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एपिसोड 3 — गूँगा गवाह

firoj saifi · Horror Poetry · 15 मिनट

सन्नाटे का भी एक वज़न होता है।

यह बात कबीर ने अपनी पूरी ज़िंदगी में कभी नहीं जानी थी, जबकि वह आवाज़ों के बीच रहकर बड़ा हुआ था। साउंड इंजीनियर के लिए ख़ामोशी एक औज़ार थी, कुछ ऐसा जिसे वह जब चाहे रिकॉर्डिंग में जोड़ता या हटाता था। पर आज, उस रात के बाद, ख़ामोशी उसकी साँसों पर चढ़ी बैठी थी।

वह पूरी रात फ़र्श पर बैठा रहा, मुँह खोलकर, गला फाड़कर चीख़ने की कोशिश करता रहा। हर बार वही नतीजा। होंठ हिलते थे, गर्दन की नसें तन जाती थीं, छाती धौंकनी की तरह चलती थी, पर कमरे में एक भी स्वर नहीं गूँजता था।

सुबह जब खिड़की से रोशनी आई तो उसने काँपती उँगलियों से फ़ोन उठाया। इस बार फ़ोन चालू था। उसने ईशान को मैसेज किया, उँगलियाँ इतनी तेज़ चल रही थीं कि दो बार ग़लत अक्षर दब गए:

*"ईशान, मेरी आवाज़ चली गई। अभी आ।"*

जवाब में ईशान का फ़ोन आया, पर कबीर फ़ोन उठा नहीं सकता था। वह बोलता कैसे? उसने मैसेज भेजा: *"फ़ोन पर नहीं। आ जा।"*

बीस मिनट में ईशान दरवाज़े पर था। उसे देखते ही कबीर की आँखें भर आईं।

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### डॉक्टर की जाँच

ईशान ने बिना कुछ पूछे अपना बैग रखा और कबीर का गला जाँचना शुरू किया। उसने टॉर्च से उसके गले के भीतर झाँका, उँगलियों से गर्दन के दोनों तरफ़ दबाकर देखा, नब्ज़ गिनी, पुतलियाँ देखीं।

"खाँसकर देख," उसने कहा।

कबीर ने खाँसने की कोशिश की। खाँसी की आवाज़ भी नहीं आई। सिर्फ़ हवा की एक हल्की-सी फूँक।

ईशान कुछ पल चुप रहा। फिर उसने कबीर के हाथ में उसका नोट पैड थमाया। "लिख। कल रात क्या हुआ, सब कुछ।"

कबीर ने जल्दी-जल्दी लिखना शुरू किया। साया, लाल आँखें, काग़ज़ पर दस्तख़त, और उसके शब्द: *पहली क़िस्त, बाकी चौदह को।* ईशान पढ़ता रहा, और पन्ना पलटते-पलटते उसकी भौंहें और कसती गईं।

जब कबीर ने आख़िरी पंक्ति लिखी, *"अनन्या की आवाज़ का सौदा मैंने किया था"*, ईशान ने उसके कंधे पर हाथ रखा।

"तूने नहीं किया," उसने कहा। "तुझे धोखे से फँसाया गया। बारह साल पहले तू बीस-बाईस साल का लड़का था। तुझे किसी ने बरगलाया।"

कबीर ने पन्ने पर लिखा: *"पर मैंने साइन किए। उस वजह से वह उसे ले गया।"*

"किसी ने कुछ किया है तो उसकी ग़लती उस पर है, तुझ पर नहीं।" ईशान की आवाज़ में दृढ़ता थी। "मैं इसे ऐसे नहीं मान सकता कि तू ख़ुद को सज़ा देता रहे।"

कबीर ने पन्ना पलटा और लिखा: *"तू मानता है यह सब? भूत, साये, आवाज़ों का सौदा?"*

ईशान ने गहरी साँस ली। "मैं डॉक्टर हूँ। मेरी पूरी ट्रेनिंग मुझे कहती है कि ऐसी चीज़ें नहीं होतीं। पर मैं यह भी जानता हूँ कि ग्यारह लोग मेरे अस्पताल में ऐसे आए हैं जिनके गले में कोई ख़राबी नहीं, और बारहवाँ मेरे सामने बैठा है। जब सारे सबूत एक ही तरफ़ इशारा करें तो मैं अपनी किताबों की ज़िद पकड़कर नहीं बैठ सकता।"

