Pretika › Real Experiences › भानपुरा की बावड़ी - चालीस सीढ़ियाँ
भाग 26 — छब्बीसवीं सीढ़ी
Piyashi Atma · Real Experiences · 20 मिनट
- Writer
- Piyashi Atma
- Story
- भानपुरा की बावड़ी - चालीस सीढ़ियाँ
- Chapter
- 26 of 31
- Category
- Real Experiences
- Reading time
- 20 min
- Words
- 3991
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
हर बलिदान में कोई और भी होता है।
हम कहानियों में सिर्फ़ उसे याद रखते हैं जो बलिदान करता है। जो अपनी जान देता है, अपना घर छोड़ता है, अपना सब कुछ लुटा देता है। हम उसके लिए गीत गाते हैं। उसकी मूर्ति बनाते हैं।
पर हर बलिदान के पीछे कोई और खड़ा होता है। कोई, जिसने उसे वो रास्ता दिखाया। कोई, जिसके कंधे पर उस बलिदान की क़ीमत गिरी। कोई, जिसका नाम किसी गीत में नहीं आता।
गंगाधर ने अपने पोते को बचाया। गीतों में गंगाधर है। भोला नहीं।
उस छब्बीसवीं रात मुझे पता चला कि दादाजी भी एक बलिदान करना चाहते थे। मिश्रों का आख़िरी बलिदान।
और उसकी क़ीमत किसके कंधे पर गिरने वाली थी, वो मुझे सबसे आख़िर में पता चला।
"बाबूजी सपने में आए थे।"
चाची ने ये बात सुबह चाय देते हुए कही। बहुत सहज ढंग से। जैसे कोई मौसम की बात करता है।
मैं आँगन में बैठा था। रात भर पनघट पर जागने के बाद, दादाजी की चिट्ठी पढ़ने के बाद, मेरी आँखें जल रही थीं। मैंने चाय का गिलास पकड़ा और रुक गया।
"क्या कहा उन्होंने?"
चाची मेरे सामने बैठ गईं। तुलसी के पास। उनके हाथ में वो पीतल का लोटा था — चाचा वाला — जिसे उन्होंने चार दिन से नहीं छोड़ा था। और उनकी गोद में, खुली हुई, दादाजी की डायरी।
मैंने उसे कल रात अपने कमरे की मेज़ पर छोड़ा था।
"कहा कि तेरे चाचा लौट सकते हैं," चाची ने कहा। और उनकी आवाज़ में कुछ था जो मैंने चार दिन में नहीं सुना था। उम्मीद। "कहा कि एक रास्ता है। पुराना। जो गंगाधर बाबा ने इस्तेमाल किया था।"
मेरे हाथ से चाय का गिलास लगभग गिर गया।
"चाची—"
"कहा कि बस किसी को उनकी गिनती लेनी होगी। उनकी जगह गिनना होगा। एक ही रात में। और फिर वो चालीसवीं पर जाएँगे, और रघु ऊपर आएँगे।" चाची ने अपनी उँगलियाँ डायरी के पन्ने पर फेरीं। "और उन्होंने पूछा कि क्या मैं वो करूँगी।"
"आपने क्या कहा?"
चाची ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखें सूखी थीं। स्थिर। उनमें कोई डर नहीं था।
"मैंने कहा — हाँ, बाबूजी।"
मैंने डायरी उनकी गोद से ले ली।
आख़िरी पन्ना। दादाजी की चिट्ठी के नीचे — मिश्रों का आख़िरी पाप मैं अपने सिर लूँगा — एक और पंक्ति थी। नई। हरी स्याही में।
"बहू, तू पढ़ रही है, जानता हूँ। पानी सब सुनता है, और तेरा कान अब भी खुला है। मुझे तेरी ज़रूरत है।"
और उसके नीचे, चाची की लिखावट में — काँपती हुई, टेढ़ी, जैसे बहुत सालों बाद किसी ने क़लम पकड़ी हो — दो शब्द।
"हाँ, बाबूजी।"
"चाची, आप नहीं जानतीं इसका मतलब क्या है।"
"जानती हूँ।" उन्होंने लोटे को अपनी छाती से लगाया। "बाबूजी ने सपने में सब बताया। कि मैं एक ही रात में चालीस गिनूँगी। कि मैं उन्हें अपने अंदर लेकर नीचे जाऊँगी। कि जब मैं उनतालीसवीं पर पहुँचूँगी, तो वो मुझसे अलग होकर चालीसवीं पर जाएँगे। और रघु की जगह लेंगे।"
"और आप?"
