Pretika › Real Experiences › भानपुरा की बावड़ी - चालीस सीढ़ियाँ

भाग 34 — चौंतीसवीं सीढ़ी

Piyashi Atma · Real Experiences · 20 मिनट

Writer
Piyashi Atma
Story
भानपुरा की बावड़ी - चालीस सीढ़ियाँ
Chapter
34 of 34
Category
Real Experiences
Reading time
20 min
Words
3976
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

हर गाँव में एक मास्टर जी होते हैं।
वो जो सुबह साइकिल पर आते हैं, एक पुराना झोला कंधे पर टाँगे। जिनका चश्मा हमेशा नाक पर फिसलता रहता है। जो बच्चों को पहाड़े रटवाते हैं और ग़लत जवाब पर हल्के से कान खींचते हैं। जिन्हें कोई बहादुर नहीं कहता। जिनके बारे में कोई कहानियाँ नहीं सुनाता।
पर वही होते हैं जो गाँव के हर बच्चे को उसका पहला अक्षर सिखाते हैं। अ। उसका पहला अंक। एक। और उसका पहला शब्द, जो वो अपने हाथ से लिखता है।
अपना नाम।
उस चौंतीसवें दिन, भानपुरा के मास्टर ओमप्रकाश जी — जो राजा के आख़िरी रक्त थे, और जिन्होंने चालीस बरस गाँव के बच्चों को गिनती सिखाई थी — बावड़ी में उतरे।
और वहाँ, सबसे नीचे, एक लड़की ने उनसे वही माँगा, जो हर बच्चा अपने मास्टर जी से माँगता है।
सुबह तक पत्थर मेरी जाँघों तक पहुँच चुका था।
मैं अब बैसाखी से भी मुश्किल से चल पाता था। सूरज और लल्लन मिलकर मुझे एक पुरानी हाथगाड़ी में बिठाकर अम्मा के आँगन तक लाए थे। वो हाथगाड़ी जिसमें सब्ज़ी वाले मंडी जाते थे।
"शर्म मत कर," सूरज ने कहा था, जब मैंने उसमें बैठने से मना किया था। "मुझे भी उन्नीस रातें ऐसे ही ढोया गया था।"
और फिर, हाथगाड़ी धकेलते हुए, पीपल वाली सड़क की धूल में, उसने धीरे से कहा — इतने धीरे कि लल्लन न सुन पाए — "सत्रह बरस पहले मैंने तुझे धकेला था, विक्की। आज भी धकेल रहा हूँ।" उसने हल्का-सा हँसने की कोशिश की। "पर इस बार आगे की तरफ़।"
मैं कुछ नहीं बोल पाया। बस हाथगाड़ी के किनारे को पकड़े रहा।
आँगन में सब थे। धूप में। अम्मा, मामी, चाची, हरिहर शास्त्री, गुड्डी — उसके बगल में वो परछाईं। और मास्टर जी।
वो सबसे अलग बैठे थे। एक कोने में। उनकी गोद में पोथी। उनका चेहरा सफ़ेद।
"योजना," अम्मा ने कहा। "एक बार फिर से। शुरू से। ताकि सबको पता हो।"
मैंने बोलना शुरू किया।
"चालीसवीं रात। छह रातें बाद। दो बजकर सैंतालीस पर। मैं चालीसवीं सीढ़ी पर पहुँचूँगा। और पत्थर बनूँगा।"
किसी ने कुछ नहीं कहा।
"उस पल भूख सबसे भारी होगी। सबसे गहरी नींद में। एक नया प्राण। गंगाधर का आख़िरी रक्त।" मैंने अपने पत्थर वाले घुटनों को देखा। "दादाजी ने कहा था — वही एक पल है।"
"और उस पल," हरिहर शास्त्री ने आगे कहा, "कोई उस लड़की के पास होगा। सबसे नीचे। घुँघरू लेकर।"
"मैं," मामी ने कहा।
सबने उनकी तरफ़ देखा।
"मेरे टख़नों पर उसके निशान हैं," मामी ने कहा। "मैं रुके हुए वक़्त में जागती हूँ। मैं नदी पर उस माँ से मिली हूँ। उसने अपनी आवाज़ मेरी हथेली पर रखी थी।" उन्होंने गुड्डी के सिर पर हाथ रखा। "बिटिया ने उसे सँभाला है। उस रात वो मुझे देगी। और मैं उसे नीचे ले जाऊँगी।"
गुड्डी ने घुँघरू को अपनी मुट्ठी में कसकर भींचा। फिर मामी की तरफ़ देखा। और सिर हिलाया।
