर तक।" उन्होंने अपनी हथेली को देखा। "और मैंने भी। उसके साथ।"
अब घुँघरू चालीसवीं रात तक टिकेगा। शायद उससे भी आगे।
मुझे अब दो सीढ़ियाँ एक रात में नहीं उतरनी थीं।
मैंने राहत की साँस ली। उनतीस दिनों में पहली बार, गिनतियाँ एक-दूसरे के ख़िलाफ़ नहीं दौड़ रही थीं। ग्यारह रातें। ग्यारह सीढ़ियाँ। और एक घुँघरू, जो अब ग्यारह रातें आराम से टिकेगा।
मामी ने चाची के दोनों हाथ पकड़े। कुछ नहीं कहा। अम्मा ने अपनी पायलें गोद में रखीं और आसमान की तरफ़ मुँह किया, जैसे धूप को अपने चेहरे पर महसूस कर रही हों।
एक पल के लिए, मुंडेर पर, सब ठीक लगा।
और तब मैंने सूरज को देखा।
वो लल्लन के टेम्पो के पास खड़ा था। बैसाखी के सहारे। चाची और मामी से कुछ दूर। उसकी अच्छी आँख चाची की हथेली पर टिकी थी। उस घुँघरू पर।
और उसके चेहरे पर कुछ था।
मैं उसे पहचानता था। मैंने उसे पहले देखा था। दसवीं रात, एक पुरानी तस्वीर में, अपनी बाईं आँख से। और उन्नीसवीं रात, पानी की याद में।
मुंडेर पर। बारह बरस का सूरज। मेरे पीछे खड़ा। अपनी कलाई का ताँबे वाला लॉकेट पकड़े। कुएँ के पानी में झाँकते हुए।
मुझे अम्मा चाहिए, दीदी।
उसी शाम, सूरज ढलते ही, मैंने सूरज को बावड़ी की तरफ़ जाते देखा।
अकेला। बैसाखी के सहारे। चाँदनी में। पीपल वाली सड़क पर।
वो मुंडेर पर पहुँचा। और बैठ गया। टीन के ठीक बगल में। और नीचे देखा। पानी में।
और उसके होंठ हिले।
मैं बहुत दूर था। पीपल के पीछे। मुझे आवाज़ सुनाई नहीं दी।
पर मैंने पढ़ लिया।
"दीदी... अगर मैं तेरी मदद करूँ... तो अम्मा को छोड़ देगी?"
और पानी से — बावड़ी के अंदर से, बहुत नीचे से — एक आवाज़ आई। मीठी। बहुत मीठी। किसी दीदी जैसी।
इतनी ऊँची कि मैंने उसे पीपल के पीछे से भी सुना।
"हाँ, सूरज बेटा।"
भाग 29 समाप्त।
अगले भाग में — "तीसवीं सीढ़ी": धोखा। कोई अपना। सत्रह साल पहले सूरज ने अपनी माँ के लिए एक दोस्त को धकेला था। आज वो फिर एक सौदा कर रहा है। उसी आवाज़ से। उसी माँ के लिए। और इस बार दाँव पर एक दोस्त नहीं, पूरी दुनिया है...
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