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भाग 21 — इक्कीसवीं सीढ़ी

Piyashi Atma · Real Experiences · 20 मिनट

Writer
Piyashi Atma
Story
भानपुरा की बावड़ी - चालीस सीढ़ियाँ
Chapter
21 of 31
Category
Real Experiences
Reading time
20 min
Words
3999
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

हर दरवाज़े के दो तरफ़ होते हैं।

हम हमेशा अपनी तरफ़ से सोचते हैं। कौन खटखटा रहा है? क्या खोलूँ? क्या ये सुरक्षित है? हम अपनी कुंडी पर हाथ रखते हैं और डरते हैं कि बाहर क्या है।

पर हम कभी नहीं सोचते कि दरवाज़े के उस तरफ़ खड़ा जो है — वो भी डरता होगा। कि शायद वो भी सालों से किसी दरवाज़े के खुलने का इंतज़ार कर रहा हो। कि शायद वो भी किसी को ढूँढ रहा हो।

सुशीला मामी ने सत्रह साल अपना दरवाज़ा बिना धागे के रखा था। ताकि उनका बेटा आए, तो उसे कुछ न रोके।

उस रात उनका दरवाज़ा खुला।

और उसके दोनों तरफ़, एक-एक माँ को ढूँढता कोई खड़ा था।

"ऊपर जाओ, भैया। अभी।"

छोटू ने मेरा हाथ छोड़ा और मुझे ऊपर की तरफ़ धकेला। बीसवीं से उन्नीसवीं पर। उसकी आँखें डर से फैली हुईं।

"मैं तेरे बिना नहीं—"

"मैं ऊपर नहीं आ सकता!" उसकी आवाज़ टूट गई। "दसवीं से आगे मैं घुल जाता हूँ। तुम्हें जाना होगा। मम्मी... भैया, मम्मी उसका हाथ पकड़ लेंगी। मुझे पता है। वो सत्रह बरस से इसी पल का इंतज़ार कर रही हैं।"

मैं मुड़ा। और चढ़ा।

मैंने कभी रुके हुए वक़्त में ऊपर चढ़ने की कोशिश नहीं की थी। हर रात मैं सुबह तक अपनी सीढ़ी पर खड़ा रहता था, और सुबह होते ही बावड़ी मुझे छोड़ देती थी। पर आज मैं चढ़ा — बाएँ हाथ से दीवार पकड़े — और हर सीढ़ी पर पानी मुझे पीछे खींचता रहा। जैसे कह रहा हो, अभी नहीं, अभी तेरा वक़्त नहीं।

अठारहवीं। पंद्रहवीं। दसवीं।

दसवीं पर मैंने पीछे मुड़कर देखा। छोटू वहीं खड़ा था। दसवीं के ठीक नीचे। अपनी अदृश्य दीवार के पीछे। उसके हाथ जुड़े हुए थे। जैसे प्रार्थना कर रहा हो।

आठवीं। पाँचवीं। दूसरी।

मुंडेर।

और मैं दौड़ा।

रुका हुआ भानपुरा।

मैंने उसे पहले देखा था, तेरहवीं रात। जब बच्चे गलियों में चल रहे थे। पर तब मैं उनके पीछे भाग रहा था, और मैंने कुछ नहीं देखा था।

आज मैंने देखा।

पीपल की घंटियाँ हवा में जमी हुई थीं। कुछ आधी झूलती हुई, एक कोण पर टँगी। उनकी आवाज़ बीच में कटी हुई। सड़क की धूल — जो मेरे पैरों से उड़नी चाहिए थी — नहीं उड़ी। मेरे क़दम पड़ते, और धूल वहीं रहती। जैसे मैं किसी तस्वीर पर चल रहा हूँ।

गाँव की पहली गली। एक कुत्ता, भौंकने के लिए मुँह खोले हुए, जमा हुआ। एक घर की खिड़की में लालटेन, उसकी लौ स्थिर, एक पत्थर के फूल की तरह। एक खाट पर सोया आदमी, करवट लेने के बीच में, आधा मुड़ा हुआ।

और फिर मामी की गली।

मैंने उन्हें देखा। दूर से।

वो दरवाज़े पर खड़ी थीं। चौखट पर। एक हाथ से चौखट पकड़े। दूसरा हाथ आगे बढ़ा हुआ। बाहर की तरफ़। उँगलियाँ फैली हुई।

