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भाग 28 — अट्ठाईसवीं सीढ़ी
Piyashi Atma · Real Experiences · 20 मिनट
- Writer
- Piyashi Atma
- Story
- भानपुरा की बावड़ी - चालीस सीढ़ियाँ
- Chapter
- 28 of 31
- Category
- Real Experiences
- Reading time
- 20 min
- Words
- 3996
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
हर पुकार एक रास्ता बनाती है।
जब कोई किसी को पुकारता है — ज़ोर से, बार-बार, बरसों तक — तो वो आवाज़ हवा में खो नहीं जाती। वो कहीं जाती है। उस तक, जिसे पुकारा गया। और जिस रास्ते से वो जाती है, वो रास्ता धीरे-धीरे गहरा होता जाता है। जैसे पानी पत्थर में अपनी लकीर काट देता है।
दो सौ अस्सी बरस से एक माँ अपनी बेटी को पुकार रही थी। तीन कोस दूर से। ज़मीन के नीचे से। बूँद-बूँद।
और उसकी पुकार ने एक रास्ता बनाया था।
उस अट्ठाईसवीं रात, मैं उस रास्ते पर चला।
उस दिन दोपहर को मैंने अम्मा को बताया। नीम के नीचे। धूप में।
"आज रात मैं नीचे जाऊँगा," मैंने कहा। "उल्टे गाँव के भी नीचे। उस लड़की तक। सरला दीदी रास्ता दिखाएँगी।"
अम्मा ने अपनी पायलें गोद में रखीं। दोनों। और बहुत देर तक कुछ नहीं कहा।
"सरला ने तुझे बताया," उन्होंने आख़िर में पूछा, "कि वो वहाँ आधे रास्ते तक गई थी?"
"हाँ।"
"और लौट आई थी।"
"हाँ।"
अम्मा ने अपना चेहरा पीपल की तरफ़ घुमाया। "वो बचपन में भी ऐसी ही थी। हर चीज़ आधी करती थी। आधा गीत। आधी रोटी। आधा रास्ता। फिर डरकर भाग आती थी।" उनके होंठों पर एक हल्की-सी मुस्कान आई। "और मैं उसे डाँटती थी — सरला, कोई काम आधा मत छोड़ा कर।"
उन्होंने मेरी तरफ़ मुँह किया।
"उससे कहना, बच्चा, कि आधा रास्ता भी रास्ता होता है। कि उसे पूरा जाने की ज़रूरत नहीं है। कि जहाँ तक वो जा सके, वहाँ तक जाना ही बहुत है।"
उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा।
"और एक बात। उस रास्ते में तुझे चीज़ें दिखेंगी। जो उसने रखी हैं। जो लोगों से ली हैं। उनमें से कोई चीज़ तुझे बहुत अपनी लगेगी।" उनकी उँगलियाँ कसीं। "उसे मत छूना। चाहे कुछ भी हो। वो उसका चारा है।"
मुझे तब नहीं पता था कि वो किस चीज़ की बात कर रही थीं।
रात को पता चला।
"अपनी सीढ़ी पर मत जाना," सरला ने कहा।
दो बजकर सैंतालीस से ठीक पहले। उल्टे गाँव में। पनघट पर। कुएँ के उस उल्टे खंभे के पास, जिसमें पानी ऊपर की तरफ़ बहता था।
मैं अभी-अभी पानी के आईने के पार पलटकर आया था। छोटू मेरे साथ था। और सरला, गंगाधर का पोता और भोला वहाँ पहले से खड़े थे। इंतज़ार करते हुए।
"क्यों?"
"क्योंकि जैसे ही तुम अपनी सीढ़ी पर पैर रखोगे, वो तुम्हें पकड़ लेगी। सुबह तक।" सरला ने सीढ़ी के मुँह की तरफ़ इशारा किया। "पहली रात, जब तुम यहाँ आए थे, तुमने इक्कीसवीं पर पैर रखा और फिर गाँव में घूमे। याद है? तुम पकड़े नहीं गए थे, क्योंकि इक्कीसवीं किनारा है। पर उसके बाद हर रात तुम सीधे अपनी सीढ़ी पर गए, और वहीं जम गए।"
"तो अगर मैं न जाऊँ?"
"तो तुम आज़ाद हो। सुबह तक।" गंगाधर के पोते ने कहा। "पर सुबह से पहले तुम्हें अपनी सीढ़ी पर होना होगा। अट्ठाईसवीं पर। वरना..."
