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भाग 19 — उन्नीसवीं सीढ़ी

Piyashi Atma · Real Experiences · 20 मिनट

Writer
Piyashi Atma
Story
भानपुरा की बावड़ी - चालीस सीढ़ियाँ
Chapter
19 of 31
Category
Real Experiences
Reading time
20 min
Words
3983
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

हर तस्वीर के तीन सच होते हैं।

एक — जो फ़्रेम के अंदर है। जो कैमरे ने देखा। जो काग़ज़ पर छप गया।

दूसरा — जो फ़्रेम के बाहर था। उस पल में, उसी जगह, पर लेंस की पहुँच से थोड़ा दूर। जो किसी ने नहीं देखा, पर जो था।

और तीसरा — जो उस पल से ठीक पहले हुआ, और ठीक बाद। वो पल, जो किसी तस्वीर में कभी नहीं आते। क्योंकि कैमरा हमेशा बीच का एक टुकड़ा पकड़ता है, और बाक़ी सब छोड़ देता है।

सत्रह साल से मेरे पास उस दोपहर का सिर्फ़ एक टुकड़ा था। एक तस्वीर, जिसमें एक चेहरा खुरचा हुआ था।

उस उन्नीसवीं रात, मेरी बाईं आँख ने मुझे बाक़ी दोनों सच दिखाए।

और मुझे पता चला कि उस दिन उस बावड़ी में किसी ने किसी को नहीं छोड़ा था।

हर किसी ने किसी को थामने की कोशिश की थी।

हरिहर शास्त्री का दरवाज़ा खुला था।

चौंतीस साल में पहली बार। लोहे का वो भारी दरवाज़ा, जिस पर बाहर से ताला और अंदर से ज़ंजीरें थीं, अब पूरा खुला पड़ा था। ज़ंजीरें ज़मीन पर पड़ी थीं। और खिड़कियों पर चुनी हुई ईंटों में से एक गिरा दी गई थी — जैसे किसी ने, बहुत बूढ़े हाथों से, पूरी रात उस पर मेहनत की हो।

पुजारी आँगन में बैठे थे। धूप में। एक सफ़ेद धोती, नंगा बदन, उनकी पसलियाँ चमड़ी के नीचे से साफ़ दिखती हुई। सफ़ेद दाढ़ी, जो सालों से नहीं कटी थी। और उनकी गोद में वो मिट्टी का कलश। ख़ाली। सूखा।

मैंने उन्हें पहली बार देखा। चौंतीस साल से गाँव में किसी ने नहीं देखा था।

"आ, बेटा," उन्होंने कहा। मेरे कुछ कहने से पहले। "मैं तेरा इंतज़ार कर रहा था।"

मैंने चाचा का काग़ज़ निकाला। मुड़ा हुआ। उनकी लिखावट में।

"चाचा ने कहा था आपको दूँ।"

पुजारी ने काग़ज़ लिया। उसे खोला नहीं। बस अपनी उँगलियों में पकड़े रहे।

"मुझे पता है इसमें क्या है," उन्होंने धीरे से कहा।

मैं जम गया।

"चौंतीस बरस, बेटा। चौंतीस बरस मैंने उस कलश को लोरी सुनाई। और तुझे क्या लगता है, उस कलश ने मुझे कुछ नहीं बताया होगा?" उन्होंने सूखे कलश पर अपनी हथेली रखी। "शंकर मुझसे बात करता था। कभी-कभी। बहुत धीरे। उसने बताया था कि पीपल वाली सड़क पर रघु भैया ने उसका हाथ पकड़ा था। और फिर छोड़ दिया था।"

"और आपने कभी..."

"कभी कुछ नहीं कहा?" पुजारी ने सिर हिलाया। "क्या कहता? रमेसर को? कि तूने मेरे बेटे का नाम लिया? रघु को? कि तूने उसका हाथ छोड़ा?" उनकी आवाज़ में कोई ग़ुस्सा नहीं था। बस एक बहुत पुरानी, बहुत थकी हुई शांति। "मैं पुजारी हूँ, बेटा। मैंने ख़ुद वो अनुष्ठान किया था। मैंने ख़ुद कहा था कि एक खूँटा चाहिए। मैंने बस ये नहीं सोचा था कि वो खूँटा मेरा ख़ून होगा।"

उन्होंने काग़ज़ को कलश के अंदर रख दिया। ख़ाली कलश में। और उसका मुँह लाल कपड़े से फिर बाँध दिया।