उसने कबीर के हाथ से पैड लेकर अपनी जेब में रख लिया। "अब बता, तुझे क्या करना है? क्योंकि मुझे पता है तू चुपचाप बैठने वाला नहीं।"

कबीर ने पैड वापस लिया और एक ही पंक्ति लिखी:

*"मुझे उस आदमी को ढूँढ़ना है जिसने कॉन्ट्रैक्ट दिया था।"*

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### कागज़ का आदमी

कबीर को उस आदमी का नाम याद था। *आलोक सेठ*। वह ख़ुद को *स्वरलोक रिकॉर्ड्स* का एजेंट बताता था, एक चमकदार सूट में, चेहरे पर हमेशा चिपकी हुई मुस्कान, और एक सुनहरी घड़ी जिसकी सुइयाँ उल्टी दिशा में घूमती थीं।

उस वक़्त कबीर ने इस बात पर ध्यान नहीं दिया था। अब याद करने पर उसे लगा कि वह घड़ी ही पहली निशानी थी।

ईशान ने अपने लैपटॉप पर खोज शुरू की। *स्वरलोक रिकॉर्ड्स, पुणे, बारह साल पहले।* एक घंटे की खोज के बाद भी कुछ नहीं मिला। न कोई वेबसाइट, न कोई रजिस्ट्रेशन, न कोई पुराना विज्ञापन, न किसी अख़बार में नाम।

"ऐसा कोई लेबल कभी था ही नहीं," ईशान ने थककर कहा।

कबीर ने लिखा: *"मेरे पास उसका विज़िटिंग कार्ड था। शायद कहीं रखा हो।"*

वह उठा और अनन्या के पुराने डिब्बे की तरफ़ गया। कैसेट, चेन और तस्वीर के नीचे एक मुड़ा हुआ भूरा लिफ़ाफ़ा था। उसने आज तक उसे नहीं खोला था, क्योंकि उसे यह उस रात की अनन्या के कमरे से मिला था, जब पुलिस उसकी चीज़ें खँगाल रही थी।

लिफ़ाफ़े में एक कार्ड था। मोटा, क्रीम रंग का, किनारों पर सुनहरी रेखा। उस पर नाम छपा था, पर अक्षर देखते-देखते धुँधले हो रहे थे, जैसे स्याही हवा में घुल रही हो। कबीर और ईशान दोनों ने देखा कि नाम पढ़ पाने के पहले ही अक्षर आधे ग़ायब हो गए।

पर कार्ड के पीछे हाथ से लिखा एक पता बचा था, बारीक अक्षरों में:

*"गणेश घाट, पुराना चायख़ाना, बुधवार पेठ।"*

कबीर को चायवाला याद आया। वह भी बुधवार पेठ के पास ही था।

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### पुराना चायख़ाना

बुधवार पेठ की तंग गलियों में बारह साल की धूल जमी थी। जिस जगह कभी वह चाय की दुकान थी, वहाँ अब एक मोबाइल रिपेयर की दुकान खुल चुकी थी। कबीर ने ईशान की तरफ़ देखा, और ईशान ने दुकान के मालिक से पूछा, "भाई, यहाँ पहले एक चायवाला बैठता था, रात को भी खुला रहता था। उसका कुछ पता है?"

मालिक ने कंधे उचकाए। "मैं तो यहाँ पाँच साल से हूँ।"

पर पास की पान की दुकान पर बैठा एक बुज़ुर्ग, जो तब से सब कुछ सुन रहा था, बोल पड़ा, "भोला की बात कर रहे हो, बाबू?"

कबीर ने जल्दी से सिर हिलाया।

"भोला चायवाला," बुज़ुर्ग ने सिर हिलाते हुए कहा। "बेचारा। उसकी दुकान सालों पहले बंद हो गई। कहते हैं एक रात उसकी आवाज़ चली गई, और उसके बाद पागलों जैसा हो गया। आजकल गणेश घाट पर भिखारियों के साथ बैठता है। किसी से कुछ कहता नहीं। गूँगा है, पर आँखें ऐसी हैं कि..."

