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भाग 27 — सत्ताईसवीं सीढ़ी

Piyashi Atma · Real Experiences · 20 मिनट

Writer
Piyashi Atma
Story
भानपुरा की बावड़ी - चालीस सीढ़ियाँ
Chapter
27 of 31
Category
Real Experiences
Reading time
20 min
Words
3995
Language
Hindi (हिंदी)
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Free to read

चालीस सीढ़ियाँ
भाग 27 — सत्ताईसवीं सीढ़ी
पहली रात दादाजी ने डायरी में लिखा था — अगर सुबह तू ख़ुद को सीढ़ियों पर पाए, तो नीचे मत देखना।
छब्बीस रातों तक मैंने उस नियम को सबसे बड़ा सच माना। मैंने ऊपर देखा। हर रात। उस धूसर, छोटे होते आसमान के टुकड़े को। और मैं सोचता था कि ऊपर देखना बस एक बचाव है। एक तरीक़ा नीचे की चीज़ से नज़र चुराने का।
उस सत्ताईसवीं रात मुझे समझ आया कि ऊपर देखना बचाव नहीं था।
वो याद दिलाना था।
कि ऊपर कोई है। कोई जो इंतज़ार कर रहा है। कोई जिसके लिए तुम्हें लौटना है।
नीचे वाले तुम्हें बुलाते हैं। ऊपर वाले तुम्हें थामे रखते हैं।
और उस रात, एक दुल्हन ने ऊपर देखा।
छन-छन-छन-छन।
पायल की आवाज़ पानी में उतरी। ऊपर से। मुंडेर से। बहुत सारे घुँघरू, एक साथ। एक लंबी, गहरी, गूँजती हुई लहर की तरह, जो हर सीढ़ी से टकराती हुई नीचे आई।
देवदत्त वाली पायल। जिसमें सारे घुँघरू थे। जो अड़सठ साल चालीसवीं पर, एक पत्थर के लड़के की मुट्ठी में रही थी।
और वो आवाज़ नीचे गई। तीसवीं के पार। पैंतीसवीं। अड़तीसवीं। उनतालीसवीं।
चालीसवीं तक।
मैंने अपनी बाईं आँख से देखा — बहुत नीचे, अँधेरे में, जहाँ रघु चाचा पत्थर बनकर खड़े थे।
वो पत्थर हिला।
धीरे से। बहुत धीरे से। जैसे कोई बहुत गहरी नींद से जाग रहा हो। उनका सिर — पत्थर का सिर, जो ऊपर की तरफ़ जमा हुआ था — थोड़ा-सा मुड़ा।
और उनकी आँखें खुलीं।
पत्थर की पलकें। चरमराती हुई। उनके नीचे से कुछ झाँका — गहरा, भूरा, ज़िंदा।
उन्होंने पायल की आवाज़ सुनी थी। अड़सठ साल वो आवाज़ उस जगह पर रही थी। पत्थर ने उसे याद रखा था। और अब, उसे सुनकर, वो पत्थर जाग गया था।
और उन्होंने ऊपर देखा। तीसवीं सीढ़ी की तरफ़। जहाँ मैं खड़ा था, एक औरत की कलाई पकड़े।
लाल जोड़े में। गीले सिंदूर के साथ। मेहंदी वाले हाथों के साथ।
उनकी पत्नी।
"सरोज।"
आवाज़ नीचे से आई। पत्थर में से। घिसटती हुई, भारी, जैसे दो चट्टानें आपस में रगड़ रही हों। पर उसके नीचे — मैंने पहचाना — रघु चाचा की आवाज़ थी।
चाची जम गईं।
उनकी गिनती रुक गई। उनके होंठ, जो "इकतीस" बोलने के लिए खुले थे, खुले ही रह गए।
और उनकी परछाईं — जो पनघट की लालटेन की रोशनी में सीढ़ी पर पड़ रही थी, जिसमें दादाजी के हाथ जुड़े हुए थे, जिसके किनारों से भूख के बाल निकल रहे थे — वो भी जम गई।
"सरोज, ऊपर देख।"