और उनके सामने, दरवाज़े के बाहर, गली की धूल में, एक बच्चा खड़ा था।

हाफ़ पैंट। नीली कमीज़। गीले बाल माथे पर चिपके हुए।

छोटू।

नहीं। वो छोटू नहीं था। मुझे पता था। छोटू बावड़ी में था, दसवीं सीढ़ी के नीचे, हाथ जोड़े।

पर वो बिल्कुल छोटू जैसा था। वही क़द। वही चेहरा। वही शरारती मुस्कान। और वो अपना हाथ ऊपर बढ़ाए था। मामी की तरफ़। उनकी फैली हुई उँगलियों से बस कुछ इंच दूर।

"मम्मी," उसने कहा। उसकी आवाज़ बिल्कुल छोटू की थी। "मम्मी, ठंड लग रही है।"

मामी का चेहरा — मैंने उसे पहले कभी ऐसा नहीं देखा था। सत्रह साल की सारी थकान, सारा दुख, सारा सूखापन उसमें से ग़ायब हो गया था। वो एक जवान माँ का चेहरा था। उम्मीद से भरा हुआ। आँसुओं से चमकता हुआ।

"कन्हैया," उन्होंने फुसफुसाया। "मेरा कन्हैया।"

उनकी उँगलियाँ आगे बढ़ीं।

"मामी!" मैं चिल्लाया।

वो नहीं रुकीं। उन्होंने मुझे सुना भी नहीं। उनकी पूरी दुनिया उस बच्चे में सिमट गई थी।

और तब मैंने देखा — अपनी बाईं आँख से, जो अब पूरी तरह पानी की दुनिया देखती थी — उस बच्चे के पैर।

वो धूल पर नहीं खड़े थे। वो धूल से कुछ इंच ऊपर थे। और उनके नीचे से, ज़मीन में धँसते हुए, बाल निकल रहे थे। काले। पतले। गली के बीच से, पीपल की तरफ़, बावड़ी की तरफ़ जाते हुए। एक मोटी रस्सी की तरह।

और उस बच्चे के चेहरे पर — मेरी बाईं आँख में — एक और चेहरा था। उसके ठीक नीचे। उसके आर-पार झाँकता हुआ। जैसे किसी पारदर्शी मुखौटे के पीछे।

भूख। कोई चेहरा नहीं। बस एक खुला मुँह। और उसके अंदर सीढ़ियाँ।

मैं उनके बीच में कूद गया।

मामी और उस बच्चे के बीच। अपनी पीठ मामी की तरफ़। अपना चेहरा उसकी तरफ़।

उस बच्चे ने — उस छोटू के चेहरे ने — मुझे देखा। और मुस्कुराया। वही मुस्कान। होंठ का एक कोना ऊपर, एक नीचे।

"भैया," उसने कहा। "हटो। मम्मी से मिलना है।"

"तू वो नहीं है।"

"मैं ही हूँ। देखो।" उसने अपनी कमीज़ की तरफ़ इशारा किया। "फटी जेब। मम्मी को मत बताना।"

मेरे पीछे मामी ने एक सिसकी भरी।

"मामी," मैंने बिना मुड़े कहा, "उससे पूछिए कि उसकी जेब किस चीज़ से फटी थी।"

मामी चुप रहीं।

"पूछिए, मामी।"

एक लंबी चुप्पी। रुकी हुई गली में। रुके हुए वक़्त में।

फिर मामी की आवाज़ आई। काँपती हुई।

"कन्हैया... तेरी जेब... किस चीज़ से फटी थी?"

उस बच्चे की मुस्कान एक पल के लिए अटकी। बहुत छोटा पल।

"पेड़ पर चढ़ते हुए, मम्मी," उसने कहा। "आम के पेड़ पर। टहनी में फँस गई थी।"

मेरे पीछे, मामी का हाथ — जो अब भी आगे बढ़ा था — धीरे-धीरे नीचे आया।

मैंने अपनी जेब में हाथ डाला। बटन वहाँ नहीं था — मैंने सुबह मामी को दे दिया था। पर मामी ने उसे अपनी कमीज़ पर टाँका था। कन्हैया की कमीज़ पर। और वो कमीज़...

