Pretika › Horror Poetry › मुझे आवाज़ किसने दी?

एपिसोड 1 — तीन बजकर सत्रह मिनट

firoj saifi · Horror Poetry · 16 मिनट

अक्टूबर की वो रात आम रातों जैसी ही थी। कम से कम कबीर मल्होत्रा को यही लगा था, जब उसने रात के साढ़े ग्यारह बजे अपने कमरे की खिड़की के पर्दे खींचे और लैम्प की पीली रोशनी में बिस्तर पर लेट गया।

बत्तीस साल का कबीर पुणे के कोथरूड इलाके की एक पुरानी इमारत की तीसरी मंज़िल पर किराए के फ़्लैट में अकेला रहता था। पेशे से वह साउंड इंजीनियर था। फ़िल्मों और वेब सीरीज़ में आवाज़ें भरना, बैकग्राउंड स्कोर साफ़ करना, पुरानी रिकॉर्डिंग्स से शोर हटाना, यही उसका काम था। उसके कान आम लोगों के कानों से अलग थे। जहाँ दूसरे लोग सिर्फ़ सुनते थे, कबीर आवाज़ों को छान लेता था। पंखे की घरघराहट में कौन-सी फ़्रीक्वेंसी छिपी है, फ़्रिज की हल्की गुनगुनाहट कितने हर्ट्ज़ की है, दूर किसी कुत्ते का भौंकना किस दिशा से आ रहा है, ये सब उसे बिना कोशिश किए पता चल जाता था।

इसीलिए उस रात जो हुआ, वह उसके लिए और भी डरावना था। क्योंकि कबीर अपने कानों पर आँख मूँदकर भरोसा करता था।

उस दिन उसने सोलह घंटे काम किया था। एक हॉरर फ़िल्म की साउंड डिज़ाइनिंग का आख़िरी हफ़्ता चल रहा था और डेडलाइन सिर पर थी। हेडफ़ोन लगाए-लगाए उसके कान थक चुके थे, आँखें जल रही थीं। उसने कंप्यूटर बंद किया, बालकनी का दरवाज़ा बंद किया, और बिस्तर पर गिर पड़ा।

बगल की मेज़ पर रखी डिजिटल घड़ी लाल अक्षरों में चमक रही थी। 11:34 PM।

"बस सात घंटे," उसने बुदबुदाकर कहा। "सात घंटे की नींद और फिर सब ठीक।"

उसे कहाँ पता था कि सात घंटे उसे मिलने वाले ही नहीं थे।

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### पहली आहट

नींद उसे जल्दी ही आ गई थी। थकान ऐसी ही होती है, बिना इजाज़त के आती है और सब कुछ बहा ले जाती है।

पर किसी वक़्त, रात के गहरे अँधेरे में, कबीर की नींद टूटी।

उसने आँखें नहीं खोलीं। पहले उसके कान जागे, जैसे हमेशा जागते थे। कमरे में पंखे की धीमी आवाज़ थी, फ़र्श के नीचे वाले फ़्लैट से आती किसी पाइप की टक-टक थी, और बाहर सड़क पर कभी-कभार गुज़रती किसी गाड़ी की सरसराहट थी। सब कुछ सामान्य।

फिर उसने कुछ और सुना।

बहुत हल्की, बहुत महीन एक आवाज़। इतनी हल्की कि कोई और होता तो शायद उसे हवा समझकर टाल देता। पर कबीर ने उसे पकड़ लिया।

"क... बी... र..."