"वरना?"
भोला ने अपनी लाठी ज़मीन पर ठोकी। एक बार।
"वरना तुम यहीं रह जाओगे," उसने कहा। "हमारी तरह।"
छोटू ने मेरा हाथ पकड़ा। "मैं भी चलूँगा, भैया।"
"नहीं।"
"भैया—"
"तू दसवीं से ऊपर नहीं जा सकता, और मुझे नहीं पता तू कितना नीचे जा सकता है।" मैंने उसके गीले बालों में हाथ फेरा। "और मुझे किसी ऐसे की ज़रूरत है जो ऊपर नज़र रखे। अगर सुबह तक मैं नहीं लौटा..."
"तो?"
"तो अम्मा को बताना। और मामी को। और..." मेरी आवाज़ रुकी। "और गुड्डी को बताना कि उसके चाचा ने कोशिश की थी।"
छोटू की आँखें भर आईं। पर उसने सिर हिलाया।
"सुबह से पहले लौटना, भैया।"
"लौटूँगा।"
कुएँ के खंभे के नीचे एक छेद था।
मैंने उसे पहले कभी नहीं देखा था। पनघट के चबूतरे में, खंभे की जड़ के पास, एक पत्थर था जो बाक़ियों से अलग था। गोल। उस पर कुछ उकेरा हुआ था — एक घड़ा, और उसके नीचे लहरें।
भोला ने अपनी लाठी उसके किनारे पर फँसाई। और ज़ोर लगाया।
पत्थर खिसका। और नीचे अँधेरा था।
और उस अँधेरे से एक गंध आई। गीली मिट्टी। सड़ी हुई काई। और कुछ और — कुछ पुराना, बहुत पुराना, जैसे किसी बंद मंदिर के गर्भगृह की गंध, जहाँ सदियों से कोई दीया न जला हो।
और एक आवाज़।
हल्की। धीमी। लगातार।
हूँ...ह... हूँ...ह...
जैसे कोई बहुत बड़ी चीज़ साँस ले रही हो। बहुत धीरे। नींद में।
"वो है," सरला ने फुसफुसाया। "भूख। सो रही है। अभी।"
मैंने अपनी मुट्ठी खोली। घुँघरू।
वो गुनगुना रहा था। और जैसे ही मैंने उसे छेद के ऊपर रखा — उसकी गुनगुनाहट तेज़ हुई। एक दिशा में। जैसे कोई कुत्ता किसी गंध को पहचानकर खिंचता है।
नीचे की तरफ़।
"वो रास्ता जानता है," गंगाधर के पोते ने कहा। "माँ की पुकार इसी रास्ते से आती है। वो घुँघरू उसे पहचान रहा है। अपने घर का रास्ता।"
हम उतरे।
पहले सरला। फिर मैं। फिर गंगाधर का पोता और भोला, हाथ पकड़े।
छेद के नीचे सीढ़ियाँ नहीं थीं। बस एक ढलान। पत्थरों की, मिट्टी की, जड़ों की। और वो ढलान नीचे जाती थी, एक सुरंग में, जो इतनी सँकरी थी कि हमें झुककर चलना पड़ रहा था।
दीवारें गीली थीं। और जब मैंने उन्हें छुआ — अपने बाएँ हाथ से, संतुलन के लिए — वो नरम थीं।
पत्थर नरम नहीं होता।
मैंने अपनी बाईं आँख से देखा।
दीवारें पत्थर की थीं। पुरानी ईंटें। चूने से जुड़ी हुई। पर उस चूने में — हर जोड़ में, हर दरार में — बाल थे। काले। लंबे। चूने में घुले हुए। पौने तीन सौ बरस से। उसके केश खोल दिए गए और चूने में मिला दिए गए। पोथी ने कहा था।
ये सुरंग उसकी थी। उसके बालों से बनी।
और वो दीवारें — बहुत धीरे — ऊपर-नीचे हो रही थीं। जैसे किसी सोते हुए जानवर की पसलियाँ।
हूँ...ह... हूँ...ह...