"रमेसर ने मेरा बेटा दिया," उन्होंने कहा। "और रघु ने उसे लौटाया। हिसाब बराबर नहीं होता, बेटा। ऐसे हिसाब कभी बराबर नहीं होते।" उन्होंने आसमान की तरफ़ देखा। "पर आज से मैं हिसाब नहीं रखूँगा। चौंतीस बरस रखा। बहुत भारी था।"

देवदत्त अम्मा के आँगन में बैठा था।

एक चौदह बरस का लड़का। अड़सठ बरस का। उसकी चमड़ी अब भी बहुत सफ़ेद थी — धूप में लगभग पारदर्शी। उसकी उँगलियों पर पत्थर की महीन धूल अब भी चिपकी थी, जो बार-बार झाड़ने पर भी नहीं जाती थी। और उसकी आँखें — बड़ी, काली — हर चीज़ को ऐसे देखती थीं जैसे पहली बार देख रही हों।

अम्मा उसके सामने बैठी थीं। उसे अपने हाथ से रोटी खिलाती हुईं। टुकड़ा-टुकड़ा करके। जैसे कोई माँ बच्चे को खिलाती है। या जैसे कोई बूढ़ी पत्नी अपने बूढ़े पति को।

पर वो न बच्चा था, न बूढ़ा। वो कुछ बीच का था। और वो दोनों ये जानते थे।

"ज़्यादा नहीं खा पाता," अम्मा ने मुझे देखकर कहा। उनकी सफ़ेद आँखें मेरी तरफ़। "कहता है पेट भारी लगता है। अड़सठ बरस से कुछ नहीं खाया।"

देवदत्त ने मेरी तरफ़ देखा। पहचाना। और उसके चेहरे पर कुछ आया — कृतज्ञता, और उसके नीचे कुछ और। अपराधबोध।

"रघु," उसने धीरे से कहा। "वो मेरी जगह है।"

"हाँ।"

"मैंने कहा था मुझे कोई बदलने वाला चाहिए।" उसने अपनी पत्थर की धूल वाली उँगलियों को देखा। "मैंने सोचा था वो तू होगा। या सूरज। मैंने कभी नहीं सोचा था कि कोई अपनी मर्ज़ी से..."

वो रुक गया।

"ऊपर की हवा," उसने कहा। अचानक। विषय बदलते हुए। "जलती है। हर साँस के साथ। जैसे किसी ने मेरे फेफड़ों में मिर्च भर दी हो।" उसने अम्मा की तरफ़ देखा। "प्यारी को मत बताना। पर मुझे नहीं लगता मैं बहुत दिन रह पाऊँगा, विक्रम। पानी मुझे वापस बुला रहा है। हर पल।"

अम्मा ने सुन लिया। पर कुछ नहीं कहा। बस उसे एक और टुकड़ा रोटी खिलाई।

"आज उन्नीसवीं है," देवदत्त ने कहा। जब अम्मा पानी लेने अंदर गईं।

"हाँ।"

"उन्नीसवीं पर उसकी पकड़ सबसे ढीली होती है।" उसने अपनी आवाज़ धीमी की। "अड़सठ बरस मैंने देखा है। हर गिनने वाले को। उन्नीसवीं पर कुछ अलग होता है। वहाँ एक बार उसका खेल टूटा था।"

"कब?"

"दो हज़ार नौ में।" देवदत्त ने मेरी आँखों में देखा। "तेरे साथ। छोटू के साथ। वो दिन जब एक बच्चे ने ख़ुद अपना हाथ छोड़ा। किसी के कहने पर नहीं। किसी के डर से नहीं। अपनी मर्ज़ी से।" उसने सिर हिलाया। "वो कभी नहीं समझ पाई। कोई भूख ये नहीं समझ सकती कि कोई ख़ुद को क्यों छोड़ेगा। किसी और के लिए।"

"तो उन्नीसवीं पर..."

