Pretika › Real Experiences › भानपुरा की बावड़ी - चालीस सीढ़ियाँ
भाग 24 — चौबीसवीं सीढ़ी
Piyashi Atma · Real Experiences · 20 मिनट
- Writer
- Piyashi Atma
- Story
- भानपुरा की बावड़ी - चालीस सीढ़ियाँ
- Chapter
- 24 of 31
- Category
- Real Experiences
- Reading time
- 20 min
- Words
- 4000
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
प्यार दो तरह का होता है।
एक — जो थामता है। जो कहता है, मत जा। रुक जा। मेरे पास रह। जो किसी का हाथ इतनी ज़ोर से पकड़ता है कि उँगलियाँ नीली पड़ जाएँ। जो दरवाज़े पर खड़ा रहता है, बरसों, इस उम्मीद में कि जाने वाला लौटेगा।
दूसरा — जो छोड़ता है। जो कहता है, जा। तू आज़ाद है। मैं तुझे रोकूँगा नहीं। जो हाथ खोल देता है, भले ही उसके बाद हथेली हमेशा के लिए ख़ाली रहे।
हम सोचते हैं पहला वाला ज़्यादा गहरा है। ज़्यादा सच्चा। कि जो जितना थामे, वो उतना प्यार करता है।
उस चौबीसवें दिन, रामप्यारी अम्मा ने मुझे बताया कि उन्होंने अड़सठ साल किसी को थामे रखा था।
और वो प्यार, जिसे वो पूरी ज़िंदगी सबसे पवित्र चीज़ मानती रहीं — वही एक ज़ंजीर थी।
"मुझे बावड़ी पर ले चल," अम्मा ने कहा।
सुबह के नौ बजे थे। देवदत्त को गए तीन घंटे हो चुके थे। अम्मा अब भी आँगन में ज़मीन पर बैठी थीं, टूटे मटके के टुकड़ों के बीच। उन्होंने उन्हें हटाने नहीं दिया था। उन्होंने गीली मिट्टी पर उन पैरों के निशानों को बार-बार टटोला था, जब तक कि मिट्टी सूख नहीं गई और निशान मिट नहीं गए।
"अभी? दिन में?"
"दिन में ही।" उन्होंने अपना हाथ बढ़ाया। "धूप में। जब वो सुन न सके। मुझे तुझे कुछ बताना है, विक्की। और मैं वो उसी जगह बताऊँगी जहाँ वो हुआ था।"
मैंने उनका हाथ पकड़ा। वो हल्की थीं। बहुत हल्की। जैसे पिछली रात ने उनके अंदर से कुछ निकाल लिया हो।
बावड़ी की मुंडेर पर धूप तेज़ थी।
अम्मा किनारे पर बैठीं। टीन के ठीक बगल में। पैर नीचे लटकाकर। जैसे दादाजी बैठे मिले थे। जैसे चाचा बैठे थे, अपनी आख़िरी रात।
उनकी लाल चुनरी धूप में फीकी गुलाबी लग रही थी। उनकी उँगलियों में वो एक घुँघरू वाली पायल घूम रही थी।
"अट्ठावन," उन्होंने कहा। "चालीसवीं रात। मैंने तुझे बताया था — मैं यहाँ आई थी। अकेली। लालटेन लेकर। और मैंने नीचे देखा।"
"हाँ।"
"मैंने तुझे बताया था कि मैंने उसे पहचाना। और उसने मेरी आँख ले ली। आधी।"
"हाँ।"
अम्मा ने अपना चेहरा मेरी तरफ़ घुमाया। उनकी दोनों सफ़ेद आँखें। थोड़ी बाईं तरफ़।
"मैंने तुझसे झूठ बोला था, बच्चा।"
"तांत्रिक ने कहा था," अम्मा ने धीरे से शुरू किया, "कि अगर कोई उसे पूरा पहचान ले, तो वो उस बार लड़के को छोड़ देगी। और मैं आई थी पूरा पहचानने। पूरी हिम्मत से। दोनों आँखें खोलकर।"
उन्होंने अपनी उँगलियों को देखा।
"मैंने नीचे देखा। चालीस सीढ़ियाँ — उनतालीस, अब पता है। और सबसे नीचे देवदत्त। छाती तक पानी में। मुस्कुराता हुआ। प्यारी, नीचे आ। यहाँ कोई प्यासा नहीं है।"
"और उसके पीछे वो थी। उल्टी। लाल साड़ी। बाल पूरी बावड़ी में।" अम्मा की आवाज़ काँपी। "और मैंने उसकी आँखों में देखा। और मैं पहचानने लगी। धीरे-धीरे। जैसे कोई धुँधली तस्वीर साफ़ होती है।"
"क्या पहचाना?"