"और शिला," चाची ने धीरे से कहा।
सबकी आँखें कोने की तरफ़ मुड़ीं।
मास्टर जी ने अपना चश्मा उतारा। पोंछा। फिर पहना।
"मैं हटाऊँगा," उन्होंने कहा। उनकी आवाज़ बहुत धीमी थी। "अगर हटा सका।"
"उसे सीधा करना है," अम्मा ने कहा। "गंगाधर ने लिखा था। शिला हटाकर। उसे सीधा करके। और उसकी माँ की आवाज़ उसके कान में।"
"और उसकी जगह लेकर," मैंने कहा।
सब चुप हो गए।
गंगाधर की चिट्ठी का वो आख़िरी हिस्सा। उससे क्षमा माँगना। उसके पाँवों तले। उसकी शिला हटाकर। उसे सीधा करके। उसकी जगह लेकर।
"किसी को उसकी जगह लेनी होगी," हरिहर शास्त्री ने कहा। "जब वो सीधी होगी, और भूख से अलग होगी — तो पिंजरा ख़ाली होगा। और ख़ाली पिंजरे में भूख..." उन्होंने अपनी दाढ़ी पर हाथ फेरा। "गंगाधर ने लिखा था कि वो मिट जाएगी। पर अगर न मिटी? अगर उसे एक पल के लिए भी कोई और देह मिल गई?"
"तो कोई उस जगह होगा," मैंने कहा। "जो उस पर भरोसा न करे।"
"कौन?"
मैंने किसी की तरफ़ नहीं देखा।
पर मुझे पता था कि उस पल, उस आँगन में, सबके मन में एक ही नाम था।
एक बारह बरस का बच्चा। जो सुरंग में खड़ा था। अपनी पीठ पर पूरी बावड़ी का वज़न थामे।
दोपहर को मैं मास्टर जी के पास गया। स्कूल में।
वो ख़ाली कक्षा में बैठे थे। बच्चे नहीं आए थे — गाँव में अब भी कुएँ के पानी का उत्सव चल रहा था, और माँ-बाप ने स्कूल भेजना बंद कर दिया था। ब्लैकबोर्ड पर कल का पाठ अब भी लिखा था। क, ख, ग, घ। और उसके नीचे एक से बीस तक अंक।
मास्टर जी अपनी मेज़ पर बैठे थे। वो पुराना वंशवृक्ष उनके सामने खुला था।
"मैं बहादुर नहीं हूँ, विक्रम," उन्होंने कहा। बिना मेरी तरफ़ देखे। "चालीस बरस मैंने इस कक्षा में बच्चों को पढ़ाया है। और चालीस बरस मैं उस बावड़ी से डरता रहा हूँ। मैं कभी पीपल वाली सड़क पर अँधेरे में नहीं गया। मैं कभी उसकी तरफ़ नहीं देखता था।"
"मुझे पता है, मास्टर जी।"
"और मुझे बंद जगहों से डर लगता है।" उन्होंने अपना चश्मा उतारा। उनकी आँखें लाल थीं। "बचपन से। एक बार मेरे भाई ने मुझे अनाज के कोठार में बंद कर दिया था, खेल-खेल में। तीन घंटे। अँधेरे में। तब से..." उन्होंने अपना सिर हिलाया। "तूने बताया था — वो सुरंग इतनी सँकरी है कि रेंगना पड़ता है।"
मैं चुप रहा।
"और देवदत्त," उन्होंने कहा। "मेरी परनानी का भाई। जिसके बारे में मुझे एक हफ़्ते पहले तक पता भी नहीं था। उसके ख़ून का होना... मुझे बहादुर नहीं बनाता।"
"नहीं बनाता," मैंने कहा। "पर आपको वहाँ ले जाता है। बाक़ी का काम डर ख़ुद करता है।"
मास्टर जी ने मेरी तरफ़ देखा।
"अम्मा कहती हैं," मैंने कहा, "कि आधा रास्ता भी रास्ता होता है। सरला दीदी आधे रास्ते तक गई थीं। और वहीं रुककर गाती रहीं। और उनके गाने से हम पहुँचे।" मैंने ब्लैकबोर्ड की तरफ़ देखा। क, ख, ग, घ। "आपको बहादुर बनने की ज़रूरत नहीं है, मास्टर जी। आपको बस वहाँ तक पहुँचना है। और एक पत्थर को छूना है।"
"आज रात," मास्टर जी ने कहा। बहुत देर बाद। "मैं आज रात जाऊँगा।"
"आज? चालीसवीं तो छह रात बाद—"