चाची ने नीचे देखा। आवाज़ की तरफ़। अपने पति की तरफ़।
"मैं आ रही हूँ," उन्होंने फुसफुसाया। "मैं आ रही हूँ, सुनो। बस नौ सीढ़ियाँ और।"
"नहीं।"
पत्थर की आवाज़ में कुछ टूटा।
"नीचे नहीं। ऊपर देख, सरोज। प्यारी अम्मा ने कहा न? एक बार। बस एक बार। ऊपर देख।"
चाची की आँखों में आँसू थे। उनकी कलाई मेरे हाथ में काँप रही थी।
और फिर — बहुत धीरे से — उन्होंने अपना सिर उठाया।
ऊपर।
ऊपर पानी की छत थी। उल्टे गाँव की। और उसके पार, बहुत ऊपर, बावड़ी के मुँह पर — चाँद।
पूरा। चाँदी का। टीन के हटे हुए हिस्से से झाँकता हुआ।
और चाँद के नीचे, पानी की सतह पर, चाची की परछाईं पड़ी थी।
पर अब चाची उसे नीचे से देख रही थीं। उल्टी तरफ़ से। जैसे कोई तालाब की तली से ऊपर देखे, और पानी की सतह पर तैरती चीज़ को उसके नीचे से देखे।
और नीचे से, वो परछाईं उनकी नहीं थी।
मैंने देखा। चाची ने देखा।
परछाईं का आकार उनका था। लंबा। पतला। खुले बाल। पर उसके अंदर, उसके बीचों-बीच, एक बूढ़ा आदमी था। घुटनों पर बैठा। हाथ जोड़े। आँखें बंद। प्रार्थना करता हुआ।
और उसके चारों ओर — परछाईं के हर किनारे से, हर कोने से, उसके पूरे आकार में लिपटे हुए — बाल थे।
काले। हज़ारों। एक जाल की तरह। एक मकड़ी के जाले की तरह, जिसमें कोई फँसा हो। वो दादाजी के चारों ओर लिपटे थे। उनकी बाँहों पर। उनकी गर्दन पर। उनके मुँह में जाते हुए। और वो परछाईं को नीचे की तरफ़ खींच रहे थे। पानी में। सीढ़ियों पर।
चाची की तरफ़।
और दादाजी को ये पता ही नहीं था। उनकी आँखें बंद थीं। वो प्रार्थना कर रहे थे। अपने बेटे के लिए। गाँव के लिए। मिश्रों के आख़िरी पाप के लिए।
और उनकी प्रार्थना के हर शब्द के साथ, बाल उनके मुँह में थोड़ा और गहरे जाते थे।
चाची ने एक आवाज़ निकाली। चीख़ नहीं। कुछ और। जैसे किसी की साँस अटक गई हो।
"बाबूजी," उन्होंने फुसफुसाया।
"वो नहीं जानते, चाची," मैंने कहा। "वो कुछ नहीं जानते।"
चाची ने अपनी परछाईं को देखा। वो जाल। वो बाल। वो बूढ़ा आदमी, बीच में फँसा हुआ, प्रार्थना करता हुआ।
फिर उन्होंने नीचे देखा। चालीसवीं की तरफ़। जहाँ रघु चाचा की पत्थर की आँखें उन्हें देख रही थीं।
"सरोज," रघु चाचा की आवाज़ फिर आई। अब धीमी। थकी हुई। "तीस बरस मैंने तेरा नाम नहीं लिया।"
चाची के होंठ काँपे।
"मुझे डर लगता था। कि अगर मैंने तेरा नाम लिया, तो वो तुझे भी याद कर लेगी। बाबूजी ने कहा था न — नाम एक रस्सी है। मैंने शंकर का नाम सुना था, उस रात। पीपल वाली सड़क पर। और फिर वो नीचे गया।" पत्थर में से एक आवाज़ आई, जैसे कोई सिसकी। "तो मैंने तेरा नाम कभी नहीं लिया। तीस बरस। ताकि तुझ तक कोई रस्सी न पहुँचे।"
चाची की आँखों से आँसू ऊपर की तरफ़ बहने लगे — उल्टे गाँव में, पानी की छत की तरफ़।
"आपको... आपको मुझसे प्यार था?"
