Pretika › Jinn & Spirits › जिन्न का इश्क़
भाग 2 — आशिक़ जिन्न
Pretika · Jinn & Spirits · 13 मिनट
- Writer
- Pretika
- Story
- जिन्न का इश्क़
- Chapter
- 3 of 3
- Category
- Jinn & Spirits
- Reading time
- 13 min
- Words
- 2586
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
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शमीम आपा
शमीम आपा उसी कोठी के ग्राउंड फ़्लोर के एक हिस्से में रहती थीं। उम्र साठ के क़रीब। शौहर गुज़र चुके थे, बेटा दुबई में था, और वो अकेली रहती थीं — सिलाई का काम करती थीं, और पूरे मोहल्ले की ख़बर रखती थीं।
दिसंबर की एक सुबह समीर सीढ़ियों से उतर रहा था। शमीम आपा नीचे खड़ी थीं। उन्होंने उसे देखा — और देखती रह गईं।
फिर उन्होंने आगे बढ़कर उसकी कलाई पकड़ ली।
समीर चौंक गया। शमीम आपा ने उसकी कलाई को दो-तीन सेकंड तक पकड़े रखा, और फिर छोड़ दिया — इतनी तेज़ी से, जैसे कुछ गरम छू लिया हो।
उन्होंने कहा — "बेटा, तुम्हारा हाथ इतना ठंडा क्यों है?"
समीर ने हँसकर कहा, "आपा, सर्दी है।"
शमीम आपा ने कहा — "सर्दी में हाथ ठंडे होते हैं। मुर्दे जैसे नहीं होते।"
वो उसे अपने कमरे में ले गईं। चाय बनाई। और फिर उन्होंने वो सवाल पूछा जिसका जवाब समीर किसी को नहीं देना चाहता था।
"रात को कोई आता है?"
समीर चुप रहा।
"बेटा, मैं इस कोठी में अड़तीस साल से हूँ। मेरे सामने यहाँ चार किराएदार आए और चारों चले गए। मुझसे झूठ मत बोलो।"
और तब समीर टूटा। उसने सब बता दिया। सब कुछ।
शमीम आपा ने सुनते-सुनते अपनी चाय नीचे रख दी। उन्होंने कोई सवाल नहीं किया, कोई हैरानी नहीं दिखाई। और जब समीर चुप हुआ, तो उन्होंने कहा —
"बेटा, ये ज़मीन कोठी से पुरानी है।
जब नफ़ीस मियाँ के दादा ने ये कोठी बनवाई थी, तब यहाँ एक कुआँ था और आसपास बबूल के पेड़ थे। मेरी सास कहती थीं कि उस वक़्त भी लोग यहाँ शाम के बाद नहीं आते थे। कोठी बाद में बनी। वो पहले से यहाँ है।
और जो तुम्हारे साथ हो रहा है ना, उसका नाम है — आशिक़ जिन्न।"
दोस्तों, अगर आपने अपने घर के बुज़ुर्गों से ये बातें नहीं सुनी हैं, तो मैं आपको बता दूँ। हमारे मुल्क में — चाहे भोपाल हो, लखनऊ हो, मालेरकोटला हो, या केरल का मलाबार — एक बात हर जगह एक जैसी कही जाती है। कि जिन्नात भी इंसानों की तरह होते हैं। कुछ अच्छे, कुछ बुरे, कुछ को हमसे कोई मतलब नहीं। लेकिन उनमें से कुछ… कुछ किसी इंसान से मोहब्बत कर बैठते हैं।
और शमीम आपा ने उस दिन जो लाइन कही, वो मैंने अपनी डायरी में लिख ली थी।
"इंसान की मोहब्बत में जगह होती है बेटा। इंसान बाँटना जानता है — बीवी को थोड़ा, माँ को थोड़ा, दोस्तों को थोड़ा। जिन्न की मोहब्बत में जगह नहीं होती। वो पूरा लेता है। और जो पूरा लेता है ना, वो कुछ छोड़ता नहीं।"
फिर उन्होंने उसे फ़ैसल के बारे में बताया।
