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भाग 25 — पच्चीसवीं सीढ़ी

Piyashi Atma · Real Experiences · 20 मिनट

Writer
Piyashi Atma
Story
भानपुरा की बावड़ी - चालीस सीढ़ियाँ
Chapter
25 of 31
Category
Real Experiences
Reading time
20 min
Words
3989
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

परछाईं हमारी सबसे वफ़ादार साथी होती है।

वो हमें कभी नहीं छोड़ती। धूप में, लालटेन की रोशनी में, चाँदनी में — वो हमेशा हमारे साथ चलती है। हमारे पैरों से बँधी हुई। हम रुकते हैं, वो रुकती है। हम भागते हैं, वो भागती है। हम जो भी करें, वो वही करती है। बिना सवाल किए।

दादी कहती थीं कि परछाईं आत्मा का किनारा होती है। वो हिस्सा जो शरीर से बाहर झाँकता है। और इसीलिए मरने वाले की परछाईं सबसे पहले जाती है — उससे पहले कि आख़िरी साँस छूटे।

मैंने उस बात पर कभी ध्यान नहीं दिया था।

उस पच्चीसवीं रात, मेरी परछाईं ने मुझे छोड़ दिया।

और किसी और ने उसे पहन लिया। किसी ऐसे ने, जो मुझे बहुत प्यार करता था।

गुड्डी की आँखें मुझे देख रही थीं।

वो पुरानी, भूखी, दो सिक्कों वाली आँखें। पाँच साल की बच्ची के चेहरे में धँसी हुईं। और उसके होंठ मुस्कुरा रहे थे।

"बारह भी सिखाओगे, चाचा?" उसने पूछा। "दीदी कहती है आप सबसे अच्छा गिनते हो।"

पीछे से, मटके से बहती पानी की वो पतली धार उसके बालों तक पहुँच चुकी थी। उनमें घुल रही थी। मैंने देखा — गुड्डी की गर्दन के पीछे वाली वो एक लंबी लट, जो दिल्ली के बाद से कभी कटी नहीं थी, हरी हो रही थी। बढ़ रही थी। ज़मीन तक।

मैंने अपनी जेब से घुँघरू निकाला।

उस लड़की का। जिसमें अब उसकी माँ की पुकार बंद थी। गुनगुनाती हुई। एक लोरी की तरह।

और उसे गुड्डी के कान के पास ले गया।

पहले कुछ नहीं हुआ।

फिर गुड्डी का चेहरा बदला।

वो मुस्कान — भूख वाली — अटकी। होंठों के कोने काँपे। और उसकी आँखें — वो पुरानी आँखें — एक पल के लिए धुँधली हुईं। जैसे किसी पानी की सतह पर लहर उठी हो।

घुँघरू की गुनगुनाहट तेज़ हुई। वो लोरी। एक माँ की आवाज़। दो सौ अस्सी बरस पुरानी। किसी भाषा में नहीं, किसी शब्द में नहीं — बस एक धुन। वो धुन, जो कोई भी माँ अपने बच्चे को सुलाने के लिए गाती है।

और गुड्डी की आँखों के पीछे — उन भूखी आँखों के पीछे — कुछ हिला।

एक और चेहरा। एक पल के लिए। एक लड़की का। सत्रह बरस की। जो उस आवाज़ की तरफ़ मुड़ी थी। जैसे कोई बहुत दूर से अपनी माँ की आवाज़ सुने, और उसे यक़ीन न हो कि वो सच है।

"...माँ?..."

गुड्डी के मुँह से निकला। पर वो गुड्डी की आवाज़ नहीं थी। न भूख की।

और फिर — एक झटके में — वो सब ग़ायब हो गया। भूख वाली आँखें, लड़की वाला चेहरा, सब। पानी की धार मटके की तरफ़ वापस सिकुड़ी। गुड्डी की हरी लट ढीली पड़ी।

और गुड्डी गिर पड़ी। मेरी बाँहों में।

उसकी आँखें बंद थीं। उसकी साँसें धीमी। वो बस सो रही थी। एक आम पाँच साल की बच्ची।

पर उसकी स्लेट ज़मीन पर पड़ी थी। और उस पर, दस के बाद, वो अंक अब भी था।

११

"वो उसे सीख चुकी है," अम्मा ने कहा।

हम आँगन में बैठे थे। गुड्डी अम्मा की गोद में सो रही थी। उसका कड़ा — काला, ठंडा — उसकी बाँह पर ढीला पड़ा था।

"अगर उसने चालीस तक सीख लिया," अम्मा ने कहा, "तो अगले सत्रहवें बरस में — या शायद उससे पहले, अगर भूख भूखी रही — वो एक ही रात में नीचे चली जाएगी। चालीस सीढ़ियाँ। एक साँस में।"

"ऐसा नहीं होगा।"

"तू ये कैसे जानता है?"

