Pretika › Horror Poetry › मुझे आवाज़ किसने दी?
एपिसोड 4 — बेसमेंट का दरवाज़ा
firoj saifi · Horror Poetry · 16 मिनट
घड़ी में 3:17 बज चुके थे।
कबीर बिस्तर के किनारे बैठा था, दोनों हाथ घुटनों पर, और उसकी आँखें उस लाल डिजिटल रोशनी पर जमी थीं जो अब पहले से कहीं ज़्यादा गाढ़ी लग रही थी। कुछ ही पल पहले रात के नौ बजे थे। अब तीन बजकर सत्रह मिनट। बीच के छः घंटे कहाँ गए, यह वह नहीं जानता था।
कमरे में एक अजीब-सी गंध फैल रही थी। पहले उसे लगा कि यह सीलन की है, पर फिर उसने उसे पहचाना। यह जड़ी-बूटियों की गंध थी। सूखी तुलसी, नीम, कपूर, और कुछ ऐसा जो जला हुआ-सा था, जैसे बहुत पुराना हवन-कुंड सालों बाद सुलगा दिया गया हो।
उसने ज़मीन की तरफ़ देखा। फ़र्श पर जो टाइलें थीं, वे अब वहाँ नहीं थीं। उनकी जगह पुरानी लाल मिट्टी की सतह थी, चिकनी, ठंडी, पैरों से घिसी हुई।
कबीर घबराकर खड़ा हुआ। कमरा बदल रहा था।
दीवारों का रंग उतर रहा था, पुराना पेंट परतों में उखड़कर नीचे गिर रहा था और भीतर से ईंट-चूने की नंगी दीवारें निकल रही थीं। खिड़की के पर्दे ग़ायब हो गए, उनकी जगह लकड़ी की मोटी जाली लग गई थी। कोने में रखी उसकी अलमारी धुँधली पड़ी और उसकी जगह एक लंबी लकड़ी की ताक उभर आई, जिस पर काँच की शीशियाँ क़तार में सजी थीं। हर शीशी में कुछ सूखा, कुछ गीला, कुछ रंग-बिरंगा।
और ताक के ठीक ऊपर, दीवार पर, एक बड़ी तस्वीर टंगी थी, वही फ़्रेम जो दो रात पहले उसने गिराकर तोड़ दिया था। पर अब वह टूटा नहीं था, और उसमें, जहाँ कभी एक धुँधली औरत दिखती थी, एक आदमी साफ़ दिख रहा था। लंबा, पतला, सफ़ेद धोती और जनेऊ में, माथे पर लंबा तिलक। उसकी आँखें बंद थीं, मानो वह किसी गहरी साधना में हो।
कबीर को याद आया। *पंडित रघुनाथ वैद्य।*
वह कमरा अब उन्नीस सौ बयालीस का कमरा था।
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### कमरे की स्मृति
कबीर धीरे-धीरे चलकर कमरे के बीच में पहुँचा। उसके पैरों के नीचे की मिट्टी सचमुच की लग रही थी, ठंडी और हल्की-सी नम। उसने झुककर उसे छुआ। उसकी उँगलियों पर राख का एक महीन निशान आ गया।
कमरे के एक कोने में एक पुराना ग्रामोफ़ोन रखा था, पीतल की चौड़ी भोंपू वाली मशीन, जिसकी सुई पहले से रिकॉर्ड पर टिकी हुई थी। पास ही एक हारमोनियम रखा था, उसकी पेटी पर धूल की मोटी परत थी, पर एक चाबी, सिर्फ़ एक, चमक रही थी, जैसे कोई बार-बार उसे दबाता रहा हो।
कबीर ने काँपते हाथ से वह चाबी दबाई।
एक लंबा, धीमा सुर कमरे में गूँजा। वह अपने आप में पूरा था, पर उसमें कुछ ऐसा था जो कानों को चुभ रहा था, जैसे वह सुर किसी और के गले का हो, किसी दर्द में डूबा हुआ।
