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भाग 33 — तैंतीसवीं सीढ़ी

Piyashi Atma · Real Experiences · 20 मिनट

Writer
Piyashi Atma
Story
भानपुरा की बावड़ी - चालीस सीढ़ियाँ
Chapter
33 of 34
Category
Real Experiences
Reading time
20 min
Words
3987
Language
Hindi (हिंदी)
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Free to read

चालीस सीढ़ियाँ
भाग 33 — तैंतीसवीं सीढ़ी
भूख सबसे आख़िर में उस चीज़ पर हमला करती है जिसे वो छू नहीं सकती।
वो आपके शरीर को पत्थर बना सकती है। आपकी आँखें ले सकती है। आपकी परछाईं चुरा सकती है, आपकी आवाज़ पहन सकती है, आपके अपनों के चेहरे ओढ़ सकती है। वो आपके गाँव के कुओं में अपना पानी भर सकती है और पूरे गाँव से आपके लिए गिनती करवा सकती है।
पर कुछ चीज़ें होती हैं, जिन्हें वो छू नहीं पाती। दो लोगों के बीच का कोई धागा, जो भरोसे से नहीं, प्यार से बँधा हो। जो उसके ख़िलाफ़ हो।
और जब वो उसे छू नहीं पाती, तो वो एक ही काम करती है।
वो आपसे उसे तोड़वाती है।
आपके अपने हाथों से।
मैंने कुएँ में फिर से झाँका।
सुबह की धूप। गाँव की औरतें घड़े भर रही थीं। गुनगुनाते हुए — वही धुन, बिना जाने। और कुएँ की तली में, पानी के नीचे, वो चेहरा।
छोटू का।
उसकी आँखें ऊपर देख रही थीं। मेरी तरफ़। पुरानी। भूखी। दो सिक्कों वाली।
और उसके होंठ हिले।
"भैया। नीचे आ जा। मैं थक गया हूँ। बस एक बार हाथ पकड़ ले।"
मेरी जेब में देवदत्त वाला घुँघरू बज रहा था। लगातार। छन-छन-छन।
मैंने अपनी आँखें बंद कीं। और साँस ली।
"तू छोटू नहीं है," मैंने कहा।
पानी में वो चेहरा मुस्कुराया। वो मुस्कान। होंठ का एक कोना ऊपर, एक नीचे। जो उसने सत्रह साल मेरे चेहरे पर पहनी थी।
"पक्का?"
और फिर वो घुल गया। कुएँ की तली में। हरे पानी में।
घुँघरू चुप हो गया।
"वो उसका चेहरा पहन रही है," मैंने अम्मा से कहा। "फिर से। जैसे पहले पहनती थी। घुँघरू बजा। वो छोटू नहीं था।"
अम्मा ने सिर हिलाया। धीरे से। "ये तो तू जानता था, बच्चा। पहले दिन से।"
"हाँ।"
"तो डर किस बात का?"
मैं चुप रहा।
क्योंकि डर उस चेहरे का नहीं था। डर उस सवाल का था जो गुड्डी ने पूछा था। उस परछाईं की तरफ़ से।
छोटू भैया उसके पास क्यों गए हैं, अगर उन्हें उसकी मदद नहीं करनी?
और उस सवाल के पीछे एक और सवाल था, जो मैं उन्नीसवीं रात से अपने अंदर दबाए बैठा था। जब मैंने पूरी याद देखी थी। जब छोटू ने अपना हाथ ऊपर उठाया था — अलविदा कहने के लिए।
वो सच में उसकी मर्ज़ी थी?
