Pretika › Jinn & Spirits › सियाही का क़ैदी — 600 साल पुराना इफ़रीत

भाग एक — वो बक्सा

Pretika · Jinn & Spirits · 5 मिनट

मेरा नाम रितिका है। उम्र चौंतीस साल। लखनऊ में रहती हूँ... एक पुराने दो-मंज़िला मकान की ऊपरी मंज़िल पर।
मेरा काम थोड़ा अजीब है। मैं पुरानी किताबें ठीक करती हूँ। फटे हुए पन्ने... दीमक खाई जिल्दें... पानी में भीगी पांडुलिपियाँ। लोग मेरे पास लाते हैं... और मैं उन्हें फिर से साँस लेने लायक बनाती हूँ।
तलाक़ को चार साल हो चुके थे। घर में मैं थी... मेरी किताबें थीं... और एक सन्नाटा था। जिसकी मुझे आदत पड़ चुकी थी।
पिछले साल फरवरी की बात है। दिल्ली से एक फ़ोन आया। एक आदमी ने अपना नाम बताया... सहगल। बोले... हमारे क्लाइंट ने एक पुरानी फ़ारसी किताब ख़रीदी है। जौनपुर के एक पुराने ख़ानदान से। पानी में ख़राब हो गई है। आपका नाम सुना है... काम करेंगी?
फ़ीस उन्होंने जो बताई... वो मेरी छह महीने की कमाई थी।
मैंने हाँ कर दी।
तीन दिन बाद एक लकड़ी का बक्सा आया। कूरियर वाला लड़का उसे सीढ़ियों पर रखकर बोला...
"दीदी... इसमें कुछ गरम चीज़ है क्या? पकड़े-पकड़े हाथ जल रहे थे।"
मैं हँस दी। फरवरी की सुबह थी। ठंडी हवा चल रही थी।
पर जब मैंने बक्सा उठाया... तो सच में... लकड़ी गुनगुनी थी। जैसे किसी ने अभी-अभी उसे धूप में से उठाकर रखा हो।
बक्से के अंदर... लाल मख़मल में लिपटी हुई एक किताब थी। चमड़े की जिल्द... जो जगह-जगह से फट गई थी। और उसमें से एक ख़ुशबू आ रही थी... जली हुई लौंग जैसी। मीठी भी... और तीखी भी।
साथ में एक पर्ची थी। उस पर लिखा था...
"किताब-उल-क़ैद। लिखने वाले... ख़्वाजा फ़ख़रुद्दीन। सन चौदह सौ सत्ताईस। जौनपुर।"
चौदह सौ सत्ताईस। यानी करीब छह सौ साल पुरानी।
मैंने दस्ताने पहने... और पहला पन्ना खोला। और ठीक उसी पल... कमरे में कहीं से... एक बहुत हल्की आवाज़ आई... चट्ट।
पन्नों पर पानी के बड़े-बड़े धब्बे थे। शायद किसी ने उसे सीलन वाले संदूक में रखा था। फ़ारसी की लिखावट थी... बेहद ख़ूबसूरत... गहरी काली सियाही में।
पर एक बात अजीब थी।
जहाँ-जहाँ पानी लगा था... वहाँ काग़ज़ गल गया था। पर सियाही फैली नहीं थी। अक्षर वैसे के वैसे थे। साफ़। तीखे। जैसे सियाही ने पानी को ख़ुद को छूने ही नहीं दिया हो।
मैंने अपना हाइग्रोमीटर निकाला... वो छोटी सी मशीन जो हवा की नमी नापती है। कमरे में नमी थी साठ प्रतिशत। मैंने मशीन को किताब के पास रखा...
सुई धीरे-धीरे गिरने लगी।
पचास...
चालीस...
बाईस।
जैसे किताब के आसपास की हवा... सूख रही हो। जैसे वो किताब... साँस ले रही हो। और हर साँस में... कमरे की नमी पी रही हो।
उस दिन मैंने इसे मशीन की ख़राबी समझा।
आज सोचती हूँ... काश उसी दिन... वो बक्सा बंद करके वापस भेज दिया होता।