कबीर की साँस रुक गई।

उसने आँखें खोलीं। कमरा अँधेरा था। सिर्फ़ मेज़ पर रखी घड़ी की लाल रोशनी दीवार पर एक धुँधला-सा आयत बना रही थी। उसने गर्दन घुमाकर घड़ी की तरफ़ देखा।

3:17 AM।

"कोई सपना होगा," उसने ख़ुद से कहा। पर उसकी आवाज़ उसे अजनबी-सी लगी, जैसे किसी और के गले से निकली हो।

वह कुछ पल यूँ ही लेटा रहा, छत को घूरता हुआ। दिल की धड़कनें कानों में बज रही थीं। उसने ख़ुद को समझाया। पिछले कई दिनों से वह डरावनी आवाज़ों पर काम कर रहा था, चीख़ें, फुसफुसाहटें, दरवाज़ों की चरमराहट। दिमाग़ का थक जाना और ऐसी चीज़ें सुन लेना बिल्कुल स्वाभाविक था।

"सो जा, कबीर," उसने कहा। "सो जा।"

उसने करवट बदली और आँखें बंद कर लीं।

"कबीर..."

इस बार आवाज़ साफ़ थी। और वह आवाज़ कमरे के अंदर से आई थी।

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### कमरे में कोई है

कबीर झटके से उठकर बैठ गया। उसने जल्दी से लैम्प का स्विच ढूँढ़ा। हाथ काँप रहे थे। खट की आवाज़ के साथ पीली रोशनी कमरे में फैल गई।

कमरा ख़ाली था।

वही अलमारी, वही कुर्सी जिस पर कल के कपड़े पड़े थे, वही खिड़की जिस पर पतले पर्दे लटक रहे थे। दीवार पर टंगी पुरानी तस्वीरें, जो मकान मालिक वहीं छोड़ गया था, उसे वैसे ही घूर रही थीं जैसे हर रात घूरती थीं।

कोई नहीं था।

कबीर ने गहरी साँस ली। उसने पानी का गिलास उठाया और एक ही घूँट में आधा ख़त्म कर दिया। फिर उसने अपने फ़ोन में टाइम देखा। 3:19 AM।

"ठीक है," उसने ज़ोर से कहा, मानो कमरे को सुना रहा हो। "मैं जाग गया हूँ। जो भी है, सामने आ जाए।"

कोई जवाब नहीं आया। सिर्फ़ पंखा घूमता रहा।

कबीर हँस पड़ा, एक घबराई हुई, खोखली हँसी। "पागल हो गया है तू।"

तभी उसके दिमाग़ में एक ख़याल कौंधा। वह साउंड इंजीनियर था। अगर आवाज़ सच में आई थी तो उसकी कोई न कोई शक्ल होनी चाहिए थी। हवा में थरथराहट, कोई फ़्रीक्वेंसी, कुछ तो।

उसने बिस्तर के पास रखा अपना पोर्टेबल रिकॉर्डर उठाया। यह वही छोटा-सा हैंडहेल्ड रिकॉर्डर था जिससे वह फ़ील्ड में आवाज़ें पकड़ता था। उसने उसे चालू किया और मेज़ पर रख दिया।

"अगर तू सच है," उसने रिकॉर्डर से कहा, "तो आज रात पकड़ में आएगा।"

फिर वह दोबारा लेट गया, पर इस बार लैम्प जलता छोड़ दिया। नींद उसकी आँखों से कोसों दूर थी, फिर भी थकान ने उसे धीरे-धीरे खींच लिया। आख़िरी बार उसने घड़ी देखी। 3:41 AM। उसके बाद उसे कुछ याद नहीं रहा।

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### सुबह की रोशनी

सुबह नौ बजे फ़ोन के अलार्म ने उसे जगाया। खिड़की से धूप कमरे में भर आई थी और रात का डर ऐसा लग रहा था जैसे किसी और की कहानी हो।

कबीर ने अँगड़ाई ली, फिर हँसकर सिर हिलाया। "वाह, साउंड इंजीनियर साहब। भूत-प्रेत की आवाज़ें सुनने लगे।"

उसने चाय बनाई, बालकनी में खड़े होकर नीचे सड़क पर चलते लोगों को देखा। चायवाला अपनी दुकान खोल रहा था, स्कूल की बस बच्चों को भर रही थी, कोई बुज़ुर्ग अख़बार लिए सैर से लौट रहा था। ज़िंदगी अपनी रफ़्तार से चल रही थी।