"चेहरे झूठ बोलते हैं," अम्मा ने कहा। "हाथ देख।"
"मैं उसके हाथ नहीं देख सकता। वो नीचे है।"
"तो उसके हाथ जो पकड़े हैं, वो देख।" अम्मा ने अपना चेहरा गुड्डी की तरफ़ घुमाया। जो आँगन के कोने में बैठी थी। घुँघरू हाथ में। और उसके बगल में — मेरी बाईं आँख में — वो परछाईं।
"बिटिया," अम्मा ने कहा। "अपनी दीदी से पूछ। कन्हैया उसके पास क्या कर रहा है।"
गुड्डी ने परछाईं की तरफ़ देखा। बहुत ध्यान से। उसकी भौंहें सिकुड़ीं। जैसे कोई बहुत धीमी आवाज़ सुनने की कोशिश कर रहा हो।
"दीदी कह रही है," उसने धीरे से कहा, "कि बाबा उसका एक हाथ पकड़े हैं।"
"दादाजी। हाँ।"
"और दूसरा हाथ..." गुड्डी रुकी। फिर परछाईं को देखा। "दूसरा हाथ छोटू भैया पकड़े हैं।"
मेरी साँस रुक गई।
"वो रात को आए थे," गुड्डी ने आगे बताया, परछाईं की बात दोहराते हुए। "जब गाँव गा रहा था। बहुत नीचे। उस सुरंग से। दीदी कह रही है — वो बहुत डरी हुई थी, क्योंकि उसने सोचा कि वो भी उसे गाड़ने आया है। पर उसने बस उसका हाथ पकड़ा। और उसके साथ गाया।"
गुड्डी ने परछाईं की तरफ़ देखा।
"दीदी कह रही है — उसका हाथ गर्म है। बाबा का ठंडा है। पर छोटू भैया का गर्म है।"
"तो कुएँ में जो था..."
"वो भूख थी," अम्मा ने कहा। "उसका चेहरा पहनकर। पर उसे भेजने वाला छोटू नहीं था।" उन्होंने अपनी पायलें अपनी गोद में रखीं। "सोच, बच्चा। बीसवीं रात, जब तूने उसके दोनों हाथ पकड़े थे — पूरी बावड़ी काँप गई थी। भूख डर गई थी। क्यों?"
"क्योंकि वो भरोसा उसके ख़िलाफ़ था।"
"और वो भरोसा उसे जलाता है।" अम्मा ने सिर हिलाया। "वो उसे छू नहीं सकती। तेरे और छोटू के बीच का वो धागा। तो उसने क्या किया?"
मैं चुप रहा। पर मुझे समझ आ रहा था।
"उसने तुझसे उसे तुड़वाने की कोशिश की," अम्मा ने कहा। "छोटू का चेहरा पहनकर कुएँ में दिखी। भूखी आँखों से। ताकि तू उस पर शक करे। ताकि तू सोचे कि वो भी उसी का है। ताकि तू उसका हाथ छोड़ दे।"
उन्होंने अपना हाथ मेरे पत्थर वाले घुटने पर रखा।
"जो भरोसा वो तोड़ नहीं सकती, वो उसे तुझसे तुड़वाती है, विक्की। तेरे अपने शक से।"
पर शक एक बार आ जाए, तो जाता नहीं।
पूरे दिन मैं उसके बारे में सोचता रहा। चौदह रातों में उसने मुझसे जो कहा था, उसका हर शब्द। उसका गर्म हाथ। उसकी चिट्ठी। उसका नीला बटन। दिल्ली की खिड़की पर उसका दुखी चेहरा — तुम्हें भागना नहीं चाहिए था। उल्टे गाँव में उसका रास्ता दिखाना। उसका पूरी रात मेरे बगल में बैठना।
सब सच लगता था।
पर सूरज की धूप वाली कहानी भी सच लगी थी। और अम्मा की भी। और दादाजी की योजना भी।
और एक सवाल बार-बार लौटता था।
उस दिन, उन्नीसवीं सीढ़ी पर, जब उसने अपना हाथ छोड़ा — क्या वो सच में उसकी मर्ज़ी थी? या उसने भी कोई सौदा किया था?
सबने किया था। सूरज ने। अम्मा ने। दादाजी ने। गंगाधर ने। हर एक ने, जो इस बावड़ी के पास आया था।
क्या छोटू अकेला था, जिसने नहीं किया?
दोपहर को मैं मामी के पास गया।
वो आँगन में बैठी थीं। कन्हैया की नीली कमीज़ अपनी गोद में रखे। उस पर टँके नीले बटन को अपने अँगूठे से सहलाती हुईं। बार-बार। जैसे कोई माला।
"मामी," मैंने कहा, "छोटू बचपन में कैसा था?"
मामी ने ऊपर देखा। उनकी आँखों में एक हल्की-सी चमक आई।
"ज़िद्दी," उन्होंने कहा। "बहुत ज़िद्दी। और झूठ बोलना उसे आता ही नहीं था।" वो मुस्कुराईं। "एक बार — सात बरस का था — उसने रसोई में मेरा सबसे अच्छा घड़ा तोड़ दिया। खेलते हुए। मैं खेत पर थी। घर लौटी तो वो दरवाज़े पर बैठा था। घुटनों पर। टूटे घड़े के टुकड़े अपने सामने सजाए हुए।"
"डर के?"