अम्मा ने बहुत देर तक जवाब नहीं दिया।
"एक लड़की," उन्होंने आख़िर में कहा। "मेरी उम्र की। डरी हुई। और उसके पीछे — उसके अंदर — कुछ और। कुछ बहुत बड़ा। कुछ जिसकी कोई शक्ल नहीं थी। बस भूख।" उन्होंने अपनी आँखें बंद कर लीं। "गंगाधर ने सच लिखा था, विक्की। दो हैं। मैंने अट्ठावन में दोनों को देखा था। मुझे बस कभी शब्द नहीं मिले।"
"और फिर?"
"और फिर, जब मैं पूरा पहचानने वाली थी — जब मेरी दोनों आँखें उस लड़की के चेहरे पर टिकने वाली थीं — भूख ने मुझसे बात की।"
अम्मा की आवाज़ अब एक फुसफुसाहट थी। धूप के बावजूद।
"उसने कहा — रुक, प्यारी। पहले सुन।"
"अगर तू मुझे पूरा पहचानेगी, तो मैं उसे छोड़ दूँगी। ये सच है। पर जानती है छोड़ने का मतलब क्या है? वो चालीस पूरी कर चुका है। वो मेरा है। छोड़ूँगी, तो उसकी साँस भी छोड़ूँगी। वो ऊपर नहीं आएगा, प्यारी। वो बस... चला जाएगा। जहाँ मरे हुए जाते हैं। हमेशा के लिए। तू उसे कभी नहीं देखेगी।"
मेरी रीढ़ में ठंड दौड़ी।
"पर अगर तू आधा पहचाने — सिर्फ़ एक आँख से — तो मैं उसे रखूँगी। मारूँगी नहीं। चालीसवीं पर। पत्थर में। ज़िंदा। और एक दिन, जब कोई और उसकी जगह लेगा, वो ऊपर आएगा। तेरे पास। वैसा ही। चौदह बरस का।"
"बस एक आँख बंद कर ले, प्यारी। और उसे अपने पास रख।"
अम्मा का पूरा शरीर काँप रहा था।
"मैं बारह बरस की थी, विक्की।" उनकी आवाज़ टूट गई। "मेरी सगाई हो चुकी थी। मैं उसके घर जाने वाली थी। और कोई मुझसे कह रहा था — या तो उसे हमेशा के लिए जाने दे, या उसे पत्थर में रख, और इंतज़ार कर।"
"और आपने..."
"मैंने अपनी दाईं आँख बंद कर ली।"
धूप में, पीपल की घंटियाँ बजीं। हवा नहीं थी।
"बाईं आँख में बर्फ़ की सलाई घुसी," अम्मा ने कहा। "मैं गिरी। और जब उठी, तो वो आँख सफ़ेद थी। और देवदत्त... देवदत्त पत्थर बनने लगा। नीचे से। मुस्कुराता हुआ। क्योंकि उसे नहीं पता था कि मैंने क्या चुना है।"
उन्होंने अपनी सफ़ेद आँखों पर हाथ रखा।
"उस आँख से मैं उसे देखती थी, बच्चा। हर रात। अड़सठ बरस। चालीसवीं पर। पत्थर में। मैंने तुझे बताया था कि वो आँख उसकी दुनिया देखती है। ये सच था। पर मैंने ये नहीं बताया था कि मैंने वो आँख ख़ुद दी थी। अपनी मर्ज़ी से। ताकि मैं उसे देख सकूँ। ताकि मैं उसे जाने न दूँ।"
मैं कुछ नहीं बोल पाया।
"गाँव वाले सोचते थे मैं बहादुर थी," अम्मा ने कहा। एक कड़वी हँसी के साथ। "बारह बरस की लड़की, जो आधी रात को बावड़ी पर गई। जिसने अपनी आँख दी। बहादुर रामप्यारी। किसी ने नहीं पूछा कि देवदत्त फिर भी ऊपर क्यों नहीं आया। तांत्रिक ने कहा था न, पूरा पहचानोगी तो वो छोड़ देगी? किसी ने नहीं पूछा कि मैंने पूरा क्यों नहीं पहचाना।"
"पचहत्तर में," अम्मा ने आगे कहा, "जब सरला गिनने लगी — मैं फिर से यहाँ आई। अपनी दूसरी आँख लेकर। मैंने कहा — ये ले, मेरी बहन को छोड़ दे।"
"और?"
