Pretika › Jinn & Spirits › जिन्न का इश्क़
भाग 1 — ढाई हज़ार रुपए की कोठी
Pretika · Jinn & Spirits · 13 मिनट
- Writer
- Pretika
- Story
- जिन्न का इश्क़
- Chapter
- 2 of 3
- Category
- Jinn & Spirits
- Reading time
- 13 min
- Words
- 2413
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
अगर आप कभी भोपाल गए हों, तो आपको पता होगा कि ये शहर दो हिस्सों में बँटा हुआ है, और ये दोनों हिस्से आपस में बात नहीं करते।
एक तरफ़ है नया भोपाल — एम॰पी॰ नगर, अरेरा कॉलोनी, कोलार। काँच की बिल्डिंगें, कोचिंग सेंटर के होर्डिंग, कैफ़े, ट्रैफ़िक, और वो सारी चीज़ें जो आजकल हर शहर में एक जैसी मिलती हैं। और दूसरी तरफ़ है पुराना भोपाल — पीर गेट, जुमेराती, इब्राहिमपुरा, चौक बाज़ार। वहाँ गलियाँ इतनी सँकरी हैं कि दो लोग साथ में चलें तो कंधे टकराते हैं। वहाँ दोपहर में भी कुछ गलियों में धूप नहीं पहुँचती। और वहाँ की इमारतें… वो इमारतें सिर्फ़ पुरानी नहीं हैं दोस्तों, वो थकी हुई हैं। जैसे कोई बहुत बूढ़ा आदमी जो सौ साल से एक ही जगह बैठा है और अब किसी से कुछ नहीं कहना चाहता।
समीर वर्मा — उम्र छब्बीस साल, जबलपुर का रहने वाला — अक्टूबर की एक शाम इसी पुराने भोपाल की एक गली में खड़ा था, हाथ में एक सूटकेस, कंधे पर लैपटॉप का बैग, और दिमाग़ में एक ही हिसाब चल रहा था।
अठारह हज़ार की तनख़्वाह थी उसकी। मेडिकल इक्विपमेंट की एक कंपनी में सर्विस इंजीनियर लगा था, अस्पतालों में मशीनें ठीक करने का काम। घर पर हर महीने आठ हज़ार भेजने थे, क्योंकि पिताजी की दुकान दो साल पहले बंद हो गई थी। बचे दस हज़ार। और भोपाल के नए इलाक़े में एक कमरे का किराया ही छह हज़ार से शुरू होता था।
इसीलिए वो अशफ़ाक़ भाई के साथ यहाँ आया था — दलाल अशफ़ाक़, जो चलते-चलते बात करता था और जिसकी चप्पल एक तरफ़ से घिसी हुई थी।
गली के आख़िर में वो कोठी थी।
तीन मंज़िल। सामने की दीवार पर चूना इतना पुराना कि कहीं-कहीं से नीचे की लाल ईंट झाँक रही थी। लकड़ी का बड़ा दरवाज़ा, जिस पर फूल-पत्तियों की नक़्क़ाशी थी और जिसके कब्ज़ों पर जंग की परत जमी थी। अंदर एक खुला आँगन, बीच में एक सूखा हुआ फ़व्वारा जिसमें अब मिट्टी और सूखे पत्ते भरे थे, और एक तरफ़ जामुन का इतना बड़ा पेड़ कि उसकी शाख़ें दूसरी मंज़िल की खिड़कियों को छू रही थीं।
समीर ने ऊपर देखा। और उसे एक अजीब बात महसूस हुई — जो उसने बाद में मुझे लिखी। उसने लिखा: "भाई, बाहर गली में शोर था। सब्ज़ी वाला चिल्ला रहा था, कहीं कोई गाना बज रहा था, बच्चे खेल रहे थे। लेकिन जैसे ही मैंने उस कोठी के दरवाज़े के अंदर क़दम रखा, वो सारी आवाज़ें ऐसे बंद हो गईं जैसे किसी ने टीवी का म्यूट दबा दिया हो। मुझे लगा मेरे कान बंद हो गए। मैंने उँगली से कान खोलने की कोशिश भी की।"
पहली मंज़िल का हिस्सा दिखाया गया। दो कमरे। और दोस्तों, वो कमरे इतने बड़े थे कि आज के फ़्लैट्स में वो पूरा घर बन जाए। छत चौदह फुट ऊँची। दीवारों में ताक़ बने हुए थे — वो पुराने ज़माने के आले, जिनमें लोग लालटेन रखते थे। फ़र्श पर काले और सफ़ेद पत्थर की चौकोर टाइलें, जो कहीं-कहीं से उखड़ गई थीं।
समीर ने पूछा — "किराया कितना?"