"डर के नहीं।" मामी ने सिर हिलाया। "उसने कहा — मम्मी, मैंने तोड़ा। मुझे मारो। पर पहले ये देखो — मैंने सारे टुकड़े ढूँढ लिए हैं। एक भी नहीं खोया। अगर जोड़ना हो, तो सब यहाँ हैं।" उनकी आँखें भर आईं। "मैं उसे मार नहीं पाई। बस गले लगा लिया।"
उन्होंने बटन को फिर से सहलाया।
"वो कभी कुछ छुपाता नहीं था, विक्की। अगर उसने कोई ग़लती की, तो वो ख़ुद आकर बताता था। और उसके टुकड़े भी लाता था।" उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। "क्यों पूछ रहा है?"
"बस यूँ ही।"
मामी ने मुझे बहुत देर तक देखा। फिर धीरे से कहा:
"अगर तुझे उस पर शक है, बेटा — तो उससे पूछ ले। वो बता देगा। वो हमेशा बताता था। चाहे कितना भी बुरा हो।"
वहाँ से मैं सूरज के पास गया। वो अपने घर के ख़ाली आँगन में बैठा था। अपनी माँ की खाट के पास।
"सत्रह बरस," उसने कहा, जब मैंने उसे बताया कि मुझे क्या डर है। "सत्रह बरस मैं भी यही सोचता रहा, विक्की। कि छोटू मुझसे नफ़रत करता होगा। नीचे से। कि वो किसी रात आएगा, मेरी खिड़की पर, और मुझसे बदला लेगा।"
"वो आया था?"
"कभी नहीं।" सूरज ने अपनी कलाई का काला धागा छुआ। "गुड्डी के पास आया। तेरे पास आया। मेरे पास कभी नहीं। मैंने सोचा वो इतनी नफ़रत करता है कि मेरी शक्ल भी नहीं देखना चाहता।" उसकी आवाज़ टूटी। "फिर तूने बताया — उसने डूबते हुए कहा था, सूरज से कहना कोई बात नहीं।"
उसने मेरी तरफ़ देखा।
"सत्रह बरस मैंने उस पर शक किया, विक्की। और वो सत्रह बरस मुझे माफ़ किए बैठा था। शक सबसे आसान चीज़ है। वो कोई मेहनत नहीं माँगता। बस अपने आप आ जाता है। भरोसा..." उसने अपना सिर हिलाया। "भरोसा हर रोज़ चुनना पड़ता है।"
शाम को मैंने छोटू की चिट्ठी फिर से खोली।
मामी ने उसे सँभालकर रखा था, एक लाल कपड़े में, नीले बटन के बगल में। उन्होंने मुझे दी, बिना कुछ पूछे।
मैंने उसे पढ़ा। फिर से। उसके टेढ़े अक्षर। उसकी ग़लत मात्राएँ।
मैं जानता हूँ बावड़ी वाली दीदी अच्छी नहीं है। मुझे पता है। पहले दिन से।
मैं ये सब इसलिए कर रहा हूँ क्योंकि मैं चाहता हूँ। कोई मुझे जबरदस्ती नहीं भेज रहा। सच्ची।
अगर कभी तुम्हें लगे कि तुमने मुझे धक्का दिया, तो ये याद रखना कि मैंने तुम्हें पहले धक्का दिया था।
और पी.एस. — मेरी नीली कमीज़ की जेब फट गई है। मम्मी को मत बताना। वो डाँटेंगी।
मैंने अपनी बाईं आँख से उसे देखा। जैसे बारहवें दिन देखा था। पंक्तियों के बीच।
और बारहवें दिन की वो हरी पंक्तियाँ — जो उसने लिखी थीं, जब घुँघरू बजा था — वो अब भी थीं। मैं उन्नीसवीं पर इंतज़ार कर रहा हूँ।