बुज़ुर्ग ने बात अधूरी छोड़ दी।

कबीर और ईशान एक-दूसरे को देखते रहे। उसके बाद वे बिना देर किए घाट की ओर चल पड़े।

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### गणेश घाट

शाम ढल रही थी और नदी के किनारे बने पत्थर के घाट पर भीड़ कम होने लगी थी। सीढ़ियों पर कुछ भिखारी लेटे थे, कुछ साधु चिलम पी रहे थे। ईशान ने एक-एक चेहरे को देखा।

"वह रहा," उसने धीरे से कहा।

घाट की आख़िरी सीढ़ी पर, पानी के बिल्कुल पास, एक दुबला-पतला आदमी बैठा था। उसके बाल उलझे हुए थे, दाढ़ी बेतरतीब, और कपड़े चिथड़ों से ज़्यादा कुछ नहीं। उसकी पीठ उनकी तरफ़ थी और वह पानी में पत्थर फेंक रहा था। एक-एक करके, लगातार, बिना रुके।

कबीर आगे बढ़ा और उसके पास बैठ गया। उसने उसके कंधे को हल्के से छुआ।

भोला मुड़ा। उसकी आँखें धँसी हुई थीं और किसी बहुत गहरी, बहुत पुरानी थकान से भरी थीं। पर जब उसने कबीर को देखा, तो उन आँखों में एक पल के लिए रोशनी कौंधी। उसने कबीर को पहचान लिया।

भोला का मुँह खुला, जैसे वह कुछ कहना चाहता हो। कोई आवाज़ नहीं निकली। फिर उसने अपने गले की तरफ़ इशारा किया, फिर कबीर के गले की तरफ़। उसके चेहरे पर एक दर्द-भरी समझ थी, जैसे वह कबीर के बिना कहे सब जान गया हो।

कबीर ने जेब से पैड निकाला और लिखा: *"आलोक सेठ कौन है? वह कहाँ मिलेगा?"*

नाम पढ़ते ही भोला के हाथ काँपने लगे। उसने पैड उसके हाथ से लगभग छीन लिया और पेन से कुछ लिखने की कोशिश की। उसकी लिखावट टेढ़ी, अनपढ़-सी, पर साफ़ थी:

*"वह इंसान नहीं है।"*

कबीर ने ईशान की तरफ़ देखा। ईशान ने धीरे से पढ़ा और उसके चेहरे पर कोई हैरानी नहीं आई। जैसे वह भी यही मानने लगा था।

भोला ने आगे लिखा: *"मैंने तुम्हें चाय दी थी। उसने मुझे मजबूर किया था। उसने कहा था, बस दस मिनट के लिए उसे बाहर रखना। उसके बदले मेरी बेटी का इलाज..."*

वह रुका। उसकी आँखों से आँसू बहने लगे। कबीर ने उसके कंधे पर हाथ रखा।

भोला ने लिखा: *"मेरी बेटी बच गई। पर मेरी आवाज़ गई। और तुम्हारी बहन..."*

पर पन्ना ख़त्म हो गया था। कबीर ने जल्दी से नया पन्ना खोला और भोला ने आगे लिखना जारी रखा।

*"मैं माफ़ी के लायक नहीं हूँ। पर मेरे पास कुछ है जो तुम्हारे काम आएगा।"*

उसने अपने चिथड़े कुर्ते के भीतर हाथ डाला और एक पुरानी, फटी-सी डायरी निकाली। कवर तेल और मैल से काला पड़ चुका था। उसने काँपते हाथों से वह कबीर को थमा दी।

*"यह मेरी दुकान के नीचे गड़ी थी। उस आदमी का हिसाब है। मैंने चुपके से लिख लिया था जब वह आता था।"*

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### हिसाब की डायरी

कबीर ने वहीं घाट की सीढ़ी पर डायरी खोली। ईशान ने मोबाइल की टॉर्च जला दी।

पन्ने पीले और भुरभुरे थे। हर पन्ने पर कुछ नाम और तारीख़ें लिखी थीं, बहुत सँभालकर, बहुत बारीकी से। पहले तो कबीर को लगा कि यह कोई उधारी का खाता है, जैसा चायवाले रखते हैं। पर जैसे-जैसे उसने पढ़ा, उसकी साँस रुकती गई।

