Pretika › Real Experiences › भानपुरा की बावड़ी - चालीस सीढ़ियाँ
भाग 20 — बीसवीं सीढ़ी
Piyashi Atma · Real Experiences · 20 मिनट
- Writer
- Piyashi Atma
- Story
- भानपुरा की बावड़ी - चालीस सीढ़ियाँ
- Chapter
- 20 of 31
- Category
- Real Experiences
- Reading time
- 20 min
- Words
- 3996
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
कुछ दोस्तियाँ वक़्त से नहीं टूटतीं।
आप सालों तक नहीं मिलते। शहर बदल जाते हैं। चेहरे बदल जाते हैं। आवाज़ें भारी हो जाती हैं, बाल सफ़ेद होने लगते हैं। और फिर एक दिन, किसी स्टेशन पर, किसी शादी में, किसी पुरानी गली के मोड़ पर — आप एक-दूसरे को देखते हैं।
और बीच का सारा वक़्त ग़ायब हो जाता है।
आप फिर से बारह साल के होते हैं। वही बेवक़ूफ़ मज़ाक़। वही अधूरी बातें, जो वहीं से शुरू होती हैं जहाँ छूटी थीं।
पर मेरे और छोटू के बीच सिर्फ़ वक़्त नहीं था।
पानी था। मौत थी। उनतालीस सीढ़ियाँ थीं।
और फिर भी, उस उन्नीसवीं सीढ़ी पर, पानी के नीचे, उसका गर्म हाथ पकड़े हुए — मैं फिर से बारह साल का था।
और वो कभी बड़ा हुआ ही नहीं था।
"भैया, तुम तो बूढ़े हो गए।"
ये पहली बात थी जो उसने कही। उसके बाद, जो उसने पिछले भाग के आख़िर में कहा था। उसने मेरा चेहरा ग़ौर से देखा — पानी में, अपनी भूरी, शरारती आँखों से — और नाक सिकोड़ी।
"दाढ़ी। और ये आँख। और माथे पर ये लकीरें।" उसने अपनी उँगली से मेरे माथे को छुआ। पानी में उसका स्पर्श अजीब था — गर्म, पर हल्का, जैसे कोई गुनगुनी हवा। "तुम चाचा जैसे लगते हो। रघु चाचा जैसे।"
मैं हँसा। पानी में। बुलबुलों में। और हँसते-हँसते रोने लगा।
"सत्रह साल, छोटू।"
"पता है।" उसने कंधे उचकाए। बच्चों वाले। "मैं गिनता था। हर साल। ऊपर जब सूखा पड़ता है, तो पानी यहाँ और गहरा हो जाता है। और जब बारिश होती है, तो ऊपर से मिट्टी आती है। सत्रह बार बारिश आई।" वो रुका। "बस पिछले तीन बरस नहीं आई।"
"तू ठीक है?"
उसने मुझे ऐसे देखा जैसे मैंने कोई बहुत बेवक़ूफ़ सवाल पूछा हो।
"भैया, मैं मर गया हूँ।"
"मुझे पता है। मेरा मतलब..."
"पता है तुम्हारा क्या मतलब है।" उसकी आवाज़ नरम हुई। "हाँ। मैं ठीक हूँ। जितना कोई यहाँ ठीक हो सकता है।" उसने मेरा हाथ और कसकर पकड़ा। "बाक़ियों से ज़्यादा ठीक। क्योंकि मैं उसकी ज़ंजीर में नहीं हूँ।"
"क्यों नहीं?"
