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भाग 1 — तीन बजकर सात मिनट

Pretika · Haunted Places · 9 मिनट

Writer
Pretika
Story
दृश्यम: वो फिर लौट आया
Chapter
1 of 5
Category
Haunted Places
Reading time
9 min
Words
1618
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

17 जुलाई 2026, रात के तीन बजकर सात मिनट।

उत्तर गोवा के शिरवडे गाँव में उस वक़्त इतनी तेज़ बारिश हो रही थी कि खपरैल पर गिरते पानी के शोर में अपनी साँस भी सुनाई नहीं देती थी, और वृंदावन होमस्टे के बरामदे में रघुवीर नाईक प्लास्टिक की कुर्सी पर बैठा अपने सामने खुले रजिस्टर को ऐसे देख रहा था जैसे कोई आदमी उस कुत्ते को देखता है जिसके बारे में उसे पक्का पता हो कि वो काटेगा, बस ये नहीं पता कि कब।

रजिस्टर में कुछ ख़ास नहीं था। हर होमस्टे में होता है, लाल जिल्द वाला, लंबा, जिसमें मेहमान का नाम, पता, आने का वक़्त, कमरा नंबर और आख़िर में रिमार्क का एक कॉलम होता है जिसे कोई नहीं भरता। आख़िरी भरी हुई लाइन पर रघु की अपनी लिखावट थी: चेक-आउट, 15 जुलाई, सुबह साढ़े छह बजे। उसके नीचे की लाइन ख़ाली थी, और पेन रजिस्टर के ऊपर आड़ा रखा था, ढक्कन बंद।

दीवार घड़ी की बड़ी सुई सात पर पहुँची तो बल्ब एक बार काँपा, जैसे मानसून में गोवा के हर गाँव में काँपता है, और जब रोशनी वापस ठहरी तो ख़ाली लाइन ख़ाली नहीं थी। नीली स्याही अभी गीली थी। नाम: विराज सक्सेना। पता: भोपाल। चेक-इन: 17 जुलाई, 3:07। कमरा नंबर: 3। और रिमार्क वाले कॉलम में, उसी झुकी हुई, जल्दबाज़ लिखावट में जिसे रघु तीन हफ़्ते से पहचानता था, तीन शब्द: “कमरा वही चाहिए।”

पेन का ढक्कन अब भी बंद था।

रघु चीखा नहीं। चीखता वो आदमी है जिसे समझ न आए कि हुआ क्या है, और रघु को पूरी तरह समझ आ रहा था, क्योंकि जिस आदमी का ये नाम था, उसे उसने दो रात पहले अपने इन्हीं हाथों से चादर में लपेटकर ज़मीन के तीन फ़ुट नीचे उतारा था।

तभी घर के पिछले हिस्से से, उस आख़िरी कमरे की तरफ़ से जिस पर उसने ख़ुद ताला लगाया था, एक दरवाज़े के धीरे से खुलने की आवाज़ आई।

ये कहानी उस दरवाज़े से शुरू नहीं होती। ये तीन हफ़्ते पहले शुरू होती है, और सच पूछो तो सात साल पहले।

दस्तख़त वाला आदमी

शिरवडे बार्देज़ तालुका का वो गाँव है जहाँ टूरिस्ट सिर्फ़ रास्ता भूलकर पहुँचते हैं। समंदर यहाँ से आठ किलोमीटर दूर है, और बीच में चापोरा नदी, नारियल के बाग़ और खारे पानी के वो निचले खेत पड़ते हैं जिन्हें गोवा में खज़ान कहते हैं। वृंदावन होमस्टे रघु के पिता का बनाया घर है, जिसके आँगन में तुलसी वृंदावन खड़ा है, यानी वो रंगा हुआ चौकोर चबूतरा जिसमें यहाँ का हर हिंदू घर तुलसी लगाता है, और उसी से होमस्टे का नाम पड़ा। मेहमानों के तीन कमरे हैं। कमरा नंबर तीन सबसे पीछे है, कुएँ की तरफ़, और सबसे नया; वो 2019 में बना, और उसी साल अगस्त में टूरिज़्म डिपार्टमेंट का लाइसेंस भी आ गया, जिसके लिए गाँव के दूसरे लोग दो-दो साल चक्कर काटते रहे।

