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एपिसोड 2 — अनन्या की आख़िरी रिकॉर्डिंग

firoj saifi · Horror Poetry · 19 मिनट

दीवार पर टंगी तस्वीर की आँखें पूरी तरह खुल चुकी थीं।

कबीर दरवाज़े पर खड़ा था, हाथ में वह पीली पर्ची थी और पैर जैसे फ़र्श में गड़ गए थे। तस्वीर में जो औरत अब तक एक धुँधली-सी परछाईं थी, अब साफ़ दिख रही थी। लंबे बाल, पीला पड़ा चेहरा, और दो आँखें जो सीधे उसी को देख रही थीं।

उसने तस्वीर को कई बार देखा था। तीन साल से वह इसी दीवार पर टंगी थी। मकान मालिक ने कहा था कि यह पुरानी चीज़ें हैं, हटाना मत, किराएदारों के जाने के बाद वापस लगानी पड़ती हैं। कबीर ने कभी ग़ौर नहीं किया था कि तस्वीर में कोई चेहरा है भी या नहीं।

अब वह चेहरा था। और वह अनन्या का नहीं था।

कबीर ने ख़ुद को हिम्मत देकर एक क़दम आगे बढ़ाया। "कौन हो तुम?" उसकी आवाज़ फुसफुसाहट से ज़्यादा नहीं थी।

तस्वीर की आँखें पलकें झपकाए बिना उसे देखती रहीं। फिर, जैसे किसी ने फ़िल्म का रील उलटा घुमा दिया हो, रंग फीके पड़ने लगे। चेहरा धुँधला हुआ, आँखें बंद हुईं और कुछ ही पल में तस्वीर फिर से एक आम, पुरानी, धूल भरी तस्वीर बन गई, जिसमें कोई नहीं था।

कबीर वहीं ज़मीन पर बैठ गया।

उसके पास दो विकल्प थे। या तो वह यह सब किसी बीमारी, थकान या भ्रम का नाम देकर आगे बढ़ जाए। या फिर वह उस दरवाज़े को खोले जिसे बारह साल से बंद रखा था।

उसने दूसरा चुना।

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### बारह साल पुरानी अलमारी

कबीर के फ़्लैट में एक अलमारी थी जिसे वह कभी नहीं खोलता था। बेडरूम के कोने में, सबसे नीचे वाला ख़ाना, जिस पर हमेशा ताला लगा रहता था। उसकी चाबी उसके गले की चेन में लटकती थी, एक छोटी-सी पीतल की चाबी, जिसे वह नहाते समय भी नहीं उतारता था।

उसने चेन से चाबी निकाली। ताला खोलते समय उसके हाथ इतने काँप रहे थे कि चाबी दो बार फिसल गई।

अंदर एक पुराना लकड़ी का डिब्बा था। डिब्बे में सबसे ऊपर अनन्या की एक तस्वीर रखी थी। वह हँस रही थी, बाल हवा में उड़ रहे थे, और उसके गले में वही चाँदी की छोटी सुरमई चेन थी जो कबीर ने उसे उसके अठारहवें जन्मदिन पर दी थी।

कबीर ने तस्वीर को उँगलियों से छुआ। बारह साल। बारह साल से उसने इसे नहीं देखा था।

तस्वीर के नीचे एक पुरानी कैसेट टेप रखी थी। उस पर काले मार्कर से लिखा था: *"अनन्या — आख़िरी रात — 14 अक्टूबर"*।

वह सिहर गया। आज 14 अक्टूबर नहीं था, पर इसमें सिर्फ़ दस दिन बाकी थे। दस दिन बाद उस रात को बारह साल पूरे होने वाले थे।

उसके पास कैसेट चलाने का कोई पुराना टेप-प्लेयर नहीं था। पर वह साउंड इंजीनियर था। उसने स्टूडियो के एक कोने से धूल में लिपटा एक पुराना डेक निकाला, जिसे वह यादगार के तौर पर रखता था। उसने उसे बिजली से जोड़ा। मशीन ने खाँसते हुए घरघराहट की आवाज़ दी, फिर चल पड़ी।