मैंने ये सवाल सत्रह साल से पूछा था। बिना जाने कि पूछ रहा हूँ। दसवीं रात, जब मैंने ज़ंजीर देखी थी — हर गिनने वाला, हर चुकाने वाला, हाथ से हाथ बँधा — और उन्नीसवीं पर वो ख़ाली जगह। वो बच्चा, जिसके हाथ आज़ाद थे।
छोटू ने नीचे देखा। अँधेरे में। जहाँ ज़ंजीर उतरती जाती थी। रघु चाचा तक, जो अब चालीसवीं पर पत्थर थे।
"क्योंकि मैंने उस पर कभी भरोसा नहीं किया," उसने कहा।
मैं चुप रहा।
"गंगाधर बाबा की चिट्ठी पढ़ी न तुमने?" उसने पूछा। मैं हैरान हुआ — उसे कैसे पता? — और उसने मेरी हैरानी देखकर मुस्कुराया। "यहाँ नीचे सब पता चलता है, भैया। पानी सब सुनता है। और मैं पानी में रहता हूँ।"
"भरोसे से बड़ा कोई बंधन नहीं," मैंने धीरे से कहा।
"हाँ।" छोटू ने सिर हिलाया। "वो पनिहारिन दीदी गंगाधर बाबा पर भरोसा करती थी। इसीलिए वो बँध गई। और हर गिनने वाला, जो नीचे आता है — किसी न किसी चीज़ पर भरोसा करता है। कि वो बचा लेगी। कि वो इच्छा पूरी करेगी। कि वो माँ को ठीक कर देगी, या देवदत्त भैया को लौटा देगी, या चाँदी का सिक्का दे देगी।" उसने अपनी फटी जेब को छुआ। "और उसी भरोसे से वो उन्हें बाँधती है। उनके बालों से। उनके हाथों से।"
"पर तुझे पता था वो अच्छी नहीं है।"
"पहले दिन से।" छोटू की आवाज़ में गर्व था। बच्चों वाला। "मैंने तुम्हें चिट्ठी में लिखा था न? उसके हाथ बहुत ठंडे थे। उसकी उँगलियाँ बहुत लंबी थीं। मैंने खिड़की से देखा था।" उसने सिर हिलाया। "मैं उसके लिए नहीं उतरा था, भैया। मैं सूरज के लिए उतरा था। उसकी अम्मा के लिए। प्यारी दादी के लिए। और तुम्हारे लिए। पर उसके लिए नहीं।"
"और इसीलिए..."
"इसीलिए उसके बाल मुझे पकड़ नहीं पाए।" छोटू ने अपने पैरों की तरफ़ इशारा किया। कोई धागा नहीं। कोई बाल नहीं। "उसने बहुत कोशिश की। सत्रह बरस। हर रात। पर उसके बाल मेरे पास आते हैं, और फिसल जाते हैं। जैसे तेल पर पानी।" उसकी मुस्कान शरारती हुई। "वो बहुत चिढ़ती है।"
"भैया, मैं तुम्हें कुछ बताना चाहता हूँ," उसने कहा। उसकी आवाज़ गंभीर हो गई। "गुड्डी के बारे में।"
मेरा दिल रुका।
"मैंने उसे गिनती सिखाई। हर रात। एक अंक। तुम्हें लगा होगा मैं उसे नीचे ला रहा था।"
"मुझे... हाँ। मुझे लगा था।"
"वो उसे एक रात में चालीस सिखाना चाहती थी।" छोटू ने बहुत धीरे से कहा। "पहली ही रात। जब तुम्हारे शरीर ने उसके कान में फुसफुसाया था — याद है? वो वो थी, तुम्हारे अंदर। उसने गुड्डी को पूरे चालीस बताने की कोशिश की। एक साँस में।" उसने मेरी आँखों में देखा। "और गुड्डी ने सुन लिए होते, तो अगली सुबह वो उनतालीसवीं पर होती।"
मैं पानी में जम गया।
"तो मैं बीच में आ गया," छोटू ने कहा। "मैंने गुड्डी की खिड़की पर खड़े होकर कहा — एक-एक करके सीखते हैं। रोज़ एक। ठीक है? और गुड्डी ने मेरी बात मानी। क्योंकि मैं... मैं उसकी दीदी से ज़्यादा प्यारा लगता था।" उसने हल्का-सा मुस्कुराया। "रोज़ एक अंक। ताकि तुम्हारे पास वक़्त रहे। ताकि तुम उसे बचा सको।"
"पर दिल्ली में..."
"दिल्ली में वो ख़ुद आ गई। जब तुम भाग गए थे।" छोटू की मुस्कान ग़ायब हो गई। "मैंने कहा था न — तुम्हें भागना नहीं चाहिए था। जब तुम दूर गए, तो मैं गुड्डी के पास नहीं रह पाया। पानी के रास्ते बहुत लंबे थे। और वो मुझसे तेज़ पहुँच गई।"
"और गाँव के बच्चे? वो गीत?"
छोटू ने अपना सिर हिलाया। ज़ोर से। दाएँ से बाएँ।
"वो मैं नहीं था। वो मेरा चेहरा पहनकर गई थी। सबके सपनों में। क्योंकि बच्चे मुझ पर भरोसा करते थे।" उसकी आवाज़ में दर्द था। "वो मेरी शक्ल चुराती है, भैया। मेरी मुस्कान। मेरी आवाज़। सत्रह बरस से। तुम्हारे घर की खिड़की पर जो 'छोटू' आता था, वो आधा मैं था, आधा वो। कभी-कभी मैं। कभी-कभी वो। मैं उसे रोक नहीं पाता था।"
"दीवार पर वो लकीरें? गुड्डी की?"