"उसने मना कर दिया।" अम्मा ने सिर हिलाया। "उसने कहा — एक आँख तू मुझे पहले ही दे चुकी है, प्यारी। अपनी मर्ज़ी से। एक सौदे के लिए। दूसरी मैं तब लूँगी, जब तू मुझे पूरा देखेगी। पर तू मुझे पूरा कभी नहीं देखेगी। क्योंकि पूरा देखने का मतलब है उसे जाने देना। और तू उसे कभी जाने नहीं देगी।"
उनकी आँखों से पानी बहने लगा।
"और वो सही थी। मैं नहीं दे पाई। सरला पैंतीसवीं पर छूट गई। और मैं... मैं अड़सठ बरस उस पत्थर को देखती रही।"
"छह दिन पहले आपने दूसरी आँख दी," मैंने धीरे से कहा। "जब आपने पहचाना कि वो देवदत्त नहीं है। जब आपने उसे पूरा देखा।"
"हाँ।" अम्मा ने अपना चेहरा पोंछा। "अड़सठ बरस बाद। पहली बार मैंने उसे पूरा देखा। और तब भी..." वो रुकीं। "तब भी मैंने ये सोचा था कि ये देवदत्त को ऊपर लाने का रास्ता है। कि अगर मैं उसे पहचान लूँ, तो असली देवदत्त आएगा।"
"दो हज़ार नौ," मैंने कहा।
अम्मा का चेहरा पत्थर हो गया।
"छोटू की चिट्ठी," मैंने कहा। "आपने उसे कहा था कि खिड़की वाली से पूछे — देवदत्त कैसा है।"
"हाँ।"
"आप जानती थीं कि इसका मतलब क्या होगा।"
अम्मा बहुत देर तक चुप रहीं।
"मैंने अपने आप से कहा कि मैं नहीं जानती थी," उन्होंने आख़िर में कहा। "सत्रह बरस। मैंने ख़ुद को समझाया कि मैं बस जानना चाहती थी। कि मैंने उसे मना भी किया था। ये सब सच है, विक्की।" उनकी आवाज़ बहुत धीमी हो गई। "पर अगर मैं पूरी ईमानदारी से कहूँ — अपनी दोनों अंधी आँखों की क़सम खाकर — तो मेरे अंदर कहीं, बहुत गहरे, एक आवाज़ थी जो कह रही थी — अगर ये बच्चा नीचे गया, तो शायद..."
उन्होंने बात पूरी नहीं की।
"और तीन दिन पहले," मैंने कहा, "जब देवदत्त ने कहा कि वो सूरज की जगह पर आज़ाद होगा — आप मुस्कुराई थीं।"
अम्मा ने अपना चेहरा अपने हाथों में छुपा लिया।
"मैंने तुझसे कहा था, बच्चा," उन्होंने अपने हाथों के पीछे से फुसफुसाया। "मुझ पर पूरा भरोसा मत करना। अड़सठ बरस से मैं हर गिनने वाले को उसके रास्ते का एक पत्थर समझती आई हूँ। सरला को भी। छोटू को भी। सूरज को भी।"
एक लंबी चुप्पी।
"तुझे भी।"
मैं वहीं बैठा रहा। उनके बगल में। धूप में।
मुझे ग़ुस्सा आना चाहिए था। मुझे धोखा महसूस होना चाहिए था। चौबीस दिन से इस औरत ने मेरा हाथ पकड़ रखा था। मुझे नियम सिखाए थे। मेरे लिए अपनी दूसरी आँख दी थी। हर सुबह मुंडेर पर बैठकर मेरा इंतज़ार किया था।
और उसके अंदर, कहीं, एक बारह साल की लड़की थी, जो सोचती थी — अगर ये पत्थर बन जाए, तो मेरा देवदत्त लौट आएगा।
पर मुझे ग़ुस्सा नहीं आया।
क्योंकि मैंने सोचा — अगर मैं बारह साल का होता, और मुझसे कोई कहता कि छोटू को हमेशा के लिए जाने दो, या उसे पत्थर में रखो और इंतज़ार करो — तो मैं क्या चुनता?
