Pretika › Jinn & Spirits › सियाही का क़ैदी — 600 साल पुराना इफ़रीत

भाग दो - हाशिये की चेतावनी

Pretika · Jinn & Spirits · 7 मिनट

अगली सुबह मैं फ़रहत आपा के पास गई।
डॉक्टर फ़रहत जहाँ। यूनिवर्सिटी से रिटायर फ़ारसी की प्रोफ़ेसर। सत्तर के ऊपर उम्र... मोटा चश्मा... और पान का शौक़। जब भी मुझे कोई पुरानी लिखावट पढ़नी होती थी... मैं उन्हीं के पास जाती थी।
मैंने किताब के कुछ पन्नों की फ़ोटो उन्हें दिखाईं।
पहले तो वो मुस्कुराईं। "माशाअल्लाह... क्या लिखावट है। ऐसा ख़त अब कौन लिखता है।"
फिर वो पढ़ने लगीं। और पढ़ते-पढ़ते... उनके चेहरे की मुस्कान... धीरे-धीरे ग़ायब हो गई।
"रितिका... ये किताब कहाँ से आई?"
मैंने सब बताया।
उन्होंने चश्मा उतारा। बहुत देर तक कुछ नहीं बोलीं। फिर धीरे से कहा...
"बेटा... ये कोई किताब नहीं है। ये एक क़ैदख़ाना है।"
उन्होंने समझाया। ये पूरी किताब... एक ही इबारत है। बार-बार दोहराई गई। हज़ारों बार। एक नाम... और उसके साथ बाँधने वाले शब्द। जैसे किसी को ज़ंजीर में बाँधा जाए... और हर अक्षर... उस ज़ंजीर की एक कड़ी हो।
"किसका नाम है?" मैंने पूछा।
फ़रहत आपा ने वो नाम ज़ोर से नहीं पढ़ा। उन्होंने एक काग़ज़ पर लिखा... और चुपचाप मेरी तरफ़ खिसका दिया।
आज़रनाल।
"ये इफ़रीत है," उन्होंने बहुत धीमी आवाज़ में कहा। "जिन्नों में सबसे ताक़तवर क़ौम। आग से बने हुए। पर वो आग नहीं... जो धुआँ देती है। बिना धुएँ की आग। जिसे पुरानी किताबों में कहते हैं... नार-ए-समूम।"
फिर उन्होंने एक फ़ोटो को बड़ा किया। पन्ने के हाशिये पर... बहुत छोटे-छोटे अक्षरों में... किसी ने कुछ लिखा था।
"ये लिखने वाले ने ख़ुद लिखा है," फ़रहत आपा बोलीं। "एक चेतावनी।"
और उन्होंने उसका मतलब बताया...
"जो इसे पढ़े... वो चुपचाप पढ़े। इसे कभी बुलंद आवाज़ में न पढ़ा जाए। क्योंकि... लिखा हुआ बाँधता है। और बोला हुआ... खोलता है।"
मेरे हाथ ठंडे पड़ गए।
"और एक बात," फ़रहत आपा ने मेरी कलाई पकड़ ली। उनकी पकड़ में अजीब सी जल्दबाज़ी थी। "तुम इसकी सियाही साफ़ कर रही हो न? रुक जाओ। आज ही रुक जाओ। हर अक्षर जो तुम्हारे हाथ से धुँधला होता है... वो उस ज़ंजीर की एक कड़ी तोड़ता है।"
मैंने उनसे वादा किया... कि मैं रुक जाऊँगी।
उसी रात... साढ़े ग्यारह बजे... फ़रहत आपा का फ़ोन आया।
उनकी आवाज़ काँप रही थी।
"रितिका... मेरे कमरे में कोई है।"
फिर फ़ोन में एक आवाज़ आई... चट्ट... जैसे कोई चीज़ बहुत तेज़ गर्मी से फटी हो।
और फ़ोन कट गया।
सुबह ख़बर आई। फ़रहत आपा के स्टडी रूम में आग लगी थी। सिर्फ़ उसी एक कमरे में। बाक़ी घर को आँच तक नहीं आई। उनकी लाइब्रेरी... उनके चालीस साल के नोट्स... और वो फ़ोटो जो मैंने उन्हें दी थीं... सब राख।