"वो मैंने बनाई थीं।" उसने सिर झुका लिया। "ताकि तुम्हें पता रहे। कि गुड्डी कितना सीख गई। ताकि तुम जल्दी करो।"
मैं बहुत देर तक कुछ नहीं बोल पाया।
उन्नीस दिन। उन्नीस दिन मैं उससे डरता रहा था। उसकी आवाज़ से। उसके नाम से। मैंने उसे बावड़ी वाली की कठपुतली समझा था। उसका शिकारी।
और वो सत्रह साल से, यहाँ नीचे, अकेला, हमें बचाने की कोशिश कर रहा था।
"छोटू," मैंने कहा। मेरी आवाज़ टूट गई थी। "तू सत्रह साल से यहाँ अकेला क्या करता था?"
उसने कंधे उचकाए। "घूमता था।"
"कहाँ?"
छोटू ने नीचे इशारा किया। बीसवीं सीढ़ी के नीचे। जहाँ पानी का रंग बदलता था — काले से गहरे हरे में। और उसके आगे, मेरी बाईं आँख ने पहली बार देखा — कुछ ऐसा जो मैंने पहले नहीं देखा था।
रोशनी।
बहुत नीचे। बहुत धुँधली। पर वहाँ। हरी-पीली। जैसे पानी के नीचे किसी गाँव की लालटेनें जल रही हों।
"इक्कीसवीं सीढ़ी के बाद," छोटू ने कहा, "पानी ख़त्म हो जाता है, भैया।"
"क्या?"
"वहाँ से नीचे एक और गाँव है।" उसकी आवाज़ में कुछ ऐसा था — डर और हैरानी मिली हुई। "भानपुरा। पर उल्टा। घर नीचे की तरफ़ लटके हुए। पेड़ों की जड़ें ऊपर। पीपल... पीपल वहाँ ज़मीन में धँसा है और उसकी डालियाँ नीचे आसमान की तरफ़ जाती हैं।" उसने निगला। "और उसमें वो सब रहते हैं। जो ज़ंजीर से छूट गए। जो पत्थर बनने से पहले कहीं अटक गए। जैसे सरला दीदी।"
"सरला? अम्मा की बहन?"
छोटू ने सिर हिलाया। "पैंतीसवीं पर वो रुक गई थीं, पचहत्तर में। पर पत्थर नहीं बनीं। वो नीचे वाले गाँव में चली गईं। वो वहाँ पनघट पर बैठती हैं। रोज़। और गाना गाती हैं। अट्ठावन वाला गीत। जिसमें वो पंक्ति है — नाम दबा है पाँव के नीचे।"
मेरी रीढ़ में ठंड दौड़ी।
"मैं उनसे मिलता था। वो मुझे कहानियाँ सुनाती थीं। प्यारी दादी के बारे में। उनके बचपन के बारे में।" छोटू ने अपना सिर झुकाया। "उन्होंने कहा था कि अगर कभी प्यारी दादी नीचे आएँ, तो उन्हें बताना — सरला नाराज़ नहीं है।"
"छोटू, वो लड़की," मैंने धीरे से कहा। "पनिहारिन। वो... वो भूख नहीं है न? गंगाधर ने लिखा था, वो दो हैं।"
छोटू का चेहरा बदल गया। पहली बार मैंने उसके चेहरे पर कुछ ऐसा देखा जो बच्चों वाला नहीं था। एक बहुत पुरानी, बहुत गहरी उदासी।
"दो हैं," उसने कहा। "पर ज़्यादातर वक़्त सिर्फ़ एक दिखती है। भूख। वो बड़ी है। वो तेज़ है। वो पूरी बावड़ी में फैली है।" उसने अपनी आवाज़ बहुत धीमी कर ली। "पर सत्रह बरस में... जब भूख सोती है... बीच के सालों में... तब कभी-कभी..."
"कभी-कभी क्या?"
"कभी-कभी वो लड़की जागती है। अकेली।" छोटू ने मेरी आँखों में देखा। "मैं उससे मिला हूँ, भैया। तीन बार। सत्रह बरस में। बहुत नीचे। उल्टे गाँव के भी नीचे। जहाँ वो उल्टी गड़ी है। वो बहुत छोटी है। मुझसे थोड़ी ही बड़ी लगती है। और वो रोती रहती है। और एक ही बात पूछती है।"
"क्या?"
