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भाग 3 — डूबे हुए आदमी की फ़ाइल

Pretika · Haunted Places · 9 मिनट

Writer
Pretika
Story
दृश्यम: वो फिर लौट आया
Chapter
3 of 5
Category
Haunted Places
Reading time
9 min
Words
1601
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

काला खड़प

खड़प कोंकणी में चट्टान को कहते हैं। काला खड़प चापोरा नदी के मुहाने के पास समंदर में घुसी हुई काली चट्टानों की एक ज़बान है, जहाँ मानसून में लहरें दो मंज़िल ऊँची उठती हैं और जहाँ हर दूसरे साल कोई न कोई टूरिस्ट फोटो खींचते हुए बह जाता है। ऐसे मामलों में लाश अकसर नहीं मिलती। मिलता है तो बस चट्टान पर छूटा सामान, और पुलिस फ़ाइल पर लिख देती है: लापता, डूबने की आशंका। छह महीने बाद उस फ़ाइल को कोई नहीं खोलता।

पंद्रह जुलाई की सुबह पौने छह बजे, उजाला होने से पहले, रघु वहाँ पहुँचा। उसने विराज की नीली रबर की चप्पलें चट्टान पर अग़ल-बग़ल रखीं, बटुआ उनके नीचे दबाया, और फ़ोन को पॉलिथीन में लपेटकर एक पत्थर की आड़ में टिका दिया। उसके हाथ अपने आप चल रहे थे, जैसे ये सब उसने पहले कभी ठीक इसी तरह रखा हुआ देखा हो। कहाँ, ये उसे याद नहीं आया। सात बजे से पहले वो घर लौट चुका था।

अगले दिन सुबह फ़ोन बजा। देसाई था। “काला खड़प आ जा। मछुआरों को किसी का सामान मिला है, पंचनामा करना है।”

अब तक रघु ने बहुत से झूठे काग़ज़ों पर साफ़ मन से दस्तख़त किए थे। उस सुबह पहली बार वो एक ऐसे पंचनामे का गवाह बना जिसका हर शब्द सच था, कि फ़लाँ जगह, फ़लाँ वक़्त, ये चप्पलें, ये बटुआ और ये फ़ोन पाए गए। झूठ सिर्फ़ इतना था कि उन्हें वहाँ रखने वाला आदमी पंच नंबर एक के ख़ाने में अपना नाम लिख रहा था। और इस बार उसने दस्तख़त से पहले पूरा काग़ज़ पढ़ा।

कॉन्स्टेबल ने बटुआ खोलकर लाइसेंस का नाम ज़ोर से पढ़ा। देसाई, जो जीप की आड़ में खड़ा सिगरेट जला रहा था, वहीं रुक गया। उसने आकर लाइसेंस अपने हाथ में लिया, फिर चप्पलों को देखा, फिर इस बात को कि वो किस तरह रखी हैं, और फिर बहुत धीरे से नज़र उठाकर रघु को।

रघु अपना वाक्य घर से तैयार करके लाया था। “साब, ये आदमी मेरे यहाँ ठहरा था। कल तड़के निकला, बोला समंदर देखकर आगे जाएगा।”

“तेरे यहाँ?”

“हाँ साब। तीन हफ़्ते से।”

देसाई के चेहरे से रंग ऐसे उतरा जैसे किसी ने भीतर से नल बंद कर दिया हो। रघु ने इस आदमी को लाशों के बग़ल में खड़े होकर वड़ा-पाव खाते देखा था; डरते हुए पहली बार देख रहा था, और उसने इसका वही मतलब निकाला जो कोई भी मुजरिम निकालता, कि देसाई को उस पर शक हो गया है। देसाई ने कॉन्स्टेबल से कहा कि होमस्टे वाली बात अभी काग़ज़ में मत चढ़ा। पर मछुआरे सामान मिलते ही कंट्रोल रूम को भी फ़ोन कर चुके थे, और ख़बर तालुका थाने की नई इंचार्ज तक पहुँच चुकी थी।

उसी रात तीन बजकर सात मिनट पर रजिस्टर में वो एंट्री आई। रघु टॉर्च लेकर पीछे गया तो कमरा नंबर तीन का ताला खुला लटक रहा था। अंदर कोई नहीं था। बस बिस्तर की नई चादर बीच से गीली थी, उस पर किसी लेटे हुए बदन की शक्ल का गड्ढा था, और तकिये पर रेत। उसने रजिस्टर का वो पन्ना फाड़ा, चूल्हे में जलाया और सुबह तक बरामदे में बैठा रहा।