काम शुरू हुआ। तरीक़ा सीधा था। हर पन्ने को धीरे से अलग करना... गंदगी हटाना... फटी जगह पर बारीक काग़ज़ चिपकाना। और जहाँ सियाही की परत उखड़ रही हो... वहाँ उसे नरम ब्रश से साफ़ करके... फिर से जमाना।
पहले हफ़्ते मैंने ग्यारह पन्ने साफ़ किए।
और हर पन्ने के बाद... मुझे एक चीज़ महसूस होती थी। मेरी उँगलियों के पोर गरम हो जाते थे। दस्तानों के अंदर भी। जैसे मैंने चाय का गिलास बहुत देर तक पकड़ रखा हो।
और एक बात... जो मैंने उस वक़्त ध्यान नहीं दी। जिस अक्षर पर मेरा ब्रश ज़्यादा देर रुकता... वो अक्षर थोड़ा धुँधला हो जाता। फिर छठे दिन... एक अक्षर मेरे ब्रश के नीचे पूरा मिट गया। और उसी पल... कमरे में कहीं... एक आवाज़ आई। चट्ट। जैसे चूल्हे में कोई सूखी लकड़ी टूटी हो।
आठवीं रात... मैं देर तक काम करती रही। करीब एक बजे मैंने टेबल लैंप बंद किया... और बिस्तर पर लेट गई।
फरवरी थी। मैं रज़ाई ओढ़कर सोती थी।
उस रात... मैं पसीने में भीगकर उठी।
कमरा गरम था। इतना गरम... जैसे मई की दोपहर हो। मैंने रज़ाई हटाई... पंखा चलाने के लिए उठने लगी...
तभी... किसी ने मेरे कान के बहुत पास... साँस ली।
धीमी... लंबी... गरम साँस।
मैं जम गई। आँखें खुली थीं... पर गर्दन घुमाने की हिम्मत नहीं थी। और फिर एक आवाज़ आई। इतनी धीमी... कि लगा मेरे अपने सिर के अंदर से आई है।
"तुम्हारे हाथ... बहुत नरम हैं।"
वो आवाज़ किसी आदमी की थी। गहरी। भारी। और उसमें एक खरखराहट थी... जैसे अंगीठी में कोयले सुलगते हैं।
मैंने चीख़ना चाहा। गला सूखा पड़ा था। आवाज़ ही नहीं निकली।
"डरो मत," आवाज़ फिर आई। "छह सौ साल से... किसी ने मुझे इतनी नरमी से नहीं छुआ।"
और फिर... मेरी गर्दन पर... किसी की उँगली चली।
कान के नीचे से... धीरे-धीरे... कंधे तक।
वो उँगली नहीं थी, अनुराग भाई। वो जैसे गरम कोयले की एक लकीर थी। जो जलाती नहीं थी... बस... पिघलाती थी।
मुझे शर्म आती है ये कहते हुए... पर उस पल में डर के साथ-साथ... कुछ और भी था। मेरा जिस्म... मेरे डर की बात नहीं सुन रहा था।
वो उँगली कंधे से नीचे उतरी... और मेरी पीठ पर... रीढ़ की हड्डी के साथ-साथ... रुक-रुककर... बल खाती हुई चलने लगी। जैसे कोई... कुछ बना रहा हो।
मैंने पूरी हिम्मत जुटाई... और गर्दन घुमाई।
कमरे में कोई नहीं था।
बस बगल वाले कमरे से... जहाँ किताब रखी थी... दरवाज़े के नीचे की दरार से... एक हल्की नारंगी रोशनी आ रही थी। जैसे अंदर कोई अंगीठी सुलग रही हो।
मैं भागकर गई। दरवाज़ा खोला।
अँधेरा। ठंडा कमरा। किताब मेज़ पर वैसे ही बंद पड़ी थी।
पर जब मैंने उस पर हाथ रखा...
वो किसी ज़िंदा इंसान के जिस्म जितनी गरम थी।
और उसकी जिल्द के नीचे... बहुत धीमे... जैसे कुछ धड़क रहा था।

Writer
Pretika
Story
सियाही का क़ैदी — 600 साल पुराना इफ़रीत
Chapter
1 of 4
Category
Jinn & Spirits
Reading time
5 min
Words
896
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

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