अशफ़ाक़ ने कहा — "ढाई हज़ार।"
समीर हँसा। उसे लगा मज़ाक़ है। उसने कहा, "भाई, इतने में तो एम॰पी॰ नगर में किसी की बालकनी नहीं मिलती।"
अशफ़ाक़ ने कोई जवाब नहीं दिया। उसने बस अपनी चप्पल से फ़र्श की एक उखड़ी हुई टाइल को सीधा करने की कोशिश की, और कहा — "मालिक साहब से मिल लो, वो नीचे इंतज़ार कर रहे हैं।"
नफ़ीस मियाँ। उम्र सत्तर के आसपास। सफ़ेद कुर्ता, हाथ में एक छड़ी जिसकी उन्हें ज़रूरत नहीं लगती थी, और आँखों में वो ठंडापन जो बहुत थके हुए लोगों में आ जाता है। वो अब अशोका गार्डन में अपने बेटे के साथ रहते थे। ये कोठी उनके दादा की थी।
उन्होंने समीर को ऊपर से नीचे तक देखा और पूछा — "अकेले रहोगे?"
"जी।"
"शादी हुई है?"
"सगाई हो गई है। अप्रैल में शादी है।"
नफ़ीस मियाँ कुछ पल चुप रहे। फिर बोले — "ठीक है। ढाई हज़ार। एडवांस की ज़रूरत नहीं। लेकिन तीन बातें हैं।"
और यहाँ से दोस्तों, ये कहानी शुरू होती है।
"पहली बात — मग़रिब के बाद छत पर मत जाना। शाम की अज़ान हो जाए, उसके बाद वो दरवाज़ा मत खोलना जो छत पर जाता है।
दूसरी बात — बरामदे के आख़िर में जो कमरा है, उसका ताला बंद है। उस पर एक काग़ज़ चिपका है। ना ताला खोलना, ना वो काग़ज़ हटाना।
और तीसरी बात…"
यहाँ नफ़ीस मियाँ रुके। उन्होंने आँगन की तरफ़ देखा, जामुन के पेड़ की तरफ़, और फिर बहुत सादे से लहज़े में कहा —
"रात में अगर कोई दरवाज़ा खटखटाए और तुम्हारा नाम लेकर बुलाए — तो जवाब मत देना। चुप रहना। करवट बदलकर सो जाना।"
समीर ने मुस्कुराकर पूछा, "क्यों चाचा? कोई चोर-वोर?"