पीआई कामत के सवाल

पीआई संजना कामत सत्रह जुलाई की दोपहर आईं। न सायरन, न जीप; एक सफ़ेद कार, साथ में एक महिला कॉन्स्टेबल, और बग़ल में दबी हुई एक मोटी, पीली पड़ चुकी फ़ाइल। चार महीने पहले पणजी क्राइम ब्रांच से तबादला होकर आई थीं, और तालुके के पुलिस वालों में उनके बारे में एक ही बात मशहूर थी, कि ये औरत पुरानी फ़ाइलें पढ़ती है।

शर्वरी और ओवी से उन्होंने अलग-अलग कमरों में बीस-बीस मिनट बात की। दोनों के बयान में एक शब्द का फ़र्क़ नहीं निकला, क्योंकि दोनों के पास कहने को था ही कितना। फिर उन्होंने रघु को बरामदे में अपने सामने बिठाया और फ़ाइल खोली।

“पंद्रह जुलाई 2019। जगह, काला खड़प। एक जोड़ी नीली रबर की चप्पल। भूरे चमड़े का बटुआ, जिसमें ड्राइविंग लाइसेंस और दो हज़ार के पाँच नोट। एक काला मोबाइल, स्क्रीन के दाएँ कोने में दरार। मालिक, विराज सक्सेना, भोपाल। लापता, डूबने की आशंका।” उन्होंने काग़ज़ घुमाकर उसके सामने रख दिया। “पंच नंबर एक, रघुवीर नाईक। ये दस्तख़त तुम्हारे हैं?”

दस्तख़त उसी के थे। रघु को वो सुबह याद नहीं थी; उसे अपनी कोई भी सुबह अलग से याद नहीं थी।

“तो अब मुझे ये समझाओ, नाईक, कि एक आदमी एक ही चट्टान से, एक ही तारीख़ को, सात साल के फ़ासले पर दो बार कैसे डूबता है। और दोनों बार गवाह तुम।”

रघु के मुँह से आवाज़ नहीं निकली।

“सात साल बाद क़ानून लापता आदमी को मरा हुआ मान लेता है और फ़ाइल हमेशा के लिए बंद हो जाती है। इसकी बहन की आख़िरी अर्ज़ी मेरी मेज़ पर पड़ी थी, और सात साल पूरे होने के अगले ही दिन इसका सामान दोबारा निकल आया। एक बात और। कल के बटुए में दो हज़ार के सिर्फ़ दो नोट थे। बाक़ी तीन कहाँ गए?”

रघु को अपनी अलमारी में रखे तीन गुलाबी नोट दिखाई दिए। उसने कहा कि उसे नहीं पता।

“आते हुए मैंने तुम्हारी मछली वाली से बात की, पाव वाले से, सामने के घर से। तीन हफ़्ते में किसी ने तुम्हारे यहाँ कोई मेहमान नहीं देखा। फ़िलू का कहना है कि मई के बाद वृंदावन में कोई ठहरा ही नहीं। बस तुम्हारी पत्नी पीछे के बरामदे में अकेली बैठी बातें करती और हँसती रहती थी, और उसे लगा फ़ोन पर होगी।”

रघु ने पूरी तैयारी ये साबित करने की की थी कि वो आदमी यहाँ से चला गया। उसने सपने में भी नहीं सोचा था कि उसे ये साबित करना पड़ेगा कि वो आदमी यहाँ आया था। उसने रजिस्टर लाकर चौबीस जून की एंट्री दिखाई, उस झुकी हुई लिखावट में, और लाइसेंस की फोटोकॉपी। पीआई कामत ने दोनों को देर तक देखा, फिर पन्ना पलटा, और रुक गईं।

“और ये?”

वो पन्ना, जिसे रघु ने रात को अपने हाथ से फाड़कर जलाया था, अपनी जगह सिला हुआ था। चेक-इन, 17 जुलाई, 3:07। कमरा वही चाहिए।

“तुम कहते हो वो पंद्रह को चला गया। तुम्हारा रजिस्टर कहता है वो कल रात वापस आया। कमरा खोलो।”