मैंने पीछे मुड़कर देखा।

मामी ने वो कमीज़ पहन रखी थी। बच्चों वाली। नीली। उनके कंधों पर बहुत छोटी, बाँहें कोहनियों तक भी नहीं आतीं। पर उन्होंने उसे अपनी साड़ी के ऊपर पहन रखा था। रात को सोने से पहले। और उस पर, जेब के ऊपर, वो नीला बटन टँका था।

मामी ने अपनी उँगलियों से उस बटन को छुआ।

"मेरे कन्हैया की जेब," उन्होंने धीरे से कहा, "इस बटन के खिंचने से फटी थी। उसने ख़ुद बताया। सुबह। विक्की के हाथ।"

उन्होंने उस बच्चे की तरफ़ देखा। और उनकी आँखों में अब उम्मीद नहीं थी। कुछ और था। कुछ ठंडा। कुछ स्थिर।

"मेरे कन्हैया ने कहलवाया है कि वो भूखा नहीं है," उन्होंने कहा। "तू भूखा है।"

उस बच्चे का चेहरा ऐंठा।

धीरे-धीरे। मोम की तरह। मुस्कान फैली। और फैली। और उसके पीछे वो खुला मुँह, वो सीढ़ियाँ — मेरी बाईं आँख में — आगे आने लगा। छोटू के चेहरे को धकेलता हुआ। फाड़ता हुआ।

और तब मेरी दाईं मुट्ठी में कुछ बजा।

उस लड़की का घुँघरू। नदी वाला।

अपने आप। बिना किसी के हिलाए। एक पतली, मीठी, बहुत पुरानी आवाज़।

छन्न।

और उस बच्चे का चेहरा — जो फट रहा था — रुक गया।

भूख वाला मुँह पीछे हटा। एक झटके में। जैसे किसी ने उसे खींच लिया हो। और छोटू का चेहरा भी पिघलने लगा। और उन दोनों के बीच से, एक पल के लिए — सिर्फ़ एक पल के लिए — एक तीसरा चेहरा झाँका।

एक लड़की का।

छोटी। सत्रह बरस की, पर उससे कम दिखती हुई। गोल चेहरा। बड़ी-बड़ी आँखें, डरी हुई, उलझी हुई। गीले बाल, बस कंधों तक। और उसके माथे पर लाल बिंदी, जो पानी में फैल गई थी।

उसने घुँघरू की आवाज़ सुनी थी। अपनी पायल की आवाज़। दो सौ अस्सी बरस बाद।

और उसने ऊपर देखा। मेरे पार। मामी की तरफ़। एक माँ की तरफ़, जो एक खुले दरवाज़े पर खड़ी थी।

उसके होंठ हिले।

"...माँ?..."

मामी जम गईं।

उन्होंने उस चेहरे को देखा। उस लड़की को। और मैंने उनके अंदर कुछ बदलते देखा। उनका चेहरा — जो अभी ठंडा और कठोर था — फिर से नरम हुआ। पर इस बार उम्मीद से नहीं।

पहचान से।

एक माँ की पहचान। जो किसी भी बच्चे में वो डर पहचान लेती है, जो सिर्फ़ उस बच्चे में होता है जो अपनी माँ को ढूँढ रहा हो।

"बिटिया?" मामी ने धीरे से कहा।

उस लड़की की आँखें फैलीं। उसके होंठ काँपे।

और मामी ने अपना हाथ फिर से आगे बढ़ाया। इस बार उसकी तरफ़। उस लड़की की तरफ़। उस भूख के बीच झाँकते, खोए हुए चेहरे की तरफ़।

"मामी, नहीं—"

पर उन्होंने उसे छुआ नहीं। उनका हाथ बस हवा में रहा। उस चेहरे से कुछ इंच दूर। जैसे किसी डरे हुए जानवर के सामने रखा जाता है। ताकि वो सूँघ सके। पहचान सके।

"तेरी माँ तुझे ढूँढ रही है, बिटिया," मामी ने कहा। बहुत धीमे। बहुत प्यार से। "मुझे पता है। एक माँ दूसरी माँ का रोना पहचानती है। मैं सत्रह बरस रोई हूँ। वो दो सौ बरस से रो रही है।"

लड़की का चेहरा काँपा। उसकी आँखों से पानी बहा।

और तब भूख लौटी।

नीचे से। बालों से। एक झटके में। वो लड़की का चेहरा अंदर खींचा गया — जैसे कोई डूबते हुए को वापस पानी में खींचता है — और उसकी जगह फिर से वो मुँह आया, वो सीढ़ियाँ, और एक गुर्राहट, जो धरती के खिसकने जैसी थी।