"छूना मत," सरला ने कहा। बिना मुड़े। "जितना कम छुओगे, उतनी गहरी नींद।"
मैंने अपना हाथ हटा लिया।
सुरंग नीचे जाती रही।
और दीवारों पर चेहरे उभरने लगे।
पहले मुझे लगा ये मेरा वहम है। पत्थर की बनावट, पानी की लकीरें, अँधेरे में आँखों का धोखा। फिर मैंने बाईं आँख से देखा।
चेहरे थे। दीवार में उभरे हुए। पत्थर में। जैसे किसी ने उन्हें अंदर से दबाया हो।
एक बच्चे का। धोती में। मुझे वो कुछ जाना-पहचाना लगा — फिर मुझे समझ आया। गंगाधर का पोता। बारह बरस का। उसके बगल में एक और — भोला।
फिर और आगे। और चेहरे। अलग-अलग ज़मानों के। एक औरत, नथ पहने हुए। एक आदमी, पगड़ी में। एक लड़का, अंग्रेज़ों के ज़माने की किसी स्कूल की टोपी में।
"सब गिनने वाले," गंगाधर के पोते ने फुसफुसाया। "उसने हर एक को याद रखा है। दीवार में। जैसे कोई अपनी जीत की ट्रॉफ़ियाँ सजाता है।"
और आगे। एक लड़का, चौदह बरस का, हँसता हुआ। देवदत्त। उसके बाद एक लड़की, अठारह बरस की, शादी की मेहंदी के साथ। सरला।
सरला ने अपने चेहरे को दीवार में देखा। और आगे बढ़ गईं। बिना रुके।
फिर एक जवान आदमी, इक्कीस बरस का, घुँघराले बाल। रघु चाचा। उसके बगल में एक बच्चा, सफ़ेद कुर्ते में। शंकर।
फिर एक बच्चा, नीली कमीज़ में। छोटू।
और उसके बगल में — मैं रुक गया —
मैं।
बारह बरस का। माथे पर चोट। टेढ़ा दाँत। आँखें बंद। होंठ पर वो मुस्कान। उसकी मुस्कान।
और उसके बगल में, एक और चेहरा। नया। अभी-अभी उभरा हुआ। चूना अब भी गीला।
उनतीस बरस का। दाढ़ी बढ़ी हुई। बाईं आँख सफ़ेद।
मैं। आज का।
उसकी आँखें खुली थीं। और वो मुझे देख रही थीं।
"चलते रहो," गंगाधर के पोते ने कहा। मेरी पीठ पर हाथ रखते हुए। "उसे देखना बंद करो। वो अभी सिर्फ़ एक खरोंच है। पत्थर में उकेरी हुई नहीं।"
मैं चलता रहा।
और तब मुझे वो ताक दिखे।
सुरंग की दीवारों में छोटे-छोटे खोखले। जैसे किसी पुराने मंदिर में दीये रखने की जगह होती है। पर उनमें दीये नहीं थे।
उनमें चीज़ें थीं।
एक ताक में — मैंने बाईं आँख से देखा — चमड़ी का एक पतला-सा टुकड़ा। एक एड़ी की शक्ल का। मेरी। नौवीं रात, जब पत्थर ने मेरे पैरों की चमड़ी की एक परत अपने पास रख ली थी।
अगले ताक में — एक छोटा-सा, गोल, पानी जैसा चमकता हुआ कुछ। उसमें एक चेहरा था। एक आठ बरस के लड़के का। गोल-मटोल। एक दाँत टूटा हुआ। उसके होंठ हिल रहे थे। चौदह... चौदह... बबलू का प्रतिबिंब। जो गिलास की तली में रह गया था।
और अगले ताक में —
मेरी साँस रुक गई।
दो आँखें।
सफ़ेद नहीं। काली। तीखी। ज़िंदा। एक छोटे-से गड्ढे में, एक के बगल में एक, जैसे दो मोती।
और वो मुझे पहचान रही थीं।
"जीजी की," सरला ने फुसफुसाया। उनकी आवाज़ टूट गई। "जीजी की आँखें।"
अम्मा की आँखें। अट्ठावन में दी गई बाईं। और इस बार दी गई दाईं। वो यहाँ थीं। इस सुरंग में। एक ताक में। और वो देख रही थीं। अब भी।
"वो कभी कुछ पूरा वापस नहीं करती," मैंने धीरे से कहा। "पर वो कुछ फेंकती भी नहीं। वो सब रखती है।"
"वो सब इकट्ठा करती है," गंगाधर के पोते ने कहा। "दो सौ अस्सी बरस से। हर वो चीज़ जो किसी ने उसे दी, या उसने किसी से ली। अपने पिंजरे के आसपास। जैसे कोई चिड़िया अपना घोंसला बनाती है।"
