Pretika › Haunted Places › दृश्यम: वो फिर लौट आया
भाग 5 — इकतालीस में से एक
Pretika · Haunted Places · 7 मिनट
- Writer
- Pretika
- Story
- दृश्यम: वो फिर लौट आया
- Chapter
- 5 of 5
- Category
- Haunted Places
- Reading time
- 7 min
- Words
- 1212
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
आख़िरी पंचनामा
उसी दोपहर रघु तालुका थाने गया और पीआई कामत से वो चीज़ माँगी जो उसने आज तक कभी नहीं माँगी थी। एक पंचनामा, पढ़ने के लिए। पंद्रह जुलाई 2019 वाला।
उसने उसे पहली लाइन से आख़िरी लाइन तक पढ़ा, फिर काग़ज़ मेज़ पर रखकर कहा, “मैडम, मैं आपको ये नहीं बता सकता कि वो सामान चट्टान पर कैसे पहुँचा। ये बता सकता हूँ कि विराज सक्सेना कहाँ है। आज रात मेरे घर आइए, वर्दी के बिना। कैमरा लाइए। और दो पंच लाइए।” वो ज़रा रुका। “मेरे जैसे नहीं। ऐसे, जो पढ़कर दस्तख़त करते हों।”
पीआई कामत ने उसे देर तक देखा। “और अगर वहाँ कुछ न निकला, तो कल सुबह मैं देसाई को नहीं, तुम्हें उठाऊँगी।”
थाने से निकलकर उसने देसाई को फ़ोन किया और अपनी ज़िंदगी का आख़िरी झूठा बयान दिया। “साब, मैडम ने कल सुबह दस बजे कमरा तीन का फ़र्श खुदवाने का ऑर्डर निकाल दिया है। बाबू मिस्त्री ने लिखकर दे दिया कि उसने सिर्फ़ टाइल्स उखाड़ी थीं, खुदाई नहीं की।”
लाइन पर बहुत देर सिर्फ़ साँस की आवाज़ आती रही। “आज रात आता हूँ। अकेला। औरतों को कहीं भेज दे।”
देसाई सवा दो बजे आया, रेनकोट में, एक सब्बल और एक बोरी के साथ। रघु ने कमरा नंबर तीन खोला, जहाँ उसने गड्ढा दोबारा भरकर मिट्टी ढीली छोड़ दी थी।
“खोद।”
“मैं पंच हूँ, साब। मैं सिर्फ़ देखता हूँ।”
देसाई ने उसे एक गाली दी और ख़ुद गड्ढे में उतर गया। कमरे की खिड़की पीछे के बरामदे में खुलती थी, और बरामदे के अँधेरे में, बारिश के शोर के पीछे, चार लोग खड़े थे: पीआई कामत, कैमरा थामे एक कॉन्स्टेबल, मापसा के एक रिटायर्ड हेडमास्टर और एक केमिस्ट।
पौन घंटे बाद देसाई के हाथ उस खोपड़ी तक पहुँचे। उसने उसे दोनों हथेलियों में उठाया ही था कि बिजली चली गई। दीवार घड़ी में तीन बजकर सात मिनट हुए थे।
टॉर्च उसके हाथ से छूटकर गड्ढे के किनारे पर गिरी, और उसकी रोशनी सीधी पलंग पर जा टिकी।
रघु ने जो देखा, वो इतना ही था: गद्दा बीच से धीरे-धीरे नीचे को दबा, जैसे कोई उस पर आकर बैठा हो, और पलंग की पाटी से पानी की बूँदें फ़र्श पर टपकने लगीं। देसाई ने क्या देखा, ये उसके चेहरे से पता चलता था। वो खोपड़ी सीने से लगाए पीछे हटता गया, जब तक उसकी पीठ गड्ढे की दीवार से नहीं लग गई।
“तू... मैंने बोला था सुबह आना। तूने फ़ोन क्यों निकाला? धक्का ही तो दिया था, बस एक धक्का। बेंच का कोना था, मैं क्या करता। तीन सात हुए थे, मैंने घड़ी देखी थी। मुझे ऐसे मत देख। ऐसे मत देख मुझे।”
खिड़की के बाहर कैमरे की लाल बत्ती जलती रही। उसने एक वर्दी वाले को रिकॉर्ड किया जो एक इंसानी खोपड़ी हाथ में लिए एक ख़ाली बिस्तर के सामने अपना जुर्म क़बूल कर रहा था।
पीआई कामत अंदर आईं। “उल्हास देसाई। जो हाथ में है, उसे धीरे से नीचे रखो।”
“मैडम, वो वहाँ बैठा है। आपको दिख नहीं रहा? वो हँस रहा है।”
पीआई कामत ने पलंग की तरफ़ देखा, और रघु ने ग़ौर किया कि उन्होंने ज़रूरत से एक पल ज़्यादा देखा।
फिर उस चुप्पी में गड्ढे के भीतर से एक बारीक आवाज़ आई। टिक। टिक। टॉर्च घुमाई गई। हड्डियों वाली कलाई पर बँधी घड़ी की सेकंड वाली सुई चल रही थी, और सात साल बाद बड़ी सुई एक ख़ाना आगे सरक चुकी थी।
हेडमास्टर साहब ने पंचनामे की हर लाइन ज़ोर से पढ़कर दस्तख़त किए। रघु ने क़लम की तरफ़ हाथ बढ़ाया तो पीआई कामत ने काग़ज़ हटा लिया। “आज तुम पंच नहीं हो, नाईक। आज तुम गवाह हो।”