नफ़ीस मियाँ ने उसकी तरफ़ देखा। और उन्होंने जो कहा, समीर उसे अगले छह महीने तक हर रात याद करने वाला था।
उन्होंने कहा — "बेटा, इस घर में तुम्हें नाम से कोई नहीं जानता।"
समीर उस रात हँसा था। उसने अपनी मंगेतर मेघा को फ़ोन पर ये सारी बात बताई और दोनों बहुत देर तक हँसे। मेघा ने कहा, "ढाई हज़ार में तो मैं भूत के साथ भी रह लूँ।"
दोस्तों, हम सब यही करते हैं ना? जब कोई हमें चेतावनी देता है, तो हम उसे मज़ाक़ बना देते हैं — क्योंकि मज़ाक़ बनाना डरने से आसान होता है।
अगले दिन समीर उस कोठी में शिफ़्ट हो गया। एक गद्दा, एक इंडक्शन चूल्हा, दो बर्तन, एक बाल्टी, और दीवार पर टँगा हुआ एक छोटा सा आईना।
बीस दिन तक कुछ नहीं हुआ।
इक्कीसवें दिन की रात, दो बजकर चालीस मिनट पर, समीर की नींद खुली।
•••
इत्र की ख़ुशबू
नींद खुलने की कोई वजह नहीं थी। ना कोई आवाज़ हुई थी, ना कोई सपना आया था। वो बस अचानक जाग गया — उस तरह, जैसे कमरे में कोई अभी-अभी आया हो और आपकी नींद ने आपको सचेत कर दिया हो।
और कमरे में ख़ुशबू थी।
इत्र की ख़ुशबू। अगरबत्ती वाली नहीं, परफ़्यूम वाली भी नहीं — वो पुराने ज़माने वाला गाढ़ा, चिपचिपा, भारी इत्र, जो शादियों में बुज़ुर्ग लोग रुमाल पर लगाते हैं। थोड़ा चमेली जैसा, थोड़ा और कुछ। इतनी तेज़ कि समीर को लगा जैसे किसी ने पूरी शीशी उसके तकिये पर उड़ेल दी हो।
उसने उठकर लाइट जलाई। कमरा ख़ाली था। खिड़की अंदर से बंद थी। दरवाज़े पर सिटकनी लगी थी। उसने तकिया सूँघा — कुछ नहीं। चादर सूँघी — कुछ नहीं। लेकिन हवा में वो ख़ुशबू अब भी थी, और उसे लग रहा था कि वो ख़ुशबू कमरे के किसी एक कोने से नहीं आ रही — वो हिल रही है। जैसे कोई कमरे में धीरे-धीरे चल रहा हो।
दस मिनट बाद वो अपने आप ख़त्म हो गई। जैसे किसी ने दरवाज़ा बंद कर दिया हो।
समीर ने ख़ुद को समझाया — पुराना घर है। नीचे वाले किसी ने कुछ लगाया होगा। हवा से आ गई होगी।
तीन रात बाद, आवाज़ आई।
पायल की आवाज़। एक बार नहीं — पूरे बरामदे में, एक सिरे से दूसरे सिरे तक। छन… छन… छन… बहुत धीरे। जैसे कोई बहुत आराम से, बिना जल्दी के, टहल रहा हो। और दोस्तों, ये बात ध्यान से सुनिएगा — वो आवाज़ भागती हुई नहीं थी, डरावनी नहीं थी। वो आवाज़ आराम से घूम रही थी। अपने घर में घूमने वाले इंसान की तरह।
समीर दरवाज़े तक गया। उसने सिटकनी पर हाथ रखा। और फिर नफ़ीस मियाँ की तीसरी बात उसके दिमाग़ में आई, और उसने हाथ हटा लिया।
आवाज़ बरामदे के आख़िरी छोर पर जाकर रुक गई। वहीं, जहाँ वो बंद कमरा था।
सुबह समीर ने वो कमरा देखा। पीतल का बड़ा ताला, इतना पुराना कि हरा पड़ चुका था। और उस पर चिपका हुआ काग़ज़ — पीला, भुरभुरा, जिस पर किसी ने काली स्याही से कुछ लिखा था। अरबी या फ़ारसी जैसा कुछ, और बीच-बीच में चौकोर ख़ाने बने थे जिनमें नंबर भरे थे।
वो काग़ज़ एक कोने से फटा हुआ था। ताज़ा फटा हुआ।
इसके बाद जो हुआ, वो धीरे-धीरे हुआ। और शायद इसीलिए समीर को पता ही नहीं चला।
आँगन में एक कुत्ता आता था — मोहल्ले का कुत्ता, जिसे समीर रोटी डालता था। वो आना बंद हो गया। समीर ने उसे गली में देखा तो बुलाया। कुत्ता कोठी के दरवाज़े तक आया, दहलीज़ पर खड़ा रहा, अंदर देखता रहा — और फिर बिना आवाज़ किए वापस मुड़ गया।
रामू काका, जो हफ़्ते में दो बार आँगन बुहारने आते थे, उन्होंने अपना वक़्त बदल लिया। पहले शाम को आते थे, अब सुबह ग्यारह बजे आने लगे। समीर ने पूछा तो बोले, "बेटा, अब उम्र हो गई है। शाम को दिखता कम है।"
लेकिन रामू काका शाम को गली में बैठकर बीड़ी पीते थे। समीर ने उन्हें कई बार देखा था।
और फिर एक रात, समीर ने गाना सुना।
औरत की आवाज़ थी। गा नहीं रही थी — गुनगुना रही थी। बिना लफ़्ज़ों के, बस धुन। वो धुन बहुत पुरानी लग रही थी, थोड़ी उदास, जैसे कोई माँ बच्चे को सुलाते वक़्त गुनगुनाती है। और वो आवाज़ इतनी साफ़ थी, इतनी पास थी, कि समीर को यक़ीन हो गया कि कोई उसके कमरे के दरवाज़े के ठीक दूसरी तरफ़ खड़ा है।
उस रात समीर ने दरवाज़ा नहीं खोला। लेकिन उसने वो धुन याद कर ली।
और अगले दिन ऑफ़िस में, काम करते-करते, वो ख़ुद उसे गुनगुना रहा था। उसके साथ काम करने वाले लड़के ने पूछा — "ये कौन सा गाना है?"