चाय ख़त्म करने के बाद वह कमरे में लौटा तो उसकी नज़र मेज़ पर रखे रिकॉर्डर पर पड़ी। लाल बत्ती अब भी जल रही थी। रिकॉर्डिंग चालू थी।

उसने मुस्कुराकर उसे बंद किया। "देखते हैं रात भर क्या पकड़ा तूने। शायद मेरे खर्राटे।"

वह रिकॉर्डर को लैपटॉप से जोड़कर बैठ गया। फ़ाइल सात घंटे चौदह मिनट की थी। उसने वेवफ़ॉर्म खोला। सामने स्क्रीन पर आवाज़ की लहरें फैल गईं, लंबी, सपाट, कहीं-कहीं छोटे उभार।

उसने हेडफ़ोन लगाए और फ़ाइल को तेज़ी से आगे बढ़ाना शुरू किया। पंखे की घरघराहट। फ़र्श के नीचे से आती टक-टक। कहीं दूर किसी ट्रक का हॉर्न। एक जगह उसका अपना खर्राटा, जिस पर वह ख़ुद हँस पड़ा।

फिर रिकॉर्डिंग 3:17 AM के आसपास पहुँची।

कबीर ने उँगली रोकी। वेवफ़ॉर्म पर, ठीक उस जगह, एक पतली-सी लाल रेखा-सी उभार दिख रहा था। उसने ज़ूम किया।

यह कोई शोर नहीं था। यह एक आवाज़ थी।

उसने धड़कते दिल से प्ले दबाया।

पंखे की हल्की घरघराहट। फिर एक लंबी चुप्पी। फिर किसी के साँस लेने की आवाज़, धीमी और भारी।

और फिर:

"क... बी... र..."

कबीर के हाथ से हेडफ़ोन छूट गया।

पर असली डर अभी बाकी था। उसने काँपती उँगलियों से रिकॉर्डिंग को फिर से चलाया, इस बार वॉल्यूम बढ़ाकर और फ़िल्टर लगाकर। पंखे का शोर हटाया, बाहर की हवा हटाई।

अब आवाज़ पूरी तरह साफ़ थी। और वह उसके नाम से आगे भी कुछ कह रही थी। दो शब्द, जो रात में उसे सुनाई नहीं दिए थे।

"कबीर... मुझे... आवाज़... दो..."

कबीर कुर्सी पर पीछे की तरफ़ धँस गया।

यह सिर्फ़ किसी का उसे पुकारना नहीं था। यह किसी का उससे कुछ माँगना था। *मुझे आवाज़ दो।*

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### वो औरत

उस दिन कबीर ने काम पर जाना टाल दिया। उसने अपने प्रोड्यूसर रोहन को मैसेज किया कि तबीयत ठीक नहीं है और दोपहर तक काम भेज देगा। फिर वह बैठकर उस रिकॉर्डिंग को बार-बार सुनता रहा।

अजीब बात यह थी कि आवाज़ उसे जानी-पहचानी लग रही थी। कहाँ सुनी थी? किसकी थी? यह वह याद नहीं कर पा रहा था। किसी औरत की आवाज़ थी, पर उसमें कुछ अजीब था। जैसे वह किसी बहुत गहरे कुएँ के तल से बोल रही हो। जैसे उसका गला सालों से बंद पड़ा हो।

उसने ऑडियो का स्पेक्ट्रोग्राम निकाला, आवाज़ का वह नक्शा जिसमें हर फ़्रीक्वेंसी रंगों में दिखती है। आम इंसानी आवाज़ में हार्मोनिक्स की एक ख़ास बनावट होती है, एक के ऊपर एक सजी हुई परतें। पर इस आवाज़ में कुछ अजीब था।