चाची ने कुछ नहीं कहा।
"आप उनतालीसवीं पर रह जाएँगी, चाची। पत्थर बनकर। हमेशा के लिए। जैसे सूरज बन रहा था।"
"जानती हूँ," उन्होंने फिर कहा। बहुत शांति से।
"क्यों?"
मैं खड़ा हो गया था। मुझे पता नहीं चला कब। मेरी आवाज़ ऊँची हो गई थी।
"क्योंकि मेरा पति नीचे पत्थर है, विक्की।" चाची ने अपना चेहरा उठाया। "तीस बरस की शादी। तीस बरस उसने कभी मेरा नाम नहीं लिया। और आख़िरी रात, चूल्हे के पास, उसने मेरा हाथ पकड़ा और कहा — सरोज, तुम्हारी चाय बहुत अच्छी बनी थी।" उनका होंठ काँपा। "और फिर वो चला गया। अपनी मर्ज़ी से। सूरज के लिए। गुड्डी के लिए। किसी और की बेटी के लिए।"
उन्होंने लोटे को देखा।
"वो लोटा ख़ाली रहता है। चार दिन से। मैं भरती हूँ, वो ख़ाली हो जाता है। वो प्यासा है, विक्की। नीचे। पत्थर में। मैं उसकी प्यास महसूस कर सकती हूँ।" उन्होंने अपना कान छुआ, वो जिससे हरा पानी रिसता था। "इस कान से। रात को। वो पानी माँगता है। मेरा नाम लेकर।"
"चाची, वो आवाज़ शायद चाचा की नहीं—"
"मुझे परवाह नहीं!" पहली बार चाची की आवाज़ ऊँची हुई। "मुझे परवाह नहीं कि वो किसकी आवाज़ है! अगर एक प्रतिशत भी मौक़ा है कि वो लौट सकते हैं, तो मैं वो करूँगी। तू मुझे नहीं रोक सकता।"
मैं फिर से बैठ गया। उनके सामने।
"चाची, दादाजी जो करना चाहते हैं — वो उस लड़की को हमेशा के लिए बाँध देगा। उस पनिहारिन को। जो दो सौ अस्सी बरस से अपनी माँ को ढूँढ रही है। और उल्टे गाँव के सैकड़ों लोगों को भी। वो सब पत्थर हो जाएँगे।"
चाची ने मुझे देखा। बहुत देर तक।
"मुझे किसी लड़की से क्या, बेटा?" उन्होंने धीरे से कहा। "मुझे किसी उल्टे गाँव से क्या? मैं उन्हें नहीं जानती। मैंने उन्हें कभी नहीं देखा।" उन्होंने लोटे को और कसकर पकड़ा। "मैं अपने पति को जानती हूँ। तीस बरस। उसकी खाँसी। उसके चलने का तरीक़ा। उसकी चाय में दो चम्मच शक्कर। और वो पत्थर बनकर नीचे खड़ा है।"
मेरे पास कोई जवाब नहीं था।
क्योंकि वो सही थीं। अपनी जगह से। पूरी तरह।
छब्बीस दिन से मैं इस गाँव में हर किसी को बचाने की कोशिश कर रहा था। गुड्डी को। बबलू को। सूरज को। उस लड़की को। उल्टे गाँव के लोगों को। और हर बार, किसी न किसी को बचाने का मतलब था किसी और को छोड़ देना।
और अब एक औरत मेरे सामने बैठी थी, जो सिर्फ़ एक इंसान को बचाना चाहती थी। अपने पति को। और वो इसके लिए अपने आप को छोड़ने को तैयार थी।
मैं उससे कैसे कहूँ कि वो ग़लत है?
मैं उनसे नहीं कह सकता था कि एक अनजान लड़की उनके पति से ज़्यादा ज़रूरी है। मैं उनसे नहीं कह सकता था कि उल्टे गाँव के मरे हुए लोग उनकी उम्मीद से ज़्यादा क़ीमती हैं।
और मैं उनसे ये भी नहीं कह सकता था कि दादाजी की योजना असल में भूख की योजना है। क्योंकि उनका कान खुला था। और जो भी मैं कहता, वो नीचे तक जाता।
मैं अम्मा के घर गया। चाची के कान से दूर।
मामी वहाँ थीं। उन्होंने मुझे देखा और उनकी आँखें भर आईं।
"मुझे माफ़ कर दे, विक्की," उन्होंने कहा। "मैंने दे दिया। तेरी शक्ल थी, तेरी आवाज़ थी, और उसने वही शब्द कहे जो कन्हैया ने..."