पहला नाम: *पंडित रघुनाथ वैद्य — गायन, मंत्र — 14 अक्टूबर, 1942।*

दूसरा नाम: *सावित्री बाई — भजन — 14 अक्टूबर, 1954।*

तीसरा: *मुरलीधर शास्त्री — कथावाचन — 14 अक्टूबर, 1966।*

चौथा: *गुलशन आरा — ग़ज़ल — 14 अक्टूबर, 1978।*

पाँचवाँ: *रमेश पाठक — बाँसुरी और स्वर — 14 अक्टूबर, 1990।*

छठा: *मंजुला देवी — लोरी, लोकगीत — 14 अक्टूबर, 2002।*

हर नाम के आगे एक साल, और हर साल के बीच ठीक बारह वर्ष का अंतर।

सातवाँ नाम, सबसे नीचे, ताज़ी स्याही में, बाकी सबसे अलग, मोटे अक्षरों में:

*अनन्या मल्होत्रा — गायन — 14 अक्टूबर, 2014।*

कबीर की उँगलियाँ पन्ने पर जम गईं। 2014। वह बारह साल पहले की तारीख़ थी, और अब साल 2026 था। हर बारह साल पर, चौदह अक्टूबर को, एक आवाज़।

ईशान ने गणित लगाया और उसका चेहरा सफ़ेद पड़ गया। "हर बारह साल में एक। सात आवाज़ें। और अब..."

"अगला," उसने धीमे से कहा। "अगला साल 2026 है।"

कबीर ने काँपते हाथ से पन्ना पलटा। सातवें नाम के नीचे एक अधूरी पंक्ति थी, किसी और स्याही में, किसी और हाथ से लिखी हुई, जो भोला की लिखावट से बिल्कुल अलग थी:

*"आठवाँ — कबीर मल्होत्रा — ध्वनि — 14 अक्टूबर, 2026।"*

कबीर के हाथ से डायरी गिरते-गिरते बची।

"आठवाँ," ईशान ने कहा। "वह तुझे आठवीं आवाज़ बनाने आया है।"

कबीर ने भोला की तरफ़ देखा। भोला ने चुपचाप सिर झुका लिया। उसने पैड पर आख़िरी बात लिखी:

*"जब तक सात आवाज़ें पूरी नहीं होतीं, वह बाहर नहीं आ सकता। छः ले चुका, सातवीं तेरी बहन। अब आठवीं की बारी है।"*

कबीर ने उलझकर लिखा: *"सात पूरी हो चुकीं? फिर आठवीं क्यों?"*

भोला ने कुछ पल सोचा, फिर लिखा:

*"सातवीं अधूरी रह गई थी। तेरी बहन ने उसे पूरी नहीं दी। वह अब भी अंदर लड़ रही है।"*

कबीर की आँखें फैल गईं। अनन्या अब भी लड़ रही थी। बारह साल बाद भी वह ज़िंदा थी, किसी रूप में, किसी जगह। उसकी आवाज़ पूरी तरह नहीं छीनी गई थी।

"इसका मतलब," ईशान ने धीरे से कहा, "वह सातवाँ ताला खोल नहीं पाया। इसलिए उसने तुझे चुना। तेरी आवाज़ से वह उस ताले को पूरा करेगा।"

कबीर ने पैड पर लिखा, बड़े और काँपते अक्षरों में:

*"अनन्या अभी भी मुझे बुला रही है। 'भाग जा' नहीं, 'बचा ले' कह रही है।"*

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### पीछा

अँधेरा घिर चुका था। ईशान ने भोला के हाथ में कुछ पैसे रखे और उसे कहा कि वह उनके साथ चले, पर भोला ने सिर हिलाकर मना कर दिया। उसने पानी की ओर इशारा किया, जैसे वही उसका घर हो।

कबीर और ईशान वापस सीढ़ियाँ चढ़ने लगे। डायरी कबीर के बगल में दबी थी।

"हमें किसी को बताना चाहिए," ईशान ने कहा। "पुलिस को।"

कबीर ने रुककर उसे देखा और पैड पर लिखा: *"तू बताएगा? कि एक भूत ने मेरी आवाज़ चुराई?"*

ईशान ने कुछ नहीं कहा। उसकी बात सही थी।

वे सड़क पर पहुँचे जहाँ ईशान की कार खड़ी थी। पर तभी कबीर को लगा कि कोई उनके पीछे है। उसने ठिठककर पीछे देखा।

घाट की सीढ़ियों पर कोई नहीं था। पर पानी के किनारे, जहाँ भोला बैठा था, वह जगह ख़ाली थी।

कबीर का दिल बैठ गया। वह दौड़कर वापस घाट की तरफ़ गया, ईशान उसके पीछे। सीढ़ी पर भोला के चिथड़े पड़े थे, और उसके पास पानी में एक पुराना, ख़ाली कुल्हड़ तैर रहा था।

भोला का कोई निशान नहीं था।

पानी की सतह पर हल्के-हल्के गोले बन रहे थे, जैसे किसी ने अभी-अभी कुछ फेंका हो। या कोई अभी-अभी अंदर गया हो।

ईशान ने घबराकर चारों तरफ़ देखा। "भोला! भोला!"