स्पेक्ट्रोग्राम में हार्मोनिक्स नहीं थे।

कबीर ने आँखें मलीं और दोबारा देखा। नहीं, कोई ग़लती नहीं थी। यह आवाज़ किसी इंसानी गले से नहीं निकली थी। इसमें गले की कंपन नहीं थी, साँस की रगड़ नहीं थी, होंठों की हरकत नहीं थी। यह तो ऐसी आवाज़ थी जैसे किसी ने सीधे हवा को ही बोलना सिखा दिया हो।

उसके पास इसका कोई स्पष्टीकरण नहीं था। वह दस साल से यह काम कर रहा था। उसने हर तरह की आवाज़ सुनी थी, काटी थी, जोड़ी थी। पर ऐसी आवाज़ उसने कभी नहीं सुनी थी।

उसने रिकॉर्डिंग की कॉपी बनाई, एक बाहरी हार्ड डिस्क में, एक अपने क्लाउड में, और एक पेन ड्राइव में। पता नहीं क्यों, पर उसे लग रहा था कि यह फ़ाइल उसकी ज़िंदगी की सबसे क़ीमती चीज़ बनने वाली है।

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### दोस्त की राय

शाम को कबीर ने अपने सबसे पुराने दोस्त ईशान को फ़ोन किया। ईशान एक न्यूरोलॉजिस्ट था, वही जिसके पास कबीर हर उस बात के लिए जाता था जिसे वह ख़ुद समझ नहीं पाता था।

"तू फ़ोन कर रहा है?" ईशान ने हँसकर कहा। "मतलब कुछ गड़बड़ है। तू सिर्फ़ तब फ़ोन करता है जब कोई मुसीबत हो।"

"मिल सकता है आज?"

"कॉफ़ी हाउस में? आठ बजे?"

"आठ बजे।"

कॉफ़ी हाउस में कबीर ने ईशान को पूरी बात बताई, पिछली रात, आवाज़, रिकॉर्डिंग, स्पेक्ट्रोग्राम। ईशान ध्यान से सुनता रहा। जब कबीर ने हेडफ़ोन उसकी तरफ़ बढ़ाए, तो उसने बिना कुछ कहे कान में लगा लिए।

रिकॉर्डिंग चली। ईशान का चेहरा बिल्कुल शांत रहा। वह आँखें बंद करके सुनता रहा। जब रिकॉर्डिंग ख़त्म हुई, उसने हेडफ़ोन उतारे और कुछ देर चुपचाप कॉफ़ी को घूरता रहा।

"तुझे कुछ सुनाई दिया?" कबीर ने उत्सुकता से पूछा।

ईशान ने धीरे से कहा, "कबीर, मुझे सिर्फ़ पंखे की आवाज़ सुनाई दी।"

कबीर का चेहरा उतर गया। "क्या? नहीं... वो आवाज़... तूने ठीक से नहीं सुना।"

"मैंने तीन बार सुना," ईशान ने कहा। उसकी आवाज़ नरम थी, पर उसमें चिंता साफ़ झलक रही थी। "तू मुझसे पूरी तरह साफ़ बात की उम्मीद करता है, इसलिए कह रहा हूँ। रिकॉर्डिंग में कोई आवाज़ नहीं है।"

"लेकिन मैंने सुनी!"

"शायद तूने सुनी हो," ईशान ने कहा। "पर शायद सिर्फ़ तू ही सुन सकता है।"

यह बात सुनकर कबीर को ठंडा पसीना आ गया। "मतलब?"

"मतलब कि तू बहुत थका हुआ है, बहुत ज़्यादा काम कर रहा है, और तेरा दिमाग़ शायद तुझे धोखा दे रहा है। इसे कहते हैं ऑडिटरी हैल्यूसिनेशन। यह आम बात है, ख़ासकर उन लोगों में जिनका पेशा सुनने से जुड़ा हो। तू आराम कर, कुछ दिन छुट्टी ले।"

"और अगर यह हैल्यूसिनेशन नहीं हुआ तो?"