मैंने अम्मा की आँखों की तरफ़ अपना हाथ बढ़ाया।
"नहीं," भोला ने कहा। उसने मेरी कलाई पकड़ी। "अभी नहीं। अगर तुमने उसकी कोई चीज़ छुई, तो वो जाग जाएगी।"
मैंने हाथ हटा लिया।
और वो दो काली आँखें मुझे जाते हुए देखती रहीं।
आगे एक और ताक था। बाक़ियों से बड़ा। और उसमें कुछ ऐसा था जिसे देखकर मेरे पैर अपने आप रुक गए।
एक छोटा-सा कैमरा। पुराना। रील वाला। उसका चमड़े का पट्टा गल चुका था, और उसके लेंस पर काई जमी थी।
दादाजी का कैमरा। जो पापा ने उन्हें दिल्ली से भेजा था। जिससे उन्होंने वो तस्वीर खींची थी। और जो वो उस दोपहर पीपल के पास भूल गए थे, और जिसे लेने वो लौटे थे।
मुझे कभी पता नहीं चला था कि वो कहाँ गया। अस्पताल में दादाजी ने कहा था कि खो गया।
वो यहाँ था। उसके पास। सत्रह बरस से।
और उसके अंदर — मुझे पता था, एक फ़ोटोग्राफ़र को पता होता है — रील अभी भी थी। उस दिन की। बाक़ी तस्वीरें। जो कभी डेवलप नहीं हुईं।
मेरा हाथ अपने आप उसकी तरफ़ बढ़ा।
उसे मत छूना। चाहे कुछ भी हो। वो उसका चारा है।
मैंने अपनी मुट्ठी भींच ली। और आगे बढ़ गया। बिना पीछे देखे।
"यहाँ तक," सरला ने कहा।
हम एक जगह पहुँचे थे जहाँ सुरंग चौड़ी हो जाती थी। एक छोटा-सा गोल कक्ष। उसकी दीवारें ऊपर की तरफ़ झुकी हुईं, जैसे किसी गुंबद के अंदर। और उसके बीच में, ज़मीन पर, एक दरार। गहरी। काली। जिसमें से वो साँसें आ रही थीं।
हूँ...ह... हूँ...ह...
अब बहुत पास। बहुत ज़ोर से। पूरे कक्ष की दीवारें उसके साथ ऊपर-नीचे हो रही थीं।
"पचहत्तर में मैं यहाँ तक आई थी," सरला ने कहा। "और यहाँ से आगे नहीं जा पाई। मेरे पैर जम गए। मैं डर गई।" उन्होंने अपने हाथों को देखा। "पर आज मैं डरी नहीं हूँ। मैं बस जानती हूँ कि मुझे कहाँ रुकना है।"
"आप नहीं आएँगी?"
"मैं यहाँ रहूँगी।" सरला दरार के किनारे बैठ गईं। पालथी मारकर। "और गाऊँगी।"
"गाएँगी?"
"वो गीत।" उन्होंने मुस्कुराने की कोशिश की। "सीढ़ी-सीढ़ी उतरी पनिहारिन। मैंने इक्यावन बरस में समझा है, बेटा। वो गीत बच्चों का खेल नहीं है। वो एक लोरी है। किसी ने उसे लोरी की तरह बनाया था। बहुत पहले। उस लड़की के लिए।" उन्होंने दरार की तरफ़ देखा। "और लोरी भूख को सुलाती है। जब मैं उल्टे गाँव में पनघट पर गाती हूँ, तो वो गहरी सोती है। मैंने ग़ौर किया है।"
उन्होंने अपनी आँखें बंद कीं। और गाना शुरू किया।
"सीढ़ी-सीढ़ी उतरी पनिहारिन, घड़ा लिया सिर पे, पाँव में पायल..."
और दरार से आती साँसें — धीमी हो गईं।
हूँ.....ह..... हूँ.....ह.....
"जाओ," सरला ने गाने के बीच में कहा। आँखें खोले बिना। "जितनी देर मैं गा सकती हूँ, उतनी देर वो सोएगी।"
हम आगे बढ़े। मैं, गंगाधर का पोता, भोला।
कक्ष के दूसरी तरफ़ एक और सुरंग थी। और सँकरी। इतनी सँकरी कि हमें रेंगना पड़ा। घुटनों के बल। दीवारें हमारे कंधों से छूती हुईं। नरम। साँस लेती हुईं। उनके बाल हमारी बाँहों पर सरसराते हुए।
घुँघरू मेरी मुट्ठी में तेज़ होता जा रहा था। उसकी गुनगुनाहट अब लगभग एक गीत थी। एक माँ की आवाज़। अपनी बेटी के पास पहुँचती हुई।
और पीछे से, बहुत दूर से, सरला का गीत। धीमा होता हुआ। दूर होता हुआ।
"...नाम दबा है पाँव के नीचे..."
