Pretika › Real Experiences › भानपुरा की बावड़ी - चालीस सीढ़ियाँ
भाग 23 — तेईसवीं सीढ़ी
Piyashi Atma · Real Experiences · 20 मिनट
- Writer
- Piyashi Atma
- Story
- भानपुरा की बावड़ी - चालीस सीढ़ियाँ
- Chapter
- 23 of 31
- Category
- Real Experiences
- Reading time
- 20 min
- Words
- 3988
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
मरे हुओं की भी एक पंचायत होती है।
दादी कहती थीं। जब कोई मरता है और ठीक से विदा नहीं होता — जब उसका कोई काम अधूरा रह जाता है, कोई बात अनकही, कोई हिसाब बाक़ी — तो वो पूरी तरह नहीं जाता। वो कहीं बीच में रुक जाता है। और वहाँ उस जैसे और भी होते हैं। और वो सब मिलकर बैठते हैं। रात को। और ज़िंदा लोगों के बारे में बात करते हैं।
किसने उनका हक़ मारा। किसने उन्हें भुलाया। किसका क़र्ज़ अभी बाक़ी है।
मैं उस कहानी पर हँसता था। बचपन में।
उस तेईसवीं रात, उल्टे भानपुरा में, मैं उस पंचायत के बीच में खड़ा था।
और मुक़दमा मुझ पर था।
"मैं भी चलूँगा," सूरज ने कहा।
दोपहर थी। अम्मा का आँगन। मामी वहाँ बैठी थीं, उस लड़की का घुँघरू अपनी मुट्ठी में बंद किए, जैसे कोई ताबीज़। लल्लन बाहर टेम्पो में था — उसने कहा था वो शाम को मामी को नदी तक ले जाएगा, पर नदी की तली तक नहीं उतरेगा।
"तू चल नहीं सकता, सूरज," मैंने कहा।
वो खाट पर बैठा था। उसके चेहरे का पत्थर लगभग पूरा झड़ चुका था। पर उसकी टाँगें — कमर से नीचे — अब भी भूरी-हरी थीं। खुरदुरी। भारी। वो बैठ सकता था, हाथ चला सकता था। पर चलना...
उसने अपने दोनों हाथ खाट के किनारे पर रखे। और ज़ोर लगाया।
और खड़ा हो गया।
उसके पैर ज़मीन पर पड़े। भारी। पत्थर जैसे। ठक। उसका पूरा शरीर काँप रहा था। उसके माथे पर पसीना। पर वो खड़ा था।
"सत्रह बरस पहले," उसने कहा, हाँफते हुए, "मैंने एक माँ के लिए किसी को धक्का दिया था।" उसने मामी की तरफ़ देखा। "आज एक माँ के साथ चलूँगा। उसे अकेला नहीं जाने दूँगा।"
मामी ने उसे देखा। बहुत देर तक। वो जानती थीं — अब सब जानते थे — कि सत्रह साल पहले सूरज ने क्या किया था। छोटू ने किसके लिए अपना हाथ छोड़ा था।
मामी उठीं। सूरज के पास गईं। और उसके पत्थर वाले घुटने पर अपना हाथ रखा। वो गर्म हाथ।
"चल, बेटा," उन्होंने कहा।
गुड्डी रोई। सूरज ने उसे बहुत देर तक गोद में रखा। अपने दोनों हाथों से। फिर उसे अम्मा के पास छोड़ दिया।
"पापा कल सुबह आएँगे," उसने कहा। "वादा।"
गुड्डी ने अपनी बाँह का कड़ा उतारा।
"ये ले जाओ, पापा।"
"नहीं, बेटा—"
"ले जाओ।" उसकी आवाज़ में ज़िद थी। पाँच साल की बच्ची वाली, पर उसके पीछे कुछ और — एक बड़ी हो चुकी समझ। "मैं यहाँ अम्मा के पास हूँ। दीवारों के बीच। और देवदत्त भैया के पास। आप वहाँ बाहर जाओगे। नदी पर। वहाँ आपको चाहिए।"
सूरज ने कड़े को देखा। फिर मुझे।
"ले जा," मैंने कहा। "आज रात वो उसे यहाँ नहीं ढूँढेगी। आज रात उसका ध्यान नदी पर होगा।"
सूरज ने कड़ा अपनी कलाई पर पहना। उस काले धागे और ताँबे के सूरज के बगल में।
देवदत्त खाट पर लेटा था। आँगन के कोने में।
वो अब बोल नहीं रहा था। उसकी साँसें छोटी थीं, तेज़, जैसे किसी मछली की जो पानी से बाहर हो। उसकी चमड़ी सफ़ेद नहीं, अब नीली-सी हो रही थी। होंठ फटे हुए। और उसकी आँखें — बड़ी, काली — बार-बार कोने में रखे मटके की तरफ़ जाती थीं।
"पानी," वो फुसफुसाता। "प्यारी... थोड़ा-सा पानी..."