छोटू की आँखें भर आईं।
"मेरी माँ कहाँ है?"
"तीसरी बार," छोटू ने आगे कहा, बहुत धीरे, "पिछले साल। बरसात नहीं आई थी, तो पानी बहुत नीचे था, और भूख बहुत गहरी सो रही थी। मैं उल्टे गाँव के नीचे उतरा। जितना नीचे जा सकता था। और वहाँ वो थी। अकेली।"
"कैसी थी?"
"छोटी।" छोटू ने अपने हाथ से एक ऊँचाई दिखाई। "लाल जोड़ा उसके लिए बहुत बड़ा था, जैसे किसी और का पहना हो। उसके बाल खुले थे — बहुत लंबे नहीं, बस कमर तक। बाक़ी सारे बाल, वो जो पूरी बावड़ी में फैले हैं, वो उसके नहीं हैं भैया। वो भूख के हैं। उसके असली बाल बस कमर तक थे।"
मैं चुप रहा।
"वो उल्टी गड़ी है, पर जब भूख सोती है तो वो अपना सिर थोड़ा-सा घुमा सकती है। उसने मुझे देखा। डरी नहीं। बस पूछा — तू कौन है? मैंने बताया। कन्हैया। उसने मेरा नाम दोहराया। तीन बार। जैसे कोई मिठाई चख रहा हो।" छोटू की आवाज़ भर्राई। "फिर उसने कहा — मुझे अपना नाम याद नहीं। सिर्फ़ गिनती याद है। वो पंडित जी ने सिखाई थी। तू मुझे मेरा नाम सिखा सकता है?"
"तूने क्या कहा?"
"मुझे नहीं पता था, भैया।" छोटू ने अपना सिर झुका लिया। "मैंने कहा मैं ढूँढूँगा। उसने कहा — मेरी माँ जानती है। वो मुझे रोज़ पुकारती है। पर आवाज़ यहाँ तक आते-आते टूट जाती है।" उसने मेरी तरफ़ देखा। "फिर भूख करवट लेने लगी, और मुझे भागना पड़ा।"
"छोटू," मैंने धीरे से कहा, "नदी पर मुझे उसका घुँघरू मिला था। उसकी पायल का।"
छोटू की आँखें फैल गईं।
"उसकी आवाज़," उसने फुसफुसाया। "भूख ने उसकी हर चीज़ खा ली। पर पायल नदी में गिर गई थी, बावड़ी में नहीं। वो बची रह गई।" उसने मेरा हाथ कसकर पकड़ा। "भैया, अगर माँ की पुकार उस घुँघरू में भरकर नीचे लाई जाए... तो भूख उसे नहीं खा पाएगी। क्योंकि वो आवाज़ लड़की की अपनी होगी।"
"पर उस पुकार को सुनने के लिए दो बजकर सैंतालीस पर नदी पर होना होगा। और मैं उस वक़्त यहाँ होता हूँ।"
छोटू ने कुछ देर सोचा।
"तो कोई और जाए," उसने कहा। "कोई ऐसा, जिसे वो माँ अपनी आवाज़ सौंपे।" उसकी आवाज़ बहुत धीमी हो गई। "कोई माँ ही किसी माँ की आवाज़ सबसे अच्छी तरह पकड़ सकती है, भैया।"
पानी में, मेरे चारों ओर, बालों में एक सरसराहट हुई।
छोटू ने ऊपर देखा। दीवारों की तरफ़। जहाँ वो ढीले, थके हुए बाल अचानक तनने लगे थे।
"वो सुन रही है," उसने फुसफुसाया। "भूख। उसे पसंद नहीं कि कोई लड़की के बारे में बात करे।"
और फिर उसने कुछ ऐसा किया जिसकी मुझे उम्मीद नहीं थी।
उसने मेरा दूसरा हाथ भी पकड़ लिया।
दोनों हाथ। उसके गर्म, छोटे हाथ। मेरे दोनों हाथों में।
और पूरी बावड़ी काँप गई।
दीवारों के बाल — जो हमारी तरफ़ बढ़ रहे थे — झटके से पीछे हटे। जैसे किसी ने उन्हें आग दिखा दी हो। नीचे, ज़ंजीर में, हर पत्थर के आदमी का सिर — बहुत धीरे — ऊपर की तरफ़ मुड़ा। हमारी तरफ़। हज़ारों खुली आँखें, पानी में, पहली बार किसी और चीज़ को देखती हुईं। आसमान के अलावा।
"क्या हो रहा है?"
