Pretika › Jinn & Spirits › सियाही का क़ैदी — 600 साल पुराना इफ़रीत

भाग तीन- पीठ पर लिखावट

Pretika · Jinn & Spirits · 6 मिनट

मार्च के आख़िर तक... मैंने किताब के एक सौ बीस पन्ने साफ़ कर दिए थे। कुल पन्ने थे... एक सौ इकसठ।
उन दिनों मैं ठीक से खाती नहीं थी। सोती भी बहुत कम थी। पर अजीब बात ये थी... कि मैं पहले से ज़्यादा ख़ूबसूरत दिखने लगी थी। मेरी खाल में एक चमक आ गई थी। आँखों के नीचे के काले घेरे ग़ायब हो गए थे। होंठ हमेशा हल्के गरम रहते थे।
पड़ोस वाली श्रीवास्तव आंटी ने एक दिन सीढ़ियों पर रोककर कहा... "रितिका... कोई नया आया है क्या ज़िंदगी में? चेहरा दमक रहा है।"
मैं बस मुस्कुरा दी।
फिर एक रात... नहाते वक़्त... मैंने आईने में अपनी पीठ देखी।
मेरी कमर के ठीक ऊपर... रीढ़ की हड्डी के दाईं तरफ़... कुछ निशान थे। हल्के भूरे। जैसे खाल पर किसी ने बहुत हल्के से कोई गरम सलाई फिराई हो।
मैंने फ़ोन से फ़ोटो खींची। ज़ूम किया।
वो निशान नहीं थे, अनुराग भाई।
वो अक्षर थे।
फ़ारसी के अक्षर। वही नाज़ुक... बल खाती लिखावट। वही... जो उस किताब में थी।
मेरा पूरा जिस्म काँपने लगा। और मुझे याद आया... हर रात... जब वो मेरे पीछे होता था... उसकी उँगली मेरी पीठ पर चलती थी। धीरे-धीरे। रुक-रुककर। बल खाती हुई। और मैं समझती थी... वो बस मुझे सहला रहा है।
वो सहला नहीं रहा था।
वो लिख रहा था।
उस रात जब वो आया... मैंने पहली बार उसे धक्का दिया।
"ये क्या है? मेरी पीठ पर क्या लिख रहे हो तुम?"
वो हँसा। उसकी हँसी में से छोटी-छोटी चिंगारियाँ निकलीं... चट्ट... और फ़र्श पर गिरकर बुझ गईं।
"किताब पुरानी हो गई है, रितिका," उसने कहा। "काग़ज़ गलता है। सियाही उखड़ती है। छह सौ साल में मैंने एक बात सीखी है... कि काग़ज़ से बेहतर क़ैदख़ाना... ज़िंदा खाल होती है।"
"तुम मुझे... किताब बना रहे हो?"
"नहीं," उसने मेरे बालों में उँगलियाँ फिराईं। "घर बना रहा हूँ।"
मैंने रसोई की तरफ़ भागना चाहा। पानी। मुझे लगा... पानी से शायद...
मैंने गिलास भरा। होंठों तक लाई।
पानी उबल रहा था।
गिलास में बड़े-बड़े बुलबुले उठ रहे थे। भाप निकल रही थी। और गिलास... काँच का वो गिलास... मेरे हाथ में... बर्फ़ जैसा ठंडा था।
सिर्फ़ पानी उबल रहा था।
"मुझसे दूर जाने की कोशिश मत करना," उसकी आवाज़ मेरे बिल्कुल पीछे से आई। मेरे कान से सटकर। "मैं नाराज़ होता हूँ... तो चीज़ें जलती हैं। तुम फ़रहत को देख चुकी हो।"
फिर उसने मुझे पीछे से अपनी बाहों में भर लिया।
मैं उसकी बाहों से छूटने के लिए छटपटा रही थी। तब उसने मेरे कान में कुछ कहा... जिसने मुझे वहीं रोक दिया।
"पिछले साल... दिसंबर की एक रात... तुम छत पर अकेली बैठी थीं। बहुत ठंड थी। तुमने आसमान की तरफ़ देखकर... बहुत धीमे से कुछ कहा था। याद है?"
मुझे याद था। वो बात मैंने किसी से नहीं कही थी। अपनी डायरी में भी नहीं लिखी थी।
और उसने वो बात... शब्द-ब-शब्द... मेरे कान में दोहरा दी।
"कोई तो हो... जो मुझे ऐसे छुए... जैसे मैं उसके पास बची आख़िरी चीज़ हूँ।"
मेरी आँखों से आँसू बहने लगे।
"तुम्हारे पति ने आख़िरी दो साल... तुम्हें एक बार भी ऐसे नहीं छुआ," वो फुसफुसाया। "और मुझे छह सौ साल किसी ने नहीं छुआ। हम दोनों जानते हैं रितिका... ठंड क्या होती है।"
उस पल मुझे समझ आया। मैं उससे डरती थी। बहुत डरती थी। पर उससे भी ज़्यादा डर मुझे इस बात से लगता था... कि अगर वो चला गया... तो वो सन्नाटा वापस आ जाएगा।
मैंने छटपटाना बंद कर दिया।
उसकी साँसें मेरी गर्दन पर थीं। उसके हाथ मेरी कमर पर। और उसकी उँगली... फिर से... मेरी पीठ पर... धीरे-धीरे... चलने लगी।