अम्मा उसके सिरहाने बैठी थीं। उसका हाथ पकड़े। उनका चेहरा पत्थर जैसा था।
"नहीं दूँगी," उन्होंने कहा। मुझसे। देवदत्त की तरफ़ देखे बिना। "सुबह से माँग रहा है। अगर एक घूँट भी पी लिया, तो वो पानी उसे वापस खींच लेगा। मैं जानती हूँ। अड़सठ बरस उसने वही पानी पिया है।"
"पर अगर नहीं पिया तो..."
अम्मा ने कुछ नहीं कहा।
देवदत्त ने अपना बायाँ हाथ उठाया। काँपता हुआ। और अम्मा के गाल को छुआ।
"बूढ़ी हो गई तू, प्यारी," उसने फुसफुसाया। वही बात, जो उसने उस नक़ली रात को कही थी। पर इस बार वो सच थी। "अड़सठ बरस... मैं तेरे साथ बूढ़ा होना चाहता था।"
अम्मा की सफ़ेद आँखों से पानी बहा।
शाम साढ़े छह बजे लल्लन का टेम्पो पीपल वाली सड़क पर चला। पश्चिम की तरफ़। सूखे खेतों के पार। रोती नदी की तरफ़।
मामी आगे बैठी थीं। कन्हैया की नीली कमीज़ में। घुँघरू उनकी मुट्ठी में।
सूरज पीछे। उसकी पत्थर वाली टाँगें सीट पर फैली हुईं। कड़ा उसकी कलाई पर।
मैं पीपल के नीचे खड़ा उन्हें जाते देखता रहा। जब तक धूल बैठ नहीं गई।
पीपल की घंटियाँ बज रही थीं। हवा नहीं थी। और मैंने अपनी बाईं आँख से उनके लाल धागों को देखा — हर धागे के सिरे पर लटके वो छोटे-छोटे पारदर्शी हाथ।
आज वो सब पश्चिम की तरफ़ मुड़े हुए थे। टेम्पो की तरफ़। नदी की तरफ़।
जैसे सैकड़ों बच्चे, बहुत दिनों बाद, किसी को जाते देख रहे हों। और चुपचाप दुआ कर रहे हों कि वो लौट आए।
मुझे नहीं पता था कि वो दुआ थी या भूख।
उस गाँव में उस हफ़्ते, दोनों में फ़र्क़ करना मुश्किल होता जा रहा था।
मैं उनके साथ नहीं जा सकता था। दो बजकर सैंतालीस पर मुझे बावड़ी में होना था। तेईसवीं सीढ़ी पर।
उल्टे भानपुरा में।
जहाँ पिछली रात सैकड़ों लोगों ने अँधेरे में फुसफुसाया था — गंगाधर का ख़ून।
दो बजकर सैंतालीस।
मैं पानी में उतरा। पहली। पाँचवीं। दसवीं — छोटू वहाँ था, दसवीं के ठीक नीचे, इंतज़ार करता हुआ। उसने मेरा हाथ पकड़ा। पंद्रहवीं। बीसवीं। इक्कीसवीं।
और फिर वो उल्टी सतह। पानी का आईना।
हम उसके पार पलटे।
और मैं उल्टे भानपुरा में था। पीपल के पास। पनघट के पास। जहाँ कुएँ का वो उल्टा खंभा था।
और मैंने अपनी सीढ़ी देखी।
मुझे पता नहीं था कि इक्कीसवीं के बाद सीढ़ियाँ कहाँ जाती हैं। मैंने सोचा था, शायद वो ग़ायब हो जाती हैं। पर वो नहीं हुईं। वो यहाँ थीं। पनघट के चबूतरे से शुरू होकर, ज़मीन में उतरती हुई। पत्थर की, घिसी हुई, काई से ढकी। एक सँकरी सीढ़ी, जो उल्टे गाँव की ज़मीन को चीरकर नीचे जाती थी। अँधेरे में।
बाईसवीं। तेईसवीं।
मेरे पैर अपने आप तेईसवीं पर पहुँचे। और वहीं जम गए।
और मैंने ऊपर देखा।
पनघट के चारों ओर — पूरे चौक में, उल्टे घरों की छतों पर, उल्टे पीपल की डालियों के बीच — लोग खड़े थे।
सैकड़ों।
वो सब मुझे देख रहे थे।
मोटी औरत, पूरियों वाली। उसकी थाली अब ख़ाली थी। बूढ़ी, चरखे वाली। कंचे खेलने वाले बच्चे। और बहुत सारे और, जिन्हें मैंने पहली बार देखा था। अलग-अलग ज़मानों के कपड़े। धोती-कुर्ते, घाघरे, पुरानी वर्दियाँ, एक आदमी तो सफ़ारी सूट में था, जैसे सत्तर के दशक का कोई सरकारी बाबू।