और फिर वो पूरी आकृति — छोटू का चेहरा, भूख का मुँह, सब — ज़मीन में धँस गई। उन बालों की रस्सी के साथ। पीपल की तरफ़ खिंचती हुई। बावड़ी की तरफ़।

और ग़ायब हो गई।

मामी दरवाज़े पर खड़ी रहीं। उनका हाथ अब भी आगे बढ़ा हुआ। ख़ाली।

मैंने उन्हें पकड़ा। वो गिर नहीं रही थीं। वो बस खड़ी थीं। कन्हैया की छोटी-सी नीली कमीज़ में।

"वो लड़की," उन्होंने फुसफुसाया। "विक्की, उसके अंदर एक लड़की है।"

"हाँ, मामी।"

"वो अपनी माँ को ढूँढ रही है।" उनकी आँखें अब भी गली की उस जगह पर थीं, जहाँ वो आकृति धँसी थी। "इसीलिए वो आई थी। मेरे दरवाज़े पर। सत्रह बरस बाद। कन्हैया का चेहरा लेकर नहीं — भूख ने वो चेहरा लिया था। पर लड़की... लड़की इसलिए आई थी क्योंकि यहाँ एक दरवाज़ा था जो खुलता था। एक माँ थी जो इंतज़ार करती थी।"

अंदर से गुड्डी की रोने की आवाज़ आई। वो भी रुके हुए वक़्त में जाग रही थी — उसका कड़ा चमक रहा था। मामी ने उसकी तरफ़ मुड़कर देखा।

फिर वो मेरी तरफ़ मुड़ीं। और उनका चेहरा बदल गया था। दुख उसमें अब भी था, सत्रह साल का। पर उसके ऊपर कुछ और आ गया था। एक फ़ैसला।

"उसकी माँ कहाँ है, विक्की?"

"रोती नदी में। तीन कोस दूर। उसकी तली में। दो सौ अस्सी बरस से पुकार रही है।"

मामी ने सिर हिलाया। धीरे से।

"तो कोई उसकी पुकार उस बिटिया तक पहुँचाए," उन्होंने कहा। "मैं पहुँचाऊँगी।"

मेरे अंदर छोटू की बात गूँजी। कोई माँ ही किसी माँ की आवाज़ सबसे अच्छी तरह पकड़ सकती है।

"मामी..."

"अभी नहीं।" उन्होंने गुड्डी की तरफ़ देखा। "पहले बिटिया को सुला दूँ। फिर सोचते हैं।" उन्होंने अपनी कमीज़ का बटन छुआ। "तू जा, विक्की। तुझे अपनी सीढ़ी पर लौटना है। मैं ठीक हूँ।"

और वो अंदर चली गईं। और दरवाज़ा बंद किया।

पर कुंडी नहीं लगाई।

मैं वापस भागा। पीपल वाली सड़क। मुंडेर। पानी।

पहली। पाँचवीं। दसवीं।

छोटू वहाँ था। दसवीं के नीचे। उसकी आँखें मेरे चेहरे पर गईं और सब पढ़ लिया।

"मम्मी ठीक हैं?"

"ठीक हैं। उन्होंने उसे पहचान लिया। बटन से।"

छोटू ने अपनी आँखें बंद कीं। और साँस ली। पानी की साँस। राहत की।

"और छोटू..." मैंने उसका हाथ पकड़ा। "उसके अंदर वो लड़की थी। एक पल के लिए। उसने मामी को 'माँ' कहा।"

छोटू की आँखें खुलीं। फैलीं।

"वो ऊपर तक आई? भूख के साथ?"

"हाँ। घुँघरू की आवाज़ सुनकर।"

छोटू ने बहुत देर तक मुझे देखा। फिर उसने मेरे दोनों हाथ पकड़े। और नीचे की तरफ़ खींचा।

"चलो, भैया," उसने कहा। "इक्कीसवीं। अभी वक़्त है। मैं तुम्हें दिखाता हूँ।"

इक्कीसवीं सीढ़ी।

मैंने उस पर पैर रखा। पानी मेरे चारों ओर। वही ठंडा, भारी, काला पानी।

पर मेरे पैरों के नीचे — सीढ़ी के नीचे — कुछ अलग था।

"नीचे देखो, भैया," छोटू ने कहा। "आज देख सकते हो। यहाँ से आगे नीचे देखना मना नहीं। क्योंकि यहाँ से आगे नीचे, ऊपर है।"