कोई जवाब नहीं आया।

और फिर, घाट की ख़ामोशी में, एक आवाज़ गूँजी। एक बेहद धीमी, बेहद ठंडी, परिचित आवाज़:

*"दूसरा गवाह भी चुप।"*

कबीर ने घूमकर देखा। घाट के ऊपरी छोर पर, एक पुराने पीपल के नीचे, एक लंबी आकृति खड़ी थी। चाँद की रोशनी में उसके हाथ में कुछ चमक रहा था, एक सुनहरी घड़ी, जिसकी सुइयाँ उल्टी घूम रही थीं।

"आलोक सेठ," ईशान ने फुसफुसाकर कहा।

आकृति ने घड़ी की तरफ़ देखा, फिर कबीर की तरफ़। उसके होंठों पर वही चिपकी हुई मुस्कान थी, जो बारह साल पहले थी, एक रत्ती भी बदली नहीं।

"नौ दिन बचे हैं, कबीर," उसने कहा, और उसकी आवाज़ पूरे घाट में अजीब तरह से फैल रही थी, जैसे हर पत्थर, हर पेड़, हर लहर से एक साथ बोल रही हो। "नौ दिन। फिर तू भी मेरा हिसाब बन जाएगा।"

कबीर ने अपनी पूरी ताक़त से चीख़ने की कोशिश की, पर कोई आवाज़ नहीं निकली।

ईशान ने उसका हाथ पकड़ा और खींचा। "भाग!"

वे दोनों सीढ़ियाँ दौड़कर चढ़ने लगे। पीछे से धीमी, ठंडी हँसी की आवाज़ आती रही। हँसी इतनी पास थी, जैसे वह उनके साथ-साथ दौड़ रही हो।

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### वापसी

कार में बैठते ही ईशान ने तेज़ी से गाड़ी स्टार्ट की। कबीर पैसेंजर सीट पर था, डायरी छाती से चिपकाए, साँसें बेतहाशा चल रही थीं।

पूरे रास्ते दोनों ख़ामोश रहे। ईशान ने उसे अपने घर ले जाने की पेशकश की, पर कबीर ने मना कर दिया। उसने पैड पर लिखा: *"मुझे अपने फ़्लैट जाना है। अनन्या वहीं है।"*

ईशान ने बहस नहीं की। उसने कबीर को इमारत के गेट पर छोड़ा और कहा, "मैं रात भर फ़ोन पास रखूँगा। कुछ भी हो, मैसेज कर देना। पूरा।"

कबीर ने सिर हिलाया।

वह सीढ़ियाँ चढ़ा। तीसरी मंज़िल का गलियारा हमेशा की तरह ख़ाली और ठंडा था। उसने ताला खोला और भीतर घुसा।

कमरा वैसा ही था जैसा उसने छोड़ा था। टूटी तस्वीर का फ़्रेम फ़र्श पर पड़ा था, दीवार पर अनन्या की लिखावट वैसी ही थी। कबीर ने बत्ती जलाई और बिस्तर पर बैठ गया।

उसके सामने पोर्टेबल रिकॉर्डर रखा था, वही जो उसने पहली रात चालू रखा था। उसने उसे उठाकर देखा। उस पर लाल बत्ती जल रही थी।

वह चालू था। जबकि उसने आज उसे हाथ भी नहीं लगाया था।

कबीर ने जल्दी से उसे लैपटॉप से जोड़ा और ताज़ा रिकॉर्डिंग खोली। फ़ाइल की लंबाई दस घंटे थी, यानी वह पिछली रात से लगातार चल रहा था। उसने उँगली से स्क्रीन पर वेवफ़ॉर्म घसीटा और बीच में एक जगह रुक गया।