और उन सबके पैरों में — मेरी बाईं आँख ने देखा — धागे बँधे थे। पतले। पारदर्शी। सब नीचे की तरफ़ जाते हुए। सीढ़ी के साथ-साथ। अँधेरे में। उस तक।
छोटू मेरे बगल में खड़ा था। बाईसवीं पर। उसका हाथ मेरे हाथ में काँप रहा था।
"ये सब कौन हैं?" मैंने फुसफुसाया।
"गिनने वाले," छोटू ने कहा। "वो सब, जो दो सौ अस्सी बरस में गिनने लगे, और पत्थर नहीं बने। जो बीच में छूट गए। जिनकी जगह किसी और ने चुकाया। या जो किसी सीढ़ी पर अटककर यहाँ आ गए।"
भीड़ में से एक आदमी आगे आया।
पतला। लंबा। घुँघराले बाल। एक पुरानी, बेलबॉटम पैंट, और एक चेक वाली कमीज़। उसके गले में एक सस्ता-सा लॉकेट। और उसकी बोली — जब उसने बोलना शुरू किया — भानपुरा की नहीं थी।
"अरे, ये है वो मिश्रा का छोकरा?" उसने कहा। बंबइया लहजे में। "पूरा गाँव इसके पीछे पड़ा है, और ये तो साला सूखी टहनी है।"
"बयासी वाला," छोटू ने फुसफुसाया। "जो बंबई भाग गया था।"
समंदर भी एक बावड़ी है, बेटा। बस उसकी सीढ़ियाँ ज़्यादा गहरी हैं।
"तीन महीने," बयासी वाले ने कहा, जैसे उसने मेरे विचार पढ़ लिए हों। "तीन महीने जुहू पर रहा। रोज़ सुबह समंदर देखता था। सोचा, भाग गया। बच गया।" उसने अपनी कमीज़ का कॉलर ठीक किया। "फिर एक रात लहर आई। बड़ी वाली। और मैं रेत पर खड़ा था। और मैंने गिनती सुनी। लहरों में। चौंतीस। पैंतीस।" उसने कंधे उचकाए। "सुबह मछुआरों को मेरी चप्पल मिली थी। बस।"
"गंगाधर का ख़ून," भीड़ में से किसी ने कहा।
एक बूढ़ी औरत। बहुत बूढ़ी। पुराने ज़माने का घाघरा, और माथे पर बड़ा-सा टीका। उसकी आवाज़ कर्कश थी। "कल रात उसने सुना। नीचे वाली लड़की ने। रमेसर की बात। कि वो उसका नाम पढ़ेगा। उसे फिर से बाँधेगा।"
भीड़ में एक सरसराहट दौड़ी।
"और जानते हो उसका मतलब क्या है?" बूढ़ी औरत ने चारों तरफ़ देखा। "अगर वो बँधी — हमेशा के लिए, पत्थर में — तो हम भी बँधेंगे।"
मैं जम गया।
"हमारे धागे उसके बालों से बँधे हैं," उसने कहा। अपने पैर की तरफ़ इशारा करते हुए। "दो सौ बरस से। अगर वो पत्थर बनी, तो ये गाँव पत्थर बनेगा। हम सब। उल्टे। अपने-अपने घरों में। हमेशा के लिए। कोई सत्रह बरस नहीं। कोई उम्मीद नहीं। कोई बेटा लौटकर नहीं आएगा।" उसकी आवाज़ टूटी। "मैं अपने पोते का इंतज़ार कर रही हूँ, बेटा। अठारह सौ अट्ठासी से। तेरे दादा उस उम्मीद को भी पत्थर करना चाहते हैं।"
मोटी औरत आगे आई। पूरियों वाली।
"गंगाधर ने हमें यहाँ भेजा," उसने कहा। उसकी आवाज़ में अब वो मिठास नहीं थी। "उसके पोते ने। उसके पोते के पोते ने। हर मिश्र ने किसी न किसी को आगे किया। और अब आख़िरी मिश्र हमें पत्थर करने आया है।"
भीड़ आगे बढ़ी। एक क़दम।
"इसे यहीं रोक लो," किसी ने कहा। "एक पूरी खिला दो। एक बार नाम पुकारो। अगर ये यहाँ रह गया, तो उनतालीसवीं तक कभी नहीं पहुँचेगा। और रमेसर का खेल ख़त्म।"
"विक्रम," मोटी औरत ने धीरे से कहा। बहुत प्यार से। "विक्रम बेटा..."