"उन्नीसवीं पर उसके बाल सबसे कमज़ोर हैं। वहाँ एक दरार है उसकी पकड़ में। और उस दरार में..." देवदत्त ने बावड़ी की तरफ़ देखा, "...एक बच्चा खड़ा है। सत्रह बरस से। जो ज़ंजीर का हिस्सा नहीं है। जिसे उसने कभी पूरा नहीं बाँधा। क्योंकि वो उसे समझ ही नहीं पाई।"

"छोटू।"

"आज रात तू वहाँ पहुँचेगा। और तेरी बाईं आँख — अब जब वो पूरी उसकी है — तुझे सब दिखाएगी। उस दिन का।" देवदत्त ने मेरा हाथ पकड़ा। अपने बाएँ हाथ से। ठंडा। पत्थर की धूल वाला। "देखना, विक्रम। पूरा देखना। चाहे जो भी दिखे। क्योंकि उस दिन का सच ही उसकी सबसे बड़ी कमज़ोरी है।"

सूरज अपने घर पर था।

वो बैठ सकता था अब। खाट पर। पीठ दीवार से टिकाए। उसका पत्थर धीरे-धीरे झड़ रहा था। उसके चेहरे का बायाँ हिस्सा अब भी भूरा-हरा था, खुरदुरा — पर हर घंटे थोड़ा और चमड़ी दिखने लगती थी। उसकी बाईं आँख अब भी सफ़ेद थी। शायद हमेशा रहेगी।

गुड्डी उसकी गोद में सो रही थी। अपना कड़े वाला हाथ अपने पापा की छाती पर रखे।

"आज रात उन्नीसवीं है," मैंने कहा।

सूरज ने कुछ नहीं कहा। उसने अपनी बेटी के बालों में हाथ फेरा।

"सूरज, मुझे पता है तू उस दिन वहाँ था। मुंडेर पर। तस्वीर में तेरा हाथ मेरी पीठ पर है। और मुझे पता है कि तूने अपनी अम्मा के लिए सौदा किया था।"

सूरज की अच्छी आँख मेरी तरफ़ मुड़ी।

"बता मुझे," मैंने कहा। "उस दिन क्या हुआ था।"

सूरज बहुत देर तक चुप रहा। फिर उसने अपना सिर हिलाया। धीरे से।

"नहीं, विक्की।"

"क्यों?"

"क्योंकि मुझमें हिम्मत नहीं है।" उसकी आवाज़ अब भी टूटी हुई थी, पत्थर के गले से निकलती हुई। "सत्रह बरस मैंने ख़ुद को अलग-अलग कहानियाँ सुनाईं। कि मैं डर के भाग गया था। कि मैं वहाँ था ही नहीं। कि मैंने बस छोटू को नीचे जाने के लिए कहा था। हर कहानी थोड़ी कम बुरी।" उसने अपनी आँख बंद कर ली। "आज रात तू देखेगा। सच में। और मैं... मैं यहाँ बैठा रहूँगा। और इंतज़ार करूँगा कि तू सुबह आकर मुझे क्या कहता है।"

उसने गुड्डी को और कसकर पकड़ लिया।

"जो भी तू देखे, विक्की," उसने फुसफुसाया, "याद रखना कि मैं बारह बरस का था।"

शाम को मैं चाची के पास बैठा।

वो आँगन में थीं। तुलसी के पास। चाचा का लोटा अब भी उनकी गोद में। सुबह से उन्होंने उसे नहीं छोड़ा था। किसी ने उन्हें कुछ नहीं बताया था, पर उन्होंने पूछना भी बंद कर दिया था।

मैं कुछ कह नहीं सकता था। उनका कान अब भी उसका था। हर शब्द नीचे तक जाता।

तो मैंने बस उनका हाथ पकड़ा। जैसे चाचा ने पकड़ा था।

चाची ने मेरी तरफ़ देखा। बहुत देर तक।

"कल रात उन्होंने मेरा नाम लिया था," उन्होंने धीरे से कहा। "सरोज। तीस बरस की शादी में पहली बार। मैंने सोचा था वो पागल हो गए हैं।" उनकी आँखें भर आईं। "अब समझ आया। वो विदा ले रहे थे।"

उन्होंने लोटे को देखा।

"ये अब ख़ाली रहता है, विक्की। सुबह से। मैंने भरकर देखा। अपने आप ख़ाली हो जाता है। जैसे कोई नीचे से पी रहा हो।"

उन्होंने लोटे को अपनी छाती से लगा लिया।

"प्यासे हैं वो। वहाँ नीचे। मुझे पता है।"

मैंने उनका हाथ और कसकर पकड़ लिया। और मन ही मन — जहाँ वो सुन नहीं सकती थी — एक वादा किया। चाचा से। चाची से। उस लड़की से।