सुरंग मुड़ी। नीचे। और नीचे।
और फिर ख़त्म हो गई।
एक छेद में। एक खुली जगह में।
और मैंने देखा।
वो जगह बहुत बड़ी नहीं थी। एक कुएँ जितनी। गोल। उसकी दीवारें ऊपर की तरफ़ जाती थीं — बहुत ऊपर — और उनके ऊपर, बहुत दूर, एक छत थी। पत्थर की। चिकनी।
नहीं। छत नहीं। एक शिला।
काली। विशाल। पूरी जगह को ढके हुए। और उसकी निचली सतह पर — जो हमारी तरफ़ थी — अक्षर खुदे थे। बड़े-बड़े। पुराने। उल्टे।
मैं उन्हें पढ़ नहीं पाया। वो बहुत ऊपर थे। और पानी की एक पतली परत उन पर बह रही थी, उन्हें धुँधला करती हुई।
और उस शिला के ठीक नीचे — उससे चिपकी हुई — दो पैर थे।
छोटे। नंगे। एक लड़की के। उनमें पायल नहीं थी। उनके टख़नों पर सिर्फ़ निशान थे, जहाँ कभी पायल रही होगी।
पैर ऊपर। शिला के नीचे दबे हुए।
और उनके नीचे — नीचे की तरफ़ लटकता हुआ — एक शरीर।
लाल जोड़ा। बहुत बड़ा, उसके छोटे-से शरीर पर। सोने का गोटा, जो अँधेरे में हल्का-सा चमक रहा था। दो बाँहें, नीचे की तरफ़ लटकती हुईं। और उनके नीचे —
एक सिर। नीचे की तरफ़। ज़मीन से बस कुछ इंच ऊपर।
और उसके बाल। कमर तक नहीं — ज़मीन तक। और ज़मीन में। और ज़मीन के आर-पार। हर दिशा में। पूरी जगह की दीवारों में। सुरंगों में। ऊपर। बावड़ी तक। गाँव तक। दुनिया तक।
पर उनमें से कुछ बाल — उसके सिर के ठीक पास, उसके चेहरे के आसपास — छोटे थे। कंधों तक। उसके अपने।
और उन्होंने उसका चेहरा ढक रखा था।
और उसके बगल में, उसी तरह उल्टे लटके हुए — बालों में लिपटे — दादाजी थे।
उनका चेहरा नीचे की तरफ़। उनकी सफ़ेद धोती उनके सीने पर गिरी हुई। उनके हाथ नीचे लटके हुए।
और उनका दायाँ हाथ — मैंने देखा — उस लड़की के बाएँ हाथ को थामे था।
दोनों की उँगलियाँ आपस में फँसी हुईं।
और दोनों रो रहे थे।
मैं कुछ नहीं बोल पाया। गंगाधर का पोता मेरे बगल में जम गया था। भोला ने अपनी लाठी कसकर पकड़ ली।
और तब दादाजी ने अपना सिर घुमाया। थोड़ा-सा। उल्टे लटके हुए। और मुझे देखा।
"विक्कू?" उन्होंने फुसफुसाया। "तू... तू यहाँ तक आ गया?"
"दादाजी—"
"श्श्श।" उन्होंने अपनी आँखें उस दरार की तरफ़ घुमाईं, जिससे हम आए थे। "धीरे। वो सो रही है। भूख। बहुत गहरी नींद में। मुझे खाने के बाद।"
"खाने के बाद?"
दादाजी ने कुछ नहीं कहा। पर मैंने उनके सीने की तरफ़ देखा। जहाँ धोती गिरी थी। और वहाँ — उनकी छाती पर — बाल घुसे हुए थे। अंदर। जैसे जड़ें किसी पेड़ में घुसती हैं।
"वो मुझसे पी रही है, बेटा," उन्होंने धीरे से कहा। "मेरी याद। मेरा पानी। धीरे-धीरे। मैं उसके लिए एक घड़ा हूँ।" उन्होंने मुस्कुराने की कोशिश की। "पर जब वो पीती है, तो वो सोती है। और जब वो सोती है..."