मैंने अपने होंठ भींचे।
"विक्रम..." एक और आवाज़। "विक्रम..." और एक। पूरी भीड़ से। मेरा नाम। अलग-अलग आवाज़ों में। अलग-अलग ज़मानों के लहजों में। एक लहर की तरह। मेरे चारों ओर।
छोटू ने मेरे कान पर अपने हाथ रख दिए। पर आवाज़ें उसकी हथेलियों के आर-पार आ रही थीं।
"विक्रम... विक्रम... जवाब दे, बेटा... बस एक बार..."
"रुको।"
एक आवाज़। पतली। बहुत पुरानी। पर इतनी साफ़ कि पूरी भीड़ जम गई।
भीड़ बीच से फटी। और एक लड़का आगे आया।
बारह बरस का। शायद कम। दुबला। उसने एक पुरानी, हाथ से बुनी धोती पहनी थी, और उसके कंधे पर एक जनेऊ था — पीला पड़ चुका, लगभग भूरा। उसके सिर पर एक छोटी-सी चोटी। और उसकी आँखें —
मैंने उन्हें पहचाना। मैंने उन्हें हर सुबह आईने में देखा था।
मिश्रों की आँखें। गहरी। थोड़ी झुकी हुई।
"गंगाधर का पोता," छोटू ने फुसफुसाया। उसकी आवाज़ में श्रद्धा थी। "संवत् अठारह सौ उन्नीस। पहला गिनने वाला।"
वो लड़का — दो सौ चौंसठ बरस पुराना — पनघट के चबूतरे के किनारे आया। तेईसवीं सीढ़ी के ठीक ऊपर। और मेरी तरफ़ देखा।
"तुम मेरे रक्त हो," उसने कहा। उसकी हिंदी बहुत पुरानी थी। शब्द अलग। लय अलग। "मेरे पितामह का रक्त। और मेरा।"
"आप... आप पहले थे।"
"प्रथम।" उसने सिर हिलाया। "बावड़ी बनने के सत्रहवें दिन मैं पहली सीढ़ी पर मिला था। पितामह ने मुझे बचाया।" उसकी आवाज़ में कोई गर्व नहीं था। बस एक बहुत पुराना दुख। "किसी और के बालक को आगे करके। एक चरवाहे का बेटा। नाम था भोला। वो भी मेरी आयु का था।"
उसने भीड़ की तरफ़ देखा।
"भोला यहाँ है। इसी भीड़ में। दो सौ चौंसठ बरस से। और मैं भी यहाँ हूँ। क्योंकि पितामह ने मुझे बचाया, पर पूरा नहीं। मैं बड़ा हुआ, विवाह किया, पुत्र हुए — और मरने के बाद मैं यहाँ खिंच आया। क्योंकि मेरा धागा कभी नहीं टूटा था।"
भीड़ में से एक लड़का आगे आया। उसी उम्र का। नंगे बदन। एक छोटी-सी लाठी हाथ में। चरवाहे वाली। वो गंगाधर के पोते के बगल में खड़ा हो गया।
और दोनों ने एक-दूसरे का हाथ पकड़ लिया।
भीड़ ख़ामोश हो गई।
"दो सौ चौंसठ बरस," गंगाधर के पोते ने कहा, "भोला और मैं साथ हैं। हमने एक-दूसरे को माफ़ किया। बहुत पहले। यहाँ, इस गाँव में।" उसने भीड़ की तरफ़ देखा। "और अगर एक मिश्र और एक चरवाहा दो सौ बरस में एक-दूसरे को माफ़ कर सकते हैं — तो तुम सब इस बालक को रोकने से पहले उससे पूछ तो लो कि वो करने क्या आया है।"
भीड़ चुप रही।
फिर पनघट के पीछे से एक और आवाज़ आई। जवान। थोड़ी काँपती हुई।
"मैं भी कुछ कहूँगी।"
सरला। वो चबूतरे पर चढ़ीं। अपनी लाल-पीली साड़ी सँभालते हुए। उनकी पायल बजी।
