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भाग 22 — बाईसवीं सीढ़ी

Piyashi Atma · Real Experiences · 20 मिनट

Writer
Piyashi Atma
Story
भानपुरा की बावड़ी - चालीस सीढ़ियाँ
Chapter
22 of 31
Category
Real Experiences
Reading time
20 min
Words
3997
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

दादा-दादी कभी पूरी तरह मरते नहीं।

वो कहानियाँ बन जाते हैं। कोई मुहावरा, जो आप बिना सोचे बोल देते हैं। कोई ख़ास तरीक़ा, जिससे आप चाय में शक्कर घोलते हैं। कोई लोरी, जो आप अपने बच्चे को सुनाते हैं और फिर अचानक रुक जाते हैं, क्योंकि आपको याद आता है कि ये किसकी आवाज़ में सुनी थी।

मेरे दादाजी मेरे लिए एक कहानी बन चुके थे। सत्रह साल से। एक बूढ़ा आदमी, दूर किसी गाँव में, जिसे मैं कभी मिलने नहीं गया। जिसकी चिट्ठियाँ मैंने कभी नहीं पढ़ीं। जिसके फ़ोन मैं कभी-कभी उठाता था, और "हाँ दादाजी, ठीक हूँ" कहकर रख देता था।

और फिर वो मर गए। और उनकी डायरी ने मुझे बताया कि वो सत्रह साल से मेरे लिए लड़ रहे थे।

उस बाईसवीं रात, उल्टे भानपुरा में, मैं उनसे मिला।

और मुझे पता चला कि कहानियाँ भी कुछ माँगती हैं।

छोटू का हाथ मेरे मुँह पर था। कसकर।

उसकी हथेली गर्म थी। उसकी उँगलियाँ काँप रही थीं। और उसकी आँखें मुझसे कह रही थीं — मत बोलना। कुछ मत बोलना।

दादाजी चारपाई पर बैठे थे। उन्होंने हमें देखा। मुझे, और मेरे मुँह पर छोटू का हाथ। और उनकी मुस्कान — जो मुझे पहचानते ही फैली थी — धीरे-धीरे बदल गई। एक दूसरी मुस्कान में। थकी हुई। समझ भरी।

"अच्छा किया, कन्हैया," उन्होंने कहा। "यहाँ नाम का जवाब नहीं देते। मैं भूल गया था।" उन्होंने अपनी क़लम डायरी पर रखी। "बहुत दिनों बाद किसी अपने को देखा, तो आदत से मुँह से निकल गया।"

छोटू ने अपना हाथ नहीं हटाया।

"डर मत, बेटा," दादाजी ने कहा। इस बार मेरा नाम नहीं लिया। "मैं तुझे कुछ खाने को नहीं दूँगा। कोई नाम नहीं पुकारूँगा। बस आ। बैठ। थोड़ी देर। मुझे तुझसे बात करनी है।"

मैंने अपनी दाईं मुट्ठी खोली। उस लड़की का घुँघरू। नदी वाला।

चुप।

बाईं मुट्ठी। देवदत्त वाला।

चुप।

मैंने छोटू की तरफ़ देखा। उसने अपनी भौंहें सिकोड़ीं। फिर धीरे-धीरे, बहुत धीरे, अपना हाथ मेरे मुँह से हटाया।

"वो वो नहीं हैं," उसने फुसफुसाया। "मुझे लगता है। पर सँभलकर, भैया।"

मैं उल्टे आँगन में गया। उल्टे चबूतरे के पास। और दादाजी की चारपाई के सामने, ज़मीन पर, बैठ गया। वैसे ही, जैसे बचपन में बैठता था। उनके पैरों के पास।

उन्होंने मुझे देखा। बहुत देर तक। मेरे चेहरे को। मेरी दाढ़ी को। मेरी सफ़ेद बाईं आँख को।

"बड़ा हो गया," उन्होंने धीरे से कहा। "आख़िरी बार जब तुझे देखा था, तू बारह बरस का था। बुख़ार में। मेरी गोद में। झाँसी के अस्पताल की तरफ़ जाती एक जीप में।"

"मुझे याद नहीं, दादाजी।"

"जानता हूँ।" उन्होंने अपना हाथ बढ़ाया। मेरे सिर की तरफ़। फिर रुक गए। हाथ हवा में रहा। "छू सकता हूँ?"