मुझे पता था मैं क्या चुनता।
"अम्मा," मैंने धीरे से कहा, "आपने उसे अड़सठ साल प्यार किया।"
"मैंने उसे अड़सठ साल क़ैद किया।" उनकी आवाज़ में घृणा थी। अपने आप से। "प्यार के नाम पर। वो अड़सठ बरस पत्थर में खड़ा रहा, ठंड में, क्योंकि मैं उसे जाने नहीं दे सकती थी। और जब आख़िरकार वो ऊपर आया — जब रघु ने अपनी जान देकर उसे आज़ाद किया — तो वो तीन दिन भी नहीं टिक पाया। तड़पता रहा। प्यास से। और मैंने उसे पानी भी नहीं दिया।"
उन्होंने अपनी पायल को कसकर मुट्ठी में भींचा।
"क्योंकि मैं फिर से उसे थामे रखना चाहती थी।"
उस दोपहर मैं मामी के पास गया।
वो आँगन में थीं। उनकी बाँहों पर बालों के लाल निशान अब भी थे। उनके टख़नों पर वो पाँच नीली उँगलियाँ।
"दर्द होता है?" मैंने पूछा।
"नहीं। बस ठंडे हैं।" उन्होंने अपने टख़ने को छुआ। "कन्हैया के हाथ जैसे। सत्रह बरस पहले, जब वो सर्दियों में बाहर से खेलकर आता था, तो मेरे पैरों पर अपने हाथ रखता था, गरम करने के लिए।" वो हल्का-सा मुस्कुराईं। "मैं डाँटती थी।"
"मामी, अब आप भी बँधी हैं। उसके धागे से।"
"जानती हूँ।" उन्होंने कंधे उचकाए। "अब मैं भी गिनने वालों में हूँ। शायद अगली बार, सत्रह बरस बाद, मैं भी..."
"अगली बार नहीं होगी।"
मामी ने मेरी तरफ़ देखा। "तू ये कैसे जानता है?"
मैंने अपनी जेब से घुँघरू निकाला। वो अब भी गुनगुना रहा था। लगातार। एक माँ की लोरी।
"क्योंकि ये उस तक पहुँचेगा," मैंने कहा। "किसी न किसी तरह। और वो अपना नाम सुनेगी। अपनी माँ की आवाज़ में।"
"और तेरे दादाजी?"
मैंने घुँघरू को मुट्ठी में बंद किया।
"दादाजी से बाद में बात करूँगा।"
शाम को सूरज अम्मा के घर आया। लल्लन के टेम्पो में। उसकी पत्थर वाली टाँगें अब थोड़ी हल्की थीं — घुटनों तक पत्थर झड़ चुका था। वो बैसाखी के सहारे चल सकता था।
गुड्डी उसे देखते ही दौड़ी। "पापा!"
सूरज ने अपनी कलाई से कड़ा उतारा। वो काला पड़ चुका था। पूरी तरह। उसकी चमक, वो स्टील वाली सफ़ेदी — सब ग़ायब। जैसे किसी ने उसे आग में डालकर बुझा दिया हो।
"तेरा कड़ा, बेटा।" उसने उसे गुड्डी की बाँह में पहनाया। कोहनी के ऊपर। कसकर।
गुड्डी ने उसे देखा। छुआ। फिर अपने पापा की तरफ़ देखा।
"पापा, ये अब ठंडा है।"
सूरज का चेहरा कस गया। उसने मेरी तरफ़ देखा। और मैंने उसकी आँखों में वही डर देखा, जो मेरे अंदर था।
"नदी पर," उसने धीरे से कहा, "जब मैं मामी को खींच रहा था, ये इतना चमका था कि मेरी आँखें चौंधिया गई थीं। फिर एक झटके में बुझ गया। जैसे किसी दीये का सारा तेल एक साथ जल गया हो।"
"सरदार जी से बात करें? शायद वो..."