और तभी, कमरे के दूसरे सिरे से किसी ने उसी सुर को दोहराया।
कबीर ने झटके से मुड़कर देखा।
दरवाज़े के पास, अँधेरे के कोने में, एक छोटी-सी आकृति खड़ी थी। सफ़ेद सलवार-कमीज़ में, बाल खुले हुए, दोनों बाँहें अपने सीने पर लपेटे हुए जैसे ठंड से काँप रही हो।
उसका चेहरा धुँधला था, पर कबीर को पहचानने में एक पल भी नहीं लगा।
उसके होंठ हिले, पर बिना आवाज़ के। उसने बहन का नाम पुकारा, जितना उसका गला दे सकता था, पर बस हवा निकली।
अनन्या ने सिर हिलाया, जैसे कह रही हो कि वह समझ रही है। उसकी आँखों में आँसू थे। वह एक क़दम आगे बढ़ी और उसका हाथ उठा, उसकी तरफ़ बढ़ा।
कबीर ने भी अपना हाथ बढ़ाया।
उँगलियाँ छूने ही वाली थीं कि अनन्या का रूप काँपने लगा, जैसे पानी में उसकी परछाईं हिल रही हो। उसने जल्दी-जल्दी अपने होंठ हिलाए। कबीर ने उसके होंठ पढ़ने की कोशिश की। उसकी बहन के होंठ, जिन्हें उसने बचपन से पढ़ना सीखा था, क्योंकि वह जब शरारत में कुछ कहती थी तो आवाज़ को दबाकर सिर्फ़ मुँह हिलाती थी।
*"नी... चे..."*
कबीर ने सिर हिलाकर इशारा किया कि क्या।
*"नीचे। भैया। नीचे। वहाँ... दरवाज़ा।"*
अनन्या ने अपनी उँगली फ़र्श की तरफ़ उठाई। उसके चेहरे पर डर था, एक गहरा और जमकर पत्थर हो चुका डर।
और तभी उसकी आँखें कबीर के पीछे गईं। उसकी पुतलियाँ फैल गईं।
कबीर को पीछे से एक भारी साँस की आवाज़ सुनाई दी। बहुत क़रीब से, उसकी गर्दन के ठीक ऊपर।
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### भागो
कबीर ने पीछे मुड़कर देखने का जोखिम नहीं उठाया। उसने बस दौड़ लगा दी।
कमरे के दरवाज़े से बाहर वह गलियारे में कूदा। गलियारा वही था, पर अब उसकी दीवारों पर पुरानी कंदील टँगी थीं, जिनकी धीमी पीली रोशनी में लंबे साये झूल रहे थे। सीढ़ियाँ भी वही थीं, पर लकड़ी की, चरमराती हुई।
उसके पीछे से भारी क़दमों की आवाज़ आ रही थी, धम, धम, धम, और वे क़दम तेज़ नहीं थे। वे बस उसके हर क़दम के साथ लय में थे, जैसे कोई उसे इत्मीनान से नीचे उतारना चाहता हो।
कबीर सीढ़ियाँ फाँदता हुआ नीचे पहुँचा। दूसरी मंज़िल, पहली मंज़िल, ज़मीन। वह इमारत के मुख्य दरवाज़े से सीधा बाहर निकला और सड़क पर गिर पड़ा।
सड़क सुनसान थी। पीली स्ट्रीट लाइट के नीचे सब कुछ साफ़ था। सामने इमारत का गेट खुला था, और गेट के पास छोटी-सी केबिन में एक बल्ब जल रहा था।
कबीर हाँफता हुआ उठा। उसने पलटकर इमारत की ओर देखा। तीसरी मंज़िल की उस खिड़की में, जहाँ से वह भागा था, एक लंबा काला साया खड़ा था, उसकी दो लाल आँखें अँधेरे में चमक रही थीं। साया उसे देख रहा था। पर वह नीचे नहीं आया। वह बस देखता रहा, जैसे वह जानता हो कि कबीर कहाँ जाएगा।