कमरा नंबर तीन में बिस्तर अब भी गीला था। पीआई कामत ने तकिये से रेत के कुछ दाने उठाकर उँगलियों में मसले, फिर फ़र्श के उस कोने पर नज़र टिकाई जहाँ टाइल्स का रंग बाक़ी से ज़रा ताज़ा था। रघु ने बिना पूछे बता दिया कि सीलन थी, बाबू मिस्त्री ने उखाड़ी थीं, उसने ख़ुद लगा दीं। उन्होंने डायरी में एक नाम लिखा और चलते हुए कहा, “जो आदमी चीज़ें छुपाना जानता है, वो एक मरे हुए आदमी का सामान चट्टान पर सजाकर पुलिस को नहीं बुलाता। या तो तुम बहुत बेवक़ूफ़ हो, नाईक, या कोई तुमसे ये सब करवा रहा है।”

रिमार्क वाला कॉलम

उस रात रघु ने रजिस्टर को स्टील की अलमारी में बंद किया, चाबी क़मीज़ की जेब में रखी और आगे के बरामदे में बैठ गया। अब उसे याद आ चुका था कि चट्टान पर चप्पलें उस तरह रखना उसने कहाँ सीखा था।

तीन बजकर सात मिनट पर पीछे का कोई दरवाज़ा नहीं खुला। आवाज़ इस बार उसके अपने बेडरूम से आई। शर्वरी की आवाज़, बहुत धीमी, और उसमें एक हँसी थी जो रघु ने बरसों से नहीं सुनी थी।

दरवाज़ा भिड़ा हुआ था। नाइट बल्ब की नीली रोशनी में शर्वरी बिस्तर के बाएँ किनारे पर करवट लिए लेटी थी, आँखें खुली, और अपने सामने की ख़ाली जगह से कह रही थी, “आज देर कर दी।”

गद्दे का दायाँ हिस्सा, रघु का हिस्सा, किसी के वज़न से दबा हुआ था। चादर पर एक गीला धब्बा फैल रहा था जिसमें कंधों और कमर की शक्ल थी। फिर रघु ने अपनी पत्नी के गाउन का कपड़ा कमर के पास अपने आप ऊपर सरकते देखा, जैसे कोई अनदेखा हाथ उसे हटा रहा हो, और उसकी नंगी कमर पर पाँच उँगलियों के गीले निशान उभरे। शर्वरी की आँखें मुँद गईं। उसकी साँस भारी हो गई, गर्दन पीछे को तन गई, एड़ियाँ चादर में धँस गईं, और उसके होंठों से वो आवाज़ निकली जो रघु ने बीस साल में गिनती की बार सुनी थी और कब का भूल चुका था। कमरे में समंदर की गंध थी।

रघुवीर नाईक ने पंद्रह साल दूसरों के कहने पर वो सब लिखकर दिया था जो उसने कभी देखा नहीं। उस रात वो अपने ही बेडरूम की चौखट पर खड़ा अपनी आँखों से वो देख रहा था जिस पर दुनिया की कोई अदालत यक़ीन नहीं करेगी। वो अंदर नहीं गया। उसमें इतनी हिम्मत नहीं थी, और सच ये है कि उसे पता भी नहीं था कि वो रोकेगा किसे।

सुबह अलमारी का ताला लगा हुआ था और चाबी उसकी जेब में थी। रजिस्टर में एक लाइन और बढ़ चुकी थी। चेक-इन, 18 जुलाई, 3:07। और रिमार्क के कॉलम में: “मेज़बान की पत्नी बाईं करवट सोती है। दाएँ कंधे के नीचे एक तिल है। रघु जी, आपने कभी देखा?”

रघु को वो तिल याद नहीं था।

वो रसोई में गया, शर्वरी को कंधे से पकड़कर घुमाया और ब्लाउज़ का किनारा नीचे खींचा। तिल वहीं था, जहाँ लिखा था। बीस साल से वहीं रहा होगा।

“कब से?”

शर्वरी ने झूठ नहीं बोला। “सात जुलाई से।” फिर, उसकी आँखों में देखते हुए, “माफ़ी नहीं माँगूँगी। बीस साल में तुमने मुझे उतना नहीं देखा, जितना उसने बीस दिन में देख लिया।”

“और अब? रात को?”

“हर रात तीन बजे मेरी नींद खुल जाती है। मैं इंतज़ार करती हूँ।”

“शर्वरी, वो मर चुका है।”

“मुझे पता है।”

इस जवाब के बाद पूछने को बहुत कुछ था। रघु ने सिर्फ़ एक बात पूछी, कि ओवी को पता था या नहीं, और जब शर्वरी ने हाँ में सिर हिलाया तो उसने मन ही मन तय कर लिया कि उस रात कोयता किसने चलाया था और क्यों। फिर उसने वही किया जो हमेशा करता आया था। आगे नहीं पूछा।

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