"कड़ा बदलने से कुछ नहीं होगा," अम्मा ने कहा। कोने से। "उसमें जो था, वो सरदार जी का भरोसा था। उनकी प्रार्थना। वो ख़र्च हो गया। एक माँ को बचाने में।"
सूरज ने गुड्डी को गोद में उठा लिया। और उसके बालों में अपना चेहरा छुपा लिया।
"आज रात मैं यहीं रहूँगा," उसने कहा। "इसके पास।"
पर उस रात वो नहीं रह पाया। आधी रात को उसकी माँ की तबीयत बिगड़ी — खाँसी, हरे पानी वाली — और उसे घर भागना पड़ा। और गुड्डी अम्मा के पास रह गई।
मुझे बाद में पता चला कि सूरज की माँ की खाँसी ठीक उसी वक़्त शुरू हुई थी, जब अम्मा बावड़ी पर जाने के लिए घर से निकली थीं।
संयोग नहीं था। कुछ भी संयोग नहीं था।
दो बजकर सैंतालीस।
मैं उल्टे भानपुरा में उतरा। पनघट के पास। सीढ़ी के मुँह पर। और नीचे उतरा। बाईसवीं। तेईसवीं।
चौबीसवीं।
और वहाँ कोई बैठा था।
सीढ़ी पर। पत्थर के किनारे पर। घुटने सीने से सटाए। एक लड़का। चौदह-पंद्रह बरस का। उसकी चमड़ी अब सफ़ेद नहीं थी, नीली नहीं थी — वो पारदर्शी थी। जैसे पानी से बनी हो। उसके आर-पार पीछे की पत्थर की दीवार दिखती थी।
देवदत्त।
उसने सिर उठाया। मुझे देखा। और मुस्कुराया। थका हुआ।
"आ गया, विक्रम।"
"तुम... तुम यहाँ?"
"पानी मुझे चालीसवीं पर नहीं ले गया।" उसने अपने आप को देखा। अपने पारदर्शी हाथों को। "वहाँ रघु है। वो जगह भर चुकी है। तो उसने मुझे यहाँ रखा। चौबीसवीं पर। तेरे रास्ते में।" वो हल्का-सा हँसा। "ताकि तू मुझे देखे, और रुक जाए। और मुझे बचाने की कोशिश करे। और भूल जाए कि तू यहाँ क्यों आया है।"
"जाल।"
"हाँ।" देवदत्त ने सिर हिलाया। "पर मैं तुझे फँसने नहीं दूँगा।"
मैं उसके बगल में बैठ गया। चौबीसवीं सीढ़ी पर। उल्टे गाँव की पानी वाली छत के नीचे।
"प्यारी ने तुझे बताया," देवदत्त ने कहा। सवाल नहीं। "अट्ठावन के बारे में। आधी आँख के बारे में।"
"तुम्हें पता था?"
"अड़सठ बरस बाद पता चला। पत्थर बनने के बाद, पहले साल ही। भूख ने बताया। वो चाहती थी कि मैं उससे नफ़रत करूँ।" उसने अपनी पारदर्शी उँगलियाँ मोड़ीं। "वो हर रात मेरे कान में फुसफुसाती थी — तेरी प्यारी ने तुझे यहाँ रखा। उसने तुझे जाने नहीं दिया। वो तुझे पत्थर में देखना पसंद करती है।"
"और तुमने..."
"पहले दस-बीस बरस, हाँ। नफ़रत की।" देवदत्त ने कंधे उचकाए। "पत्थर में खड़े होकर किसी से नफ़रत करने के अलावा और करता भी क्या? पर फिर..." उसकी आवाज़ नरम हो गई। "फिर मैंने उसे देखा। हर रात। मुंडेर पर। बूढ़ी होती हुई। अपनी सफ़ेद आँख से मुझे देखती हुई। अकेली। बिना शादी के। बिना बच्चों के। अड़सठ बरस। एक पत्थर के लड़के के लिए।"
उसने मेरी तरफ़ देखा।
"जो इतना इंतज़ार कर सके, विक्रम, उससे नफ़रत कैसे करूँ?"
"उससे कहना," देवदत्त ने कहा, "कि मैंने उसे बहुत पहले माफ़ कर दिया था।"
"कह दूँगा।"
"और उससे कहना..." वो रुका। उसकी पारदर्शी आँखों में पानी भर आया। "कहना कि आधी आँख से उसने मुझे अड़सठ बरस देखा। अब वो पूरी आँख से मुझे जाने दे।"
"पर वो अंधी है। उसकी दोनों आँखें..."
"आँखों से नहीं।" देवदत्त ने अपना बायाँ हाथ उठाया। और मेरी बाईं आँख ने देखा — उसकी अनामिका पर एक धागा बँधा था। चाँदी जैसा। पतला। ऊपर की तरफ़ जाता हुआ। उल्टे गाँव की छत के पार। बावड़ी के पार। मुंडेर तक। एक बूढ़ी औरत की उँगली तक।
"सगाई की मौली," देवदत्त ने कहा। "मेरी माँ ने बाँधी थी। हम दोनों की उँगलियों पर। कहा था, ये कभी नहीं टूटेगी। नहीं टूटी। अड़सठ बरस।" उसने धागे को छुआ। "यही मुझे यहाँ रखे है, विक्रम। पत्थर नहीं। भूख नहीं। ये। उसका प्यार। अगर वो इसे तोड़ दे — अपनी तरफ़ से — तो मैं आज़ाद हो जाऊँगा। शंकर की तरह। रोशनी बनकर।"
"और अगर वो न तोड़े?"
