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भाग चार - आख़िरी सतर

Pretika · Jinn & Spirits · 3 मिनट

मई आते-आते... किताब के सिर्फ़ चार पन्ने बचे थे... जिनकी सियाही साबुत थी।
और मेरी पीठ... मेरी पूरी पीठ... कंधों से कमर तक... फ़ारसी अक्षरों से भर चुकी थी। मैं घर से निकलना बंद कर चुकी थी। फ़ोन पर बहन की सत्रह मिस्ड कॉल्स पड़ी थीं।
और आज़रनाल अब सिर्फ़ रात को नहीं आता था।
दिन में भी... जब मैं ब्रश लेकर किताब पर झुकती... वो मेरे पीछे खड़ा होता। उसका हाथ मेरे हाथ पर होता। और मेरा हाथ... बस चलता रहता।
एक रात मैंने उससे पूछा... "जब किताब पूरी साफ़ हो जाएगी... तब क्या होगा? तुम आज़ाद हो जाओगे?"
उसने सिर हिलाया। "नहीं। लिखा हुआ मिटाने से ज़ंजीर ढीली होती है... टूटती नहीं। ख़्वाजा ने हाशिये पर लिखा था न... लिखा हुआ बाँधता है... बोला हुआ खोलता है।"
"मतलब?"
"आख़िरी सतर," उसने कहा। "ख़्वाजा ने किताब के आख़िरी पन्ने पर एक सतर लिखी थी। उलटी। वो ताला है। जब तक वो सतर लिखी हुई है... मैं आधा क़ैद हूँ। पर अगर वो सतर... बोली जाए... और सुनी जाए..."
"तो मैं बोल देती हूँ," मैंने कहा। मुझे सच में लगा था... मैं उसे आज़ाद कर दूँगी... और वो मुझे छोड़ देगा।
वो हँसा। इस बार उसकी हँसी में कोई चिंगारी नहीं थी।
"एक मुँह से बोली गई बात... एक कमरे की हवा में रहती है, रितिका। मुझे इससे ज़्यादा हवा चाहिए।
मुझे हज़ारों कान चाहिए।"
मैं उस वक़्त समझी नहीं।
फिर उसने मेज़ पर पड़े मेरे फ़ोन की तरफ़ इशारा किया। स्क्रीन... अपने आप जल गई थी। चट्ट... जैसे शीशे के अंदर कुछ टूटा हो। उस पर एक यूट्यूब चैनल खुला था।
अनुराग की वाणी।
आपका चैनल, अनुराग भाई।
मैं आपकी कहानियाँ पिछले दो साल से सुनती थी। तलाक़ के बाद... रातों को... जब नींद नहीं आती थी। छत पर बैठकर। आपकी आवाज़ मेरी आदत बन गई थी।
और उसे... ये पता था।
"इसे भेजो," उसने कहा। "अपनी कहानी। सब कुछ। जैसे हुआ।"
"और उसके बाद?"
"उसके बाद मैं तुम्हें छोड़ दूँगा। तुम्हारी पीठ साफ़ हो जाएगी। तुम फिर से... सिर्फ़ तुम हो जाओगी।"
अनुराग भाई... ये मेल मैं रात के तीन बजे लिख रही हूँ।
वो मेरे पीछे खड़ा है। उसकी साँस मेरी गर्दन पर है। मेरा कीबोर्ड इतना गरम है... कि मेरी उँगलियों के पोर लाल हो गए हैं।
मैंने आपको सब सच बताया है। बस एक बात छुपाई है।
वो आख़िरी सतर... जो किताब के आख़िरी पन्ने पर उलटी लिखी थी...
मैंने उसे इस कहानी में ही रख दिया है।
पर शब्दों में नहीं, अनुराग भाई। ख़्वाजा ने वो सतर आग की ज़ुबान में लिखी थी। और आग की ज़ुबान... वही एक आवाज़ है... जो आप इस कहानी में बार-बार सुनते आए हैं।
इस कहानी में... जितनी बार भी वो आवाज़ आई है... हर बार वो उस सतर का एक अक्षर था।
सात अक्षर। सात बार।
यक़ीन न हो... तो कहानी दोबारा सुनिए। और गिनिए।
आग का अक्षर पढ़ा नहीं जाता, अनुराग भाई... सुना जाता है। जिस कान में सातों पहुँच गईं... उसके अंदर वो सतर पूरी हो जाती है। और हर पूरी सतर... उसकी ज़ंजीर की एक कड़ी खोल देती है।
इसीलिए उसे हज़ारों कान चाहिए।
और जिस कान ने कड़ी खोली... वो सबसे पहले... उसी के पास आता है।
मुझे माफ़ कर दीजिएगा।
और अगर आप ये कहानी सुनाएँ... तो प्लीज़... धीमी आवाज़ में मत सुनाइएगा।
बुलंद आवाज़ में सुनाइएगा।
उसने कहा है... बुलंद आवाज़ में।
और हाँ... अगर इसे पढ़ते हुए... आपको अपनी गर्दन पर कोई गरम साँस महसूस हो...
तो पीछे मत देखिएगा।
वो बस ये देखने आया है... कि आप पढ़ रहे हैं... या नहीं।
रितिका।

Writer
Pretika
Story
सियाही का क़ैदी — 600 साल पुराना इफ़रीत
Chapter
4 of 4
Category
Jinn & Spirits
Reading time
3 min
Words
584
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

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