कि ये ख़त्म होगा। किसी न किसी तरह।

दो बजकर सैंतालीस।

उन्नीसवीं सीढ़ी।

मैं पानी में उतरा। और रुक गया।

क्योंकि पानी यहाँ अलग था। बाक़ी सीढ़ियों पर पानी भारी होता था, खिंचता हुआ, नीचे की तरफ़ दबाता हुआ। यहाँ वो हल्का था। जैसे किसी ने खिंचाव ढीला कर दिया हो। और दीवारों में उसके बाल — जो हर दूसरी सीढ़ी पर तने हुए, काँपते हुए होते थे — यहाँ ढीले थे। लटके हुए। जैसे थके हुए हों।

उसकी पकड़ में दरार।

और मेरे सामने, एक हाथ की दूरी पर — उन्नीसवीं सीढ़ी पर, मेरे साथ — एक बच्चा खड़ा था।

मैंने उसे नहीं देखा। मैंने अपनी आँखें बंद रखीं। दोनों। मैं अभी उसे नहीं देखना चाहता था। अभी नहीं।

पर मेरी बाईं आँख — बंद, पर पूरी उसकी — ने देखना शुरू कर दिया।

और पानी पीछे हटने लगा।

धूप।

तेज़, सफ़ेद, जून की दोपहर वाली धूप। बावड़ी ख़ाली थी — लगभग। पानी बहुत नीचे था। सीढ़ियाँ सूखी, गरम, चमकती हुई।

और ऊपर मुंडेर पर, चार लोग।

तीन बच्चे। और एक बूढ़ा आदमी।

दादाजी। सफ़ेद धोती, कंधे पर गमछा, हाथ में एक छोटा-सा कैमरा — वो नया वाला, जो पापा ने उन्हें उसी साल दिल्ली से भेजा था और जिसे वो बड़े गर्व से पूरे गाँव को दिखाते थे।

"दादाजी, एक फ़ोटो!" बारह साल का मैं कह रहा था। उछलते हुए। "बस एक! सीढ़ियों पर!"

दादाजी की भौंहें सिकुड़ी हुई थीं। "यहाँ क्या कर रहे हो तुम लोग? मैंने मना किया था न इधर आने को?"

"बस देखने आए थे," छोटू ने कहा। मासूमियत से। "कुछ नहीं कर रहे। देखो, पानी भी नहीं है।"

दादाजी ने नीचे झाँका। बावड़ी में। मैंने उनका चेहरा देखा — सत्रह साल पुराना, पर बिल्कुल साफ़। उनकी आँखें नीचे गईं, पानी तक। और उसमें कुछ आया। एक हल्का-सा डर। एक सवाल।

अभी सत्रह साल पूरे नहीं हुए। मुझे उनके चेहरे पर वो हिसाब दिख रहा था। अभी बहुत वक़्त है।

मैंने ग़लत गिना था। डायरी में उन्होंने लिखा था।

"ठीक है," दादाजी ने आख़िर में कहा। "एक फ़ोटो। फिर सीधे घर। सब लोग।"

बारह साल का मैं पहली सीढ़ी पर कूदा। मुस्कुराता हुआ। छोटू ने दौड़कर तीन सीढ़ियाँ नीचे जगह ली — "मैं नीचे खड़ा होऊँगा, बड़ा दिखूँगा!" — और सूरज...

सूरज मुंडेर पर रुका। मेरे पीछे।

और उसने मेरी पीठ पर हाथ रखा। दोस्ताना। खेल-खेल में। जैसे बच्चे फ़ोटो में एक-दूसरे पर हाथ रखते हैं।

"सूरज, तू भी नीचे आ न," दादाजी ने कहा, कैमरा आँख से लगाते हुए।

"मैं यहीं ठीक हूँ, बाबा," सूरज ने कहा। उसकी आवाज़ थोड़ी काँप रही थी। "मुझे... मुझे सीढ़ियों से डर लगता है।"

क्लिक।

दादाजी ने कैमरा नीचे किया। "चलो अब। घर।"

और वो मुड़े, और चलने लगे। पीपल की तरफ़। बिना पीछे देखे। क्योंकि उन्हें भरोसा था। कि बच्चे उनकी बात मानेंगे।

तस्वीर का पहला सच। जो फ़्रेम के अंदर था।

और तब मैंने दूसरा सच देखा। वो, जो फ़्रेम के बाहर था।

दादाजी के कैमरे का लेंस उस पल में पहली सीढ़ी और उसके नीचे की तीन सीढ़ियों तक ही पहुँचा था। मुंडेर का वो हिस्सा, जहाँ सूरज खड़ा था — ऊपर से कट गया था। इसलिए सूरज का चेहरा तस्वीर में नहीं आया। बस उसका हाथ। मेरी पीठ पर।