"आपकी ग़लती नहीं थी, मामी।" मैंने उनका गर्म हाथ पकड़ा। "पानी सब सुनता है। उन्होंने सब सुना था।"
मैंने उन्हें और अम्मा को चाची के बारे में बताया। सपना। डायरी। हाँ, बाबूजी।
अम्मा बहुत देर तक चुप रहीं। फिर उन्होंने धीरे से कहा:
"जिसने धरोहर ली है, बच्चा, उससे धरोहर छीनी नहीं जा सकती। उसे अपनी मर्ज़ी से लौटानी होगी। वैसे ही, जैसे उसने अपनी मर्ज़ी से ली थी।"
"चाची नहीं लौटाएँगी।"
"नहीं।" अम्मा ने अपनी दोनों पायलें उँगलियों में घुमाईं। "कोई भी औरत, जिसे अपने पति को लौटाने का एक रास्ता मिले, उसे नहीं लौटाएगी।" उन्होंने अपनी सफ़ेद आँखें मेरी तरफ़ घुमाईं। "मैंने अड़सठ बरस एक धागा नहीं लौटाया, विक्की। मैं उससे कैसे कहूँ कि वो एक डायरी लौटा दे?"
फिर भी मैंने कोशिश की।
शाम को मैं घर लौटा। चाची रसोई में थीं। डायरी उनकी कमर में खुँसी हुई थी, साड़ी के पल्लू के नीचे। मैंने उनसे माँगी। बहुत नरमी से। फिर ज़ोर से। फिर हाथ जोड़कर।
उन्होंने मुझे देखा। और मुस्कुराईं। एक बहुत थकी हुई, बहुत शांत मुस्कान।
"सो जा, विक्की," उन्होंने कहा। "कल तेरी सत्ताईसवीं है। आराम कर ले।"
और वो अपने कमरे में चली गईं। और कुंडी लगा ली।
सूरज और मामी ने तय किया कि वो रात भर चाची के दरवाज़े के बाहर बैठेंगे। सूरज अपनी बैसाखी के साथ। मामी अपने गर्म हाथों के साथ। "जैसे ही कुछ हो," सूरज ने कहा, "हम दरवाज़ा तोड़ देंगे।"
मुझे लगा ये काफ़ी होगा।
मैं ग़लत था।
"वो रास्ता," गंगाधर के पोते ने कहा, "मेरे पितामह ने इस्तेमाल किया था।"
दोपहर थी — नहीं, दोपहर ऊपर थी। मैं उल्टे गाँव में था। पर अभी दो बजकर सैंतालीस नहीं हुए थे।
नहीं — मैं ग़लत कह रहा हूँ। मुझे वक़्त का हिसाब गड़बड़ाने लगा था। छब्बीस रातें। उल्टी दुनिया। रुका हुआ वक़्त। कभी-कभी मुझे याद नहीं रहता था कि मैं कब कहाँ हूँ।
पर ये बातचीत मुझे याद है। उस रात। दो बजकर सैंतालीस के बाद। छब्बीसवीं सीढ़ी पर।
छब्बीसवीं। शंकर की सीढ़ी। जहाँ वो चौंतीस साल खड़ा रहा था। अब ख़ाली। सिर्फ़ पत्थर पर एक हल्का-सा निशान, दो छोटे पैरों का।
गंगाधर का पोता और भोला मेरे पास बैठे थे। सीढ़ी के ऊपर वाले किनारे पर। हाथ पकड़े।
"गिनती सौंपना," उसने कहा। "संवत् अठारह सौ उन्नीस। जब मैं सत्रहवीं पर था, पितामह भोला के पास गए।"
भोला ने अपना सिर झुका लिया।
"उन्होंने मुझे अपना जनेऊ दिया," भोला ने धीरे से कहा। उसकी पतली, पुरानी आवाज़ में। "मेरे हाथ में। कहा — भोला, इसे पकड़ ले। और चालीस तक गिनकर लौटा देना।" उसने अपनी ख़ाली हथेली देखी। "मैं आठ बरस का था। पंडित जी ने मुझे जनेऊ दिया था। मैं इतना ख़ुश था। मैंने कहा — हाँ, पंडित जी। मैं ले जाऊँगा।"
"और उसी से," गंगाधर के पोते ने कहा, "मेरी गिनती उसके पास चली गई। उसने धरोहर ली। भरोसे से। और उसके साथ मेरा बोझ भी।"
"जनेऊ से?"