मैंने नीचे देखा।

इक्कीसवीं सीढ़ी के किनारे पर पानी ख़त्म हो जाता था।

किसी दीवार की तरह नहीं। किसी सतह की तरह। जैसे पानी का एक फ़र्श हो, चमकता हुआ, आईने जैसा — पर उल्टा। और उस सतह के पार, नीचे, कुछ था।

रोशनी। हरी-पीली। लालटेनों जैसी।

और छतें।

नीचे की तरफ़ लटकी हुई छतें। खपरैल की, टीन की, फूस की। उनके नीचे — उनके ऊपर — दीवारें, दरवाज़े, खिड़कियाँ। सब उल्टे। जैसे किसी ने पूरे गाँव को उठाकर उसकी नींव आसमान की तरफ़ कर दी हो।

"उल्टा भानपुरा," छोटू ने कहा। "आओ।"

उसने मेरा हाथ पकड़ा और उस सतह की तरफ़ क़दम बढ़ाया।

और हम उसके पार गिर गए।

गिरना नहीं था। पलटना था।

एक पल के लिए सब घूम गया। मेरा पेट मेरे गले में आया। ऊपर नीचे हुआ, नीचे ऊपर। और फिर मेरे पैर किसी चीज़ पर टिके।

ज़मीन।

सूखी। ठोस। धूल भरी।

मैंने साँस ली। और हवा मेरे फेफड़ों में गई। पानी नहीं — हवा। ठंडी, सीलन भरी, पुरानी हवा, जिसमें गीली मिट्टी और काई की गंध थी। पर हवा।

मैं खड़ा था। एक गली में। कच्ची। धूल भरी। दोनों तरफ़ घर।

और मैंने ऊपर देखा।

ऊपर आसमान नहीं था। ऊपर पानी था। एक विशाल, काली, हिलती हुई छत। पूरे गाँव के ऊपर फैली हुई। और उस पानी में, बहुत ऊपर, एक छोटा-सा आयताकार धब्बा। धुँधला। धूसर।

बावड़ी का मुँह। आसमान का वो टुकड़ा, जिसे मैं हर रात ऊपर देखता था।

अब वो नीचे की तरफ़ देखने वाले के लिए ऊपर था।

और उस पानी की छत से — पूरे गाँव के ऊपर से — जड़ें लटक रही थीं। पेड़ों की जड़ें। मोटी, भूरी, मुड़ी हुई। जो नीचे की तरफ़ बढ़ती थीं और ज़मीन में धँसी पेड़ों की टहनियों से जुड़ती थीं।

"पेड़ उल्टे हैं," छोटू ने कहा। "जड़ें ऊपर, पत्ते नीचे। यहाँ सूरज नहीं आता, तो वो पानी से खाते हैं।"

मैंने गली में देखा। घर। पर वो सिर्फ़ उल्टे नहीं थे। वो पुराने थे। बहुत पुराने। किसी घर की दीवारें मिट्टी की थीं, किसी की पत्थर की, किसी की ईंट की। अलग-अलग ज़मानों के। जैसे ये गाँव किसी एक वक़्त का नहीं, हर वक़्त का हो।

और गली के आख़िर में — ज़मीन में धँसा हुआ, उल्टा, उसकी जड़ें पानी की छत तक, उसकी डालियाँ ज़मीन में — एक विशाल पेड़।

पीपल।

उसकी डालियों पर लाल धागे बँधे थे। ऊपर की बजाय नीचे की तरफ़ लटकते हुए। और हर धागे के सिरे पर एक छोटी घंटी। और वो घंटियाँ बज रही थीं।

उल्टी।

मैं उस आवाज़ को कभी नहीं भूलूँगा। घंटी की आवाज़, पर उल्टी चलाई हुई। जैसे आवाज़ बाहर नहीं निकल रही, अंदर खिंच रही हो। एक सिसकारी जैसी। एक साँस अंदर लेने जैसी।

"यहाँ के नियम हैं," छोटू ने कहा। मेरा हाथ पकड़े, गली में चलते हुए। "सुनो।"

"बोल।"

"कुछ खाना मत। कोई भी कुछ भी दे। रोटी, पानी, मिठाई। कुछ नहीं।" उसने उँगली उठाई। "अगर तुमने यहाँ का कुछ खाया, तो तुम यहाँ के हो जाओगे।"

"ठीक है।"

"कोई तुम्हें तुम्हारे नाम से पुकारे, तो जवाब मत देना। यहाँ के लोग नाम पुकारते हैं। बहुत प्यार से। पर जवाब देने वाला उनके साथ रह जाता है।"