उन्होंने लड़की की तरफ़ देखा।
"...तो ये जागती है।"
"वो मुझसे बात करती है, बेटा," दादाजी ने धीरे से कहा। "जब भूख सोती है। टूटी-फूटी। जैसे कोई बहुत छोटा बच्चा, जिसे बोलना भूल गया हो।" उनकी आँखें लड़की के छोटे, झुके हुए सिर पर थीं। "पहली रात उसने मुझसे पूछा — मेरा नाम क्या है? मैंने कहा, मुझे पूरा नहीं पता, बिटिया। सुख... सुखन... और वो रोने लगी। कहा — माँ ऐसे ही बुलाती थी। सुखन। पर आगे का याद नहीं।"
उन्होंने लड़की का हाथ थोड़ा और कसकर पकड़ा।
"मैंने उससे कहा कि मेरा पोता आएगा। कि वो उसकी माँ की आवाज़ लाएगा। पूरी।" दादाजी की आवाज़ भर्राई। "उसने मुझसे पूछा — तेरा पोता भी गंगाधर जैसा है? और मैंने कहा — नहीं, बिटिया। वो तेरे जैसा है। वो भी सत्रह बरस अपना नाम भूलकर जिया है।"
लड़की ने अपना सिर हिलाया।
बहुत धीरे। उल्टी लटकी हुई। उसके छोटे बाल उसके चेहरे पर से थोड़ा खिसके। और मैंने उसकी ठोड़ी देखी। छोटी। गोल। एक बच्ची जैसी।
और उसके होंठ।
वो हिल रहे थे।
"...गंगाधर?..."
उसकी आवाज़ बहुत पतली थी। बहुत टूटी हुई। दो सौ अस्सी बरस से इस्तेमाल न हुई आवाज़। पर उसमें कोई भूख नहीं थी। कोई दोहरी गूँज नहीं।
बस डर।
उसने गंगाधर के पोते को देखा था। मिश्रों की वो आँखें। वो चेहरा। और उसके पीछे मुझे।
"...गंगाधर... फिर से... फिर से गाड़ने आए..."
उसका पूरा शरीर काँपने लगा। उल्टा लटका हुआ। उसकी छोटी-छोटी उँगलियाँ दादाजी की उँगलियों को और कसकर पकड़ने लगीं।
"नहीं, बिटिया," दादाजी ने कहा। बहुत नरमी से। जैसे किसी डरे हुए बच्चे को। "नहीं। ये गंगाधर नहीं है। ये मेरा पोता है। विक्रम। और ये..." उन्होंने गंगाधर के पोते की तरफ़ देखा, "...ये गंगाधर का पोता है। पर ये तुझसे माफ़ी माँगने आया है।"
लड़की ने दादाजी की तरफ़ देखा। फिर हमारी तरफ़।
"...माफ़ी?..."
"और ये," दादाजी ने मेरी मुट्ठी की तरफ़ देखा, "ये तेरी माँ की आवाज़ लाया है।"
लड़की जम गई।
उसके छोटे बाल — उसके अपने — उसके चेहरे पर से और खिसके। और मैंने उसकी आँखें देखीं।
नहीं। मैंने नहीं देखीं। मैंने अपनी आँखें बंद कर लीं। उससे पहले। जिस दिन तू मेरा चेहरा देखेगी, उस दिन तू मेरी हो जाएगी।
पर मैंने उसकी आवाज़ सुनी।
"...माँ?..."
और उसी पल, दरार की तरफ़ से — पीछे से, सुरंग से, बहुत दूर से — सरला का गीत रुक गया।
एक पल की चुप्पी।
और फिर साँसें।
हूँ-ह। हूँ-ह। हूँ-ह।
तेज़। बहुत तेज़। जैसे कोई जाग रहा हो।
"भागो!" दादाजी चिल्लाए। "अभी! वो जाग रही है!"
"दादाजी, आप—"
"मैं यहीं रहूँगा!" उनका चेहरा — उल्टा लटका हुआ — मेरी तरफ़ मुड़ा। "सुन, विक्कू! जल्दी सुन! घुँघरू अभी मत बजाना! अभी नहीं! अगर भूख जागते हुए उस आवाज़ को सुनेगी, तो वो उसे खा जाएगी! एक पल में! पूरी!"
"तो कब?"