"वो डर रही है," छोटू ने कहा। उसकी आवाज़ में हैरानी थी। "भैया, वो डर रही है! मैंने सत्रह बरस में उसे कभी डरते नहीं देखा!"
"क्यों?"
छोटू ने हमारे जुड़े हुए हाथों की तरफ़ देखा।
"क्योंकि ये हाथ उसके नहीं हैं," उसने धीरे से कहा। "मेरा हाथ उसकी ज़ंजीर में नहीं है। और तुमने मेरा हाथ पकड़ा है — उस पर भरोसा करके नहीं, मुझ पर भरोसा करके।" उसने अपनी उँगलियाँ मेरी उँगलियों में फँसा लीं। "गंगाधर बाबा ने लिखा था न? भरोसे के बिना वो कुछ नहीं बाँध सकती। और जो भरोसा उसके ख़िलाफ़ हो... वो उसे जलाता है।"
"तो अगर तू मेरे साथ ऊपर चले—"
"मैं ऊपर नहीं जा सकता, भैया।"
उसने बहुत सीधे कहा। बिना किसी दुख के। जैसे कोई मौसम की बात करता है।
"मेरा शरीर बहुत पहले पानी हो गया। पहले साल में ही। मैं अब बस... ये हूँ।" उसने अपने आप को देखा। "एक याद। एक आवाज़। एक गर्म हाथ। ऊपर की हवा में मैं एक पल भी नहीं टिक पाऊँगा।"
वो मेरे साथ ऊपर चला। जितना चल सकता था।
उन्नीसवीं से अठारहवीं। सत्रहवीं — वो दरार, जिसमें बाल ठुँसे थे। छोटू ने उस दरार को छुआ, और बाल एक पल के लिए ढीले पड़े, और उसके पीछे से, बहुत दूर, माँ के रोने की एक हल्की-सी आवाज़ आई — और फिर बाल वापस कस गए।
पंद्रहवीं। बारहवीं। दसवीं।
दसवीं पर वो रुक गया।
"यहाँ से आगे नहीं, भैया।" उसके पैर जैसे किसी अदृश्य दीवार से टकरा गए हों। "यहाँ से पानी बहुत पतला हो जाता है। मैं घुल जाऊँगा।"
मैंने उसके हाथ नहीं छोड़े।
"छोटू, मामी..."
उसकी आँखें भर आईं।
"मैं जानता हूँ," उसने कहा। "हर शाम। दरवाज़े पर। थाली। सत्रह बरस।" उसने अपने होंठ काटे। "मैं कभी उनके दरवाज़े पर नहीं गया, भैया। क्योंकि मुझे पता था वो खोल देंगी। और मेरे साथ चली आएँगी। बिना एक पल सोचे। और मैं नहीं चाहता था कि वो नीचे आएँ। कभी नहीं।"
"परसों रात तू गया था।"
उसने सिर हिलाया। "गुड्डी वहाँ थी। मैं बस देखना चाहता था कि कोई उनके पास है या नहीं। कि वो अकेली नहीं हैं।" उसकी आवाज़ टूट गई। "वो सो रही थीं, भैया। बहुत सालों बाद वो इतनी गहरी नींद सो रही थीं। गुड्डी को गले लगाकर।"
"उनसे क्या कहूँ?"
छोटू ने बहुत देर सोचा। बच्चों की तरह। अपनी भौंहें सिकोड़कर।
"कहना... कहना कि अब थाली मत लगाएँ।" उसने धीरे से कहा। "कहना मैं भूखा नहीं हूँ। कि यहाँ कोई भूखा नहीं होता — सिर्फ़ वो। और कहना..."
उसने अपनी फटी हुई जेब में हाथ डाला। और कुछ निकाला।
एक छोटा-सा बटन। नीला। प्लास्टिक का। उसकी कमीज़ का।
"ये उनकी कमीज़ पर लगाने को कहना," उसने कहा। "जो जेब फटी थी, वो इसी बटन के खिंचने से फटी थी। उस दिन। बावड़ी की सीढ़ियों पर।" उसने बटन मेरी हथेली में रखा। "मैंने सत्रह बरस इसे सँभाला। अब उन्हें दे दो। और कहना — अब डाँट सकती हैं।"
मैंने बटन को मुट्ठी में बंद किया।
"कल रात तुम इक्कीसवीं पर होगे," छोटू ने कहा। "जहाँ पानी ख़त्म होता है। और उल्टा गाँव शुरू होता है। मैं वहाँ मिलूँगा। सीढ़ी के ठीक नीचे। मैं तुम्हें रास्ता दिखाऊँगा।"
और उसने मेरे हाथ छोड़े। धीरे-धीरे। एक-एक उँगली।
इस बार अलविदा कहने के लिए नहीं।
कल कहने के लिए।
मामी आँगन में थीं जब मैं पहुँचा।
सुबह के सात बजे। तुलसी पर दीया। दो थालियाँ। एक गुड्डी के लिए — जो अब भी सो रही थी। और एक...