कबीर केबिन की तरफ़ लड़खड़ाता हुआ गया।
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### दिनकर काका
केबिन में बूढ़े दिनकर काका बैठे थे, पर वे सोए नहीं थे। उनके सामने स्टोव पर पीतल की केतली चढ़ी थी और उनके हाथ में एक पुरानी, मुड़ी-तुड़ी माला थी। जब उन्होंने कबीर को देखा तो वे ज़रा भी चौंके नहीं।
"आ गए, साहब?" उन्होंने धीरे से कहा। "बैठिए। आज आप अंदर चले गए थे।"
कबीर ने उन्हें हैरानी से देखा। उसने जेब से पैड निकाला और लिखा: *"आपको कैसे पता?"*
दिनकर ने उसका गूँगापन देखकर कोई हैरानी नहीं जताई। उसने बस एक गहरी साँस ली। "आपकी आवाज़ गई, फिर आप अंदर गए। यह क्रम मैंने कई बार देखा है।"
उन्होंने केतली से दो कुल्हड़ों में चाय डाली और एक कबीर की तरफ़ बढ़ा दिया। कबीर के हाथ काँप रहे थे, पर चाय की गरमाहट ने उसे कुछ राहत दी।
"मैंने आपसे पूरा सच नहीं बताया था, साहब," दिनकर ने नज़रें झुकाकर कहा। "मैं इस इमारत का चौकीदार हूँ, पर मैं सिर्फ़ चौकीदार नहीं हूँ।"
कबीर ने पैड पर लिखा: *"तो आप कौन हैं?"*
"मेरे पिता, गणपत राव, पंडित रघुनाथ वैद्य के नौकर थे। वैद्य जी को मैंने कभी नहीं देखा, पर पिताजी ने मुझे सब कुछ बताया था। वैद्य जी बहुत पहुँचे हुए आदमी थे, पर उनमें एक लालच था। उन्हें सुरों से इतना प्रेम था कि वे चाहते थे कि उनकी आवाज़ कभी न मरे। उसी के लिए उन्होंने एक साधना की।"
कबीर ध्यान से सुनता रहा।
"उस साधना में उन्होंने किसी शक्ति को बुलाया। कहते हैं, वह शक्ति आवाज़ों को खाती है। उसका नाम किसी को नहीं पता, पर पुराने लोग उसे *नादभक्षी* कहते थे। वैद्य जी ने उससे सौदा किया। कि मुझे अमर आवाज़ दे। पर नादभक्षी ने कहा कि हर वरदान की क़ीमत होती है। अमर आवाज़ की क़ीमत सात आवाज़ें हैं, हर बारह बरस पर एक।"
कबीर के हाथ से कुल्हड़ गिरते-गिरते बचा।
*"पहला नाम वैद्य जी का ही था,"* उसने जल्दी से लिखा, *"भोला की डायरी में।"*
दिनकर ने कुछ पल चुप रहकर सिर हिलाया। "हाँ। वैद्य जी इस सौदे के पहले शिकार थे। नादभक्षी ने उनकी आवाज़ पहले ली, और फिर उसी आवाज़ का चेहरा पहनकर वह बाहर आया। जो आपको दिखता है, साहब, वह वैद्य जी का साया है, पर वह वैद्य जी नहीं है। वह वह चीज़ है जो उनकी आवाज़ पहनकर आज़ाद घूमती है।"
कबीर का सिर घूमने लगा। यह सब किसी बुरे सपने की तरह लग रहा था, पर उसके गले में जो ख़ालीपन था, वह सपना नहीं था।
"मेरे पिता ने नीचे एक दरवाज़ा बनवाया था," दिनकर ने आगे कहा, "बेसमेंट में। वैद्य जी के कहने पर। सात ताले हैं उस पर। जब तक सातों ताले आवाज़ों से भर नहीं जाते, नादभक्षी पूरी तरह बाहर नहीं आ सकता। इसलिए वह हर बारह साल पर एक आवाज़ लेकर एक ताला भरता है, अपनी ओर।"