"धरोहर किसी भी चीज़ की हो सकती है। बस उसमें देने वाले का कुछ होना चाहिए। उसकी पहचान।" उसने मेरी तरफ़ देखा। "और लेने वाले को कहना होगा — मैं इसे ले जाऊँगा। अपनी मर्ज़ी से। भरोसे से।"
"चाची ने लिखा था — हाँ, बाबूजी।"
गंगाधर के पोते का चेहरा पीला पड़ गया।
"तो वो धरोहर ले चुकी है," उसने फुसफुसाया।
"कौन-सी धरोहर?"
"उसके पास उसके ससुर का कुछ है? कुछ ऐसा, जो उन्होंने बहुत बरस इस्तेमाल किया हो?"
मैंने सोचा। दादाजी का कमरा। उनका बक्सा। उनकी डायरी—
डायरी।
चाची की गोद में। सुबह। खुली हुई। जिस पर उन्होंने अपने हाथ से लिखा था।
"डायरी," मैंने कहा।
"गिनती सौंपने के बाद," गंगाधर के पोते ने कहा, "जिसने धरोहर ली है, वो किसी भी रात गिन सकता है। एक ही साँस में। चालीस तक।" उसने नीचे देखा। अँधेरी सीढ़ी की तरफ़। "और जब वो गिनता है, तो देने वाला उसके अंदर होता है। उसके शरीर में। नीचे जाता हुआ। उसके साथ।"
"और उनतालीसवीं पर?"
भोला ने अपनी आँखें बंद कर लीं।
"उनतालीसवीं पर देने वाला अलग हो जाता है," गंगाधर के पोते ने कहा। "और आगे बढ़ता है। चालीसवीं पर। और लेने वाला..." उसकी आवाज़ टूट गई। "लेने वाला उनतालीसवीं पर रह जाता है। उसके पैर पत्थर में धँस जाते हैं। वो न ऊपर जा सकता है, न नीचे। न पूरा मरता है, न पूरा जीता है।"
मैंने भोला की तरफ़ देखा।
"पितामह ने मुझे बचा लिया," गंगाधर के पोते ने कहा। "पर उस रात भोला ने मेरी गिनती गिनी। मेरा बोझ उठाया। उनतालीसवीं तक। और वहीं रह गया।" उसने भोला का हाथ और कसकर पकड़ा। "जब तक सत्रह बरस बाद अगले गिनने वाले ने चालीसवीं पर पैर नहीं रखा और ज़ंजीर हिली, तब तक वो वहाँ खड़ा रहा। अकेला। पत्थर में। फिर वो यहाँ आया। इस गाँव में। और मैं... मैं जब बूढ़ा होकर मरा, तो उसे ढूँढता हुआ आया।"
"चाची आज रात गिनेंगी," मैंने कहा। अपने आप से। जैसे ये बात ज़ोर से कहने से वो सच हो जाएगी। या झूठ।
"शायद," गंगाधर के पोते ने कहा। "या कल। या परसों। तुम्हारे दादाजी तय करेंगे। जब वो तैयार होंगे।"
"मुझे उन्हें रोकना होगा। दादाजी को। कहाँ हैं वो?"
गंगाधर के पोते ने पनघट की तरफ़ इशारा किया।
कुएँ का वो उल्टा खंभा। पानी ऊपर की तरफ़ बहता हुआ।
और उसके पास, चबूतरे पर, कोई बैठा था। सफ़ेद धोती। कंधे पर गमछा। घुटनों पर एक डायरी — यहाँ वाली, नीचे वाली। और उनकी दाईं मुट्ठी बंद थी।
और उस बंद मुट्ठी से एक हल्की-सी गुनगुनाहट आ रही थी। एक लोरी की।
मैं सीढ़ियाँ चढ़कर पनघट तक गया। छब्बीसवीं से पच्चीसवीं। चौबीसवीं। तेईसवीं। बाईसवीं। मेरे पैर भारी थे — बावड़ी मुझे मेरी सीढ़ी से बाँधती थी, पर उल्टे गाँव में उसकी पकड़ थोड़ी ढीली थी। मैं चल सकता था। धीरे-धीरे।