"पचहत्तर में, जब मैं गिन रही थी," उन्होंने कहा, "मेरी जीजी ने मुझे बचाने की हर कोशिश की। रात-रात भर जागीं। मुंडेर पर बैठीं। अपनी आधी आँख से पानी में झाँकती रहीं।" उन्होंने भीड़ की तरफ़ देखा। "और जब मैं पैंतीसवीं पर छूट गई, तो वो इक्यावन बरस इस डर में जीईं कि मैं उन्हें कोसती होऊँगी।"
उन्होंने मेरी तरफ़ इशारा किया।
"ये लड़का कल यहाँ आया। उल्टे गाँव में। सिर्फ़ मुझे ये बताने कि मेरी जीजी ने अपनी दूसरी आँख भी दे दी। किसी और के लिए।" उनकी आवाज़ भर्राई। "एक मिश्र, जो किसी की बहन का संदेश लेकर मौत के गाँव में उतरे — वो गंगाधर जैसा नहीं हो सकता।"
भीड़ में एक सरसराहट हुई।
भोला — चरवाहे वाला लड़का — ने अपनी लाठी ज़मीन पर ठोकी। एक बार। और पहली बार बोला। उसकी आवाज़ बहुत पतली थी। बहुत पुरानी।
"मेरी माँ भी रोई थी," उसने कहा। "जब मैं नहीं लौटा। गंगाधर बाबा के पोते की जगह।" उसने अपने बगल में खड़े लड़के का हाथ और कसकर पकड़ा। "पर माँ अब यहाँ नहीं है। वो ऊपर चली गई। बहुत पहले। क्योंकि उसने किसी को कोसा नहीं।"
फिर बूढ़ी औरत — घाघरे वाली — ने धीरे से पूछा:
"तू क्या करेगा, गंगाधर के पोते के पोते? नाम पढ़ेगा? हमें पत्थर करेगा?"
सैकड़ों आँखें मुझ पर टिकीं।
और मैंने सच कहा।
"मुझे नहीं पता।"
एक सरसराहट।
"मेरे दादाजी चाहते हैं कि मैं नाम लाऊँ। वो उसे पढ़ेंगे। भूख बँधेगी। गाँव बचेगा। ऊपर वाला गाँव।" मैंने चारों तरफ़ देखा। उन सारे चेहरों को। "पर छोटू कहता है कि उसके अंदर एक लड़की है। जो अपनी माँ को ढूँढ रही है। और अगर उससे माफ़ी माँगी जाए — अगर उसे उसकी माँ की आवाज़ पहुँचाई जाए — तो वो भूख से अलग हो सकती है। और भूख मिट सकती है।"
"और तब हम?" बयासी वाले ने पूछा।
"गंगाधर ने लिखा था कि भूख बिना पिंजरे के, बिना भरोसे के, कुछ नहीं बाँध सकती।" मैंने अपने पैर के धागे की तरफ़ देखा। "अगर भूख मिटी, तो ये धागे भी... शायद..."
"आज़ाद," गंगाधर के पोते ने कहा।
भीड़ में एक लहर दौड़ी। एक अलग तरह की। इस बार ग़ुस्से की नहीं।
उम्मीद की।
"पर अगर वो माफ़ न करे?" मोटी औरत ने पूछा। उसकी आवाज़ काँप रही थी।
"तो मुझे नहीं पता," मैंने कहा। "गंगाधर को भी नहीं पता था।"
और तब — बिल्कुल उसी पल — पनघट के बीच खड़ा वो कुएँ का उल्टा खंभा काँपा।
उसके अंदर बहता पानी — जो हमेशा ऊपर की तरफ़, बावड़ी की तरफ़, एक धीमी, लगातार धारा में बहता था — अचानक रुक गया।
फिर तेज़ हुआ।
और उसमें से एक आवाज़ आई।
पूरी भीड़ ने सुनी। हर एक ने। मैंने देखा — सैकड़ों चेहरे एक साथ उस खंभे की तरफ़ मुड़े।
एक औरत की आवाज़। रोती हुई। टूटी हुई। बहुत दूर से। ज़मीन के नीचे से। उस रास्ते से, जो तीन कोस दूर एक सूखी नदी से आता था।
"...बिटिया..."
