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एपिसोड 5 — सुर की चाब

firoj saifi · Horror Poetry · 16 मिनट

अस्पताल की चौथी मंज़िल पर वह वार्ड था जिसे नर्सें आपस में "ख़ामोश वार्ड" कहने लगी थीं।

ईशान कबीर को लेकर जब वहाँ पहुँचा, तब दोपहर के एक बज रहे थे। गलियारे में दवाओं और फिनाइल की मिली-जुली गंध थी, पर उसके नीचे एक और गंध थी, जो कबीर को कल रात अपने कमरे में आई थी। जड़ी-बूटियों की, कपूर की, और किसी बहुत पुरानी राख की।

"यहीं रुक," ईशान ने वार्ड के दरवाज़े पर कहा। "नर्स सुबह से डरी हुई हैं। मैं पहले देख लूँ।"

कबीर ने सिर हिलाया, पर वह रुका नहीं। उसने दरवाज़े का काँच पकड़ा और भीतर झाँका।

ग्यारह बिस्तर थे, और ग्यारह के ग्यारह ख़ाली। ग्यारह मरीज़ वार्ड के बीचोंबीच एक गोले में खड़े थे, कंधे से कंधा मिलाए, आँखें आधी बंद। उनमें एक नौजवान था, दो बूढ़ी औरतें, एक अधेड़ आदमी जिसके हाथ में अब भी ड्रिप की सुई लगी थी, और एक किशोर लड़का जो मुश्किल से सोलह का लगता था। सबके होंठ धीरे-धीरे हिल रहे थे। कोई आवाज़ नहीं, पर कबीर को उनके होंठों की लय साफ़ दिख रही थी।

वह लोरी थी। वही लोरी।

कबीर ने दरवाज़ा खोल दिया।

उसके क़दम की आहट के साथ ही ग्यारह सिर एक साथ घूमे। ग्यारह जोड़ी आँखें उसकी तरफ़ उठीं, एकदम एक साथ, जैसे किसी एक धागे से बँधी हों। होंठों की हरकत थम गई।

"कबीर, वापस आ," ईशान ने धीमे से कहा, पर कबीर आगे बढ़ चुका था।

वार्ड की हवा ठंडी थी, इतनी कि उसकी साँस भाप बनकर उड़ रही थी। वह गोले के क़रीब पहुँचा। नौजवान, जो मरीज़ नंबर 417 था, एक क़दम आगे बढ़ा। उसके हाथ में एक छोटी-सी स्लेट थी, जो नर्सों ने उसे बात करने के लिए दी थी। उसने स्लेट पर चॉक से कुछ लिखा और कबीर की तरफ़ घुमा दी।

एक शब्द: *आठवाँ।*

कबीर ने निगलकर गला साफ़ करने की कोशिश की, पर गले में सिर्फ़ ख़ालीपन था।

फिर बूढ़ी औरत ने अपना हाथ उठाया और कबीर की जेब की तरफ़ इशारा किया, जहाँ उसका पोर्टेबल रिकॉर्डर रखा था। कबीर ने उसे निकाला और असमंजस में उसकी तरफ़ देखा। बूढ़ी औरत ने सिर हिलाया, जैसे कह रही हो, *चालू करो।*

कबीर ने रिकॉर्डर चालू करके हाथ में पकड़ लिया।

उसी पल ग्यारह होंठ फिर हिले। इस बार भी कोई आवाज़ नहीं निकली। पर रिकॉर्डर की स्क्रीन पर, जहाँ आवाज़ की लहरें दिखती थीं, एक के बाद एक छोटी-छोटी रेखाएँ उभरने लगीं।

कबीर ने हेडफ़ोन कान पर लगा लिए।

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### मरे हुए गले

पहले सिर्फ़ सन्नाटा था। फिर, जैसे बहुत दूर से, किसी बंद कुएँ की तली से, एक औरत की धीमी, थकी हुई, मगर साफ़ आवाज़ आई।