और नीचे — जहाँ फ़्लैश नहीं पहुँची थी — पानी के ठीक ऊपर, अँधेरे में, वो खड़ी थी। उल्टी नहीं। सीधी। एक लड़की की तरह। लाल जोड़े में। सात लड़ों वाली चोटी। घड़ा कमर पर टिकाए। जैसे कोई पनिहारिन नदी से लौटी हो।

और वो ऊपर देख रही थी। कैमरे की तरफ़ नहीं। दादाजी की तरफ़।

गंगाधर के वंश की तरफ़।

उस पल उसके चेहरे पर कोई भूख नहीं थी। बस एक अजीब-सी पहचान। जैसे वो सोच रही हो — यही है। यही वो ख़ून है।

फिर दादाजी ने कैमरा नीचे किया, और वो पानी में घुल गई।

बच्चे दादाजी के पीछे गए। पीपल तक। फिर वहाँ से, जब दादाजी गाँव की तरफ़ मुड़े और आँखों से ओझल हो गए — वो तीनों वापस भागे।

हँसते हुए। दबी हुई हँसी। जैसे बच्चे तब हँसते हैं जब किसी बड़े को धोखा दे दें।

मुंडेर पर वापस।

"चल, विक्की," छोटू ने कहा। "तू गिन। मैं उतरूँगा।"

"और सूरज?"

छोटू ने सूरज की तरफ़ देखा। सूरज ने नज़रें फेर लीं।

"सूरज भी उतरेगा," छोटू ने कहा। "मेरे पीछे। है न, सूरज?"

सूरज ने सिर हिलाया। बिना कुछ कहे।

बारह साल का मैं मुंडेर के किनारे खड़ा हुआ। आँखें बंद कीं। और गिनना शुरू किया।

"एक।"

मैं अपनी उस गिनती को सुनता रहा। सत्रह साल बाद। पानी की याद में।

"दो। तीन। चार।"

बारह साल के मैं की आवाज़। पतली। उत्साहित। थोड़ी डरी हुई।

"पाँच। छह। सात।"

छोटू और सूरज नीचे उतर रहे थे। सूरज पीछे। उसका हाथ छोटू के कंधे पर।

"आठ। नौ।"

और तब, दसवीं पर, कुछ बदला।

मैंने देखा — मेरी अपनी बंद आँखों के पीछे से, पानी की याद में — बारह साल के मैं का चेहरा बदला। उसकी भौंहें ढीली पड़ीं। उसके होंठ — एक कोना ऊपर गया, एक नीचे।

और उसके पैरों के पास, मुंडेर की दरारों से, कुछ निकला। पतले, काले धागे। बाल। उसके टख़नों पर लिपटते हुए। उसकी पिंडलियों पर चढ़ते हुए। धीरे-धीरे। उसकी गर्दन तक। उसके होंठों तक।

"...दस..."

वो आवाज़ अब मेरी नहीं थी। गहरी। धीमी। कुएँ के अंदर से।

वो मेरे मुँह से गिन रही थी।

"ग्यारह। बारह। तेरह।"

नीचे, सूरज छोटू के कान में फुसफुसा रहा था। मैंने वो सुना था, ग्यारहवीं रात। "विक्की नहीं रुकेगा। दीदी ने उसकी आवाज़ ले ली है।"

"चौदह। पंद्रह। सोलह।"

पानी आया। उनके पैरों तक।

"सत्रह।"

और सूरज ने नीचे देखा।

मैंने उसे देखा — सत्रह साल बाद — उसका गोल चेहरा, उसकी आँखें पानी की सतह पर। और वहाँ, पानी के नीचे, वो उल्टी औरत। लाल साड़ी। बाल ऊपर की तरफ़ लहराते हुए। और उसका मुँह, जिसमें दाँतों की जगह सीढ़ियाँ थीं।

सूरज चीख़ा।

और मुड़ा। और भागा।

ऊपर। सत्रह सीढ़ियाँ। गिरता हुआ। घुटने छीलता हुआ। रोता हुआ।

और वो मुंडेर पर पहुँचा। जहाँ बारह साल का मैं खड़ा था। आँखें बंद। मुस्कुराता हुआ। उसकी आवाज़ में गिनता हुआ।

"...अठारह..."