फ़ैसल — दो हज़ार चौदह में उसी हिस्से में रहता था। एम॰बी॰ए॰ का स्टूडेंट, इंदौर से आया था, हँसमुख लड़का, नीचे आकर शमीम आपा से खाना माँगकर खाता था।
चार महीने में वो बदल गया। बात करना बंद, नीचे आना बंद, क्लास जाना बंद।
और फिर एक रात — फ़रवरी की रात, तीन-चार बजे — पूरे मोहल्ले ने चीख़ सुनी।
फ़ैसल छत पर मिला था। मुंडेर पर बैठा हुआ, पैर बाहर की तरफ़ लटकाए हुए, पूरी तरह नंगा, फ़रवरी की उस ठंड में — और वो हँस रहा था। ज़िंदा था। साँस ले रहा था। लेकिन जब उसके घरवाले इंदौर से आए और उसे ले गए, तो वो आठ महीने तक एक लफ़्ज़ नहीं बोला।
शमीम आपा ने कहा, "आज भी वो अकेले नहीं सोता। उसकी माँ उसके कमरे में ज़मीन पर सोती है। मैंने उसकी माँ से पिछले साल बात की थी।"
उन्होंने अपनी अलमारी से एक छोटा काला ताबीज़ निकाला और समीर के हाथ में रख दिया।
"ये आज रात पहन लो। और कल सुबह पीर गेट के पास मौलाना इरफ़ान साहब के पास चले जाना। वो पैसे नहीं लेते। और बेटा… कल ही जाना। परसों मत करना।"
समीर ने वो ताबीज़ लिया। ऊपर गया। अपने कमरे में खड़ा होकर उसने उसे देखा।
और दोस्तों, अब मैं आपसे एक सवाल पूछता हूँ। आप ख़ुद से पूछिएगा, ईमानदारी से।
अगर आपको ऐसी चीज़ मिल जाए जो आपको हर रात इतनी बुरी तरह चाहती हो — जितना आपको आपकी ज़िंदगी में कभी किसी ने नहीं चाहा। जो आपसे कोई सवाल ना करे, कोई शिकायत ना करे, आपसे कुछ माँगे नहीं। तो क्या आप उससे छूटना चाहेंगे?
समीर ने वो ताबीज़ अपनी अलमारी की दराज़ में रख दिया।
और उस रात वो जल्दी सो गया।
•••
मेघा
बाईस दिसंबर। मेघा भोपाल आई।
उसे आना ही था — अप्रैल में शादी थी, कार्ड छपवाने की बात करनी थी, और समीर पिछले डेढ़ महीने से इस तरह बात कर रहा था जैसे किसी अजनबी से बात कर रहा हो। वो अपनी कज़िन के साथ आई और कोलार में रुकी।
शाम पाँच बजे वो कोठी देखने आई। समीर ने बहुत टालने की कोशिश की — "यार गंदा है, कुछ नहीं है वहाँ, बाहर मिलते हैं" — लेकिन मेघा ज़िद पर अड़ गई।
वो गली से अंदर आई। आँगन पार किया। सीढ़ियाँ चढ़ीं।
और जैसे ही उसका पैर पहली मंज़िल के बरामदे में पड़ा — पूरी कोठी की बत्तियाँ एक साथ मद्धम हो गईं।
एक सेकंड के लिए। फिर वापस आ गईं।
मेघा ने हँसकर कहा, "वोल्टेज की प्रॉब्लम है क्या?"
समीर ने कुछ नहीं कहा। क्योंकि पिछले दो महीने में कभी, एक बार भी, वहाँ बिजली की कोई दिक़्क़त नहीं हुई थी।
वो कमरे में आई। इधर-उधर देखा। और फिर उसने नाक सिकोड़कर, मुस्कुराते हुए कहा —
"अच्छा! तो किसी ने बड़ा अच्छा परफ़्यूम लगा रखा है यहाँ। ये क्या है? इत्र जैसा।"
समीर के हाथ-पैर ठंडे पड़ गए।
क्योंकि शाम के पाँच बजे थे। और आज तक वो ख़ुशबू सिर्फ़ रात में आई थी।
उसने मेघा का हाथ पकड़ा और लगभग खींचते हुए उसे नीचे ले गया। मेघा नाराज़ हो गई, रास्ते भर लड़ती रही, और आख़िर में उसने वो कहा जो लड़कियाँ ऐसे वक़्त में कहती हैं — "तुम्हें मुझसे कुछ छुपाना है तो बता दो, मैं चली जाती हूँ।"
समीर उसे कैसे बताता? क्या बताता?