"पहले दिन से।" पत्थर की आवाज़ में एक हल्की-सी हँसी थी। "जब तू डोली से उतरी थी, और तेरा घूँघट हवा में उड़ गया था, और तूने शरमाकर उसे दाँतों से पकड़ लिया था। पहले दिन से, सरोज।"
चाची ने अपना चेहरा अपने मेहंदी वाले हाथ से ढक लिया।
"और अब तू मेरे लिए नीचे आ रही है। उसी रस्सी पर। जिससे मैं तुझे तीस बरस बचाता रहा।" आवाज़ बहुत नरम हो गई। "मत आ, सरोज। मैं ठीक हूँ। यहाँ ठंड है, पर मैं ठीक हूँ। मैंने शंकर को ऊपर भेजा। मैंने सूरज को ऊपर भेजा। मैंने अपना क़र्ज़ चुका दिया।"
"अब तू ऊपर रह। मेरे लिए। बूढ़ी हो। धूप में बैठ। चाय बना।"
"और कभी-कभी, सुबह-सुबह, जब कोई न देखे — मेरा नाम ले लेना।"
चाची ने अपना हाथ चेहरे से हटाया।
उनका चेहरा आँसुओं से भीगा था। सिंदूर उनके गालों पर बह गया था, लाल लकीरों में। पर उनकी आँखें साफ़ थीं।
"रघुनाथ," उन्होंने कहा।
बस इतना। उनका नाम। तीस साल में शायद पहली बार उन्होंने भी अपने पति का नाम इतनी साफ़ आवाज़ में लिया था।
और नीचे, चालीसवीं पर, पत्थर में, कुछ मुस्कुराया।
फिर चाची ने अपनी परछाईं की तरफ़ देखा। ऊपर। पानी की सतह पर। जहाँ दादाजी बालों के जाल में घुटनों पर बैठे थे।
"मैं अपनी परछाईं वापस लेती हूँ," उन्होंने कहा।
आवाज़ ऊँची नहीं थी। पर पूरी बावड़ी में गूँजी।
"मैंने अपनी मर्ज़ी से दी थी। अब अपनी मर्ज़ी से वापस लेती हूँ।"
परछाईं काँपी।
पानी की सतह पर। एक झटके में। जैसे किसी ने उसे चाबुक मारा हो।
और उसमें से दो आवाज़ें आईं। एक साथ।
"सरोज, मत कर—" दादाजी की। बूढ़ी। घबराई हुई।
"—मत कर।" और उसके नीचे। गहरी। दोहरी। धरती के खिसकने जैसी।
और तब दादाजी ने आँखें खोलीं।
मैंने देखा। पानी की सतह पर। नीचे से। परछाईं के बीच में घुटनों पर बैठे उस बूढ़े आदमी ने अपनी आँखें खोलीं। और अपनी आवाज़ सुनी।
अपनी आवाज़। और उसके नीचे वो दूसरी आवाज़। जो बिल्कुल उसी लय में, उसी पल में, वही शब्द बोल रही थी।
उन्होंने पहली बार उसे सुना।
"दादाजी!" मैं चिल्लाया। पानी में। पूरी ताक़त से। "नीचे देखिए! अपने चारों तरफ़ देखिए!"
दादाजी ने नीचे देखा।
अपनी बाँहों को। जिन पर बाल लिपटे थे। अपनी छाती को। अपने घुटनों को, जो बालों के एक मोटे, काले गुच्छे पर टिके थे। और अपने मुँह के सामने — जहाँ बाल उनके होंठों से अंदर जा रहे थे।
उनकी आँखें फैल गईं।
और मैंने उनके चेहरे पर वो देखा जो मैंने कभी किसी इंसान के चेहरे पर नहीं देखा था। न डर। न दर्द।
पहचान।
एक बूढ़े आदमी की, जिसने अभी-अभी समझा कि वो इतने दिनों से किसकी प्रार्थना कर रहा था।
"मैं... मैं वही कर रहा था," दादाजी ने फुसफुसाया। अब उनकी आवाज़ अकेली थी। दूसरी आवाज़ रुक गई थी। "वही, जो गंगाधर ने किया। उसकी आवाज़ में। उसके कहने पर।"
बाल कसे। उनके चारों ओर। जैसे कोई जाल, जिसका शिकार भागने वाला हो।
"सत्रह बरस मैंने सोचा कि मैं उससे लड़ रहा हूँ।" दादाजी की आँखों से पानी बहा। "और मैं उसकी योजना पूरी कर रहा था। अपने ही पोते से चुराकर। अपनी ही बहू को नीचे भेजकर।"
और फिर उन्होंने कुछ किया।
उन्होंने अपने जुड़े हुए हाथ खोले।
और उनके दाएँ हाथ में कुछ था। छोटा। धातु का। गोल। जो पानी में हल्की, चाँदी जैसी रोशनी दे रहा था, और गुनगुना रहा था।
घुँघरू।
उस लड़की का। उसकी माँ की पुकार के साथ।