सूरज रुका।

मेरे ठीक पीछे।

मैंने उसका चेहरा देखा। पानी की याद में। पूरा। साफ़।

वो रो रहा था। उसके गाल आँसुओं से भीगे थे। उसके होंठ काँप रहे थे। और उसकी कलाई पर वो ताँबे का सूरज, धूप में चमकता हुआ।

और मुंडेर की दरार से, उसके पैरों के पास, एक आवाज़ आई। वही। मीठी। दीदी वाली।

"सूरज बेटा। तीन चाहिए थे। याद है? एक जो गिने, एक जो उतरे, और एक जो तय करे। तूने तय किया था कि छोटू उतरेगा। पर छोटू अकेला काफ़ी नहीं है।"

सूरज ने सिर हिलाया। दाएँ से बाएँ। नहीं।

"विक्की को भी भेजना होगा। नहीं तो सौदा अधूरा। और अधूरे सौदे में... तेरी अम्मा की साँस भी अधूरी रहेगी।"

सूरज ने अपनी आँखें बंद कीं। कसकर।

और उसके होंठ हिले। बहुत धीरे। मैंने पढ़ लिया।

"माफ़ कर।"

वही दो शब्द। जो सत्रह साल बाद उसने गुड्डी की स्लेट पर लिखे थे। अपनी पत्थर की उँगलियों से।

और उसने अपने दोनों हाथ मेरी पीठ पर रखे।

और धकेला।

बारह साल का मैं गिरा।

मुंडेर से। सीढ़ियों पर। लुढ़कता हुआ। एक, दो, पाँच, दस — हर सीढ़ी पर मेरा सिर, मेरे कंधे, मेरे घुटने टकराते हुए। मेरे माथे की पुरानी चोट — जो उस गर्मी की शुरुआत में आम के पेड़ से गिरकर लगी थी — एक पत्थर से टकराकर फिर से फट गई। वही निशान, जो आज भी मेरे माथे पर है। मैं सत्रह साल से सोचता था कि वो बस एक पेड़ से गिरने का निशान है। वो दो बार का निशान था।

और गिरते हुए, मेरे मुँह से वो आवाज़ निकल गई। वो गहरी, कुएँ वाली आवाज़। बाल मेरे होंठों से छूटे।

और मैं जागा।

अठारहवीं सीढ़ी पर। पानी में। कमर तक। हाँफता हुआ। मेरे माथे से ख़ून बहता हुआ। और मुझे कुछ नहीं पता था कि मैं कहाँ हूँ, कैसे पहुँचा।

और फिर मैंने छोटू को देखा।

उन्नीसवीं पर। मेरे ठीक नीचे। पानी उसकी छाती तक। और उसके पैरों के चारों ओर, पानी के नीचे से, बाल लिपटे हुए। उसे नीचे खींचते हुए।

वो मेरी तरफ़ देख रहा था। उसकी आँखें डर से फैली हुईं।

"छोटू!"

मैंने अपना हाथ बढ़ाया।

"छोटू! हाथ पकड़! हाथ पकड़!"

सूरज ने यही सुना था। पीपल तक भागते हुए। मेरी असली आवाज़।

छोटू ने अपना हाथ ऊपर किया। हमारी उँगलियाँ मिलीं। उसकी उँगलियाँ ठंडी। मेरी गरम। मैंने पकड़ा। कसकर।

और खींचा।

बाल उसे नीचे खींच रहे थे। मैं उसे ऊपर। वो दोनों तरफ़ से खिंच रहा था। उसका मुँह पानी में डूबा, फिर ऊपर आया, फिर डूबा।

मैं उन्नीसवीं पर उतरा। उसके बगल में। पानी मेरी छाती तक। और मैंने अपनी दोनों हथेलियाँ उसकी पीठ पर रखीं — उसे उठाने के लिए, उसे अठारहवीं की तरफ़ धकेलने के लिए, ऊपर की तरफ़ — और पूरी ताक़त लगाई।

मेरी हथेलियाँ उसकी पीठ पर। दबाव आगे की तरफ़।

वो याद। दसवीं रात वाली। अब पूरी।

मैं उसे धक्का दे रहा था। हाँ। ऊपर की तरफ़। सीढ़ी की तरफ़। पानी से बाहर।

आईने ने आधा सच कहा था। तूने उसे धक्का दिया। उसने ये नहीं बताया था कि किस तरफ़।

और तब छोटू मुड़ा।

उसने मेरी तरफ़ देखा। पानी में। उसके गीले बाल माथे पर चिपके हुए। और उसके चेहरे पर डर नहीं था।

एक अजीब, शांत, बारह साल वाली समझदारी थी।

"भैया," उसने कहा। पानी उगलते हुए। "तुम गिर जाओगे।"

"नहीं गिरूँगा। ऊपर चल!"