उस रात एक बजकर दस मिनट पर समीर की नींद खुली।
लेकिन इस बार कुछ अलग था। इस बार उसका शरीर जकड़ा हुआ नहीं था। वो हिल सकता था। वो उठकर बैठ भी गया।
और वो कमरे में खड़ी थी।
पहली बार — खड़ी हुई, सामने, पूरी तरह दिखती हुई।
दोस्तों, अब मैं जो बताने जा रहा हूँ, वो सबसे मुश्किल हिस्सा है, क्योंकि समीर ने ख़ुद लिखा है कि उसे शब्द नहीं मिल रहे।
वो ख़ूबसूरत नहीं थी।
दो महीने से जो चीज़ हर रात उसके पास आ रही थी, वो ख़ूबसूरत नहीं थी। उसकी गर्दन बहुत लंबी थी — इंसानी गर्दन से कम से कम चार उँगली ज़्यादा लंबी। उसके कंधे इस तरह झुके हुए थे जैसे किसी ने उन्हें ग़लत जगह से जोड़ दिया हो। उसकी बाँहें उसके घुटनों से नीचे तक जा रही थीं। और उसकी आँखों में सफ़ेदी नहीं थी — बस काला, पूरा काला, कोने से कोने तक।
और वो मुस्कुरा रही थी। ऐसी मुस्कुराहट जो इंसानी चेहरे पर आ ही नहीं सकती, क्योंकि उसके लिए मुँह इतना चौड़ा नहीं होता।
समीर के हलक़ से आवाज़ नहीं निकली।
उसने सिर्फ़ एक जुमला कहा। साफ़ हिंदुस्तानी में, एक औरत की आवाज़ में, बिल्कुल नॉर्मल लहज़े में — जैसे कोई बीवी अपने शौहर से कह रही हो कि दूध ले आना।
"वो दोबारा इस घर में नहीं आएगी।"
और फिर कमरे की लाइट अपने आप जल गई। कमरा ख़ाली था।
सुबह छह बजे समीर का फ़ोन बजा। मेघा की कज़िन थी।
रात एक बजकर दस मिनट पर, कोलार वाले घर में, मेघा पानी पीने के लिए उठी थी। सीढ़ियों से नीचे उतरते वक़्त वो गिर गई। कलाई में फ़्रैक्चर, माथे पर पाँच टाँके।
समीर हॉस्पिटल पहुँचा। मेघा दर्द में थी, दवाइयों के असर में थी, और उसने समीर का हाथ पकड़कर जो कहा, वो उसने तीन बार दोहराया।
उसने कहा — "मैं गिरी नहीं थी। किसी ने मुझे धक्का दिया था। और समीर… सीढ़ियों पर वही ख़ुशबू थी जो तुम्हारे कमरे में थी।"
समीर उसी दिन, दोपहर दो बजे, पीर गेट पहुँच गया।
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हाज़िरी
मौलाना इरफ़ान की उम्र कितनी थी, ये कोई नहीं जानता था। एक आँख से उन्हें दिखता नहीं था — वो आँख दूधिया सफ़ेद थी। दूसरी आँख से वो इतना देखते थे कि लोग घबरा जाते थे।
वो एक छोटे से कमरे में बैठते थे, जहाँ ज़मीन पर चटाई थी और दीवार पर एक अलमारी, बस। पैसे नहीं लेते थे। लोग कहते थे कि वो पैसे लेना शुरू करेंगे तो उनका अमल चला जाएगा।
समीर उनके सामने बैठा। उसने बोलना शुरू ही किया था — "मौलाना साहब, मैं एक कोठी में रहता हूँ…" — कि मौलाना ने हाथ उठाकर उसे रोक दिया।
उन्होंने कहा — "तुम देर से आए हो।"
फिर उन्होंने आँखें बंद कीं और तीन-चार मिनट तक कुछ पढ़ते रहे। और उसके बाद उन्होंने जो पहला सवाल पूछा, उसने समीर को हिला दिया।
उन्होंने पूछा — "बचपन में कभी खो गए थे?"