"क्योंकि अगला सत्रहवाँ बरस नहीं आएगा," मैंने कहा।

अम्मा ने अपनी सफ़ेद आँखें मेरी तरफ़ उठाईं। कुछ नहीं कहा। पर उनके चेहरे पर एक सवाल था। वही, जो सब पूछ रहे थे। दादाजी, छोटू, गाँव वाले, उल्टे गाँव वाले।

कैसे?

मेरे पास अभी जवाब नहीं था।

"गुड्डी को किसी ऐसी जगह रखना होगा जहाँ वो न पहुँच सके," मैंने कहा।

"ऐसी कोई जगह नहीं है, बच्चा। पानी हर जगह है।"

"कड़ा..."

"कड़ा ख़र्च हो गया। सरदार जी का भरोसा उसमें था। वो नदी पर जल गया।" अम्मा ने गुड्डी के बालों में हाथ फेरा। "कोई और भरोसा चाहिए। कोई और प्रार्थना। कोई ऐसी चीज़, जो वो न तोड़ सके।"

और तब दरवाज़े पर एक आवाज़ आई।

"लोरी।"

हम मुड़े।

हरिहर शास्त्री दरवाज़े पर खड़े थे। चौंतीस साल बाद पहली बार घर से इतनी दूर। सफ़ेद धोती, नंगा बदन, लंबी सफ़ेद दाढ़ी। उनके हाथ में वो मिट्टी का कलश था। ख़ाली। सूखा।

"मैंने सुना," उन्होंने कहा। "गली में बच्चे बात कर रहे थे। भोला की पोती ने ग्यारह सीख लिया।"

वो अंदर आए। धीरे-धीरे। और गुड्डी के पास बैठ गए। ज़मीन पर।

"चौंतीस बरस," उन्होंने कहा, "मैंने इस कलश को लोरी सुनाई। हर रात। मेरे शंकर को। और उसने बताया था — बबलू के ज़रिए — कि वो सुनता था। कि उसे ठंड नहीं लगती थी, जब तक लोरी चलती थी।"

उन्होंने गुड्डी के माथे पर अपनी उँगली रखी।

"भूख हर चीज़ खाती है, बेटा। पर लोरी — एक बाप की, एक माँ की — वो नहीं खा पाती। क्योंकि लोरी भरोसा नहीं माँगती। वो बस देती है। बिना बदले के।"

उन्होंने अम्मा की तरफ़ देखा।

"इसे मेरे घर ले चलो। आज रात। मैं इसके पास बैठूँगा। पूरी रात। और गाऊँगा। जैसे शंकर के लिए गाता था।"

गुड्डी को हम पुजारी के घर ले गए।

वो घर अब बदल गया था। खिड़कियों की ईंटें गिरा दी गई थीं। दरवाज़ा खुला था। ज़ंजीरें आँगन के कोने में पड़ी थीं, जंग खाती हुईं। और अंदर, एक छोटी-सी चारपाई पर, पुजारी ने एक साफ़ चादर बिछाई थी।

"शंकर की थी," उन्होंने कहा। "चौंतीस बरस से किसी ने इस पर नहीं सोया।"

गुड्डी को उस पर लिटाया गया। वो अब भी सो रही थी।

पुजारी उसके सिरहाने बैठे। ख़ाली कलश अपनी गोद में रखा। और धीरे-धीरे, बहुत पुरानी, भारी आवाज़ में, गाना शुरू किया।

कोई शब्द नहीं थे जो मैं पहचानता। शायद संस्कृत। शायद कोई पुरानी बुंदेली। पर धुन — धुन मैं पहचानता था। वो हर लोरी की धुन थी। हर उस आवाज़ की, जो कभी किसी बच्चे के सिरहाने बैठकर उसे सुलाती है।

गुड्डी ने नींद में करवट ली। और उसके होंठों पर एक हल्की-सी मुस्कान आई। उसकी अपनी।

"घुँघरू मुझे दे दो, बेटा।"