*"तुलसीबाग... स्वर-सदन... मेरी बेटी..."*

कबीर की साँस रुक गई। यह किसी ज़िंदा मरीज़ की आवाज़ नहीं थी। मरीज़ तो बोल ही नहीं सकते थे। यह आवाज़ उनके भीतर से, उनके ज़रिये नहीं, बल्कि उनके *बीच* से आ रही थी, उस ख़ाली जगह से जो गोले के बीच में थी।

*"मेरी बेटी... मीरा..."*

आवाज़ कमज़ोर पड़ने लगी।

*"उसके पास... पोथी है... सुर की... मोचन..."*

और फिर एक झटके में वह कट गई। रिकॉर्डर की स्क्रीन फिर सपाट हो गई।

कबीर ने हेडफ़ोन उतारे। गोले में खड़े ग्यारह लोग थके हुए-से ज़मीन पर बैठने लगे, एक-एक करके, जैसे किसी ने उनके भीतर से अचानक कुछ खींच लिया हो। नर्सें दौड़ पड़ीं।

ईशान ने कबीर का कंधा पकड़कर उसे बाहर खींचा। "तूने क्या सुना?"

कबीर ने काँपते हाथ से पैड पर लिखा:

*"मंजुला देवी। छठी आवाज़। उसने अपनी बेटी का पता दिया। तुलसीबाग, स्वर-सदन।"*

ईशान ने एक पल सोचा। "मुझे लगता है मैंने यह नाम सुना है। तुलसीबाग में एक पुरानी संगीत की दुकान है, जहाँ हारमोनियम और तबले बिकते हैं। मेरी माँ वहाँ से सितार की तारें लाया करती थी।"

कबीर ने सिर हिलाया। पर वह अपनी मुट्ठी में रिकॉर्डर को कसकर भींचे हुए था, और उसके दिमाग़ में एक सवाल घूम रहा था। मरी हुई आवाज़ें क़ैद थीं, पर वे अब भी बाहर संदेश भेज पा रही थीं। मतलब छः आवाज़ें पूरी तरह चुप नहीं हुई थीं। वे लड़ रही थीं।

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### मशीन की आवाज़

स्वर-सदन जाते हुए रास्ते में कबीर ने एक नया प्रयोग किया।

वह साउंड इंजीनियर था, और उसके फ़ोन में टेक्स्ट-टू-स्पीच के कई ऐप थे, जिनसे वह कभी-कभी फ़िल्मों के लिए रोबोट की आवाज़ें बनाता था। उसने सोचा, अगर उसकी अपनी आवाज़ नहीं है, तो मशीन की आवाज़ से तो बोला जा सकता है।

कार की पिछली सीट पर बैठे हुए उसने ऐप खोला, टाइप किया: *"मीरा से बात करने के लिए यह इस्तेमाल करूँगा।"* और प्ले दबाया।

फ़ोन के स्पीकर से एक सपाट, मशीनी आवाज़ निकली: *"मीरा से बात करने के लिए यह इस्तेमाल करूँगा।"*

ईशान ने मुड़कर मुस्कुराया। "देख, तुझे आवाज़ मिल गई।"

पर कबीर मुस्कुराया नहीं। उसकी निगाहें स्क्रीन पर जमी थीं, क्योंकि मशीन के वाक्य ख़त्म होने के बाद भी स्पीकर से एक आवाज़ निकलती रही।

बहुत धीमी, बहुत महीन, मशीन की आवाज़ के ठीक नीचे दबी हुई, एक फुसफुसाहट:

*"मेरी है... मेरी है... मेरी है..."*

कबीर ने झटके से फ़ोन बंद कर दिया।

"क्या हुआ?" ईशान ने गाड़ी धीमी की।

कबीर ने जल्दी से पैड पर लिखा: *"मशीन भी नहीं चलेगी। वह मेरी हर आवाज़ पर अपना हक़ जता रहा है।"*