समीर ने कहा, "नहीं।"
मौलाना ने कहा, "सोचो।"
और दोस्तों, कभी-कभी हमारे दिमाग़ में कुछ ऐसा दबा होता है जिसे हमने ख़ुद नीचे धकेल दिया होता है। और जब कोई उसे ऊपर खींचता है ना, तो वो एक झटके में आता है।
समीर को याद आया।
वो सात साल का था। जबलपुर, नानी का घर, गर्मियों की छुट्टियाँ। घर के पीछे एक इमली का बहुत बड़ा पेड़ था और उसके आगे एक पुराना कुआँ जिस पर लकड़ी के पट्टे रखे रहते थे।
एक दोपहर वो खेलते-खेलते ग़ायब हो गया।
पूरा मोहल्ला ढूँढता रहा। पाँच-छह घंटे। शाम को नानी के पड़ोसी ने उसे कुएँ के पास बैठा हुआ पाया — बिल्कुल शांत, बिल्कुल ख़ुश, बिना रोए हुए।
और जब उसकी माँ ने उसे पकड़कर पूछा कि "कहाँ था तू इतनी देर?" — तो सात साल के समीर ने कहा था:
"वो आंटी मुझे कहानियाँ सुना रही थीं। बहुत अच्छी कहानियाँ।"
उसकी माँ ने उसे दो थप्पड़ मारे थे। और उस दिन के बाद, उन्नीस साल तक, उस घर में इस बात का ज़िक्र कभी नहीं हुआ।
मौलाना इरफ़ान ने बहुत धीरे से कहा — "बेटा, वो कोठी तुम्हारे पास उसे नहीं लाई। वो उन्नीस साल से तुम्हारे साथ है। उस कोठी में सिर्फ़ इतना हुआ कि वहाँ की दीवार पतली थी — इसलिए वो दिखने लगी।"
दोस्तों, ज़रा सोचिए।
उन्नीस साल। स्कूल की हर परीक्षा। कॉलेज की हर रात। हर जन्मदिन। हर वो लम्हा जब आपको लगा कि आप अकेले हैं।
समीर ने वहीं, उस चटाई पर बैठे-बैठे उल्टी कर दी।
हाज़िरी उसी शाम हुई।
मौलाना साहब ने अपने दो शागिर्दों को बुलाया। लोबान जलाया गया — इतना कि कमरे में धुआँ भर गया और दीवारें दिखनी बंद हो गईं। समीर को बीच में बिठाया गया। उसके चारों तरफ़ पानी की एक लकीर खींची गई।
और पढ़ना शुरू हुआ।
पहले दस मिनट कुछ नहीं हुआ। समीर को बस उबकाई आ रही थी।
फिर उसके हाथ काँपने लगे।
फिर उसकी गर्दन पीछे की तरफ़ मुड़ने लगी — इतनी पीछे कि उसके शागिर्दों ने उसे पकड़ लिया।
और फिर समीर का शरीर बिल्कुल ढीला पड़ गया, वो सीधा होकर बैठ गया, उसने आँखें खोलीं — और वो मुस्कुराया।
मौलाना इरफ़ान ने पूछा — "कौन हो तुम?"
और समीर के मुँह से जो आवाज़ निकली, वो समीर की नहीं थी। एक औरत की आवाज़ थी। थकी हुई, चिड़चिड़ी, जैसे किसी ने उसे नींद से जगा दिया हो।
"तुम कौन होते हो पूछने वाले?"
मौलाना ने फिर पूछा — "तुम्हारा नाम?"
और उस आवाज़ ने कहा —
"जो नाम इंसान रखते हैं, वो मत पूछो। मेरा नाम वो है जो इसने मुझे दिया था। जब ये सात साल का था। इसने मुझे बुलाया था —
गुड़िया आंटी।"
कमरे में मौजूद एक शागिर्द उठकर बाहर चला गया।
मौलाना ने कहा — "तुम्हें इसे छोड़ना होगा।"
और उस आवाज़ ने बहुत सादगी से, बिना ग़ुस्से के जवाब दिया —
"क्यों छोड़ूँ?
मैंने इसके सारे जन्मदिन देखे हैं। मैंने इसे रोते हुए देखा है जब इसके बाप ने दुकान बेची थी। मैंने इसे उस रात देखा है जब ये छत पर बैठकर सोच रहा था कि मर जाए। तुम कहाँ थे उस रात?
मैंने उन्नीस साल इंतज़ार किया है सिर्फ़ इसलिए कि ये बड़ा हो जाए।
और अब तुम कह रहे हो छोड़ दो?"