समीर ने कहा — "पता नहीं यार। दिमाग़ में घुस गया है।"
•••
वो जो पैरों की तरफ़ बैठती थी
दोस्तों, अब मैं आपको कहानी के उस हिस्से में ले जा रहा हूँ जिसकी वजह से मैंने शुरू में कहा था कि ये कहानी बालिग़ लोगों के लिए है। मैं सब कुछ नहीं बताऊँगा — कुछ चीज़ें बताने की नहीं होतीं। लेकिन जितना बताऊँगा, उतना ही काफ़ी होगा।
नवंबर की शुरुआत थी। भोपाल में रातें ठंडी होने लगी थीं।
उस रात समीर की आँख खुली, लेकिन उसका शरीर नहीं खुला।
आपने कभी ये महसूस किया है? आप जागे हुए हैं, आपको छत दिख रही है, आपको पंखे की आवाज़ सुनाई दे रही है, लेकिन आपकी उँगली तक नहीं हिलती। जैसे किसी ने आपके शरीर और आपके दिमाग़ के बीच का तार काट दिया हो। डॉक्टर इसे स्लीप पैरालिसिस कहते हैं। हमारे यहाँ लोग इसे कुछ और कहते हैं।
समीर ऐसे ही पड़ा था। और उसे लगा कि गद्दा उसके पैरों की तरफ़ दब रहा है।
धीरे-धीरे। जैसे कोई आराम से आकर वहाँ बैठ गया हो।
उसने अपनी आँखें घुमाईं — सिर्फ़ आँखें, क्योंकि गर्दन नहीं हिल रही थी।
वो एक औरत थी।
वो उसके पैरों की तरफ़, गद्दे के किनारे पर बैठी थी, उसकी तरफ़ पीठ करके। समीर को उसका चेहरा नहीं दिख रहा था। उसे सिर्फ़ ये दिख रहा था कि उसके बाल खुले हुए हैं, कमर से नीचे तक, और वो गीले हैं — इतने गीले कि उनसे पानी टपक रहा था और उसके कपड़ों की पीठ पर गहरा दाग़ बन गया था। कपड़े पुराने ज़माने के थे, गहरे रंग का कुछ — शायद हरा, शायद काला, अँधेरे में पता नहीं चलता।
और कमरे में वही ख़ुशबू थी।
वो औरत धीरे से हिली। जैसे साँस ले रही हो। और फिर उसने अपना हाथ पीछे किया — बिना मुड़े, बिना देखे — और अपनी उँगलियाँ समीर के टख़ने पर रख दीं।
समीर ने लिखा है: "भाई, मैं आपको वो एहसास कैसे बताऊँ। वो ठंडा था। इतना ठंडा कि दर्द हो रहा था। लेकिन मेरे अंदर से डर ग़ायब हो गया था। मुझे डर नहीं लग रहा था। मुझे… अच्छा लग रहा था। और यही सबसे डरावनी बात है जो मैं आपको बता सकता हूँ।"
उसकी उँगलियाँ धीरे-धीरे ऊपर की तरफ़ बढ़ीं — टख़ने से पिंडली तक, पिंडली से घुटने तक। और फिर वो औरत मुड़ी।
समीर को उसका चेहरा नहीं दिखा। सिर्फ़ आँखें दिखीं — क्योंकि उस रात बाहर गली की एक ट्यूबलाइट जल रही थी और उसकी रोशनी की एक पतली लकीर खिड़की से आकर ठीक उसकी आँखों पर पड़ रही थी। बड़ी आँखें। गाढ़ा काजल, इतना कि नीचे तक फैला हुआ। और वो आँखें झपक नहीं रही थीं।
वो उसके ऊपर झुकी। उसके गीले बाल समीर के सीने पर गिरे। उसका चेहरा समीर के कान के पास आया और उसने कुछ कहा — बहुत धीरे, किसी ऐसी ज़बान में जो समीर की समझ में नहीं आई, लेकिन जिसका लहज़ा उसे समझ आ गया।
वो लहज़ा शिकायत का था। जैसे कोई कह रहा हो — "तुमने इतनी देर क्यों लगाई?"