देवदत्त ने अपना पारदर्शी हाथ देखा।
"तो भूख मुझे यहीं रखेगी। तेरे रास्ते पर। जाल बनाकर। और जब तू चालीसवीं पर पहुँचेगा, तो वो मुझे भी उस ज़ंजीर में जोड़ देगी। एक और प्राण।"
"एक बात और," देवदत्त ने कहा। जब मैं उठने लगा।
मैं रुका।
"अड़सठ बरस मैं चालीसवीं पर खड़ा था। उस शिला के ठीक ऊपर। उसके पैरों के ठीक ऊपर।" उसने नीचे देखा। अँधेरे में। "मैं पढ़ सकता था, विक्रम। ठाकुर का बेटा था। पाठशाला जाता था। अड़सठ बरस मैंने उस शिला को पढ़ने की कोशिश की।"
मेरा दिल रुक गया।
"अक्षर उल्टे हैं। गंगाधर ने उल्टे खुदवाए थे, ताकि वो अपना नाम कभी न पढ़ सके। और पानी में वो धुँधले हो जाते हैं। मैं कभी पूरा नहीं पढ़ पाया।" उसने मेरी तरफ़ देखा। "पर आख़िरी अक्षर। वो मैंने पढ़ा था। उस पर एक बड़ी मात्रा थी। ऊपर तक जाती हुई।"
"कौन-सी?"
"ई की।"
मैंने अपनी जेब में घुँघरू को छुआ। उसकी गुनगुनाहट।
सुखन... मामी ने नदी पर सुना था। तीसरा अक्षर।
और अब — ई।
सुखन... ई।
"बीच में कुछ और भी हो सकता है," देवदत्त ने कहा। "एक अक्षर। या दो। मैं नहीं जानता। पर आख़िर में ई है। मैं क़सम खाता हूँ।"
मैंने उस नाम को अपने अंदर बनते महसूस किया। अक्षर जुड़ते हुए। एक नदी का नाम। जो इस इलाक़े में कहीं बहती थी, कभी — और जिसका नाम अब कोई नहीं जानता था।
सुखनई।
मैंने उसे ज़ोर से नहीं बोला। मैंने उसे मन में भी नहीं दोहराया। पानी सब सुनता है। और इस उल्टे गाँव में, कहीं, एक बूढ़ा आदमी चबूतरे पर बैठा हरी स्याही से लिख रहा था, और हर वो अक्षर सुन रहा था जो इस पानी में गिरता था।
पर वो वहाँ था। मेरे अंदर। एक अधूरा, अनिश्चित, पर लगभग पूरा नाम।
और मुझे पता था कि दादाजी उसके लिए क्या देंगे।
ऊपर लौटते हुए, दसवीं सीढ़ी पर, छोटू मेरा इंतज़ार कर रहा था।
"देवदत्त भैया से मिले?" उसने पूछा।
"हाँ।"
छोटू ने सिर झुका लिया। "वो बहुत अच्छे हैं, भैया। सत्रह बरस में जब भी मैं चालीसवीं के पास जाता था, वो मुझसे बात करते थे। कहानियाँ सुनाते थे। अट्ठावन के मेलों की। प्यारी दादी की चोटी की।" उसकी आवाज़ भर्राई। "उन्हें जाने देना, भैया। वो बहुत थक गए हैं।"
"वो अम्मा पर है।"
"प्यारी दादी जाने देंगी।" छोटू ने मेरी आँखों में देखा। "मम्मी ने थाली लगाना बंद किया न? जो माँ सत्रह बरस बाद थाली छोड़ सकती है, वो प्यार करने वाली अड़सठ बरस बाद धागा भी छोड़ सकती है।"
मैं सुबह ऊपर आया।
अम्मा मुंडेर पर थीं। वैसे ही, जैसे मैंने उन्हें छोड़ा था। पैर नीचे लटकाए। चेहरा बावड़ी की तरफ़। उन्होंने रात भर वहीं काटी थी।
"वो चौबीसवीं पर है," मैंने कहा। उनके बगल में बैठते हुए।