"बेटा," दादाजी ने कहा। मेरी तरफ़ देखते हुए। पानी के पार। परछाईं के पार। "बायाँ हाथ।"
मैंने अपना बायाँ हाथ उठाया। वही, जो चाची की कलाई पकड़े था।
नहीं। मैंने चाची की कलाई अपने दाएँ हाथ में ली। और बायाँ हाथ ख़ाली किया। ऊपर उठाया।
और दादाजी ने घुँघरू फेंका।
वो पानी में गिरा। धीरे-धीरे। चाँद की रोशनी में चमकता हुआ। गुनगुनाता हुआ।
और बाल उसकी तरफ़ झपटे।
परछाईं के किनारों से। सीढ़ियों की दरारों से। दीवारों से। हज़ारों। उस छोटे-से चमकते गोले की तरफ़।
पर वो मेरे बाएँ हाथ की तरफ़ गिर रहा था। और बाल — बाएँ को नहीं देखते।
उन्होंने टटोला। अंधों की तरह। चारों तरफ़। घुँघरू उनके बीच से फिसलता रहा। उनकी पकड़ से बचता रहा। जैसे किसी को पता हो कि उसे कहाँ जाना है।
और मेरी हथेली में आ गिरा।
मैंने मुट्ठी बंद की।
और ऊपर, पानी की सतह पर, परछाईं के बीच में, दादाजी मुस्कुराए। वही मुस्कान। जो मुझे बचपन में कहानियाँ सुनाती थी।
"उसकी माँ की आवाज़ उसे सुना देना, बेटा," उन्होंने कहा। "जैसे कन्हैया चाहता था। जैसे सुशीला चाहती थी। मैं गलत था। मिश्र हमेशा गलत थे।"
और फिर बालों ने उन्हें खींच लिया।
एक झटके में।
परछाईं से बाहर। चाची की परछाईं से। नीचे। पानी में। सीढ़ियों पर। तीसवीं। पैंतीसवीं। उनतालीसवीं। चालीसवीं के पार — रघु चाचा के पत्थर के बगल से, जिन्होंने अपनी पत्थर की आँखों से अपने पिता को गुज़रते देखा —
और उसके भी नीचे।
अँधेरे में। उस जगह, जहाँ कोई सीढ़ी नहीं थी। जहाँ वो उल्टी गड़ी थी।
मैंने उन्हें जाते देखा। अपनी बाईं आँख से। एक छोटा-सा, बूढ़ा आकार, बालों में लिपटा हुआ, अँधेरे में घुलता हुआ।
और उनकी आवाज़ आख़िरी बार आई। बहुत दूर से।
"...विक्कू..."
और फिर कुछ नहीं।
चाची की परछाईं पानी की सतह पर वापस सिकुड़ी। उनकी तरफ़। उनके पैरों तक। और उनसे फिर से जुड़ गई।
ख़ाली। सिर्फ़ उनकी। कोई बूढ़ा आदमी नहीं। कोई बाल नहीं।
और चाची ने अपने बाएँ कान को छुआ।
छब्बीस दिन से उससे हरा पानी रिसता था। कभी कम, कभी ज़्यादा। कभी ख़ून के साथ। उसमें से वो गाना सुनाई देता था, वो फुसफुसाहटें, वो दोहरी आवाज़।
वो सूखा था।
"बंद हो गया," चाची ने फुसफुसाया। हैरानी से। "पानी की आवाज़। बंद हो गई।"
"आपने भरोसा वापस लिया," मैंने कहा। "आपने उस योजना पर भरोसा किया था — दादाजी की, भूख की। और अब आपने उसे वापस ले लिया। तो खिड़की बंद हो गई।"
चाची ने अपने कान को फिर छुआ। फिर अपनी परछाईं को देखा।
फिर नीचे देखा। चालीसवीं की तरफ़।
रघु चाचा की पत्थर की आँखें अब भी खुली थीं। उन्हें देख रही थीं।
"मैं रोज़ सुबह तुम्हारा नाम लूँगी," चाची ने कहा। नीचे की तरफ़। "जब कोई न देखे। तुमने कहा था न।"
और पत्थर की आँखें धीरे-धीरे बंद हो गईं।
संतुष्ट।
हम ऊपर चढ़े।
चाची ने ख़ुद गिनती की। उल्टी। तीस से। "उनतीस... अट्ठाईस..." उनकी आवाज़ शांत थी। अपनी। बिना किसी दोहरी गूँज के।
और मैं उनके साथ। उनकी कलाई अब भी मेरे दाएँ हाथ में। घुँघरू मेरे बाएँ में।
अट्ठाईसवीं पर मेरे पैर अचानक भारी हो गए।
"क्या हुआ?" चाची ने पूछा।
"मेरी सीढ़ी," मैंने कहा। मुझे महसूस हो रहा था — मेरे टख़ने के निशानों में एक खिंचाव। नीचे की तरफ़ नहीं। ऊपर की तरफ़ भी नहीं। बस... यहाँ। "मैं आपके साथ तीस तक गया। पर वो मेरी गिनती नहीं थी। वो आपकी थी। मेरी गिनती मुझे वापस बुला रही है।"
"कहाँ?"