पर उनके नीचे, और भी हल्की, और भी धुँधली, एक और पंक्ति थी। जो पहले नहीं दिखी थी। पेंसिल की। छोटू की अपनी लिखावट में। जैसे उसने लिखकर मिटाई हो, बहुत ज़ोर से, और रबर ने उसे पूरा न मिटा पाया हो।
"दीदी ने कहा है कि अगर मैं नीचे आऊँ तो वो विक्की भैया को छोड़ देगी। मैंने हाँ कहा। पर मुझे उस पर भरोसा नहीं है। इसलिए मैं ख़ुद भैया को बचाऊँगा। ताकि उनका बचना उसकी मेहरबानी न हो। मेरी हो।"
मैं बहुत देर तक उस पंक्ति को देखता रहा।
मैंने हाँ कहा।
उसने भी सौदा किया था। सबकी तरह। बावड़ी वाली ने उससे भी कहा था — तू नीचे आ, और मैं विक्की को छोड़ दूँगी।
और उसने हाँ कहा था।
पर उसने उस पर भरोसा नहीं किया था।
इसलिए मैं ख़ुद भैया को बचाऊँगा।
और उन्नीसवीं सीढ़ी पर, जब मैं उसे ऊपर धकेल रहा था, और वो बालों में खिंच रहा था — उसने अपनी दोनों हथेलियाँ मेरी छाती पर रखी थीं। और मुझे ऊपर धकेला था। अपने हाथों से।
भूख के हाथों से नहीं। उसकी मेहरबानी से नहीं।
अपने हाथों से।
उसने सौदा किया था — और फिर उसे ख़ुद पूरा किया था। ताकि उसका फल भूख के हाथ में न रहे।
इसीलिए उसके पैरों में कोई धागा नहीं था। इसीलिए उसके बाल उसे नहीं पकड़ पाते थे। इसीलिए उसका हाथ गर्म था।
वो सौदा उसने भूख से किया था। पर भरोसा उसने सिर्फ़ मुझ पर किया था।
दो बजकर सैंतालीस।
मैं बावड़ी में उतरा। सूखी सीढ़ियाँ — अब सत्रहवीं तक सूखी। उनकी सफ़ेद, धूल भरी सतह पर हज़ारों खुरची हुई लकीरें।
दसवीं। कोई नहीं था वहाँ।
सत्रहवीं — वो दरार, जिससे माँ की पुकार आती थी। वो बालों से ठुँसी हुई थी। पूरी तरह। एक काली, गीली गाँठ।
अठारहवीं पर पानी शुरू हुआ। घुटनों तक। ठहरा हुआ।
इक्कीसवीं पर वो भँवर था — जो अब बहुत धीमा घूम रहा था, जैसे थक गया हो।
और उल्टा गाँव।
पानी की छत अब लगभग ज़मीन को छू रही थी। मुझे झुककर चलना पड़ रहा था। उल्टे घर — ज़्यादातर — उसमें समा चुके थे। बस कुछ बचे थे। पनघट। कुएँ का खंभा। और सीढ़ी का मुँह, जो अब एक सँकरी दरार जैसा था।
सरला पनघट पर बैठी थीं। गाते हुए। गंगाधर का पोता और भोला उनके बगल में। वो तीनों अब बहुत धुँधले थे। पारदर्शी। जैसे उनका पानी भी खिंच रहा हो।
पनघट पर पहुँचने से पहले, सीढ़ी के उस सँकरे मुँह के पास, कोई खड़ा था।
हाफ़ पैंट। नीली कमीज़। गीले बाल।
उसने मेरी तरफ़ अपना हाथ बढ़ाया।
"भैया," उसने कहा। "आ गए। चलो। मैं तुम्हें रास्ता दिखाता हूँ। नीचे। उसके पास।"
मेरी जेब में घुँघरू बजा। छन-छन-छन।
मैंने उसके हाथ को देखा। बाईं आँख से। उँगलियाँ बहुत लंबी थीं। पतली। जोड़ों पर मुड़ी हुई। बच्चे की चमड़ी का एक दस्ताना, जिसके अंदर से कुछ और झाँकता हुआ।
"तू वो नहीं है," मैंने कहा।
उस चेहरे की मुस्कान बनी रही। "कैसे पता?"