ईशान ने गहरी साँस ली और कुछ नहीं कहा। उसने बस गाड़ी की रफ़्तार बढ़ा दी।

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### स्वर-सदन

तुलसीबाग की संकरी गलियों में दोपहर की धूप दुकानों की छतों पर टूट-टूटकर गिर रही थी। हर तरफ़ पीतल के बर्तनों, रंग-बिरंगी चूड़ियों और पूजा के सामान की चहल-पहल थी। उसी भीड़ के बीच, एक पुरानी दो-मंज़िला इमारत की निचली मंज़िल पर एक छोटी-सी दुकान थी, जिसके ऊपर फीके पड़ चुके अक्षरों में लिखा था: *"स्वर-सदन — वाद्य, पुस्तकें व संगीत सामग्री।"*

दुकान का शटर आधा खुला था। भीतर हारमोनियम, तानपुरे, ढोलकियाँ और बाँसुरियाँ क़रीने से टँगी थीं। काउंटर के पीछे एक औरत बैठी थी, उम्र लगभग अड़तीस, सफ़ेद सूती साड़ी पहने, बाल कसकर बँधे हुए। उसके सामने एक पुरानी खाता-बही खुली थी और वह उसमें कुछ लिख रही थी।

ईशान ने पहले क़दम रखा। "नमस्ते। हम मीरा जी से मिलना चाहते हैं।"

औरत ने सिर उठाया। उसकी आँखें तीखी और थकी हुई थीं, ऐसी जो बहुत कुछ देख चुकी हों। "मैं ही हूँ। मीरा गायकवाड़। आप?"

ईशान ने अपना परिचय दिया, फिर कबीर की तरफ़ इशारा किया। "यह मेरे दोस्त कबीर हैं। इनकी आवाज़ हाल में चली गई है, इसलिए इनकी तरफ़ से मैं बोलूँगा। हम आपकी माँ, मंजुला देवी, के बारे में कुछ पूछना चाहते हैं।"

मीरा के हाथ में पकड़ी क़लम रुक गई।

दुकान में कुछ देर सन्नाटा छा गया। फिर उसने धीरे-धीरे क़लम नीचे रखी और शटर की तरफ़ गई। उसने उसे पूरा गिराकर नीचे से कुंडी लगा दी। दुकान में अचानक अँधेरा-सा छा गया, सिर्फ़ ऊपर लटके एक पीले बल्ब की रोशनी बची।

"आप पहले नहीं हैं जो उस रात का नाम लेकर आए हैं," मीरा ने पलटकर कहा। उसकी आवाज़ में कड़वाहट नहीं थी, बस एक पुरानी थकान थी। "पंद्रह साल पहले एक आदमी आया था। चमकदार सूट, उल्टी घड़ी। उसने कहा कि वह मेरी माँ की रिकॉर्डिंग्स ख़रीदना चाहता है। मुँहमाँगी क़ीमत देने को तैयार था।"

कबीर का दिल उछला। उसने झट से पैड पर लिखा: *"आलोक सेठ?"*

मीरा ने उसका पैड देखा। उसके चेहरे का रंग उतर गया। "आप उसे जानते हैं।"

कबीर ने हाँ में सिर हिलाया, फिर उसने अपनी हथेली आगे कर दी। उस पर वही जली हुई गोल छाप थी जो कल दरवाज़े से उभरी थी।

मीरा देर तक उस छाप को देखती रही। फिर उसने गहरी साँस ली। "अंदर आइए। पीछे मेरा घर है। चाय बनाती हूँ। और फिर मैं आपको वह सब बताऊँगी जो मैंने चौबीस साल से किसी को नहीं बताया।"

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### मंजुला की कहानी

दुकान के पीछे एक छोटा-सा आँगन था, जिसमें तुलसी का चौरा और एक पुराना नीम का पेड़ था। एक कोने में पुरानी चटाई बिछी थी, जिस पर तीनों बैठ गए। मीरा ने पीतल की तश्तरी में तीन कप चाय रखी और बोलना शुरू किया।