मैंने अपनी बाईं आँख से उनके हाथ को देखा। अम्मा की सीख। चेहरे झूठ बोलते हैं। हाथ देख।

उनका हाथ ख़ाली था। कोई धागा नहीं। कोई बाल नहीं। बस एक बूढ़ा, झुर्रियों वाला हाथ। जिसकी हथेली पर वो पुराना निशान था — जो उन्हें जवानी में खेत में हँसिए से लगा था। मुझे वो कहानी याद थी।

मैंने सिर हिलाया।

उन्होंने अपना हाथ मेरे सिर पर रखा।

ठंडा था। बहुत ठंडा। पानी जैसा। पर उसका भार — उसका वो ख़ास भार, जिस तरह वो मेरे बालों में उँगलियाँ फँसाते थे — वो बिल्कुल वैसा था।

और मैं रो पड़ा।

"अरे, अरे," दादाजी ने कहा। उसी तरह, जैसे वो तब कहते थे जब मैं बचपन में घुटना छिलवाकर रोता था। "इतना बड़ा हो गया, और अब भी रोता है।"

"आपने मुझे कीड़े वाली कहानी सुनाई थी," मैंने कहा। आँसुओं के बीच। "सत्रह बरस सोने वाला। आप मुझे उसके बारे में नहीं बता रहे थे, न?"

दादाजी का हाथ मेरे सिर पर रुक गया।

"नहीं," उन्होंने धीरे से कहा। "मैं तुझे उसके बारे में बता रहा था। तू सात बरस का था। तू तारे गिन रहा था। और मुझे डर था कि किसी दिन तू सीढ़ियाँ गिनेगा।" उन्होंने एक गहरी साँस ली। "मैं चाहता था कि तुझे याद रहे — कि कुछ चीज़ें ज़मीन के नीचे सोती हैं, और किसी पुकार का इंतज़ार करती हैं। ताकि जिस दिन तू वो पुकार सुने, तू जवाब न दे।"

"मैं भूल गया था।"

"मुझे पता है।" उन्होंने मेरे बालों में उँगलियाँ फेरीं। "तू सब भूल गया था। बुख़ार के बाद। और तेरे पापा तुझे दिल्ली ले गए, और मैंने उन्हें रोका नहीं। मैंने सोचा — अच्छा है। दूर रहेगा, तो भूला रहेगा। भूला रहेगा, तो बचा रहेगा।"

उनकी आवाज़ काँपी।

"फिर अड़तीसवीं रात, जब मुझे पता चला कि मैं तेरी गिनती पूरी नहीं कर सकता — तो मैंने रघु से कहा, तुझे बुलाए। अपने ही पोते को। उस जगह, जिससे मैंने उसे सत्रह बरस दूर रखा।" उन्होंने अपनी आँखें बंद कर लीं। "कोई दादा ऐसा नहीं करता, बेटा।"

"आपके पास कोई और रास्ता नहीं था।"

"हमेशा होता है।" उन्होंने आँखें खोलीं। "बस मैं उसे देख नहीं पाया।"

"मैं हर रात तुझे देखता हूँ," दादाजी ने कहा।

हम बहुत देर तक चुप बैठे रहे थे। उनका हाथ मेरे सिर पर। छोटू चबूतरे के किनारे बैठा था, अपने घुटने मोड़े, हमें देखता हुआ।

"कैसे?"

उन्होंने ऊपर इशारा किया। पानी की उस काली छत की तरफ़, जो पूरे उल्टे गाँव पर फैली थी।

"यहाँ से बावड़ी की सीढ़ियाँ दिखती हैं। नीचे से। उनके तले। और हर रात, दो बजकर सैंतालीस पर, मुझे तेरे पैर दिखते हैं। एक सीढ़ी पर उतरते हुए। फिर अगली रात, अगली पर। मैं यहाँ चबूतरे पर बैठकर उन्हें गिनता हूँ।"

उन्होंने एक थकी हुई हँसी हँसी।

"देख, विडंबना। जिस चीज़ से मैंने तुझे पूरी ज़िंदगी रोका — गिनना — वही मैं यहाँ हर रात करता हूँ। तेरे पैर। तेरी सीढ़ियाँ।"

"आप यहाँ कब से हैं, दादाजी?"

"अड़तीसवीं रात से।" उनका चेहरा कस गया। "मैं तेरी गिनती पूरी करने उतरा था। डायरी में लिखा था न? उन्नीस तूने गिनीं थीं, बाक़ी मैंने सोचा मैं उतर जाऊँगा। अगस्त के आख़िर से। हर रात।" उन्होंने अपनी हथेली देखी। "पैंतीसवीं तक सब ठीक था। फिर मुझे समझ आया कि ये मेरी गिनती नहीं है। कि मैं उतर तो सकता हूँ, पर पूरी नहीं कर सकता। अड़तीसवीं पर मेरे पैर फिसलने लगे। और उनतालीसवीं पर..."