एक ख़ाली। ढकी हुई। कन्हैया की।
मैं उनके सामने बैठा। ज़मीन पर। बिना कुछ कहे।
मामी ने मुझे देखा। मेरे चेहरे पर कुछ पढ़ा। और उनके हाथ, जो रोटी बेल रहे थे, रुक गए।
"तू उससे मिला," उन्होंने फुसफुसाया।
मैंने सिर हिलाया।
उनका पूरा शरीर काँप गया। बेलन उनके हाथ से गिरा। "वो... वो कैसा है?"
"बारह साल का," मैंने कहा। "बिल्कुल वैसा ही। उसने कहा मैं बूढ़ा हो गया हूँ।"
मामी के मुँह से एक आवाज़ निकली — हँसी और रोने के बीच की।
"उसने कहा... उसने कहा कि आप अब थाली मत लगाइए। कि वो भूखा नहीं है।"
मामी ने अपना चेहरा हाथों में छुपा लिया।
मैंने अपनी मुट्ठी खोली। और वो बटन उनके सामने रखा। नीला। छोटा। पानी से चमकता हुआ।
"और उसने ये दिया है। उसकी नीली कमीज़ का। कहा कि जेब इसी के खिंचने से फटी थी। उस दिन।" मेरा गला रुँध गया। "कहा कि इसे लगा दीजिए। और अब आप उसे डाँट सकती हैं।"
मामी ने अपने हाथ हटाए। बटन को देखा।
फिर उसे उठाया। बहुत धीरे। अपनी दोनों हथेलियों में। जैसे कोई बहुत छोटी, बहुत नाज़ुक चिड़िया।
और उसे अपनी छाती से लगा लिया।
वो रोईं नहीं। बस बैठी रहीं। बटन को छाती से लगाए। बहुत देर तक। और उनके होंठ हिलते रहे। बहुत धीमे।
"पगला," वो बुदबुदा रही थीं। "पगला। सत्रह बरस एक बटन सँभालता रहा। जेब फटने के डर से। पगला।"
फिर वो उठीं। अंदर गईं। और एक पुराना बक्सा खोला। उसमें से एक कमीज़ निकाली। नीली। बच्चों वाली। जेब फटी हुई।
सत्रह साल से उस बक्से में।
वो आँगन में लौटीं। सुई-धागा लेकर। और तुलसी के दीये की रोशनी में, बैठकर, अपने बेटे की कमीज़ पर वो बटन टाँकने लगीं।
और कन्हैया की ढकी हुई थाली वहीं रही। पर उन्होंने उसे उठाया नहीं। उसे गाय को नहीं दिया। बस उसके ढक्कन पर अपना हाथ रखा। एक पल के लिए।
और फिर उसे उठाकर रसोई में वापस रख दिया।
सत्रह साल में पहली बार।
गुड्डी अंदर से आँखें मलती हुई निकली। उसने मामी को कमीज़ पर बटन टाँकते देखा। फिर रसोई की तरफ़, जहाँ थाली रखी गई थी।
"मामी," उसने नींद भरी आवाज़ में पूछा, "आज छोटू भैया की थाली नहीं लगेगी?"