"मेरी माँ मंजुला देवी लोकगायिका थीं। सतारा के पास एक गाँव की रहने वाली, पर पूरे महाराष्ट्र में उनकी लोरियों और लोकगीतों की धूम थी। मैं उस वक़्त चौदह साल की थी। चौदह अक्टूबर दो हज़ार दो की रात माँ एक कार्यक्रम से लौटी थीं। थकी थीं, पर बहुत ख़ुश।"

मीरा की आँखें दूर कहीं देखने लगीं।

"आधी रात के बाद मेरी नींद टूटी। माँ के कमरे से कुछ आवाज़ें आ रही थीं। मैं दरवाज़े तक गई तो मैंने देखा कि माँ बिस्तर पर बैठी हैं और उनके सामने अँधेरे में एक लंबी आकृति खड़ी है। मैंने उसका चेहरा नहीं देखा। बस उसके हाथ में एक चमकती चीज़ थी, घड़ी जैसी।"

कबीर और ईशान ने एक-दूसरे की तरफ़ देखा।

"माँ ने मुझे देखा और इशारे से कहा, भाग जा। मैं नहीं भागी। मैं वहीं खड़ी रही, पत्थर की तरह। और तब मैंने वह चीख़ सुनी। माँ की नहीं। उनके गले की चीख़, जो ख़ुद उनसे अलग होकर बाहर निकल रही थी।"

मीरा ने अपनी चाय का कप दोनों हाथों में कसकर पकड़ा। उसके हाथ काँप रहे थे।

"सुबह माँ ज़िंदा थीं। साँस ले रही थीं, चल रही थीं, खाना खा रही थीं। पर बोल नहीं सकती थीं। एक शब्द भी नहीं। डॉक्टरों ने कहा कि गले में कोई ख़राबी नहीं है। छः साल वे ऐसे ही रहीं, चुपचाप, अपनी आँखों से बोलती हुईं। और फिर एक दिन उन्होंने चुपचाप आँखें मूँद लीं।"

ईशान ने धीरे से कहा, "मुझे बहुत अफ़सोस है।"

"अफ़सोस की बात बाद में," मीरा ने कहा। उसने अपने आँसू पोंछे और सीधी बैठ गई। "मरने से पहले माँ ने एक चीज़ मुझे दी थी। एक पोथी। बहुत सँभालकर रखी थी उन्होंने। वे उसे कपड़े में लपेटकर अपने तकिये के नीचे रखती थीं। आख़िरी दिन उन्होंने इशारे से कहा कि इसे सँभालकर रखना, और जिस दिन कोई उस रात का नाम लेकर आए, उसे देना।"

वह उठकर अंदर गई और कुछ पल बाद लाल रंग के रेशमी कपड़े में लिपटी एक मोटी, पुरानी किताब लेकर लौटी।

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### सुर-पोथी

मीरा ने पोथी चटाई पर रखकर उसका कपड़ा खोला।

वह हाथ से सिले हुए पन्नों की किताब थी, जिसके पन्ने मोटे, खुरदुरे और पीले थे। उन पर काली स्याही से देवनागरी में बारीक अक्षर लिखे थे, बहुत सलीक़े से, जैसे कोई बरसों तक यह काम करता रहा हो। कई जगह स्याही फैल गई थी, कई जगह पन्ने फट चुके थे।

"माँ ने छः साल की ख़ामोशी में इसे लिखा था," मीरा ने कहा। "वे जो कुछ जानती थीं, जो उन्होंने उस रात के बाद अपने भीतर महसूस किया, सब कुछ। माँ कहती थीं कि आवाज़ चली जाने के बाद भी उन्हें उन सबकी आहट सुनाई देती थी जो उनसे पहले गए थे। जैसे कुएँ के भीतर कई लोग एक-दूसरे को पुकार रहे हों।"

कबीर ने पोथी के पन्ने पलटे। पहले पन्ने पर मोटे अक्षरों में लिखा था:

*"बंधन-सुर और मोचन-सुर।"*

उसने ईशान की तरफ़ देखा और पन्ने को ऊँचा कर दिया। ईशान ने पढ़ा, और मीरा से पूछा, "इसका क्या मतलब है?"