"माँ," छोटू ने फुसफुसाया। "उसकी माँ।"
पर ये आवाज़ पहले से अलग थी। पहले जब मैंने उसे सत्रहवीं की दरार में सुना था, वो धुँधली थी। कमज़ोर। टूटी हुई।
आज वो साफ़ थी।
और उसके साथ — उसके बीच में, उसके साथ-साथ — एक और आवाज़ थी। एक औरत की। पर दूसरी। ज़िंदा। गर्म।
"बोलो, बहन। मैं सुन रही हूँ। मैं यहाँ हूँ। अपनी बिटिया को पुकारो। मैं उसे ले जाऊँगी।"
मामी।
वो नदी पर थीं। रोती नदी की तली में। दो बजकर सैंतालीस पर। और पानी — जो हर जगह एक है — उनकी आवाज़ को यहाँ ले आया था। उस खंभे में। उस माँ की आवाज़ के साथ।
और खंभे के अंदर, मेरी बाईं आँख ने देखा — पानी में एक तस्वीर बनने लगी। धुँधली। हिलती हुई। जैसे किसी कुएँ में झाँकने पर दिखती है।
एक सूखी नदी का पाट। रात। चाँद नहीं। और रेत — जो गीली हो रही थी, नीचे से, पानी रिसता हुआ।
और उस रेत पर घुटनों के बल बैठी एक औरत। नीली कमीज़ में। अपनी दोनों हथेलियाँ रेत पर रखे। और उनके बीच, रेत पर, एक छोटा-सा घुँघरू।
मामी।
उनके पीछे, किनारे पर, एक आदमी खड़ा था। उसकी टाँगें पत्थर की। उसकी कलाई पर एक कड़ा, जो चमक रहा था।
सूरज।
और रेत के नीचे — मामी की हथेलियों के ठीक नीचे — एक चेहरा था। मेरी बाईं आँख में। रेत में धँसा हुआ। पेट के बल। एक बूढ़ी औरत का। दो सौ अस्सी बरस से रोती हुई।
और मामी उससे बात कर रही थीं।
"मैं भी रोई हूँ, बहन," मामी ने कहा। "सत्रह बरस। मेरा भी बेटा उसी बावड़ी में गया। मैं जानती हूँ। मैं जानती हूँ तेरा रोना।"
रेत में धँसे चेहरे के होंठ हिले। और वो आवाज़ — दो सौ अस्सी बरस पुरानी — उस घुँघरू में जाने लगी। मैंने उसे देखा। रेत से उठती एक हल्की, चाँदी जैसी धुंध, जो घुँघरू की तरफ़ खिंच रही थी। उसमें समा रही थी।
"...बिटिया... मेरी बिटिया... स..."
खंभे के अंदर पानी और तेज़ बहा।
"...सु... सुख..."
पूरी भीड़ ने साँस रोक ली।
"...सुखन..."
तीसरा अक्षर।
भीड़ में किसी ने सिसकारी भरी। दो सौ अस्सी बरस में कोई तीसरे अक्षर तक नहीं पहुँचा था।
"...सुखन..."
और तब खंभे का पानी काला हो गया।
बाल।
नदी की रेत से। मामी की हथेलियों के चारों ओर। काले। गीले। हज़ारों। एक झटके में ऊपर उठते हुए। जैसे रेत के नीचे कोई जाल बिछा हो, और किसी ने उसे खींच दिया हो।
वो मामी के हाथों पर लिपटे। उनकी कलाइयों पर। उनकी बाँहों पर। उन्हें नीचे खींचते हुए। रेत में।
"नहीं!"
एक आवाज़। खंभे से। पूरे उल्टे गाँव में गूँजती हुई। दोहरी। लड़की की, और उसके नीचे वाली भूख की। पर आज भूख वाली बहुत ज़ोर से थी।
"वो मेरी है! उसका नाम मेरा है! कोई नहीं ले जाएगा!"