"देवदत्त ने आपको वापस ऊपर धकेला।"

दादाजी ने सिर हिलाया। "उस लड़के ने बहुत प्यार से धकेला था। कहा — रमेसर भैया, ये आपकी जगह नहीं है। ऊपर जाइए।" उनकी आवाज़ टूटी। "मैं ऊपर गया। मुंडेर तक पहुँचा। बैठा। और मेरा दिल... बस रुक गया। अस्सी बरस की उम्र में। अड़तीस रातों की थकान के बाद।"

"और फिर आप यहाँ आ गए।"

"मेरा शरीर ऊपर रह गया। मुंडेर पर। रघु और गाँव वालों ने उसे जलाया।" उन्होंने अपनी उँगलियाँ मोड़ीं। मुझे चाची की बात याद आई — उनकी उँगलियाँ मुड़ी हुई थीं, जैसे गिनती करते वक़्त कोई मोड़ता है। "पर जो भी मैं था — मेरी याद, मेरी आवाज़, मेरा पानी — वो नीचे खिंच गया। यहाँ। इस गाँव में। जहाँ वो सब रहते हैं जो किसी सीढ़ी पर अधूरे छूट गए।"

"दादाजी," मैंने कहा, "मुझे आपसे कुछ कहना है।"

उन्होंने मेरे सिर से हाथ हटाया। और मेरी तरफ़ देखा।

"मुझे पता है," मैंने धीरे से कहा। "शंकर के बारे में। बानवे के बारे में। आपने उसका नाम लिया था। चाचा को बचाने के लिए।"

दादाजी का चेहरा पत्थर हो गया।

"रघु ने बताया," उन्होंने कहा। सवाल नहीं। सच।

"और चाचा... चाचा अब चालीसवीं पर हैं। उन्होंने सूरज की जगह ली। अपनी मर्ज़ी से।"

दादाजी ने अपनी आँखें बंद कर लीं।

"मैंने देखा," उन्होंने फुसफुसाया। "चार रात पहले। यहाँ से। उसके पैर। बहुत तेज़ी से उतरते हुए। एक ही रात में छब्बीस से चालीस तक।" उनकी बंद आँखों से पानी बहा — ऊपर की तरफ़, उल्टा, जैसे सरला का बहा था। "मैं चबूतरे से उठकर भागा था। कुएँ वाले खंभे तक। उसे रोकने। पर मैं यहाँ से ऊपर नहीं जा सकता, बेटा। मैं बस देख सकता था।"

"उन्होंने शंकर को छोड़ दिया। ऊपर भेज दिया।"

"वो भी देखा।" दादाजी ने अपनी आँखें खोलीं। "एक रोशनी। छब्बीसवीं से ऊपर उठती हुई। बुलबुलों में। पूरे उल्टे गाँव ने देखी। सब अपने घरों से बाहर आ गए थे।" उन्होंने अपना सिर हिलाया। "चौंतीस बरस, बेटा। चौंतीस बरस मैं हर हफ़्ते सुशीला के पास जाता था। क्योंकि हरिहर के पास जाने की हिम्मत नहीं थी। और मेरा बेटा... मेरे बेटे ने वो कर दिया जो मैं कभी नहीं कर पाया।"

उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।

"मुझसे नफ़रत करता है?"

मैंने उनकी आँखों में देखा। एक बूढ़े आदमी की आँखें। जिसने अपने बेटे को बचाने के लिए किसी और का बेटा दिया था। जिसने अपने पोते को एक झूठ के साथ शहर भेज दिया था। जिसने सत्रह साल तक अकेले एक डायरी में लड़ाई लड़ी थी।

"नहीं, दादाजी," मैंने कहा।

वो कुछ नहीं बोले। पर उनका हाथ फिर से मेरे सिर पर आया।

"और एक बात," दादाजी ने कहा। "दो हज़ार नौ।"

"मुझे पता है। मैंने उन्नीसवीं पर सब देखा। तस्वीर। आप कैमरा भूलकर लौटे थे।"