मीरा ने पोथी का एक पन्ना खोला और उँगली से पंक्तियाँ पढ़ीं:

"माँ ने लिखा है कि हर आवाज़ दो तरह से बाँधी जा सकती है। एक, जब कोई उसे छीन ले और अपने पास क़ैद कर ले। इसे उन्होंने बंधन-सुर कहा। दूसरा, जब छीनी हुई आवाज़ को उसी के असली सुर में, उसी की अपनी लय में, उलटे क्रम से पुकारा जाए, तब क़ैद ढीली पड़ती है। यह मोचन-सुर है।"

कबीर के भीतर कुछ चमक उठा। उसने पैड पर तेज़ी से लिखा: *"मतलब हर आवाज़ की अपनी रिकॉर्डिंग चाहिए। और उन्हें उलटे क्रम में बजाना होगा।"*

मीरा ने पन्ना पढ़ा और सिर हिलाया। "उलटे क्रम में, यानी जिस क्रम में आवाज़ें ली गईं, उसके उलट। सबसे आख़िर वाली पहले, सबसे पहली वाली आख़िर में।"

"सबसे आख़िर वाली अनन्या है," ईशान ने धीमे से कहा।

कबीर की उँगलियाँ पन्ने पर जम गईं। *अनन्या सबसे पहले।* यानी अगर यह तरकीब काम करती, तो उसकी बहन का ताला सबसे पहले ढीला होता।

पर मीरा ने उसे रोका। "एक बात और है। माँ ने उस पर एक चेतावनी लिखी है।" उसने पन्ना पलटा और एक जगह उँगली रखी:

*"मोचन-सुर तभी खुलेगा जब सातों आवाज़ें अपनी-अपनी लय में हों। एक भी कम हुई तो सुर उलटा पड़ेगा। जो ताला नहीं खुला, वह और कसकर भर जाएगा। और जो बजाएगा, उसकी आवाज़ भी उसमें खिंच जाएगी।"*

कबीर ने पढ़ा, और उसके चेहरे का रंग उतर गया।

"मतलब," ईशान ने कहा, "अगर हमने छः आवाज़ें ढूँढ़ भी लीं, और सातवीं में चूक हुई..."

"तो आपके दोस्त की आवाज़, जो पहले ही गई हुई है, हमेशा के लिए उस दरवाज़े में बंद हो जाएगी," मीरा ने शांत स्वर में कहा। "और अनन्या की भी।"

कबीर ने पन्ने को देर तक देखा, फिर उसने पैड पर लिखा, धीरे-धीरे, एक-एक अक्षर तौलकर:

*"सातवीं आवाज़ मेरी बहन की है। उसकी असली रिकॉर्डिंग मेरे पास है। टेप में। 'साँसों के पार'।"*

मीरा ने सिर उठाया। "अनन्या मल्होत्रा?"

कबीर ने सिर हिलाया।

"मैंने उसे सुना है," मीरा ने कहा, और पहली बार उसकी आवाज़ में कोमलता आई। "बारह-तेरह साल पहले। एक कार्यक्रम में, पुणे में। उसकी आवाज़ में कुछ था जो आपको भीतर तक छू जाता था। मुझे माँ की याद आ गई थी।"

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### माँ की रिकॉर्डिंग

मीरा उठकर दुकान के पिछले कमरे में गई। थोड़ी देर बाद वह एक पुराने लकड़ी के संदूक के साथ लौटी, जिसके ढक्कन पर सुनहरे अक्षरों में किसी ने कभी लिखा था: *"मंजुला देवी — रिकॉर्डिंग्स।"*