मैंने नीचे देखा। अपने पैरों को।
"सत्ताईसवीं पर।"
छब्बीस से एक आगे। मेरी अगली रात। बावड़ी ने मुझे मेरे अपने हिसाब से ही रखा था। जो सीढ़ियाँ मैंने किसी और के साथ उतरी थीं, वो मेरी नहीं गिनी गईं। पर जो रात बीत रही थी, वो गिनी गई।
"आप जाइए, चाची," मैंने कहा। "ऊपर। अम्मा वहाँ हैं। मैं सुबह आऊँगा।"
चाची ने मेरी कलाई छोड़ी। और मेरा चेहरा अपने दोनों हाथों में लिया। उनकी मेहंदी वाली हथेलियाँ। गीली।
"तूने मेरा हाथ नहीं छोड़ा," उन्होंने कहा। "जब मैंने तीन बार कहा।"
"नहीं छोड़ा।"
"तेरे चाचा भी ऐसे ही थे। ज़िद्दी।" वो मुस्कुराईं। आँसुओं के बीच। "मिश्र।"
और वो ऊपर चली गईं। अकेली। पर इस बार अकेली नहीं।
सत्ताईसवीं सीढ़ी।
मैं वहाँ बाक़ी रात खड़ा रहा। उल्टे गाँव में।
और दादाजी के बारे में सोचता रहा।
वो आदमी, जो मुझे सात बरस की उम्र में तारे गिनने से रोकता था। जो एक कैमरा लेकर बावड़ी पर आया था, और बच्चों पर भरोसा करके लौट गया था। जिसने अपने बेटे के लिए किसी और के बेटे का नाम लिया। जिसने सत्रह बरस एक दूसरी माँ के आँगन में बैठकर माफ़ी माँगी। जिसने अड़तीस रातें मेरी सीढ़ियाँ उतरीं। और जिसने आख़िर में, बालों के जाल में फँसे हुए, अपनी मुट्ठी खोली, और मेरी तरफ़ वो चीज़ फेंकी जिसके लिए उसने मेरा भरोसा तोड़ा था।
वो बुरे आदमी नहीं थे। वो बस एक ऐसे आदमी थे, जो हर बार सबसे कम बुरा रास्ता चुनते थे। और उस बावड़ी में, सबसे कम बुरा रास्ता भी हमेशा किसी न किसी को डुबोता था।
और शायद हम सब यही थे। मिश्र। पौने तीन सौ बरस से। सबसे कम बुरे रास्ते के क़ैदी। सीढ़ी के मुँह से कुछ नीचे। पनघट की लालटेन की रोशनी मुझ तक आती थी।
और मेरी परछाईं — सीढ़ी पर — अपनी जगह पर थी। मेरे पैरों से बँधी हुई। पर उसके हाथ अब जुड़े नहीं थे। वो बस मेरी नक़ल करती थी। एक आम परछाईं की तरह।
दादाजी उसमें से चले गए थे। पूरी तरह।
मैंने घुँघरू को अपनी आँखों के सामने रखा।
वो गुनगुना रहा था। वो लोरी। एक माँ की। पर मैंने ग़ौर किया — उसकी सतह पर एक बारीक-सी लकीर थी। एक दरार। पतली, टेढ़ी। जो पहले नहीं थी।
जब दादाजी ने उसे फेंका था, और बाल उस पर झपटे थे — किसी एक बाल ने उसे छुआ होगा। बस एक पल के लिए। और उसे चटका दिया होगा।
और उस दरार से, बहुत धीरे-धीरे, कुछ रिस रहा था।
आवाज़।
वो लोरी, जो पहले पूरे घुँघरू से आती थी, अब उस दरार से थोड़ी-थोड़ी बाहर निकल रही थी। पानी में घुलती हुई। जैसे किसी मटके में बारीक छेद हो, और उसका पानी बूँद-बूँद रिस रहा हो।