एक लंबी लहर। ठीक उसी समय की जब वह घाट पर था।

*घाट पर था? तो फिर रिकॉर्डर ने इस कमरे में क्या रिकॉर्ड किया?*

उसने काँपते हाथ से प्ले दबाया।

पहले सन्नाटा। फिर दरवाज़े के खुलने की आहट। फिर किसी के चलने की आवाज़।

और फिर, एक आवाज़।

*"भैया?"*

कबीर का पूरा शरीर जम गया।

यह अनन्या की आवाज़ थी। पर इस बार वह टेप वाली आवाज़ नहीं थी। यह आज की, इसी रात की, इसी कमरे की आवाज़ थी।

*"भैया, तुम घर पर नहीं हो? मैं... मैं बाहर निकल पा रही हूँ, भैया। बस कुछ पल के लिए। तुम सुन रहे हो?"*

रिकॉर्डिंग में हल्की-हल्की साँसों की आवाज़ आई, जैसे कोई इधर-उधर चल रहा हो, कमरे की चीज़ों को छू रहा हो।

*"यहाँ सब वैसा ही है। तुम्हारी किताबें, वह पुरानी कुर्सी... भैया, मुझे बहुत ठंड लग रही है।"*

कबीर की आँखों से आँसुओं की धार बह निकली। वह वेवफ़ॉर्म पर उँगली रखे, स्क्रीन को छू रहा था, जैसे उसे सहला सकता हो।

*"भैया, एक बात सुनो। वह सातवाँ ताला अकेले मेरे पास नहीं है। उसकी चाबी..."*

आवाज़ अचानक रुक गई।

फिर रिकॉर्डिंग में एक भारी क़दम की आहट आई।

धम।

*"भैया, वह लौट आया। मैं..."*

एक दबी हुई चीख़। फिर सन्नाटा।

कबीर ने स्क्रीन को घूरा। रिकॉर्डिंग अब भी चल रही थी। लहरें आगे बढ़ती जा रही थीं।

और फिर उसमें एक नई आवाज़ आई, ऐसी जिसे सुनकर कबीर के सीने में दिल गिर पड़ा।

यह उसकी अपनी आवाज़ थी।

*"अनन्या को बहुत दर्द हो रहा है, कबीर।"*

रिकॉर्डिंग में, उसी की आवाज़ में, वही उसका लहजा, उसकी हल्की-सी बैठी हुई खनक।

*"तू उसे बचा सकता है। पर उसके लिए तुझे वह करना होगा जो तूने बारह साल पहले नहीं किया।"*

कबीर ने सिर हिलाकर अपना गला पकड़ा। वह बोलना चाहता था, पूछना चाहता था कि यह किसकी आवाज़ है। पर वह जानता था।

यह उसकी चुराई हुई आवाज़ थी। और अब वह उसी का इस्तेमाल करके उससे बात कर रही थी।

*"चौदह को आ जा, कबीर,"* उसकी अपनी आवाज़ ने कहा। *"सबसे नीचे की मंज़िल पर। बेसमेंट में। वहाँ दरवाज़ा है। सातवें ताले का दरवाज़ा।"*

रिकॉर्डिंग में एक लंबी साँस आई।

*"और अकेले आना।"*

रिकॉर्डिंग बंद हो गई।

कबीर कुर्सी पर पीछे की ओर ढह गया। उसके सामने स्क्रीन पर एक आख़िरी पंक्ति चमक रही थी, जिसे उसने पहले नहीं देखा था। फ़ाइल के मेटाडेटा में रिकॉर्डिंग का समय दर्ज था।

*"3:17 AM।"*

पर अभी रात के बस नौ बज रहे थे।

कबीर ने धीरे-धीरे सिर उठाकर घड़ी की तरफ़ देखा।

घड़ी में अब भी 9:04 PM ही हो रहे थे। पर उसके देखते-देखते, उसके सामने ही, लाल अंक अपने आप बदलने लगे।

9:05... 9:06...

फिर अंक तेज़ी से घूमने लगे, घंटे बीतते गए, और घड़ी ठहर गई।

*3:17 AM।*

कमरे में तापमान गिरने लगा। पर्दे बिना हवा के फड़फड़ाने लगे। और दीवार पर, पुरानी तस्वीर की ख़ाली जगह के पीछे, किसी के हल्के-हल्के हँसने की आवाज़ आई।

कबीर बिना आवाज़ के चीख़ा।

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**(जारी है... अगला एपिसोड: "बेसमेंट का दरवाज़ा")**

Writer
firoj saifi
Story
मुझे आवाज़ किसने दी?
Chapter
3 of 5
Category
Horror Poetry
Reading time
15 min
Words
2938
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

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