"मुझे लौटना नहीं चाहिए था।" उनकी आवाज़ बहुत धीमी हो गई। "मतलब — मुझे जाना नहीं चाहिए था। उस दोपहर। मुझे बच्चों को वहाँ से घसीटकर घर ले जाना चाहिए था। पर मैंने हिसाब लगाया था। मैंने सोचा अभी सत्रह बरस पूरे नहीं हुए। मैंने सोचा बानवे के बाद ज़ंजीर बँधी है, टीन तो उस साल हटी हुई थी मरम्मत के लिए, पर ज़ंजीर... अंदर का खूँटा शंकर था। मैंने सोचा वो काफ़ी है।"

उन्होंने अपनी डायरी को छुआ।

"मैंने ग़लत गिना था। पचहत्तर से गिनना चाहिए था, बानवे से नहीं। नहीं — अट्ठावन से। नहीं..." उन्होंने अपना सिर पकड़ लिया। "पता नहीं। सत्रह बरस से मैं वो हिसाब लगा रहा हूँ। और आज भी नहीं समझ पाया कि उस साल वो क्यों जागी।"

"क्योंकि माँ की पुकार पहुँच गई थी," मैंने धीरे से कहा। "रोती नदी से। सत्रह बरस का रास्ता। पर वो रास्ता हमेशा एक जैसा नहीं होता, दादाजी। कभी बारिश ज़्यादा, कभी सूखा। पानी कभी तेज़ आता है, कभी धीमा। उस साल पुकार जल्दी पहुँची।"

दादाजी ने मुझे अविश्वास से देखा।

"चाचा ने बताया। सत्रह का राज़।"

"रघु को याद था?" उनकी आवाज़ में हैरानी थी। "मैंने उससे कसम ली थी..."

"उन्होंने कसम तोड़ी। मरने से पहले।"

दादाजी बहुत देर तक चुप रहे।

"अच्छा किया," उन्होंने आख़िर में कहा। "मेरे बेटे ने अच्छा किया।"

और फिर उन्होंने डायरी खोली।

वही भूरी जिल्द। वही फूले हुए पन्ने। पर इस डायरी के पन्ने ऊपर वाली से अलग थे। उन पर हरी स्याही से भरे-भरे अक्षर थे। घने। एक के ऊपर एक। जैसे किसी ने कई दिनों तक, बिना रुके, बिना सोए, बस लिखा हो।

"मैं यहाँ बैठकर लिखता हूँ," दादाजी ने कहा। "जो ऊपर पढ़ा जाता है, कभी-कभी वो यहीं से जाता है। पानी काग़ज़ को जोड़ता है। मेरी डायरी और ये डायरी — एक ही हैं। बस एक ऊपर है, एक नीचे।"

"वो चेतावनियाँ... वो नियम... आपने लिखे थे?"

"कुछ मैंने। कुछ उसने। मेरी क़लम उसके हाथ भी लगती है।" उन्होंने सिर हिलाया। "जिसमें भी मेरा नाम हो और तेरा भला हो — वो मेरी थी। बाक़ी उसकी।"

उन्होंने एक पन्ना पलटा। और उसे मेरी तरफ़ घुमाया।

उस पर अक्षर थे। अकेले-अकेले। अलग-अलग लिखावट में। हर अक्षर के बगल में एक नाम।

स — रामप्यारी (अट्ठावन, पानी में देखा) स — मास्टर ओमप्रकाश की पोथी (विक्रम ने देखा) सु — रघुनाथ (बानवे, रोती नदी की तली) सुख — विक्रम (सत्रहवीं सीढ़ी, दरार से) सुख... — सरला (पचहत्तर, पैंतीसवीं पर सपने में) सुख... — एक बच्चा, अठारह सौ इकहत्तर (नाम नहीं मालूम)

और आगे। दर्जनों पंक्तियाँ। अलग-अलग साल, अलग-अलग लोग। हर एक के पास उसके नाम का एक टुकड़ा। एक अक्षर। दो अक्षर। कोई भी तीसरे अक्षर तक नहीं पहुँचा था।

"दो सौ अस्सी बरस में," दादाजी ने धीरे से कहा, "जिस-जिसने उसका नाम सुना — आधा, अधूरा, टूटा हुआ — मैंने उन्हें यहाँ ढूँढा। इस उल्टे गाँव में। हर घर में गया। हर पनघट पर। हर उस आदमी से पूछा जो ज़ंजीर से छूटकर यहाँ अटका है।"

"आपको पूरा नाम मिला?"