उस रात उसने मेरी पीठ पर तीन सतरें और लिखीं।
और मैंने... उसे लिखने दिया।
अप्रैल की एक रात... जब वो मेरे पास लेटा था... मैंने उससे पूछा...
"ख़्वाजा फ़ख़रुद्दीन ने तुम्हें क़ैद क्यों किया था?"
बहुत देर तक वो चुप रहा। कमरे की गर्मी अचानक कम हो गई। उन सारे दिनों में... पहली बार... मुझे उसके पास लेटे हुए ठंड लगी।
फिर उसने बताया।
चौदह सौ पच्चीस का जौनपुर। ख़्वाजा फ़ख़रुद्दीन दरबार का सबसे बड़ा ख़त्तात था। सुलेखक। उसकी लिखावट पर बादशाह सोने के सिक्के लुटाते थे।
उसकी एक बीवी थी। नाम था... नूरजहाँ। उम्र में उससे बहुत छोटी। ख़्वाजा उसे ऐसे रखता था... जैसे कोई क़ीमती क़लमदान। बंद। सजाकर। किसी को दिखाए बिना।
"वो हर रात छत पर आती थी," आज़रनाल ने कहा। "अकेली। और आसमान की तरफ़ देखकर... रोती थी। मैं उन दिनों उस शहर की गरम हवाओं में घूमता था। मैंने उसका रोना सुना। और मैं... नीचे उतर आया।"
दो साल तक... हर रात... नूरजहाँ छत पर इंतज़ार करती थी। और एक इफ़रीत... बादलों में से उतरकर उसके पास आता था।
"फिर ख़्वाजा को पता चल गया," उसकी आवाज़ में अब गर्मी नहीं थी। एक अजीब सी... राख थी। "वो इल्म जानता था। उसने एक बूढ़े आलिम से सीखा था... कि आग को कैसे बाँधा जाता है। पर आग को बाँधने के लिए... सियाही चाहिए थी। ख़ास सियाही।"
उसने मेरी तरफ़ देखा। उसकी अंगारों जैसी आँखें... उस वक़्त बुझी-बुझी सी थीं।
"जानती हो रितिका... वो किताब जिस सियाही से लिखी गई है... उसमें क्या मिला है?"
मुझे जवाब नहीं चाहिए था। फिर भी उसने बताया।
"नूरजहाँ की राख।"
कमरे में इतनी ख़ामोशी हो गई... कि मुझे अपने दिल की धड़कन सुनाई दे रही थी। और उस ख़ामोशी में... बगल वाले कमरे से... किताब की तरफ़ से... एक आवाज़ आई। चट्ट।
"उसने उसे जलाया," आज़रनाल ने कहा। "मेरी आँखों के सामने। और फिर उसकी राख को... गोंद और कालिख में मिलाकर... मेरा नाम लिखा। हज़ार बार। मैं उस सियाही से नहीं लड़ सकता था... क्योंकि उस सियाही में वो थी। जिसे मैंने चाहा था। हर अक्षर में... वो थी।"
"छह सौ साल," उसने कहा, "मैं उसकी राख में क़ैद रहा। और उसकी राख... मुझे पकड़े रही। जैसे वो छत पर पकड़ती थी।"
मुझे उस पर तरस आ रहा था, अनुराग भाई। एक जिन्न पर। एक आग पर।
और तभी मुझे समझ आया... कि हर बार जब मैं ब्रश से किसी अक्षर को धुँधला करती थी... तो मैं सिर्फ़ उसकी ज़ंजीर नहीं तोड़ रही थी।
मैं नूरजहाँ को... धीरे-धीरे... मिटा रही थी।
और फिर उसने वो बात कही... जिसके बाद मैं आज तक ठीक से सो नहीं पाई।
"तुम्हें पता है मैंने तुम्हें क्यों चुना, रितिका?"
मैंने सिर हिलाया।
"उस बक्से को किसी ने तुम्हारे पास नहीं भेजा। कोई सहगल नहीं है। कोई दिल्ली वाला क्लाइंट नहीं है।"
वो मेरे कान के पास झुका।
"मैंने तुम्हें ढूँढा। उन आँखों से... जो नूरजहाँ की थीं। उस अकेलेपन से... जो उसका था। दिसंबर की उस रात... छत पर... तुमने आसमान से कुछ माँगा था न, रितिका?
मैंने सुना था। ये बक्सा... उसी का जवाब था।"
मेरी साँस रुक गई।
दिसंबर की वो रात... और फरवरी में ये बक्सा। ठीक दो महीने। मैंने हिसाब लगाया... और मेरा पूरा जिस्म ठंडा पड़ गया।
उस रात मैंने आसमान से जो माँगा था... वो किसी ने सुन लिया था। और भेज भी दिया था।

Writer
Pretika
Story
सियाही का क़ैदी — 600 साल पुराना इफ़रीत
Chapter
3 of 4
Category
Jinn & Spirits
Reading time
6 min
Words
1140
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

← पिछला भाग  ·  अगला भाग →

सियाही का क़ैदी — 600 साल पुराना इफ़रीत · सभी भाग →

और कहानियाँ · More stories