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भाग 2 — बारिश, लालटेन और वो रात
Pretika · Haunted Places · 8 मिनट
- Writer
- Pretika
- Story
- दृश्यम: वो फिर लौट आया
- Chapter
- 2 of 5
- Category
- Haunted Places
- Reading time
- 8 min
- Words
- 1442
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
बारिश, लालटेन और शर्वरी
शर्वरी ने शुरू में उसे वैसे ही देखा जैसे बीस साल से हर मेहमान को देखती आई थी: एक चादर, दो तौलिये, तीन वक़्त की थाली। फ़र्क़ बस इतना था कि ये मेहमान उसे वापस देखता था।
पहली बार उसे ये पीछे के बरामदे में कपड़े फैलाते हुए महसूस हुआ, जब लगा कि कोई उसकी गर्दन के पीछे, जूड़े के ठीक नीचे वाली जगह को देख रहा है। मुड़ी तो विराज ने नज़र नहीं हटाई, माफ़ी भी नहीं माँगी। बस इतना कहा कि इस घर में सब आपको आवाज़ देते हैं, देखता कोई नहीं। शर्वरी को ग़ुस्सा आना चाहिए था। उसकी जगह कुछ और आया।
अपने बारे में वो बस इतना बताता था कि भोपाल में एक बहन है, तन्वी, इतनी ज़िद्दी कि एक इतवार भाई का फ़ोन न आए तो सीधे पुलिस में पहुँच जाए। शर्वरी ने ये बात एक रात खाने पर हँसते हुए रघु को भी सुनाई थी।
सात जुलाई की रात साढ़े ग्यारह बजे रघु का फ़ोन बजा, और दस मिनट में स्कूटर की लाल बत्ती बारिश में घुल गई। बारह बजे बिजली चली गई। शर्वरी लालटेन लेकर पीछे का दरवाज़ा बंद करने गई तो विराज बरामदे के खंभे से टिका खड़ा था, बौछार में भीगता हुआ।
“अंदर आ जाइए, भीग जाएँगे।”
“मैं तो कब का भीगा हुआ हूँ,” उसने कहा, और लालटेन की पीली रोशनी में उसका चेहरा देखता रहा।
जो हुआ उसमें कोई जल्दबाज़ी नहीं थी, और शायद इसीलिए वो उसे रोक नहीं पाई। उसने पहले सिर्फ़ उसकी कलाई छुई, चूड़ियों के पास, और वो उँगलियाँ इतनी ठंडी थीं कि शर्वरी के पूरे बदन में एक सिहरन उतर गई जिसे उसने बारिश के खाते में डाल दिया। फिर वही उँगलियाँ बाँह से कंधे तक आईं और गर्दन के पीछे उसी जगह ठहरीं जिसे वो कई दिनों से देखता आ रहा था। शर्वरी ने लालटेन नीचे रख दी। कमरा नंबर तीन का दरवाज़ा उसने ख़ुद अपने पीछे बंद किया।
खपरैल पर पानी इतने ज़ोर से बज रहा था कि उसे अपनी आवाज़ दबानी नहीं पड़ी। उस आदमी ने उसकी साड़ी की हर तह ऐसे खोली जैसे कोई बरसों बाद मिली चिट्ठी खोलता है, बिना फाड़े, और जहाँ-जहाँ उसके ठंडे होंठ पहुँचे, वहाँ शर्वरी को अपनी ही त्वचा जलती हुई लगी। उसके मुँह में नमक का स्वाद था। बीस साल की शादी में उसे छुआ बहुत बार गया था, चाहा पहली बार गया। जब उसकी पीठ बिस्तर से उठी, तो गले से जो नाम निकला वो उसके पति का नहीं था।