दादाजी ने अपना सिर हिलाया।

"सुख तक। उससे आगे कोई नहीं पहुँचा।" उन्होंने अपनी उँगली उस आख़िरी अक्षर पर रखी। "उसके आगे जो है, वो सिर्फ़ दो जगह है। उसकी माँ के पास। और उस शिला पर।"

"अब सुन, बेटा," दादाजी ने कहा। उनकी आवाज़ बदल गई। नरम से कठोर। जैसी वो तब होती थी जब मैं बचपन में कोई ग़लती करता था और वो मुझे समझाते थे। "जो मैं कहने जा रहा हूँ, वो ध्यान से सुन।"

मैं सीधा बैठ गया।

"गंगाधर बाबा की चिट्ठी पढ़ी तूने। ओरछा वाली। मुझे पता है — ये पानी सब सुनता है।" उन्होंने अपनी डायरी बंद की। "उसमें दो रास्ते लिखे थे। नाम पढ़ना। या माफ़ी माँगना।"

"हाँ।"

"माफ़ी वाला रास्ता," दादाजी ने कहा, "बच्चों की कहानी है।"

छोटू चबूतरे के किनारे से उठ खड़ा हुआ।

"बाबा—"

"चुप रह, कन्हैया।" दादाजी ने उसकी तरफ़ नहीं देखा। "मैं जानता हूँ तू क्या कहेगा। कि वो रोती है। कि वो अपनी माँ को पूछती है।" उनकी आँखें मुझ पर टिकी रहीं। "भूख भी रोना जानती है, बेटा। भूख भी माँ को पुकारना जानती है। दो सौ अस्सी बरस वो उस लड़की में रही है। उसकी हर याद में। उसकी हर आवाज़ में। तुझे क्या लगता है, तू जिस लड़की से माफ़ी माँगने जाएगा, वो लड़की होगी? या वो भूख, जिसने उस लड़की का चेहरा पहन रखा है — जैसे उसने कन्हैया का पहना था, मुझ जैसा पहना था, देवदत्त का पहना था?"

मैं चुप रहा।

"गंगाधर ने ख़ुद लिखा था — यदि वह क्षमा न करे, तो मैं नहीं जानता।" दादाजी ने धीरे से कहा। "वो नहीं जानता था, क्योंकि कोई नहीं जानता। और जिस चीज़ का अंजाम कोई न जानता हो, उस पर पूरा गाँव दाँव पर नहीं लगाया जाता।"

"और नाम पढ़ने का अंजाम?"

"वो सब जानते हैं।" दादाजी ने अपनी उँगलियाँ गिनीं — एक-एक करके, जैसे वो मरते वक़्त मुड़ी हुई थीं। "भूख बँधेगी। हमेशा के लिए। पत्थर में। कोई सत्रह बरस नहीं। कोई गिनती नहीं। कोई बच्चा नहीं। भानपुरा बच जाएगा। दिल्ली बच जाएगी। हर कुआँ, हर घाट, हर नल।"

"और लड़की भी बँधेगी।"

"हाँ।"

"सूरज की माँ की साँस टूटेगी।"

दादाजी की उँगली रुकी।

"हाँ।"

"बबलू का धागा..."

"मुझे नहीं पता।" उन्होंने ईमानदारी से कहा। "शायद टूटे। शायद बबलू बच जाए। शायद..." उन्होंने कंधे उचकाए। "हर लड़ाई की एक क़ीमत होती है, बेटा। मिश्र दो सौ अस्सी बरस से ये क़ीमत चुकाने से भागते रहे हैं। गंगाधर भागा। उसका पोता भागा। मैं भागा — मैंने शंकर का नाम लेकर। हर पीढ़ी ने किसी और के बच्चे को आगे कर दिया, और ख़ुद पीछे खड़े रहे।"

उनकी आवाज़ काँप रही थी।

"अब भागना बंद।"

"आप मुझसे क्या चाहते हैं, दादाजी?"

उन्होंने मुझे देखा। बहुत देर तक।

"तू उनतालीसवीं तक पहुँचेगा," उन्होंने कहा। "सत्रह रात और। और उस रात, जब तुझे चालीस बोलना होगा — तू मत बोलना।"

"फिर?"

"फिर मुझे बोलने देना।"

मैं जम गया।

"मेरी गिनती तेरी गिनती का हिस्सा है, बेटा।" उन्होंने अपनी हथेली खोली। और मेरी बाईं आँख में — पहली बार — मैंने उनके हाथ में कुछ देखा। एक धागा। बहुत पतला। बहुत पुराना। उनकी कलाई से निकलकर... मेरी तरफ़। मेरे टख़ने तक। मेरी गिनती तक।

वो ज़ंजीर के हिस्से नहीं थे। पर वो मुझसे जुड़े थे।

"मैं बीस से अड़तीस तक तेरे लिए उतरा था," उन्होंने कहा। "वो सीढ़ियाँ तेरी थीं। मेरे पैरों में। इसलिए मैं तेरी गिनती में हूँ। और अगर तू उनतालीसवीं पर पहुँचकर मुझे बुलाए — अगर तू मुझे अपनी जगह चालीस बोलने दे — तो मैं चालीसवीं बनूँगा।"

"चाचा की जगह?"