कैसेट डालने से पहले कबीर ने रुककर एक लंबी साँस ली। वह जानता था कि यह रिकॉर्डिंग उसे कहाँ ले जाएगी। उसने इसे बारह साल पहले सिर्फ़ एक बार सुना था, और उसके बाद कभी नहीं।

उसने प्ले का बटन दबाया।

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### वह रात

पहले कुछ सेकंड सिर्फ़ टेप की सरसराहट रही। फिर एक आवाज़ उभरी, एक नौजवान लड़के की, हँसती हुई।

*"ठीक है, मैं रिकॉर्डिंग शुरू कर रहा हूँ। चौदह अक्टूबर, रात ग्यारह बजकर पाँच मिनट। गायिका अनन्या मल्होत्रा। गाना, 'साँसों के पार'। टेक नंबर सात।"*

वह उसकी अपनी आवाज़ थी, बारह साल छोटी, बेफ़िक्र और ख़ुश।

फिर एक और आवाज़ आई। और कबीर की आँखें एकदम भर आईं।

*"भैया, तुम हर बार टेक नंबर सात क्यों कहते हो? पिछले छह टेक भी तो तुमने सातवाँ ही बोला था।"*

अनन्या की आवाज़ थी। वही हँसी, वही शरारत, वही मीठी चंचलता। बारह साल बाद पहली बार कबीर उसे सुन रहा था, और उसे लगा जैसे किसी ने उसके सीने पर पत्थर रख दिया हो।

*"क्योंकि सातवाँ टेक हमेशा सबसे अच्छा होता है,"* जवान कबीर ने जवाब दिया। *"चल, गा। और इस बार पूरी जान लगा देना। यह गाना तेरी ज़िंदगी बदल देगा।"*

टेप में कुछ पल की शांति रही। फिर हल्का-सा हारमोनियम बजा। और फिर अनन्या गाने लगी।

कबीर ने आँखें बंद कर लीं।

उसकी बहन की आवाज़ में कुछ ऐसा था जो शब्दों में नहीं समाता था। वह आवाज़ नहीं थी, वह एक दवा थी, एक पुकार थी, एक ऐसी चीज़ जो सुनने वाले के सबसे गहरे दर्द को छू लेती थी। जब वह गाती थी तो लोग रोना भूलकर रो पड़ते थे। लता मंगेशकर के बाद उसकी तुलना किसी से नहीं हो सकती थी, ऐसा लोग कहते थे। और कबीर, जो हमेशा बहन के लिए पक्षपाती रहा, इसे मज़ाक नहीं मानता था।

पर आज उसे इस आवाज़ में कुछ और भी सुनाई दे रहा था।

गाने के तीसरे अंतरे में, जब अनन्या ऊँचे सुर पर पहुँची, कबीर के अनुभवी कानों ने एक अजीब-सी बात पकड़ी। अनन्या की आवाज़ के नीचे, बहुत हल्की, एक और आवाज़ गूँज रही थी। जैसे कोई उसके साथ बहुत धीमे सुर में गुनगुना रहा हो।

कबीर ने टेप रोका। वापस घुमाया। फिर चलाया।

हाँ। वह वहीं थी। एक मर्द की धीमी गुनगुनाहट, जो अनन्या के सुर के साथ-साथ चल रही थी, बिल्कुल उसी लय में, उसी साँस में।

बारह साल पहले, कबीर ने यह नहीं सुना था। क्योंकि तब उसके पास ऐसे उपकरण नहीं थे, ऐसा अनुभव नहीं था। पर आज वह इसे साफ़ सुन पा रहा था।

वह रिकॉर्डिंग स्टूडियो में हुई थी। स्टूडियो में उस रात सिर्फ़ दो लोग थे, अनन्या और कबीर। तीसरी आवाज़ कहाँ से आई?