"क्योंकि छोटू अगर कोई ग़लती करता," मैंने कहा, "तो ख़ुद आकर बताता। और टुकड़े भी लाता।" मैंने उसके ठंडे हाथ की तरफ़ देखा। "तू टुकड़े छुपाती है। वो सब अपनी सुरंग के ताकों में रखती है।"
वो चेहरा पिघला। मोम की तरह। और बालों में घुलकर पानी की छत में खिंच गया।
"छोटू?" मैंने पनघट पहुँचकर पूछा।
सरला ने गाना नहीं रोका। बस अपनी आँखों से कुएँ के खंभे की तरफ़ इशारा किया।
मैं खंभे के पास गया।
उसका पानी — जो पहले ऊपर बहता था, फिर नीचे, फिर ठहर गया था — अब फिर से हिल रहा था। बहुत हल्के से। नीचे की तरफ़ नहीं। ऊपर की तरफ़ नहीं।
किनारों की तरफ़। जैसे कोई अंदर से उसे धकेल रहा हो। चौड़ा कर रहा हो।
और उसकी जड़ में वो गोल पत्थर — घड़े और लहरों वाला — खिसका हुआ था। थोड़ा-सा। एक दरार भर। और उस दरार से, नीचे से, एक आवाज़ आ रही थी।
गाने की।
"...माँ खड़ी है दरवाज़े पे..."
एक बच्चे की आवाज़। थकी हुई। पर गर्म।
मैंने अपनी बाईं आँख से उस दरार में देखा।
और मैंने उसे देखा।
वो सुरंग में था।
उस सुरंग में, जो माँ की पुकार का रास्ता थी। जिससे हम अट्ठाईसवीं रात उतरे थे। जिसकी दीवारें साँस लेती थीं।
वो अब साँस नहीं ले रही थीं। वो बंद हो रही थीं। धीरे-धीरे। एक मुट्ठी की तरह। उनके बाल आपस में गुँथते हुए, सुरंग को भरते हुए।
पर एक जगह, खंभे के ठीक नीचे, वो बंद नहीं हो पा रही थीं।
क्योंकि वहाँ कोई खड़ा था।
हाफ़ पैंट। नीली कमीज़। उसकी पीठ एक दीवार से सटी हुई, उसके दोनों हाथ दूसरी दीवार पर फैले हुए। जैसे कोई दो बंद होते दरवाज़ों के बीच खड़ा होकर उन्हें रोक रहा हो। उसके पैर ज़मीन में गड़े हुए।
और दीवारें — बाल और चूने और पत्थर की वो साँस लेती दीवारें — उसे दबा रही थीं। दोनों तरफ़ से। पर वो उसे पकड़ नहीं पा रही थीं। उसके कंधों पर, उसकी बाँहों पर, बाल आते, और फिसल जाते। जैसे तेल पर पानी।
और वो गा रहा था।
"...कहती है — आ जा, मेरी लली..."
"छोटू!"
उसने अपना सिर उठाया। ऊपर। दरार की तरफ़। मेरी तरफ़।
उसकी आँखें भूरी थीं। शरारती। थकी हुई।
उसकी अपनी।
"भैया," उसने कहा। और मुस्कुराया। वो मुस्कान। होंठ का एक कोना ऊपर, एक नीचे। जो उसकी थी। हमेशा से। जो भूख ने सत्रह बरस चुराकर पहनी थी।
"तू यहाँ क्या कर रहा है?"
"रास्ता पकड़े हूँ।" उसने दीवारों की तरफ़ देखा। जो उसे दबा रही थीं। "वो इसे बंद कर रही थी, भैया। माँ वाली सुरंग। ताकि चालीसवीं रात तुम नीचे न आ सको। उस लड़की तक न पहुँच सको।" उसने अपनी फैली हुई बाँहों को थोड़ा और कसा। "तो मैं यहाँ खड़ा हो गया। वो मुझे पकड़ नहीं सकती। तो वो मुझे कुचल भी नहीं सकती। बस दबा सकती है।"
"कब से?"
"कल रात से। जब गाँव गा रहा था। मैं लड़की के पास गया था पहले — उसका हाथ पकड़ा, उसके साथ गाया। वो बहुत डरी हुई थी। बाबा उसका एक हाथ पकड़े थे, और दूसरा ख़ाली था।" उसकी आवाज़ नरम हुई। "किसी का एक हाथ ख़ाली नहीं रहना चाहिए, भैया। जब वो डरा हो।"
"और फिर?"
"फिर मैंने देखा कि सुरंग बंद हो रही है। तो मैं यहाँ आ गया।" उसने कंधे उचकाए। दबी हुई दीवारों के बीच। "लड़की से कहा — मैं वापस आऊँगा। चालीसवीं रात। भैया के साथ।"
"तुझे दर्द हो रहा है।"
"थोड़ा।" छोटू ने अपने होंठ काटे। "बहुत भारी है, भैया। पूरी बावड़ी का वज़न। पर ठीक है।"
मैंने अपनी बाईं आँख से उसे ध्यान से देखा।
और मैंने ग़ौर किया — उसके किनारे धुँधले थे। उसकी कमीज़ का रंग, उसके बालों की लकीरें, उसकी उँगलियों के सिरे। जैसे कोई पानी में घुली स्याही, जो धीरे-धीरे फैल रही हो।
वो घुल रहा था।
"छोटू, तू ऐसे कितनी देर टिक पाएगा?"