"नहीं, भैया।" उसने अपना सिर हिलाया। नीचे से बाल उसे फिर खींचे। उसकी ठोड़ी पानी में डूबी। वो ऊपर आया। "दीदी को एक चाहिए। अगर मैं ऊपर आया, तो वो तुम्हें ले जाएगी। सूरज ने तुम्हें धकेला है। मैंने देखा। वो अब तुम्हें चाहती है।"

"मुझे परवाह नहीं!"

"मुझे है।"

और उसने अपनी दोनों हथेलियाँ मेरी छाती पर रखीं।

और धकेला।

ऊपर की तरफ़।

मैं पीछे गिरा। अठारहवीं पर। मेरी पीठ सीढ़ी से टकराई। और मेरे हाथ — जो उसकी पीठ पर थे — उससे छूट गए।

"छोटू!"

वो उन्नीसवीं पर खड़ा रहा। पानी अब उसकी ठोड़ी तक। बाल उसकी कमर तक लिपटे हुए। पर उसने कोई लड़ाई नहीं की। उसने बस ऊपर देखा। मेरी तरफ़। और मुस्कुराया।

होंठ का एक कोना ऊपर। एक नीचे।

वो मुस्कान, जो सत्रह साल से उसने मेरे चेहरे पर पहनी थी। वीडियो में। खिड़की पर। हर जगह। वो मुस्कान उसकी नहीं थी। वो छोटू की थी। और उसने उसे चुरा लिया था। क्योंकि ये वो आख़िरी चीज़ थी जो मैंने उस दिन देखी थी, इससे पहले कि मेरी याद बंद हो जाए।

"भैया," छोटू ने कहा। पानी उसके होंठों तक आ गया था। "मम्मी को मत बताना कि जेब फट गई है।"

"छोटू, नहीं—"

"और सूरज से कहना... कहना कोई बात नहीं। उसकी अम्मा ठीक हो जाएँगी।"

और फिर उसने अपना हाथ ऊपर उठाया। मेरी तरफ़। खुला हुआ। उँगलियाँ फैली हुईं।

पकड़ने के लिए नहीं।

अलविदा कहने के लिए।

और पानी उसके ऊपर बंद हो गया।

मैंने आगे की याद देखी। धुँधली। जल्दी-जल्दी। जैसे किसी फ़िल्म की रील तेज़ी से घूम रही हो।

मैं अठारहवीं पर, चीख़ता हुआ। पानी में हाथ मारता हुआ। नीचे की तरफ़। कुछ नहीं। बस पानी।

ऊपर मुंडेर पर दादाजी। भागते हुए आते हुए। वो लौट आए थे — कैमरा भूल गए थे, बाद में पता चला, पीपल के पास। और उन्होंने चीख़ सुनी थी।

दादाजी नीचे उतरे। सीढ़ियों पर। मुझे पकड़ा। मेरे माथे का ख़ून। मेरा ठंडा, काँपता शरीर। उन्होंने मुझे उठाया और ऊपर ले गए। और मुंडेर पर लिटाया। और वापस नीचे झाँका।

उन्नीसवीं सीढ़ी ख़ाली थी।

और दादाजी वहीं मुंडेर पर बैठ गए। मेरे बगल में। और एक ऐसी आवाज़ में रोए, जो मैंने अपने दादाजी के मुँह से कभी नहीं सुनी थी।

और फिर बुख़ार। अँधेरा। झाँसी का अस्पताल। मम्मी का रोना। और एक पानी वाली आवाज़, मेरे कान में, बार-बार:

"...सत्रह... अठारह... उन्नीस..."

वो मेरी याद खा रही थी। टुकड़ा-टुकड़ा। ताकि मुझे कभी पता न चले कि उस दिन उसका खेल टूटा था। कि एक बच्चे ने उसके सौदे को ठुकरा दिया था। कि किसी ने अपनी मर्ज़ी से अपना हाथ छोड़ा था — ख़ुद को बचाने के लिए नहीं, किसी और को।

सत्रह साल उसने मुझे एक झूठ के साथ जीने दिया। कि मैंने उसे छोड़ा था। या धकेला था।

क्योंकि जो इंसान ख़ुद से नफ़रत करता है, वो कभी किसी की तरफ़ हाथ नहीं बढ़ाता।

और सूरज।

मैंने उसके चेहरे को याद किया। उस पल में। मुंडेर पर। आँसुओं से भीगा। माफ़ कर। उसकी छोटी-छोटी हथेलियाँ मेरी पीठ पर।