रास्ते में, उल्टी गली के किनारे, वो मोटी औरत खड़ी थी। पूरियों वाली। उसकी थाली ख़ाली थी। उसने मुझे देखा, और इस बार उसने मेरा नाम नहीं पुकारा।
"गंगाधर के पोते," उसने धीरे से कहा। "एक बात सुन।"
मैं रुका। पर उसकी तरफ़ मुड़ा नहीं।
"रमेसर हर रात उस चबूतरे पर बैठता है," उसने कहा। "लिखता रहता है। और मैंने देखा है — जब वो लिखता है, तो उसके कान के पास पानी हिलता है। खंभे से एक पतली-सी धार निकलकर उसके कंधे तक जाती है। जैसे कोई उसके कान में कुछ कह रहा हो।" उसने अपनी ख़ाली थाली को सीने से लगाया। "मैंने सवा सौ बरस उस धार को देखा है, बेटा। वो मेरे कान के पास भी आई थी। अठारह सौ नब्बे में। जब उसने मुझसे कहा था कि अगर मैं अपने बेटे को एक पूरी खिला दूँ, तो वो हमेशा मेरे पास रहेगा।"
उसकी आवाज़ टूट गई।
"वो हमेशा वही कहती है जो तुम सुनना चाहते हो। अपने दादा से कहना।"
मैंने सिर हिलाया। और आगे बढ़ गया।
पीछे से उसकी आवाज़ आई। बहुत धीमी। जैसे अपने आप से।
"...और अगर वो ये नहीं समझता, तो उसे उसके बेटे की याद दिलाना। जिसने किसी की नहीं सुनी। सिर्फ़ अपनी।"
दादाजी ने मुझे आते देखा। उन्होंने उठने की कोशिश नहीं की।
"आ गया, बेटा," उन्होंने कहा। बिना नाम लिए।
मैं उनके सामने खड़ा हुआ।
"आपने मेरी परछाईं पहनी।"
"हाँ।"
"आपने मामी से झूठ बोला।"
"हाँ।"
"आपने चाची से कहा कि वो आपकी गिनती लें।"
दादाजी ने अपनी आँखें नीचे कर लीं। "हाँ।"
"वो उनतालीसवीं पर पत्थर बन जाएँगी, दादाजी। हमेशा के लिए। भोला की तरह।"
दादाजी ने अपने पास बैठे भोला की तरफ़ देखा — वो और गंगाधर का पोता मेरे पीछे-पीछे आ गए थे — और उनके चेहरे पर एक दर्द आया।
"जानता हूँ," उन्होंने धीरे से कहा। "और सरोज भी जानती है। मैंने उससे कुछ नहीं छुपाया। सपने में। मैंने उसे सब बताया। उनतालीसवीं। पत्थर। सब।" उन्होंने अपनी बंद मुट्ठी को देखा। "और उसने तब भी हाँ कहा।"
"क्योंकि वो चाचा को वापस चाहती हैं।"
"क्योंकि वो अपने पति से प्यार करती है।" दादाजी ने ऊपर देखा। मेरी आँखों में। "जैसे रामप्यारी देवदत्त से करती थी। जैसे सुशीला कन्हैया से करती है। इस गाँव की हर औरत किसी न किसी के लिए उस पानी में उतरने को तैयार है, बेटा। मैं उससे कुछ छीन नहीं रहा। मैं उसे वो दे रहा हूँ जो वो चाहती है।"
"दादाजी," मैंने कहा, "ये योजना आपकी नहीं है।"
उन्होंने भौंहें सिकोड़ीं।
"ये उसकी है। भूख की।"
दादाजी हँसे। एक छोटी-सी, थकी हुई हँसी। "बेटा, भूख मुझे ऐसा रास्ता क्यों दिखाएगी, जिससे वो ख़ुद बँध जाए? हमेशा के लिए?"