छोटू ने जवाब नहीं दिया। बस गाना फिर शुरू किया। सीढ़ी-सीढ़ी उतरी पनिहारिन...
"छोटू!"
"सात रातें," उसने कहा। गाने के बीच में। "चालीसवीं तक।" वो मुस्कुराया। "उतनी देर टिकूँगा। वादा।"
"और उसके बाद?"
उसने मेरी तरफ़ देखा। बहुत देर तक।
"उसके बाद देखेंगे, भैया।"
"कुएँ में तेरा चेहरा था," मैंने कहा। "आज सुबह। भूखी आँखों से।"
छोटू की मुस्कान ग़ायब हो गई।
"मुझे पता है," उसने फुसफुसाया। "मैंने महसूस किया। जब वो मेरा चेहरा पहनती है, तो मुझे ठंड लगती है। यहाँ।" उसने अपनी छाती की तरफ़ सिर झुकाया। "वो चाहती है कि तुम मुझ पर शक करो, भैया। कि तुम मेरा हाथ छोड़ दो। क्योंकि अगर तुमने छोड़ा, तो..."
"तो तेरा हाथ ठंडा हो जाएगा।"
छोटू ने सिर हिलाया। "और उसके बाल मुझे पकड़ लेंगे। और ये सुरंग बंद हो जाएगी।"
मैंने अपना बायाँ हाथ उस दरार में डाला। पत्थर की दरार में। नीचे की तरफ़। जितना जा सकता था।
और छोटू ने अपना एक हाथ दीवार से हटाया — दीवार एक पल के लिए सिकुड़ी, उसकी तरफ़ झपटी — और ऊपर उठाया। मेरी तरफ़।
हमारी उँगलियाँ मिलीं।
गर्म।
"तूने भी सौदा किया था," मैंने कहा। "उस दिन। तेरी चिट्ठी में लिखा है। मिटाया हुआ। मैंने आज पढ़ा।"
छोटू की आँखें भर आईं।
"हाँ," उसने फुसफुसाया। "उसने कहा था — तू नीचे आ, और मैं विक्की को छोड़ दूँगी। मैंने हाँ कहा।" उसकी उँगलियाँ मेरी उँगलियों में कसीं। "पर मुझे उस पर भरोसा नहीं था, भैया। तो मैंने तुम्हें ख़ुद धकेला। अपने हाथों से। ताकि तुम उसके वादे से नहीं, मेरे धक्के से बचो।"
"और सत्रह साल तू नीचे रहा। उसके पास।"
"अपनी मर्ज़ी से।" छोटू मुस्कुराया। आँसुओं के बीच। "सौदा उसका था। मर्ज़ी मेरी थी। दोनों अलग चीज़ें हैं, भैया।"
"मामी ने बताया," मैंने कहा, "कि बचपन में तूने एक घड़ा तोड़ा था। और सारे टुकड़े ढूँढकर दरवाज़े पर बैठ गया था।"
छोटू हँसा। दबी हुई दीवारों के बीच। एक छोटी, टूटी हुई हँसी।
"मम्मी को याद है?"
"सब याद है। उन्होंने कहा — अगर तुझ पर शक हो, तो तुझसे पूछ लूँ। तू बता देगा।"
छोटू की आँखें और भर आईं।
"सत्रह बरस मैंने मम्मी को कुछ नहीं बताया, भैया," उसने फुसफुसाया। "कि मैंने सौदा किया था। कि मैंने तुम्हें धक्का दिया था। कि मैं ख़ुद गया था। वो पहली बात थी, जो मैंने उनसे छुपाई।" उसने अपनी फटी जेब की तरफ़ देखा। "इसीलिए मैं उनके दरवाज़े पर कभी नहीं गया। मुझे डर था कि वो मेरी आँखों में देख लेंगी कि मैंने कुछ छुपाया है।"
"वो अब जानती हैं। तेरी चिट्ठी से।"
"और?"