उसके बाद जो हुआ, वो मैं आपको नहीं बताऊँगा। समीर ने भी मुझे पूरा नहीं लिखा। उसने सिर्फ़ इतना लिखा कि उसे अपने ऊपर एक ठंडा वज़न महसूस होता रहा, बहुत देर तक, और वो पूरे वक़्त हिल नहीं पाया, और पूरे वक़्त वो चाहता भी नहीं था कि ये रुके।
सुबह चार बजकर चौदह मिनट पर उसकी आँख खुली।
कमरे की खिड़की खुली हुई थी — वही खिड़की जो उसने रात में अंदर से बंद की थी। बाहर हल्की बारिश हो रही थी। उसका पूरा शरीर पसीने से भीगा हुआ था और उसे इतनी ठंड लग रही थी कि दाँत बज रहे थे।
और उसके तकिये पर लंबे, काले, गीले बाल पड़े थे।
समीर के बाल छोटे थे। फ़ौजी कट। उसकी माँ चिढ़ती थी इस बात पर।
दोस्तों, अब मैं आपको वो बताता हूँ जो इस पूरी कहानी की सबसे डरावनी चीज़ है। और वो कोई भूत नहीं है।
वो ये है कि समीर ने भागने की कोशिश नहीं की।
अगले तीन हफ़्तों में ये सब बार-बार हुआ। कभी हफ़्ते में दो बार, कभी चार बार। और समीर ने धीरे-धीरे अपनी ज़िंदगी उसके हिसाब से ढालनी शुरू कर दी। वो ऑफ़िस से सीधा घर आने लगा। दोस्तों के साथ बाहर खाना बंद कर दिया। रात को नौ बजे ही खाना खाकर लेट जाता था — जल्दी, ताकि ज़्यादा वक़्त मिले।
मेघा के फ़ोन उठने कम हो गए। पहले रोज़ घंटा भर बात होती थी। फिर दस मिनट। फिर "यार मैं थक गया हूँ, कल बात करते हैं।"
और उसका शरीर… उसका शरीर उसे छोड़ने लगा।
दिसंबर तक समीर का नौ किलो वज़न कम हो चुका था। आँखों के नीचे गड्ढे पड़ गए थे। ऑफ़िस में लोग पूछने लगे — "क्या हुआ भाई, कोई बीमारी है क्या?" और सबसे अजीब बात ये कि उसके हाथ हमेशा ठंडे रहते थे। दिसंबर की दोपहर में, धूप में खड़े होकर भी, उसकी हथेलियाँ बर्फ़ जैसी रहती थीं।
एक दिन उसने ऑफ़िस के वॉशरूम के आईने में अपनी शर्ट खोलकर देखी। उसके सीने पर, कंधे पर, गर्दन के नीचे — निशान थे। लंबी पतली खरोंचें, कुछ पुरानी और भूरी, कुछ ताज़ा और लाल।
उसने शर्ट के बटन बंद किए। और फिर उसने वो किया जो किसी नॉर्मल इंसान को नहीं करना चाहिए।
उसने आईने में देखकर मुस्कुरा दिया।
और कहानियाँ · More stories
- हमज़ाद · Pretika
- रजिस्टर · Pretika
- ग्यारह मिनट · Pretika
- कोटला के साये: जिन्नात और भटकती रूहें · Piyashi Atma