"इसीलिए।" उन्होंने वंशवृक्ष को मोड़ा और अपनी जेब में रखा। "अगर मैं उस रात पहली बार उस सुरंग में घुसा, और मेरी साँस रुक गई — तो सब ख़त्म। मुझे पहले देखना है। एक बार। कि मैं पहुँच सकता हूँ या नहीं।" उन्होंने अपने हाथ देखे। "और कि वो शिला मेरे छूने से हिलती है या नहीं।"
"वो जाग सकती है। अभी वो गहरी नींद में नहीं है।"
"तो मैं बस एक उँगली लगाऊँगा।" मास्टर जी ने एक फीकी मुस्कान दी। "जैसे बच्चे पहली बार किसी गरम चीज़ को छूते हैं। देखने के लिए कि कितनी गरम है।"
"आपने कुएँ का पानी पिया था," मैंने कहा। "परसों।"
मास्टर जी ने सिर हिलाया।
"तो आप रुके हुए वक़्त में जागेंगे। आपका धागा अब उस लड़की के पानी से बँधा है। नदी की तरफ़ जाता है।" मैंने उनकी गर्दन पर वो हल्की हरी लकीर देखी, अपनी बाईं आँख से। "पर इसका मतलब है कि आप बावड़ी में उतर सकते हैं। पानी आपको पहचानेगा।"
"और भूख?"
"भूख भी पहचानेगी।"
मास्टर जी ने अपनी आँखें बंद कीं।
"ठीक है," उन्होंने कहा।
उसी दोपहर, जब मैं स्कूल से निकल रहा था, गुड्डी मास्टर जी के पास आई। अकेली। अपनी स्लेट लेकर। और अपने बगल में — मेरी बाईं आँख में — वो परछाईं।
"मास्टर जी," उसने कहा, "मुझे भी अक्षर सिखाओ।"
मास्टर जी ने उसे देखा। "अभी तू बहुत छोटी है, बिटिया। अगले साल—"
"अभी।" गुड्डी की आवाज़ में वही ज़िद थी, जो उसके पापा के कड़े वाले दिन थी। "मैं सीखूँगी, और दीदी भी मेरे साथ सीखेगी। वो रोज़ मेरे बगल में बैठती है। अगर मैं सीखूँ, तो वो भी देखेगी।" उसने अपनी स्लेट आगे बढ़ाई। "आप आज रात नीचे जाओगे न? तो उसे वहाँ सिखाना। मैं दिन में ऊपर सिखाऊँगी। दोनों तरफ़ से।"
मास्टर जी बहुत देर तक उसे देखते रहे। फिर उन्होंने अपनी जेब से चॉक का वो टुकड़ा निकाला। स्कूल वाला। छोटा। टूटा हुआ।
और गुड्डी की स्लेट पर, बहुत बड़े-बड़े, एक अक्षर लिखा।
स
"ये स है," उन्होंने कहा। "सूरज का स। सरला का स।"
गुड्डी ने उसे अपनी उँगली से छुआ। "स।"
और उसके बगल में, परछाईं ने भी अपना हाथ स्लेट की तरफ़ बढ़ाया। और उस अक्षर की परछाईं को छुआ।
मास्टर जी को वो नहीं दिखा। पर मुझे दिखा।
और मैंने देखा कि उस परछाईं के होंठ हिले।
स।
दो बजकर सैंतालीस।
मैं बावड़ी में था। और मास्टर जी भी।
वो मेरे साथ उतरे। सूखी सीढ़ियों पर। नंगे पैर — मैंने कहा था, जूते उतार दीजिए, पत्थर को आपकी चमड़ी महसूस होनी चाहिए। उनके हाथ में एक छोटी टॉर्च थी, जो रुके हुए वक़्त में जल नहीं रही थी, पर जिसे उन्होंने फिर भी पकड़ रखा था। शायद आदत से। शायद डर से।
पहली सीढ़ी। उन्होंने नीचे देखा। उन खुरची हुई लकीरों को। हज़ारों। चार खड़ी, एक आड़ी।
"गिनने वाले," मैंने कहा। "हर रात। पौने तीन सौ बरस।"
मास्टर जी ने अपना हाथ एक लकीर पर रखा। बहुत धीरे। जैसे किसी बच्चे की कॉपी पर रखते हैं।
"मैंने चालीस बरस बच्चों को सिखाया कि ये चार और एक, पाँच होते हैं," उन्होंने फुसफुसाया। "मिलान चिह्न। टैली मार्क्स। मुझे नहीं पता था कि कोई इन्हें अपनी मौत गिनने के लिए इस्तेमाल करता है।"
अठारहवीं पर पानी शुरू हुआ। मास्टर जी ठिठके। पर उतरे। पानी उनके घुटनों तक। कमर तक।
"साँस रोकिए मत," मैंने कहा। "बस लीजिए। पानी आपको पहचानता है।"
उन्होंने पहले साँस रोकी। दस सेकंड। बीस। उनका चेहरा लाल हो गया।
