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भाग 4 — जो सात साल से दफ़्न था

Pretika · Haunted Places · 7 मिनट

Writer
Pretika
Story
दृश्यम: वो फिर लौट आया
Chapter
4 of 5
Category
Haunted Places
Reading time
7 min
Words
1365
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

जीप में देसाई

अठारह जुलाई की शाम देसाई ने उसे नदी के पुराने फेरी घाट पर बुलाया, अकेले। जीप का इंजन बंद था, वाइपर रुके हुए थे, और शीशों पर बारिश इतनी मोटी बह रही थी कि बाहर से अंदर कुछ नहीं दिखता था। रघु बग़ल की सीट पर बैठा तो देसाई ने उसकी तरफ़ देखे बिना पूछा, “कितना चाहिए?”

“किस बात का, साब?”

“नाटक मत कर, रघु। सात साल बाद वही चप्पल, वही बटुआ, वही जगह, उसी तरह सजाकर, उसी तारीख़ को। ऊपर से सबके सामने बोलता है, मेरे घर में ठहरा था। मैडम को ख़बर भी तूने ही पहुँचाई होगी। सीधा बोल। पैसा चाहिए, या मुझे अंदर करवाना है?”

“साब, वो आदमी सच में मेरे घर...”

देसाई ने अब जाकर उसकी तरफ़ देखा। बीस साल उसने झूठ बोलने वालों की आँखें पढ़ी थीं, और रघु की आँखों में उसे जो दिखा उससे उसका अपना चेहरा ढीला पड़ गया।

“तुझे सच में याद नहीं।”

फिर वो बोलता गया, आधा रघु से, आधा अपने आप से। चौदह जुलाई 2019, इतवार की रात, वर्ल्ड कप का फ़ाइनल, वही सुपर ओवर वाला। चौकी में चारों आदमी टीवी के सामने थे जब भोपाल का एक टूरिस्ट भीगता हुआ अंदर आया और बोला कि काला खड़प के पास उसने एक नाव से बोरियाँ उतरती देखी हैं, और किनारे पर वर्दी में एक आदमी खड़ा नोट गिन रहा था। वर्दी वाला देसाई का ही हवलदार था। बोरियाँ किसकी थीं, ये उसने रघु को नहीं बताया।

“मैंने बोला सुबह आना। वो बोला अभी लिखो, एफ़आईआर लिखो, मैंने अपनी आँखों से देखा है। फिर फ़ोन निकालकर हमारा वीडियो बनाने लगा। हमने उसे अंदर लिया। दो-चार हाथ, बस डराने को। मारने का इरादा नहीं था, माँ क़सम। एक धक्का लगा और उसकी कनपटी लॉक-अप की बेंच के कोने पर जा लगी।” देसाई ने सिगरेट निकाली और जलाई नहीं। “मैंने घड़ी देखी थी, क्योंकि लगा था डायरी में कुछ लिखना पड़ेगा। तीन बजकर सात मिनट।”

“सुबह तक उसका सामान चट्टान पर था और तू पंच बनकर साइन कर रहा था। उस दिन तुझे पाँच सौ दिए थे, दो सौ नहीं।”

रघु ने बहुत देर बाद पूछा, “और लाश?”

देसाई सूखी हँसी हँसा। “तू उस साल पीछे नया कमरा बनवा रहा था। प्लिंथ खुली पड़ी थी, भराई बाक़ी थी। मैंने बोला था ना, मज़दूर मैं भेज देता हूँ, तू लाइसेंस की फ़ाइल देख। तूने पूछा भी था कि मज़दूर रात में क्यों आए। मैंने बोला, दिन में बारिश है।”

जीप की छत पर पानी बज रहा था।

“वो आदमी तेरे घर में सात साल से ठहरा हुआ है, रघु। कमरा नंबर तीन। इसीलिए जब तू चट्टान पर बोला कि मेरे यहाँ रुका था, मुझे लगा तुझे सब पता है और तू मुझे सुना रहा है।”

रघु को याद आया कि उसका लाइसेंस तीन हफ़्ते में आ गया था। उसे ये भी याद आया कि चार रात पहले उसने एक आदमी को ठीक उसी फ़र्श में उतारा है।

“अब तू बता,” देसाई ने कहा। “चट्टान पर सामान किसने रखा?”

रघु ने जवाब नहीं दिया। वो जीप से उतरा और बारिश में पैदल घर की तरफ़ चल पड़ा।

फ़र्श के नीचे

रात एक बजे, जब दोनों औरतें अपने कमरों में थीं, रघु ने कमरा नंबर तीन का दरवाज़ा भीतर से बंद किया और अपनी ही जमाई हुई टाइल्स सब्बल से उखाड़ दीं।

तीन फ़ुट पर उसे वो सफ़ेद चादर मिली। सिर्फ़ चादर। वो अपने ही ऊपर तह होकर पड़ी थी, सूखे नमक से अकड़ी हुई, और उसकी सिलवटों में सफ़ेद रेत और छोटी-छोटी सीपियाँ भरी थीं। उसमें कोई बदन नहीं था। गंध तक नहीं थी।

वो खोदता गया। पाँच फ़ुट के आसपास सब्बल किसी सख़्त चीज़ से टकराया और उसने औज़ार छोड़कर हाथों से मिट्टी हटानी शुरू की। पहले पसलियाँ निकलीं, फिर घुटने, जो सीने की तरफ़ मुड़े हुए थे, जैसे किसी को जल्दी में, ठूँसकर लिटाया गया हो। खोपड़ी सबसे आख़िर में निकली। उसकी दाईं कनपटी अंदर को धँसी हुई थी।