मुझे ग़ुस्सा आना चाहिए था। नफ़रत होनी चाहिए थी। सत्रह साल, उसने मुझे वो कहानी सुनाई थी कि वो भाग गया था। कि वो मेरे बगल से गुज़रा था। कि उसने बस मेरी चीख़ सुनी थी।

पर जब मैंने उस बारह साल के गोल-मटोल लड़के का चेहरा याद किया — जिसकी माँ खाँसी में ख़ून थूकती थी, जो रात को रोता था, जिसके कान में पानी से एक मीठी आवाज़ फुसफुसाती थी — तो मुझे बस एक चीज़ महसूस हुई।

वही, जो छोटू ने अपनी चिट्ठी में लिखी थी। सूरज रात को रोता है। मैंने सुना है।

उसने सूरज को पहले ही माफ़ कर दिया था। सत्रह साल पहले। पानी में डूबते हुए। सूरज से कहना कोई बात नहीं।

और अगर छोटू कर सकता था, तो मैं भी।

याद ख़त्म हुई।

पानी वापस आया। ठंडा। काला। मेरे सिर के ऊपर तक।

मैं उन्नीसवीं सीढ़ी पर खड़ा था। सत्रह साल बाद। उसी जगह जहाँ छोटू खड़ा था।

और मेरे आँसू पानी में घुल रहे थे। कहीं नहीं जा रहे थे।

मैंने अपनी आँखें खोलीं।

दोनों। दाईं भी। बाईं भी।

और उसे देखा।

वो मेरे सामने खड़ा था। एक हाथ की दूरी पर।

हाफ़ पैंट। नीली कमीज़, जिसकी जेब फटी हुई थी। गीले बाल माथे पर चिपके हुए। बारह साल का। बिल्कुल वैसा ही। सत्रह साल में ज़रा भी बड़ा नहीं हुआ।

और उसकी आँखें उसकी अपनी थीं।

वो पुरानी, भूखी, दो सिक्कों वाली आँखें नहीं, जो मैंने तस्वीर में देखी थीं। जो गुड्डी के चेहरे में धँसी थीं। वो छोटू की आँखें थीं। भूरी। थोड़ी शरारती। और बहुत, बहुत थकी हुई।

उसका दायाँ हाथ ऊपर की तरफ़ बढ़ा हुआ था। खुला। उँगलियाँ फैली हुईं। वैसे ही, जैसे सत्रह साल पहले, आख़िरी पल में।

अलविदा कहने के लिए।

या शायद — अब — कुछ और कहने के लिए।

मेरी जेब का घुँघरू चुप था। बिल्कुल चुप।

मैंने अपना हाथ बढ़ाया। धीरे-धीरे। पानी में।

मेरी उँगलियों ने उसकी उँगलियों को छुआ।

वो गर्म थीं।

पूरी बावड़ी में — पूरे भानपुरा में — उन्नीस दिनों में जिसे भी मैंने छुआ था, सबके हाथ ठंडे थे। पानी जैसे ठंडे। सिर्फ़ मामी का हाथ गर्म था।

और अब, उन्नीसवीं सीढ़ी पर, पानी के नीचे, सत्रह साल से डूबे एक बच्चे का हाथ।

गर्म। अपनी माँ की तरह।

छोटू ने मेरी उँगलियाँ पकड़ीं। और मुस्कुराया। वो मुस्कान, जो उसने सत्रह साल चुराकर पहनी थी — पर अब ये उसी के चेहरे पर थी जिसकी थी।

"भैया," उसने कहा। उसकी आवाज़ पानी में भी साफ़ थी। "आ गए तुम। मैंने कहा था न, जल्दी आना।"

और उसके पीछे — बहुत नीचे — पूरी बावड़ी काँप उठी।

भाग 19 समाप्त।

अगले भाग में — "बीसवीं सीढ़ी": छोटू, पहली बार, आमने-सामने। सत्रह साल की बातें। वो बताता है कि उसने ज़ंजीर में शामिल होने से कैसे इनकार किया, और सत्रह साल से वो नीचे क्या कर रहा था। और पूरी बावड़ी में, पहली बार, भूख डर रही है... क्योंकि एक बच्चे के गर्म हाथ ने किसी को थामा है।

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