फिर उन्होंने ली।
और उनकी आँखें फैल गईं। हैरानी से।
"ये... ये मीठा है," उन्होंने फुसफुसाया। पानी में। "कुएँ के पानी जैसा। नदी जैसा।"
"ये उसका है। लड़की का। भूख का नहीं।"
इक्कीसवीं का भँवर। उल्टा गाँव। मास्टर जी पलटकर उस पार गिरे और एक पल के लिए ज़मीन पर पड़े रहे, हाँफते हुए, ऊपर पानी की छत को देखते हुए — जो अब इतनी नीचे थी कि उसकी जड़ें उनके चेहरे से बस कुछ इंच ऊपर लटक रही थीं।
"हे भगवान," उन्होंने कहा।
पनघट पर सरला, गंगाधर का पोता और भोला थे। बहुत धुँधले। लगभग पारदर्शी। उन्होंने मास्टर जी को देखा।
और भोला ने अपनी लाठी ज़मीन पर ठोकी। एक बार।
"राजा का रक्त," उसने फुसफुसाया।
मास्टर जी ने उसकी तरफ़ देखा। एक नंगे बदन वाला बारह बरस का लड़का। चरवाहे की लाठी। दो सौ चौंसठ बरस पुराना।
"मैं राजा नहीं हूँ, बेटा," मास्टर जी ने कहा। "मैं मास्टर हूँ।"
कुएँ के खंभे के नीचे का पत्थर — घड़े और लहरों वाला — अब भी थोड़ा खिसका हुआ था। उस दरार से छोटू का गाना आ रहा था।
मैं उसके पास घुटनों के बल बैठा। अपना बायाँ हाथ दरार में डाला।
और छोटू की उँगलियाँ मेरी उँगलियों से मिलीं। गर्म।
सुरंग काँपी। दीवारें पीछे हटीं। थोड़ा-सा। और छोटू की आवाज़ आई। थकी हुई। पर मुस्कुराती हुई।
"भैया, आ गए। आज किसे लाए हो?"
"मास्टर जी को।"
"मास्टर जी?" छोटू की आवाज़ में हैरानी थी। "ओमप्रकाश मास्टर जी? जो कान खींचते थे?"
मास्टर जी दरार के पास झुके। और अंदर देखा। वो उसे देख नहीं सकते थे — उनकी आँखें पानी की आँखें नहीं थीं। पर वो उसकी आवाज़ सुन सकते थे।
"कन्हैया?" उन्होंने फुसफुसाया।
"हाँ, मास्टर जी।"
मास्टर जी का पूरा शरीर काँप गया।
"तू... तू तीसरी में था। उस साल। मेरी कक्षा में। पहली बेंच पर बैठता था।" उनकी आवाज़ टूट गई। "तू नौ का पहाड़ा हमेशा ग़लत सुनाता था। छप्पन के बाद तू हमेशा अटक जाता था।"
छोटू हँसा। सुरंग में। दबी हुई दीवारों के बीच।
"नौ सात तिरेसठ, मास्टर जी," उसने कहा। "मैंने यहाँ सीख लिया। सत्रह बरस में।"
"मुझे अंदर जाना है, कन्हैया," मास्टर जी ने कहा। "तेरे पार। उस लड़की तक।"
"आप नहीं जा पाओगे, मास्टर जी। सुरंग बहुत सँकरी है। मैं इसे पकड़े हूँ, पर बस इतना कि कोई रेंगकर निकल सके।" छोटू की आवाज़ गंभीर हो गई। "और आपको मेरे नीचे से जाना होगा। मेरी बाँह के नीचे से। अगर आप रुके, या डरे, या दीवार को छुआ — तो वो जाग जाएगी।"
मास्टर जी की साँस तेज़ हो गई। मैंने देखा — उनके हाथ काँप रहे थे।
"मास्टर जी," मैंने कहा, "आप मत जाइए। आज नहीं। चालीसवीं पर—"
"नहीं।" मास्टर जी ने अपने हाथ मुट्ठियों में भींचे। "अगर आज नहीं गया, तो उस दिन भी नहीं जाऊँगा। मैं ख़ुद को जानता हूँ, विक्रम।"
उन्होंने अपना चश्मा उतारा। और मेरी हथेली में रख दिया।
"इसे सँभाल। अंदर इसकी ज़रूरत नहीं।"
और उन्होंने पत्थर को थोड़ा और खिसकाया। और दरार में उतर गए।
मैं उन्हें नहीं देख सकता था। पर मैंने सुना।
उनकी साँसें। तेज़। टूटी हुई। घबराई हुई। सुरंग की दीवारों पर उनके कपड़ों की सरसराहट। उनके घुटनों की घिसटती आवाज़।
और छोटू की आवाज़। धीमी। शांत। किसी कक्षा के सबसे अच्छे बच्चे जैसी, जो किसी डरे हुए नए बच्चे को रास्ता दिखा रहा हो।