मामी ने सुई रोकी। गुड्डी को अपनी गोद में खींचा।
"नहीं, बिटिया," उन्होंने कहा। "छोटू भैया ने कहलवाया है कि वो भूखे नहीं हैं।"
गुड्डी ने इस बात पर बहुत गंभीरता से सोचा। फिर सिर हिलाया।
"अच्छा है," उसने कहा। "वो पतले-पतले थे। खिड़की पर। पर अगर भूख नहीं है, तो ठीक है।"
और मामी हँस पड़ीं। सत्रह साल में पहली बार, शायद। एक असली, छोटी-सी, टूटी हुई हँसी।
वहाँ से मैं अम्मा के पास गया।
देवदत्त आँगन में खाट पर लेटा था। आज वो बैठ नहीं पा रहा था। उसकी साँसें छोटी थीं, तेज़। उसकी चमड़ी पहले से भी ज़्यादा सफ़ेद। अम्मा उसके सिरहाने बैठी थीं, एक गीले कपड़े से उसका माथा पोंछती हुईं।
"अम्मा," मैंने कहा, "नीचे एक और गाँव है। उल्टा भानपुरा। और वहाँ पनघट पर एक औरत बैठती है। रोज़। अट्ठावन वाला गीत गाती है।"
अम्मा के हाथ रुक गए।
"छोटू ने बताया कि उसका नाम सरला है," मैंने धीरे से कहा। "और उसने कहा था कि अगर आप कभी नीचे आएँ, तो आपसे कहा जाए — सरला नाराज़ नहीं है।"
अम्मा बहुत देर तक कुछ नहीं बोलीं। उनकी सफ़ेद आँखें आसमान की तरफ़ उठी रहीं। और फिर उन्होंने गाया — बहुत धीमे, टूटी हुई आवाज़ में —
"नाम दबा है पाँव के नीचे, कौन पुकारे, कौन पुकारे..."
"वो ये पंक्ति सबसे ज़ोर से गाती थी," उन्होंने फुसफुसाया। "बचपन में। पूरा घर सिर पर उठा लेती थी। मैं उसे डाँटती थी।" उनका होंठ काँपा। "इक्यावन बरस, विक्की। इक्यावन बरस मैंने सोचा कि वो मुझे कोसती होगी।"
देवदत्त ने अपना बायाँ हाथ उठाया। धीरे से। और अम्मा के हाथ पर रख दिया।
"मैंने भी यही सोचा था, प्यारी," उसने कहा। "अड़सठ बरस। कि तू मुझे कोसती होगी। पानी में सब एक-दूसरे को माफ़ कर देते हैं। बस ऊपर वाले ख़ुद को माफ़ नहीं कर पाते।"
सूरज अपनी खाट पर बैठा था। उसके चेहरे का पत्थर लगभग पूरा झड़ चुका था। बस बाईं आँख के आसपास, कनपटी पर, एक भूरा-हरा धब्बा बचा था। और वो सफ़ेद आँख।
वो मुझे देखकर जम गया। उसकी अच्छी आँख में डर था।
"तूने देखा," उसने कहा। सवाल नहीं। सच।
"हाँ।"
वो बहुत देर तक चुप रहा। फिर उसने अपनी दोनों हथेलियाँ देखीं। वो हथेलियाँ, जो सत्रह साल पहले मेरी पीठ पर थीं।
"मैं बारह बरस का था," उसने फुसफुसाया।
"मुझे पता है।"
"अम्मा मर रही थीं।"
"मुझे पता है, सूरज।"
उसने अपना चेहरा अपने हाथों में छुपा लिया। और एक ऐसी आवाज़ में रोया जो मैंने किसी मर्द के मुँह से कभी नहीं सुनी थी। सत्रह साल का रोना।
मैं उसके पास बैठा। उसके कंधे पर हाथ रखा।
"छोटू ने कहा," मैंने धीरे से कहा, "कि तुझसे कहूँ — कोई बात नहीं।"
सूरज का रोना रुक गया। एक पल के लिए। उसने अपना चेहरा उठाया।
"उसने... उसने ऐसा कहा?"
"सत्रह साल पहले। डूबते हुए। मैंने अपने कानों से सुना। 'सूरज से कहना कोई बात नहीं। उसकी अम्मा ठीक हो जाएँगी।'" मैंने उसका कंधा दबाया। "वो जानता था, सूरज। कि तूने मुझे धकेला था। उसने देखा था। और फिर भी उसने तुझे माफ़ कर दिया था। उसी पल।"
सूरज ने मेरी तरफ़ देखा। अपनी एक अच्छी आँख से। और एक सफ़ेद आँख से।
"और तू?"
