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भाग 10 — काली गाड़ी वाले

Piyashi Atma · Paranormal · 7 मिनट

Writer
Piyashi Atma
Story
शव गृह — सिविल अस्पताल का कमरा नंबर 2
Chapter
10 of 10
Category
Paranormal
Reading time
7 min
Words
1323
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

═══ भाग 10 — काली गाड़ी वाले ═══

उस दिन दोपहर तक आर्यन को खतरे की भनक लग चुकी थी। दुर्गा भट्टनागर ने उसे अस्पताल की पिछली सीढ़ियों पर पकड़कर जो बताया, उससे उसकी समझ में शहर की असली तस्वीर आ गई — वह काली गाड़ी देशमुख मेमोरियल नर्सिंग होम की थी, और गाड़ी से उतरा आदमी डॉ. देशमुख का बेटा नहीं, उसका "काम का आदमी" था — जिसे शहर में लोग "मैनेजर जी" कहते थे, और जिसके बारे में कहा जाता था कि वह पैसों से वे सारे काम करता है जिन्हें कानून कागज़ों में नहीं होने देता। दुर्गा जी ने काँपती आवाज़ में कहा — "बेटा, मैंने तुम्हारा पता नहीं बताया। मैं बूढ़ी हूँ, मुझसे झूठ नहीं बोला जाता, पर मैंने उनसे कहा कि इंटर्न्स के पते मेरे पास नहीं होते। पर वे ढूँढ लेंगे। इस शहर में वे कुछ भी ढूँढ लेते हैं। तुम सावधान रहो — और एक बात सुनो..." उसने आर्यन के कान में फुसफुसाकर कहा, "...तीस साल पहले भी, जिस दिन पाटिल साहब का ट्रांसफर हुआ था, उससे एक दिन पहले भी एक काली गाड़ी अस्पताल के गेट पर आई थी। यह उनकी पुरानी आदत है — पहले वे नज़र रखते हैं, फिर डराते हैं, और फिर... फिर कागज़ साफ करते हैं।"

आर्यन ने उसी शाम वह किया जो उसे बहुत पहले करना चाहिए था — उसने अपने दोस्त, दिल्ली वाले पत्रकार अखिलेश को फोन किया, और पूरी कहानी कह दी — फोटो, रसीद, रजिस्टर, डायरी, गवाह। फोन के उस पार कुछ देर खामोशी रही, फिर अखिलेश ने कहा — "आर्यन, सुन। यह खबर तू मुझे आज रात पूरे दस्तावेज़ों के साथ भेज। मैं इसे सीधे अपने एडिटर के साथ नहीं, एक ऐसे पत्रकार के साथ बाँटता हूँ जो अंग-तस्करी पर तीन साल से काम कर रहा है। पर एक बात सुन ले — जब तक खबर छप नहीं जाती, तू वहाँ अकेला है। और जिस दिन खबर छपेगी... उस दिन के बाद भी तू अकेला ही होगा, क्योंकि अखबार खबर छापते हैं, बचाते नहीं हैं।" आर्यन ने फोन रखा, और उसी रात उसने अपने कमरे की खिड़की से बाहर देखा — गली के आखिर में, बिजली के खंभे के नीचे, एक आदमी खड़ा सिगरेट पी रहा था, जो कुछ नहीं कर रहा था — बस खड़ा था, और उसके कमरे की खिड़की की तरफ देख रहा था।

उस रात आर्यन ड्यूटी पर गया — क्योंकि अब शव गृह उसके लिए डर की जगह नहीं, एकमात्र ऐसी जगह थी जहाँ शायद वह सबसे ज्यादा सुरक्षित था। रात में उसने गणपत के साथ बैठकर अगला नक्शा बनाया — ढोलकपुरा, चिराग का गाँव, शेषनगर से सत्तर किलोमीटर दूर, उसी जिले में। गणपत ने बताया — "ढोलकपुरा मैं जानता हूँ। छोटा सा गाँव है, ढाणी-बस्ती वाला। अगर शांति बाई जिंदा हुईं, तो कोई सत्तर-पचहत्तर साल की होंगी। और अगर नहीं हुईं... तो गाँव वाले बताएँगे। गाँव कभी नहीं भूलते, साहब — शहर भूल जाते हैं।" दोनों ने तय किया — परसों, रविवार को, जब आर्यन की छुट्टी है, वे दोनों ढोलकपुरा जाएँगे। पर किस्मत को शायद इतना इंतज़ार मंजूर नहीं था — क्योंकि उसी रात, ठीक दो बजकर सत्रह मिनट पर, कुछ ऐसा हुआ जो पहले कभी नहीं हुआ था।

बिजली गई, मोमबत्ती जली, और खटखट आई — पर इस बार खटखट तीन-तीन की नहीं थी। इस बार वह तेज़ थी, बेचैन, लगातार — खटखटखटखटखट — जैसे कोई दरवाज़ा नहीं, कोई दिल धड़का रहा हो। और साथ ही, गलियारे के उस पार, कमरा नंबर 2 से वह भारी आवाज़ आई — रहमत खाँ की — पर इस बार उसमें वह थकान नहीं थी; इस बार उसमें घबराहट थी — "साहब... गणपत... जल्दी करो... वे लोग आ गए हैं... इस इमारत में... अभी... इसी वक्त... मैं महसूस कर रहा हूँ... जिन लोगों ने मुझे उस रात... वे... वे यहाँ हैं..." आर्यन और गणपत एक-दूसरे का मुँह देखते रह गए। और तभी — शव गृह के बाहर, पेड़ों के बीच से, टॉर्च की दो रोशनियाँ चमकीं — और गेट पर किसी ने लोहे की चेन खींची। गणपत ने आर्यन को खिड़की से झटके से हटाया — "साहब, दो आदमी हैं। एक के हाथ में... कुछ लंबा है। ये... ये गुंडे नहीं हैं। ये काम के आदमी हैं।"