अम्मा ने कुछ नहीं कहा। पर उनकी उँगलियाँ पायल पर रुक गईं।
"उसने कहा," मैंने धीरे से कहा, "कि उसने आपको बहुत पहले माफ़ कर दिया था। पहले दस-बीस बरस उसने नफ़रत की। फिर उसने आपको हर रात मुंडेर पर बूढ़ा होते देखा। अकेले। उसके लिए। और उसने कहा — जो इतना इंतज़ार कर सके, उससे नफ़रत कैसे करूँ।"
अम्मा का पूरा शरीर काँपने लगा।
"और उसने कहा..." मेरी आवाज़ भर्रा गई, "...कहा कि आधी आँख से आपने उसे अड़सठ साल देखा। अब पूरी आँख से उसे जाने दीजिए।"
अम्मा ने अपना चेहरा ऊपर उठाया। आसमान की तरफ़। उनकी सफ़ेद आँखों से पानी बह रहा था।
"कैसे?" उन्होंने फुसफुसाया।
मैंने उनका दायाँ हाथ पकड़ा। और उनकी अनामिका को छुआ। मेरी बाईं आँख ने वो धागा देखा। चाँदी जैसा। उनकी उँगली से निकलकर बावड़ी में उतरता हुआ। नीचे। चौबीसवीं तक।
"सगाई की मौली," मैंने कहा। "अब भी बँधी है। आपकी उँगली पर।"
अम्मा ने अपनी उँगली को टटोला। उन्हें कुछ नहीं दिखा। पर उन्होंने उसे महसूस किया। मैंने उनके चेहरे पर देखा।
"अड़सठ बरस," उन्होंने कहा। "मुझे लगता था ये बस मेरा वहम है। ये ठंडक। इस उँगली में।"
वो बहुत देर तक बैठी रहीं। अपनी उँगली को छूती हुईं।
फिर उन्होंने पायल उठाई। वो एक घुँघरू वाली। और उसके किनारे को — जो सालों से घिसकर पतला और तेज़ हो गया था — अपनी उँगली के पास लाईं।
"मुझे दिखा, बच्चा," उन्होंने कहा। "धागा कहाँ है।"
मैंने उनका हाथ पकड़ा। और उसे सही जगह पर ले गया। अपनी बाईं आँख से देखते हुए। पायल का तेज़ किनारा उस चाँदी जैसे धागे के ठीक ऊपर।
अम्मा रुकीं।
"देवदत्त," उन्होंने फुसफुसाया। बावड़ी की तरफ़। "मैंने तुझे बारह बरस की उम्र में पहली बार देखा था। मंदिर के मेले में। तूने मेरी चोटी खींची थी। बाएँ हाथ से। और मैंने तुझे मारा था। दाएँ से।"
उनके होंठ काँपे।
"अड़सठ बरस मैंने तुझे थामे रखा। क्योंकि मुझे लगा, अगर मैंने छोड़ा, तो मेरे पास कुछ नहीं बचेगा।" उन्होंने एक गहरी साँस ली। "पर तू सही कहता था। जो इतना इंतज़ार कर सके... वो जाने भी दे सकता है।"
"जा, देवदत्त।"
और उन्होंने पायल का किनारा धागे पर खींचा।
धागा टूटा।
मैंने उसे देखा — अपनी बाईं आँख से। एक पतली, चाँदी जैसी लकीर, जो बीच से टूटी और दोनों सिरे हवा में लहराए। एक अम्मा की उँगली की तरफ़ सिकुड़ा, और ग़ायब हो गया। दूसरा बावड़ी में, नीचे की तरफ़, तेज़ी से खिंचता हुआ।
और बावड़ी के अंदर से, बहुत नीचे से, एक रोशनी उठी।
हल्की। सुनहरी। पानी में से। टीन के छेदों से, दरारों से, बाहर झाँकती हुई। और उसके साथ एक आवाज़। एक लड़के की। चौदह-पंद्रह बरस का। बड़े होने के बीच में अटकी हुई। हँसती हुई।
"प्यारी..."