उसने टेप को आगे बढ़ाया।

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### चीख़

गाना ख़त्म हुआ। हारमोनियम की आख़िरी तान हवा में घुल गई। फिर टेप में कुछ देर चुप्पी रही।

*"कैसा रहा?"* अनन्या की आवाज़ आई, हल्की-सी थकी हुई।

*"जादू,"* जवान कबीर ने कहा। *"बिल्कुल जादू। तू कल से सुपरस्टार है।"*

*"भैया, आप हमेशा ऐसा कहते हो।"*

*"इस बार सच कह रहा हूँ। तू रुक, मैं एक मिनट में आता हूँ, चाय लेकर।"*

कबीर की आँखों से आँसू बहने लगे। उसे याद था। उसे बिल्कुल याद था। वह चाय लेने गया था। स्टूडियो के बाहर कोने पर एक चायवाला रात भर खुला रहता था। वह दस मिनट के लिए बाहर गया था।

सिर्फ़ दस मिनट।

टेप में दरवाज़े के बंद होने की आवाज़ आई। फिर क़दमों की आहट, कबीर के जाने की आवाज़। फिर सन्नाटा।

उसके बाद टेप चलती रही, क्योंकि रिकॉर्डर को बंद करना कबीर भूल गया था।

पहले एक मिनट तक कुछ नहीं हुआ। सिर्फ़ टेप की सरसराहट, और कहीं दूर से आती ट्रैफ़िक की आवाज़। फिर अनन्या के हल्के गुनगुनाने की आवाज़ आई। वह कोई पुरानी लोरी गुनगुना रही थी, वही लोरी जो माँ उन दोनों को सुलाने के लिए गाती थी।

फिर दरवाज़ा खुलने की आवाज़ आई।

*"भैया? इतनी जल्दी आ गए?"* अनन्या ने कहा।

कोई जवाब नहीं आया।

*"भैया?"*

टेप में एक भारी क़दम की आहट आई। फिर एक और। और फिर एक आवाज़, गहरी, पुख़्ता, मर्दाना, ऐसी जो कबीर ने कल रात अपने कमरे में सुनी थी।

*"तुम्हारी आवाज़ बहुत ख़ूबसूरत है, अनन्या।"*

*"आप... आप कौन हैं? यह स्टूडियो बंद है। आप यहाँ कैसे आए?"*

*"मैं तुम्हारी आवाज़ का सबसे बड़ा प्रशंसक हूँ।"* वह आवाज़ अब पास आ चुकी थी। *"इतनी ख़ूबसूरत आवाज़ किसी को यूँ ही नहीं मिलती। यह एक वरदान है। और वरदान की क़ीमत होती है।"*

*"आप जाइए यहाँ से! भैया आ रहे हैं!"*

*"जानता हूँ,"* आवाज़ ने कहा, और उसमें एक भयानक-सी शांति थी। *"इसीलिए जल्दी करूँगा।"*

फिर टेप में सिर्फ़ एक चीख़ बची।

कबीर ने आज तक ऐसी चीख़ नहीं सुनी थी, न उस रात, न किसी भी फ़िल्म की रिकॉर्डिंग में, जहाँ वह चीख़ों के साथ ही काम करता था। यह किसी इंसान के डर की चीख़ नहीं थी। यह किसी के अस्तित्व के फटने की आवाज़ थी, जैसे कोई चीज़ अंदर से खींचकर बाहर निकाली जा रही हो।

चीख़ लंबी चली, कई सेकंड तक। फिर वह एकदम कट गई।

एकदम। जैसे किसी ने गले को दबा दिया हो।

उसके बाद टेप में सिर्फ़ एक आवाज़ रही। वही मर्दाना आवाज़, एक संतुष्ट-सी साँस के साथ, धीमे से:

*"अब यह मेरी है।"*

कबीर का हाथ टेप-प्लेयर के बटन पर जम गया। वह बारह साल से इस रिकॉर्डिंग से भाग रहा था, और आज वह ख़ुद उसके सामने खड़ा था।