"आगे, मास्टर जी। आगे। अब झुकिए। मेरी बाँह के नीचे। हाँ। ऐसे ही। दीवार मत छूना। बाईं तरफ़ बाल हैं। दाईं तरफ़ से निकलिए।"
मास्टर जी की एक सिसकी।
"मैं... मैं नहीं कर सकता, कन्हैया। बहुत अँधेरा है। बहुत सँकरा।"
"आप कर सकते हो, मास्टर जी।" छोटू की आवाज़ और नरम हुई। "याद है, आप कहते थे — जब पहाड़ा याद न आए, तो ज़ोर से बोलो। डर भाग जाता है।"
एक लंबी चुप्पी।
फिर, बहुत धीमी, काँपती हुई, मास्टर जी की आवाज़ आई।
"नौ एकम नौ। नौ दूनी अठारह। नौ तिया सत्ताईस।"
और घिसटने की आवाज़ फिर शुरू हुई।
"नौ चौके छत्तीस। नौ पंजे पैंतालीस।"
"शाबाश, मास्टर जी।"
"नौ छक्के चौवन। नौ सत्ते..."
"तिरेसठ," छोटू ने कहा। हँसते हुए। "मैंने सीख लिया, मास्टर जी।"
फिर आवाज़ें दूर होती गईं। मास्टर जी छोटू के पार निकल गए थे। उस सुरंग में, जो नीचे जाती थी। कक्ष की तरफ़। और उससे आगे।
मैं इंतज़ार करता रहा। पनघट पर। दरार के पास घुटनों के बल। मास्टर जी का चश्मा मेरी हथेली में।
सरला गा रही थीं। नया गीत। धीमा। ताकि भूख सोती रहे।
दस मिनट। बीस। मुझे नहीं पता — उल्टे गाँव में वक़्त अलग चलता था।
और फिर, बहुत नीचे से, एक आवाज़ आई।
मास्टर जी की। पर वो डरी हुई नहीं थी।
हैरान थी।
"बिटिया?"
और फिर, बहुत देर बाद, फिर से घिसटने की आवाज़। ऊपर की तरफ़। नौ का पहाड़ा — इस बार उल्टा, नौ दहाई नब्बे से शुरू होकर नीचे आता हुआ। छोटू की आवाज़, हाँ, मास्टर जी, बाईं तरफ़ नहीं, दाईं तरफ़। और फिर दरार से एक हाथ निकला। काँपता हुआ। मिट्टी और काई से सना हुआ।
मैंने उसे पकड़ा और खींचा।
मास्टर जी पनघट के चबूतरे पर गिरे। हाँफते हुए। उनका पूरा शरीर काँप रहा था। उनकी धोती फटी हुई थी, उनकी बाँहों पर खरोंचें थीं।
गंगाधर का पोता और भोला दौड़कर उनके पास आए। और भोला — दो सौ चौंसठ बरस पुराना चरवाहा — ने उन्हें अपनी छोटी-सी बाँहों में भर लिया। जैसे कोई बच्चा किसी डरे हुए बड़े को गले लगाता है।
"तुम लौट आए, मास्टर," भोला ने फुसफुसाया। "राजा कभी नहीं लौटे थे। तुम लौट आए।"
मास्टर जी ने कुछ नहीं कहा। बस रोते रहे। उस छोटे-से लड़के के कंधे पर सिर रखकर।
मैंने उनका चश्मा उनकी तरफ़ बढ़ाया। उन्होंने उसे लिया। पर पहना नहीं। बस अपनी मुट्ठी में बंद रखा।
मुझे ये सब बाद में पता चला। मास्टर जी से। उनके अपने शब्दों में। सुबह, मुंडेर पर, काँपते हुए।
"मैं उस गोल जगह पहुँचा," उन्होंने बताया। "जहाँ शिला है। ऊपर। छत की तरह। और उसके नीचे वो लड़की। उल्टी। और उसके बगल में तुम्हारे दादाजी।"
"उन्होंने मुझे देखा। और पहचाना। 'ओमप्रकाश?' उन्होंने कहा। 'मास्टर? तू यहाँ?' और मैंने कहा — हाँ, रमेसर भैया। मैं शिला देखने आया हूँ।"
"रास्ते में," उन्होंने आगे कहा, "उन ताकों के पास से गुज़रा। जो तुमने बताए थे। रामप्यारी अम्मा की आँखें। बबलू का ख़ाली गड्ढा। तुम्हारे दादाजी का कैमरा।"
उन्होंने निगला।
"और एक ताक और था, विक्रम। तुमने उसे नहीं देखा होगा — वो नीचे की तरफ़ था, कक्ष के बाद। उसमें एक पाटी थी। लकड़ी की। बच्चों वाली। जिस पर खड़िया से लिखते हैं।"
"किसकी?"