मामी चीख़ीं। उनका शरीर रेत में धँसने लगा। कमर तक। छाती तक।
पर उनकी मुट्ठी — घुँघरू वाली मुट्ठी — बंद रही।
और तब किनारे से सूरज कूदा।
उसकी पत्थर वाली टाँगें रेत पर पड़ीं। धम्म। भारी। इतनी भारी कि रेत उसके नीचे दब गई, सख़्त हो गई। वो धँसा नहीं। वो मामी के पास पहुँचा। और उनकी कलाई पकड़ी। अपने कड़े वाले हाथ से।
कड़ा चमका। तेज़, सफ़ेद रोशनी में।
और बाल — जहाँ-जहाँ वो रोशनी पड़ी — सिकुड़े। जले। पीछे हटे।
सूरज ने खींचा। अपनी पत्थर वाली टाँगों को ज़मीन में गाड़कर। जैसे कोई खूँटा। उसके चेहरे पर दर्द था, पसीना था, और एक ऐसी ज़िद जो मैंने उसके चेहरे पर पहले कभी नहीं देखी थी।
"सत्रह बरस पहले," वो चिल्लाया, "मैंने एक बच्चे को नीचे भेजा था! आज एक माँ को नीचे नहीं जाने दूँगा!"
मामी रेत से बाहर आईं। एक झटके में। सूरज के ऊपर गिरती हुई।
और खंभे के अंदर की तस्वीर टूट गई।
उल्टे भानपुरा में ख़ामोशी थी।
सैकड़ों लोग। पनघट के चारों ओर। कुएँ के खंभे को देखते हुए। जिसका पानी धीरे-धीरे वापस साफ़ हो रहा था। और फिर से ऊपर की तरफ़ बहने लगा था।
किसी ने कुछ नहीं कहा।
फिर गंगाधर का पोता बोला। बहुत धीमे।
"सुखन," उसने कहा। "तीसरा अक्षर। दो सौ चौंसठ बरस में पहली बार।"
"और घुँघरू," छोटू ने फुसफुसाया। "मम्मी ने उसे नहीं छोड़ा। मैंने देखा। उनकी मुट्ठी बंद थी। आख़िर तक।"
भीड़ ने मेरी तरफ़ देखा।
और इस बार उनकी आँखों में ग़ुस्सा नहीं था। शक भी नहीं। कुछ और था।
मोटी औरत — पूरियों वाली — आगे आई। उसने अपनी ख़ाली थाली नीचे रखी।
"वो औरत," उसने कहा, "जो नदी पर थी। वो कौन है?"
"सुशीला," मैंने कहा। "कन्हैया की माँ।"
मोटी औरत ने छोटू की तरफ़ देखा। फिर मेरी तरफ़।
"उसका बेटा यहाँ है," उसने धीरे से कहा। "सत्रह बरस से। और वो किसी और की बिटिया के लिए नदी में उतरी।" उसकी आवाज़ काँपी। "मैंने अपने बेटे को एक पूरी खिलाकर यहाँ रोक लिया था। अठारह सौ नब्बे में। सवा सौ बरस। मैं कभी किसी और के बच्चे के लिए..."
वो रुक गई।
और मुड़ी। और भीड़ में वापस चली गई।
और एक-एक करके, बाक़ी लोग भी मुड़े। और अपने उल्टे घरों की तरफ़ जाने लगे। धीरे-धीरे। उल्टे क़दमों से। कोई नाम नहीं पुकारा। कोई पूरी नहीं दी।
आख़िर में सिर्फ़ गंगाधर का पोता और भोला बचे। हाथ पकड़े। चबूतरे के किनारे।
"जब वक़्त आए," गंगाधर के पोते ने कहा, "हम तुम्हारे साथ नीचे चलेंगे। उस लड़की तक। दो सौ चौंसठ बरस मैंने उससे माफ़ी नहीं माँगी। अब माँगूँगा।"
भोला ने सिर हिलाया।
मैं सुबह ऊपर आया।
और सीधे अम्मा के घर भागा।
मामी वहाँ थीं। आँगन में। ज़मीन पर बैठी। उनकी कमीज़ फटी हुई, उनकी बाँहों पर लाल निशान — बालों के। उनके टख़नों पर पाँच छोटी उँगलियों के नीले निशान।
अब वो भी बँधी थीं।
सूरज उनके बगल में था। उसकी पत्थर वाली टाँगें फैली हुईं। कड़ा उसकी कलाई पर, अब काला पड़ चुका — जैसे उसने अपनी सारी रोशनी ख़र्च कर दी हो।
और मामी की मुट्ठी अब भी बंद थी।
उन्होंने मुझे देखा। और मुस्कुराईं। थकी हुई। पर जीती हुई।