मैंने उसकी कलाई देखी। वो काला धागा। वो ताँबे का सूरज।
"मैं भी," मैंने कहा।
उस रात सोने से पहले मैंने अपनी दोनों मुट्ठियों में दोनों घुँघरू रखे। बाएँ में देवदत्त वाला। दाएँ में उस लड़की वाला।
और मैंने सोचा — पहली बार उन्नीस दिनों में — कि शायद मैं अकेला नहीं हूँ। कि नीचे एक बच्चा है, जिसका हाथ गर्म है। एक लड़की, जो अपना नाम भूल गई है। एक माँ, जो दो सौ अस्सी बरस से उसे पुकार रही है। और एक पत्थर का आदमी, जिसने अपनी मर्ज़ी से अपनी जगह चुनी।
ये लड़ाई मेरी अकेले की नहीं थी। कभी थी ही नहीं।
बीसवीं सीढ़ी।
दो बजकर सैंतालीस।
छोटू मेरे बगल में था। जैसे उसने वादा किया था — नहीं, उसने इक्कीसवीं का वादा किया था। पर वो आज भी आ गया था। बीसवीं पर। मेरे साथ खड़ा।
"मैं इंतज़ार नहीं कर सका," उसने शरमाकर कहा।
मैं मुस्कुराया। और उसका हाथ पकड़ लिया।
हम दोनों वहाँ खड़े रहे। पानी में। बच्चों की तरह। कोई बात नहीं की। कोई ज़रूरत नहीं थी।
बचपन में हम ऐसे ही बैठते थे। आम के पेड़ के नीचे। पीठ से पीठ टिकाकर। घंटों। बिना बोले। मैं पत्तियाँ गिनता था, और छोटू मुझे गिनने देता था, और कभी नहीं टोकता था।
आज मैंने कुछ नहीं गिना।
और तब, ऊपर से — बहुत ऊपर से, पानी की सतह के पार, गाँव की तरफ़ से — एक आवाज़ आई।
बहुत धीमी। पर रुके हुए वक़्त में सब सुनाई देता है।
ठक।
एक दस्तक।
ठक। ठक।
छोटू का हाथ मेरे हाथ में जम गया।
और फिर एक आवाज़। एक बच्चे की। बारह बरस का। पतली। मीठी। बिल्कुल छोटू की।
"मम्मी? मम्मी, दरवाज़ा खोलो। मैं आ गया। ठंड लग रही है।"
मैंने छोटू की तरफ़ देखा।
वो मेरे बगल में खड़ा था। बीसवीं सीढ़ी पर। पानी में। मेरा हाथ पकड़े।
और उसका चेहरा सफ़ेद पड़ गया था। पूरी तरह। डर से।
"मम्मी, मैंने बटन भेजा था न? अब तो खोल दो। मुझे डाँटना है तो डाँट लो। बस अंदर आने दो।"
"छोटू," मैंने फुसफुसाया।
उसके होंठ काँपे।
"वो मैं नहीं हूँ, भैया।"
ठक। ठक। ठक।
"वो मेरा चेहरा पहनकर गई है। मम्मी के दरवाज़े पर। पहली बार।" उसकी आँखों में आँसू थे। पानी में घुलते हुए। "सत्रह बरस मैंने उस दरवाज़े को उससे बचाया। कभी नहीं गया, ताकि वो भी न जा सके। ताकि मम्मी कभी उस आवाज़ को न सुनें।"
और फिर, ऊपर से, बहुत धीमी — एक और आवाज़।
लकड़ी पर लोहे के खिसकने की। एक कुंडी के सरकने की।
"मम्मी के दरवाज़े पर कोई धागा नहीं है," छोटू ने फुसफुसाया। "कोई नींबू-मिर्च नहीं। कोई कील नहीं। उन्होंने कहा था न? ताकि अगर मैं आऊँ, तो मुझे कुछ न रोके।"
चर्र्र।
दरवाज़ा खुलने की आवाज़।
और उसके बाद, ऊपर से, एक और आवाज़। एक औरत की। टूटी हुई। काँपती हुई। सत्रह साल के इंतज़ार से भरी हुई।
"कन्हैया?"
छोटू ने मेरा हाथ इतनी ज़ोर से पकड़ा कि मुझे दर्द हुआ।
"भैया," उसने कहा। "ऊपर जाओ। अभी। मेरे बिना।"
भाग 20 समाप्त।
— दूसरा खंड: "याद" समाप्त —
अगले भाग में — "इक्कीसवीं सीढ़ी": तीसरा खंड शुरू होता है — "नीचे"। विक्रम इक्कीसवीं सीढ़ी से आगे उतरता है, जहाँ पानी ख़त्म होता है और एक उल्टा भानपुरा शुरू होता है। पर पहले — उसे ऊपर लौटना होगा। सुशीला मामी के दरवाज़े पर। जहाँ सत्रह बरस में पहली बार, एक माँ ने अपने बेटे की आवाज़ सुनकर दरवाज़ा खोला है...
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