"उस पर अक्षर थे। बहुत पुराने। मिटे हुए। पर मैं पढ़ सकता था। अ, आ, इ, ई। बच्चों वाली लिखावट में। और उसके कोने में एक नाम।" मास्टर जी की आवाज़ भर्रा गई। "देवदत्त।"
अम्मा का हाथ अपनी पायलों पर जम गया।
"वो अपनी पाटी लेकर गया था," अम्मा ने फुसफुसाया। "अट्ठावन में। उस दिन। बावड़ी पर। पाठशाला से सीधे आया था। मुझे याद है। उसकी पाटी उसकी बगल में दबी थी।"
"मैंने उसे नहीं छुआ," मास्टर जी ने कहा। "विक्रम ने कहा था। पर मैं बहुत देर तक उसके सामने रुका रहा। कन्हैया को मुझे आवाज़ देनी पड़ी।"
"और लड़की?"
मास्टर जी ने अपनी आँखें बंद कीं।
"उसने अपना सिर हिलाया। उल्टी लटकी हुई। उसके छोटे बाल उसके चेहरे पर। और उसने कहा..." उनकी आवाज़ रुक गई। "उसने कहा — राजा?"
"वो डर गई।"
"बहुत।" मास्टर जी ने सिर हिलाया। "उसका पूरा शरीर काँपने लगा। उसकी उँगलियाँ तुम्हारे दादाजी का हाथ और कसकर पकड़ने लगीं। और कन्हैया का — कन्हैया ने उसका दूसरा हाथ छोड़ दिया था, मुझे रास्ता देने के लिए, पर वो उसके लिए हवा में टटोल रही थी।" उन्होंने अपना चेहरा अपने हाथों में छुपा लिया। "उसने मेरे चेहरे में राजा को पहचाना था, विक्रम। भानुप्रताप को। जिसकी आज्ञा से उसे गाड़ा गया था।"
"आपने क्या किया?"
"मैं घुटनों के बल बैठ गया," मास्टर जी ने कहा। "उसके सामने। उसके उल्टे सिर के सामने। और मैंने कहा — मैं राजा नहीं हूँ, बिटिया। मैं मास्टर हूँ। बच्चों को पढ़ाता हूँ।"
"और फिर?"
मास्टर जी ने अपने हाथ चेहरे से हटाए। उनकी आँखें लाल थीं। पर उनमें कुछ और भी था। कुछ जो मैंने उनमें पहले कभी नहीं देखा था।
"वो चुप हो गई," उन्होंने कहा। "बहुत देर तक। फिर उसने पूछा — मास्टर? जो अक्षर सिखाते हैं?"
"मैंने कहा हाँ।"
"और उसने कहा..."
मास्टर जी रुके। उन्होंने बावड़ी की तरफ़ देखा। उस सूखी पहली सीढ़ी की तरफ़। वहाँ, सुबह की धूप में, हज़ारों खुरची हुई लकीरें चमक रही थीं। चार खड़ी, एक आड़ी। और उनमें से किसी ने कभी एक अक्षर नहीं लिखा था।
"मुझे पढ़ना नहीं आता," उन्होंने धीरे से दोहराया। उस लड़की की आवाज़ की नक़ल करते हुए, बहुत पतली, बहुत टूटी हुई। "पंडित जी ने सिर्फ़ गिनना सिखाया था। पढ़ना नहीं। उन्होंने कहा था, पनिहारिन को पढ़ने की क्या ज़रूरत।"
"और मेरे पैरों पर कुछ लिखा है। पत्थर पर। मुझे महसूस होता है। अक्षर। पर मैं उन्हें पढ़ नहीं सकती।"
मास्टर जी की आवाज़ टूट गई।
"तू मुझे पढ़ना सिखाएगा, मास्टर?"