बाद में वो उसके सीने पर सिर रखे लेटी रही, और उसे हल्की-सी हैरानी हुई कि इतनी देर बाद भी वो बदन गरम नहीं हुआ था।
उसके बाद की रातों का हिसाब एक जैसा था: रघु का फ़ोन, स्कूटर की आवाज़, और बरामदे के आख़िर में एक दरवाज़ा जो भीतर से बंद नहीं होता था। शर्वरी दिन में गुनगुनाने लगी, बालों में अबोली के फूल लगाने लगी, और एक दोपहर मछली वाली फ़िलू मौशी ने उसे ग़ौर से देखकर कहा, “बाई, आजकल तू अकेले में बहुत मुस्कुराती है।”
पंद्रह जुलाई की रात
ओवी को ग्यारह जुलाई को पता चला, जब रात दो बजे पानी पीने उठी और उसने अपनी माँ को कमरा नंबर तीन से पल्लू सँभालते हुए निकलते देखा। तीन दिन वो चुप रही। चौदह की शाम रसोई में उसने बिना आवाज़ ऊँची किए कहा, “आई, मुझे सब पता है। कल सुबह तक वो आदमी इस घर से नहीं गया तो मैं बाबा को बता दूँगी। और अगर तुमसे नहीं निकलता, तो मैं निकाल दूँगी।”
उसी रात साढ़े ग्यारह बजे फ़ोन फिर बजा। नदी किनारे किसी बंद शैक पर छापा था, पंच चाहिए था, रघु चला गया।
शर्वरी कमरा नंबर तीन में ये कहने गई थी कि उसे जाना होगा। उसे कहना नहीं पड़ा। विराज पहले से बैग बाँधे बैठा था। “कल मैं चला जाऊँगा। पंद्रह तक ही रुकना था।”
“कहाँ जाओगे?”
“जहाँ से आया था।”
जिस बात के लिए वो ख़ुद आई थी, वही सुनकर शर्वरी के भीतर कुछ टूट गया। वो रोई, फिर लड़ी, फिर इतनी ऊँची आवाज़ में बोली कि बग़ल के कमरे में जागती ओवी ने एक-एक शब्द सुना: “तुम ऐसे नहीं जा सकते।” विराज ने उसे चुप नहीं कराया। उसने सिर्फ़ इतना कहा कि आज रात तुम्हारे पति को एक काम करना है, उसके बाद तुम्हें सब समझ आ जाएगा, और शर्वरी को कुछ समझ नहीं आया। ढाई बजे के क़रीब वो उस कमरे से निकली और अपने बिस्तर पर नहीं गई।
तीन बजकर सात मिनट पर घर के पिछले हिस्से से एक आवाज़ आई। भारी और गीली, जैसे कोई भरी हुई बोरी लकड़ी के कोने से टकराकर फ़र्श पर गिरी हो।
रघु का स्कूटर तीन चालीस पर गेट के अंदर आया। रसोई की बत्ती जल रही थी, जो इस वक़्त कभी नहीं जलती, और पीछे के बरामदे के आख़िर में कमरा नंबर तीन का दरवाज़ा पूरा खुला था।
विराज सक्सेना पलंग के पास फ़र्श पर चित पड़ा था। दाईं कनपटी अंदर को धँसी हुई थी और उसके सिर के नीचे फैला गहरा रंग टाइल्स के जोड़ों में उतर रहा था। शर्वरी दीवार से पीठ लगाए बैठी थी, बाल खुले, गाउन का निचला किनारा लाल। और दरवाज़े के ठीक अंदर ओवी खड़ी थी, दोनों हाथों में कोयता पकड़े, वो भारी मुड़ा हुआ हँसिया जिससे गोवा के हर घर में नारियल फोड़ा जाता है।
“मैंने मारा, बाबा,” ओवी ने कहा।
“ये झूठ बोल रही है।” शर्वरी की आवाज़ बैठी हुई थी। “मैंने मारा।”
“वो आई के साथ ज़बरदस्ती...”
“वो ओवी के कमरे में घुसा था...”