"और उन्होंने तेरी कमीज़ पर बटन टाँक दिया है। और रोज़ उसे अपनी गोद में रखकर सहलाती हैं।"
छोटू ने अपनी आँखें बंद कर लीं। और बहुत देर तक कुछ नहीं कहा। पर सुरंग की दीवारें — जो उसे दबा रही थीं — एक इंच और पीछे हटीं।
पूरी बावड़ी काँपी।
वही काँपना, जो बीसवीं रात हुआ था। जब मैंने उसके दोनों हाथ पकड़े थे।
सुरंग की दीवारें — जो छोटू को दबा रही थीं — पीछे हटीं। एक इंच। दो इंच। जैसे किसी ने उन्हें जला दिया हो। उनके बाल सिकुड़े। और छोटू ने एक गहरी साँस ली। पानी की। राहत की।
"देखा?" उसने कहा। "जब तुम पकड़ते हो, तो वो डरती है।"
पानी की छत से — उल्टे गाँव के ऊपर से — एक चीख़ आई। भूख की। धरती के फटने जैसी।
और उसके नीचे, बहुत दूर से, एक और आवाज़।
पतली। एक लड़की की।
वो हँस रही थी।
दो सौ अस्सी बरस में शायद पहली बार।
सुबह से ठीक पहले मुझे अपनी सीढ़ी पर जाना पड़ा। तैंतीसवीं।
छोटू ने मेरी उँगलियाँ छोड़ीं। धीरे-धीरे। एक-एक करके।
"कल आना, भैया," उसने कहा। "और परसों। हर रात। बस एक बार हाथ पकड़ जाना। उससे वो डरती है। उससे दीवारें पीछे हटती हैं।"
"आऊँगा।"
"और भैया..." उसने दीवार पर अपना हाथ वापस रखा। दीवार फिर से उसकी तरफ़ सिकुड़ी। "किसी पर शक मत करना। ख़ुद पर भी नहीं। वो यही चाहती है।"
"और तू?" मैंने पूछा। "तुझे कभी मुझ पर शक हुआ? सत्रह बरस में?"
छोटू ने बहुत देर तक सोचा। बच्चों की तरह। अपनी भौंहें सिकोड़कर।
"एक बार," उसने ईमानदारी से कहा। "जब तुम दिल्ली भागे थे। मुझे लगा तुम हमेशा के लिए चले गए।" फिर वो मुस्कुराया। "पर फिर तुम लौट आए। तुम हमेशा लौट आते हो, भैया। अच्छे वाले डरपोक।"
मैं तैंतीसवीं पर गया। मेरे पैर जमे। भारी। अब घुटनों तक पत्थर।
और खड़े-खड़े मैंने सोचा — उस बच्चे के बारे में, जो सत्रह बरस पहले एक सौदा करके नीचे आया था, और फिर उसे अपने हाथों से पूरा किया था, ताकि उसका फल किसी और की मेहरबानी न रहे।
और मुझे समझ आया कि पूरी बावड़ी में — गंगाधर से लेकर दादाजी तक, सूरज से लेकर अम्मा तक — सिर्फ़ एक इंसान था, जिसने सौदा करके भी भरोसा नहीं बेचा था।
एक बारह बरस का बच्चा। फटी जेब वाला।
और मैंने, आज सुबह, एक पल के लिए, उस पर शक किया था।
और सारी रात, पनघट के खंभे से, एक बच्चे की आवाज़ आती रही। थकी हुई। गर्म। गाती हुई।
और उसके साथ, बहुत नीचे से, एक लड़की की।
सुबह मास्टर जी मुंडेर पर थे।
वो हमेशा बाद में आते थे। पर आज वो सबसे पहले थे। अम्मा से भी पहले। उनके हाथ में पोथी थी। और एक और चीज़ — एक पुराना, मुड़ा हुआ, पीला पड़ चुका काग़ज़।
"विक्रम," उन्होंने कहा। मेरे ऊपर आते ही। मुझे खींचने में मदद करते हुए। मेरे पत्थर वाले घुटनों को देखते हुए, और फिर नज़रें हटाते हुए। "मुझे कुछ मिला है।"
"क्या?"
"गंगाधर की चिट्ठी में दूसरा रास्ता लिखा था न? उसकी शिला हटाकर। उसे सीधा करके। उसकी जगह लेकर।"
"हाँ।"
"मैं रात भर सोचता रहा," मास्टर जी ने कहा। उनकी आवाज़ काँप रही थी। "वो शिला। काले पत्थर की। उसे गंगाधर ने खुदवाया था — पर उसे वहाँ रखवाया किसने? किसकी आज्ञा से?"