क्योंकि जब वह उस रात चाय लेकर लौटा था, उसने स्टूडियो को ख़ाली पाया था। टेप चल रही थी, दरवाज़ा खुला था, और अनन्या कहीं नहीं थी। न कोई खून, न कोई संघर्ष का निशान। बस एक ख़ाली कुर्सी और उसके पास फ़र्श पर गिरी वही चाँदी की चेन।

पुलिस ने तीन महीने तक खोजबीन की थी। फिर केस बंद हो गया था। कहा गया कि लड़की अपनी मर्ज़ी से कहीं चली गई। किसी ने उस टेप के बारे में नहीं पूछा, क्योंकि कबीर ने कभी किसी को बताया ही नहीं था। उसे डर था कि उस पर शक किया जाएगा। उसने उस टेप को छिपा लिया था, और साथ ही ख़ुद को भी।

बारह साल तक वह ख़ुद से झूठ बोलता रहा।

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### देशपांडे की याद

अगली सुबह कबीर सोया नहीं था। वह पूरी रात टेप को बार-बार सुनता रहा और हर बार उसमें कुछ नया पकड़ता रहा। उस मर्दाना आवाज़ के पीछे एक हल्का-सा फुसफुसाता सुर था, जैसे कोई बहुत-सी आवाज़ें एक साथ बोल रही हों। एक के भीतर कई, जैसे वह गला अकेला नहीं था।

सुबह वह नीचे उतरा। इमारत के गेट पर बूढ़े चौकीदार दिनकर काका बैठे थे, हाथ में गरम चाय का कुल्हड़।

"अरे साहब, आज इतनी जल्दी?" दिनकर ने हँसकर कहा। "आप तो रात-रात भर काम करते हो, सुबह नौ से पहले तो दिखते भी नहीं।"

"काका, एक बात पूछनी थी," कबीर ने उनके पास बैठते हुए कहा। "मेरा फ़्लैट, तीसरी मंज़िल वाला, उसमें मुझसे पहले कौन रहता था?"

दिनकर के हाथ में कुल्हड़ हल्का-सा काँपा। उसकी मुस्कान एक पल में ग़ायब हो गई।

"क्यों पूछ रहे हो, साहब?"

"बस ऐसे ही। कुछ अजीब-सी चीज़ें हो रही हैं।"

दिनकर ने इधर-उधर देखा, जैसे कोई सुन न रहा हो। फिर धीमे स्वर में कहा, "साहब, मैं इस इमारत में बाईस साल से हूँ। आपसे पहले उस फ़्लैट में कोई टिकता नहीं था।"

कबीर चौंका। "क्या मतलब?"

"तीन-चार महीने से ज़्यादा कोई नहीं रहा। एक पूरा परिवार आया था, पति-पत्नी और दो बच्चे। दूसरे ही हफ़्ते में बीवी रात को चीख़ती हुई नीचे भागी, कहा कि कमरे में कोई उसका नाम पुकारता है। फिर एक कॉलेज का लड़का आया था। वह एक महीने में फ़्लैट छोड़कर चला गया, और जाते समय कुछ बोला नहीं। बस उसकी आँखें... उसकी आँखें ऐसी थीं जैसे उसने मौत देख ली हो।"

"और मैं तीन साल से हूँ।"

"आप तो अलग हैं, साहब," दिनकर ने कहा, और उसकी नज़र कबीर के चेहरे पर टिक गई। "आप पहले इंसान हैं जो इतने दिन टिके। मुझे तब भी अजीब लगा था। मैंने सोचा था, शायद आपको कुछ सुनाई नहीं देता। या शायद..."

"शायद क्या?"

दिनकर ने बात अधूरी छोड़ दी। फिर कुछ देर बाद फुसफुसाकर बोला, "या शायद वह चीज़ आपका इंतज़ार कर रही थी।"

कबीर की रीढ़ में सर्द लहर दौड़ गई।

"काका, उस फ़्लैट में पहले, बहुत पहले, कौन रहता था? मकान मालिक देशपांडे से पहले?"