दादाजी की डायरी में फिर से वही पंक्ति उभरी थी। हरी स्याही में। मैं दोपहर को घर लौटा तो वो मेज़ पर खुली पड़ी थी। उसी पन्ने पर।

मैंने पहली बार क़लम उठाई। और उस पंक्ति के नीचे लिखा।

"अभी नहीं, दादाजी।"

मुझे नहीं पता था कि वो पढ़ेंगे या नहीं। कि पानी काग़ज़ को ऐसे जोड़ता है या नहीं।

पर शाम को, जब मैंने डायरी फिर से खोली, मेरी पंक्ति के नीचे एक और पंक्ति थी।

"देवदत्त ने तुझे आख़िरी अक्षर बताया। ई। मैंने सुना। पानी सब सुनता है।"

और उसके नीचे:

"सुखनई?"

मेरे हाथ ठंडे पड़ गए।

वो जानते थे। उन्होंने सुन लिया था। चौबीसवीं सीढ़ी पर, जब देवदत्त मुझसे बात कर रहा था — दादाजी उल्टे गाँव में चबूतरे पर बैठे हर शब्द सुन रहे थे।

और नीचे, छोटे अक्षरों में, एक और पंक्ति:

"पर अंदाज़ा काफ़ी नहीं, बेटा। अगर उस शिला पर एक अक्षर भी ग़लत पढ़ा गया, तो मुझे नहीं पता क्या होगा। शायद कुछ नहीं। शायद उससे भी बुरा। इसलिए घुँघरू चाहिए। पक्का नाम। उसकी माँ की आवाज़ में।"

"घुँघरू नीचे मत लाना, भैया।"

छोटू ने ये बात उस रात दसवीं सीढ़ी पर कही। जब मैं उतर रहा था।

"क्यों?"

"क्योंकि उल्टे गाँव में सब उसे सुन सकते हैं।" उसकी आँखें मेरी जेब पर थीं, जहाँ घुँघरू गुनगुना रहा था। "कल रात तुम उसे लेकर नहीं आए थे — मम्मी के पास था। पर आज अगर तुम उसे नीचे लाए, तो वो पूरा गाँव उसकी आवाज़ सुनेगा। और भूख भी।" उसने निगला। "वहाँ उसकी दुनिया है, भैया। वो उसे छीन लेगी। तुम्हारे हाथ से। और उसके साथ वो नाम भी हमेशा के लिए खा जाएगी।"

मैं रुक गया। नौवीं सीढ़ी पर।

"तो कहाँ रखूँ?"

"किसी ऐसे के पास, जो झूठे चेहरे पहचानता हो।" छोटू ने ऊपर देखा। पानी की सतह की तरफ़। "मम्मी के पास। उन्होंने बटन से पहचाना था। वो फिर पहचानेंगी।"

मैं वापस ऊपर गया। रुके हुए वक़्त में। मुंडेर तक। गाँव तक। मामी के दरवाज़े तक।

मामी जाग रही थीं। वो भी अब रुके हुए वक़्त में जागती थीं — उनके टख़नों के निशानों की वजह से। उन्होंने दरवाज़ा खोला।

मैंने घुँघरू उनकी हथेली में रखा।

"सुबह तक इसे किसी को मत देना, मामी। किसी को भी नहीं। चाहे कोई भी माँगे।"

"तुझे भी नहीं?"

"मुझे भी नहीं।" मैंने उनकी आँखों में देखा। "जब तक मैं ख़ुद सुबह न आऊँ। और पहले कुछ पूछिएगा। कुछ ऐसा, जो सिर्फ़ मैं जानता हूँ।"

मामी ने सिर हिलाया। और घुँघरू को अपनी मुट्ठी में बंद कर लिया।

और मैं वापस बावड़ी की तरफ़ भागा।

रास्ते में, पुराने शिव मंदिर के पीछे से गुज़रते हुए, मैं एक पल के लिए रुका।

पुजारी के घर में लालटेन जल रही थी। उसकी लौ नीली थी — रुके हुए वक़्त वाली। और उस नीली रोशनी में, चारपाई के सिरहाने, हरिहर शास्त्री बैठे थे। जागते हुए। हिलते हुए। गाते हुए। वो भी रुके हुए वक़्त में जाग रहे थे — चौंतीस साल उस कलश के पास बैठने के बाद, शायद पानी ने उन्हें भी अपना मान लिया था।