ईशान ने गहरी साँस ली। "अगर नहीं हुआ तो मेरे पास कोई जवाब नहीं है, दोस्त।"

वह बात वहीं ख़त्म हो गई। पर कबीर को पूरी रात ईशान की वह बात चुभती रही। *शायद सिर्फ़ तू ही सुन सकता है।*

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### दूसरी रात

उस रात कबीर ने ख़ुद से वादा किया कि वह नहीं डरेगा। उसने दो काम किए। पहला, कमरे में दो रिकॉर्डर रख दिए, एक बिस्तर के पास और एक दरवाज़े के पास। दूसरा, अपने फ़ोन से भी वीडियो रिकॉर्डिंग शुरू कर दी, जिसका कैमरा सीधा उसके बिस्तर की तरफ़ था।

"आज देखते हैं," उसने कहा।

रात के ग्यारह बजे वह लेट गया। लैम्प बुझा दिया। कमरे में सिर्फ़ घड़ी की लाल रोशनी बची।

उसने ख़ुद को जगाए रखने की पूरी कोशिश की। उसने बारह बजे तक फ़ोन चलाया, एक बजे तक पुराने गाने सुने। पर आख़िरकार दो बजे के आसपास उसकी पलकें भारी होकर बंद हो गईं।

और फिर...

उसकी आँख खुली।

कोई आवाज़ नहीं आई थी। कोई सपना नहीं आया था। बस उसकी आँख खुल गई थी, जैसे किसी ने उसके कंधे को हल्के से छुआ हो।

कमरा पहले से ज़्यादा ठंडा था। साँस छोड़ने पर हल्की भाप जैसी निकल रही थी, जबकि अक्टूबर की रात इतनी ठंडी नहीं होती।

उसने घड़ी की तरफ़ देखा।

3:17 AM।

कबीर का गला सूख गया। उसने बहुत धीरे से सिर घुमाया।

कुछ नहीं था।

पर उसके कान में एक आवाज़ आई, इस बार बहुत पास से।

"कबीर..."

कबीर की रीढ़ में बिजली-सी दौड़ गई। आवाज़ उसके सिर के ठीक ऊपर से आई थी, जहाँ से कोई बिस्तर के सिरहाने खड़ा होकर बोलता।

"मुझे... आवाज़... दो..."

वह हिल भी नहीं पा रहा था। उसका शरीर जैसे पत्थर बन गया था। उसकी आँखें छत पर टिकी थीं और उसे लग रहा था कि अगर उसने ऊपर देखा तो वह कुछ ऐसा देख लेगा जो उसे देखना नहीं चाहिए।

"कौन है?" उसने काँपती हुई, फुसफुसाती आवाज़ में पूछा। "तुम... तुम कौन हो?"

कुछ पल के लिए सन्नाटा रहा। फिर वह आवाज़ आई, और इस बार उसमें एक अजीब-सा दर्द था।

"तुमने ही तो दी थी..."

कबीर की आँखें फैल गईं। "क्या? मैंने? मैंने क्या दिया था?"

"तुमने ही तो... मुझे... आवाज़..."

और तभी, कमरे की सारी बत्तियाँ एक झटके में बंद हो गईं।

लैम्प तो पहले से बुझा था, पर अब घड़ी की लाल रोशनी भी चली गई थी। पूरा कमरा घुप्प अँधेरे में डूब गया। इतना गहरा कि कबीर को अपना हाथ भी नहीं दिख रहा था।

फिर अँधेरे में, खिड़की के पास, उसे एक आकृति दिखाई दी।

पहले वह सिर्फ़ एक गहरा धब्बा थी, अँधेरे में अँधेरे से थोड़ा ज़्यादा काला। फिर धीरे-धीरे उसने आकार लिया। एक लंबी, चौड़ी आकृति, जिसके सिर पर कोई नक़ाब या हुडी जैसी चीज़ थी। और उस चेहरे की जगह, जहाँ आँखें होनी चाहिए थीं, दो धुँधली लाल बिंदियाँ जल रही थीं।