और अपनी मुट्ठी खोली।
घुँघरू उनकी हथेली पर था। छोटा। काला पड़ा हुआ।
पर वो अब बज नहीं रहा था।
वो गुनगुना रहा था।
लगातार। बहुत धीमे। एक औरत की आवाज़। कोई लोरी जैसी। उस छोटे-से धातु के गोले के अंदर से। जैसे किसी ने एक पूरी पुकार को, दो सौ अस्सी बरस के रोने को, उसमें बंद कर दिया हो।
"उसने दे दिया," मामी ने फुसफुसाया। "उस माँ ने। पूरा नाम। इस घुँघरू में। मैंने सुना नहीं — वो मेरे सुनने के लिए नहीं था। वो उसकी बिटिया के लिए है।" उन्होंने घुँघरू मेरी हथेली में रखा। "सिर्फ़ वो सुन पाएगी, विक्की। जब ये उसके पास बजेगा।"
मैंने घुँघरू को देखा। उस गुनगुनाहट को सुना। पूरा नाम। एक छोटे-से धातु के गोले में। जो दादाजी चाहते थे। जो छोटू चाहता था।
और तब दादाजी के कमरे से — मेरे घर से, गाँव के उस छोर से — कुछ गिरने की आवाज़ आई।
बाद में चाची ने बताया। सुबह पौ फटते ही, दादाजी की डायरी — जो मेरे कमरे की मेज़ पर रखी थी — अपने आप खुल गई थी। और उसके आख़िरी पन्ने पर, हरी स्याही में, एक पंक्ति उभरी थी। दादाजी की लिखावट में।
"घुँघरू मुझे दे दो, बेटा।"
मैंने घुँघरू को अपनी मुट्ठी में कसकर बंद किया। उसकी गुनगुनाहट मेरी हथेली में काँपती रही। एक माँ की लोरी।
दो लोग उसे चाहते थे। दोनों मुझसे प्यार करते थे। और दोनों के पास उसके लिए अलग-अलग इस्तेमाल थे। एक उससे बाँधना चाहता था। दूसरा उससे आज़ाद करना।
और घुँघरू बस गुनगुनाता रहा। किसी ऐसी बिटिया के लिए, जिसने दो सौ अस्सी बरस से अपना नाम नहीं सुना था।
और फिर अम्मा की चीख़।
आँगन के कोने से। देवदत्त की खाट से।
हम सब मुड़े।
खाट ख़ाली थी।
और उसके बगल में, कोने में रखा मिट्टी का मटका, उल्टा पड़ा था। टूटा हुआ। उसका पानी ज़मीन पर फैला हुआ। और उस पानी में, गीली मिट्टी पर — पैरों के निशान।
नंगे। एक लड़के के। खाट से मटके तक।
और मटके से आगे — आँगन के दरवाज़े तक। दरवाज़े से गली में। गली से पीपल की तरफ़।
अम्मा ज़मीन पर बैठी थीं। मटके के टुकड़ों के बीच। उनके हाथ उस गीली मिट्टी को टटोल रहे थे। उन पैरों के निशानों को।
"मैं सो गई थी," उन्होंने फुसफुसाया। "एक पल के लिए। अड़सठ बरस में पहली बार मैं उसके पास सोई। और उसने... उसने पानी पी लिया।"
उन्होंने अपनी सफ़ेद आँखें पीपल की तरफ़ उठाईं।
"वो वापस चला गया, विक्की। पानी उसे वापस ले गया।"
उनका चेहरा — जो अड़सठ बरस से पत्थर था, जो दो बार आँखें खोकर भी नहीं टूटा था — उस पल पूरी तरह टूट गया।
"मुझे उसे पानी दे देना चाहिए था," उन्होंने कहा। "कल ही। जब वो माँग रहा था। कम से कम वो मेरे हाथ से पीता।"
भाग 23 समाप्त।
अगले भाग में — "चौबीसवीं सीढ़ी": रामप्यारी अम्मा की आँख का राज़। अट्ठावन में उन्होंने जब पानी में देखा था, तो असल में क्या पहचाना था — और उन्होंने आधी आँख ही क्यों दी, पूरी क्यों नहीं। और देवदत्त वापस बावड़ी में है — पर इस बार चालीसवीं पर नहीं। कहीं और...
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