"जब वो सोए! सबसे गहरी नींद!" दादाजी के सीने के बाल हिलने लगे। कसने लगे। "और वो सबसे गहरी नींद तभी सोती है, जब उसने पूरा पेट भरा हो। जब कोई नया चालीसवीं बना हो। उस रात। उस पल।"
मेरा दिल रुक गया।
"चालीसवीं की रात," दादाजी ने कहा। उनकी आवाज़ अब टूट रही थी। बाल उनके मुँह की तरफ़ बढ़ रहे थे। "जब कोई चालीसवीं बनेगा — उस पल भूख सबसे भारी होगी। सबसे गहरी नींद में। और तब, सिर्फ़ तब — घुँघरू बजाना। उसके कान में।"
"पर घुँघरू दस रात में ख़ाली हो जाएगा! मेरे पास बारह रातें हैं!"
दादाजी ने मुझे देखा। उल्टे लटके हुए। बालों में घिरे हुए। और उनकी आँखों में एक बहुत पुराना, बहुत थका हुआ दुख था।
"तो तुझे जल्दी उतरना होगा, बेटा," उन्होंने कहा। "किसी रात दो। जैसे सूरज उतरा था।"
भोला ने मेरी बाँह पकड़ी और खींचा। "चलो!"
हम सुरंग में घुसे। रेंगते हुए। पीछे की तरफ़। दीवारें अब नरम नहीं थीं। वो कस रही थीं। सिकुड़ रही थीं। उनके बाल हमारे चेहरों पर, हमारी बाँहों पर, हमारी गर्दनों पर लिपटने लगे।
मैंने अपने बाएँ हाथ से उन्हें हटाया। वो अंधे होकर टटोलते रहे।
पर गंगाधर के पोते और भोला के पास बायाँ हाथ नहीं था। उनके हाथ एक-दूसरे को पकड़े थे। उनकी गर्दनों पर बाल लिपटे। उनके टख़नों पर।
"छोड़ो मत एक-दूसरे को!" मैं चिल्लाया।
और तब मैंने देखा — जहाँ उनके हाथ जुड़े थे, वहाँ बाल नहीं टिक रहे थे। वो पास आते, और फिसल जाते। जैसे तेल पर पानी। जैसे छोटू के पैरों पर।
भरोसे के बिना वो कुछ नहीं बाँध सकती। और जो भरोसा उसके ख़िलाफ़ हो, वो उसे जलाता है।
दो सौ चौंसठ बरस पहले एक मिश्र के बेटे की जगह एक चरवाहे का बेटा नीचे गया था। और दो सौ चौंसठ बरस में उन दोनों ने एक-दूसरे को माफ़ किया था। और वो माफ़ी — वो हाथ, जो एक-दूसरे को थामे थे — भूख उसे छू नहीं सकती थी।
"हम ठीक हैं!" गंगाधर का पोता चिल्लाया। "भागो!"
हम कक्ष में पहुँचे।
सरला ज़मीन पर गिरी पड़ी थीं। दरार के किनारे। उनकी गर्दन पर बाल लिपटे हुए। उनका मुँह खुला, पर कोई आवाज़ नहीं निकल रही थी। बालों ने उनका गला बंद कर दिया था।
मैंने उन्हें अपने बाएँ हाथ से पकड़ा। और उनके गले के बालों को खींचा।
वो छूटे। सरला ने एक लंबी, हाँफती हुई साँस ली।
"मैं... मैं रुक गई थी," उन्होंने फुसफुसाया। "एक पल के लिए। जीजी की आँखें... मुझे याद आ गईं। उस ताक में। और मेरी आवाज़ टूट गई।"
"चलिए।"
हम ऊपर भागे। सुरंग में। झुककर। ताक — अम्मा की आँखें, बबलू का प्रतिबिंब, मेरी एड़ी की चमड़ी। दीवार के चेहरे — मेरा, छोटू का, रघु चाचा का। सब हमारे पीछे छूटते गए।
और पीछे से साँसें। तेज़। पास आती हुईं।
हूँ-ह। हूँ-ह। हूँ-ह।
और कुएँ का छेद। ऊपर। उल्टे गाँव की लालटेनों की हरी-पीली रोशनी।
भोला ने पहले मुझे धकेला। मैं उस छेद से बाहर निकला। पनघट पर। फिर सरला। फिर गंगाधर का पोता। फिर भोला।
और भोला ने अपनी लाठी से उस पत्थर को वापस धकेला। छेद पर।
धम्म।
छोटू पनघट पर था। उसकी आँखें डर से फैली हुईं।
"भैया! ऊपर सुबह हो रही है! अभी! तुम्हारी सीढ़ी—"