"राव भानुप्रताप की।"
"और जो पत्थर राजाज्ञा से रखा गया हो," मास्टर जी ने कहा, "उसे कौन हटा सकता है?"
मैं चुप रहा।
मास्टर जी ने वो पीला काग़ज़ खोला। उस पर एक वंशवृक्ष था। हाथ से बनाया हुआ। पुरानी स्याही में। राव भानुप्रताप सिंह बुंदेला, सबसे ऊपर। और उनके नीचे, शाखाएँ। पीढ़ी दर पीढ़ी।
"मेरे दादा के दादा ने बनाया था," उन्होंने कहा। "पटवारी थे। ज़मीन के रिकॉर्ड के लिए। मैंने इसे बचपन में देखा था, और कभी ध्यान नहीं दिया।"
उन्होंने अपनी उँगली एक शाखा पर रखी। ठाकुर गजराज सिंह। देवदत्त के पिता। और उसके बगल में एक और नाम। एक बेटी का। जिसकी शादी कहीं और हुई थी।
और उस बेटी के नीचे, एक और शाखा। नीचे। और नीचे।
और सबसे नीचे, पिछली पीढ़ी में, एक नाम।
ओमप्रकाश।
मास्टर जी ने अपना चश्मा उतारा। उनकी आँखें भरी हुई थीं।
"देवदत्त मेरी परनानी का भाई था," उन्होंने फुसफुसाया। "मुझे कभी किसी ने नहीं बताया। शायद किसी को याद भी नहीं था।"
उन्होंने बावड़ी की तरफ़ देखा।
"राजा का आख़िरी रक्त, विक्रम। मैं हूँ।"
अम्मा आईं। सूरज के सहारे। उन्होंने मास्टर जी की आवाज़ सुनी थी, गली से ही।
"ओमप्रकाश," उन्होंने कहा। "गजराज की बेटी का वंश?"
"हाँ, अम्मा।"
अम्मा बहुत देर तक चुप रहीं। फिर उन्होंने अपना हाथ बढ़ाया। मास्टर जी के चेहरे की तरफ़। और उसे टटोला। उनकी नाक। उनकी ठोड़ी। उनका माथा।
"उसकी ठोड़ी है," उन्होंने फुसफुसाया। "देवदत्त की। मैंने चालीस बरस तुझे गली में देखा, और कभी नहीं पहचाना।"
मास्टर जी की आँखों से आँसू बहने लगे।
"मैं शिक्षक हूँ, अम्मा," उन्होंने कहा। उनकी आवाज़ काँप रही थी। "बहादुर नहीं। मैंने ज़िंदगी भर किताबें पढ़ी हैं। बच्चों को पहाड़े रटवाए हैं। मैंने कभी... मैं कभी किसी बावड़ी में नहीं उतरा।"
"देवदत्त भी शिक्षक बनना चाहता था," अम्मा ने धीरे से कहा। "बचपन में। वो कहता था, बड़ा होकर पाठशाला खोलूँगा।" उन्होंने मास्टर जी का हाथ पकड़ा। "तूने वो कर दिखाया, ओमप्रकाश। उसकी जगह।"
मास्टर जी ने अपना सिर झुका लिया।
और मैंने अपने पत्थर वाले घुटनों को देखा। सुबह की धूप में। भूरे-हरे। खुरदुरे।
सात रातें।
और अब, पहली बार, उन सात रातों के आख़िर में, एक रास्ता था। सुरंग, जिसे छोटू थामे था। घुँघरू, जिसे गुड्डी थामे थी। और एक शिला, जिसे सिर्फ़ एक डरा हुआ स्कूल मास्टर हटा सकता था।
भाग 33 समाप्त।
अगले भाग में — "चौंतीसवीं सीढ़ी": बावड़ी बनवाने वाले का वंशज। मास्टर ओमप्रकाश — जिन्होंने चालीस बरस गाँव के बच्चों को गिनती पढ़ाई — राव भानुप्रताप के आख़िरी रक्त हैं। और वो शिला, जिसे राजाज्ञा से रखा गया था, सिर्फ़ राजा का रक्त हटा सकता है। पर उस शिला तक पहुँचने के लिए, मास्टर जी को उस सुरंग से होकर जाना होगा — जिसे छोटू अपनी पीठ पर थामे खड़ा है...

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