कलाई की हड्डी पर स्टील के पट्टे वाली एक घड़ी अब भी बँधी थी। रघु ने अँगूठे से उसके शीशे की मिट्टी पोंछी। सुइयाँ तीन बजकर सात मिनट पर रुकी थीं।

वो गड्ढे के किनारे बैठ गया। जिस बदन को उसने चार रात पहले उठाया था उसमें पूरे आदमी का वज़न था, उसकी कनपटी से रिसता हुआ रंग उसने अपनी आँखों से देखा था, और अब उसे समझ आ रहा था कि वो बदन पत्थर जैसा ठंडा क्यों था, जबड़ा अकड़ा हुआ क्यों था, फ़र्श के पानी में रेत क्यों थी, और कोयते की धार साफ़ क्यों थी। उस रात उसने ये सब देखा था, और देखकर अपने ही भीतर दबा दिया था। वो लाश उस रात की नहीं थी। वो चोट भी उस रात की नहीं थी।

और अगर चोट सात साल पुरानी थी, तो उसके घर की दो औरतों में से किसी ने आख़िर किया क्या था?

किसने मारा

उन्नीस जुलाई की सुबह, पाव वाले के भोंपू से पहले, रघु ने दोनों को रसोई में उसी जगह बिठाया जहाँ चार दिन पहले बिठाया था।

“उस रात का नियम मैंने बनाया था। आज मैं ही तोड़ रहा हूँ। कोयता किसने चलाया?”

“मैंने,” दोनों ने एक साथ कहा, और इस बार भी एक-दूसरे की तरफ़ नहीं देखा।

रघु ने ओवी की तरफ़ मुँह किया। “तूने अपनी आई को उसे मारते हुए देखा था? अपनी आँखों से?”

ओवी बहुत देर चुप रही। फिर उसने धीरे से सिर हिलाया, ना में। उस रात वो जाग रही थी। उसने बग़ल के कमरे से लड़ाई सुनी थी, माँ को रोते हुए बाहर जाते सुना था, और तय कर लिया था कि सुबह का इंतज़ार नहीं करेगी। पीछे की दीवार से कोयता उतारकर वो उस आदमी को डराने निकली ही थी कि वो आवाज़ आई। कमरे में पहुँची तो वो फ़र्श पर पड़ा था। “और तभी तुम आईं, आई। अपने कमरे से नहीं, बाहर से। पूरी भीगी हुई। मुझे लगा तुम उसे मारकर भागी थीं और लौट आई हो। तुम चिल्ला रही थीं कि तुम ऐसे नहीं जा सकते। मैंने सुना था।”

शर्वरी का चेहरा सफ़ेद पड़ गया था। “मैं आगे की सीढ़ियों पर बैठी रो रही थी। आवाज़ सुनकर भागी तो तू कोयता लिए उसके ऊपर खड़ी थी। शाम को तूने ही कहा था कि तू उसे निकाल देगी।”

“तो तुमने मुझे बचाने के लिए...”

“और तूने मुझे।”

चूल्हे पर चढ़ा पानी खौलता रहा और किसी ने उसे उतारा नहीं। फिर ओवी ने वो सवाल पूछा जो तीनों के मन में था। “तो उसे मारा किसने?”

“किसी ने नहीं,” रघु ने कहा। “इस घर में किसी ने नहीं। इस साल तो बिल्कुल नहीं।” और उसने उन्हें बताया कि कमरा नंबर तीन के फ़र्श के नीचे, उसकी खोदी हुई ख़ाली जगह से दो फ़ुट और नीचे, क्या पड़ा है और कब से पड़ा है।

शर्वरी ने कुछ नहीं कहा। उसने बस अपनी कलाई को उस जगह छुआ जहाँ सात जुलाई की रात ठंडी उँगलियाँ पहली बार ठहरी थीं।

ओवी ने अपना फ़ोन निकाला। “बाबा, ग्यारह तारीख़ को मैंने आई की और उसकी एक फोटो खींची थी, पीछे के बरामदे में, तुम्हें दिखाने के लिए।” फोटो में शर्वरी हँस रही थी, सिर एक तरफ़ झुकाए, बेंत की एक ख़ाली कुर्सी की ओर। “मुझे लगा था कैमरे की ग़लती है।”

तीन लोगों ने मिलकर चार दिन तक एक ऐसा ख़ून छुपाया था जो उनमें से किसी ने किया ही नहीं था। अगर उस रात रघु ने अपनी पत्नी और बेटी को सिर्फ़ पाँच मिनट बोलने दिया होता, तो ये बात वहीं खुल जाती। और अगर उस सुबह वो काला खड़प न गया होता, तो कुछ भी न होता। गाँव में किसी ने वो मेहमान देखा नहीं था। भोपाल की बहन किसी के फ़ोन का इंतज़ार नहीं कर रही थी; वो तो सात साल से हर दफ़्तर का दरवाज़ा खटखटाकर थक चुकी थी। कोई केस था ही नहीं। केस रघु ने अपने हाथों से बनाया था, उसी सफ़ाई से जो उसने पुलिस के बग़ल में खड़े-खड़े सीखी थी।

विराज सक्सेना को एक ऐसा आदमी चाहिए था जो उसका सामान उसी चट्टान पर दोबारा रख दे और उसी कमरे का फ़र्श दोबारा खोद दे। दुनिया में ये काम एक ही आदमी कर सकता था: वो, जिसके दस्तख़त ने उसे काग़ज़ पर डुबोया था और जिसके घर के नीचे वो सात साल से पड़ा था। विराज ने रघु को चुना नहीं था। रघु सात साल पहले ही चुना जा चुका था, पाँच सौ रुपये में।

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