फ़रहत आपा बच गईं।
पर उनका चश्मा... जो उस वक़्त उन्होंने पहना हुआ था... उसके दोनों शीशे बीच से टूट गए थे।
बाहर की तरफ़ से नहीं।
अंदर की तरफ़ से।
जैसे गर्मी... उनकी आँखों में से निकली हो।
अस्पताल में जब मैं उनसे मिलने गई... उन्होंने मेरी तरफ़ देखा तक नहीं। दीवार की तरफ़ मुँह किए लेटी रहीं। बस इतना कहा...
"वो तुम्हें जलाएगा नहीं, रितिका। वो तुम्हें चाहता है। और जिसे इफ़रीत चाहता है... उसके आस-पास बाक़ी सबको जलना पड़ता है।"
अब आप पूछेंगे... मैंने वो किताब वापस क्यों नहीं भेज दी?
मैंने कोशिश की थी, अनुराग भाई। सच में।
अगले दिन मैंने बक्सा पैक किया। दिल्ली वाले सहगल को फ़ोन किया। नंबर बंद था। मैंने उनका ईमेल ढूँढा... जो पहले आया था। वो ईमेल मेरे इनबॉक्स में था ही नहीं। न इनबॉक्स में... न ट्रैश में। बैंक में पचास हज़ार का एडवांस आया था... उसकी एंट्री तो थी... पर भेजने वाले का नाम... ख़ाली था।
मैं बक्सा लेकर कूरियर ऑफ़िस तक गई। रास्ते भर गाड़ी का एसी चलता रहा... फिर भी मेरी पीठ से पसीना बहता रहा। काउंटर पर पहुँची... और वहाँ खड़े-खड़े... मेरे मुँह से ये शब्द निकले...
"सॉरी भैया... ग़लती से आ गई।"
और मैं बक्सा लेकर... वापस घर आ गई।
मुझे आज तक याद नहीं... कि मैंने ऐसा क्यों कहा।
उस रात वो फिर आया।
इस बार मैं जागी हुई थी। मैंने कमरे की ट्यूबलाइट जलाकर रखी थी। और फिर भी... रोशनी धीरे-धीरे पीली हुई... फिर नारंगी... फिर इतनी धीमी... जैसे किसी दीये की लौ। और ट्यूबलाइट के अंदर से... एक आवाज़ आई... चट्ट।
और उस धीमी रोशनी में... मैंने उसे पहली बार देखा।
वो मेरे बिस्तर के पैताने बैठा था।
उसका जिस्म किसी आदमी जैसा था। लंबा। चौड़े कंधे। पर उसकी खाल... जैसे किसी भट्टी की दीवार हो। ऊपर से काली... और दरारों के अंदर से... हल्की लाल चमक। उसके बाल धुएँ जैसे थे... जो नीचे नहीं गिरते थे... ऊपर की तरफ़ बहते थे।
और उसकी आँखें...
अनुराग भाई... उसकी आँखें दो अंगारे थीं। और उनमें एक ऐसी भूख थी... जो सिर्फ़ जिस्म की नहीं थी। छह सौ साल के अकेलेपन की भूख।
"तुमने बक्सा वापस क्यों नहीं दिया?" उसने पूछा। और मुस्कुराया... जैसे उसे जवाब पता हो।
मेरे पास कोई जवाब नहीं था।
वो आगे बढ़ा। बिस्तर पर उसके हाथ जहाँ-जहाँ पड़ते... चादर पर हल्के भूरे निशान बन जाते। जैसे इस्त्री ज़्यादा देर रखी रह गई हो।
उसने मेरा चेहरा अपने दोनों हाथों में लिया। मुझे लगा मेरी खाल जल जाएगी।
नहीं जली।
बस एक गर्मी... मेरे गालों से उतरकर... गर्दन से होती हुई... सीने तक... और फिर पूरे जिस्म में... धीरे-धीरे फैल गई। जैसे सर्दी की रात में कोई गरम पानी में उतरता है।
"छह सौ साल," वो फुसफुसाया। "मैं सियाही में रहा हूँ। अँधेरे में। ठंड में। तुम नहीं जानती रितिका... आग के लिए ठंड क्या होती है।"