"कमरा नंबर 2 में छुप जाओ," गणपत ने फुसफुसाकर कहा। आर्यन ने विरोध किया — "काका, वहाँ तो..." — पर गणपत ने उसकी बात काट दी — "वहाँ कुछ नहीं होगा। आज नहीं। आज उन लोगों से बचाने वाला इस इमारत में सिर्फ एक है — और वह मैं नहीं हूँ। जाओ — और हाँ, अंदर जाकर चुपचाप तीसरी ट्रे के पास बैठ जाना। बाकी... बाकी रहमत भाई जानते हैं।" आर्यन अंधेरे में कमरा नंबर 2 के अंदर घुसा, और गणपत ने बाहर से दरवाज़ा बंद करके तीनों ताले लगा दिए — आवाज़ ऊँची की, जानबूझकर, ताकि सुनाई दे। फिर गणपत खुद गलियारे के बीच की खुली जगह में जाकर अपनी बाँस की कुर्सी पर बैठ गया — बिल्कुल खुले में, बिल्कुल अकेला — और अपनी बीड़ी जलाकर इंतज़ार करने लगा, जैसे वह तत्तीस साल से इसी रात का इंतज़ार कर रहा हो।

दरवाज़ा टूटा, और दो साये अंदर आए। आर्यन ने कमरा नंबर 2 की जालीदार खिड़की से, धुंधली टॉर्च की रोशनी में, सब देखा। दोनों आदमियों ने गणपत को घेरा। एक ने पूछा — आवाज़ नीची, पेशेवर — "बूढ़ा, वह डॉक्टर कहाँ है। उसके पास कुछ कागज़ हैं जो उसके नहीं हैं।" गणपत ने बीड़ी का कश लिया, धुआँ छोड़ा, और बहुत शांत आवाज़ में कहा — "इस इमारत में कागज़ नहीं, साहब। इस इमारत में बस मुर्दे हैं, और उनकी गिनती। और हाँ — एक बात बता दूँ? यहाँ एक पुराना नियम है — रात के दो बजे के बाद, इस इमारत में वही टिकता है... जिसे यहाँ का रखवाला टिकने दे।" दूसरे आदमी ने हँसकर कहा — "बूढ़ा पागल है। इसे हटा, और डॉक्टर को ढूँढ—" उसका वाक्य आधा ही रह गया। क्योंकि उसी पल, शव गृह की सारी लाइटें — जो बिना बिजली के जल भी नहीं सकती थीं — एक साथ जल उठीं, और गलियारे के दोनों सिरों से, एक साथ, एक ही आवाज़ आई — धातु की ट्रेज़ के खुलने की आवाज़ — एक नहीं, दो नहीं... बारह। और फिर, कमरा नंबर 1 का पोस्टमार्टम कक्ष का दरवाज़ा, जो ताले में बंद था, धड़ाम से खुल गया — और उसके अंदर से, ठंडी हवा की एक लहर निकली, जिसमें मोगरे की खुशबू थी... और उस खुशबू के साथ, गलियारे की हवा में, बहुत धीरे-धीरे, कई पैरों की आहटें उठीं — जैसे छह साये अपनी-अपनी ट्रेज़ से उतरकर, गलियारे में, एक कतार में खड़े हो रहे हों।

दोनों आदमी टस से मस नहीं हुए। आर्यन ने जाली से देखा — उन दोनों की टॉर्चें उनके हाथों से गिर गईं, और गलियारे के उस सफेद चमकीले अंधेरे में, कुछ ऐसा उभरा जिसे आर्यन शब्दों में कभी नहीं ढाल पाया — पर जिसे देखकर वे दोनों आदमी उसी तरह चीखे, जैसे तीस साल पहले शायद रहमत खाँ को देखकर किसी ने चीखा होगा। चीखें गलियारे से निकलीं, टूटे दरवाज़े से बाहर निकलीं, पेड़ों के बीच से होती हुई मुख्य भवन तक गईं — और फिर कट गईं। सुबह, शेषनगर के लोगों ने दो आदमियों को अस्पताल के मुख्य गेट के पास, बेहोश, एक-दूसरे से चिपके, बिल्कुल सफेद चेहरों के साथ पाया — दोनों के दोनों बोल नहीं पा रहे थे, और दोनों के हाथों में, कसकर पकड़ा हुआ, एक-एक पुराना, पीला अस्पताल का कलाई-पट्टा था — जिन पर किसी ने पेंसिल से लिखा था — "गिनती अब पूरी होने वाली है।"

⏳ सस्पेंस — उस रात गलियारे में उन दोनों आदमियों ने देखा क्या...? और अब, जब "मैनेजर जी" को पता चलेगा कि उसके आदमी लौटे तो पागल होकर लौटे — तो क्या अगला हमला आर्यन पर होगा... या उन दो बूढ़े गवाहों पर — जानकी दीदी और कल्लू पर — जो अभी भी इस शहर में बिल्कुल अकेले हैं...?

(भाग 11 में: ढोलकपुरा का सफर — चिराग की माँ का पता, और वह घर जिसमें तीस साल से एक दीया रोज़ जलता है, एक लौटे हुए बेटे के इंतज़ार में...)

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