लाइसेंस इतनी जल्दी आने की वजह रघु का दूसरा काम था।

क़ानून कहता है कि पुलिस जब कहीं छापा मारे, कुछ ज़ब्त करे या कोई लाश मिले, तो मौक़े पर दो आम, इज़्ज़तदार लोग मौजूद होने चाहिए जो बाद में कह सकें कि हाँ, ये सब हमारी आँखों के सामने हुआ। इन्हें पंच कहते हैं, और जो काग़ज़ बनता है उसे पंचनामा। मुश्किल ये है कि रात के दो बजे किसी शैक के पीछे से निकली चरस का गवाह बनने कोई इज़्ज़तदार आदमी घर से नहीं निकलता। इसलिए हर चौकी के पास दो-तीन ऐसे लोग होते हैं जो एक फ़ोन पर आ जाते हैं। शिरवडे चौकी के पास रघुवीर नाईक था।

पंद्रह साल में उसने कितने काग़ज़ों पर दस्तख़त किए, ये उसने कभी गिना नहीं। हर बार दो-तीन सौ रुपये मिलते, चाय मिलती, और वो चीज़ मिलती जो होमस्टे चलाने वाले के लिए पैसों से ज़्यादा क़ीमती है: चौकी इंचार्ज पीएसआई उल्हास देसाई का हाथ अपने कंधे पर। रघु का उसूल सीधा था और वो इसे छुपाता भी नहीं था, कि पंच का काम देखना नहीं, दस्तख़त करना है। देसाई काग़ज़ पर उँगली रखता, रघु साइन कर देता। पढ़ता नहीं था। पढ़ने वाले पंच को अदालत बुलाती है, ऐसा उसका मानना था।

फिर भी इतने बरस मौक़े पर खड़े रहने से आदमी बिना देखे बहुत कुछ सीख जाता है। रघु जानता था कि पुलिस किसी कमरे में घुसकर सबसे पहले कहाँ नज़र डालती है, दो लोगों को अलग-अलग बिठाकर एक ही सवाल क्यों पूछा जाता है, और डूबे हुए आदमी की फ़ाइल कितने महीने खुली रहती है। चालीस के आसपास लाशें उसने देखी थीं; समंदर से निकाली गईं, नदी से निकाली गईं, पंखे से उतारी गईं। ये सारी जानकारी उसके किसी काम की नहीं थी। जुलाई 2026 तक।

घर में उसके अलावा दो लोग थे। शर्वरी, अड़तीस साल की, जिससे उसकी शादी को बीस साल हो चुके थे और जिसे उसने आख़िरी बार ठीक से कब देखा था, ये पूछने पर उसे सोचना पड़ता। वो पाव वाले के भोंपू से पहले उठती, चूल्हा जलाती, मेहमानों की चादरें धोती, मछली साफ़ करती, और रात को उस बिस्तर के बाएँ किनारे पर सो जाती जिसका दायाँ हिस्सा अकसर ख़ाली रहता, क्योंकि छापे रात में पड़ते हैं। और ओवी, उन्नीस साल की, मापसा के कॉलेज में बी.कॉम सेकंड ईयर, जो बाप की हर बात पर सवाल करती थी और माँ की किसी बात पर नहीं।

मानसून में गोवा के होमस्टे ख़ाली रहते हैं। जून 2026 में वृंदावन के तीनों कमरों में मई के बाद से कोई नहीं ठहरा था। चौबीस जून, बुधवार की रात, साढ़े दस बजे के क़रीब, जब बारिश इतनी घनी थी कि गेट के पार की सड़क नहीं दिख रही थी, किसी ने गेट की कुंडी खटखटाई।

कमरा नंबर तीन का मेहमान

गेट पर एक आदमी खड़ा था, बिना छाते के, सिर से पाँव तक भीगा हुआ, कंधे पर रेक्सीन का एक छोटा बैग। तैंतीस-चौंतीस का रहा होगा, दुबला, दो दिन की दाढ़ी, और आँखों में वो थकान जो लंबे सफ़र से नहीं, लंबे इंतज़ार से आती है। बोला कि टैक्सी वाला मोड़ पर छोड़ गया है और उसे तीन हफ़्ते के लिए कमरा चाहिए, पंद्रह जुलाई तक।

ऑफ़-सीज़न में तीन हफ़्ते का मेहमान लॉटरी होता है, इसलिए रघु ने वो सवाल नहीं पूछे जो उसे पूछने चाहिए थे। उसने बस इतना पूछा कि कौन सा कमरा दिखाए।

“सबसे पीछे वाला,” उस आदमी ने कहा। “जो कुएँ की तरफ़ है।”

रघु को एक पल खटका कि अँधेरे में गेट पर खड़े इस आदमी को कुएँ का कैसे पता, फिर उसने मान लिया कि इंटरनेट पर फोटो देखी होगी। एडवांस में उस आदमी ने बटुए से दो-दो हज़ार के तीन नोट निकाले। रघु हँस पड़ा। “ये गुलाबी नोट तो तीन साल पहले बंद हो गए, साहब।”