दोस्तों, मैं जब ये लाइनें पहली बार पढ़ रहा था ना, तो मुझे डर से ज़्यादा कुछ और महसूस हुआ। मुझे नहीं पता उसे क्या कहते हैं।
वो हाज़िरी दो घंटे चली। मौलाना इरफ़ान ने बहुत कोशिश की।
और आख़िर में उन्होंने समीर से जो कहा, वो ईमानदार आदमी की बात थी — और इसीलिए सबसे डरावनी।
उन्होंने कहा:
"बेटा, मैं इसे निकाल नहीं सकता। जो चीज़ उन्नीस साल से किसी के साथ हो, वो निकलती नहीं। मैं सिर्फ़ बंद लगा सकता हूँ।
और बंद का मतलब होता है — दीवार। दीवार निकालना नहीं होता, दीवार सिर्फ़ रोकना होता है।
चार शर्तें हैं। आज रात ही वो कोठी छोड़ दो — सामान मत लेने जाना। ये ताबीज़ कभी मत उतारना, नहाते वक़्त भी नहीं। उस शहर में दोबारा मत आना। और सबसे ज़रूरी — उसका नाम कभी ज़बान पर मत लाना। किसी के सामने नहीं। अपनी बीवी के सामने भी नहीं।
और एक बात याद रखना बेटा। ये बंद हमेशा के लिए नहीं है। ये सिर्फ़ वक़्त है। और वक़्त ख़त्म होता है।"
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और फिर, छह साल बाद
समीर उस रात कोठी नहीं गया। उसने अपना सूटकेस, अपने कपड़े, अपना लैपटॉप — सब वहीं छोड़ दिया। उसने अपने दोस्त के घर से जबलपुर की रात वाली बस पकड़ी।
अप्रैल दो हज़ार अठारह में उसकी शादी हो गई। मेघा की कलाई तब तक ठीक हो चुकी थी, माथे पर सिर्फ़ एक पतली सी लकीर बची थी।
वो इंदौर गया, फिर दो साल बाद पुणे। कंपनी बदली, तनख़्वाह बढ़ी, एक छोटी सी गाड़ी आ गई।
दो हज़ार इक्कीस में उनकी बेटी हुई। नाम रखा — आरवी।
और दोस्तों, अगले पाँच साल… बिल्कुल नॉर्मल थे। कुछ नहीं हुआ। कोई ख़ुशबू नहीं, कोई आवाज़ नहीं, कोई सपना नहीं। वो ताबीज़ उसके गले में रहा — काला, घिसा हुआ, और मेघा ने कई बार पूछा कि ये क्या है, और वो हर बार हँसकर कह देता था, "नानी ने दिया था।"
समीर को लगने लगा था कि वो सब कुछ शायद एक बीमारी थी। डिप्रेशन, अकेलापन, नींद की कमी। लोग कहते हैं ना, दिमाग़ चीज़ें बना लेता है।
वो मुझे मेल के इस हिस्से में लिखता है: "भाई, मैंने ख़ुद को यक़ीन दिला लिया था। छह साल लगे, लेकिन दिला लिया था।"
अब मैं आपको उस मेल का आख़िरी हिस्सा पढ़कर सुनाता हूँ। जस का तस। मैंने इसमें एक लफ़्ज़ नहीं बदला।
"पिछले महीने से आरवी कमरे के कोने में बैठकर बातें करने लगी है।
हमने पहले ध्यान नहीं दिया। तीन-चार साल के बच्चे ऐसा करते ही हैं, ख़याली दोस्त बना लेते हैं। मेघा तो हँसती थी।
फिर उसने सोना बंद कर दिया। रात में उठकर बैठ जाती, दरवाज़े की तरफ़ देखती रहती।
दस दिन पहले उसने खाना खाते-खाते कहा कि 'पापा, आपकी दोस्त आई है।' मैंने पूछा कौन दोस्त? उसने कहा, 'वो जो बहुत सुंदर है, उसके बाल गीले हैं।'
मैंने उस रात पूरी रात लाइट जलाकर रखी।
और परसों रात, तीन बजे, आरवी मेरे कमरे में आई। उसने मुझे उठाया। वो रो नहीं रही थी, डर नहीं रही थी। वो बिल्कुल शांत थी।
उसने कहा —
'पापा, गुड़िया आंटी कह रही हैं कि आपने वादा तोड़ा।'
भाई, मैंने वो नाम आज तक किसी को नहीं बताया। मेघा को भी नहीं। किसी को भी नहीं।
और कल सुबह मुझे मेरा ताबीज़ आरवी के खिलौनों के डिब्बे में मिला। मैंने उसे कभी उतारा नहीं था। उसका धागा टूटा हुआ था।
मैं ये मेल आपको रात के तीन बजकर बीस मिनट पर लिख रहा हूँ।
मेरे कमरे में इत्र की ख़ुशबू है।
और बग़ल वाले कमरे में मेरी बेटी हँस रही है।"
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