"ठीक है।"

"और..." छोटू ने मेरी तरफ़ देखा। "पीछे मत देखना। जब हम लौटें। चाहे कुछ भी सुनाई दे।"

मैंने सिर हिलाया।

गली में लोग थे।

मैंने उन्हें पहले नहीं देखा था। या शायद वो पहले नहीं थे, और अब आ गए थे। धुँधले। पारदर्शी। धीरे-धीरे चलते हुए। एक औरत, सिर पर घड़ा रखे। एक बूढ़ा, लाठी टेकता हुआ। दो बच्चे, कंचे खेलते हुए।

पर वो सब उल्टे चल रहे थे।

पीछे की तरफ़। उनके पैर आगे बढ़ते, पर वो पीछे जाते। उस औरत का घड़ा — मैंने देखा — भरा हुआ नहीं था, ख़ाली था, और उसमें से पानी ऊपर की तरफ़ उठ रहा था, उल्टा बहता हुआ, पानी की छत की तरफ़। वो बच्चे कंचे खेल रहे थे, पर कंचे उनकी उँगलियों से छूटने की बजाय उनकी उँगलियों में उछलकर वापस आ रहे थे।

"ये सब कौन हैं?"

"जो ज़ंजीर से छूट गए," छोटू ने कहा। "जो किसी सीढ़ी पर अटक गए और पत्थर नहीं बने। जो बहुत पहले मर गए और उनका पानी कभी सूखा नहीं। जो किसी का इंतज़ार कर रहे हैं।" उसने एक बूढ़ी औरत की तरफ़ इशारा किया, जो एक उल्टे घर के दरवाज़े पर बैठी थी, और चरखा चला रही थी — उल्टा, धागा चरखे से खुलता हुआ, वापस रुई बनता हुआ। "वो कहती हैं, वो अपने बेटे का इंतज़ार कर रही हैं। अठारह सौ किसी साल से।"

"उन्हें पता है वो मर चुके हैं?"

छोटू ने कंधे उचकाए। "कुछ को। कुछ को नहीं। कुछ को पता है, पर वो भूल जाना चाहते हैं।"

एक उल्टे घर के दरवाज़े पर एक औरत खड़ी थी। मोटी। हँसमुख चेहरा। हाथ में एक पीतल की थाली, जिसमें गरम-गरम पूरियाँ थीं। उनसे भाप उठ रही थी — ऊपर की तरफ़ नहीं, नीचे की तरफ़, ज़मीन में धँसती हुई।

"अरे, आओ बेटा," उसने मुझे देखकर कहा। बहुत प्यार से। जैसे कोई मौसी अपने भांजे को बुलाती है। "थके हुए लग रहे हो। बहुत दूर से आए हो न? एक पूरी खा लो। अभी-अभी तली है।"

मेरे पेट में भूख की एक लहर उठी। उन्नीस दिनों से मैंने ठीक से कुछ नहीं खाया था। और उन पूरियों की गंध — घी की, अजवाइन की — मेरी दादी की रसोई जैसी थी।

मेरा हाथ आगे बढ़ा।

छोटू ने उसे नीचे दबा दिया। बिना कुछ कहे।

औरत की मुस्कान बनी रही। पर उसकी आँखें — मैंने अब ग़ौर किया — उसकी आँखें हिल नहीं रही थीं। वो बस मुझ पर टिकी थीं। पलक नहीं झपकती।

"विक्रम," उसने धीरे से कहा। "विक्रम बेटा। खा ले न।"

मुझे ठंड लगी। उसे मेरा नाम कैसे पता था?

मैंने अपने होंठ भींच लिए। और आगे बढ़ गया।

पीछे से वो आवाज़ आती रही। बहुत देर तक। बिना किसी ग़ुस्से के। बस धैर्य से। "विक्रम... विक्रम... पूरी ठंडी हो रही है..."