मुंडेर पर कोई आवाज़ नहीं थी।
अम्मा ने अपनी पायलें गोद में रखीं। मामी ने अपना मुँह हाथ से ढक लिया। चाची ने गुड्डी को अपने पास खींच लिया।
"गंगाधर ने नाम उल्टा खुदवाया था," हरिहर शास्त्री ने फुसफुसाया। "उसके पैरों पर। ताकि वो कभी अपना नाम न पढ़ सके। और उसे पढ़ना सिखाया ही नहीं। ताकि अगर वो उल्टे अक्षर देख भी ले, तो भी न समझे।"
"नाम दबा है पाँव के नीचे," अम्मा ने गाया। बहुत धीमे। "कौन पुकारे, कौन पुकारे।"
उन्होंने अपनी सफ़ेद आँखें आसमान की तरफ़ उठाईं।
"अड़सठ बरस मैंने सोचा कि इस गीत का जवाब है — कोई मिश्र। या कोई राजा। कोई जो ऊपर से उसका नाम पढ़े और उसे बाँधे।" उनकी आवाज़ काँप रही थी। "पर जवाब ये है कि कोई नहीं पुकारे। वो ख़ुद पढ़े। अपना नाम। अपनी आँखों से।"
"आपने क्या कहा उससे?" मैंने मास्टर जी से पूछा।
मास्टर जी ने अपनी जेब से कुछ निकाला। एक छोटा-सा, टूटा हुआ चॉक का टुकड़ा। सफ़ेद। स्कूल वाला।
"मैंने कहा हाँ," उन्होंने कहा। "और मैंने उसकी हथेली पर लिखा। उँगली से। अँधेरे में। उसका पहला अक्षर।"
"कौन-सा?"
मास्टर जी ने चॉक को देखा।
"अ," उन्होंने कहा। "जैसे हर बच्चे को पहले दिन सिखाते हैं। और उसने उसे अपनी उँगली से छुआ। बहुत देर तक। और कहा — अ। अ। अ।" उनकी आँखें भर आईं। "दो सौ अस्सी बरस बाद। उसका पहला अक्षर।"
"और शिला?"
"वो मैंने छुई।" मास्टर जी ने अपनी दाईं हथेली खोली। उस पर एक हल्का-सा काला धब्बा था। जैसे किसी जले हुए कोयले का निशान। "आख़िरी पल में। जब कन्हैया ने कहा — मास्टर जी, वो जाग रही है, भागिए। मैंने ऊपर हाथ उठाया और शिला के किनारे को छुआ। एक उँगली से।"
"और?"
"वो हिली, विक्रम।" मास्टर जी की आवाज़ में एक हैरानी थी। एक बच्चे जैसी। "बस एक बाल भर। पर हिली। और उसके नीचे से — उस लड़की के पैरों और शिला के बीच से — एक पतली-सी रोशनी झाँकी। एक पल के लिए।"
"छह रातें," मैंने कहा।
मास्टर जी ने सिर हिलाया।
"छह रातें," उन्होंने दोहराया। "और छह अक्षर?" उन्होंने अपनी उँगलियों पर गिना। फिर रुके। "नहीं। बहुत कम हैं। वर्णमाला में बावन अक्षर हैं। मात्राएँ। संयुक्ताक्षर।" उन्होंने अपना सिर हिलाया। "एक बच्चे को पढ़ना सिखाने में महीने लगते हैं। साल।"
"उसे सब नहीं सीखना है, मास्टर जी," अम्मा ने धीरे से कहा। "बस अपना नाम।"
मास्टर जी ने अम्मा की तरफ़ देखा।
"पर हमें उसका नाम नहीं पता।"
"सुखन," मैंने कहा। "और आख़िर में ई। देवदत्त ने पढ़ा था। बीच में शायद कुछ और।"
मास्टर जी ने अपना चॉक का टुकड़ा उठाया। और मुंडेर के पत्थर पर लिखा। धीरे-धीरे। अपनी साफ़, सधी हुई, चालीस बरस पुरानी लिखावट में।
स
सु
सुख
सुखन
और फिर रुके। उनका हाथ हवा में।
"और उसके बाद ई," उन्होंने फुसफुसाया। "सुखनई।"
उन्होंने उसे नहीं लिखा। चॉक वहीं रुका रहा। पत्थर से बस एक इंच ऊपर।