सुबह चार बजकर दस मिनट पर, सात साल और पाँच दिन की देरी से, विराज सक्सेना की एफ़आईआर लिखी गई।
कमरे उपलब्ध हैं
देसाई और उस रात चौकी में मौजूद तीन सिपाही हफ़्ते भर में अंदर थे। तन्वी सक्सेना भोपाल से अपने भाई को लेने आई, दुबली, चुप, सात साल में अपनी उम्र से बहुत आगे निकल चुकी एक औरत। उसने कमरा नंबर तीन देखने को कहा और देर तक उसकी दहलीज़ पर खड़ी रही। जाते हुए उसने शर्वरी से सिर्फ़ इतना कहा कि भैया को बारिश बहुत अच्छी लगती थी। शर्वरी ये बात जानती थी, और बता नहीं सकती थी कि कैसे जानती है।
पीआई कामत आख़िरी बार रजिस्टर लौटाने आईं। लिखावट की जाँच हो चुकी थी: चौबीस जून की एंट्री और उसके बाद की सारी एंट्रियाँ विराज की अपनी लिखावट से मिल गई थीं। मिलान के लिए तन्वी ने भाई की एक पुरानी डायरी दी थी, जो सात साल से उसके पास रखी थी। “ये रिपोर्ट चार्जशीट में नहीं जाएगी,” उन्होंने कहा। “अदालत को मैं ये नहीं समझा सकती। ख़ुद को भी नहीं।” फिर, गाड़ी का दरवाज़ा खोलते हुए: “मालख़ाने के रजिस्टर में 2019 का वो सामान जमा दिखता है, पर शेल्फ़ ख़ाली है। काग़ज़ पर ये भी देसाई के खाते में जाएगा। असल में वो चट्टान पर किसने रखा, ये मैं तुमसे नहीं पूछूँगी, नाईक। मुझे डर है तुम सच बता दोगे।”
रजिस्टर में उस हाथ की एक आख़िरी लाइन थी जो रघु ने पहले नहीं देखी थी। चेक-आउट, 20 जुलाई, 3:08। रिमार्क: “जगह अच्छी है। औरों को भी बताऊँगा।”
रघु अब आगे के बरामदे में सोता है। अलमारी में दो-दो हज़ार के तीन गुलाबी नोट अब भी रखे हैं; उन्हें बदलवाने की उसकी हिम्मत नहीं हुई। शर्वरी की नींद आज भी तीन बजे खुलती है। अब कोई नहीं आता, और रघु को नहीं पता कि इस बात से उसकी पत्नी को चैन मिलता है या नहीं। उसने पूछा नहीं।
दो अगस्त की रात एक बजकर बावन मिनट पर गेट की कुंडी खटकी।
बाहर एक लड़की खड़ी थी, तेईस-चौबीस की, बिना छाते के, नंगे पाँव, बालों से पानी टपकता हुआ। उसने कहा कि उसे एक कमरा चाहिए, कुछ दिनों के लिए। रघु के हाथ रजिस्टर खोलते हुए काँप रहे थे। उसने नाम ख़ुद लिखा, गोल, साफ़ अक्षरों में: मनीषा धुरी।
“आप पहले कभी यहाँ आई हैं?”
“नहीं,” उसने कहा। “पर आप मेरा नाम पढ़ चुके होते, तो पहचान लेते।”
वो कमरा नंबर एक की चाबी लेकर चली गई। फ़र्श पर उसके पैरों के गीले निशान थे, जिनमें नदी की काली मिट्टी थी।
सुबह होते ही रघु ने पीआई कामत को फ़ोन किया। “मैडम, मैंने कुल कितने पंचनामों पर दस्तख़त किए हैं?”
काग़ज़ पलटने की आवाज़ आई। “दो सौ चौदह।”
“उनमें से कितनों में कोई मरा था, या लापता हुआ था?”
इस बार जवाब आने में देर लगी। “इकतालीस। एक का हिसाब हो गया।”
“मनीषा धुरी?”
“नवंबर 2021। चापोरा नदी। फ़ाइल में ख़ुदकुशी लिखी है। पंच नंबर एक, तुम।” एक पल की चुप्पी। “तुम ये नाम कैसे जानते हो, नाईक?”
रघु ने फ़ोन कान से हटाया। कमरा नंबर एक के बंद दरवाज़े के नीचे पानी की एक पतली लकीर थी। बरामदे का ढलान आँगन की तरफ़ है, पानी को उधर बहना चाहिए था। वो उल्टा बह रहा था: दहलीज़ चढ़कर, धीरे-धीरे, कमरे के अंदर।
मेज़ पर रजिस्टर खुला पड़ा था। मनीषा धुरी के नाम के नीचे वाली लाइन पर, जो रात को ख़ाली थी, नीली स्याही अपने आप उभर रही थी, एक ऐसी लिखावट में जो रघु ने पहले कभी नहीं देखी थी। नाम अभी आधा ही लिखा गया था। कमरा नंबर: 2। चेक-इन: आज रात।
शिरवडे में लोग आज भी यही कहते हैं कि मानसून में वृंदावन होमस्टे में कोई नहीं ठहरता।
इकतालीस में से एक का हिसाब हुआ है। चालीस अभी बाक़ी हैं। और वृंदावन में कमरे सिर्फ़ तीन हैं।
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