"वह फ़्लैट देशपांडे साहब के नाम पर है ही नहीं," दिनकर ने कहा।

कबीर का सिर घूम गया। "क्या?"

"वह फ़्लैट किसी वैद्य जी का था, पंडित रघुनाथ वैद्य। बहुत पुराने ज़माने की बात है। वे आवाज़ों के जानकार थे, लोग कहते थे वे मंत्रों से किसी की भी आवाज़ बाँध सकते थे। पर एक दिन वे ग़ायब हो गए। फ़्लैट सालों बंद पड़ा रहा, फिर देशपांडे साहब ने इसे किराए पर चढ़ाने का फ़ैसला किया।"

"आवाज़ बाँधने वाले?" कबीर ने दोहराया।

"जी साहब। लोग कहते थे वे गले से आवाज़ निकाल लेते थे, और जिसकी आवाज़ निकालते, वह फिर कभी बोल नहीं पाता था।"

कबीर का मुँह सूख गया। वह चौकीदार को शुक्रिया कहकर उठा और धीरे-धीरे सीढ़ियाँ चढ़ने लगा, जैसे हर क़दम पर कोई अदृश्य बोझ बढ़ रहा हो।

*आवाज़ें निकालने वाला।* *आवाज़ बाँधने वाला।*

उसके दिमाग़ में टेप की वह आवाज़ गूँज रही थी: *"अब यह मेरी है।"*

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### ईशान की चिंता

दोपहर में कबीर ने ईशान को फ़ोन किया और उसे अपने घर बुलाया। इस बार वह पूरी तैयारी के साथ था। उसने टेप की डिजिटल कॉपी बना ली थी, और कंप्यूटर पर स्पेक्ट्रोग्राम खोलकर रख लिया था।

ईशान आया तो उसके चेहरे पर थकान थी। "कबीर, मैं ऑपरेशन थिएटर से सीधा आ रहा हूँ। जो भी हो, जल्दी बता।"

कबीर ने उसे पूरी बात बताई, टेप, चीख़, पर्ची, तस्वीर, चौकीदार। ईशान चुपचाप सुनता रहा। जब कबीर ने टेप चलाई, तो उसने हेडफ़ोन नहीं लगाए। उसने स्पीकर पर ही सुनी।

टेप ख़त्म हुई तो ईशान का चेहरा सफ़ेद पड़ चुका था।

"तुझे सुनाई दिया?" कबीर ने तेज़ी से पूछा।

ईशान ने धीरे-धीरे सिर हिलाया। "हाँ। इस बार सुनाई दिया।"

कबीर ने राहत की साँस ली। "ठीक है, तो मैं पागल नहीं..."

"कबीर," ईशान ने उसे बीच में रोका। उसकी आवाज़ धीमी थी, और उसमें एक अजीब डर था। "तूने एक बात नहीं बताई।"

"कौन-सी?"

"जिस आदमी की आवाज़ टेप में है, वह तेरे कमरे में रात में आया था। तूने ख़ुद कहा। लाल आँखें, काला हुडी, भारी आवाज़।"

"हाँ।"

"मैंने यह आवाज़ पहले सुनी है।"

कबीर ने चौंककर ईशान को देखा। "कहाँ?"

ईशान ने कुछ पल कुछ नहीं कहा। फिर उसने जेब से अपना फ़ोन निकाला और एक पुरानी रिकॉर्डिंग खोली। एक हॉस्पिटल का ऑडियो मेमो था, जिसमें ईशान अपने मरीज़ों के नोट्स बोलकर रखता था।

"यह पिछले हफ़्ते का है," उसने कहा। "मैं एक मरीज़ के बारे में बोल रहा था। सुन।"

उसने प्ले दबाया।

पहले ईशान की अपनी आवाज़, थकी हुई, तेज़ रफ़्तार में: *"मरीज़ नंबर 417, पुरुष, उम्र चौंतीस। लक्षण: अचानक बोलने की क्षमता का खो जाना, जबकि स्वर-तंतु पूरी तरह स्वस्थ हैं।"*