गुड्डी चारपाई पर सो रही थी। और मैंने देखा — उसकी गर्दन के पीछे वाली वो लंबी, हरी लट हवा में उठी हुई थी। खिड़की की तरफ़। दरवाज़े की तरफ़। जैसे कोई उसे बाहर से बुला रहा हो।

पर हर बार जब पुजारी की लोरी ऊँची होती, वो लट काँपती, और धीरे-धीरे नीचे झुक जाती। वापस तकिये पर। जैसे कोई बच्चा, जिसे बाहर खेलने जाना हो, पर जिसे माँ की आवाज़ रोक ले।

पुजारी ने मुझे नहीं देखा। उनकी आँखें बंद थीं। और उनकी आवाज़ — बूढ़ी, भारी, टूटी हुई — उस छोटे-से कमरे को एक गर्म चादर की तरह ढके हुए थी।

चौंतीस साल उन्होंने एक ख़ाली कलश को गाया था। आज वो एक ज़िंदा बच्ची को गा रहे थे।

मैं आगे बढ़ गया।

पच्चीसवीं सीढ़ी।

उल्टा भानपुरा। पनघट। सीढ़ी का मुँह।

मैं उतरा। बाईसवीं। तेईसवीं। चौबीसवीं — वहाँ अब कोई नहीं था। देवदत्त चला गया था। बस सीढ़ी के पत्थर पर एक हल्का-सा, सुनहरा धब्बा बचा था, जैसे कोई वहाँ बहुत देर तक बैठा रहा हो।

पच्चीसवीं।

मेरे पैर जम गए।

और मैंने ऊपर देखा।

पनघट के चारों ओर लोग थे। पर कल जैसी भीड़ नहीं। कुछ ही। गंगाधर का पोता और भोला। सरला। वो बयासी वाला लड़का। और कुछ और।

और वो सब मेरे पैरों की तरफ़ देख रहे थे।

"क्या हुआ?" मैंने पूछा।

गंगाधर के पोते ने चबूतरे पर रखी लालटेन की तरफ़ इशारा किया। उसकी पीली रोशनी सीढ़ी पर पड़ रही थी। मुझ पर।

"तेरी परछाईं कहाँ है?"

मैंने नीचे देखा।

लालटेन की रोशनी मुझ पर पड़ रही थी। सीधे। पत्थर की सीढ़ी पर।

पर मेरे पैरों के पास कुछ नहीं था। कोई काला आकार नहीं। कोई परछाईं नहीं।

बस रोशनी। और पत्थर।

मैंने अपना हाथ उठाया। लालटेन के सामने। हथेली फैलाई।

रोशनी मेरे हाथ के आर-पार नहीं गई। मेरा हाथ ठोस था। पर उसके पीछे, सीढ़ी पर — कोई परछाईं नहीं बनी।

"ये कब हुआ?" मैंने फुसफुसाया।

"जब तुम आए," सरला ने कहा। उनकी आवाज़ में डर था। "तुम पानी से पलटकर इधर आए, और तुम्हारी परछाईं नहीं आई। वो ऊपर रह गई।"

"ऊपर? कहाँ?"

"जहाँ तुमने उसे आख़िरी बार छोड़ा था," गंगाधर के पोते ने कहा। "बावड़ी की मुंडेर पर। या उससे पहले। किसी दीवार पर। किसी लालटेन के पास।"

मुझे याद आया। मामी का दरवाज़ा। उनकी लालटेन। मैं उनके आँगन में खड़ा था, उनकी हथेली में घुँघरू रखते हुए। और लालटेन मेरे पीछे थी। और मेरी परछाईं उनकी दीवार पर पड़ रही थी।

और फिर मैं भागा। और शायद...

"वो वहीं रह गई," मैंने कहा।

"परछाईं अकेले नहीं रहती," बयासी वाले ने कहा। उसकी बंबइया बोली में कोई मज़ाक़ नहीं था। "बंबई में मैंने एक बाबा को देखा था, जुहू पर। वो कहता था — जो परछाईं छूट जाती है, उसे कोई न कोई पहन लेता है। जैसे कोई लावारिस कोट।"

"कौन?"