दोनों एक साथ बोल रही थीं, दोनों की कहानी अलग थी, और दोनों एक-दूसरे की तरफ़ देख नहीं रही थीं। रघु ने हाथ उठाया।
“चुप। दोनों।”
रघु का नियम
उस रात रघु ने जो किया, वो कोई पति या बाप नहीं करता। वो एक पंच ने किया।
उसने घुटनों पर बैठकर उस आदमी की गर्दन छुई। पत्थर जैसी ठंडी थी, और जबड़ा अकड़ चुका था। आधे घंटे पुरानी लाश ऐसी नहीं होती, ये बात उसके दिमाग़ में आई और निकल गई, क्योंकि उस वक़्त सोचने को इससे बड़ी चीज़ें थीं। फ़र्श पर ख़ून कम था और पानी ज़्यादा, और पानी में रेत के बारीक दाने थे। कोयते की धार बिल्कुल साफ़ थी। ये तीनों बातें उसने वैसे ही देखीं जैसे हमेशा देखता आया था, यानी देखकर भी नहीं देखीं। चालीस लाशें देख चुके आदमी को उसी घड़ी खटक जाना चाहिए था। पर वो चालीस लाशें दूसरों के घरों की थीं। ये उसके अपने घर के फ़र्श पर पड़ी थी, बग़ल में उसकी बेटी कोयता लिए खड़ी थी, और ऐसे वक़्त में आदमी का दिमाग़ सिर्फ़ वही देखता है जो उसे अगला काम करने दे।
उसने ओवी के हाथ से कोयता लिया और दोनों को रसोई में बिठाया।
“सुनो। पुलिस तीन चीज़ों से केस बनाती है: लाश, वक़्त, और बयानों का फ़र्क़। लाश मैं देख लूँगा, वक़्त भी। फ़र्क़ तुम दोनों के हाथ में है। मुझे नहीं जानना किसने मारा और क्यों। जो मुझे पता ही नहीं, वो कोई मुझसे निकलवा नहीं सकता, और जो तुम दोनों ने एक-दूसरे को बताया नहीं, उसमें पुलिस फ़र्क़ नहीं ढूँढ सकती। आज के बाद इस रात की कोई बात इस घर में नहीं होगी। मुझसे नहीं, आपस में भी नहीं। कोई पूछे तो तुम दोनों ने इस आदमी को आख़िरी बार कल रात खाने पर देखा, फिर सो गईं, और सुबह मैंने बताया कि वो तड़के निकल गया। बस इतना। झूठ जितना छोटा होता है, उतना मज़बूत होता है।”
शर्वरी ने कुछ कहने को मुँह खोला। ओवी ने भी। रघु ने दोनों को बोलने नहीं दिया, और उस घड़ी उसे ये अपनी ज़िंदगी का सबसे समझदार फ़ैसला लगा।
लाश के लिए जगह उसे ढूँढनी नहीं पड़ी। पुलिस तीन जगह देखती है: जहाँ मिट्टी नई हो, जहाँ सीमेंट नया हो, और जहाँ से बदबू आए। कमरा नंबर तीन के फ़र्श का एक कोना दस दिन से खुला पड़ा था, और उसके खुले होने का गवाह बाबू मिस्त्री था। वहाँ मिट्टी का हिलना किसी को नहीं खटकता। रघु ने उसी कोने में तीन फ़ुट गहरा गड्ढा खोदा, विराज को पलंग की सफ़ेद चादर में लपेटा और नीचे उतार दिया। उठाते वक़्त उस बदन में पूरे आदमी का वज़न था; ये बात उसे बाद में बार-बार याद आई।
रेक्सीन का बैग पानी गरम करने वाले चूल्हे में गया। रजिस्टर में उसने अपने हाथ से लिखा: चेक-आउट, 15 जुलाई, सुबह 6:30। दोपहर तक उस कोने पर सीमेंट डालकर उसने टाइल्स ख़ुद जमा दीं।
बचा एक सवाल। कोई न कोई इस आदमी को ढूँढता हुआ आएगा, कम से कम भोपाल की वो बहन तो ज़रूर, जो एक इतवार का फ़ोन छूटने पर पुलिस में पहुँच जाती है। और जब कोई आए, तो उसे एक ऐसी कहानी मिलनी चाहिए जो वृंदावन के गेट के बाहर ख़त्म होती हो।
रघु ऐसी एक कहानी जानता था। उसने उसे अपनी आँखों के सामने बनते देखा था।
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