“बंद नहीं हुए, बस चलन से हटे हैं। रिज़र्व बैंक के दफ़्तर में अब भी जमा हो जाते हैं।” फिर ज़रा रुककर उसने जोड़ा, “मेरे पास यही हैं।”

जुलाई के महीने में छह हज़ार रुपये कोई नहीं लौटाता। नोट अलमारी में चले गए।

आईडी में उसने ड्राइविंग लाइसेंस दिया। फोटोकॉपी निकालते हुए शर्वरी ने देखा कि लाइसेंस 2021 में ही एक्सपायर हो चुका है और जन्म का साल 1985 लिखा है, जिस हिसाब से इस आदमी को इकतालीस का होना चाहिए था। उसने कुछ कहा नहीं। कुछ लोग अपनी उम्र से छोटे दिखते हैं। रजिस्टर उस आदमी ने ख़ुद भरा, झुकी हुई, जल्दबाज़ लिखावट में, जैसे लिखने वाले को हमेशा कहीं पहुँचना हो। नाम: विराज सक्सेना। पता: भोपाल।

अगले कुछ दिनों में घर को उसकी आदत पड़ गई, और ये मुश्किल नहीं था क्योंकि विराज सक्सेना लगभग कुछ माँगता ही नहीं था। वो कहीं घूमने नहीं गया; न बीच, न क़िला, न मापसा का बाज़ार। सुबह से शाम तक कमरे के बाहर पीछे वाले बरामदे में बेंत की कुर्सी पर बैठा कुएँ पर गिरती बारिश देखता रहता। उसका फ़ोन, एक पुराना काला हैंडसेट जिसकी स्क्रीन के दाएँ कोने में दरार थी, मेज़ पर पड़ा रहता और कभी बजता नहीं था। कलाई पर स्टील के पट्टे वाली घड़ी थी जो बंद पड़ी थी; शर्वरी ने टोका तो उसने कहा उसे मालूम है, और घड़ी नहीं उतारी। पाँच जुलाई को कमरा नंबर तीन के फ़र्श में सीलन निकली और बाबू मिस्त्री एक कोने की टाइल्स उखाड़कर ये कहता हुआ चला गया कि बारिश थमे तो आएगा। रघु ने मेहमान से कमरा बदलने को कहा। विराज ने मना कर दिया, और उखड़े हुए फ़र्श को देखते हुए पूछा कि इस कमरे का सबसे पहला मेहमान कौन था। रघु को याद था: 2019 की दिवाली पर पुणे का एक परिवार। “नहीं,” विराज ने कहा, “उससे पहले।” रघु हँस दिया कि उससे पहले तो कमरा बना ही नहीं था। विराज ने इस पर कुछ नहीं कहा, और उसी कमरे में रहा, खुले फ़र्श के साथ।

रघु से उसकी बात कम होती थी, पर एक शाम दोनों आगे के बरामदे में साथ बैठे और विराज ने कहा, “सुना है आप पुलिस के पंच हैं।” रघु को याद नहीं आया कि घर में किसी ने मेहमान के सामने कभी इसका ज़िक्र किया हो, पर सुनकर उसे अच्छा लगा, और उसने थोड़े गर्व से समझाया कि ये काम होता क्या है।

“और आप देखते हैं? जो ज़ब्त होता है, जो लाश होती है?”

“देखने का टाइम किसके पास है। साहब बोलते हैं यहाँ साइन करो, कर देता हूँ। पंद्रह साल में एक बार भी कोर्ट ने नहीं बुलाया।”

“यानी आप वो गवाह हैं जिसने कुछ देखा ही नहीं।”

“इसी में सेफ़्टी है, विराज जी। जो देखता है, वही फँसता है।”

विराज देर तक बारिश की तरफ़ देखता रहा। “ये आपने सही कहा,” उसने आख़िर में कहा। “मैंने एक बार देख लिया था। बहुत महँगा पड़ा।”

रघु ने नहीं पूछा कि क्या देखा था। पूछना उसकी आदत में नहीं था।

ओवी को वो आदमी पहले दिन से खटकता था। वजह वो ख़ुद नहीं बता पाती थी; बस इतना कहती थी कि जो आदमी तीन हफ़्ते की छुट्टी लेकर गोवा आए और गेट से बाहर एक क़दम न रखे, वो छुट्टी पर नहीं, किसी काम से आया है।

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