किसी ने जवाब नहीं दिया।

पर सबकी आँखें एक ही दिशा में गईं। उल्टी गली के उस तरफ़। जहाँ दादाजी का उल्टा घर था।

मैंने उस तरफ़ देखा।

दादाजी का आँगन। उल्टा चबूतरा। तुलसी का चौरा।

और चारपाई।

ख़ाली।

दादाजी वहाँ नहीं थे। न उनकी डायरी। न उनकी हरी स्याही वाली क़लम।

सिर्फ़ चारपाई पर एक गड्ढा था। जहाँ वो बैठते थे। और चारपाई के बगल में, ज़मीन पर — मैंने अपनी बाईं आँख से देखा — एक धुँधला-सा, काला आकार। जैसे किसी की परछाईं का एक टुकड़ा। जो पूरा नहीं उठ पाया था।

"वो ऊपर गए हैं," गंगाधर के पोते ने धीरे से कहा। "तुम्हारी परछाईं पहनकर।"

"पर वो ऊपर नहीं जा सकते! उन्होंने ख़ुद कहा था — वो सिर्फ़ देख सकते हैं। कुएँ के खंभे तक जाकर भी—"

"अपनी देह में नहीं जा सकते," सरला ने कहा। "पर परछाईं में..." उन्होंने अपने पैर की तरफ़ देखा। "परछाईं रोशनी की होती है, बेटा। पानी की नहीं। और तुम्हारी परछाईं गंगाधर के ख़ून की है। उनके ख़ून की। वो उन्हें पहचानती है। उसने उन्हें अंदर आने दिया होगा।"

मेरे पैरों तले ज़मीन खिसकने लगी।

मामी। घुँघरू।

सुबह तक इसे किसी को मत देना। चाहे कोई भी माँगे। पहले कुछ पूछिएगा। कुछ ऐसा, जो सिर्फ़ मैं जानता हूँ।

और दादाजी — जो पानी में सब सुनते थे — ने वो भी सुना होगा।

मैं ऊपर भागा।

पच्चीसवीं से चौबीसवीं। तेईसवीं। बाईसवीं। पनघट। कुएँ का खंभा — मैं उसमें कूदा, जैसे उस रात कूदा था, जब सरला ने रास्ता दिखाया था।

और पानी ने मुझे वापस धकेल दिया।

मैं खंभे से बाहर गिरा। पनघट के चबूतरे पर। हाँफता हुआ।

फिर से कूदा। फिर से धकेला गया।

"नहीं जा पाओगे, भैया।"

छोटू। वो मेरे बगल में था। पता नहीं कब आया। उसका चेहरा पीला पड़ा हुआ।

"क्यों?"

"क्योंकि तुम्हारी परछाईं ऊपर है। और वो दरवाज़ा ले चुकी है।" उसने मेरा हाथ पकड़ा। "एक दरवाज़े से दो नहीं जाते। जब तक वो परछाईं ऊपर है, तुम्हारा रास्ता बंद है। तुम्हें सुबह तक रुकना होगा। जब बावड़ी तुम्हें छोड़ेगी।"

"तब तक बहुत देर हो जाएगी!"

छोटू ने कुछ नहीं कहा।

मैं पनघट के चबूतरे पर बैठ गया। और ऊपर देखा। पानी की उस काली छत की तरफ़। उस छोटे-से धूसर धब्बे की तरफ़, जो बावड़ी का मुँह था।

और मैंने कल्पना की। ऊपर। रुका हुआ भानपुरा। मामी का दरवाज़ा। और उस पर दस्तक देता हुआ कोई।

मेरी शक्ल में। मेरी परछाईं पहनकर।

"देखना है?" गंगाधर के पोते ने धीरे से पूछा।

मैंने उसकी तरफ़ देखा।

उसने कुएँ के उल्टे खंभे की तरफ़ इशारा किया। "पानी हर जगह एक है। ऊपर का पानी, नीचे का पानी। अगर सुशीला के आँगन में कोई मटका है, तो ये खंभा उसे दिखा सकता है।"

मैं खंभे के पास गया। और उसकी पत्थर की दीवार पर अपनी हथेली रखी। और बाईं आँख से अंदर झाँका।

पानी में तस्वीर बनी। धुँधली। हिलती हुई।

मामी का आँगन। नीली लालटेन। तुलसी का चौरा। और दरवाज़ा।

उस पर दस्तक देता हुआ एक आदमी।

उनतीस साल का। दाढ़ी बढ़ी हुई। बाईं आँख सफ़ेद। मैं।

वो — मैं — मामी से कुछ कह रहा था। मैं आवाज़ नहीं सुन सकता था। पर मैंने अपने ही होंठ हिलते देखे। अपनी ही मुस्कान। अपने ही हाथ, आगे बढ़े हुए।

और मामी की मुट्ठी खुलती हुई।

"नहीं," मैंने फुसफुसाया। खंभे की दीवार पर मुक्का मारते हुए। "नहीं, मामी, नहीं!"