दादाजी की आँखें भर आईं।

"रघु आज़ाद होगा। मेरा बेटा। जो मेरी वजह से वहाँ है।" उन्होंने अपनी आवाज़ सँभाली। "और तू बचेगा। तू उनतालीसवीं पर रहेगा, पत्थर नहीं बनेगा। ज़िंदा ऊपर जाएगा। और मैं — चालीसवीं बनकर — शिला तक पहुँचूँगा। उसके पैरों तक। और उसका नाम पढ़ूँगा।"

"आपको पूरा नाम नहीं पता।"

"तू लाएगा।" उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा। ठंडा। पानी जैसा। "उसकी माँ से। रोती नदी से। कोई न कोई रास्ता होगा। तू ले आ, बेटा। पूरा नाम। और मुझे दे दे। और मैं उस लड़की को — उस भूख को — हमेशा के लिए बाँध दूँगा। मिश्रों का आख़िरी काम। गंगाधर के पाप का आख़िरी हिसाब।"

उन्होंने मेरी उँगलियाँ दबाईं।

"तुझे कुछ नहीं होगा। रघु आज़ाद होगा। गाँव बचेगा। बस एक बूढ़ा आदमी, जो पहले ही मर चुका है, थोड़ा और नीचे चला जाएगा।"

"नहीं!"

छोटू चबूतरे से कूदा। हमारे बीच आ गया। उसकी आँखें ग़ुस्से से जल रही थीं।

"बाबा, आप उसे हमेशा के लिए बंद कर दोगे! उस लड़की को! वो पहले ही दो सौ अस्सी बरस से उल्टी पड़ी है! वो अपना नाम भूल गई है! वो अपनी माँ को ढूँढ रही है! और आप उसका नाम पढ़कर उसे... उसे फिर से वहीं गाड़ दोगे! जैसे गंगाधर बाबा ने किया था!"

"कन्हैया—"

"आप भी वही कर रहे हो!" छोटू की आवाज़ टूट गई। "एक मिश्र, एक लड़की के नाम से, उसे बाँध रहा है! फिर से! बस इस बार आप कह रहे हो कि आप ख़ुद भी नीचे जाओगे! पर वो तब भी बँधेगी!"

दादाजी ने छोटू को देखा। और उनके चेहरे पर कोई ग़ुस्सा नहीं था। बस एक बहुत पुराना, बहुत थका हुआ दुख।

"तू ठीक कहता है, बेटा," उन्होंने धीरे से कहा। "वो बँधेगी। और ये पाप होगा। और मैं वो पाप अपने सिर लूँगा।" उन्होंने अपना हाथ छोटू के सिर पर रखा। "पर तूने भूख को नहीं देखा जैसे मैंने देखा है। अड़तीस रातें। मेरे बेटे के मुँह से गिनती करवाते हुए। गुड्डी के कान में फुसफुसाते हुए। सूरज को पत्थर बनाते हुए। उसने जो बच्चे लिए हैं — दो सौ अस्सी बरस में — उनकी गिनती मेरी डायरी में है, कन्हैया। तू उनमें से एक है।"

छोटू ने कुछ नहीं कहा। उसकी आँखों से पानी ऊपर की तरफ़ बहा।

"एक लड़की के लिए," दादाजी ने कहा, "मैं और बच्चे नहीं दूँगा।"

मैं उठ खड़ा हुआ।

मेरे अंदर सब कुछ उलझा था। दादाजी की बात सच लगती थी। छोटू की भी। दोनों रास्ते किसी न किसी को डुबोते थे। दोनों।

"मुझे सोचने दीजिए," मैंने कहा।

दादाजी ने सिर हिलाया। "सत्रह रातें हैं, बेटा। सोच। पर जब तू उनतालीसवीं पर पहुँचे, तो मुझे बुलाना। मैं वहीं होऊँगा। कुएँ के खंभे के पास। इंतज़ार करता हुआ।"

छोटू ने मेरा हाथ पकड़ा। "चलो, भैया। ऊपर सुबह होने वाली है।"

हम आँगन से निकले। उल्टी गली में।

और तब, पीछे से, दादाजी ने धीरे से कुछ कहा। मुझसे नहीं। शायद ख़ुद से। शायद अपनी डायरी से।

"सुख... सुख... उसके बाद क्या है? उसके बाद क्या है, बिटिया?"