फिर कुछ सेकंड की ख़ामोशी। और फिर, उसी रिकॉर्डिंग में, ईशान की आवाज़ के पीछे, बहुत धीमे:

*"अब यह मेरी है।"*

कबीर के हाथ-पैर ठंडे हो गए। वही आवाज़। वही शब्द।

"मैंने इस मेमो में यह नहीं बोला था," ईशान ने कहा। "मैं इसे दो बार सुन चुका हूँ, और हर बार यह आवाज़ आती है। कबीर, पिछले दो महीनों में मेरे अस्पताल में ग्यारह ऐसे मरीज़ आ चुके हैं जिनकी आवाज़ अचानक चली गई। कोई बीमारी नहीं, कोई चोट नहीं, कोई वजह नहीं। सब बिल्कुल स्वस्थ, पर गूँगे। और सबने एक ही बात कही थी, कि रात में उन्हें किसी ने पुकारा था।"

"किस समय?"

ईशान की आँखें कबीर पर टिक गईं। "तीन बजकर सत्रह मिनट पर।"

कमरे में सन्नाटा छा गया।

"वह सिर्फ़ तुझे नहीं ढूँढ़ रहा है, कबीर," ईशान ने धीरे से कहा। "वह आवाज़ें इकट्ठी कर रहा है।"

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### वह तस्वीर फिर से

शाम को ईशान चला गया। जाते समय उसने कबीर से वादा लिया कि वह रात को अकेला नहीं सोएगा। पर कबीर जानता था कि यह लड़ाई वह किसी और के साथ नहीं लड़ सकता। जो भी चीज़ थी, उसने उसे चुना था।

उसने खाना बनाने की कोशिश भी नहीं की। वह कमरे में टहलता रहा, बार-बार दीवार पर लगी उस तस्वीर को देखता रहा।

आख़िर में उसने फ़ैसला किया। वह उस तस्वीर को दीवार से उतारेगा।

वह कुर्सी पर चढ़ा और काँपते हाथों से फ़्रेम को पकड़ा। फ़्रेम भारी था, बहुत भारी, जैसे उसमें सीसा भरा हो। उसने ज़ोर लगाकर उसे दीवार से हटाया।

और फ़्रेम के पीछे, दीवार पर, कुछ लिखा था।

पुराने, मिट्टी जैसे रंग में, किसी नुकीली चीज़ से कुरेदकर लिखे गए अक्षर। कबीर ने उन्हें पढ़ने के लिए फ़ोन की टॉर्च जलाई।

*"जिसने आवाज़ पाई, उसने क़ीमत नहीं चुकाई।*
*जिसने आवाज़ खोई, वह लौटकर माँगती है।*
*सातवाँ टेक सातवाँ ताला है।*
*चौदह को दरवाज़ा खुलेगा।"*

कबीर के हाथ से फ़ोन लगभग छूट गया।

*सातवाँ टेक।* वही टेक जिसे वह हमेशा सबसे अच्छा कहता था। वही जो उसने अनन्या के लिए रिकॉर्ड किया था। कोई उसकी आदत जानता था। कोई उसकी बहन की उस रात को जानता था।

और *चौदह को दरवाज़ा खुलेगा।* चौदह अक्टूबर। दस दिन बाद।

उसकी आँखें नीचे उसी दीवार के कोने पर गईं, जहाँ फ़र्श से कुछ ऊपर एक और छोटी पंक्ति कुरेदी गई थी, उतनी ही नीचे, जितनी कोई बैठा हुआ इंसान लिख सके:

*"भैया, मुझे ठंड लग रही है।"*

कबीर की साँस रुक गई। यह अनन्या की लिखावट थी।

वह उसे हज़ारों में पहचान सकता था। उसकी गोल-गोल, थोड़ी झुकी हुई, बचपन से वैसी ही। *"भैया"*, वह उसे इसी तरह पुकारती थी। और ठंड... अनन्या को हमेशा ठंड बहुत लगती थी। सर्दियों में वह हर वक़्त उसकी शॉल माँगती रहती थी।