*"और अनन्या?"* कबीर ने काँपती उँगलियों से लिखा। *"वह ज़िंदा है?"*
दिनकर की आँखें गीली हो गईं। "साहब, मैं झूठ नहीं बोलूँगा। मुझे नहीं पता। पर इतना जानता हूँ कि सातवाँ ताला आज तक पूरा नहीं भरा। कोई चीज़ उसे रोके हुए है। और वह चीज़ आपकी बहन के भीतर है।"
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### सुबह का इरादा
सुबह होते-होते ईशान आ गया। कबीर ने रात भर उसे मैसेज किए थे और उसे शायद रास्ते में ही कहीं कुछ ऐसा लगा कि वह बिना जवाब का इंतज़ार किए चल पड़ा था। केबिन में उसने कबीर को देखा और राहत की साँस ली।
कबीर ने पैड पर पूरी बात लिखकर उसे दी। ईशान ने पढ़ा और दिनकर की तरफ़ देखा।
"आपके पास उस दरवाज़े की चाबी है?"
दिनकर ने अपनी जेब से एक काली, भारी-सी चाबी निकाली, जिस पर ज़ंग लग चुका था। "यह सिर्फ़ बाहरी फाटक की है। असली दरवाज़ा चाबी से नहीं खुलता।"
"तो फिर?"
"आवाज़ से।"
कबीर और ईशान ने एक-दूसरे की तरफ़ देखा। कबीर के चेहरे पर एक कड़वी, उलझी हुई मुस्कान उभरी। *आवाज़ से।* और उसके पास आवाज़ नहीं थी।
"फिर भी देखना चाहिए," ईशान ने कहा। "हो सकता है कुछ और रास्ता निकल आए।"
दिनकर उन्हें इमारत के पिछवाड़े की ओर ले गया। एक पुरानी लोहे की जाली के पीछे, झाड़ियों से ढकी हुई, नीचे उतरती सीढ़ियाँ थीं। जाली पर मोटा ताला लगा था। दिनकर ने चाबी लगाई और वह चरमराते हुए खुल गया।
"मैं यहीं रहूँगा," उसने कहा। "पिताजी ने कसम दिलाई थी कि मैं उस दरवाज़े के आगे कभी न जाऊँगा।"
ईशान ने मोबाइल की टॉर्च जलाई और कबीर के आगे-आगे सीढ़ियाँ उतरने लगा।
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### सात ताले का दरवाज़ा
बेसमेंट में हवा भारी और गाढ़ी थी, जैसे किसी ने उसे सालों से बंद करके रखा हो। दीवारों पर पानी के रिसने के निशान थे और छत से पुरानी मकड़ी के जाले लटक रहे थे। एक लंबा, सँकरा गलियारा था जो सीधा आगे जाकर एक दरवाज़े पर ख़त्म होता था।
गलियारे के फ़र्श पर धूल की मोटी, मुलायम परत बिछी थी, और उस परत में क़दमों के निशान थे।
ईशान ने टॉर्च नीचे झुकाई। निशान सैकड़ों थे, एक-दूसरे पर चढ़े हुए, कुछ बहुत पुराने और धुँधले, कुछ अपेक्षाकृत ताज़ा। वे सब एक ही दिशा में जा रहे थे, दरवाज़े की ओर।
"कोई वापस नहीं लौटा," ईशान ने धीमे से कहा। "देख, सारे निशान अंदर की तरफ़ हैं।"
कबीर घुटनों के बल बैठ गया। निशान नंगे पैरों के थे। बड़े, छोटे, चौड़े, पतले। मर्दों के, औरतों के, एक-दो इतने छोटे कि बच्चों के लगते थे। पर सबसे ऊपर, दीवार के पास, धूल पर एक नया निशान था, इतना ताज़ा कि उसके किनारे अब तक टूटे नहीं थे। एक जोड़ी छोटे, पतले, नंगे पैर।