पत्थर ने कोई आवाज़ ऊपर नहीं जाने दी।

मैंने देखा — मामी की हथेली से घुँघरू उस आदमी की हथेली में गया। और उस आदमी ने अपनी मुट्ठी बंद की। और मुड़ा।

और एक पल के लिए — मुड़ते हुए — उसने सीधे मटके में देखा। पानी में। खंभे के आर-पार। मेरी तरफ़।

और मेरे चेहरे पर, उस पल, एक ऐसी भावना थी जो मैंने अपने चेहरे पर कभी नहीं देखी थी।

एक बूढ़े आदमी की शर्म।

तस्वीर टूट गई।

"कुछ और भी है, भैया," छोटू ने धीरे से कहा।

वो मेरे बगल में बैठा था। उसने अपने घुटने मोड़ रखे थे।

"क्या?"

"बाबा ने ये अकेले नहीं सोचा।" उसकी आवाज़ में दर्द था। "परछाईं पहनना बहुत मुश्किल है। किसी मरे हुए के लिए। वो ख़ुद नहीं कर सकते थे। किसी ने उन्हें सिखाया होगा। रास्ता दिखाया होगा।"

मैं जम गया।

"भूख," मैंने फुसफुसाया।

छोटू ने सिर हिलाया।

"वो चाहती है कि बाबा नाम पढ़ें, भैया।" उसने मेरी आँखों में देखा। "सोचो। अगर बाबा नाम पढ़ेंगे — और लड़की बँधेगी — तो लड़की हमेशा के लिए भूख के साथ बँधेगी। एक पिंजरे में। पत्थर का। और भूख के लिए वो सबसे अच्छी बात है। क्योंकि तब लड़की कभी अलग नहीं हो पाएगी। कभी माफ़ नहीं कर पाएगी। कभी अपनी माँ के पास नहीं जा पाएगी।"

"पर भूख भी बँधेगी।"

"भूख तो दो सौ अस्सी बरस से बँधी है, भैया।" छोटू ने कंधे उचकाए। "उसे बँधने से डर नहीं लगता। उसे डर लगता है लड़की के अलग होने से। क्योंकि अगर लड़की अलग हुई, तो भूख के पास कोई पिंजरा नहीं बचेगा। कोई देह नहीं। कोई भरोसा नहीं।" उसने अपना सिर हिलाया। "और तब वो मिट जाएगी। गंगाधर बाबा ने लिखा था न?"

मुझे सब कुछ एक झटके में समझ आ गया।

दादाजी की योजना। नाम पढ़ना। मिश्रों का आख़िरी काम।

वो भूख की योजना थी।

और दादाजी को ये पता भी नहीं था।

मैंने गंगाधर की चिट्ठी को याद किया। ओरछा के उस धूल भरे कमरे में। मेरे गुरु ने मुझे बताया था कि यह अनुष्ठान बलि का नहीं, बंधन का है।

गंगाधर को भी किसी ने बताया था। एक गुरु ने। एक रास्ता। एक योजना। जो गाँव को बचाएगी।

और दो सौ अस्सी बरस बाद, उसी ख़ून का एक बूढ़ा आदमी, उल्टे गाँव में बैठकर, किसी की फुसफुसाहट सुन रहा था। एक योजना। एक रास्ता। जो गाँव को बचाएगी।

शायद गंगाधर का गुरु भी कभी इंसान नहीं था।

शायद उस पहले दिन से, जब एक राजपुरोहित ने कहा था कि धरती को जीवित नींव चाहिए — शायद वो आवाज़ भी ज़मीन के नीचे से आई थी। उस पुरानी, सोई हुई भूख से, जो एक पिंजरा चाहती थी। और उसने एक पंडित के कान में फुसफुसाकर अपना पिंजरा ख़ुद बनवाया था।

और अब वो उसी पिंजरे को पत्थर का बनवाना चाहती थी। हमेशा के लिए। उसी ख़ून से।

मेरे हाथ काँपने लगे।

"छोटू," मैंने फुसफुसाया। "अगर दादाजी ने नाम पढ़ा..."