मैंने उसे अपनी मुट्ठी में कसकर बंद कर लिया। जैसे इससे रिसना रुक जाएगा।
नहीं रुका।
कुछ देर बाद पनघट की तरफ़ से क़दमों की आवाज़ आई। उल्टी। धीमी।
गंगाधर का पोता और भोला। हाथ पकड़े। और उनके पीछे सरला, अपनी लाल-पीली साड़ी सँभालती हुई।
वो सीढ़ी के मुँह पर रुके। मुझसे कुछ सीढ़ियाँ ऊपर।
"हमने देखा," गंगाधर के पोते ने कहा। "पूरे गाँव ने देखा। एक बूढ़ा आदमी, बालों में लिपटा, पनघट के पास से गुज़रा। नीचे। बहुत तेज़ी से। जैसे कोई पत्थर कुएँ में गिरता है।" उसकी पुरानी, मिश्रों वाली आँखें मुझ पर टिकीं। "रामेश्वर। मेरे रक्त का।"
"वो मेरे दादाजी हैं।"
"जानता हूँ।" उसने धीरे से सिर हिलाया। "दो सौ चौंसठ बरस में, पहली बार किसी को उस जगह तक ले जाया गया है। ज़िंदा — या जितना कोई यहाँ ज़िंदा होता है। भूख अपने शिकार को पत्थर बनाती है। या ज़ंजीर में बाँधती है। पर उसे अपने पास नहीं ले जाती। कभी नहीं।"
"तो क्यों ले गई?"
सरला आगे आईं। उन्होंने मेरी बंद मुट्ठी की तरफ़ देखा। जहाँ घुँघरू था।
"क्योंकि उसे डर है," उन्होंने कहा। "वो जानती है कि वो घुँघरू अब तेरे पास है। और वो जानती है कि तू उसे लेकर नीचे आएगा। तो उसने अपने सबसे पास एक ऐसा रखा है, जिसे तू कभी पीछे नहीं छोड़ेगा।"
"दादाजी। चारा।"
"या ढाल," भोला ने कहा। उसकी पतली, बहुत पुरानी आवाज़ में। पहली बार उसने मुझसे सीधे बात की थी। "जब तू वहाँ पहुँचेगा, तो तुझे लड़की के पास जाने से पहले अपने दादा के पास से गुज़रना होगा।"
"वो रास्ता मैं जानती हूँ," सरला ने कहा। "आधा। कुएँ के खंभे के नीचे से। ज़मीन के अंदर। पत्थरों के बीच। मैं आधे रास्ते तक गई थी। वहाँ से उसकी साँसें सुनाई देने लगती हैं। पत्थरों में। जैसे पूरी धरती साँस ले रही हो।"
"तो आगे?"
"आगे तू अकेला जाएगा," गंगाधर के पोते ने कहा। "या हमारे साथ। हम दोनों ने तय किया है।" उसने भोला का हाथ और कसकर पकड़ा। "दो सौ चौंसठ बरस मैंने उस लड़की से माफ़ी नहीं माँगी। अब माँगूँगा। उसके पास जाकर।"
"कब?"
"जब तू तैयार हो।" सरला ने ऊपर देखा। पानी की छत की तरफ़। "पर जल्दी। वो घुँघरू रो रहा है, बेटा। मैं उसकी आवाज़ सुन रही हूँ। वो हर पल थोड़ी धीमी हो रही है।"
वो तीनों वहाँ बैठे रहे। मेरे ऊपर। सीढ़ी पर। पूरी रात। किसी ने कुछ और नहीं कहा।
पर मैं अकेला नहीं था।
सुबह मैं ऊपर आया।
मुंडेर पर सब थे।
अम्मा — दोनों पायलें उनकी गोद में। सूरज — बैसाखी के सहारे, उसका चेहरा रात भर के रोने से सूजा हुआ। मामी — कन्हैया की नीली कमीज़ में, हाथ में चाची की चूड़ियाँ। और चाची।