कबीर ने काँपती उँगली से उसकी लंबाई नापी। उसकी हथेली से बस थोड़ा-सा ही लंबा। उसे याद आया कि अनन्या के पाँव हमेशा बहुत छोटे रहे थे, इतने कि वह बड़ी होकर भी बच्चों के नाप के जूते ख़रीदती थी, और मज़ाक में कहती थी कि उसका सारा सुर पैरों से नहीं, गले से आता है।
ईशान ने उसके कंधे पर हाथ रखा। "यह कल रात का निशान है, या शायद आज सुबह का। मतलब वह यहाँ तक आती है, कबीर।"
कबीर ने सिर हिलाया, पर आँखें उस निशान से हटा नहीं पाया।
पास की दीवार पर किसी नुकीली चीज़ से खुरचकर सात खड़ी लकीरें खींची गई थीं। उनमें से छः पर आड़ी लकीर कटी हुई थी, गिनती की तरह, और सातवीं बिना कटी, अधूरी। उनके नीचे पुरानी देवनागरी में एक पंक्ति उकेरी थी:
*"यहाँ आवाज़ें सोती हैं। इन्हें जगाना मना है।"*
आदतन, जैसे वह हर नई जगह पर करता था, कबीर ने अपने फ़ोन में स्पेक्ट्रम एनालाइज़र ऐप खोल लिया। स्क्रीन पर एक अकेली ऊँची लकीर उभरी, सबसे बाएँ किनारे, उन आवृत्तियों में जहाँ इंसानी कान कुछ सुन नहीं सकता। उसने उसके नीचे लिखा आँकड़ा पढ़ा और उसकी साँस थम गई।
*17 हर्ट्ज़।*
उसने स्क्रीन ईशान की तरफ़ घुमाई। ईशान ने झुककर देखा और धीरे से बोला, "इन्फ्रासाउंड। इतनी नीची आवृत्ति कि सुनाई नहीं देती, पर शरीर पर असर करती है। इससे बेचैनी होती है, डर लगता है, कभी-कभी लोगों को साये भी दिखने लगते हैं।"
कबीर ने पैड पर लिखा, एक-एक अक्षर ठहरकर: *"यह डर पैदा करने के लिए नहीं है। यह दरवाज़े की धड़कन है। सत्रह हर्ट्ज़। तीन बजकर सत्रह।"*
ईशान कुछ नहीं बोला। उसकी टॉर्च की रोशनी अब हल्की-हल्की काँप रही थी, जैसे गलियारे की हवा में कोई अदृश्य लहर चल रही हो।
वह दरवाज़ा लोहे का था, काला और मोटा, लगभग आठ फ़ुट ऊँचा। उस पर कोई हैंडल नहीं था, न कोई कुंडी, न कोई ताला। पर उसके बीचोंबीच एक गोलाकार नक़्क़ाशी थी, जिसमें सात छोटे-छोटे वृत्त उकेरे गए थे, एक बड़े वृत्त के भीतर।
छः वृत्तों में पीतल की छोटी-छोटी तश्तरियाँ जड़ी थीं, जिन पर नाम खुदे थे। ईशान ने टॉर्च से देखा और धीरे-धीरे पढ़ा:
*रघुनाथ वैद्य। सावित्री। मुरलीधर। गुलशन। रमेश। मंजुला।*
सातवाँ वृत्त अधूरा था। उसमें तश्तरी तो लगी थी, पर वह आधी पिघली हुई-सी थी, उसके किनारे टूटे हुए, और उस पर खुदे अक्षर अधूरे थे: *"अनन्…"*
कबीर ने उस तश्तरी को छुआ।
उसकी उँगलियों में अचानक एक झनझनाहट दौड़ गई। पीतल ठंडा नहीं था, वह गरम था, जैसे उसके भीतर कोई धड़कन चल रही हो।
और फिर उसे सुनाई दिया।
पहले तो कुछ नहीं। फिर बहुत महीन, बहुत धीमी, छः अलग-अलग आवाज़ें, जो दरवाज़े के पीछे से आ रही थीं। एक बूढ़ी औरत का भजन, किसी मर्द का कथावाचन का गूँजता स्वर, किसी की ग़ज़ल, किसी की बाँसुरी जैसी साँस, किसी की लोरी। सब एक-दूसरे में गुँथकर एक अजीब, डरावना-सा संगीत बना रही थीं।