अम्मा ने अपनी सफ़ेद आँखें बावड़ी की तरफ़ उठाईं।
और मैंने उनके चेहरे पर देखा — उन्होंने उसे देखा। अपनी अंधी आँखों से। पूरा।
"...अब मैं जा रहा हूँ। पर तू बूढ़ी होती रहना। अच्छे से। धूप में।"
रोशनी टीन के ऊपर से उठी। आसमान की तरफ़। और पीपल की घंटियाँ — जो हवा के बिना बजती थीं — उस पल चुप हो गईं। सब एक साथ।
और फिर, बावड़ी के अंदर से, पानी की सतह से, कुछ ऊपर आया। टीन के एक छेद से। चमकता हुआ। और मुंडेर पर, अम्मा के पैरों के पास, आकर गिरा।
एक पायल।
चाँदी की। काली पड़ चुकी। पर उसमें सारे घुँघरू थे।
अम्मा ने उसे टटोला। उठाया। और अपनी दूसरी पायल के बगल में रखा। दोनों। एक जोड़ी। अड़सठ बरस बाद।
और रामप्यारी अम्मा मुस्कुराईं।
इस बार उस मुस्कान से मुझे डर नहीं लगा।
और तब, बावड़ी के अंदर से, एक और आवाज़ आई।
दोहरी। पर लड़की वाली आवाज़ उसमें अब सुनाई ही नहीं दे रही थी। सिर्फ़ भूख। गहरी। ग़ुस्से से भरी। धरती के खिसकने जैसी।
"एक प्राण गया।"
पीपल की घंटियाँ फिर से बजने लगीं। तेज़। बेतहाशा।
"तो एक चाहिए।"
मैं उठ खड़ा हुआ।
"गुड्डी," अम्मा ने फुसफुसाया। उनका चेहरा पीला पड़ गया था। "गुड्डी मेरे घर पर है। अकेली। कड़ा... कड़ा सूरज के पास है।"
हम भागे।
अम्मा मेरा हाथ पकड़े दौड़ रही थीं। अस्सी बरस की, अंधी, नंगे पैर। अपनी दोनों पायलें मुट्ठी में भींचे। पीपल वाली सड़क की धूल उनके पैरों से उड़ रही थी। वो एक बार भी नहीं लड़खड़ाईं। जैसे उनके पैरों को रास्ता पता हो। अड़सठ बरस से।
गाँव की गलियों में बच्चे खेल रहे थे। "सीढ़ी-सीढ़ी"। पर आज वो गा नहीं रहे थे। वो बस चुपचाप उतर रहे थे। मंदिर की सात सीढ़ियाँ। एक-एक करके। और सबसे नीचे पहुँचकर जमे रहते थे। आँखें खुली। सबकी आँखें एक ही दिशा में। अम्मा के घर की तरफ़।
मेरी जेब में घुँघरू की गुनगुनाहट तेज़ हो गई। जैसे वो माँ, जो उसमें बंद थी, भी डर गई हो।
अम्मा का आँगन।
गुड्डी वहाँ थी। तुलसी के चौरे के पास। ज़मीन पर पालथी मारकर बैठी। उसकी आँखें बंद थीं। उसके बाल खुले थे।
और उसकी गोद में उसकी स्लेट थी।
वो उस पर कुछ लिख रही थी। चॉक से। धीरे-धीरे। बहुत ध्यान से। उसकी जीभ होंठों के कोने में दबी हुई।
मैं उसके पास पहुँचा। और रुक गया।
स्लेट पर अंक थे। १ से १०। जो उसने बहुत पहले लिखे थे।
और दस के बाद, एक नया अंक।
साफ़। सधा हुआ। किसी बड़े के हाथ जैसा।
११
गुड्डी ने अपनी आँखें खोलीं। और मेरी तरफ़ देखा।
और वो उसकी आँखें नहीं थीं।
वो पुरानी, भूखी, दो सिक्कों वाली आँखें थीं। जो मैंने तीसरे दिन पहली बार देखी थीं।
"चाचा," उसने कहा। उसकी पतली, मीठी आवाज़ में। "देखो। मैंने ग्यारह सीख लिया।"
उसकी बाँह पर वो काला कड़ा था। ठंडा। बेजान।
और उसके पीछे, तुलसी के चौरे के पास, मिट्टी के मटके से — जो अम्मा ने सुबह नया भरकर रखा था — पानी की एक पतली धार बह रही थी। ज़मीन पर। गुड्डी की तरफ़।
उसके बालों तक।
भाग 24 समाप्त।
अगले भाग में — "पच्चीसवीं सीढ़ी": गुड्डी ने ग्यारह सीख लिया है। और कड़ा अब काला पड़ चुका है, अपनी सारी रोशनी ख़र्च करके। भूख ने एक प्राण खोया है, और वो उसकी भरपाई चाहती है। उधर, विक्रम की परछाईं एक रात ऊपर रह जाती है — जब वो नीचे जाता है। और उस परछाईं को उल्टे गाँव में कोई और पहन लेता है...
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