"तो वो लड़की कभी अपनी माँ के पास नहीं जाएगी," छोटू ने कहा। "कभी नहीं।"

मैंने बाक़ी रात पनघट पर काटी।

सरला मेरे बगल में बैठी रहीं। और अट्ठावन वाला गीत गाती रहीं। धीमे। मेरे लिए। गंगाधर का पोता और भोला चबूतरे के किनारे बैठे रहे, हाथ पकड़े, चुपचाप। बयासी वाले ने एक बार अपनी बेलबॉटम की जेब से एक पुराना, गीला सिगरेट का पैकेट निकाला, उसे देखा, और वापस रख दिया।

और छोटू मेरे बगल में बैठा रहा। मेरा हाथ पकड़े।

"तुम्हें बाबा से नफ़रत होगी?" उसने आख़िर में पूछा।

मैंने बहुत देर तक सोचा।

"वो सोचते हैं वो सही कर रहे हैं," मैंने कहा। "वो सोचते हैं कि अगर वो नाम पढ़ेंगे, तो कोई और बच्चा नहीं जाएगा। कि गंगाधर का पाप ख़त्म होगा।" मेरी आवाज़ टूट गई। "वो बस ये नहीं देख पा रहे कि वो वही पाप दोहरा रहे हैं। एक और मिश्र, एक और लड़की, एक और नाम।"

"गंगाधर बाबा भी सोचते थे कि वो सही कर रहे हैं," छोटू ने धीरे से कहा। "गाँव को बचा रहे हैं।"

"हाँ।"

छोटू ने मेरे हाथ को दबाया।

"तो बाबा को रोकना होगा, भैया। उनसे नफ़रत किए बिना।"

सुबह हुई।

बावड़ी ने मुझे छोड़ा। पानी का वो आईना पलटा। और मैं इक्कीसवीं पर था। फिर ऊपर। फिर मुंडेर। फिर पीपल वाली सड़क।

मैं भागा।

पीपल की घंटियाँ बज रही थीं। और मेरे पैरों के पास, सुबह की पहली तिरछी धूप में, मेरी परछाईं भी भाग रही थी। लंबी। पतली। मुझसे आगे।

हमेशा की तरह।

गाँव। गली। मामी का दरवाज़ा।

वो खुला था।

मामी आँगन में बैठी थीं। तुलसी के पास। उनके चेहरे पर एक अजीब-सी शांति थी। जैसे किसी ने उन्हें कोई अच्छी ख़बर दी हो।

उन्होंने मुझे देखा। और मुस्कुराईं।

"फिर आ गया? रात को तो तू ले गया था।"

मेरा दिल रुक गया।

"मामी... क्या ले गया?"

"घुँघरू।" उन्होंने अपनी ख़ाली हथेली खोली। "तू आया था। रात को। तीन बजे के आसपास। वक़्त रुका हुआ था। तूने दस्तक दी। कहा कि योजना बदल गई है, कि घुँघरू अभी चाहिए।"

"और आपने दे दिया?"

"पहले पूछा था।" मामी की मुस्कान अब थोड़ी अटकी। मेरे चेहरे पर कुछ पढ़कर। "जैसा तूने कहा था। कुछ ऐसा, जो सिर्फ़ तू जानता हो। मैंने पूछा — कन्हैया ने मुझे क्या कहलवाया था?"

"और?"

"तूने कहा — अब थाली मत लगाना। मैं भूखा नहीं हूँ। और बटन टाँक देना, अब डाँट सकती हो।" मामी की आवाज़ धीमी हो गई। "बिल्कुल वही। शब्द-शब्द।"

पानी सब सुनता है।

"वो मैं नहीं था, मामी।"

मामी का चेहरा सफ़ेद पड़ गया।

"पर... तू ही था। तेरा चेहरा। तेरी आवाज़। तेरी आँख — बाईं वाली, सफ़ेद। सब।" उनके हाथ काँपने लगे। "बस एक बात अजीब थी। लालटेन की रोशनी में, जब तू दरवाज़े पर खड़ा था — तेरी परछाईं... तेरी परछाईं तेरे पीछे नहीं, तेरे आगे पड़ रही थी। जैसे रोशनी उल्टी तरफ़ से आ रही हो। मैंने सोचा वो बस मेरी थकान थी।"

मैं घर भागा।

दादाजी की डायरी मेज़ पर थी। खुली। आख़िरी पन्ने पर।

हरी स्याही। गीली। दादाजी की लिखावट। पर वो काँप रही थी। जैसे लिखने वाले का हाथ स्थिर न हो।