"क्योंकि उसे बँधने से डर नहीं लगता।" मैंने उनके सामने घुटनों के बल बैठकर कहा। "उसे डर लगता है लड़की के अलग होने से। गंगाधर ने लिखा था — भरोसे के बिना, पिंजरे के बिना, वो कुछ नहीं। अगर लड़की माफ़ कर दे, अलग हो जाए, तो भूख मिट जाएगी। पर अगर आप नाम पढ़ें — तो लड़की हमेशा के लिए उसके साथ बँधेगी। पत्थर में। एक ऐसा पिंजरा, जो कभी नहीं टूटेगा। भूख के लिए इससे अच्छा कुछ नहीं।"
दादाजी चुप रहे।
"किसने आपको परछाईं पहनना सिखाया, दादाजी? किसने बताया कि मामी से क्या पूछा जाएगा? किसने आपको सरोज चाची के सपने तक पहुँचाया?" मैंने उनका हाथ पकड़ा। वो ठंडा था। "आप ख़ुद ऊपर नहीं जा सकते थे। आपने ख़ुद कहा था। किसी ने आपको रास्ता दिखाया।"
दादाजी का हाथ मेरे हाथ में काँपा।
"गंगाधर को भी किसी ने रास्ता दिखाया था," मैंने धीरे से कहा। "एक गुरु ने। जिसके बारे में कोई नहीं जानता कि वो कौन था।"
बहुत देर तक दादाजी कुछ नहीं बोले।
फिर उन्होंने अपनी बंद मुट्ठी खोली।
घुँघरू। छोटा। काला। गुनगुनाता हुआ। उस माँ की लोरी।
उन्होंने उसे देखा। बहुत ध्यान से। जैसे पहली बार देख रहे हों।
"एक आवाज़ आती थी," उन्होंने फुसफुसाया। "जब मैं चबूतरे पर बैठकर लिखता था। रात को। एक औरत की। बहुत मीठी। कहती थी — रमेसर, तू ही कर सकता है। मिश्रों का क़र्ज़ तू ही चुकाएगा। तेरा पोता कमज़ोर है। वो लड़की पर तरस खाएगा।"
उनकी आवाज़ टूट गई।
"मैंने सोचा वो... मैंने सोचा वो उस माँ की आवाज़ है। रोती नदी वाली। जो अपनी बिटिया को आज़ाद देखना चाहती है। मैंने सोचा वो मुझसे कह रही है कि उसकी बिटिया को इस भूख से छुड़ाऊँ। नाम पढ़कर।"
उन्होंने अपना चेहरा अपने हाथों में छुपा लिया।
"भगवान। भगवान मुझे माफ़ करे। मैंने फिर से उसकी सुनी। जैसे बानवे में सुनी थी। जब उसने कहा था — एक नाम दे, रमेसर। रस्सी दे। खींच लूँगी।"
मैंने उनके कंधे पर हाथ रखा।
"घुँघरू मुझे दे दीजिए, दादाजी।"
उन्होंने अपना चेहरा उठाया। उनकी आँखों से पानी ऊपर की तरफ़ बह रहा था।
"और रघु?" उन्होंने फुसफुसाया। "मेरा बेटा? वो वहीं रहेगा? पत्थर में? हमेशा?"
"नहीं।" मैंने कहा। मुझे नहीं पता था कि मैं ये कैसे जानता था, पर मैंने कहा। "अगर भूख मिटी, तो ज़ंजीर टूटेगी। हर पत्थर। हर प्राण। चाचा भी।"
"और अगर वो लड़की माफ़ न करे?"
मेरे पास कोई जवाब नहीं था।
दादाजी ने घुँघरू को देखा। फिर मुझे।
और फिर — बहुत धीरे — उन्होंने अपनी मुट्ठी फिर से बंद कर ली।
"मुझे सोचने दे, बेटा," उन्होंने कहा। "बस एक रात।"
पीछे से भोला ने कुछ कहा। बहुत धीमे। अपनी चरवाहे वाली लाठी को ज़मीन पर टिकाए।
"पंडित जी," उसने कहा — दादाजी से, पर उसकी आँखें कहीं दूर थीं, दो सौ चौंसठ बरस दूर — "गंगाधर बाबा ने भी एक रात माँगी थी। सोचने के लिए। मेरी माँ के सामने।" उसने अपना सिर झुका लिया। "और उस रात के ख़त्म होने से पहले उन्होंने मुझे जनेऊ दे दिया था।"
दादाजी ने भोला की तरफ़ देखा। और उनका चेहरा ऐसे सिकुड़ा, जैसे किसी ने उन्हें थप्पड़ मारा हो।
"बहुत देर हो चुकी है, रमेसर।"
आवाज़ कुएँ के खंभे से आई।
दोहरी नहीं। सिर्फ़ एक। गहरी। धरती के खिसकने जैसी। भूख।
पानी का खंभा काँपा। उसके अंदर बहता पानी काला हुआ। और उसमें एक तस्वीर बनी।
ऊपर का भानपुरा। रुका हुआ। नीली लालटेन। मेरा घर। आँगन। तुलसी का चौरा।
और उसके पास, ज़मीन पर, पालथी मारकर बैठी एक औरत।
चाची।
उनकी आँखें बंद थीं। उनकी गोद में दादाजी की डायरी खुली थी। उनके एक हाथ में चाचा का लोटा। और उनके होंठ हिल रहे थे।
"एक। दो। तीन। चार।"
"नहीं," दादाजी ने फुसफुसाया। "नहीं, सरोज, मैंने अभी नहीं कहा था—"
"जिसने धरोहर ली है, उसे किसी के कहने की ज़रूरत नहीं," भूख ने कहा। खंभे से। "उसे बस बुलाया जाना चाहिए। और मैंने उसे तेरी आवाज़ में बुलाया, रमेसर। जैसे मैंने तुझे उस माँ की आवाज़ में बुलाया था।"
"पाँच। छह। सात। आठ।"
चाची की गिनती तेज़ हो रही थी।
और दादाजी — मेरे सामने, चबूतरे पर बैठे — धुँधले होने लगे।
"दादाजी!"