और मेरी दाईं मुट्ठी में — उस लड़की का घुँघरू — बजा।

पर इस बार वो घुँघरू चेतावनी नहीं था।

वो रो रहा था।

पतली, टूटी हुई आवाज़ में। छन... छन... छन... जैसे कोई लड़की अपनी पायल पहने हुए, भाग रही हो, और हर क़दम पर घुँघरू उसके डर के साथ बज रहा हो।

मैं रुका। छोटू भी रुका।

और उल्टे गाँव के नीचे से — बहुत नीचे से, उस ज़मीन के अंदर से, जहाँ सरला ने कहा था कि वो उल्टी गड़ी है — एक आवाज़ आई।

एक लड़की की। पहली बार। बिना भूख के। बिना किसी दोहरी गूँज के। अकेली। साफ़। सत्रह बरस की।

और वो चीख़ रही थी।

"फिर से नहीं! फिर से नहीं! मिश्र मुझे फिर से गाड़ेंगे! फिर से नहीं!"

वो उसने सुना था। दादाजी की योजना। पूरी।

और उल्टे भानपुरा की हर लालटेन बुझ गई।

एक साथ। एक पल में। अँधेरा। पूरा।

और उस अँधेरे में, मैंने महसूस किया — हर घर के दरवाज़े पर, हर खिड़की में, हर उल्टी गली में — कोई खड़ा हो गया था। सैकड़ों। वो सब, जो ज़ंजीर से छूटकर यहाँ अटके थे। वो मोटी औरत, पूरियों वाली। वो बूढ़ी, चरखे वाली। वो बच्चे, कंचों वाले।

और वो सब मेरी तरफ़ देख रहे थे।

मुझे उनकी आँखें नहीं दिख रही थीं। पर मैं उन्हें महसूस कर सकता था। सैकड़ों निगाहें। अँधेरे में। मुझ पर।

और फिर उन सबके मुँह से, एक साथ, एक फुसफुसाहट उठी। धीमी। पूरे गाँव में फैलती हुई। जैसे पानी की लहर।

"गंगाधर का ख़ून..."

"गंगाधर का ख़ून..."

"गंगाधर का ख़ून..."

छोटू का हाथ मेरे हाथ में काँप रहा था।

"भागो, भैया," उसने फुसफुसाया। "पीछे मत देखना। चाहे कुछ भी हो। पीछे मत देखना।"

और हम भागे।

अँधेरे में। उल्टी गली में। मुझे कुछ नहीं दिख रहा था। मेरी दाईं आँख बेकार थी, और बाईं — पानी की आँख — इस पानी के बिना वाली जगह में धुँधली थी। बस छोटू का गर्म हाथ, मुझे खींचता हुआ।

मेरे चारों ओर क़दमों की आवाज़ें थीं। धीमी। घिसटती हुई। उल्टी — मैं उन्हें पीछे से आगे आते सुन रहा था, जैसे कोई टेप उल्टा चल रहा हो।

और आवाज़ें।

"विक्रम... रुक जा, बेटा... पूरी ठंडी हो रही है..."

वो मोटी औरत। कहीं बाईं तरफ़। बहुत पास।

"गंगाधर का पोता... मेरे बेटे को तेरे पुरखे ने... अठारह सौ इकहत्तर में..."

एक बूढ़े आदमी की। दाईं तरफ़।

किसी का हाथ मेरी कमीज़ के कोने को छुआ। ठंडा। गीला। मैंने झटका दिया। कोई मेरे कान के पास फुसफुसाया — "मुड़कर देख, एक बार, बस एक बार..."

मैंने नहीं देखा।

और तब, अँधेरे के बीच से, एक और आवाज़ आई। एक औरत की। जवान। गाती हुई। पीपल की उल्टी घंटियों की सिसकारी के ऊपर से।

"सीढ़ी-सीढ़ी उतरी पनिहारिन..."

सरला।

"उसकी आवाज़ के पीछे चलो," छोटू ने कहा। "वो पनघट पर है। कुएँ के खंभे के पास। वहीं से ऊपर का रास्ता है।"

हम उस आवाज़ के पीछे भागे। अँधेरे में। गीत की हर पंक्ति के साथ वो पास आती गई।

"...घड़ा लिया सिर पे, पाँव में पायल..."