वो अम्मा के बगल में बैठी थीं। लाल जोड़े में। सिंदूर गालों पर बहा हुआ। मेहंदी हथेलियों पर सूखी हुई। उनकी परछाईं उनके पैरों के पास, सुबह की धूप में, छोटी और काली।
उन्होंने मुझे देखा। और उठकर मेरे पास आईं। और मुझे गले लगा लिया।
उनका शरीर गर्म था।
छब्बीस दिनों में पहली बार।
"रात को क्या हुआ था ऊपर?" मैंने अम्मा से पूछा।
अम्मा ने अपनी गोद में रखी पायलों को छुआ। दोनों।
"जब सरोज नीचे उतरी," उन्होंने कहा, "सूरज पीछे-पीछे कूदने वाला था। अपनी पत्थर वाली टाँगों के साथ। मामी ने उसे पकड़ लिया। उसकी कमर से। पूरी ताक़त से। और वो दोनों मुंडेर पर गिर पड़े।"
सूरज ने नज़रें फेर लीं।
"और मैं वहाँ बैठी सुनती रही। उसकी गिनती। एक-एक सीढ़ी। दस। पंद्रह। बीस।" अम्मा की आवाज़ धीमी हो गई। "और मुझे देवदत्त की बात याद आई। उस दिन, जब वो चौबीसवीं पर था। उसने तुझसे कहा था न — अड़सठ बरस वो पायल उसकी मुट्ठी में रही। चालीसवीं पर। पत्थर में।"
"हाँ।"
"पत्थर आवाज़ याद रखता है, बच्चा। पानी की तरह।" उन्होंने देवदत्त वाली पायल उठाई। "अड़सठ बरस उस जगह ने ये आवाज़ सुनी थी। मैंने सोचा — अगर वो पत्थर, जो अब रघु है, इसे सुने... तो शायद वो जागे। शायद वो अपनी पत्नी को देखे।"
उन्होंने पायल को हल्के से हिलाया। छन्न।
"मैंने कभी किसी को जगाने के लिए इसे नहीं बजाया था," उन्होंने कहा। "अड़सठ बरस मैंने इसकी आवाज़ से डर रखा था। आज पहली बार मैंने इसे बुलाने के लिए बजाया। थामने के लिए नहीं।"
चाची ने अम्मा का हाथ पकड़ लिया। बिना कुछ कहे।
फिर वो उठीं। और घर गईं। और लौटीं — एक कटोरी लेकर। कल रात वाली खीर। ठंडी। ढकी हुई।
उन्होंने उसे मुंडेर के किनारे रखा। टीन के ठीक बगल में। बावड़ी की तरफ़।
"वो रात को देर से आते थे," उन्होंने धीरे से कहा। "ठंडी खीर खाना पसंद करते थे।"
और उन्होंने अपनी मेहंदी वाली हथेली एक पल के लिए टीन पर रखी। जैसे किसी दरवाज़े पर। फिर हटा ली।
"दादाजी," मैंने अम्मा से कहा। बाद में। जब चाची मामी के साथ घर चली गईं। "उसने उन्हें ले लिया। सबसे नीचे। चालीसवीं के भी नीचे।"
अम्मा ने अपनी सफ़ेद आँखें बावड़ी की तरफ़ उठाईं।
"मैंने देखा," उन्होंने धीरे से कहा। "पायल बजाते हुए। एक बूढ़ा आकार, नीचे जाता हुआ। बालों में लिपटा हुआ।" उन्होंने अपना सिर हिलाया। "रमेसर ने सत्तर बरस लड़ाई लड़ी, बच्चा। और आख़िर में उसने वही किया जो उसके पुरखे ने किया था। पर उसने देखा। आख़िरी पल में। और उसने घुँघरू तुझे दे दिया।"
"वो ज़िंदा हैं? मतलब... वो वहाँ हैं? या..."