और उन सबके बीच, सबसे कमज़ोर, सबसे टूटी हुई, एक सातवीं आवाज़। उसने कोई गीत नहीं गाया, कोई शब्द नहीं बोला। वह बस *आह* भर रही थी।
कबीर अपनी बहन को पहचान गया।
उसने दरवाज़े पर अपनी हथेली पूरी तरह चिपका दी। उसके गले से आवाज़ नहीं निकली, पर उसका पूरा शरीर काँप रहा था। वह कुछ कहना चाहता था, कुछ ऐसा जो उसकी बहन तक पहुँच जाए।
ईशान ने उसके कंधे पर हाथ रखा। "तू सुन रहा है उसे?"
कबीर ने हाँ में सिर हिलाया।
"मुझे सिर्फ़ ठंडी हवा महसूस हो रही है," ईशान ने कहा। "पर मैं तेरे साथ हूँ।"
तभी दरवाज़े पर खुदे वृत्तों में हल्की-सी चमक उठी। सातवें वृत्त की आधी तश्तरी पर नए अक्षर उभरने लगे, जैसे कोई उन्हें भीतर से जला रहा हो।
पहले एक अक्षर। फिर दूसरा। फिर तीसरा।
*"क… बी… र…"*
ईशान पीछे हट गया। कबीर ने हाथ खींचने की कोशिश की, पर उसकी हथेली दरवाज़े से चिपक गई थी, जैसे चुंबक से खिंची हो। उसकी नसों में कुछ खिंच रहा था, कोई अदृश्य चीज़ उसके भीतर से बाहर रिस रही थी।
"कबीर!" ईशान ने उसका हाथ पकड़कर खींचा। "हाथ हटा!"
पूरी ताक़त लगाकर दोनों ने मिलकर कबीर का हाथ दरवाज़े से छुड़ाया। कबीर लड़खड़ाकर पीछे गिरा, उसकी हथेली पर एक जली हुई गोल छाप उभर आई थी, ठीक वैसी जैसी दरवाज़े पर उकेरी थी।
ईशान ने टॉर्च दरवाज़े पर घुमाई। सातवें वृत्त में अब पूरा नाम उभर चुका था:
*कबीर।*
और नाम के नीचे एक छोटी-सी तारीख़, जो धीमे-धीमे चमक रही थी:
*14 अक्टूबर, 2026।*
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### दरवाज़े के पीछे की आवाज़
कबीर ज़मीन पर बैठा अपनी जली हुई हथेली को देख रहा था। उसमें दर्द नहीं था, बस एक अजीब-सी ख़ामोश ठंडक थी।
ईशान उसके पास बैठ गया। "सुन, यह दरवाज़ा तुझे बुला रहा है। पर इसका मतलब है कि तेरे पास भी कुछ है जो यह चाहता है, और जो तू इस्तेमाल कर सकता है।"
कबीर ने पैड पर लिखा: *"मेरे पास आवाज़ ही नहीं है।"*
"आवाज़ नहीं है, पर तेरे पास कान हैं," ईशान ने कहा। "तू आवाज़ों का इंजीनियर है। तू जानता है कि उन्हें कैसे पकड़ा जाता है, कैसे सँवारा जाता है। अगर यह दरवाज़ा आवाज़ों से खुलता है, तो शायद उसे खोलने के लिए तुझे अपनी आवाज़ की ज़रूरत नहीं, उन छः आवाज़ों की ज़रूरत है जो उसके भीतर क़ैद हैं।"
कबीर ने उसे ग़ौर से देखा।
"सोच," ईशान ने आगे कहा। "छः लोगों की आवाज़ें ले ली गईं। पर उनकी रिकॉर्डिंग्स कहीं तो होंगी। उनके परिवार, उनके चाहनेवाले, पुराने रेडियो, पुराने रिकॉर्ड। अगर तू उन रिकॉर्डिंग्स को ढूँढ़कर, एक में जोड़ सके..."