एक ठंडी उँगली ने मेरी कलाई पकड़ी। मैंने बाएँ हाथ से झटका दिया। वो छूट गई। पीछे से एक सिसकारी आई। निराश।

"...नाम दबा है पाँव के नीचे..."

पनघट। मेरे पैर पत्थर के चबूतरे से टकराए। और सामने, अँधेरे में, कुएँ का वो उल्टा खंभा — उसके अंदर पानी ऊपर की तरफ़ बहता हुआ, हल्की हरी रोशनी देता हुआ।

सरला उसके पास खड़ी थीं। उनका हाथ आगे बढ़ा।

"अंदर जाओ," उन्होंने कहा। "ये तुम्हें सीधे इक्कीसवीं तक ले जाएगा। पानी के साथ।"

"आप?"

"मैं यहीं रहूँगी।" उन्होंने मुस्कुराने की कोशिश की। "ये लोग मुझे नहीं छूते। मैं उन्हीं में से एक हूँ।" फिर उनकी आवाज़ धीमी हो गई। "पर गंगाधर के ख़ून को ये कभी माफ़ नहीं करेंगे, बेटा। जो लड़की ने कहा, वो सबने सुना। अगली बार नीचे आओ, तो अकेले मत आना।"

छोटू ने मेरा हाथ पकड़ा। और हम उस खंभे में कूद गए।

पानी। ऊपर की तरफ़ बहता हुआ। हमें अपने साथ खींचता हुआ। उल्टा। तेज़। और एक पल के लिए — सिर्फ़ एक पल के लिए — मैंने पीछे से एक आवाज़ सुनी। दादाजी की। अँधेरे गाँव से। बहुत दूर से।

"सोचना, बेटा... सत्रह रातें..."

और फिर हम इक्कीसवीं सीढ़ी पर थे। पानी में। और ऊपर सुबह हो रही थी।

मैं मुंडेर पर आया तो वहाँ मामी बैठी थीं।

अम्मा के बगल में। कन्हैया की नीली कमीज़ अब भी उनकी साड़ी के ऊपर। उनके हाथ में कुछ था — एक छोटी-सी पोटली, लाल कपड़े की।

"अम्मा ने सब बताया," उन्होंने मेरे बोलने से पहले कहा। "रोती नदी। वो माँ। उसका घुँघरू।" उन्होंने अपना हाथ बढ़ाया। "मुझे दे।"

मैंने अपनी दाईं मुट्ठी देखी। उस लड़की का घुँघरू। वो अब भी बहुत धीमे बज रहा था। रो रहा था।

"मामी, आप अकेली नहीं जा सकतीं। वहाँ दो बजकर सैंतालीस पर..."

"कोई और जा भी नहीं सकता, विक्की।" उन्होंने सीधे मेरी आँखों में देखा। "तू बावड़ी में होगा। सूरज अभी चल नहीं सकता। रामप्यारी अंधी है। और देवदत्त..." उन्होंने अम्मा की तरफ़ देखा, और रुक गईं।

"देवदत्त आज सुबह से पानी माँग रहा है," अम्मा ने धीरे से कहा। "बार-बार। मैं दे नहीं रही। पर वो तड़प रहा है।"

मामी ने फिर से अपना हाथ बढ़ाया।

"एक माँ दूसरी माँ की आवाज़ पकड़ सकती है," उन्होंने कहा। "कन्हैया ने कहा था न?"

मैंने घुँघरू उनकी हथेली में रखा।

उन्होंने उसे अपनी मुट्ठी में बंद किया। और आँखें बंद कर लीं। और उनके चेहरे पर कुछ आया — दर्द, और उसके नीचे कुछ और।

"रो रही है," उन्होंने फुसफुसाया। "बिटिया रो रही है।"

और मामी ने अपनी मुट्ठी अपनी छाती से लगा ली। उसी जगह, जहाँ कन्हैया की कमीज़ का नीला बटन था।

भाग 22 समाप्त।

अगले भाग में — "तेईसवीं सीढ़ी": उल्टे भानपुरा के लोग — जो दो सौ अस्सी बरस में ज़ंजीर से छूटे — अब विक्रम को पहचान गए हैं। गंगाधर का ख़ून। और उनमें से कुछ उसे बचाना चाहते हैं, कुछ उसे वहीं रोकना। उधर, ऊपर, सुशीला मामी तय करती हैं कि वो रोती नदी पर जाएँगी। अकेली। दो बजकर सैंतालीस पर...

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