"मुझे माफ़ करना, बेटा।

तेरी परछाईं बहुत भारी थी। मिश्रों की परछाईं हमेशा भारी होती है। पर मैंने उसे पहना। और तेरी शक्ल में सुशीला के दरवाज़े पर गया। और उससे झूठ बोला।

घुँघरू अब मेरे पास है। उसकी माँ की आवाज़। पूरा नाम। उसमें बंद।

मैं जानता हूँ तू क्या सोचेगा। कि मैंने तुझसे चुराया। कि मैंने तेरा भरोसा तोड़ा। ये सच है।

पर जब तू उनतालीसवीं पर पहुँचेगा, और तुझे चुनना होगा — तू नहीं चुन पाएगा, बेटा। मैं तुझे जानता हूँ। तू कन्हैया की सुनेगा। उस लड़की पर तरस खाएगा। और भूख फिर से जीत जाएगी।

तो मैंने तेरे लिए चुन लिया।

मिश्रों का आख़िरी पाप। मैं अपने सिर लूँगा।

— तेरे दादाजी"

मैं डायरी के सामने बैठा रहा। बहुत देर तक।

धूप खिड़की से अंदर आ रही थी। मेरे ऊपर। मेज़ पर। दीवार पर।

और मैंने दीवार पर अपनी परछाईं देखी।

वो लौट आई थी। सुबह। जब बावड़ी ने मुझे छोड़ा था। मेरे पैरों से फिर से बँधी हुई।

पर वो ठीक नहीं थी।

मैंने अपना सिर घुमाया। परछाईं ने भी घुमाया। पर एक पल देर से। बस एक पल। जैसे किसी ने उसे याद दिलाया हो।

मैंने अपना दायाँ हाथ उठाया। परछाईं ने भी उठाया।

और फिर मैंने हाथ नीचे किया।

परछाईं ने नहीं किया।

वो दीवार पर खड़ी रही। उसका हाथ उठा हुआ। और फिर — धीरे-धीरे — उसने अपने दोनों हाथ जोड़े। सामने। सीने के पास। जैसे कोई बूढ़ा आदमी पूजा करता है। या माफ़ी माँगता है।

दादाजी हमेशा ऐसे ही हाथ जोड़ते थे।

और फिर परछाईं ने अपने हाथ खोले। और फिर से मेरी नक़ल करने लगी। सामान्य। एक आम परछाईं की तरह।

जैसे कुछ हुआ ही न हो।

नीचे आँगन से चाची की आवाज़ आई। "विक्की, चाय बन गई है।"

मैंने कुछ नहीं कहा। मैं बस दीवार को देखता रहा।

चाची ऊपर आईं। चाय का गिलास लेकर। उन्होंने मुझे देखा, फिर डायरी को, फिर दीवार को। उनके बाएँ कान से अब भी हल्का-सा हरा पानी रिसता था, पर उन्होंने उसे पोंछना बंद कर दिया था।

"बाबूजी की लिखावट है न?" उन्होंने डायरी की तरफ़ देखकर धीरे से पूछा।

"हाँ।"

चाची ने गिलास मेज़ पर रखा। और डायरी के पन्ने पर अपनी उँगली फेरी। उस गीली, हरी स्याही पर।

"वो हमेशा ऐसे ही लिखते थे," उन्होंने कहा। "जब कुछ बहुत ज़रूरी होता था। और बहुत ग़लत भी।" उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। "तेरे चाचा कहते थे — बाबूजी के सबसे बड़े फ़ैसले हमेशा हरी स्याही में होते थे।"

वो नीचे चली गईं।

पर मुझे पता था।

उसने कुछ छोड़ दिया था। मेरी परछाईं में। एक टुकड़ा। एक आदत।

या एक रास्ता। वापस आने का।

भाग 25 समाप्त।

अगले भाग में — "छब्बीसवीं सीढ़ी": दादाजी के पास घुँघरू है। और उन्हें अब सिर्फ़ एक चीज़ चाहिए — चालीसवीं बनना। पर रघु वहाँ है। तो वो एक पुराना, भूला हुआ तरीक़ा ढूँढते हैं — किसी जीवित इंसान को अपनी गिनती सौंपने का। और उस तरीक़े की एक क़ीमत है। जो किसी और को चुकानी होगी...

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