वह आकृति धीरे-धीरे खिड़की से हटकर उसके बिस्तर की तरफ़ बढ़ी।

कबीर चीख़ना चाहता था, पर उसके गले से आवाज़ ही नहीं निकली। उसने अपने हाथ को ऊपर उठाया, एक बेबस, बेमतलब-सा इशारा, जैसे वह उस आकृति को रोकना चाहता हो।

आकृति रुकी नहीं। वह बिस्तर के सिरहाने तक पहुँची और उसने अपने दोनों काले दस्ताने वाले हाथ बिस्तर की लकड़ी पर रख दिए। लाल आँखें अब ठीक कबीर के चेहरे के ऊपर थीं।

और तब, उस नक़ाब के पीछे से एक आवाज़ आई। यह वही आवाज़ नहीं थी। यह एक मर्द की, भारी, गूँजती हुई आवाज़ थी।

"तू अभी भी नहीं समझा?"

कबीर के होंठ हिले, पर कोई शब्द नहीं निकला।

"जिस आवाज़ को तू ढूँढ़ रहा है," आकृति ने धीरे से कहा, "वह तेरी ही चुराई हुई है।"

इतना कहते ही आकृति अपना सिर थोड़ा आगे झुकाने लगी, जैसे अपना चेहरा दिखाने वाली हो।

कबीर ने पूरी ताक़त लगाकर चीख़ मारी।

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### चीख़ के बाद

जब उसकी आँख खुली तो वह फ़र्श पर पड़ा था, बिस्तर से नीचे गिरा हुआ। कमरे की सारी बत्तियाँ जल रही थीं। खिड़की से सुबह की हल्की रोशनी अंदर आ रही थी।

घड़ी में 6:02 AM हो रहे थे।

कबीर काँपता हुआ उठा। उसका गला दुख रहा था, जैसे वह घंटों चीख़ा हो। उसका फ़ोन अब भी बिस्तर पर रखा था, कैमरा चालू।

उसने जल्दी से वीडियो रोककर उसे देखना शुरू किया। उसकी उँगलियाँ बर्फ़ की तरह ठंडी थीं।

रात की वीडियो में सब कुछ सामान्य दिख रहा था। वह सो रहा था, करवटें बदल रहा था। और फिर 3:17 पर वीडियो में उसकी आँखें खुलती दिखीं।

पर कमरे में कोई नहीं था।

वीडियो में खिड़की के पास कोई आकृति नहीं थी। बिस्तर के सिरहाने कोई नहीं खड़ा था। कमरे की बत्तियाँ बंद नहीं हुई थीं। बस कबीर था, जो अकेले बिस्तर पर बैठा, हवा में हाथ उठाए, किसी अनदेखी चीज़ को रोकने की कोशिश कर रहा था। और उसके मुँह से चीख़ निकल रही थी।

लेकिन वीडियो में एक चीज़ और थी।

कबीर ने ऑडियो का वॉल्यूम बढ़ाया। चीख़ के नीचे, बहुत धीमे, एक और आवाज़ दबी हुई थी। एक औरत की आवाज़, बहुत धीमी, बहुत टूटी हुई, जैसे कोई रो रहा हो और ख़ुद को रोकने की कोशिश कर रहा हो।

और वह आवाज़ एक ही वाक्य दोहरा रही थी:

"उसने मुझे चुप करा दिया... उसने मुझे चुप करा दिया..."

कबीर ने वीडियो रोक दिया। उसका दिल इतनी तेज़ी से धड़क रहा था कि उसे लगा सीना फट जाएगा।

उसने कमरे में चारों तरफ़ देखा। सब कुछ अपनी जगह पर था। पर उसे अब पहली बार महसूस हुआ कि यह कमरा उसका अपना नहीं था। इन दीवारों के पीछे, इस फ़र्श के नीचे, इस हवा में, कुछ और भी रहता था।