"वो अठारह सौ नब्बे से यहाँ है," छोटू ने फुसफुसाया। "उसने अपने बेटे को एक पूरी खिलाकर यहाँ रोक लिया था। वो बेटा अब उसके घर के अंदर बैठा है। उल्टा। सवा सौ बरस से।"

हम पीपल के पास पहुँचे।

और उसकी उल्टी डालियों के नीचे — जो ज़मीन में धँसी थीं — एक पनघट था। एक छोटा-सा पत्थर का चबूतरा, जिसके बीच में एक कुआँ था।

पर वो कुआँ नीचे नहीं जाता था।

वो ऊपर जाता था। पानी की छत की तरफ़। एक खंभे की तरह। पत्थर का एक गोल खंभा, जो ज़मीन से उठकर ऊपर की पानी की छत तक पहुँचता था। और उसके अंदर — पत्थर की दीवारों के पार दिख रहा था — पानी ऊपर की तरफ़ बह रहा था। लगातार। बावड़ी की तरफ़।

और उस चबूतरे पर एक औरत बैठी थी।

जवान। अठारह बरस की। लाल-पीली साड़ी, बहुत पुराने ज़माने की। हाथों में मेहंदी, जो पानी में घुलकर धुँधली हो गई थी। गीले बाल, एक चोटी में। और उसके पैरों में पायल।

वो गा रही थी। धीमे। एक ऐसी धुन में, जो मैं पहचानता था।

"सीढ़ी-सीढ़ी उतरी पनिहारिन, घड़ा लिया सिर पे, पाँव में पायल, नाम दबा है पाँव के नीचे, कौन पुकारे, कौन पुकारे..."

"सरला दीदी," छोटू ने कहा।

औरत ने गाना रोका। और ऊपर देखा।

उसकी आँखें — दोनों — काली थीं। तीखी। बिल्कुल वैसी, जैसी अम्मा की दाईं आँख थी, अट्ठावन में, उस पोथी की कहानी में, उस तस्वीर में जो कभी खिंची नहीं।

बहनों की आँखें।

"कन्हैया," उसने मुस्कुराकर कहा। "आज किसे लाया है?"

फिर उसकी नज़र मुझ पर पड़ी। और उसकी मुस्कान धीरे-धीरे ग़ायब हो गई। उसने मेरी बाईं आँख देखी। पूरी सफ़ेद।

"ये तो उसकी आँख है," उसने फुसफुसाया। "जैसी जीजी की थी।"

"आपकी जीजी ठीक हैं," मैंने कहा। मुझे नहीं पता था कि मुझे क्या कहना चाहिए। "रामप्यारी अम्मा। उन्होंने... उन्होंने दोनों आँखें दे दीं। अब वो सिर्फ़ आपकी दुनिया देखती हैं।"

सरला बहुत देर तक चुप रहीं।

"दोनों?" उन्होंने आख़िर में पूछा।

"हाँ।"

उनकी आँखों से पानी बहा। पर ये पानी ऊपर की तरफ़ बहा — उल्टा — उनके गालों से होता हुआ, माथे की तरफ़, और फिर हवा में उठता हुआ, पानी की छत की तरफ़।

"बचपन में वो मुझे डाँटती थीं," उन्होंने कहा। "जब मैं वो पंक्ति ज़ोर से गाती थी। नाम दबा है पाँव के नीचे। कहती थीं, चुप कर, सरला, कोई सुन लेगा।" उन्होंने अपना चेहरा पोंछा। "मैंने उनकी बात कभी नहीं मानी।"

"उन्होंने कहा था कि आप नाराज़ होंगी। इक्यावन साल से।"

सरला हँसीं। एक छोटी-सी, उदास हँसी।

"नाराज़? जीजी से?" उन्होंने सिर हिलाया। "उनसे कहना — सरला हर रात उनके लिए ये गीत गाती है। ताकि जब वो नीचे आएँ, तो उन्हें रास्ता पता हो।"

फिर उन्होंने ऊपर देखा। पानी की छत की तरफ़। जहाँ बावड़ी का मुँह था।

"तुम्हारे पास वक़्त कम है," उन्होंने कहा। "ऊपर तो रात का बस एक पल बीतता है। पर यहाँ... यहाँ एक पल सौ पल होता है। और जब ऊपर सुबह होगी, तो ये गाँव तुम्हें छोड़ देगा। जहाँ भी हो।" उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। "अगर तुम उस वक़्त किसी उल्टे घर के अंदर हुए, तो वहीं रह जाओगे।"

"एक बात और," सरला ने कहा, इससे पहले कि हम मुड़ें। उन्होंने कुएँ के उस उल्टे खंभे की तरफ़ इशारा किया। "ये पानी ऊपर जाता है। बावड़ी में। पर इसके नीचे — ज़मीन के अंदर — एक और रास्ता है। वो लड़की तक जाता है। जहाँ वो उल्टी गड़ी है।"

"आप वहाँ गई हैं?"