उसने ढक्कन खोला। अंदर क़रीने से कैसेट टेप, रील और कुछ रिकॉर्ड रखे थे। हर एक पर पीले काग़ज़ के लेबल लगे थे।

"माँ की सारी रिकॉर्डिंग्स मैंने सँभालकर रखी हैं," मीरा ने कहा। "उनमें उनका सबसे प्यारा गीत भी है। एक लोरी। उन्होंने उसे उन्नीस सौ अट्ठानवे में रिकॉर्ड किया था। यही सबसे पहले उस आदमी की नज़र में आई थी, मुझे लगता है।"

उसने एक कैसेट निकाली और अपने पुराने टेप-डेक में डाल दी। बटन दबाया।

पहले हल्की-सी सरसराहट। फिर एक औरत की धीमी, मखमली, थपकी जैसी आवाज़ कमरे में फैलने लगी।

*"निंदिया पार... निंदिया पार..."*

कबीर का पूरा शरीर जम गया।

वह इस लोरी को जानता था। उसके कान इसे बचपन से पहचानते थे। बचपन की हर रात, हर बुख़ार, हर रोती हुई याद में यही लोरी बजती थी। यह वही थी जो उसकी माँ उसे और अनन्या को सुनाया करती थी।

शब्द वही थे। सुर वही था। थपकी वही थी।

वह बिना कुछ कहे उठ खड़ा हुआ। उसके हाथ काँप रहे थे। उसने पैड पर लिखने की कोशिश की, पर स्याही पन्ने पर फैल गई, क्योंकि आँसू गिर रहे थे।

*"यह मेरी माँ की लोरी है।"*

मीरा ने पढ़ा और चौंककर कैसेट रोक दी। "क्या?"

*"हमारी माँ यही लोरी गाती थीं। हर रात। किसी को नहीं पता था कि यह कहाँ से आई। माँ ने कभी नहीं बताया।"*

मीरा के चेहरे पर एक अजीब, धुँधली-सी पहचान उभरी। "मेरी माँ ने मुझे बताया था कि यह लोरी उन्होंने ख़ुद नहीं रची। उन्हें किसी ने सिखाई थी। एक औरत ने, जो उन्नीस सौ सत्तानवे के आसपास पुणे आई थी और उनसे मिली थी।"

"किसने?" ईशान ने पूछा।

मीरा पोथी के पन्ने पलटने लगी। एक जगह वह रुकी।

"यहाँ माँ ने नाम लिखा है। उस औरत का नाम। वे कहती थीं कि वह बहुत संकोची थी, अपनी पहचान किसी को नहीं बताना चाहती थी। उसने माँ को यह लोरी सौंपी थी और कहा था कि जिस दिन आवाज़ें खोने लगें, उस दिन इसे बजाना।"

कबीर ने झुककर पन्ना पढ़ा। उसकी निगाह नाम पर पड़ी और जैसे समय एक पल के लिए ठहर गया।

*"शारदा।"*

सिर्फ़ इतना। पर नाम के नीचे माँ ने मोटे अक्षरों में एक और शब्द लिखा था, जिसे कबीर ने जीवन में कभी नहीं सुना था, उस संदर्भ में तो कभी नहीं:

*"वैद्य-वंश की अंतिम कड़ी।"*

कबीर ने पन्ने को घूरा। शारदा। उसकी अपनी माँ का नाम। शारदा मल्होत्रा। वह नाम जो उसने बचपन से सुना था। पर शादी से पहले की माँ का नाम, कबीर ने कभी नहीं पूछा था, और माँ ने कभी बताया नहीं था।

उसके हाथ से पैड छूटकर गिर गया।

ईशान ने उसे सँभाला। "कबीर? क्या हुआ?"