और वह कुछ उसके नाम को जानता था।

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### दरवाज़े के नीचे

कबीर ने उस सुबह फ़ैसला किया कि वह अपने फ़्लैट के बारे में पता लगाएगा। इस घर में पहले कौन रहता था? इसे उसने किराए पर लिया था तीन साल पहले, एक दलाल के ज़रिए। मकान मालिक, श्री देशपांडे, किसी दूसरे शहर में रहते थे। कबीर ने उन्हें कभी देखा तक नहीं था।

वह नहाकर, कपड़े बदलकर बाहर निकलने ही वाला था कि उसने दरवाज़े के नीचे से अंदर झाँकता एक सफ़ेद कागज़ का टुकड़ा देखा।

उसने झुककर उसे उठाया।

यह एक पुराना, पीला पड़ चुका लिफ़ाफ़ा था। उस पर कोई पता नहीं था, कोई डाक टिकट नहीं। सिर्फ़ एक नाम, हाथ से लिखा हुआ, स्याही फैली हुई:

*कबीर।*

कबीर ने काँपते हाथों से लिफ़ाफ़ा खोला। अंदर एक छोटी-सी पर्ची थी, जिस पर सिर्फ़ दो पंक्तियाँ लिखी थीं। लिखावट टेढ़ी-मेढ़ी थी, जैसे किसी ने जल्दबाज़ी में या डर में लिखा हो:

*"तीसरी मंज़िल का यह कमरा तुम्हारा नहीं है।*
*जिसने तुम्हें यहाँ भेजा, उससे पूछो, तुम्हारी आवाज़ कहाँ गई।"*

कबीर ने पर्ची को उलटा-पलटा। पीछे कुछ नहीं लिखा था। उसने दरवाज़ा खोला और गलियारे में झाँका। सीढ़ियाँ ख़ाली थीं, पूरी इमारत में सन्नाटा था।

उसने पर्ची को फिर से पढ़ा। *तुम्हारी आवाज़ कहाँ गई।*

कबीर का माथा ठनका। उसकी आवाज़ तो उसके पास थी, वह बोल रहा था, सुन रहा था। फिर यह किसकी आवाज़ की बात थी?

और तभी, जैसे किसी ने उसके दिमाग़ में एक पर्दा उठा दिया हो, उसे कुछ याद आया। कुछ बहुत पुराना, कुछ जिसे उसने सालों पहले दफ़्न कर दिया था।

एक नाम।

*अनन्या।*

कबीर के होंठों से वह नाम बिना सोचे निकल गया। और जैसे ही निकला, कमरे के अंदर, बहुत दूर कहीं, उसे लगा किसी ने एक गहरी, लंबी साँस ली, जैसे कोई बरसों बाद पहली बार हवा में साँस ले रहा हो।

कबीर दरवाज़े के पास पत्थर की तरह खड़ा रहा। उसके हाथ में वह पर्ची काँप रही थी।

अनन्या।

उसकी छोटी बहन। जिसे गए हुए बारह साल हो चुके थे।

वह बहन जिसकी आवाज़ पूरे शहर में मशहूर थी, जिसके गाने सुनकर लोग रो पड़ते थे। वह बहन जो एक रात अचानक ग़ायब हो गई थी, और जिसकी आख़िरी रिकॉर्डिंग कबीर के पास थी।

वह रिकॉर्डिंग जो उसने कभी किसी को नहीं सुनाई थी।

वह रिकॉर्डिंग जिसमें अनन्या की आख़िरी चीख़ क़ैद थी।

पीछे, कमरे के भीतर, घड़ी की सुइयाँ अपने आप घूम रही थीं। और दीवार पर टंगी पुरानी तस्वीरों में से एक, जो अब तक सिर्फ़ एक धुँधली-सी औरत की तस्वीर थी, धीरे-धीरे साफ़ होती जा रही थी।

तस्वीर वाली औरत की आँखें खुल रही थीं।
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**(जारी है... अगला एपिसोड: "अनन्या की आख़िरी रिकॉर्डिंग")**

Writer
firoj saifi
Story
मुझे आवाज़ किसने दी?
Chapter
1 of 5
Category
Horror Poetry
Reading time
16 min
Words
3082
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

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