"एक बार।" सरला का चेहरा कस गया। "पचहत्तर के बाद। जब मैं यहाँ आई थी। मैं उसे देखना चाहती थी। जिसने मुझे यहाँ लाया।" उन्होंने सिर हिलाया। "मैं आधे रास्ते से लौट आई। वहाँ भूख बहुत पास है। उसकी साँसें सुनाई देती हैं। पत्थरों में।"

उन्होंने मेरी सफ़ेद आँख की तरफ़ देखा।

"पर तू शायद पहुँच जाए। तेरी आँख उसकी है। और तेरे पास उसका घुँघरू है — मैं उसकी आवाज़ सुन रही हूँ, तेरी मुट्ठी में।" उन्होंने धीरे से कहा। "जब वक़्त आए, मेरे पास आना। मैं रास्ता दिखाऊँगी।"

छोटू ने मेरा हाथ पकड़ा। "चलो, भैया। आज के लिए बहुत है।"

हम गली से लौट रहे थे। पीपल की उल्टी घंटियों की सिसकारी पीछे छूट रही थी। उल्टे चलते लोग हमारे बगल से गुज़र रहे थे।

और तब मैंने वो घर देखा।

गली के किनारे। उल्टा। उसकी नींव पानी की छत से जुड़ी, उसकी छत ज़मीन पर। दो मंज़िला। पत्थर का बना।

और उसके दरवाज़े पर — मैंने पहचाना — एक आम के पत्तों की सूखी हुई बंदनवार, नीचे की तरफ़ लटकती हुई।

दादाजी का घर।

मेरे पैर अपने आप रुक गए।

उस घर की खिड़कियों में रोशनी थी। पीली। लालटेन की। और उस रोशनी में मुझे वो चीज़ें दिखीं जो मैं बचपन से जानता था — दादी के ज़माने की लकड़ी की अलमारी, दीवार पर टँगी हनुमान जी की तस्वीर, और छत से लटकता वो पुराना पंखा, जो कभी चलता नहीं था। सब उल्टा। सब वहीं।

जैसे किसी ने मेरे बचपन को उठाकर पानी के नीचे टाँग दिया हो।

"भैया," छोटू ने मेरा हाथ खींचा। "मत रुको।"

पर मैं नहीं हिल पाया।

क्योंकि उस घर के आँगन में — उल्टे आँगन में, जो ज़मीन की तरफ़ था — एक चबूतरा था। तुलसी का चौरा। और उसके पास एक चारपाई। और उस चारपाई पर कोई बैठा था।

सफ़ेद धोती। कंधे पर गमछा। घुटनों पर एक भूरी जिल्द वाली डायरी। और एक हाथ में क़लम। हरी स्याही वाली।

वो कुछ लिख रहे थे।

और फिर उन्होंने सिर उठाया।

लंबा, दुबला चेहरा। गहरी आँखें। सफ़ेद भौंहें। वही चेहरा, जो पहली शाम की तस्वीर में पीपल के पास खड़ा था, हाथ उठाकर मुझे रोकता हुआ।

उनकी आँखें मुझ पर पड़ीं। और उनके चेहरे पर एक ऐसी मुस्कान फैली जो मैं पूरी ज़िंदगी पहचानता था। जो मुझे बचपन में कहानियाँ सुनाती थी। जो मुझे "विक्कू" बुलाती थी।

"विक्कू?" दादाजी ने कहा।

उनकी आवाज़ बिल्कुल उनकी थी। बूढ़ी। गर्म। प्यार भरी।

"तू इतनी जल्दी आ गया, बेटा?"

कोई तुम्हें तुम्हारे नाम से पुकारे, तो जवाब मत देना।

मेरे होंठ खुले।

और छोटू का हाथ — गर्म, छोटा — मेरे मुँह पर आ गया। कसकर।

भाग 21 समाप्त।

अगले भाग में — "बाईसवीं सीढ़ी": उल्टे भानपुरा में दादाजी। वो जो अड़तीसवीं पर मरे थे, जिन्होंने विक्रम की गिनती पूरी करने की कोशिश की थी। वो विक्रम को अपने पास बुलाते हैं। उन्हें उसे कुछ बताना है। पर वो बस इतना नहीं चाहते — उन्हें कुछ और भी चाहिए। और उनकी डायरी के हरे पन्नों पर, जो वो नीचे बैठकर लिखते रहे हैं, एक योजना है...

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