उसने अपने होंठ मेरे होंठों के बिल्कुल पास लाए... पर छुए नहीं। बस उसकी साँस... गरम... लौंग जैसी महकती साँस... मेरी साँस में घुलती रही।
उस रात के बाद की बातें... मैं यहाँ नहीं लिख सकती, अनुराग भाई।
बस इतना कहूँगी... जो चार साल से मेरे अंदर ठंडा पड़ा था... उसने एक रात में उसे पिघला दिया।
सुबह उठी... तो चादर पर... मेरे ठीक बगल में... एक इंसानी जिस्म का भूरा... झुलसा हुआ निशान था।
और मैं... मुस्कुरा रही थी।
उसके बाद... रातें बदल गईं।
दिन में मैं काम करती। किताब के पन्ने साफ़ करती। मुझे पता था मैं क्या कर रही हूँ। हर अक्षर जो मेरे ब्रश के नीचे धुँधला होता... वो उसकी ज़ंजीर की एक कड़ी थी। मुझे पता था। फ़रहत आपा का चश्मा मुझे याद था।
फिर भी... मेरे हाथ नहीं रुकते थे।
क्योंकि हर रात... दिन में जितने अक्षर मैं मिटाती... वो उतना ही ज़्यादा... असली होकर आता।
पहले हफ़्ते वो बस एक आवाज़ था। फिर एक साया। फिर एक गर्मी... जो मुझे छूती थी। और फिर... चीज़ें बदलने लगीं।
एक सुबह मैंने किताब खोली... तो जिस पन्ने को मैंने पिछले दिन साफ़ किया था... उस पर अक्षर फिर से उभर आए थे।
पर वो अक्षर फ़ारसी के नहीं थे।
वो हिंदी में थे। और लिखावट... मेरी अपनी थी। पूरे पन्ने पर... ऊपर से नीचे तक... सैकड़ों बार... एक ही शब्द लिखा था।
रितिका... रितिका... रितिका।
जैसे कोई मेरा नाम... रट रहा हो। याद कर रहा हो। ताकि कभी भूले नहीं।
और फिर... मेरी अपनी यादें बदलने लगीं।
अलमारी में मेरी शादी का एल्बम पड़ा था। एक रात मैंने उसे खोला। हर फ़ोटो में... मेरे पति का चेहरा झुलसा हुआ था। जैसे किसी ने जलती सलाई से उसे मिटा दिया हो। बाक़ी सब वैसा ही था... मेरी लाल साड़ी... मेहमान... फूल। बस उनका चेहरा नहीं था।
मैंने आँखें बंद करके उनका चेहरा याद करने की कोशिश की।
सात साल साथ रही थी उस आदमी के साथ... और मुझे उसका चेहरा याद नहीं आया।
याद आईं... तो बस दो जलती हुई आँखें।
मेरी कामवाली कमला ने एक दिन बर्तन धोते हुए पूछा... "दीदी... रात को कोई आता है क्या? सुबह-सुबह कमरे में धुएँ की बास रहती है।"
मैंने कहा... नहीं। कोई नहीं आता।
अगले दिन कमला ने काम छोड़ दिया। जाते-जाते दरवाज़े पर रुकी... और बोली...
"दीदी... आपके कमरे के बाहर... फ़र्श पर पैरों के निशान हैं। जले हुए। और उन पैरों में उँगलियाँ... पाँच नहीं हैं, दीदी।
चार हैं।"

Writer
Pretika
Story
सियाही का क़ैदी — 600 साल पुराना इफ़रीत
Chapter
2 of 4
Category
Jinn & Spirits
Reading time
7 min
Words
1287
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

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