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भाग नौवाँ — आखिरी पेंटिंग

Piyashi Atma · Paranormal · 4 मिनट

Writer
Piyashi Atma
Story
शव गृह — सिविल अस्पताल का कमरा नंबर 2
Chapter
9 of 10
Category
Paranormal
Reading time
4 min
Words
733
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

उस रात के बाद, गैलरी में एक अजीब-सी शांति आ गई — मानवी ने वसुंधरा की हड्डियों को उनकी क़ब्र दिलाई, पूरी विधि-विधान से, और देशपांडे ने अपनी बची हुई ज़िंदगी उन बच्चों को चित्रकला सिखाने में लगा दी, जो ग़रीब थे, होनहार थे, और जिन्हें कोई गुरु नहीं मिला था — और कहा जाता है कि उस बूढ़े आदमी की आँखों में अब वो बोझ नहीं था, बल्कि एक ऐसी रोशनी थी जो किसी के अपने क़र्ज़ को चुकाने की होती है। गैलरी को शहर की धरोहर घोषित किया गया, और उसमें अब लोग आते थे, पेंटिंगें देखते थे, और 1962 वाली पेंटिंग के सामने खड़े होकर उस मुस्कान को देखते थे, जो अब हमेशा के लिए उसमें बस गई थी — और कहा जाता है कि जो लोग उस पेंटिंग को सच्चे दिल से देखते थे, उन्हें अपनी अधूरी कलाओं को पूरा करने की प्रेरणा मिलती थी, और जो लोग उसे झूठी तारीफ़ से देखते थे, उन्हें एक हल्की-सी ठंडक महसूस होती थी, जैसे कोई उन्हें कह रहा हो — "सच बोलो, क्योंकि सच बोलने से कला मुक्त होती है, और झूठ बोलने से कला क़ैद होती है।"

पर मानवी की कहानी अभी बाकी थी — क्योंकि उस रात, जब सब कुछ खत्म हो गया था, जब देशपांडे अपने घर लौट गए थे और रोहन अपने फ्लैट पर आराम कर रहा था, मानवी ने गैलरी का एक आखिरी चक्कर लगाया — और उसकी नज़र उस पेंटिंग पर पड़ी, जो गैलरी के सबसे अंदरूनी कोने में लगी थी, धूल से ढकी हुई, और जिसे उसने पहले कभी नहीं देखा था — एक छोटी-सी पेंटिंग, जिसमें एक बूढ़ी औरत थी, एक ऐसी औरत जिसकी आँखें बहुत उदास थीं, और जिसके नीचे लिखा था — "मेरी माँ — जिसने मुझे ब्रश दिया था — और जिसे मैंने कभी अपनी कला नहीं दिखाई — वसुंधरा की माँ — 1962।" मानवी ने पेंटिंग को साफ़ किया — और उसी पल, उसके फोन की घंटी बजी — रात के दो बजे — और स्क्रीन पर, उसी बिना-नंबर वाले चित्र से, एक मैसेज आया — "मानवी — तुमने मेरी कहानी पूरी की — अब एक और कहानी है — मेरी माँ की — जिसने मुझे ब्रश दिया था, पर जिसे मैंने कभी अपनी पेंटिंग नहीं दिखाई, क्योंकि वो मुझसे नाराज़ थी कि मैंने कला को अपना पेशा बनाया — और वो आज भी कहीं है, इसी शहर में, और उसे नहीं पता कि उसकी बेटी अब अमर हो गई है — क्या तुम उसे ढूँढोगी? क्या तुम उसे बताओगी कि उसकी बेटी ने वो कर दिखाया जो कोई नहीं कर पाया — उसने अपनी कला को मुक्त कर दिया — और उसकी आखिरी इच्छा यह थी कि उसकी माँ उसकी पेंटिंग देखे, और उसे कहे — 'बेटी, मुझे तेरे पर नाज़ है' — क्योंकि हर कलाकार को अपनी कला से ज़्यादा अपने माता-पिता के नाज़ की ज़रूरत होती है, और मुझे वो नाज़ साठ साल से नहीं मिला — क्या तुम मुझे वो दिलाओगी?"

मानवी ने मैसेज पढ़ा — और उसकी आँखों में आँसू आ गए, क्योंकि उसे समझ आ गया कि कुछ कहानियाँ कभी खत्म नहीं होतीं, वो बस अपने अगले अध्याय का इंतज़ार करती हैं — और उसने अपने फोन में लिखा — "मैं ढूँढूँगी, वसुंधरा जी — मैं आपकी माँ को ढूँढूँगी, और मैं उन्हें आपकी पेंटिंग दिखाऊँगी — बस आप मुझे उनका पता बताइए।" और जवाब आया, तुरंत — "उनका नाम है कमला कानूनगो — और वो आज भी उसी घर में रहती हैं, जहाँ मैं पली थी — पुणे के पुराने शहर में, उस घर में जिसकी खिड़की पर आज भी मेरे बचपन की एक तस्वीर लटकी है — जाओ, मानवी, और उन्हें बताओ कि उनकी बेटी ने अपनी मुस्कान वापस पा ली है — और उन्हें यह भी बताओ कि मैंने उन्हें कभी दोष नहीं दिया, क्योंकि मुझे पता है कि माता-पिता हमेशा अपने बच्चों की भलाई चाहते हैं, बस कभी-कभी वो भलाई का रास्ता ग़लत चुन लेते हैं — और मेरी माँ ने भी वही किया था — पर आज, मैं चाहती हूँ कि वो मुझे मेरी कला में देखें, और मुझे बताएँ कि वो मुझसे नाराज़ नहीं हैं — क्योंकि एक कलाकार की सबसे बड़ी क़ामयाबी उसकी कला नहीं, उसके माता-पिता की मुस्कान होती है, और मुझे वो मुस्कान चाहिए — साठ साल बाद, पर चाहिए।"

**⏳ सस्पेंस — क्या मानवी वसुंधरा की माँ को ढूँढ पाएगी...? और क्या साठ साल बाद एक माँ अपनी बेटी की कला को पहचानेगी...?**

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