मैंने उन्हें पकड़ा। उनका हाथ मेरी उँगलियों में पिघल रहा था। पानी बनकर। उनका चेहरा पारदर्शी हो रहा था। और उनके पैरों से — मेरी बाईं आँख ने देखा — एक धागा ऊपर की तरफ़ खिंच रहा था। पानी की छत की तरफ़। बावड़ी के पार। ऊपर। मेरे घर तक। चाची तक।
"नौ। दस। ग्यारह। बारह।"
"मैं नहीं जाना चाहता!" दादाजी चीख़े। उनकी आवाज़ टूटी हुई, पानी से भरी। "विक्कू! मैं नहीं—"
वो ग़ायब हो गए।
और उनकी मुट्ठी — जो आख़िरी पल तक बंद थी — खुल गई।
घुँघरू चबूतरे पर गिरा। टन्न। और लुढ़का। कुएँ के खंभे की तरफ़। पानी की तरफ़।
मैं झपटा।
मेरी उँगलियों ने उसे पकड़ा। खंभे के मुँह से बस कुछ इंच पहले।
"तेरह। चौदह। पंद्रह।"
"ऊपर जाओ, भैया!"
छोटू। पता नहीं कहाँ से। वो मेरी बाँह खींच रहा था। "ऊपर! अभी! वो चालीस तक पहुँचने वाली हैं!"
"मैं नहीं जा सकता! पिछली रात—"
"आज तुम्हारी परछाईं तुम्हारे साथ है!" छोटू ने मेरे पैरों की तरफ़ इशारा किया। लालटेन की रोशनी में। वहाँ एक परछाईं थी। मेरी। "आज दरवाज़ा खुला है! भागो!"
मैं कुएँ के खंभे में कूदा।
पानी ने मुझे पकड़ा। ऊपर की तरफ़ खींचा। उल्टा। तेज़।
इक्कीसवीं। पानी। आँखें ऊपर।
"सोलह। सत्रह। अठारह।"
चाची की आवाज़। पानी में। हर जगह से। ऊपर से। मेरे अंदर से। पूरी बावड़ी से। जैसे बावड़ी ख़ुद उनकी गिनती गा रही हो।
मैं चढ़ा। बाएँ हाथ से दीवार पकड़े। बीसवीं। उन्नीसवीं। अठारहवीं।
और मैंने महसूस किया — कोई मेरे बगल से गुज़र रहा था। नीचे की तरफ़। तेज़ी से। एक औरत। साड़ी में। उसकी आँखें बंद। उसके होंठ हिलते हुए।
चाची। नहीं — चाची का पानी। उनकी गिनती। उनके अंदर दादाजी। नीचे उतरते हुए। हर संख्या के साथ एक सीढ़ी।
"उन्नीस। बीस। इक्कीस।"
वो मेरे बगल से गुज़रीं। और मैंने उन्हें पकड़ने के लिए हाथ बढ़ाया।
और उनका शरीर मेरी उँगलियों के आर-पार निकल गया। पानी की तरह।
वो असली चाची नहीं थीं। वो उनकी गिनती थी। उनकी परछाईं। पानी में। असली चाची ऊपर थीं। आँगन में। तुलसी के पास। गिनती करती हुई।
और जब तक गिनती चल रही थी, उनकी देह ऊपर थी। पर जिस पल वो चालीस बोलेंगी —
उनकी देह भी नीचे आएगी।
"बाईस। तेईस। चौबीस।"
मैं चढ़ता रहा।
दसवीं। नौवीं। आठवीं।
"पच्चीस। छब्बीस। सत्ताईस।"
पानी पतला हो रहा था। मेरी नाक बाहर। मेरे फेफड़े जले। मैंने हवा निगली।
पाँचवीं। चौथी।
"अट्ठाईस। उनतीस। तीस।"
मुंडेर। धूल। पीपल की जमी हुई घंटियाँ।
मैं भागा।
रुका हुआ भानपुरा। सड़क। मेरे पैर धूल पर पड़ते और धूल नहीं उड़ती। एक जमा हुआ कुत्ता। एक जमी हुई लालटेन।
"इकतीस। बत्तीस।"
गाँव की पहली गली। मैंने कभी इतनी तेज़ नहीं दौड़ा था। मेरी छाती फट रही थी। मेरी बाईं आँख — पूरी सफ़ेद — हर तरफ़ पानी दिखा रही थी। पूरा गाँव पानी में डूबा हुआ।