"अगर मैंने इसे लिखा," उन्होंने कहा, "और ये ग़लत हुआ — तो मैं उसे ग़लत नाम सिखाऊँगा। और अगर ये सही हुआ, पर मैंने इसे पढ़ा — ज़ोर से, उसके सामने — तो मैं उसे बाँध दूँगा। जैसे गंगाधर ने।"
उन्होंने चॉक नीचे रखा।
"मैं उसे अक्षर सिखाऊँगा। एक-एक करके। स। उ की मात्रा। ख। न। ई की मात्रा। अलग-अलग। जैसे बच्चों को सिखाते हैं।" उन्होंने अपने हाथ देखे। "और फिर, चालीसवीं रात, जब शिला हटेगी, और वो अपने पैरों पर लिखे अक्षर देखेगी — तो वो उन्हें ख़ुद जोड़ेगी। ख़ुद पढ़ेगी। मैं नहीं। कोई मिश्र नहीं। कोई राजा नहीं।"
"वो।"
"वो।" मास्टर जी ने सिर हिलाया। "और उसकी माँ की आवाज़ — घुँघरू में — उसे बताएगी कि उसने सही पढ़ा।"
पर उससे पहले — उस रात, जब मास्टर जी नीचे से लौट आए थे और ऊपर जा चुके थे — मैं चौंतीसवीं पर खड़ा रहा था।
मास्टर जी ऊपर लौट चुके थे। नौ का पहाड़ा ज़ोर से बोलते हुए, छोटू की बाँह के नीचे से रेंगते हुए, काँपते हुए, पर लौटे थे।
और मैं पत्थर में धँसा हुआ खड़ा था। मेरी जाँघें पत्थर की। मेरी कमर की तरफ़ बढ़ता हुआ भार।
और भूख की आवाज़ आई। पानी की छत से। धीमी। ठंडी।
"एक मास्टर।"
मैं चुप रहा।
"पौने तीन सौ बरस मैंने राजाओं को देखा, पंडितों को, तांत्रिकों को। और आख़िर में तुम लोग एक मास्टर लाए। जो बंद कोठार से डरता है। जो नौ का पहाड़ा बोलकर अपना डर भगाता है।"
हँसी। बुलबुलों वाली।
"पढ़ाई से भूख नहीं मिटती, गंगाधर के पोते।"
मैंने ऊपर देखा। पानी की छत की तरफ़।
"नहीं मिटती," मैंने कहा। "पर जो पढ़ना जानता है, उससे झूठ बोलना मुश्किल होता है। और तू सिर्फ़ झूठ से बाँधती है।"
मुझे नहीं पता था कि ये सच था या नहीं। मैंने बस कह दिया। पर जैसे ही मैंने कहा, मुझे अपनी कमर की तरफ़ बढ़ते पत्थर में एक हल्का-सा ठहराव महसूस हुआ। एक पल के लिए। जैसे किसी ने, बहुत नीचे, साँस रोक ली हो।
शायद भूख भी डरती थी। उस एक चीज़ से, जो गंगाधर ने पौने तीन सौ बरस पहले जान-बूझकर एक पनिहारिन से छीन ली थी।
अक्षरों से।
भूख चुप रही।
और बहुत नीचे से — सुरंग के पार, कक्ष के पार, उस गोल जगह से जहाँ शिला थी — एक आवाज़ आई। पतली। एक लड़की की। अकेली। किसी बच्चे की तरह, जो अपना पहला पाठ बार-बार दोहरा रहा हो, ताकि भूल न जाए।
"...अ... अ... अ..."
भाग 34 समाप्त।
अगले भाग में — "पैंतीसवीं सीढ़ी": वहाँ तक, जहाँ दादाजी के पैर नहीं टिके थे। पत्थर विक्रम की कमर तक है। मास्टर जी हर रात सुरंग में उतरते हैं, नौ का पहाड़ा बोलते हुए, और एक लड़की को अक्षर सिखाते हैं। और भूख — जिसे पढ़ाई से डर नहीं लगता — एक नई चाल चलती है। वो भी पढ़ाना जानती है...

← पिछला भाग

भानपुरा की बावड़ी - चालीस सीढ़ियाँ · सभी भाग →

और कहानियाँ · More stories