कबीर ने काँपते हाथ से पैड उठाया और, बहुत धीमे, ऐसे लिखा जैसे हर अक्षर एक पत्थर हो:

*"मेरी माँ का नाम शारदा था। शादी से पहले, वह शारदा वैद्य थीं।"*

मीरा के हाथ से पोथी लगभग छूट गई।

कमरे में कोई कुछ नहीं बोला। बाहर आँगन में नीम की पत्तियाँ हवा में सरसरा रही थीं, और उनकी आवाज़ में कबीर को पहली बार कुछ ऐसा लगा जैसे कोई बहुत दूर से, बहुत पुराने किसी रिश्ते से, उसका नाम पुकार रहा हो।

"मतलब वह तुम्हारा ख़ून है," ईशान ने फुसफुसाकर कहा। "पंडित रघुनाथ वैद्य का।"

कबीर ने सिर हिलाया, जैसे उसकी गर्दन पर किसी ने भारी बोझ रख दिया हो।

"इसीलिए उसने अनन्या को चुना," मीरा ने धीमे से कहा। "और अब तुम्हें। यह सातवीं और आठवीं आवाज़ किसी इत्तफ़ाक़ का नतीजा नहीं हैं। वह वैद्य जी के अपने ख़ून को ढूँढ़ रहा है।"

कबीर के भीतर, उस ख़ामोश, गूँगे गले की गहराई में, कुछ हिला। एक ख़याल, एक पुरानी याद, एक अनकहा सवाल।

*माँ ने सबको क्यों नहीं बताया? माँ क्या जानती थीं?*

मीरा ने एक आख़िरी पन्ना खोलकर कबीर के सामने रखा। उस पर माँ की लिखावट में सिर्फ़ तीन पंक्तियाँ थीं, किसी ने बहुत जल्दी में लिखी हुईं:

*"बाकी पाँच आवाज़ें ढूँढ़ो। गुलशन आरा के रिकॉर्ड रज़ाक़ के पास हैं। रमेश की बाँसुरी रेडियो के तहख़ाने में दबी है।*
*मुरलीधर और सावित्री की रिकॉर्डिंग आकाशवाणी के पुराने गोदाम में।*
*और वैद्य जी की आवाज़... वह तुम्हारी माँ के पास है।"*

कबीर की साँस अटक गई।

*"वैद्य जी की आवाज़ तुम्हारी माँ के पास है।"*

वह पंक्ति बार-बार उसकी आँखों के सामने तैरने लगी।

उसकी माँ को गुज़रे सात साल हो चुके थे। उसने उनका सारा सामान सतारा के पुराने पुश्तैनी घर के एक संदूक में बंद करके छोड़ दिया था, ताला लगाकर, चाबी कहीं रखकर भूल गया था।

और उसी पल, दुकान के बाहर, तुलसीबाग की भीड़-भाड़ भरी गली में, जहाँ दोपहर की धूप अभी-अभी ढलने लगी थी, एक घड़ी की टिक-टिक की आवाज़ गूँजी। उल्टी दिशा में घूमती हुई।

मीरा ने खिड़की के परदे से झाँका। उसका चेहरा सफ़ेद पड़ गया।

"वह यहाँ है," उसने फुसफुसाकर कहा।

बाहर गली के उस पार, एक चमकदार सूट पहने आदमी खड़ा था, हाथ में सुनहरी घड़ी, चेहरे पर वही चिपकी हुई मुस्कान। वह सीधे दुकान की खिड़की की तरफ़ देख रहा था, और उसने अपना एक हाथ उठाकर हल्के से हिलाया, जैसे किसी पुराने दोस्त को नमस्ते कर रहा हो।

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**(जारी है... अगला एपिसोड: "गूँगी लोरी")**

Writer
firoj saifi
Story
मुझे आवाज़ किसने दी?
Chapter
5 of 5
Category
Horror Poetry
Reading time
16 min
Words
3044
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

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