"एक सुर की चाबी," कबीर के होंठों ने बिना आवाज़ के कहा।
ईशान ने सिर हिलाया। "वैद्य जी का सौदा आवाज़ का था, तो उसका ताला खोलने की कुंजी भी आवाज़ में ही होगी। और तेरे जितना यह काम कोई नहीं कर सकता।"
कबीर के भीतर एक धीमी, पर दृढ़ आग जल उठी। वह पहली बार इस पूरी जकड़न में कोई रास्ता देख रहा था। उसने पैड पर तेज़ी से लिखा:
*"आठ दिन बाकी हैं। छः आवाज़ें ढूँढ़नी हैं।"*
"हम ढूँढ़ेंगे," ईशान ने कहा।
तभी ईशान का फ़ोन बज उठा। उसने स्क्रीन देखी और चेहरा कस गया। "अस्पताल से है।"
उसने कॉल उठाया। उसका चेहरा सुनते-सुनते धीरे-धीरे सफ़ेद पड़ने लगा।
"क्या? कितने? ... मैं आ रहा हूँ।" उसने फ़ोन काटा।
कबीर ने सवालिया निगाह से उसे देखा।
"मेरे वार्ड के मरीज़," ईशान ने बमुश्किल कहा। "वे सारे, जो गूँगे हो चुके हैं। ग्यारह के ग्यारह। नर्सों ने बताया कि वे सब रात के तीन बजकर सत्रह मिनट पर अपने बिस्तरों से उठे और एक साथ वार्ड के बीच में आकर खड़े हो गए।"
"फिर?"
ईशान ने काँपती हुई आवाज़ में कहा, "फिर वे सब एक साथ गुनगुनाने लगे। बिना आवाज़ के, पर उनके होंठ हिल रहे थे। और नर्सें कहती हैं कि पूरे वार्ड में किसी लोरी की धुन गूँज रही थी, जैसे हवा ख़ुद गा रही हो।"
कबीर का रक्त जम गया।
"वह लोरी," ईशान ने धीरे से पूछा, "तू पहचानता है?"
कबीर के चेहरे का रंग उड़ चुका था। उसने सिर हिलाया। हाँ।
यह वही लोरी थी जो अनन्या टेप में गा रही थी। वही जो उनकी माँ उन्हें सुलाने के लिए गाती थी।
कबीर ने दरवाज़े की तरफ़ पलटकर देखा। सातवें वृत्त के भीतर उसका नाम हल्के-हल्के धड़क रहा था, मानो कोई दिल वहाँ क़ैद हो।
और दरवाज़े के पीछे से, बहुत दूर से, एक बच्ची की लोरी की धुन उठने लगी।
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**(जारी है... अगला एपिसोड: "सुर की चाबी")**
- Writer
- firoj saifi
- Story
- मुझे आवाज़ किसने दी?
- Chapter
- 4 of 5
- Category
- Horror Poetry
- Reading time
- 16 min
- Words
- 3029
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
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