बारह साल पहले ग़ायब हुई उसकी बहन, इसी दीवार पर, इसी कमरे में, ये शब्द लिख गई थी।

मतलब वह यहाँ थी। या यहाँ क़ैद थी।

कबीर पीछे हटा। उसका पैर कुर्सी से फिसला और वह धड़ाम से फ़र्श पर गिरा। तस्वीर का फ़्रेम उसके हाथ से छूटकर ज़ोर से टूट गया।

और उसी पल, कमरे की सारी बत्तियाँ बुझ गईं।

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### अँधेरे में

अँधेरे में कबीर को अपनी साँस की आवाज़ बहुत तेज़ सुनाई दे रही थी। उसने जेब में हाथ डालकर फ़ोन ढूँढ़ा। फ़ोन हाथ में आया, पर स्क्रीन नहीं जली। बैटरी पूरी भरी थी, फिर भी वह बेजान पड़ा था।

कमरे में हल्की-सी ठंडक भर गई। वही ठंडक जो कल रात आई थी।

उसने घड़ी की तरफ़ देखने की कोशिश की। लाल रोशनी भी बुझी हुई थी।

फिर उसे एक आवाज़ सुनाई दी।

इस बार वह किसी औरत की नहीं थी, न किसी मर्द की। यह बहुत सारी आवाज़ों का मिला-जुला सुर था, जैसे दर्जनों लोग एक साथ फुसफुसा रहे हों। बच्चे की आवाज़, बूढ़े की, औरत की, किसी गूँगे के गले से निकलती टूटी-फूटी कराह की।

और उन सबके बीच, सबसे धीमी, सबसे कमज़ोर, एक आवाज़ थी जिसे कबीर तुरंत पहचान गया।

*"भैया..."*

कबीर ज़मीन से उठा। उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे। "अनन्या? तू... तू सुन रही है मुझे?"

*"भैया... मुझे... ठंड..."*

"अनन्या, मैं यहाँ हूँ! बता मुझे, तू कहाँ है? मैं तुझे ले जाऊँगा!"

*"भाग... जा..."*

कबीर ठिठक गया। "क्या?"

*"भाग... जा... भैया... वह... आ रहा है..."*

और तभी, अँधेरे में, दरवाज़े की ओर से एक भारी क़दम की आहट आई।

धम।

धम।

धम।

कबीर का खून जम गया। यह वही क़दम थे जो उसने टेप में सुने थे।

एक पल के लिए कमरे में रोशनी की एक पतली लकीर कौंधी, जो पर्दों के बीच से आई चाँदनी थी। उसमें कबीर को दरवाज़े के पास एक लंबा साया दिखा, काले हुडी वाला, जिसके चेहरे के अँधेरे में दो लाल आँखें धीमे-धीमे दहक रही थीं।

साया दरवाज़े के बीचोंबीच खड़ा था और कबीर के बाहर भागने का एकमात्र रास्ता रोके हुए था।

"कबीर मल्होत्रा," साये ने कहा। उसकी आवाज़ में वही भारीपन था, वही सुकून भरी भयावहता। "बारह साल इंतज़ार करवाया तूने।"

"तू... तू कौन है?" कबीर ने पीछे हटते हुए पूछा।

साया धीरे से हँसा। यह हँसी कमरे की दीवारों से टकराकर गूँजती रही, जैसे दर्जनों लोग एक साथ हँस रहे हों।

"तू मुझे पहचानता है, कबीर। तूने मुझे बनाया है।"

"झूठ!"

"क्या तूने कभी सोचा कि अनन्या उस रात क्यों गई?" साये ने एक क़दम आगे बढ़ाते हुए कहा। "क्या तूने कभी सोचा कि तू उस रात चाय लेने क्यों गया? कौन तुझे बाहर ले गया था?"

कबीर के पैर लड़खड़ा गए।

"चायवाला तुझे नहीं जानता था, कबीर। तू उस दुकान पर पहली बार गया था। फिर भी वह तेरा नाम जानता था। है न?"