मैं सीढ़ी के मुँह की तरफ़ भागा। उल्टे गाँव में। नीचे। बाईसवीं। पच्चीसवीं। सत्ताईसवीं।
अट्ठाईसवीं।
मेरे पैर उस पर पड़े। और जम गए। एक पल की भी देर होती, तो शायद मैं भी उन उल्टे घरों में से किसी एक के दरवाज़े पर बैठा होता। किसी का इंतज़ार करता हुआ। हमेशा के लिए।
और उसी पल, ऊपर, पानी की छत पलटी। बावड़ी ने मुझे छोड़ा।
मैं ऊपर था। इक्कीसवीं पर। पानी में। फिर पहली सीढ़ी पर। फिर मुंडेर पर।
सुबह की पहली रोशनी। पीपल की घंटियाँ।
और मैं हाँफता हुआ धूल में गिरा।
अम्मा वहाँ थीं। दोनों पायलें उनकी गोद में।
उन्होंने अपना चेहरा मेरी तरफ़ घुमाया। और फिर — धीरे से — थोड़ा बाईं तरफ़। मेरे बगल में।
"विक्की," उन्होंने फुसफुसाया। "तेरे साथ कोई आया है।"
मैं उठकर बैठा। चारों तरफ़ देखा।
कोई नहीं था। बस मुंडेर। टीन। धूल।
और धूल में — मेरे गीले पैरों के निशानों के बगल में — छोटे-छोटे पैरों के निशान।
नंगे। एक लड़की के। बहुत छोटे। जिनमें पायल नहीं थी।
वो पानी से निकलकर मेरे पैरों के साथ-साथ चलकर आए थे। मुंडेर तक। और वहीं रुक गए थे।
मैंने अपनी परछाईं की तरफ़ देखा। सुबह की तिरछी धूप में। ज़मीन पर। लंबी।
और मेरी परछाईं के बगल में, उससे सटी हुई, एक और परछाईं थी।
छोटी। पतली। एक लड़की की। खुले बाल, कंधों तक।
और उसका हाथ मेरी परछाईं का हाथ पकड़े था।
मेरी जेब में घुँघरू — उसकी माँ की आवाज़ वाला — गुनगुना रहा था। पर घुँघरू नहीं बजा। देवदत्त वाला भी नहीं।
वो भूख नहीं थी।
वो लड़की थी। उसकी परछाईं। जो पहली बार — दो सौ अस्सी बरस में पहली बार — बावड़ी से बाहर आई थी।
किसी का हाथ पकड़कर।
अम्मा ने अपना हाथ बढ़ाया। धीरे से। मेरी परछाईं के बगल में। उस छोटी परछाईं की तरफ़। उनकी उँगलियाँ धूल पर पड़ीं, जहाँ वो छोटा-सा काला आकार था।
"कैसी है?" उन्होंने फुसफुसाया।
"छोटी," मैंने कहा। "बहुत छोटी। गुड्डी से थोड़ी ही बड़ी लगती है।"
अम्मा की उँगलियाँ उस परछाईं के किनारे पर रुकीं। और मैंने देखा — वो छोटी परछाईं सिकुड़ी। एक पल के लिए। जैसे डर गई हो। मेरी परछाईं के और क़रीब सरकी।
फिर, बहुत धीरे, उसका दूसरा हाथ — परछाईं का हाथ — अम्मा की उँगली की परछाईं की तरफ़ बढ़ा। और उसे छुआ।
अम्मा का पूरा शरीर काँप गया।
"ठंडी है," उन्होंने फुसफुसाया। "बहुत ठंडी। और... और डरी हुई। जैसे किसी ने इसे बहुत दिनों से छुआ न हो।"
उनकी सफ़ेद आँखों से पानी बहने लगा।
"दो सौ अस्सी बरस, विक्की। किसी ने उसे छुआ नहीं। सिवाय उन बालों के।"
भाग 28 समाप्त।
अगले भाग में — "उनतीसवीं सीढ़ी": विक्रम के सामने सबसे कठिन फ़ैसला। घुँघरू दस रातों में ख़ाली हो जाएगा। उसके पास बारह सीढ़ियाँ हैं। चालीसवीं की रात ही एकमात्र मौक़ा है। तो उसे किसी रात दो सीढ़ियाँ उतरनी होंगी — या किसी और को चालीसवीं बनने देना होगा, पहले। और उधर, उस लड़की की परछाईं, जो उसके साथ ऊपर आई है, गाँव में घूम रही है... अपनी माँ को ढूँढती हुई...
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