"तैंतीस। चौंतीस।"
मेरी गली।
"पैंतीस।"
मेरा दरवाज़ा।
"छत्तीस।"
दरवाज़े पर सूरज और मामी थे।
पर वो अंदर नहीं थे। वो दरवाज़े के बाहर खड़े थे। और दरवाज़ा — मेरे घर का, लकड़ी का, जिसे मैं बचपन से जानता था — अब लकड़ी का नहीं था।
वो पानी का था।
एक खड़ी, काली, हिलती हुई दीवार। चौखट के अंदर। जैसे किसी ने एक पूरी बावड़ी उठाकर दरवाज़े में टाँग दी हो। सूरज अपनी बैसाखी से उस पर वार कर रहा था — और बैसाखी पानी में धँसती, और फिर बाहर उछल आती। मामी उस पर अपनी हथेलियाँ मार रही थीं — और हर बार उनके हाथ वापस धकेल दिए जाते।
"विक्की!" सूरज चीख़ा। "नहीं खुल रहा! एक घंटे से! जैसे ही वक़्त रुका, दरवाज़ा पानी बन गया!"
मैं उस दीवार की तरफ़ भागा। और मैंने सोचा कि मैं भी वापस धकेल दिया जाऊँगा।
पर मेरी परछाईं — लालटेन की नीली रोशनी में, मेरे पैरों से बँधी, मेरे आगे पड़ती हुई — उस पानी की दीवार पर पड़ी।
और दीवार हिली। एक दरार बनी। मेरी परछाईं के आकार की।
मिश्रों की परछाईं। जिसे दादाजी ने पहना था। जो उन्हें पहचानती थी। और जिसे ये घर पहचानता था।
मैं उस दरार से अंदर गया।
आँगन।
चाची तुलसी के पास बैठी थीं।
पालथी मारकर। आँखें बंद। डायरी गोद में। लोटा हाथ में।
और वो अकेली नहीं थीं।
उनके पीछे, उनके कंधों पर, एक आकृति थी। धुँधली। पारदर्शी। एक बूढ़े आदमी की। सफ़ेद धोती। कंधे पर गमछा। उसके हाथ चाची के कंधों पर। और उसका चेहरा —
दादाजी का चेहरा। रोता हुआ। चीख़ता हुआ। बिना आवाज़ के।
वो वहाँ नहीं रहना चाहते थे। वो खिंचे चले आए थे। उनकी धरोहर ने उन्हें बुलाया था, और उन्हें आना पड़ा था।
"सैंतीस।"
चाची के होंठ हिले। शांत। बिल्कुल स्थिर आवाज़ में।
"अड़तीस।"
मैं उनके पास पहुँचा। घुटनों के बल गिरा।
"उनतालीस।"
और मैंने अपना हाथ उनके मुँह पर रख दिया।
कसकर। दोनों हाथों से।
चाची की आँखें खुलीं।
और वो उनकी आँखें नहीं थीं।
वो गहरी थीं। थोड़ी झुकी हुई। मिश्रों वाली।
दादाजी की आँखें।
और उन आँखों में आँसू थे। और एक भीख।
रोक, बेटा। रोक।
और मेरी हथेली के नीचे, चाची के होंठ फिर से हिले।
उनके सीने से। उनके पेट से। उनके पूरे शरीर से। वैसे ही, जैसे चाचा के शरीर से देवदत्त वाली गिनती निकली थी, मेरे हाथों के नीचे।
एक आवाज़। एक अक्षर।
"चा—"
भाग 26 समाप्त।
अगले भाग में — "सत्ताईसवीं सीढ़ी": चाची के होंठों पर "चालीस" का पहला अक्षर है। विक्रम के पास एक पल है। एक घुँघरू है, जिसमें एक माँ की पुकार बंद है। और एक सवाल है — क्या एक माँ की लोरी एक पत्नी की गिनती रोक सकती है? उधर, सुबह होते ही गाँव में एक अजनबी आता है। एक शहरी यूट्यूबर। कैमरा लेकर। बावड़ी पर वीडियो बनाने...
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