कबीर को याद आया। चायवाले ने उसे देखते ही कहा था, *"आइए कबीर साहब, आज आपकी बहन की रिकॉर्डिंग का दिन है ना?"* तब उसने सोचा था कि अनन्या ने शायद कभी ज़िक्र किया होगा। उसने इस बात को कभी दोबारा नहीं सोचा।

"वह मेरा आदमी था," साये ने कहा। "और उस दिन तेरे चाय पीने का हर घूँट मैंने ही तुझे पिलाया था।"

कबीर ने अपनी मुट्ठियाँ भींच लीं। "तूने मेरी बहन को क्यों..."

"मैंने तेरी बहन को कुछ नहीं किया," साया उसके बहुत क़रीब आ चुका था। लाल आँखें अब कबीर के चेहरे से सिर्फ़ एक हाथ दूर थीं। "तूने किया, कबीर। उसकी आवाज़ तूने ही मुझे दी थी।"

"मैंने कभी ऐसा..."

"क्या तूने उस शाम एक काग़ज़ पर दस्तख़त नहीं किए थे?"

कबीर का दिमाग़ सुन्न हो गया।

शाम। एक मीटिंग। एक आदमी जो अनन्या को बड़े संगीत लेबल की तरफ़ से कॉन्ट्रैक्ट देने आया था। उसने कहा था कि बस औपचारिकता है, भाई के दस्तख़त भी ज़रूरी हैं, क्योंकि अनन्या अभी नई है। कबीर ने बिना पढ़े दस्तख़त कर दिए थे। उसे बहन की क़ामयाबी की इतनी ख़ुशी थी कि उसने एक शब्द भी नहीं पढ़ा था।

वह काग़ज़... वह काग़ज़ क्या था?

साये ने सिर थोड़ा झुकाया। उसकी हुडी हल्की-सी पीछे सरकी। और कबीर ने पहली बार उसके चेहरे की एक झलक देखी।

वह चेहरा इंसान का नहीं था। उसकी जगह सिर्फ़ एक गहरा, काला खोखलापन था, और उस खोखलेपन के भीतर सैकड़ों छोटे-छोटे मुँह थे, सब खुले हुए, सब चुपचाप चीख़ते हुए।

"अब तू समझा?" साये ने फुसफुसाकर कहा। "तूने जो दस्तख़त किए थे, वह अनन्या की आवाज़ का सौदा था। और अब," उसकी हुडी के भीतर से एक लंबी, काली, हड्डियों-सी उँगली बाहर निकली और कबीर के गले की ओर बढ़ी, "तेरी बारी है।"

कबीर ने चीख़ना चाहा।

पर उसके गले से कोई आवाज़ नहीं निकली।

उसने फिर कोशिश की। अपना मुँह खोला, पूरी ताक़त से चिल्लाया।

कुछ नहीं। सन्नाटा।

कबीर की आँखें दहशत से फैल गईं। उसकी आवाज़ जा चुकी थी।

साया पीछे हट गया। लाल आँखें अँधेरे में मुस्कुराईं।

"पहली क़िस्त," उसने कहा। "बाकी की क़िस्तें चौदह तारीख़ को लूँगा।"

और फिर वह धुएँ की तरह हवा में घुल गया।

कमरे की बत्तियाँ अचानक जल उठीं। कबीर घुटनों के बल गिरा हुआ था, मुँह खुला हुआ, गला चीख़ने की कोशिश में फटने को तैयार, पर कोई आवाज़ नहीं।

उसकी आँखों में आँसू थे और होंठों पर एक ही शब्द बार-बार आ रहा था, जिसे वह ज़ोर से बोल नहीं पा रहा था:

*"अनन्या..."*

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**(जारी है... अगला एपिसोड: "गूँगा गवाह")**

Writer
firoj saifi
Story
मुझे आवाज़ किसने दी?
Chapter
2 of 5
Category
Horror Poetry
Reading time
19 min
Words
3601
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

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