"मुझे नहीं पता।" अम्मा ने अपनी पायलें उठाईं। "उस जगह के बारे में कोई नहीं जानता। जहाँ वो उल्टी गड़ी है। सरला आधे रास्ते से लौट आई थी। देवदत्त अड़सठ बरस उसके ऊपर खड़ा रहा, पर कभी नीचे नहीं गया।"
उन्होंने मेरी तरफ़ मुँह किया।
"पर तुझे जाना होगा, विक्की। वहाँ। उस लड़की तक। इससे पहले कि वो घुँघरू ख़ाली हो जाए।"
मैंने अपनी मुट्ठी खोली। घुँघरू। उसकी दरार। उसकी गुनगुनाहट।
रात से अब तक वो थोड़ी धीमी हो गई थी। बहुत थोड़ी। पर हो गई थी।
"कितना वक़्त है?" मैंने पूछा।
अम्मा ने घुँघरू को छुआ। उसे अपने कान के पास ले गईं। बहुत देर तक सुनती रहीं।
"एक माँ की आवाज़ है, बच्चा," उन्होंने कहा। "वो दो सौ अस्सी बरस चली। पर अब उसमें एक छेद है।" उन्होंने घुँघरू वापस मेरी हथेली में रखा। "शायद दस रातें। शायद कम।"
दस रातें।
मेरे पास बारह सीढ़ियाँ बची थीं। उनतालीसवीं तक।
दस रातें उस आवाज़ के लिए। बारह रातें मेरी गिनती के लिए। और दोनों गिनतियाँ एक-दूसरे के ख़िलाफ़ दौड़ रही थीं। अगर मैंने इंतज़ार किया, तो घुँघरू ख़ाली हो जाएगा। अगर जल्दी की, तो मुझे उस जगह तक पहुँचने का रास्ता ढूँढना होगा जहाँ कोई कभी नहीं पहुँचा।
मुझे गिनने से नफ़रत थी। और मेरी पूरी ज़िंदगी अब दो गिनतियों में सिमट गई थी।
घर लौटने से पहले मैं पुजारी के घर गया। गुड्डी को देखने।
वो आँगन में बैठी थी। शंकर की चारपाई के पास, ज़मीन पर। अपनी स्लेट लेकर। हरिहर शास्त्री उसके बगल में ऊँघ रहे थे — रात भर की लोरी के बाद।
स्लेट पर अब भी १ से ११ तक लिखा था। कुछ नया नहीं।
"बारह नहीं सीखा," गुड्डी ने गर्व से कहा। मेरे पूछने से पहले। "बाबा पूरी रात गाते रहे। दीदी खिड़की पर आई थी, पर अंदर नहीं आ पाई।"
फिर उसने मेरी तरफ़ देखा। और उसकी भौंहें सिकुड़ीं।
"चाचा, आपके बाबा कहाँ गए?"
मैं जम गया।
"कौन-से बाबा, बेटा?"
"जो आपके पीछे खड़े रहते थे। पिछली कई रातों से। खिड़की के बाहर से मुझे दिखते थे। एक बूढ़े बाबा। हाथ जोड़े हुए। आपकी परछाईं के पास।" उसने अपना सिर एक तरफ़ झुकाया। "आज वो नहीं हैं।"
मैंने अपनी परछाईं को देखा। धूप में। ज़मीन पर। अकेली।
"वो नीचे गए हैं, गुड्डी," मैंने कहा। "एक लड़की के पास। जो बहुत रो रही है।"
गुड्डी ने इस बात पर गंभीरता से सोचा।
"तो वो उसे चुप कराएँगे?" उसने पूछा। "बाबा लोग रोते हुए बच्चों को चुप कराते हैं।"
मेरे पास कोई जवाब नहीं था।
घर लौटकर मैंने दादाजी की डायरी खोली।
आख़िरी पन्ना। जहाँ उन्होंने लिखा था — मिश्रों का आख़िरी पाप मैं अपने सिर लूँगा।
उसके नीचे कुछ नहीं था। कोई नई पंक्ति नहीं। कोई हरी स्याही नहीं।
मैंने इंतज़ार किया। एक घंटा। दो घंटे। पूरी दोपहर।
कुछ नहीं।
शाम को, जब मैं डायरी बंद करने वाला था, पन्ने पर कुछ उभरा।
हरी स्याही। गीली। पर दादाजी की लिखावट नहीं।
टेढ़े-मेढ़े, बड़े-बड़े अक्षर। किसी बच्चे के। कुछ अक्षर उल्टे। मात्राएँ ग़लत जगह।
वही लिखावट, जो मैंने दूसरी सुबह देखी थी। और जिसे मैंने उसकी समझा था।
पर इस बार मेरी जेब में घुँघरू चुप था।
"भैया, बाबा को वो सबसे नीचे ले गई है। जहाँ वो है। मैंने देखा।
बाबा ज़िंदा हैं। मतलब, जितना कोई यहाँ ज़िंदा होता है।
वो उसके पास हैं। लड़की के पास। उल्टे। उसके बगल में। और वो रो रहे हैं।
पर भैया — वो लड़की भी रो रही है। और वो बाबा का हाथ पकड़े है।
जल्दी आना।
— कन्हैया"
भाग 27 समाप्त।
अगले भाग में — "अट्ठाईसवीं सीढ़ी": घुँघरू रिस रहा है। दस रातें, शायद कम। और विक्रम को उस जगह तक पहुँचना है जहाँ कोई कभी नहीं गया — उल्टे गाँव के भी नीचे, जहाँ वो लड़की उल्टी गड़ी है, और अब उसके बगल में दादाजी हैं। सरला, गंगाधर का पोता और भोला रास्ता दिखाने को तैयार हैं। पर उस रास्ते पर भूख की साँसें पत्थरों में सुनाई देती हैं...

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